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अखिलेश यादव सरकार में केवल मुसलमानों का कल्याण


उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति किसी से छिपी नहीं है। सपा ने खुद को हमेशा अल्पसंख्यकों की पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के बीच अपना जनाधार बनाए रखने के लिए पार्टी ने अपने विभिन्न कार्यकालों में अनेक योजनाओं के केंद्र बिंदु में मुस्लिमों को ही रखा। यहां तक कि कई योजनाओं तो उन्होंने सिर्फ मुस्लिमों के लिए ही शुरू कीं। मुलायम सिंह यादव के दौर से लेकर अखिलेश यादव के कार्यकाल तक अल्पसंख्यक कल्याण को राजनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान दिया गया। यही कारण है कि भाजपा सहित अन्य दल अक्सर समाजवादी पार्टी पर “मुस्लिम तुष्टिकरण” की राजनीति करने का आरोप लगाते रहे हैं।

सपा ने चार कार्यकाल में मुस्लिमों में ही पहचान बनाई

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार चार प्रमुख कार्यकालों में सत्ता में रही। मुलायम सिंह यादव 1989-91, 1993-95 और 2003-07 के बीच मुख्यमंत्री रहे, जबकि अखिलेश यादव ने 2012 से 2017 तक राज्य की कमान संभाली। इन अवधियों में मुस्लिम समुदाय की शिक्षा, छात्रवृत्ति, रोजगार, मदरसा आधुनिकीकरण, अल्पसंख्यक महिलाओं के उत्थान और सामाजिक सुरक्षा के लिए कई योजनाएं लागू की गईं। मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी ने अल्पसंख्यक कल्याण को अपनी राजनीति और शासन की केंद्रीय धुरी बनाए रखा। छात्रवृत्ति, मुस्लिम लड़कियों के लिए आर्थिक सहायता, मदरसा आधुनिकीकरण, उर्दू शिक्षा और आरक्षण की मांग जैसी पहलों ने मुस्लिम समुदाय के बीच पार्टी की मजबूत पहचान बनाई। दूसरी ओर, इन्हीं नीतियों को विपक्ष ने “मुस्लिम तुष्टिकरण” करार दिया।

कब्रिस्तानों की चारदीवारी योजना: वोट बैंक के लिए कब्जे 

अखिलेश यादव सरकार के सबसे चर्चित फैसलों में से एक राज्यभर के कब्रिस्तानों की चारदीवारी का निर्माण था। वर्ष 2012-13 के बजट में इसके लिए विशेष प्रावधान किया गया। सरकार का तर्क था कि भूमि विवादों और अतिक्रमण को रोकने के लिए यह कदम आवश्यक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हजारों कब्रिस्तानों की चारदीवारी के लिए एक हजार करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च किए गए। विपक्ष ने इसे खुलकर मुस्लिम तुष्टिकरण बताया। यह योजना मुस्लिम समाज में बेहद लोकप्रिय रही और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक इसका राजनीतिक प्रभाव देखने को मिला। सपा सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग मो. आजम खां के पास था। उन्होंने ही कब्रिस्तानों की चारदीवारी के निर्माण की योजना चलाई। इस योजना पर पांच साल में 1200 करोड़ रुपये खर्च किए गए। जबकि हकीकत यह है कि कई जिलों में योजना पर काम ही नहीं हुआ। जहां काम हुआ भी वहां भी घपले की शिकायतें हैं।

लैपटॉप वितरण योजना में उर्दू शिक्षा और उर्दू सॉफ्टवेयर को बढ़ावा

अखिलेश यादव सरकार ने लैपटॉप वितरण योजना में उर्दू सॉफ्टवेयर शामिल करने की घोषणा की। रामपुर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने कहा था कि विद्यार्थियों को दिए जाने वाले लैपटॉप में हिंदी और अंग्रेजी के साथ उर्दू सॉफ्टवेयर भी उपलब्ध कराया जाएगा। मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग ने इसे उर्दू भाषा के संरक्षण और डिजिटल युग में उसके विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना।

सच्चर समिति के तहत मुस्लिमों को सरकारी नौकरी में आरक्षण की पैरवी

दिसंबर 2012 में समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा कि सत्ता में आने पर सपा विधि विषेशज्ञों की राय लेकर केरल तथा आंध्र प्रदेश की तर्ज पर मुसलमानों को इतना आरक्षण देगी, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों के आधार पर मुसलमानों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण दिलाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाएंगे। हालांकि यह नीति पूरी तरह लागू नहीं हो सकी, लेकिन मुस्लिम समुदाय के बीच इसे सपा की राजनीतिक प्रतिबद्धता के रूप में प्रस्तुत किया गया।

‘हमारी बेटी उसका कल’: मुस्लिम लड़कियों के लिए सबसे चर्चित योजना

10 दिसंबर 2012 को रामपुर में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने “हमारी बेटी उसका कल” योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत हाईस्कूल उत्तीर्ण अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों को 30,000 रुपये की एकमुश्त सहायता दी जाती थी। इसका उद्देश्य लड़कियों की उच्च शिक्षा को बढ़ावा देना और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को विवाह संबंधी सहायता देना था। योजना का सबसे बड़ा लाभ मुस्लिम छात्राओं को मिला। क्योंकि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदाय का है। प्रारंभिक चरण में लगभग 14,000 लड़कियों को इसका लाभ मिला। बाद में यह संख्या और बढ़ी। सरकार ने इस योजना के लिए लगभग 250 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। “हमारी बेटी उसका कल” योजना को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका तक दाखिल हुई थी।

 वोट बैंक को साधने के लिए 84 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे

2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम मतदाताओं को साधने के लिए बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार समाजवादी पार्टी ने 2012 विधानसभा चुनाव में लगभग 84 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। सपा के 42 मुस्लिम उम्मीदवार विजयी होकर विधानसभा पहुंचे थे। उस चुनाव में कुल 63 मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचे थे, जिनमें सबसे अधिक सपा के थे। 15 मार्च 2012 को बनी पहली अखिलेश यादव सरकार में कुल 48 मंत्रियों ने शपथ ली थी। इनमें 9 मुस्लिम मंत्री शामिल थे।
प्रदेश में हज यात्रियों के लिए सुविधाओं का विस्तार
मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अखिलेश सरकार ने हज यात्रियों की सुविधा के लिए लखनऊ हज हाउस और अन्य व्यवस्थाओं का विस्तार किया। हज प्रशिक्षण शिविरों, आवास और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर जोर दिया गया। गाजियाबाद में 1886 हज यात्रियों के रुकने के लिए बनाए गए हज हाउस में शासन ने 51.16 करोड़ रुपये खर्च किए। 11 साल में बनकर तैयार हुए इस हज हाउस शिलान्यास 30 मार्च 2005 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम ¨सिंह ने किया था और उद्घाटन उनके पुत्र व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 5 सितंबर 2016 को किया। नगर विकास मंत्री आजम खान ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 16 जिलों के हज पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए जाने के लिए व्यवस्था की गई है।

हिन्दू विरोधी समाजवादी पार्टी : मुलायम से अखिलेश तक मुसलमानों को खुश रखने हिन्दुओं को गोली और गाली

जिस पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह से लेकर वर्तमान सर्वेसर्वा अखिलेश यादव हिन्दू होते हुए जब सिर्फ सत्ता की खातिर मुस्लिम वोटबैंक को खुश रखने जब सनातन पर ही हमलावर हो सकते हैं किसी और के क्या हो सकते हैं? हैरानी होती है समाजवादी पार्टी को वोट देने वाले हिन्दुओं पर चाहे वह किसी भी जाति से हों, जो हिन्दू विरोधी पार्टी को वोट देते हैं। जाति से पहले धर्म आता है जब धर्म ही नहीं रहेगा जाति क्या करेगी? सनातन को गाली देना और हिन्दुओं को जातियों में बांटकर राज करने की मंशा रखने वालों से जनहित की कामना करना अंधे कुएं में चीखने से कम नहीं।    
समाजवादी पार्टी ने वर्षों तक खुद को समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का चेहरा बताने की कोशिश की, लेकिन हकीकत में उसकी राजनीति का सबसे बड़ा सच हमेशा हिंदू विरोध और मुस्लिम तुष्टिकरण ही रहा। मुलायम सिंह यादव के दौर में अयोध्या में कारसेवकों पर चली गोलियां केवल फायरिंग नहीं थीं, बल्कि करोड़ों रामभक्तों की आस्था पर सीधा हमला था। “परिंदा भी पर नहीं मार सकता” जैसे अहंकारी बयान से लेकर राम मंदिर आंदोलन को सांप्रदायिक उन्माद बताने तक, सपा ने हमेशा हिंदू भावनाओं को संदेह और शत्रुता की नजर से देखा। समय बदला, चेहरे बदले, लेकिन सोच नहीं बदली। अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी वही राजनीति नए रूप में सामने आती रही है। कभी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से दूरी, कभी कुंभ और कांवड़ यात्रा पर तंज, तो कभी रामचरितमानस पर विवादित बयान देने वाले नेताओं पर नरम रुख…यह सब बताता है कि अखिलेश यादव की भी राजनीति में हिंदू आस्था के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि वोट बैंक का गुणा-भाग ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है।

हिंदू समाज की धार्मिक आस्था और भावनाओं पर शब्दों की गोलियां
सपा सुप्रीमो रहे मुलायम सिंह यादव के दौर में कारसेवकों पर गोलियां चली थीं, तो आज सपा नेताओं के बयानों से हिंदू समाज की धार्मिक आस्था और भावनाओं पर शब्दों की गोलियां चलाई जाती हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं द्वारा रामचरितमानस को बकवास कहना हो या सनातन परंपराओं को कटघरे में खड़ा करना, सपा नेतृत्व हर बार या तो चुप दिखाई दिया या बचाव की मुद्रा में खड़ा नजर आता है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश का बहुसंख्यक समाज बार-बार सपा की राजनीति को नकारता रहा है। जनता समझ चुकी है कि जो पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए बहुसंख्यकों की आस्था को चोट पहुंचाने में संकोच नहीं करती, वह समाज को जोड़ने नहीं, बांटने की राजनीति करती है। यही वजह है कि सपा को सत्ता से बेदखली का दर्द बार-बार झेलना पड़ा और हिंदू समाज का अविश्वास उसके साथ लगातार गहराता चला गया।

समाजवादी पार्टी के नेताओं ने मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने हिंदुओं का, उनकी आस्था का और सनातन संस्कृति का विरोध और अपमान किया

कांवड़ यात्रा के नाम पर ध्रुवीकरण — अखिलेश यादव
जुलाई 2025
कांवड़ यात्रा मार्गों पर प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर धार्मिक ध्रुवीकरण का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि सपा हमेशा कांवड़ यात्रा और सनातन परंपराओं को राजनीतिक चश्मे से देखती है।

मंदिरों पर कब्जा कर रही BJP – अखिलेश यादव
मई 2025
बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन विवाद पर अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा “मंदिरों पर अप्रत्यक्ष कब्जा” कर रही है। भाजपा नेताओं ने कहा कि सपा मंदिर प्रशासन को लेकर भ्रम फैलाकर धार्मिक राजनीति कर रही है।

गौशाला को ‘दुर्गंध’ बताने पर अखिलेख के खिलाफ मोर्चा खोला
2 अप्रैल 2025
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को घेरने की तैयारी कर ली है। दरअसल अखिलेश यादव ने पिछले दिनों कन्नौज में कहा था कि भाजपा वाले दुर्गंध पसंद करते हैं इसलिए गौशाला बना रहे हैं। हम सुगंध पसंद कर रहे थे इसलिए इत्र पार्क बना रहे थे। भाजपा ने दुर्गंध के मुद्दे को गाय और गौशाला का अपमान बताते हुए यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

राम लला की प्राण प्रतिष्ठा BJP-RSS का राजनीतिक कार्यक्रम बताया
11 जनवरी 2024
मुलायम सिंह यादव ने राम मंदिर आंदोलन का विरोध किया था और अब उनके पुत्र राम मंदिर के विरोध पर उतर आए हैं। राम लला मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर अखिलेश यादव ने दूरी बनाते हुए कहा कि वह इसमें नहीं जाएंगे। उन्होंने इस भव्य-दिव्य राम जन्मभूमि न्यास के कार्यक्रम को बीजेपी और आरएसएस का कार्यक्रम बताया। सपा द्वारा इस कार्यक्रम को “राजनीतिक आयोजन” कहने के बाद भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि सपा राम मंदिर आंदोलन से आज भी असहज है।

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होने से इनकार
9 जनवरी 2024
विश्व हिंदू परिषद के प्रतिनिधि जब राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण देने पहुंचे, तब पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यह कहते हुए निमंत्रण लेने से इनकार कर दिया कि “हम उन्हें नहीं जानते, जो निमंत्रण देने आए हैं।” इस घटना के बाद भाजपा ने उन पर राम मंदिर आंदोलन और सनातन आस्था का अपमान करने का आरोप लगाया।

राम मंदिर का उद्घाटन मार्केटिंग इवेंट है – एसटी हसनसमाजवादी पार्टी राम मंदिर का शुरू से ही विरोध करती आ रही है और इसमें अड़ंगे डालने में लगी है। अब समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद और वरिष्ठ नेता ने एसटी हसन ने राम मंदिर के उद्घाटन को भाजपा का एक ‘राजनीतिक कार्यक्रम’ और ‘मार्केटिंग इवेंट’ करार दे दिया। दूसरी ओर सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने अक्सर राम मंदिर आंदोलन से जुड़े संतों या हिंदू धर्मगुरुओं पर तंज कसते हुए उन्हें पाखंडी या राजनीतिक फायदे के लिए काम करने वाला बताया है।

सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने हिंदू धर्म को धोखा बताया
28 अगस्त 2023
सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के रामचरितमानस प्रकरण के बाद दिए बयान से बवाल मच गया। हिंदू धर्म को धोखा बतानेवाले स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान की चारों तरफ निंदा होने लगी है। अयोध्या के साधु-संतों ने भी बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। रामजन्मभूमि के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि स्वामी प्रसाद मौर्य बौखला गए हैं। उनको बोलने का ज्ञान नहीं है और स्वामी प्रसाद मौर्य ऊटपटांग बोलते हैं।

सपा समर्थकों ने पावन रामचरितमानस की प्रतियां जलाईं
29 जनवरी 2023
स्वामी प्रसाद मौर्य के समर्थन में कुछ लोगों द्वारा रामचरितमानस की प्रतियां जलाने का वीडियो वायरल हुआ। इस घटना के बाद भाजपा ने आरोप लगाया कि सपा नेताओं के बयानों ने धार्मिक उन्माद पैदा किया। (Reddit)

रामचरितमानस बकवास है – स्वामी प्रसाद मौर्य
24 जनवरी 2023
रामचरितमानस विवाद के बीच स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि “यह सब बकवास है।” इस बयान के बाद संत समाज, अखाड़ा परिषद और कई हिंदू संगठनों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किए। भाजपा ने आरोप लगाया कि सपा नेतृत्व जानबूझकर सनातन ग्रंथों को निशाना बना रहा है। समाजवादी पार्टी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि रामचरितमानस की कुछ चौपाइयां दलितों और पिछड़ों का अपमान करती हैं। उन्होंने मांग की कि “आपत्तिजनक हिस्सों को हटाया जाए या किताब पर प्रतिबंध लगाया जाए।” इस बयान के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए और उनके खिलाफ कई FIR दर्ज हुईं।

भगवा राजनीति देश के लिए खतरा — मुलायम सिंह यादव
अप्रैल 2009
लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान लखनऊ में बोलते हुए मुलायम सिंह यादव ने भाजपा और हिंदुत्व राजनीति पर हमला किया। यादव ने भगवा राजनीति को देश के लिए खतरा बता दिया। भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री को घेरते हुए इसे हिंदू धार्मिक पहचान को कट्टरवाद से जोड़ने की कोशिश बताया।

देश मिथकों से नहीं विकास से चलता है – अमर सिंह
सितंबर 2007
रामसेतु विवाद के दौरान नई दिल्ली में समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह ने कहा कि “देश मिथकों से नहीं, विकास से चलता है।” रामसेतु पर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के हलफनामे के बीच, रामसेतु को मिथक बताने वाला यह बयान बड़ा विवाद बन गया।

राम मंदिर आंदोलन ने देश बांटा – मुलायम सिंह यादव
अगस्त 2003
मुलायम सिंह यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राम मंदिर आंदोलन ने “देश को बांटने का काम किया।” विश्व हिंदू परिषद और रामभक्त संगठनों ने इसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था का अपमान बताया।

अयोध्या की पूरी जमीन ही विवादित, निर्माण का अधिकार नहीं
27 फरवरी 2003
लोकसभा में बोलते हुए सपा सांसद मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अयोध्या की पूरी जमीन विवादित है। जब तक इसका फैसला नहीं हो जाता तब तक किसी भी पक्ष को कोई भी निर्माण कार्य करने का अधिकार नहीं है और न किया जा सकता है। न ही हमारी पार्टी करने देगी।

साधु-संतों को ‘राजनीतिक एजेंट’ बताने पर विवाद
वर्ष 1995
लखनऊ में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और अन्य सपा नेताओं ने अपने बयान में राम मंदिर आंदोलन से जुड़े कई संतों और महंतों को “भाजपा के राजनीतिक एजेंट” कहा। संत समाज ने इसका तीखा विरोध किया। सपा नेता रामगोपाल यादव ने भाजपा पर राम के नाम के राजनीतिकरण और पेटेंट का आरोप लगाया था।

सपा राज में हनुमानगढ़ी के पास कारसेवकों पर गोलियां बरसाईं
2 नवंबर 1990
समाजवादी पार्टी के राज में अयोध्या की गलियों में एक बार फिर कारसेवकों की भारी भीड़ जुटी और हनुमानगढ़ी के पास पहुंचने पर सुरक्षा बलों ने दूसरी बार गोलियां बरसाईं। जोश और जुनून से भरे हजारों कारसेवकों को रोकने के लिए सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की। कोठारी बंधुओं समेत कई कारसेवकों की मौत हुई। हिंदू संगठनों ने इसे रामभक्तों पर दमन बताया। तब मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि देश की एकता के लिए हमें मस्जिद को बचाना पड़ा।
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पुरखे बताते थे महिलाओं की चड्डी का रंग, ग्रामीण-गरीब महिला आकर्षक नहीं होती; आज ‘सपोले’ बता रहे
पुरखे बताते थे महिलाओं की चड्डी का रंग, ग्रामीण-गरीब महिला आकर्षक नहीं होती; आज ‘सपोले’ बता रहे
 

मुलायम सरकार में अयोध्या में गोली कांड
30 अक्टूबर 1990
अयोध्या में हजारों की संख्या में कारसेवक बाबरी मस्जिद की ओर बढ़ रहे थे और बैरिकेडिंग तोड़कर आगे निकलने लगे। तब मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर भीड़ को रोकने के लिए पुलिस ने गोली चलाने का आदेश दिया था, जिसमें कई कारसेवक मारे गए थे। राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग हुई, जिसमें कई लोगों की जान गई। यह घटना आज भी सपा के खिलाफ हिंदू विरोध का सबसे जीवंत उदाहरण है।

कर्नाटक : भगवा से नफरत करने वालों ने फिर बुर्का/हिजाब उछाला सियासत के बाजार में

                                                                                         प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: ChatGPT)
कांग्रेस हिन्दू-मुस्लिम कर ध्रुवीकरण खुद करती है फिर कहती है वोट चोरी हो गया। शाहबानो केस पार्लियामेंट से पलट तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का मिला "हार", दुनिया कहां जा रही है लेकिन कांग्रेस मुस्लिम महिलाओं को रूढ़िवाद में फंसा अपनी रोटियां सेंकने में लगी रहती है। और कट्टरपंथी इनकी रौ में बहने लगती है। उसका अंजाम क्या होता है यह टीवी पर जमने वाली चौपालों के अच्छी तरह देखा जा सकता है। यानि जब बुर्का/हिजाब के हक़ में बोलने वालों से पूछा जाता है कि "तुम्हारे घरों में कितनी महिलाएं 
बुर्का/हिजाब जवाब नहीं में मिलता है। यानि मुद्दे को उछालो और खुद मालपुए खाओ और जनता को हिन्दू-मुस्लिम झगडे में लड़ने दो। इतना ही नहीं वो बातें सामने आती है जिन्हे आज तक कट्टरपंथी मौलानाओं से जनता से छिपाया। अगर ये बातें सनातन में होती सनातन विरोधी खूब शोर मचाते, लेकिन एक मुसलमान है जो चुपचाप उन कुरीतियों को झेल रहा है।         

कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार अब खुलकर इस्लामी तुष्टिकरण पर उतर आई है। इसके लिए कांग्रेस सरकार ने साल 2022 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें शिक्षण संस्थानों में हिजाब-बुर्का जैसे इस्लामी मजहबी पहनावे पर बैन लगा दिया गया था। इसकी जगह कांग्रेस सरकार ने चुपचाप वो फैसला लागू किया है, जिसमें कलावा, जनेऊ, माला, रुद्राक्ष पहनने की भी अनुमति देने की आड़ ली गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने साल 2022 के उस ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया है, जिसने राज्य के शिक्षण संस्थानों में अनुशासन और एकरूपता लाने के लिए हिजाब और बुर्के जैसे मजहबी पहनावे पर प्रतिबंध लगाया था। सरकार ने बुधवार (13 मई 2026) को जारी अपने नए आदेश के जरिए ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित पहचान चिह्नों’ के नाम पर स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब की राह फिर से खोल दी है।

इस रिपोर्ट के माध्यम से हम आपको बताने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि गिरते हुए वोटबैंक को बचाने के लिए की गई ‘राजनीतिक सौदेबाजी’ है। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक गणित, गिरता हुआ वोटबैंक और तुष्टीकरण की वह पराकाष्ठा है, जिसने कर्नाटक के शैक्षणिक माहौल को एक बार फिर वैचारिक प्रयोगशाला बना दिया है।

साल 2022 का आदेश क्या था और क्यों जरूरी था?

दरअसल, फरवरी 2022 में बसवराज बोम्मई सरकार ने कर्नाटक शिक्षा अधिनियम के तहत स्पष्ट आदेश दिया था कि जहाँ यूनिफॉर्म निर्धारित है, वहाँ छात्रों को वही (यूनिफॉर्म) पहनना अनिवार्य है। कोई धार्मिक प्रतीक यूनिफॉर्म को बदल या प्रभावित नहीं कर सकता। उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ हिजाब विवाद पूरे राज्य में फैल गया था। मुस्लिम छात्राएँ हिजाब पहनकर क्लास में घुसने की जिद पर अड़ी रहीं। विरोध प्रदर्शन हुए, स्कूल बंद हुए।

कर्नाटक हाई कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने भी साल 2022 में साफ कहा था कि हिजाब कोई जरूरी मजहबी प्रथा नहीं है। यह व्यक्तिगत विश्वास का मुद्दा है, लेकिन स्कूल-कॉलेज जैसे सार्वजनिक संस्थानों में यूनिफॉर्म और अनुशासन पहले आते हैं। कोर्ट ने कहा, शिक्षा संस्थान वैज्ञानिक सोच, समानता और जॉतिवाद-निरपेक्षता सिखाने का केंद्र हैं, धार्मिक पहचान का नहीं। मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। फिर भी सिद्धारमैया सरकार ने बिना कोर्ट का इंतजार किए, चुपके से 2022 का आदेश वापस ले लिया। यह न्यायपालिका का मजाक है।

सीमित प्रतीकों की आड़ में कट्टरपंथ को न्योता

कांग्रेस सरकार द्वारा जारी नए सर्कुलर के बिंदु संख्या 3 और 4 को अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो सिद्धारमैया सरकार की मंशा साफ हो जाती है। आदेश में कहा गया है कि छात्र ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित प्रतीकों’ को निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ पहन सकते हैं। इसमें पेटा (पगड़ी), जनेऊ, शिवदारा, रुद्राक्ष और ‘सिर का कपड़ा’ (हिजाब) शामिल हैं।

पहली नजर में यह आदेश सर्वधर्म समभाव जैसा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे की चालाकी को समझना जरूरी है। जनेऊ, रुद्राक्ष या कलावा जैसे प्रतीक सदियों से हिंदू छात्र पहनते आए हैं और ये कभी भी ‘यूनिफॉर्म’ के लिए बाधा नहीं बने। लेकिन इनकी आड़ लेकर हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिलाना सीधे तौर पर उस कट्टरपंथी एजेंडे को खाद-पानी देना है, जिसे 2022 में कोर्ट और तत्कालीन सरकार ने खारिज कर दिया था। यह सशक्तिकरण नहीं है, बल्कि कक्षाओं के भीतर धार्मिक पहचान का संस्थानीकरण (Institutionalization) है। स्कूल वह स्थान हैं जहाँ बच्चों के दिमाग मुक्त, जिज्ञासु और समान होने चाहिए, न कि ऐसी जगह जहाँ राजनीतिक दल वोटबैंक की खातिर अलगाववाद को बढ़ावा दें।

पहचान का संकट, जनेऊ बनाम हिजाब का तर्क

कांग्रेस सरकार ने इस आदेश को लागू करने के लिए जिस तर्क का सहारा लिया है, वह बेहद चालाकी भरा है। सरकार ने कहा है कि छात्रों को जनेऊ, कलावा, माला और रुद्राक्ष जैसे पारंपरिक चिह्न पहनने की अनुमति दी जाएगी और इसी की आड़ में हिजाब को भी शामिल कर लिया गया। लेकिन यहाँ एक बुनियादी फर्क है जिसे कांग्रेस सरकार ने जानबूझकर नजरअंदाज किया है।

जनेऊ, कलावा और रुद्राक्ष ऐसे धार्मिक प्रतीक हैं जो व्यक्ति की पहचान को कभी नहीं छिपाते। जनेऊ वस्त्रों के भीतर पहना जाता है, कलावा कलाई पर बंधा एक साधारण धागा होता है और रुद्राक्ष भी गले में कमीज के नीचे रहता है। इनसे न तो छात्र की पहचान संदिग्ध होती है और न ही कक्षा के अनुशासन में कोई बाधा आती है। इसके विपरीत, हिजाब और बुर्का सीधे तौर पर छात्र की पहचान को ढक लेते हैं।

दुनिया के कई विकसित और धर्मनिरपेक्ष देशों जैसे फ्रांस, बेल्जियम और ऑस्ट्रिया में सार्वजनिक स्थानों और स्कूलों में चेहरे को ढकने वाले पहनावे पर प्रतिबंध है। इसका कारण धार्मिक घृणा नहीं, बल्कि ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ (Public Security) और ‘समानता’ है। लेकिन कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने इन वैश्विक मानकों और सुरक्षा चिंताओं को ताक पर रखकर केवल इस्लामी वोटबैंक को खुश करने के लिए यह कदम उठाया है।

जनेऊ और कलावा की आड़ में हिजाब का खेल

इस आदेश के बैकग्राउंड में अप्रैल 2026 की एक घटना के बारे में बताना जरूरी है। दरअसल, कांग्रेस सरकार ने अप्रैल 2026 में हुई उस घटना का हवाला दिया जिसमें एक हिंदू छात्र का जनेऊ उतरवा लिया गया था। असल में वह घटना ‘हिंदू घृणा’ का सीधा उदाहरण थी, क्योंकि जनेऊ एक पवित्र धागा है जो कपड़ों के नीचे रहता है।

लेकिन कांग्रेस सरकार ने इस जन-आक्रोश का समाधान करने के बजाय, इसे एक अवसर की तरह इस्तेमाल किया। सरकार ने जनेऊ उतरवाने की घटना पर दिखावे का दुख जताया और फिर ‘समानता’ का ढोंग करते हुए हिजाब को भी अनुमति दे दी। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी की उंगली कटने पर मरहम लगाने के बहाने आप उसके दूसरे हाथ को ही काट दें। जनेऊ की आड़ में हिजाब को वैध करना कांग्रेस की उस ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का सबसे बड़ा प्रमाण है, जिसमें हिंदुओं की भावनाओं को केवल तुष्टीकरण के मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

उस विवाद को ढाल बनाकर सरकार ने हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिला दिया, जो कि विशुद्ध रूप से इस्लामी कट्टरपंथियों को खुश करने की एक कोशिश है।

न्यायपालिका की अवमानना और वैधानिक संकट

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हिजाब का मामला वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष लंबित है। इससे पहले, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपने फैसले में कहा था कि ‘हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) नहीं है’। जब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में विचाराधीन है, तो आखिर ऐसी क्या जल्दी थी कि सिद्धारमैया सरकार को मई 2026 में ही यह आदेश जारी करना पड़ा?

यह फैसला न केवल न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाता है, बल्कि उस संवैधानिक गरिमा पर भी प्रहार करता है जिसका गुणगान राहुल गाँधी और कांग्रेस के नेता हर मंच से करते हैं। मुख्यमंत्री ने अदालती प्रक्रिया का इंतजार करने के बजाय अपनी कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग कर ध्रुवीकरण का रास्ता चुना है। यह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) द्वारा अपनाए गए उसी खतरनाक रास्ते की तरह है, जहाँ वोट के लिए संस्थानों की शुचिता को दाँव पर लगा दिया जाता है।

चुनावी हार का डर और तुष्टीकरण का सहारा

इस फैसले की टाइमिंग पर गौर करना बेहद जरूरी है। आगामी शनिवार, यानी 16 मई 2026 को बेंगलुरु में मुस्लिम संगठनों और एसडीपीआई (SDPI) की एक बहुत बड़ी रैली होने वाली है। यह रैली किसी और के खिलाफ नहीं, बल्कि कांग्रेस सरकार के ही खिलाफ आयोजित की गई है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कॉन्ग्रेस की जो दुर्गति हुई, उसने पार्टी आलाकमान की नींद उड़ा दी है।

दरअसल, इस फैसले के पीछे का असली खेल ‘नंबर गेम’ है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस को जो झटका लगा, उसने सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार की रातों की नींद हराम कर दी है। मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार समर्थ शमनूर मल्लिकार्जुन को मुस्लिम समुदाय का वह समर्थन नहीं मिला जिसकी पार्टी को उम्मीद थी।

वहाँ एसडीपीआई (SDPI) ने भारी सेंधमारी की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम मतदाता अब कांग्रेस को अपनी जागीर नहीं मान रहे हैं। मुस्लिम बहुल सीट होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार की मुश्किल से हुई जीत और एसडीपीआई को मिले भारी वोटों ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस का पारंपरिक मुस्लिम वोटबैंक अब उसके हाथ से खिसक रहा है।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा डर शनिवार (16 मई 2026) को होने वाली बेंगलुरु की विशाल रैली है। चूँकि अब कांग्रेस को डर है कि अगर यह रैली सफल हो गई, तो आगामी विधानसभा चुनाव में उसका ‘मुस्लिम वोटबैंक’ पूरी तरह बिखर जाएगा। इसी रैली की हवा निकालने के लिए और कट्टरपंथियों को यह संदेश देने के लिए कि ‘कांग्रेस उनकी सबसे बड़ी हितैषी है’, यह हिजाब वाला आदेश चुपचाप लागू किया गया। यह एक राजनीतिक ‘रिश्वत’ (Political Bribe) है जो छात्रों के भविष्य की कीमत पर दी गई है।

टीएमसी के बंगाल फॉर्मूले की राह पर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार

कांग्रेस कर्नाटक को उसी रास्ते पर ले जा रही है जिस पर ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को पहुँचाया है। तुष्टीकरण की यह राजनीति शुरू में तो फायदे का सौदा लगती है, लेकिन अंत में यह राज्य के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर देती है। स्कूलों को धार्मिक पहचान का प्रदर्शन स्थल बनाकर कांग्रेस आने वाली पीढ़ी के मन में ‘हम’ और ‘वे’ की भावना पैदा कर रही है।

हिंदू छात्रों के प्रतीकों (जनेऊ, कलावा) का उपयोग केवल एक ‘शील्ड’ के रूप में किया जा रहा है ताकि कोई उन पर सीधा आरोप न लगा सके। लेकिन सच्चाई यह है कि हिंदू प्रतीकों को तो स्कूलों में हमेशा से हतोत्साहित किया गया है। सीईटी (CET) परीक्षा के दौरान जिस तरह जनेऊ उतरवाए गए, वह कांग्रेस की असली मानसिकता को दर्शाता है। एक तरफ हिंदू प्रतीकों के प्रति ‘असहिष्णुता’ और दूसरी तरफ हिजाब के लिए ‘असीम प्रेम’ यह विषमता कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक वास्तुकला (Architecture) है।

क्या 2028 में उलट जाएगा दाँव?

कांग्रेस को उम्मीद है कि हिजाब की वापसी से वह 16 मई की रैली के प्रभाव को कम कर देगी और मुस्लिम मतदाताओं को फिर से रिझा लेगी। लेकिन यह दाँव उल्टा भी पड़ सकता है। कर्नाटक की जनता देख रही है कि किस तरह एक खास समुदाय को खुश करने के लिए शिक्षा के स्तर और स्कूलों के अनुशासन से समझौता किया जा रहा है।

अगर इस फैसले के खिलाफ राज्य का हिंदू समाज एकजुट होता है, तो 2028 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथ से कर्नाटक भी निकल जाएगा। जनता यह समझ रही है कि जो सरकार बच्चों की शिक्षा को राजनीति का मोहरा बना सकती है, वह राज्य का भला कभी नहीं कर सकती। ‘इव नम्मव’ (यह हमारा है) का नारा देने वाली सरकार ने असल में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपना ली है।

कर्नाटक सरकार का यह आदेश समावेशिता के नाम पर समाज को बाँटने वाला कदम है। शिक्षा के अधिकार और धार्मिक पहचान के बीच संतुलन बनाने का दावा करने वाली कॉन्ग्रेस ने असल में तुष्टीकरण की वेदी पर ‘संवैधानिक समानता’ की बलि चढ़ा दी है। स्कूलों में हिजाब की वापसी केवल एक वस्त्र की वापसी नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता की वापसी है जो आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बजाय मध्यकालीन पहचान को प्राथमिकता देती है। अब देखना यह है कि क्या कर्नाटक की जनता तुष्टीकरण की इस राजनीति को स्वीकार करेगी या 2028 में इसका निर्णायक जवाब देगी।

प्राइवेट पार्ट पर बात, गंदे इशारे और देवी-देवताओं का अपमान: नासिक TCS मामले में मुस्लिम गैंग कैसे करते थे हिंदू महिलाओं को परेशान, 9 FIR की सारी डिटेल्स


नासिक के अशोका मार्ग पर स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के बीपीओ यूनिट से हिंदू महिला कर्मचारियों के साथ यौन उत्पीड़न, शारीरिक दुर्व्यवहार और धर्म के आधार पर भेदभाव का एक बेहद परेशान करने वाला मामला सामने आया। महज 48 घंटों के भीतर, मुंबई नाका पुलिस स्टेशन में एक ही विभाग के पाँच मुस्लिम पुरुष कर्मचारियों के खिलाफ कई FIR दर्ज की गई हैं। ऑपइंडिया (OpIndia) के पास मौजूद इन FIR की कॉपियों से पता चला है कि इस BPO में काम करने वाली हिंदू महिलाएँ पिछले कई सालों से यौन शोषण और धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हो रही थीं।

इन मामलों में आरोपित शाहरुख कुरैशी, रजा मेमन, आसिफ अंसारी, तौसीफ अत्तर और शफी शेख सभी ओडीसी-02 (ODC-02) यूनिट से जुड़े हैं, जो कॉलिंग के जरिए एक्सिस बैंक क्रेडिट कार्ड कलेक्शन का काम संभालते हैं। दर्ज की गई शिकायतों में तीन हिंदू महिला कर्मचारियों (जिनमें दो 23 साल की सहयोगी और एक 36 साल की टीम लीडर) ने दफ्तर के बेहद खराब माहौल का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि वहाँ लगातार यौन उत्पीड़न, निजी जिंदगी को लेकर बेतुके सवाल, गलत तरीके से छूने की कोशिश और हिंदू धार्मिक मान्यताओं पर अपमानजनक टिप्पणियाँ की जाती थीं।

(FIR नंबर: 156/2026) हिंदू देवी-देवताओं पर अश्लील टिप्पणी और यौन शोषण

नासिक की TCS कंपनी में काम करने वाली एक 23 वर्षीय हिंदू छात्रा ने सहकर्मी दानिश शेख, तौसीफ अख्तर और निदा खान के खिलाफ यौन उत्पीड़न और धार्मिक प्रताड़ना पर रिपोर्ट दर्ज कराई है। FIR के अनुसार, आरोपित दानिश शेख ने अपने निकाह और दो बच्चों की बात छिपाकर युवती को प्रेम जाल में फँसाया और शादी का झांसा देकर जुलाई 2022 से फरवरी 2026 तक अलग-अलग होटलों में उसका शारीरिक शोषण किया। इस दौरान आरोपित तौसीफ और निदा खान ने पीड़िता को इस्लाम कबूलने के लिए मजबूर किया और शिवलिंग व भगवान कृष्ण सहित हिंदू देवी-देवताओं पर बेहद अश्लील और अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं।

हद तो तब हो गई जब तौसीफ अख्तर ने पीड़िता को ब्लैकमेल करते हुए ऑफिस की पेंट्री और लॉबी में यौन उत्पीड़न किया और धमकी दी कि यदि उसने उसकी शारीरिक माँगें पूरी नहीं कीं, तो वह उसके घर वालों को सब बता देगा। इस पूरे मामले में आरोपितों ने न केवल पीड़िता का विश्वास तोड़ा, बल्कि एक सोची-समझी साजिश के तहत उसकी धार्मिक भावनाओं और गरिमा को छलनी किया।

(FIR नंबर: 163/2026) रजा मेमन और शाहरुख पर गंभीर आरोप, हेड अश्विनी पर भी कार्रवाई

नासिक की TCS कंपनी (BPO यूनिट) में काम करने वाली एक 25 वर्षीय शादीशुदा महिला कर्मचारी ने टीम लीडर रजा मेमन और सहकर्मी शाहरुख कुरैशी के खिलाफ यौन उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना की रिपोर्ट दर्ज कराई। FIR के अनुसार, रजा मेमन मई 2023 से ही पीड़िता को अकेले पाकर गंदी नीयत से छूने, अश्लील पहेलियाँ बुझाने और घूरने जैसी हरकतें कर रहा था। पीड़िता की शादी होने के बाद आरोपित ने उसकी पर्सनल लाइफ पर भद्दे और ‘सेक्सुअली सजेस्टिव’ कमेंट्स किए, जैसे- ‘रात में क्या करती हो कि दिन में नींद आती है?’ और गोवा ट्रिप के नाम पर ‘हनीमून और शराब’ जैसे शर्मनाक सवाल पूछे।

                                                      ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त FIR की कॉपी

शिकायत में यह भी आरोप है कि जब पीड़िता ने विरोध किया, तो टीम लीडर रजा ने उसका नाम ऑफिस बॉय से जोड़कर चरित्र हनन किया और दानिश-तौसीफ के साथ मिलकर उस पर काम का बोझ बढ़वा दिया। हद तो तब हो गई जब गुड़ी पड़वा पर साड़ी पहनकर आने पर शाहरुख ने उसे गंदी नजरों से देखा और अश्लील टिप्पणी की। पीड़िता का सबसे गंभीर आरोप कंपनी की ऑपरेशनल हेड अश्विनी चौनानी पर है, जिन्होंने बार-बार शिकायत के बावजूद कोई एक्शन नहीं लिया, बल्कि आरोपितों का साथ देकर पीड़िता की आवाज दबाने की कोशिश की।

(FIR नंबर: 164/2026) हिंदू महिलाओं के अंगों को घूरते थे मुस्लिम कर्मचारी, मिसकैरेज होने पर जबरन ‘अजमेर के मौलवी’ के पास भेजने का दबाव

नासिक की TCS कंपनी में एक 36 वर्षीय हिंदू महिला टीम लीडर ने मुस्लिम सहकर्मियों के एक खास गुट पर धार्मिक प्रताड़ना और यौन उत्पीड़न का सनसनीखेज आरोप लगाया। FIR के अनुसार, शफी शेख, तौसीफ अत्तर, दानिश शेख, रज़ा मेमन और शाहरुख कुरैशी जैसे मुस्लिम कर्मचारी दफ्तर में एकजुट होकर गैर-मजहबी लड़कियों और लड़कों को चुन-चुनकर निशाना बनाते हैं। पीड़िता ने बताया कि आरोपित शफी शेख मीटिंग के दौरान सार्वजनिक रूप से उसके प्राइवेट पार्ट्स (छाती) को गंदी नजरों से घूरता था और विरोध करने पर गंदी मुस्कान देता था, जिसकी शिकायत के बावजूद उसे सिर्फ दूसरे विभाग में भेज दिया गया जहाँ से वह लगातार पीड़िता का पीछा करता रहा।

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हद तो तब पार हो गई जब फरवरी 2026 में पीड़िता का मिसकैरेज (गर्भपात) हुआ, तो तौसीफ अत्तर ने उसकी व्यक्तिगत पीड़ा का मजाक उड़ाते हुए उसे ‘अजमेर के मौलवी’ का नंबर दिया और जबरन वहाँ जाने का दबाव बनाया। आरोपितों पर आरोप है कि वे दफ्तर में हिंदू लड़कियों पर अश्लील कमेंट करते हैं, उन्हें सिर से पैर तक गंदी नजरों से घूरते हैं और उनकी निजी जिंदगी में दखल देकर उन्हें मजहबी आधार पर प्रताड़ित और शर्मिंदा करते हैं।

(FIR नंबर: 165/2026) हिंदू देवी-देवताओं पर भद्दी टिप्पणी और महिला कर्मचारी को प्राइवेट पार्ट दिखाकर किया यौन उत्पीड़न

नासिक की TCS कंपनी में कार्यरत 25 वर्षीय हिंदू महिला कर्मचारी ने बिजनेस प्रोसेस लीडर तौसीफ अत्तर के खिलाफ यौन प्रताड़ना और हिंदू धर्म के अपमान की FIR दर्ज कराई। FIR के अनुसार, आरोपित तौसीफ दफ्तर में हिंदू लड़कियों को सिर से पैर तक घूरता और उनके अंगों को देखकर आँखें मारता था। पीड़िता ने बताया कि तौसीफ आने-जाने वाली लड़कियों के फिजिकल साइज पर भी बात करता था। हद तो तब पार हो गई जब दिसंबर 2025 में पीड़िता को छाछ पीते देख आरोपित ने अपने प्राइवेट पार्ट की ओर इशारा करते हुए बेहद अश्लील टिप्पणी की और कहा- ‘मेरे पास भी छाछ है, तुझे चाहिए क्या?’

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 यही नहीं, आरोपित ने दफ्तर में हिंदू धर्म और आस्था पर भी जहरीला हमला बोला। पीड़िता की टेबल पर रखी महादेव की मूर्ति को देखकर मुझसे पूछा कि क्या महादेव सच में भगवान हैं? अगर पार्वती ने गणपति को बनाया, तो महादेव को इसके बारे में क्यों नहीं पता? गणेश सच में महादेव के बेटे है? यह कहते हुए तौसीफ ने देवी पार्वती के चरित्र पर कीचड़ उछाला। इसके अलावा, उसने भगवान ब्रह्मा के लिए भी टिप्पणी कर कहा कि ब्रह्मा अपनी ही बेटी का रेपिस्ट है। और प्रभु श्री राम व माता सीता के बारे में अपमानजनक बातें कहीं कि उन्होंने वनवास में मांस खाया होगा, वे कंद खाकर नहीं रह सकते। तौसीफ ने जहर उगलते हुए हिंदू देवताओं को ‘झूठा’ और ‘दिखावे वाला’ बताया और इस्लाम को श्रेष्ठ साबित करने के लिए हिंदू भावनाओं को बुरी तरह कुचला।

(FIR नंबर: 166/2026) हिंदू कर्मचारी को जबरन खिलाया नॉन-वेज, पत्नी के लिए बोली बेहद शर्मनाक बात

नासिक की TCS कंपनी में काम करने वाले एक वरिष्ठ विश्लेषक ने सहकर्मी तौसीफ अत्तर, दानिश शेख, शाहरुख शेख और रजा मेमन के खिलाफ FIR दर्ज कराई। FIR के अनुसार, ये आरोपित दफ्तर में एक संगठित गिरोह की तरह काम करते थे और हिंदू कर्मचारियों को निशाना बनाकर उनका धर्मांतरण कराने का दबाव डालते थे। पीड़ित, जो रुद्राक्ष की माला पहनते हैं और धार्मिक मार्ग पर चलते हैं, उन्हें आरोपितों ने मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। आरोपितों ने छत्रपति संभाजी महाराज को ‘इस्लाम का गुलाम’ बताकर अपमानित किया। हद तो तब हो गई जब आरोपितों ने पीड़ित के शाकाहारी होने के बावजूद उन्हें देर रात जबरन नॉन-वेज खिलाया और मना करने पर जान से मारने की धमकी दी।

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इस गिरोह की दरिंदगी यहीं नहीं रुकी। जब आरोपितों को पता चला कि पीड़ित की संतान नहीं हो रही है, तो तौसीफ और दानिश ने सारी मर्यादाएँ लाँघते हुए घटिया टिप्पणी की। आरोपितों ने पीड़ित से कहा, “दवा से बच्चे नहीं हो रहे, तो अपनी पत्नी को हमारे पास भेज दो।” इसके अलावा, पीड़ित को धोखे से घर ले जाकर जबरन टोपी पहनाई गई, कलमा पढ़वाया गया और उसकी तस्वीरें वायरल कर दी गईं। FIR में यह भी आरोप है कि ये आरोपित दफ्तर की महिलाओं को देखकर गंदे कमेंट्स करते थे और कहते थे कि ‘तुम जो भी पसंद करोगी, उसे खुश करना होगा।’ जब पीड़ित ने इस धर्मांतरण और उत्पीड़न का विरोध किया, तो उसे जान से मारने की धमकी दी गई और काम के बहाने प्रताड़ित किया गया।

(FIR नंबर: 167/2026) हिंदू महिला के अंगों को हाथ से छुआ, भगवान कृष्ण को बताया ‘औरतबाज’

नासिक की TCS कंपनी में 25 वर्षीय हिंदू महिला कर्मचारी (जो एक पावरलिफ्टर भी हैं) ने आसिफ अंसारी, शफी शेख और तौसीफ अत्तर के खिलाफ FIR दर्ज कराई। FIR के मुताबिक, आरोपित आसिफ अंसारी ने पीड़िता की छाती को सरेआम घूरते हुए अश्लील सवाल पूछा, “तुम्हारी पसंद छोटी है या बड़ी?” पीड़िता के वजन और शरीर की बनावट का मजाक उड़ाते हुए आरोपित तौसीफ और आसिफ उस पर गंदे कमेंट्स करते थे। दिसंबर 2024 में आरोपित शफी शेख ने पीड़िता के पास बैठकर पैर से पैर रगड़ा और काम सिखाने के बहाने उसके सीने और प्राइवेट पार्ट्स को हाथ से छुआ। जब पीड़िता ने विरोध किया, तो आरोपित गंदी मुस्कान देकर वहाँ से चला गया।

                                                 ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त FIR की कॉपी

यही नहीं, आरोपितों ने दफ्तर के माहौल को मजहबी जहर से भर दिया था। आरोपित तौसीफ अत्तर ने हिंदू आस्था को चोट पहुँचाने के लिए भगवान कृष्ण को ‘औरतबाज’ कहा और भगवान शिव व माता पार्वती के रिश्ते पर निहायत ही गंदी और अश्लील टिप्पणी की। पीड़िता का आरोप है कि ये आरोपित दफ्तर में एकजुट होकर हिंदू लड़कियों को उनके शरीर और धर्म के आधार पर शर्मिंदा करते थे।

(FIR नंबर: 168/2026) नई नवेली हिंदू दुल्हन से ‘हनीमून’ पर अश्लील सवाल, भगवान ‘नंगे’ रहने पर टिप्पणी

नासिक की TCS कंपनी से एक 23 वर्षीय विवाहित हिंदू महिला कर्मचारी ने शाहरुख कुरैशी, रजा मेमन, आसिफ अंसारी, तौसीफ अत्तर और शफी शेख के खिलाफ सामूहिक उत्पीड़न की FIR दर्ज कराई। FIR के अनुसार, पीड़िता की शादी के महज एक महीने बाद ही टीम लीडर रजा मेमन और शाहरुख कुरैशी ने उसे दफ्तर में घेर लिया और उसके हनीमून को लेकर गंदे और अश्लील सवाल पूछे लगे, जैसे- ‘हनीमून पर क्या किया? क्या तुम्हारे पति ने तुम्हें गाजर दी?’ आरोपितों ने पीड़िता का नाम ‘प्लेयर’ रख दिया था और उसे अपने पति को छोड़कर दूसरा बॉयफ्रेंड बनाने के लिए मजबूर किया।

                                            ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त FIR की कॉपी

प्रताड़ना का सिलसिला यहीं नहीं रुका। आरोपित आसिफ अंसारी दफ्तर में पीड़िता को जबरन गले लगा लेता था, उसकी कमर, पेट और जाँघों को गंदी नीयत से छूता था और उसके अंदर के कपड़ों (innerwear) के साइज के बारे में भद्दी बातें पूछता था। आरोपित तौसीफ अत्तर भी काम सिखाने के बहाने पीड़िता के अंगों पर हाथ फेरता था और ‘संतरे छोटे हैं या बड़े’ जैसी अश्लील टिप्पणियाँ करता था। आरोपितों ने हिंदू धर्म पर भी जहर उगला। आसिफ अंसारी ने कहा कि ‘तुम्हारे भगवान नंगे घूमते हैं और तुम लोग नकाब नहीं पहनती, इसीलिए तुम हिंदुओं का रेप होता है।’ गुड़ी पड़वा के दिन आरोपितों ने पीड़िता की साड़ी का पल्लू तक खींच लिया। इन दरिंदों ने पीड़िता को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया, जिससे वह दफ्तर जाने से भी डरने लगी थी।

(FIR नंबर: 169/2026) महिला कर्मचारी की बीमारी का मजाक उड़ाया, प्राइवेट पार्ट और ‘फिजिकल रिलेशन’ पर पूछते अश्लील सवाल

नासिक की TCS कंपनी से एक 23 वर्षीय हिंदू महिला कर्मचारी ने शफी शेख, रजा मेमन और शाहरुख कुरैशी के खिलाफ FIR दर्ज कराई। FIR के अनुसार, ट्रेनिंग के बहाने आरोपित शफी शेख पीड़िता को घेर लेता था और काम की जगह उसकी निजी जिंदगी पर गंदे सवाल पूछता था। शफी पीड़िता से पूछता था कि ‘क्या तुम्हारे अपने बॉयफ्रेंड के साथ फिजिकल रिलेशन (शारीरिक संबंध) रहे हैं?’ और ‘क्या तुम रात को सोई या नहीं?’। हद तो तब हो गई जब अगस्त 2025 में आरोपित ने कैंटीन में पीड़िता को अकेला पाकर जबरन ‘गर्लफ्रेंड’ बनने का दबाव बनाया, जिससे डरकर पीड़िता रोने लगी।
                                                 ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त FIR की कॉपी
शिकायत के मुताबिक, जब पीड़िता ने इसकी शिकायत अपने टीम लीडर रज़ा मेमन से की, तो उसने आरोपित शफी के खिलाफ एक्शन लेने के बजाय उसे शह दी और खुद भी पीड़िता का शोषण शुरू कर दिया। रजा मेमन ने पीड़िता की बीमारी (PCOD) का मजाक उड़ाते हुए उसके शरीर पर भद्दी टिप्पणियाँ कीं और उसे जिम जाने व फेशियल कराने की सलाह देते हुए गंदी नीयत से छूने की कोशिश की। आरोपित शाहरुख कुरैशी ने भी पीड़िता को व्यवस्थित ट्रेनिंग न देकर उसे शफी के हवाले कर दिया ताकि वे मिलकर उसे प्रताड़ित कर सकें। पीड़िता ने बताया कि आरोपित उस पर नजर रखते थे और उसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाते थे, जिससे वह दफ्तर में असुरक्षित महसूस करने लगी थी।

(FIR नंबर: 171/2026) हिंदू युवती के शरीर पर भद्दे कमेंट्स, गुड़ी पड़वा पर ड्रेस को लेकर उड़ाया मजाक और डाली गंदी नजर

नासिक की TCS कंपनी से 23 वर्षीय हिंदू पीड़िता ने रजा मेमन और शाहरुख कुरैशी के खिलाफ FIR दर्ज कराई है। FIR के अनुसार, शाहरुख कुरैशी पीड़िता को अकेले पाकर जबरन उसकी पर्सनल लाइफ, बॉयफ्रेंड और ‘एक्स’ के बारे में अश्लील सवाल पूछता था और माता-पिता की गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर उसे अपने साथ घूमने चलने के लिए दबाव डालता था। आरोपित रजा मेमन ने पीड़िता के शरीर पर भद्दे कमेंट्स करते हुए उसे ‘शेप में आने’ और जिम जाने जैसी शर्मनाक बातें कहीं।
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प्रताड़ना की हद तब पार हो गई जब 19 मार्च 2026 को गुड़ी पड़वा के पावन अवसर पर पीड़िता नई ड्रेस पहनकर ऑफिस आई। आरोपित रजा मेमन ने उसे सबके सामने बुलाकर सिर से पैर तक गंदी नजर से घूरा और हिंदू त्योहारों का अपमान करते हुए ताना मारा कि ‘क्या तुम पूजा नहीं करती, बस तैयार होकर ऑफिस आ जाती हो?’ आरोपितों ने दफ्तर में ऐसा खौफ पैदा कर रखा था कि पीड़िता शिकायत करने से भी डरती थी। पीड़िता का आरोप है कि ये लोग उस पर लगातार नजर रखते थे और गंदे इशारे कर उसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाते थे।

नासिक TCS कंपनी से सामने आई यह रिपोर्ट न केवल यौन उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना की पराकाष्ठा है, बल्कि एक इस्लामिक संगठित गिरोह द्वारा हिंदू आस्था और मानवाधिकारों पर किया गया गहरा प्रहार भी है। दफ्तर जैसे पेशेवर माहौल को मजहबी कट्टरता, लव जिहाद और धर्मांतरण की साजिशों का अड्डा बनाना समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह बेहद शर्मनाक है कि जहाँ महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान प्राथमिकता होनी चाहिए थी, वहाँ उनकी धार्मिक पहचान को हथियार बनाकर उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से छलनी किया गया।(साभार) 

सनातन की एकजुटता पर उठाओ सवाल ताकि उम्माह का रहे बोलबाला : क्यों तरुण हत्याकांड में वामपंथी हिंदुओं में ही भर रहे ‘ग्लानि’, क्या है स्ट्रैटेजी?

दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दौरान एक हिंदू दलित परिवार की खुशियाँ मातम में बदल गईं। एक बच्ची के पानी के गुब्बारे की छींटें मुस्लिम महिला पर पड़ने के बाद शुरू हुआ विवाद इतना बढ़ा कि तरुण को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। परिवार माफी माँगता रहा लेकिन इसकी कीमत उसकी जान देकर चुकानी पड़ी। घटना के दौरान भीड़ में शामिल लोग ‘खूनी होली’ की बात करते दिखे।

घटना के बाद वामपंथियों का प्रोपेगेंडा पैटर्न देखने को मिला। इसमें पहले इसे सामान्य झगड़ा बताने की कोशिश हुई। कहा गया कि दोनों पक्षों में मारपीट हुई और एक व्यक्ति की गलती से मौत हो गई। जब यह नैरेटिव नहीं चला तो सोशल मीडिया पर तरुण पर ही आरोप लगाए जाने लगे कि वही उकसा रहा था और वही मारने गया था। लेकिन स्थानीय लोगों और तथ्यों ने इन दावों को खारिज कर दिया।

इसके बाद फोकस पूरी तरह बदल दिया गया। तरुण के लिए न्याय की माँग कर रहे हिंदुओं के गुस्से को ही सवालों के घेरे में लाया गया। हिंदू संगठनों के प्रदर्शन को साजिश और हिंसा से जोड़ने की कोशिश की गई जबकि हत्या के मुद्दे को पीछे धकेला गया। यह पूरा मामला अब केवल एक हत्या तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह उस नैरेटिव की लड़ाई का उदाहरण बन गया है जिसमें घटना से ज्यादा उसकी कहानी को प्रभावित करने की कोशिश होती है।

हिंदुओं को ‘अपराधी बनाने’ की सिस्टेमेटिक कोशिश

इस हिंसा में लेफ्ट-लिबरल गिरोह ने तरुण के लिए न्याय की माँग करना तो छोड़िए, हिंदुओं को ही अपराधी बताने की सिस्टेमेटिक कोशिशें शुरू कर दी। सबसे पहले ‘अस्वीकार’- इस गिरोह और इससे जुड़े पत्रकारों ने सबसे पहले इस घटना को सही रूप में दिखाने के बजाय इसे मामूली झगड़े को तौर पर पेश करनी कोशिश की। ऐसा दिखाया गया है कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को मारा और उनमें एक आदमी ‘गलती’ से मर गया। यह दिखानी कोशिश की गई कि स्थानीय झगड़े को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर भी आपको कई ऐसे वीडियो दिखेंगे, जिसमें यह बताने की कोशिश की गई कि यह स्थानीय लोगों का झगड़ा था। हालाँकि, तथ्य सामने थे तो यहाँ इस गिरोह की दाल नहीं गली।

इसके बाद यह कोशिश शुरू की गई कि तरुण पर ही इल्जाम लगा दिया जाए। सोशल मीडिया पर दावे वायरल होने लगे कि तरुण ही छेड़छाड़ कर रहा था और वही इन कट्टरपंथियों को मारने गया था लेकिन ये दावे भी नहीं टिके और पड़ोसियों और अन्य लोगों ने इस गिरोह का यह प्रोपेगेंडा भी फेल कर दिया।

इसके बाद एक और कोशिश शुरू की गई, इस बार निशाने पर तरुण की जगह पूरा हिंदू समाज था। इस हत्या के बाद हिंदू समुदाय ने तरुण कुमार की हत्या के लिए न्याय की माँग की। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे हिंदूवादी संगठनों ने खुलेआम प्रदर्शन का ऐलान किया जिसके बाद भारी संख्या में न्याय की माँग के लिए लोग सड़कों पर उतर गए। लोग सड़कों पर उतरे तो उनमें से कई आक्रोशित भी थे और इसी आक्रोश की आड़ में हत्या को ढकने की साजिश शुरू कर दी गई। बताया जाना लगा कि तरुण की हत्या तो मामूली बात है असल दिक्कत हिंदुओं से ही है।

कॉन्ग्रेस के नेता भी इसी प्रोपेगेंडा को हवा देने लगे, पवन खेड़ा जैसे वरिष्ठ नेता तक यह दावा करने लगे कि तरुण की हत्या तो महज दो लोगों का झगड़ा थी, लेकिन RSS-BJP ने इस मामले को उग्र कर दिया। यानी हिंदू अगर न्याय माँगते हुए आक्रोशित भी हो जाएँ तो यह हिंदुओं के लिए गुनाह है। हत्या भी उन्हीं की होगी, आरोप भी उनपर लगेगा और अंत में अगर संभलकर नहीं बोले तो अपराधी भी वही ठहरा दिए जाएँगे।

यह पैटर्न कोई अभी का नहीं है। इसी दिल्ली में 2020 के दंगों को देखिए, शरजील इमाम जैसे लोगों के भड़काऊ भाषण दिए पैटर्न के तहत रोड ब्लॉक की गईं, जिसे जाँच में साजिश करार दिया गया। लेकिन यह गिरोह अंकित शर्मा की हत्या को छिपाकर इस मामले में सिर्फ इस पीड़ित को दिखाता है और वो है शरजील इमाम। उदयपुर में कन्हैयालाल की निर्मम हत्या को आइसोलेटेड घटना बताकर हिंदू एकजुटता पर ही सवाल उठा दिए गए। केरल, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में लव जिहाद के सैकड़ों मामले सामने आने के बावजूद इन्हें मिथ करार दिया जाता रहा है।

विरोध प्रदर्शनों का पैटर्न: हिंदुओं की उदारता ही उनका अपराध है?

हिंदू समाज को हमेशा से सहिष्णु और उदार माना जाता है। यह समाज अलग-अलग मतों को स्वीकार करता है और इसी से जुड़कर भी रहता है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि ज्यादा सहन करना कमजोरी समझ लिया जाता है। हिंदुओं की ‘उदारता’ ही उनका ‘अपराध’ बन जाती है। इसे प्रदर्शनों के पैटर्न के जरिए भी समझा जा सकता है। हिंदू संगठनों के प्रदर्शन का पैटर्न भी आम तौर पर यही रहता है कि लोग प्रदर्शन के लिए लोगों को बुलाने का आह्वान करते हैं, अपनी माँगों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, पुलिस-प्रशासन तक अपनी बात पहुँचाते हैं और फिर न्याय का इंतजार करते हैं। यही दिल्ली में भी हुआ। इसे के लिए हिंदुओं को अपराधी बनाया जा रहा है।

अब दूसरी तरफ कट्टरपंथियों के इस प्रदर्शन के पैटर्न को देखिए। कई बार तो किसी को भनक तक नहीं लगती कि यहाँ कोई प्रदर्शन होने वाला है। ना कोई सार्वजनिक पोस्टर, ना सोशल मीडिया पर चर्चा। बस गुप्त बैठकें होती हैं, बंद कमरों में प्लानिंग होती है, वॉट्सऐपर पर कोडेड मेसेज चलते हैं और अचानक दंगा भड़क जाता है, हिंसा शुरू हो जाती है और सड़कों पर पत्थरबाजी देखने को मिलती है।

2020 दिल्ली दंगे इसका सबसे खतरनाक उदाहरण हैं। दिखावे के लिए महीनों तक ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन चल रहे थे लेकिन असली खेल पर्दे के पीछे खेला जा रहा था। दिल्ली में देखते ही देखते प्रदर्शन हिंसक हो गया और दर्जनों हिंदू मारे गए। इसके अलावा आगजनी और मंदिरों पर हमले की घटनाएँ भी हुई। मुस्लिमों की घरों से पत्थरबाजी की गई तो जाहिर है कि ये पत्थर एक दिन में नहीं इकट्ठा हुए होंगे। यह साजिश लंबे समय से रची जा रही थी। ताहिर हुसैन की छत पर बाहुबली गुलेल और पेट्रोल बम जैसी चीजें मिलीं जो हिंसक प्रदर्शनों के सुनियोजित होने पर सवाल उठा रही थीं।

उत्तर प्रदेश के बरेली में सितंबर 2025 को जुमे की नमाज के बाद ‘आई लव मोहम्मद‘ को लेकर हुई हिंसा भी इसी तरह का उदाहरण है। लोगों को जो आम विरोध प्रदर्शन लग रहा था, वो अचानक हिंसक हो गया और पुलिस पर पत्थरबाजी की गई। जाँच में पता चला कि यह आम या विरोध भी पूरी प्लानिंग के तहत अंजाम दिया जा रहा था।

बरेली में कुछ लोग इस्लामिया मैदान में जाने की जिद कर रहे थे और पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी तो कट्टरपंथियों ने पुलिस पर पथराव कर दिया। इस दंगे के लिए करीब 5000 उपद्रवियों की फौज तैयार की गई थी। ये उपद्रवी शहर की 390 मस्जिदों में ठहराए गए थे और उनके पास पहले से ईंट, पत्थर और पेट्रोल बम जैसे हथियार मौजूद थे। अगर ये कट्टरपंथी अपनी इस साजिश में सफल हो जाते तो शायद सैकड़ों लोगों की जान जाती लेकिन पुलिस ने इन्हें काबू कर लिया।

राम नवमी, हनुमान जयंती और अन्य धार्मिक जुलूसों के कार्यक्रमों पर हमलों की खबरें हम सब सुनते हैं। अचानक मस्जिदों और घरों की छतों से पत्थरबाजी होने लगती है, ऐसी दर्जनों घटनाएँ हैं। बीते दिनों शिवाजी महाराज की जयंती के मौके जुलूस पर हमला हुआ और मस्जिद से पत्थरबाजी की गई।

अब पत्थरबाजी के लिए ये पत्थर कैसे और क्यों इकट्ठा होते होंगे ये सवाल ही इन प्रदर्शनों की आड़ में होने वाली साजिश का सबसे बड़ा जवाब है। इन पैटर्न से आपको अंदाजा होगा कि दिल्ली के जिन हिंदुओं को अपराधी बताया जा रहा है वो असल में सिर्फ अपने बेटे-भाई को होने से ही पीड़ित नहीं है बल्कि वो उस प्रोपेगेंडाबाज गिरोह से भी पीड़िता है जो उनकी आवाज तक उठाने पर उन्हें अपराधी घोषित कर देता है।

तरुण पर चुप्पी, रिजवान के लिए दर्द?

इस घटना में वामपंथी प्रोपेगेंडाबाजों ने तरुण की हत्या से ध्यान हटाने के लिए ‘रिजवान कहाँ है‘ का नैरेटिव भी चलाया था। इस घिनौने नैरेटिव को हवा देने में तथाकथित सेकुलर और पत्रकारिता का चोला पहनने वाले लोग खुलकर सामने आ गए। आरजे सायमा से लेकर जहीर इकबाल की पत्नी सोनाक्षी सिन्हा और वारिस पठान समेत कई इस्लामी कट्टरपंथी इन्फ्लुएंसर्स ने यह प्रोपेगेंडा फैलाया था। लेकिन दिल्ली पुलिस ने उनके इस प्रोपेगेंडा की हवा निकाल दी।

इसका मकसद बिल्कुल साफ था कि तरुण की हत्या वाले मुद्दे से लोगों का ध्यान भटका दिया जाए। यह धारणा बना दी जाए कि इस घटना में सिर्फ हिंदू परिवार ही नहीं बल्कि मुस्लिम परिवार ने भी अपना बच्चा खो दिया है। पुलिस को बार-बार टैग करके इसे गंभीरता का रंग देने की रणनीति अपनाई गई ताकि आम आदमी सोचे कि शायद पुलिस कुछ छुपा रही है। लेकिन सच सामने आया तो इन सब प्रोपेगेंडाबाजों की पोल खुल गई।

हिंदुओं के लिए सच को पहचानने का समय

तरुण की हत्या के अपराध को छिपाने के लिए उस अपराध पर खड़ा किया गया दोहरा नैरेटिव भी कम अपराध नहीं है। न्याय माँगने वालों को ही साजिशकर्ता या हिंसक बता देना असल में पूरे देश में एक डर का माहौल खड़ा करने की साजिश है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है बल्कि यह इस गिरोह द्वारा हिंदू विरोध की धारणा बनाने की प्रक्रिया है।

यह गिरोह बस यही तय करता है कि कैसे अपने पर हुए अपराध के बाद भी हिंदुओं को आक्रामक और अपराधी की तरह दिखाया जाए जबकि दूसरे पक्ष को बेबस और पीड़ित की तरह पेश किया जाए। यह वक्त इस पूरे नैरेटिव को चुनौती देने का है। क्योंकि अगर आज भी हम यह नहीं समझ पाए कि हमारे सामने जो परोसा जा रहा है वो पूरी सच्चाई नहीं है तो आने वाले समय में हर घटना इसी तरह किसी एजेंडे की भेंट चढ़ाया जाता रहेगा। तब न कोई तरुण याद रहेगा, न उसकी हत्या केवल इस गिरोह के द्वारा बनाई एक कहानी बची रहेगी जिसे बार-बार दोहराकर सच साबित किया जाएगा।

नजरिया: ‘विक्टिम’ को ‘विलेन’ बनाने का खतरनाक इकोसिस्टम

उत्तम नगर के तरुण हत्याकांड ने एक बार फिर उस ‘नैरेटिव वॉर’ को सतह पर ला दिया है, जहाँ अपराधी के मजहब को ढाल बनाने के लिए पीड़ित के अस्तित्व को ही मिटाने की कोशिश की जाती है। यह महज एक स्थानीय झगड़ा या गुब्बारे से शुरू हुई हिंसा नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी ‘मनोवैज्ञानिक युद्धनीति’ का हिस्सा है।

दिल्ली से लेकर बरेली तक, पैटर्न एक ही है। जहाँ एक पक्ष की ‘सुनियोजित हिंसा’ को ‘हताशा’ बताकर डिफेंड किया जाता है, वहीं दूसरे पक्ष की ‘प्रतिक्रिया’ को ‘आतंक’ करार दिया जाता है। सनातन समाज को यह समझना होगा कि यह लड़ाई केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन और अखबारों की सुर्खियों में लड़ी जा रही है।

अगर आज तरुण के लिए न्याय की माँग को ‘गुंडागर्दी’ मानकर हिंदू पीछे हटा, तो कल हर घर का दरवाजा इसी कट्टरता की दस्तक सुनेगा। यह ‘ग्लानि’ से बाहर निकलकर ‘सत्य’ को पहचानने और संगठित होने का समय है, क्योंकि नैरेटिव की इस जंग में चुप रहना ही पराजय स्वीकार करना है।