सनातन की एकजुटता पर उठाओ सवाल ताकि उम्माह का रहे बोलबाला : क्यों तरुण हत्याकांड में वामपंथी हिंदुओं में ही भर रहे ‘ग्लानि’, क्या है स्ट्रैटेजी?

दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दौरान एक हिंदू दलित परिवार की खुशियाँ मातम में बदल गईं। एक बच्ची के पानी के गुब्बारे की छींटें मुस्लिम महिला पर पड़ने के बाद शुरू हुआ विवाद इतना बढ़ा कि तरुण को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। परिवार माफी माँगता रहा लेकिन इसकी कीमत उसकी जान देकर चुकानी पड़ी। घटना के दौरान भीड़ में शामिल लोग ‘खूनी होली’ की बात करते दिखे।

घटना के बाद वामपंथियों का प्रोपेगेंडा पैटर्न देखने को मिला। इसमें पहले इसे सामान्य झगड़ा बताने की कोशिश हुई। कहा गया कि दोनों पक्षों में मारपीट हुई और एक व्यक्ति की गलती से मौत हो गई। जब यह नैरेटिव नहीं चला तो सोशल मीडिया पर तरुण पर ही आरोप लगाए जाने लगे कि वही उकसा रहा था और वही मारने गया था। लेकिन स्थानीय लोगों और तथ्यों ने इन दावों को खारिज कर दिया।

इसके बाद फोकस पूरी तरह बदल दिया गया। तरुण के लिए न्याय की माँग कर रहे हिंदुओं के गुस्से को ही सवालों के घेरे में लाया गया। हिंदू संगठनों के प्रदर्शन को साजिश और हिंसा से जोड़ने की कोशिश की गई जबकि हत्या के मुद्दे को पीछे धकेला गया। यह पूरा मामला अब केवल एक हत्या तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह उस नैरेटिव की लड़ाई का उदाहरण बन गया है जिसमें घटना से ज्यादा उसकी कहानी को प्रभावित करने की कोशिश होती है।

हिंदुओं को ‘अपराधी बनाने’ की सिस्टेमेटिक कोशिश

इस हिंसा में लेफ्ट-लिबरल गिरोह ने तरुण के लिए न्याय की माँग करना तो छोड़िए, हिंदुओं को ही अपराधी बताने की सिस्टेमेटिक कोशिशें शुरू कर दी। सबसे पहले ‘अस्वीकार’- इस गिरोह और इससे जुड़े पत्रकारों ने सबसे पहले इस घटना को सही रूप में दिखाने के बजाय इसे मामूली झगड़े को तौर पर पेश करनी कोशिश की। ऐसा दिखाया गया है कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को मारा और उनमें एक आदमी ‘गलती’ से मर गया। यह दिखानी कोशिश की गई कि स्थानीय झगड़े को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर भी आपको कई ऐसे वीडियो दिखेंगे, जिसमें यह बताने की कोशिश की गई कि यह स्थानीय लोगों का झगड़ा था। हालाँकि, तथ्य सामने थे तो यहाँ इस गिरोह की दाल नहीं गली।

इसके बाद यह कोशिश शुरू की गई कि तरुण पर ही इल्जाम लगा दिया जाए। सोशल मीडिया पर दावे वायरल होने लगे कि तरुण ही छेड़छाड़ कर रहा था और वही इन कट्टरपंथियों को मारने गया था लेकिन ये दावे भी नहीं टिके और पड़ोसियों और अन्य लोगों ने इस गिरोह का यह प्रोपेगेंडा भी फेल कर दिया।

इसके बाद एक और कोशिश शुरू की गई, इस बार निशाने पर तरुण की जगह पूरा हिंदू समाज था। इस हत्या के बाद हिंदू समुदाय ने तरुण कुमार की हत्या के लिए न्याय की माँग की। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे हिंदूवादी संगठनों ने खुलेआम प्रदर्शन का ऐलान किया जिसके बाद भारी संख्या में न्याय की माँग के लिए लोग सड़कों पर उतर गए। लोग सड़कों पर उतरे तो उनमें से कई आक्रोशित भी थे और इसी आक्रोश की आड़ में हत्या को ढकने की साजिश शुरू कर दी गई। बताया जाना लगा कि तरुण की हत्या तो मामूली बात है असल दिक्कत हिंदुओं से ही है।

कॉन्ग्रेस के नेता भी इसी प्रोपेगेंडा को हवा देने लगे, पवन खेड़ा जैसे वरिष्ठ नेता तक यह दावा करने लगे कि तरुण की हत्या तो महज दो लोगों का झगड़ा थी, लेकिन RSS-BJP ने इस मामले को उग्र कर दिया। यानी हिंदू अगर न्याय माँगते हुए आक्रोशित भी हो जाएँ तो यह हिंदुओं के लिए गुनाह है। हत्या भी उन्हीं की होगी, आरोप भी उनपर लगेगा और अंत में अगर संभलकर नहीं बोले तो अपराधी भी वही ठहरा दिए जाएँगे।

यह पैटर्न कोई अभी का नहीं है। इसी दिल्ली में 2020 के दंगों को देखिए, शरजील इमाम जैसे लोगों के भड़काऊ भाषण दिए पैटर्न के तहत रोड ब्लॉक की गईं, जिसे जाँच में साजिश करार दिया गया। लेकिन यह गिरोह अंकित शर्मा की हत्या को छिपाकर इस मामले में सिर्फ इस पीड़ित को दिखाता है और वो है शरजील इमाम। उदयपुर में कन्हैयालाल की निर्मम हत्या को आइसोलेटेड घटना बताकर हिंदू एकजुटता पर ही सवाल उठा दिए गए। केरल, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में लव जिहाद के सैकड़ों मामले सामने आने के बावजूद इन्हें मिथ करार दिया जाता रहा है।

विरोध प्रदर्शनों का पैटर्न: हिंदुओं की उदारता ही उनका अपराध है?

हिंदू समाज को हमेशा से सहिष्णु और उदार माना जाता है। यह समाज अलग-अलग मतों को स्वीकार करता है और इसी से जुड़कर भी रहता है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि ज्यादा सहन करना कमजोरी समझ लिया जाता है। हिंदुओं की ‘उदारता’ ही उनका ‘अपराध’ बन जाती है। इसे प्रदर्शनों के पैटर्न के जरिए भी समझा जा सकता है। हिंदू संगठनों के प्रदर्शन का पैटर्न भी आम तौर पर यही रहता है कि लोग प्रदर्शन के लिए लोगों को बुलाने का आह्वान करते हैं, अपनी माँगों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, पुलिस-प्रशासन तक अपनी बात पहुँचाते हैं और फिर न्याय का इंतजार करते हैं। यही दिल्ली में भी हुआ। इसे के लिए हिंदुओं को अपराधी बनाया जा रहा है।

अब दूसरी तरफ कट्टरपंथियों के इस प्रदर्शन के पैटर्न को देखिए। कई बार तो किसी को भनक तक नहीं लगती कि यहाँ कोई प्रदर्शन होने वाला है। ना कोई सार्वजनिक पोस्टर, ना सोशल मीडिया पर चर्चा। बस गुप्त बैठकें होती हैं, बंद कमरों में प्लानिंग होती है, वॉट्सऐपर पर कोडेड मेसेज चलते हैं और अचानक दंगा भड़क जाता है, हिंसा शुरू हो जाती है और सड़कों पर पत्थरबाजी देखने को मिलती है।

2020 दिल्ली दंगे इसका सबसे खतरनाक उदाहरण हैं। दिखावे के लिए महीनों तक ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन चल रहे थे लेकिन असली खेल पर्दे के पीछे खेला जा रहा था। दिल्ली में देखते ही देखते प्रदर्शन हिंसक हो गया और दर्जनों हिंदू मारे गए। इसके अलावा आगजनी और मंदिरों पर हमले की घटनाएँ भी हुई। मुस्लिमों की घरों से पत्थरबाजी की गई तो जाहिर है कि ये पत्थर एक दिन में नहीं इकट्ठा हुए होंगे। यह साजिश लंबे समय से रची जा रही थी। ताहिर हुसैन की छत पर बाहुबली गुलेल और पेट्रोल बम जैसी चीजें मिलीं जो हिंसक प्रदर्शनों के सुनियोजित होने पर सवाल उठा रही थीं।

उत्तर प्रदेश के बरेली में सितंबर 2025 को जुमे की नमाज के बाद ‘आई लव मोहम्मद‘ को लेकर हुई हिंसा भी इसी तरह का उदाहरण है। लोगों को जो आम विरोध प्रदर्शन लग रहा था, वो अचानक हिंसक हो गया और पुलिस पर पत्थरबाजी की गई। जाँच में पता चला कि यह आम या विरोध भी पूरी प्लानिंग के तहत अंजाम दिया जा रहा था।

बरेली में कुछ लोग इस्लामिया मैदान में जाने की जिद कर रहे थे और पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी तो कट्टरपंथियों ने पुलिस पर पथराव कर दिया। इस दंगे के लिए करीब 5000 उपद्रवियों की फौज तैयार की गई थी। ये उपद्रवी शहर की 390 मस्जिदों में ठहराए गए थे और उनके पास पहले से ईंट, पत्थर और पेट्रोल बम जैसे हथियार मौजूद थे। अगर ये कट्टरपंथी अपनी इस साजिश में सफल हो जाते तो शायद सैकड़ों लोगों की जान जाती लेकिन पुलिस ने इन्हें काबू कर लिया।

राम नवमी, हनुमान जयंती और अन्य धार्मिक जुलूसों के कार्यक्रमों पर हमलों की खबरें हम सब सुनते हैं। अचानक मस्जिदों और घरों की छतों से पत्थरबाजी होने लगती है, ऐसी दर्जनों घटनाएँ हैं। बीते दिनों शिवाजी महाराज की जयंती के मौके जुलूस पर हमला हुआ और मस्जिद से पत्थरबाजी की गई।

अब पत्थरबाजी के लिए ये पत्थर कैसे और क्यों इकट्ठा होते होंगे ये सवाल ही इन प्रदर्शनों की आड़ में होने वाली साजिश का सबसे बड़ा जवाब है। इन पैटर्न से आपको अंदाजा होगा कि दिल्ली के जिन हिंदुओं को अपराधी बताया जा रहा है वो असल में सिर्फ अपने बेटे-भाई को होने से ही पीड़ित नहीं है बल्कि वो उस प्रोपेगेंडाबाज गिरोह से भी पीड़िता है जो उनकी आवाज तक उठाने पर उन्हें अपराधी घोषित कर देता है।

तरुण पर चुप्पी, रिजवान के लिए दर्द?

इस घटना में वामपंथी प्रोपेगेंडाबाजों ने तरुण की हत्या से ध्यान हटाने के लिए ‘रिजवान कहाँ है‘ का नैरेटिव भी चलाया था। इस घिनौने नैरेटिव को हवा देने में तथाकथित सेकुलर और पत्रकारिता का चोला पहनने वाले लोग खुलकर सामने आ गए। आरजे सायमा से लेकर जहीर इकबाल की पत्नी सोनाक्षी सिन्हा और वारिस पठान समेत कई इस्लामी कट्टरपंथी इन्फ्लुएंसर्स ने यह प्रोपेगेंडा फैलाया था। लेकिन दिल्ली पुलिस ने उनके इस प्रोपेगेंडा की हवा निकाल दी।

इसका मकसद बिल्कुल साफ था कि तरुण की हत्या वाले मुद्दे से लोगों का ध्यान भटका दिया जाए। यह धारणा बना दी जाए कि इस घटना में सिर्फ हिंदू परिवार ही नहीं बल्कि मुस्लिम परिवार ने भी अपना बच्चा खो दिया है। पुलिस को बार-बार टैग करके इसे गंभीरता का रंग देने की रणनीति अपनाई गई ताकि आम आदमी सोचे कि शायद पुलिस कुछ छुपा रही है। लेकिन सच सामने आया तो इन सब प्रोपेगेंडाबाजों की पोल खुल गई।

हिंदुओं के लिए सच को पहचानने का समय

तरुण की हत्या के अपराध को छिपाने के लिए उस अपराध पर खड़ा किया गया दोहरा नैरेटिव भी कम अपराध नहीं है। न्याय माँगने वालों को ही साजिशकर्ता या हिंसक बता देना असल में पूरे देश में एक डर का माहौल खड़ा करने की साजिश है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है बल्कि यह इस गिरोह द्वारा हिंदू विरोध की धारणा बनाने की प्रक्रिया है।

यह गिरोह बस यही तय करता है कि कैसे अपने पर हुए अपराध के बाद भी हिंदुओं को आक्रामक और अपराधी की तरह दिखाया जाए जबकि दूसरे पक्ष को बेबस और पीड़ित की तरह पेश किया जाए। यह वक्त इस पूरे नैरेटिव को चुनौती देने का है। क्योंकि अगर आज भी हम यह नहीं समझ पाए कि हमारे सामने जो परोसा जा रहा है वो पूरी सच्चाई नहीं है तो आने वाले समय में हर घटना इसी तरह किसी एजेंडे की भेंट चढ़ाया जाता रहेगा। तब न कोई तरुण याद रहेगा, न उसकी हत्या केवल इस गिरोह के द्वारा बनाई एक कहानी बची रहेगी जिसे बार-बार दोहराकर सच साबित किया जाएगा।

नजरिया: ‘विक्टिम’ को ‘विलेन’ बनाने का खतरनाक इकोसिस्टम

उत्तम नगर के तरुण हत्याकांड ने एक बार फिर उस ‘नैरेटिव वॉर’ को सतह पर ला दिया है, जहाँ अपराधी के मजहब को ढाल बनाने के लिए पीड़ित के अस्तित्व को ही मिटाने की कोशिश की जाती है। यह महज एक स्थानीय झगड़ा या गुब्बारे से शुरू हुई हिंसा नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी ‘मनोवैज्ञानिक युद्धनीति’ का हिस्सा है।

दिल्ली से लेकर बरेली तक, पैटर्न एक ही है। जहाँ एक पक्ष की ‘सुनियोजित हिंसा’ को ‘हताशा’ बताकर डिफेंड किया जाता है, वहीं दूसरे पक्ष की ‘प्रतिक्रिया’ को ‘आतंक’ करार दिया जाता है। सनातन समाज को यह समझना होगा कि यह लड़ाई केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन और अखबारों की सुर्खियों में लड़ी जा रही है।

अगर आज तरुण के लिए न्याय की माँग को ‘गुंडागर्दी’ मानकर हिंदू पीछे हटा, तो कल हर घर का दरवाजा इसी कट्टरता की दस्तक सुनेगा। यह ‘ग्लानि’ से बाहर निकलकर ‘सत्य’ को पहचानने और संगठित होने का समय है, क्योंकि नैरेटिव की इस जंग में चुप रहना ही पराजय स्वीकार करना है।

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