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पूरे देश में लागू हो समान नागरिक संहिता (UCC) : कर्नाटक हाई कोर्ट, कहा कि धर्म के आधार पर बने पर्सनल लॉ के कारण महिलाओं के भेदभाव होता है


कर्नाटक हाई कोर्ट ने 4 अप्रैल 2025 को संसद एवं राज्य विधानसभाओं से समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के लिए हरसंभव प्रयास करने का आग्रह किया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 44 तहत समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने से भारत के संविधान की प्रस्तावना में निहित उद्देश्य और आकांक्षाएँ सही मायने में साकार होंगी। 

जस्टिस हंचते संजीवकुमार की एकल पीठ ने कहा कि समान नागरिक संहिता को लागू करने से महिलाओं के लिए न्याय सुनिश्चित होगा, सभी जातियों और धर्मों में समानता को बढ़ावा मिलेगा तथा भाईचारे के माध्यम से व्यक्तिगत गरिमा कायम रहेगी। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुसार भारत में सभी महिलाएँ एक नागरिक के तौर पर समान हैं, लेकिन पर्सनल लॉ उनके साथ भेदभाव करते हैं।

कोर्ट ने कहा कि धर्म के आधार पर बने पर्सनल लॉ के कारण महिलाओं के भेदभाव होता है। हिंदू कानून के तहत बेटी को बेटे के समान जन्मसिद्ध अधिकार और पत्नी को अपने पति के बराबर दर्जा प्राप्त है। हालाँकि, मुस्लिम कानून के तहत ऐसी समानता नहीं दिखाई देती है। इसलिए, कोर्ट ने कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करने के लिए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जोर दिया।

कर्नाटक हाई कोर्ट के न्यायाधीश हंचते संजीवकुमार ने समान नागरिक संहिता कानून को लेकर संविधान सभा का तर्क दिया। उन्होंने कहा कि संविधान सभा में भी समान नागरिक संहिता विवाद का एक विषय था। जस्टिस संजीवकुमार ने कहा कि संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने समान नागरिक संहिता का समर्थन किया और कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किया था।

न्यायालय ने कहा, “संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बीआर अंबेडकर ने अपने सबसे शानदार भाषण में समान नागरिक संहिता के पक्ष में तर्क दिया है।” कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस संजीवकुमार ने आगे कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद, टी कृष्णमाचारी और मौलाना हसरत मोहानी जैसे प्रमुख नेताओं ने समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था।

इसके अलावा, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का भी हवाला दिया। इनमें मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम और अन्य (1985), सरला मुद्गल (श्रीमती) और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (1995) और जॉन वल्लमट्टम और अन्य बनाम भारत संघ (2003) प्रमुख हैं। इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने संसद को समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने का सुझाव दिया था।

दरअसल, कर्नाटक हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अब्दुल बशीर खान नामक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच संपत्ति बँटवारे को लेकर विवाद हो गया। दरअसल, अब्दुल बशीर ने अपनी मृत्यु से पहले कोई वसीयत नहीं लिखी थी। वे अपने पीछे कई अचल संपत्तियाँ छोड़ गए, जिनमें से कुछ पैतृक थीं तथा कुछ उन्होंने स्वयं अर्जित की थीं।

अब्दुल बशीर की मौत के बाद उनकी संपत्ति के बँटवारे को लेकर उनके बच्चों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। बेटी शहनाज़ बेगम की मौत के बाद उनका प्रतिनिधित्व उनके शौहर सिराजुद्दीन मक्की (प्रतिवादी) ने किया। मक्की ने आरोप लगाया कि उन्हें संपत्ति के बँटवारे से बाहर रखा गया और उसमें से उन्हें उचित हिस्सा नहीं दिया गया। इसको लेकर मक्की ने बेंगलुरु सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया।

नवंबर 2019 में ट्रायल कोर्ट ने माना कि विचाराधीन तीन संपत्तियाँ संयुक्त परिवार की संपत्ति का हिस्सा हैं और शहनाज़ बेगम उन में पाँचवें हिस्से की हकदार हैं। हालाँकि, ट्रायल कोर्ट ने अन्य संपत्तियों को बँटवारा योग्य नहीं बताया। ट्रायल कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट अब्दुल बशीर के दो बेटों- समीउल्ला खान और नूरुल्ला खान तथा बेटी राहत जान (अपीलकर्ता) ने कर्नाटक हाई कोर्ट में अपील दायर की।

इधर, सिराजुद्दीन मक्की ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आपत्ति दायर की, जिसमें अपने हिस्से को बढ़ाने या पहले के आदेश में संशोधन की माँग की गई। हाई कोर्ट ने दोनों पक्ष की याचिकाओं को स्वीकार किया और अपील एवं आपत्ति याचिका, दोनों पर एक साथ सुनवाई की। तमाम दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

UCC की दिशा में बढ़ा असम: मुस्लिम निकाह- तलाक रजिस्ट्रेशन वाला कानून निरस्त, बोले CM सरमा- बाल विवाह पर लगेगी रोक

                                साभार: Lenardo AI Generated & The Statesman
असम ने वर्ष 1935 में बनाए गए मुस्लिम विवाह और तलाक रजिस्ट्रेशन अधिनियम (Muslim Marriages and Divorces Registration Act 1935) को रद्द कर दिया है। इसकी जानकारी सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया पर दी है। उन्होंने कहा है कि इससे अंतर्गत शादी की कानूनी आयु ना पूरी करने वालों का भी निकाह हो रहा था।

सीएम हिमंता ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “23 फरवरी, 2024 को असम कैबिनेट ने दशकों पुराने असम मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम को निरस्त करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। भले ही दूल्हा और दुल्हन की उम्र 18 और 21 ना हुई हो, जैसा कि कानूनन होना चाहिए, के विवाह का पंजीकरण भी इसके अंतर्गत हो रहा था। यह निर्णय असम में बाल विवाह पर रोक लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”

इससे पहले असम सरकार में मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने इस विषय में मीडिया से बात की। उन्होंने मीडिया को बताया, “असम मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम 1935, जिसके आधार पर अब तक 94 मुस्लिम रजिस्ट्रार राज्य में मुस्लिम निकाहों का पंजीकरण कर रहे थे और तलाक का निर्णय कर रहे थे, उसे निरस्त कर दिया गया है। आज की कैबिनेट बैठक में इस अधिनियम को हटा दिया है।”

उन्होंने आगे बताया, “इसके परिणामस्वरूप आज के बाद इस अधिनियम के जरिए मुस्लिम विवाह या तलाक का पंजीकरण नहीं हो सकेगा। हमारे राज्य में एक विशेष विवाह अधिनियम है, इसलिए हम चाहते हैं कि सभी विवाह, विशेष विवाह अधिनियम के तहत हों।” बरुआ ने इस कानून को औपनिवेशिक काल का कानून बताया और कहा कि इससे राज्य में बाल विवाह पर रोक लगेगी। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से असम में बाल विवाह पर एक्शन चल रहा है, इसके अंतर्गत 1000 से अधिक गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं।

क्या था मुस्लिम विवाह अधिनियम?

यह अधिनियम वर्ष 1935 में अंग्रेजों द्वारा लाया गया था। यह अधिनियम वर्ष 1935 में अंग्रेजों द्वारा लाया गया था। यह असम के मुस्लिमों के लिए विवाह पंजीकरण और तलाक के नियम बनाता था। इसके अंतर्गत कोई भी मुस्लिम व्यक्ति, जिसे सरकार अधिकृत कर दे, मुस्लिम निकाह को पंजीकृत कर सकता था। इसी के साथ वह तलाक का पंजीकरण भी कर सकता था। इसके लिए वह एक शुल्क भी ले सकता था। इस अधिनियम के तहत एक इलाके में दो मुस्लिम रजिस्ट्रार नियुक्त किए जाने थे, जिनमें से एक सुन्नी और एक शिया होता।
असम सरकार का मानना है कि इस नियम का लाभ उठा कर ऐसे निकाह भी पंजीकृत हो रहे थे, जो कि कानूनी मान्यता पूरी नहीं करते। चूंकि इस अधिनियम में निकाह की न्यूनतम आयु का जिक्र नहीं था, ऐसे में 18 वर्ष से कम की बच्चियों का निकाह भी हो रहा था।
हालाँकि, अब सरकार ने इस पर रोक लगा दी है। वर्तमान में असम के भीतर 94 ऐसे मुस्लिम रजिस्ट्रार हैं, जो कि निकाह और तलाक का पंजीकरण करते हैं। सरकार अब इनका रजिस्ट्रार का पद खत्म कर देगी। असम सरकार ने कहा है कि इन सभी को एक बार ₹2 लाख का मुआवजा भी दिया जाएगा।

UCC की दिशा में एक बड़ा कदम

असम सरकार का यह निर्णय समान नागरिक संहिता (UCC) की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। गौरतलब है कि हाल ही में उत्तराखंड में UCC को विधानसभा की मंजूरी मिली है। इसके अंतर्गत सभी धर्मों के लोगों के विवाह, तलाक और विरासत जैसे मुद्दों को लेकर नियम बनाए गए हैं। इसमें भी बहुविवाह जैसे मामलों पर रोक लगाई गई है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा पहले ही कहते आए हैं कि वह राज्य में UCC लागू करेंगे।
ऐसे में मुस्लिमों के लिए अलग से बनाया कानून खत्म करना UCC का रास्ता साफ़ करता है। CM सरमा राज्य में बाल विवाह, बहुविवाह और तीन तलाक के धुर विरोधी रहे हैं। इसके खिलाफ वह लगातार बोलते रहे हैं। अब असम में मुस्लिम निकाह का पंजीकरण विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत होगा।

जो कुरान में नहीं वह नहीं मानेगे: UCC पर रोते-बिलखते मुस्लिम कट्टरपंथी और छद्दम/ढोंगी सेक्युलरिस्ट्स को वीडियो जरूर देखना चाहिए

यूसीसी पर मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रिया (फोटो साभार : X_ANI)
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 6 फरवरी 2024 को उत्तराखंड विधानसभा में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से जुड़ा बिल पेश कर दिया। इसको लेकर तमाम मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रिया सामने आ रही है। कई मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है और UCC को नकार दिया है। जिसका मुख्य कारण है शरीयत के लागू करने के रास्ते का बंद होना। 
एनजीओ आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा पाकिस्तान को तोड़ बांग्लादेश बनाये पर कांग्रेस से मुस्लिम वोट बैंक को दूर होते देख इसकी स्थापना की गयी थी, यानि मुस्लिम समाज को खुश कर इस वोट बैंक को कांग्रेस की झोली में रखने के लिए तुष्टिकरण के आगे घुटनों के बल बैठना पड़ा। 
UCC के विरोध करने का असली कारण है, इनकी दुकानों और तिजोरी पर प्रहार। भारत में इतने वर्षों के बाद इस कानून को पिछली सरकारों द्वारा तुष्टिकरण के आगे घुटने टेकने की वजह से इस कानून को बनाने के लिए सोंचा तक नहीं था। जिस कारण मुस्लिम कट्टरपंथी अपना वर्जस्व बनाये हुए थे और छद्दम सेक्युलरिस्ट्स सेकुलरिज्म का ढोल पीट हिन्दुओं का हनन करते रहे। 

जब मुस्लिम कट्टरपंथियों और ढोंगी सेक्युलरिस्ट्स अपनी दाल नहीं पकती देखते, तब ये समस्त ढोंगी गैंग संविधान को भूल साम्प्रदायिक भाषा पर उतर आते हैं। राष्ट्र इस गैंग से जानना चाहता है कि विश्व में एक ऐसा देश बताए जहाँ UCC न हो। आखिर कब तक अपनी भड़काऊ हरकतों से बेगुनाह लोगों-हिन्दू एवं मुस्लिम- की लाशों पर बैठ मालपुए खाने के साथ-साथ अपनी तिजोरियों को भरते रहोगे? इमरजेंसी में विपक्ष को जेलों में भर संविधान में Secular शब्द डालने से क्या संविधान सेक्युलर हो गया? देश को उसी तुष्टिकरण की नीति पर चलाया गया। समय बदल रहा है और बहुत तेजी से बदल रहा है, जिस कारण इन सब की दुकानों पर ताला पड़ने वाला है। यह शोर-शराबा, रोना-बिलखना सिर्फ अपनी पार्टियों/संस्थानों(यानि दुकान) को बचाने के लिए है, किसी नागरिक-हिन्दू अथवा मुस्लिम- के लिए नहीं। 

स्मरण हो, जब पिछली बार उत्तराखंड में भाजपा सरकार बनने के बाद, मदरसों और स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों को मिलने वाली राशि को सीधे बैंक खातों में डालने की प्रक्रिया शुरू होने पर शोर मचा था कि 'मदरसों से 98000 बच्चे गायब', कहाँ गए मदरसे जाने वाले बच्चे, किसने अगवा किया? किसी ने अगवा नहीं किया उन बच्चों को, हकीकत में जब नकद भुगतान चल रहा था, इतने बच्चों का मदरसा चालक/संरक्षक अपनी जेब में डाल रहे थे, उस हो रही लूट पर पाबन्दी हो गयी थी।  

कुछ समय से यह सुनने को मिल रहा है कि 2024 चुनाव के बाद मुस्लिम कट्टरपंथियों, सनातन विरोधियों, सर तन से जुदा गैंग, भारत के विरुद्ध षड़यंत्र रचने वाले-चाहे भारत में हो अथवा भारत से बाहर- आदि गैंग पर जबरदस्त प्रहार होने वाला है, जिसमें भारत को विदेशों से भी जबरदस्त समर्थन मिलेगा। लेकिन जब तक उस बात की पुष्टि न हो प्रसारित नहीं करनी चाहिए। यही पत्रकारिता का नियम भी है। इसी सन्दर्भ में एक वीडियो मिला, जिसकी पुष्टि नहीं कि यह कब का है और कहाँ का, लेकिन लगता वजनदार है। देखिए: 

खुद को मुस्लिमों का रहनुमा मानने वाला ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने समान नागरिक संहिता की की जरूरत को ही नकार दिया। कांग्रेस नेता इमरान प्रतापगढ़ी ने समान नागरिक संहिता को मुद्दे से भटकाने वाला बताया। वहीं, सपा नेता एसटी हसन ने कहा कि यह बिल कुरान के खिलाफ होगा तो उसका विरोध किया जाएगा।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बोला- यूसीसी की जरूरत ही नहीं

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा, “जहाँ तक ​​यूसीसी का सवाल है, हमारी राय है कि प्रत्येक कानून में एकरूपता नहीं लाई जा सकती है। यदि आप किसी खास समुदाय को इस यूसीसी से छूट देते हैं तो इसे एक समान कोड कैसे कहा जा सकता है? संविधान का आर्टिकल 25 अभी भी है।”
फिरंगी महली ने आगे कहा, “संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता दी गई है। मुस्लिमों में शादी विवाह के लिए के लिए शरिया लॉ 1937 से मौजूद है। हिंदुओं, सिखों के लिए कानून मौजूद है। ऐसे में किसी यूसीसी की जरूरत नहीं ही है। बाकी हमारी टीम इस बिल की कॉपी मिलने के बाद इसे पढ़ेगी, फिर आगे का फैसला लिया जाएगा।”

उत्तराखंड सरकार फेल, मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश: कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी की भी प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने इस मामले को सियासी बताते हुए कहा, “भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकारों के पास भी गिनाने के लिए काम के तौर पर कुछ नहीं है। उत्तराखंड की सरकार कानून व्यवस्था से लेकर महिला सुरक्षा तक में पूरी तरह विफल हो चुकी है। पुष्कर सिंह धामी के पास और कोई तरीका नहीं बचा है लोकसभा चुनाव में जाने के लिए। यूसीसी का प्रोपेगेंडा खड़ा करना है।”
प्रतापगढ़ी ने कहा, “इस देश में अलग-अलग रंग के फूल हैं। अलग-अलग रंग के फूलों की महत्ता है। आप पूरे देश को एक रंग में रंग देना चाहते हैं। ये कहीं से भी भारत जैसे विविधता वाले देश के लिए अच्छा नहीं है। लेकिन पूरी तरह विफल है। अंकिता भंडारी को आजतक इंसाफ नहीं मिला है। उत्तराखंड में आज भी लोगों के पास रोजगार नहीं है, अग्निवीर योजना को लेकर युवाओं में गुस्सा.. इस सारे मुद्दों पर घिरी हुई उत्तराखंड की सरकार के और कुछ नहीं है।”

असम के बदरुद्दीन अजमल बोले- कचरे में डाल देना चाहिए ये बिल

एआईयूडीएफ के अध्यक्ष और असम से सांसद बदरुद्दीन अजमल ने कहा, “हमारा हिंदुस्तान एक रंगा-रंग बगीचा है। कोई भी बगीचा कितना भी खूबसूरत क्यों न हो, अगर उसमें सिर्फ एक फूल है तो आप उसे ज्यादा देर तक देख नहीं पाएँगे। भारत में लोग सभी धर्मों की संस्कृति जीवित है। यही हमारी खूबसुरती है। एक जिन्न आकर औरत-मर्द सबको एक कर दे… तो ऊपर वाला चाहता तो वैसा ही बना देता। दुनिया में मर्द बनाते ही नहीं, सारी औरतें बन जातीं। औरत नहीं बनाता तो सारे मर्द बन जाते। प्रकृति के खिलाफ कुछ भी ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है।”
अजमल ने आगे कहा, “जब सरकार विफल हो जाती है तो कुछ चमकदार लाना होता है। असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा भी समय-समय पर ऐसा ही करते हैं। लोगों का ध्यान भटकाने के लिए वो कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पीएम मोदी को खुश करना चाहते हैं। ये चलेगा नहीं, क्योंकि ये नेचर के खिलाफ है। बाकी इस बिल को कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए।”

शरियत के खिलाफ कानून बना तो मंजूर नहीं: सपा संसद

इस बिल पर सपा सांसद एसटी हसन ने कहा कि कुरान के खिलाफ कोई भी कानून मंजूर नहीं है। उन्होंने कहा, “अगर कोई कानून ऐसा बनता है, जो हमें… मुसलमानों को कुरान-ए-पाक ने दी गई हिदायत के खिलाफ बनता है। जैसे कि हम साढ़े 14 सौ साल से पैतृक संपत्ति में बेटी को हिस्सा दे रहे हैं। कितना देते हैं, वो अलग बात है। उसके खिलाफ कोई कानून बनता है तो हम उसे मानने को तैयार नहीं है।”
एसटी हसन ने आगे कहा, “अगर मुसलमानों के हित में है, अगर शरियत के हिसाब से है… हर वो कानून शरियत का जिससे दूसरे को परेशानी नहीं हो रही तो इन्हें (भाजपा को) क्यों परेशानी है? कब तक ये हिंदू-मुसलमान कहकर पोलराइज करते रहेंगे। अब लोग तंग आ चुके हैं इस राजनीति से।”
गौरतलब है कि उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) आने के बाद समाज में कई बदलाव होने वाले हैं। नए कानून में विवाह, लिव-इन रिलेशनशिप, उत्तराधिकार से लेकर तमाम सिविल मामलों को लेकर प्रावधान किए गए हैं। ये सारे प्रावधान बिन किसी धार्मिक भेदभाव के सब पर लागू होंगे। मसलन, 18 साल की उम्र में अगर लड़की की शादी होनी है तो यह कानून सारे लोगों पर लागू होगा। 

समान नागरिक संहिता और आर्य समाज

डॉ राकेश कुमार आर्य, मुख्य संपादक, उगता भारत   

आज भारत में समान नागरिकता संहिता की बात करने को मुस्लिम कट्टरपंथी और छद्दम सेक्युलरिस्ट छाती पीट मातम कर देश का माहौल ख़राब करते रहे हैं। इन अशिक्षित से भी बत्तर और शैतान बने शिक्षितों को नहीं ज्ञान कि सनातन धर्म कितना महान और क्षीर सागर से भी अधिक गहरा है। जिसका अध्ययन और समझने के लिए असंख्य ऋषि-मुनियों ने हज़ारों वर्ष तपस्या की है, जिस कारण सनातन पर प्रहार करने वालों का विश्व में कोई नामलेवा नहीं, इतिहास साक्षी है। लेकिन अपनी तिजोरी और अय्याशी के लिए धन एकत्र करने बेगुनाह जनता को गुमराह कर उनका जीवन अंधकारमय बना रहे हैं। सनातन की थोड़ी-से गहराई में जाने पर ज्ञात होता है कि सनातन कितना व्यापक और आसमान से बहुत ऊँचा है।
जनता को-चाहे वह किसी भी जाति, समुदाय अथवा मजहब से हो- इन समाज के दुश्मनों से पूछो की मानव को जातियों में किसने बांटा? कुर्मी,अनुसूचित, शिया, सुन्नी, वहाबी, कैथोलिक और बैप्टिस्ट आदि जातियों में मानव को किसने बांटा और क्यों? ये सब किया भटकी आत्माओं ने अपनी दुकानदारी चलाने के लिए।
लेखक 
भारत में प्रत्येक राष्ट्रवासी को (नागरिक नहीं) समान अधिकार प्राप्त हों और प्रत्येक व्यक्ति अपनी मानसिक, शारीरिक और आत्मिक उन्नति कर सके, इसके लिए ऋषियों ने तप किया। स्वामी दयानंद जी महाराज भारत के आधुनिक इतिहास के ऐसे पहले महानायक हैं जिन्होंने तप को राष्ट्र का आधार बनाया। उन्होंने इस बात को गंभीरता से अनुभव किया कि बिना तप के राष्ट्र निर्माण संभव नहीं है । यही कारण था कि उन्होंने सारे देश को तपस्वियों का देश बनाने के लिए कार्य करना आरंभ किया। अपनी इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए उन्होंने गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को लागू करने के साथ-साथ वेदों की ओर लौटने का आवाहन देशवासियों से किया । वह जानते थे कि वेदों का स्वराज्य चिंतन जब तक लोगों की दृष्टि में नहीं आएगा तब तक देश तप के लिए तैयार नहीं होगा। एक प्रकार से स्वामी दयानंद जी महाराज ने भारत की आत्मिक चेतना को उस परमचेतना के साथ जोड़ दिया जिसे आप ऊर्जा का अजस्र स्रोत कह सकते हैं।
ऋषि का यह बहुत बड़ा उपकार था। उनके इतना करने मात्र से भारत अपने मूल्य को अपने आप समझ गया। जैसे ही वह परम चेतना से जुड़ा और जुड़ने के पश्चात ऊर्जा से भरा तो वह बब्बर शेर की भांति अपने शत्रु पर टूट पड़ा। उसका यह शत्रु कई क्षेत्रों में कई रूपों में खड़ा हुआ था । यदि राजनीतिक क्षेत्र में देखें तो वह विदेशी शासको के रूप में खड़ा था । सामाजिक क्षेत्र में देखें तो वह अज्ञानता और पाखंड के रूप में खड़ा था। यदि धार्मिक क्षेत्र में देखें तो वहां पर भी अज्ञानता का साम्राज्य था। इसी प्रकार आर्थिक क्षेत्र में जबरदस्त शोषण के रूप में यह शत्रु दिखाई दे रहा था।
महर्षि दयानंद जी के प्रयास से जगे हुए भारत ने अपने सामने खड़े शत्रुओं को पहचाना और उनके विनाश पर काम करने लगा।
स्वामी दयानंद जी महाराज ने जब भारत के लोगों को वेदों की ओर लौटने का आवाहन किया तो वेदों के समान दृष्टिकोण से लोगों का अपने आप परिचय हो गया। आर्य समाज एक ऐसा क्रांतिकारी संगठन है जो पहले दिन से समान नागरिक संहिता का समर्थक रहा है। इसने अपने चिंतन से, अपने लेखन से , अपने व्याख्यानों से और उपदेशों से हर स्थान पर मनुष्य मनुष्य के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव न करने का संकल्प बार-बार दोहराया है। यदि यह कहा जाए कि आर्य समाज ही वह पवित्र संस्था है जो भारत ही नहीं संपूर्ण संसार में समान नागरिक संहिता की पैरोकार है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। हम सभी जानते हैं कि ऊंच, अस्पृश्यता की खाई को पाटने और समाज से जातिवाद को मिटाने की पहल करने वाली संस्था आर्य समाज ही रही है। स्वामी दयानंद जी महाराज ने सभी देशवासियों को आर्य शब्द दिया। इस प्रकार उन्होंने सभी देशवासियों को एक नाम 'आर्य' देकर इस पवित्र शब्द को हमारी राष्ट्रीयता के साथ संलग्न किया। इससे पता चलता है कि स्वामी दयानंद जी महाराज हम देशवासियों के भीतर तो श्रेष्ठता का भाव पैदा करना चाहते ही थे, वह हमारी राष्ट्रीयता को भी सर्वोच्च श्रेष्ठता में परिवर्तित कर देना चाहते थे। यह एक ऐसा शब्द है जो मनुष्य मनुष्य के बीच में किसी भी प्रकार की दूरी नहीं रहने देता। सबको एक मुख्यधारा में समान स्तर पर और समान सम्मान के भाव से स्थापित कर देना चाहता है अर्थात आर्य शब्द हमारे लिए समान नागरिक संहिता की सबसे बड़ी गारंटी है।
ऋषियों का तप और भारतीय राष्ट्र
भारतीय राष्ट्र की मानवतावादी चिंतनधारा के पीछे ऋषियों का तप काम करता रहा है। बड़े परिश्रम और पुरुषार्थ के बाद हमारे ऋषियों ने राष्ट्र की सुव्यवस्थित योजना और स्वरूप को तैयार किया। भारत के ऋषियों के द्वारा बनाई गई यह राष्ट्र की व्यवस्था करोड़ों वर्ष तक निर्विघ्न काम करती रही। इस संबंध में अथर्ववेद ( 19: 41: 1) का यह मंत्र बड़ा प्रसिद्ध है कि :-
भद्रमिच्छन्त : ऋषय: स्वविर्द : तपोदीक्षामुपसेदुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजस्वजातं तस्मै देवा: उपसन्नु मन्तु।
“भद्रमिच्छन्त : ऋषय” विश्व के कल्याण की कामना रखने वाले और भद्र की उपासना करने वाले ऋषियों ने तप किया। हमारे ऋषियों ने भद्र के माध्यम से राष्ट्र की पवित्रता को बनाए रखने का प्रशंसनीय प्रयास किया। उनके तप से राष्ट्र को बल मिला, तेज मिला। बल और तेज के सम्मिश्रण से जो अग्नि पैदा होती है वह राष्ट्र को तेजस्विता से ओतप्रोत करती है। उपरोक्त मंत्र का भावार्थ है कि उनके परिश्रम पूर्ण त्याग, तपस्या और राष्ट्र की ऊंची साधना के फलस्वरूप जिस प्रकार के राष्ट्र ने आकार लिया उसे देखकर देवता भी आकर इस राष्ट्र को नमस्कार करते हैं। लोक कल्याण की उच्चतम साधना में रत रहे भारत के ऋषियों के इस प्रकार के परिश्रम के पश्चात जो राष्ट्र बना उसे लोगों ने देव निर्मित देश अर्थात ऋषियों के द्वारा निर्मित किया गया देश कहा। देव निर्मित देश कहने से एक और भी बड़ी शंका का या कहिए कि इतिहास के एक महाझूठ का निराकरण अपने आप हो जाता है कि हम सब ऋषियों के त्याग तपस्या के फलों को भोगने वाले सौभाग्यशाली जन हैं । हमने कभी लोगों को ना तो उत्पीड़ित किया और ना किसी ऐसे कबीलाई संघर्ष में अपने देश को कभी फंसाया, जिसमें लोगों को अपने अधीन कर अर्थात अपना गुलाम बनाकर उन पर अपना अमानवीय शासन थोपने की प्रवृत्ति संसार के अन्य देशों में देखी जाती है। हमने पूर्ण व्यवस्थित योजना के साथ आगे बढ़ना आरंभ किया और सबको सबके अधिकारों का उपयोग करने का सुंदर परिवेश उपलब्ध कराया। हमने किसी के अधिकारों का शोषण नहीं किया बल्कि अपनी ओर से अधिकार देने की या दूसरों के अधिकारों का संरक्षण करने की मानवोचित प्रवृत्ति को अपना कर मानवता का हित संरक्षण किया। अपनी इसी सोच और पवित्र भावना के कारण भारत प्राचीन काल से ही समान नागरिक संहिता का समर्थक ही नहीं बल्कि संस्थापक देश रहा है। जो लोग दूसरों के अधिकारों का संरक्षण करने की प्रवृत्ति वाले होते हैं वही देव होते हैं । भारत देव निर्मित देश इसीलिए है कि यहां के ऐसे ही देव भावना वाले लोगों ने या ऋषि पूर्वजों ने इस राष्ट्र का निर्माण किया है।
भारतीय राष्ट्र का निर्माण और हमारे ऋषि पूर्वज
इस देव निर्मित देश में हम करोड़ों वर्ष से निवास करते चले आए हैं। भारत राष्ट्र का निर्माण ऋषियों के द्वारा हुआ है। उनके तप से दीक्षित राष्ट्र प्राचीन काल से ही शांति और व्यवस्था का समर्थक रहा है । इस राष्ट्र ने धर्म के साये में आंखें खोली हैं। धर्म से ऊर्जा प्राप्त कर भारतीय राष्ट्र ने ऐसे धर्म-राज्य की स्थापना की जो नीति अर्थात निश्चित व्यवस्था पर आधारित था। इसी निश्चित व्यवस्था को दूसरे संदर्भ में आप धर्म का सकते हैं तो निश्चित व्यवस्था का समर्थक होने के कारण राष्ट्र के रूप में भी इसका उपयोग हो सकता है। हमारी दृष्टि में राष्ट्र ऐसे लोगों से बनता है जिनका चिंतन धर्म की भट्टी में तपा हो और जो स्वाभाविक रूप से एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर आगे बढ़ने वाले हों। जो शोषण, उत्पीड़न, छोटे-बड़े , ऊंचनीच के भाव से मुक्त हों और जो सबको एक साथ, एक दिशा में लेकर चलने की पवित्र भावना से भरे हों।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि वही व्यक्ति राष्ट्र निर्माता की श्रेणी में आता है जो अपने देशवासियों के प्रति सहानुभूति का भाव रखता हो, जो अपने इतिहास नायकों से प्रेम करता हो, अपने देश की संस्कृति और धर्म के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखता हो और देश पर मर मिटने की भावना से ओतप्रोत हो। मानवता के हत्यारे लोग जिन्होंने तुर्क, मुगल या अंग्रेजों के रूप में हमारे देश पर जबरन शासन किया, कभी भी राष्ट्र निर्माता नहीं हो सकते थे। उनके आचरण ,कार्य शैली और व्यवहार को देखकर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ऐसे लोग तो राष्ट्र के हत्यारे होते हैं। ऐसे हत्यारे लोगों का अनुकरण करने वाले लोग भी राष्ट्र निर्माता नहीं हो सकते। यह आर्य समाज ही था जिसने सबसे पहले इस बात को लोगों को समझाया कि राष्ट्र के हत्यारों को हत्यारा कहो और राष्ट्र निर्माताओं को राष्ट्र निर्माता कहो। आज भी आर्यसमाज इसी विचारधारा में विश्वास रखता है। यही कारण है कि वह किसी भी प्रकार के तुष्टिकरण या छद्मवाद का समर्थक नहीं है।
जिन लोगों की मानसिकता में दोष था या दोष है वह कभी भी 'सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया…. ' की पवित्र भावना के उपासक नहीं हो सकते। राष्ट्र की अवधारणा उनके मानस में खंडित रूप में प्रवाहित होती है और राष्ट्र कभी भी खंडित रूप में साकार रूप नहीं ले सकता।
हमने अपनी ऋषि परंपरा को सम्मान देने और उसे जीवित रखने की भावना से प्रेरित होकर देश में गोत्र परंपरा को अपने अपने महान ऋषियों के नाम से प्रचलित किया। भारतवर्ष की सभी कुल, वंश ,परंपराएं ऋषि गोत्रों के आधार पर चल रही हैं। गोत्र परंपराओं को जीवित रखकर हम अपने महान पूर्वजों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यह अलग बात है कि हम अपनी वंश, गोत्र परंपरा के पीछे खड़े ऋषियों के चिंतन को भूल गए हैं।
वेद व्यक्ति की स्वतंत्रता का उद्घोषक
आज पश्चिमी जगत के अनेक विद्वान इस बात पर बल देते हैं कि संसार को व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाने वाला पश्चिमी जगत है, पर सच यह नहीं है। पश्चिमी जगत का इतिहास उठाकर देखिए , वहां पर लाखों करोड़ों लोगों को मार-मारकर समाप्त किया गया । इसके पीछे व्यक्ति के अधिकारों को छीनने की मनुष्य की अमानवीय भावना ही काम कर रही थी। जबकि भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ जब किसी एक वर्ग ने दूसरे वर्ग के ऊपर हमला कर उसके लाखों निरपराध लोगों को मौत के घाट उतार दिया हो।
वेद को व्यक्ति की स्वतन्त्रता का उद्घोषक कहा जा सकता है। वैदिक काल में राष्ट्रचिन्तक ऋषियों ने वास्तविक प्रजातन्त्र की अवधारणा का सूत्रपात करते हुए पंचायती राज्य व्यवस्था का शुभारम्भ किया था।
ऋ. 10/62/11 में कहा गया है:-
सहस्रदा ग्रामणीर्मा रिषन्मनुः सूर्येणास्य यतमानैतु दक्षिणा।
यहाँ ऋषि ग्राम प्रधान (ग्रामणी) के प्रजा के प्रति कल्याण भावना से ओत- प्रोत होने की बात कह रहा है। ऋषि का कहना है कि ग्राम प्रधान प्रभूत धन देने वाला सहस्रदा मनु है। उसकी दक्षिणा सूर्य से प्रतिद्वन्द्विता करे। कहने का अभिप्राय ये है कि जिस प्रकार सूर्य सभी लोगों पर बिना किसी भेदभाव के अपनी किरणों को बिखेरता है, उसी प्रकार ग्रामणी प्रत्येक व्यक्ति और ग्रामवासी के प्रति स्नेहासिक्त हो तथा उसके हृदय में किसी के प्रति भी द्वेषभाव ना हो। जैसे सूर्य की किरणें सबके लिए जीवन प्रद हैं, उसी प्रकार ग्राम प्रधान सबके लिए जीवन प्रद हो ।
ग्राम प्रधान से लेकर राष्ट्र प्रधान तक लोक कल्याण की इसी पवित्र भावना में वसुधैव कुटुंबकम , कृण्वंतो विश्वमार्यम् और सर्वे भवंतू सुखिन: …. का उदात्त भाव छुपा हुआ है जो प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकार तो प्रदान करता ही है राज्य को उसके मौलिक अधिकारों का संरक्षक भी बनाता है। नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करने की प्रक्रिया ईसाइयत और इस्लाम की देन है।
शायद किसी भी ग्रामणी या ग्राम प्रधान के रहते हुए जैसे गांव में कोई भी नागरिक नंगा भूखा नहीं रह सकता , वैसे ही देश के राष्ट्रपति के रहते हुए कोई भी देशवासी नंगा भूखा नहीं रह सकता। इस प्रकार की न्यायिक व्यवस्था करते राजा या राष्ट्रपति को हर स्थिति में व्यक्तियों के बीच पूर्ण न्याय करना चाहिए। उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए उनमें पारस्परिक बंधुता की भावना को सुनिश्चित करना राजा का दायित्व होता है। राजा या शासक वर्ग वोटों की राजनीति करते हुए आरक्षण, रेवड़ी बांटने या तुष्टीकरण के माध्यम से विभेद उत्पन्न करता है या विभेदकारी नीतियां अपनाता है तो ऐसा राजा या शासन व्यवस्था उत्तम नहीं होती। देश के शासक वर्ग को चाहिए कि देश में समरूपता स्थापित करने के लिए एक प्रकार के कानून, एक प्रकार की विधि व्यवस्था, एक प्रकार के रीति रिवाज ,विवाह आदि संस्कारों के एक प्रकार के नियम लागू हों। जिससे देश में समरूपता स्थापित होकर राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूती प्रदान हो।
शासन की नीतियों का आधार विभिन्नताओं को पोषित करना नहीं है,अपितु राष्ट्रहित में विभिन्नताओं को समेकित करना है।
नेहरु और समान नागरिक संहिता
नेहरू समान नागरिक संहिता को लागू करने के पक्षधर होकर भी विभिन्नताओं को पोषित करने वाले प्रधानमंत्री थे।
शासन के उपरोक्त उदात्त भाव ( जिसे हमारे यहां राष्ट्रधर्म कहा जाता है) से प्रेरित होकर हमारे संविधान में समान नागरिक संहिता की पवित्र भावना का समावेश करने का प्रयास इसलिए किया गया कि संविधान सभा के अनेक सदस्य इस बात पर सहमत थे कि पिछली कई शताब्दियों में भारतीय राज्य व्यवस्था में होती रही उथल-पुथल के चलते तुर्क , मुगल और ब्रिटिश शासकों ने लोगों के बीच विभेदकारी नीतियां अपनाई । जिससे तुष्टीकरण, फूट डालो और राज करो की देशघाती परंपरा देश की शासन व्यवस्था में आरम्भ हो गई। संविधान सभा के अनेक सदस्य इस बात से सहमत थे कि स्वतंत्र भारत में शासन की इस प्रकार की विभेदकारी नीतियों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू तो 1930 से समान नागरिक संहिता की बात कर रहे थे। इस सबके उपरांत भी नेहरू एक ऐसे नेता थे जो समान नागरिक संहिता का अपना ही अर्थ निकाल रहे थे। वे नहीं चाहते थे कि देश में समान नागरिक संहिता सही संदर्भ और सही अर्थों में लागू हो जाए। राजनीति में दक्षिणा के संस्कार को नेहरू ने कभी स्वीकार नहीं किया। उन्हें इस प्रकार का संस्कार या दक्षिणा देने का विचार सांप्रदायिक दिखाई देता था। जिसे वह हिंदू मानसिकता से पूर्वाग्रहग्रस्त मानते थे। नेहरू का झुकाव इस्लाम की ओर था। अतः उनके बारे में कहा जा सकता है कि वह स्वयं सांप्रदायिक थे। क्योंकि हर वह व्यक्ति सांप्रदायिक होता है जो सांप्रदायिक आधार पर लोगों में तुष्टीकरण जैसी बीमारी के आधार पर विभेद पैदा करता है। नेहरू की इस प्रकार की नीति ने समान नागरिक संहिता की भावना को चोटिल किया।
वेद ने ग्राम प्रधान को नरपति की संज्ञा दी थी।
ऋ. 10/107/5 में कहा गया है:-
“तमेवमन्ये नृपतिं जनानां यः प्रथमो दक्षिणा मा विवाय।”
अर्थात् “जिसने पहले दक्षिणा आरम्भ की उसे ही मैं लोगों का नरपति मानता हूँ।”
नेहरू भारतीय शासन व्यवस्था के इस सूत्र वाक्य के निकट तक भी नहीं थे। वह नहीं जानते थे कि दक्षिणा का अभिप्राय राष्ट्र की उन्नति के प्रति मन से समर्पित हो जाना है। उन्होंने मंदिरों में होने वाली दक्षिणा के बारे में सुना था। वेद की आत्मिक और मानसिक दक्षिणा के विषय में उन्हें कोई बोध नहीं था। इस्लाम की या ईसाइयत की मान्यताओं को उन्होंने व्यक्ति की व्यक्तिगत पवित्रता के साथ जोड़कर देखा। बस, यही कारण था कि वे समान नागरिक संहिता की संवैधानिक वचनबद्धता के प्रति अपनी ईमानदारी प्रकट नहीं कर पाए। समय आने पर उन्होंने इस्लामिक तुष्टीकरण के सामने समान नागरिक संहिता को बौना करके देखा।
यदि कोई प्रधानमंत्री आर्य समाज की विचारधारा से प्रेरित होकर काम करता तो वह वैदिक चिन्तन से अभिभूत होकर राष्ट्र को वास्तविक समान नागरिक संहिता का बोध कराता। हमारे देश का यह दुर्भाग्य ही रहा कि देश को पहला प्रधानमंत्री ऐसा व्यक्ति मिला जो भारतीय संस्कृति से तो दूरी बनाकर रहता ही था, उसे आर्य समाज नाम की पवित्र संस्था से तो बहुत ही अधिक द्वेष भाव था।

‘अम्मी नाबालिग बच्चों की अभिभावक नहीं, बेवा को संपत्ति बेचने का अधिकार नहीं’: शरिया के आगे गोदरेज समूह बेबस, 227 करोड़ रूपए की लैंड डील फँसी

                                                                                                                                  साभार: HT
नागपुर में 227 करोड़ रूपए की एक जमीन को लेकर गोदरेज प्रॉपर्टीज और अग्रवाल परिवार के बीच चल रहे विवाद के बीच मुस्लिम पर्सनल लॉ फिर चर्चा में आ गया है। इस मामले में सामने आया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ एक विधवा को जमीन बेचने या उसे ट्रांसफर करने का अधिकार नहीं देता है। अब इस इस्लामी कानून का सहारा लेकर विधवा के वारिस करोड़ों रुपए बनाने का जुगाड़ लगा रहे हैं।

क्या है गोदरेज से जुड़ा जमीन विवाद और मुस्लिम पर्सनल लॉ का रोल

यह पूरा मामला 1988 का है। महाराष्ट्र के नागपुर के बेसा इलाके के घोगली गाँव में अब्दुल वहाब नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति के पास 58 एकड़ भूमि थी। अब्दुल वहाब की मौत के बाद यह भूमि उसकी विधवा खैरुन्निसा ने अग्रवाल परिवार को बेच दिया। इस जमीन को कितने में बेचा गया, इसकी जानकारी नहीं आई है। बेची गई इस जमीन में खैरुन्निसा के 8 बच्चों का हिस्सा भी शामिल था।
जमीन की बिक्री के समय मधुकर पुरोहित नाम के एक आदमी को अब्दुल वहाब के बच्चों का देखरेख करने वाला नियुक्त किया गया था। पुरोहित ने ही बच्चों की तरफ से जमीन की बिक्री के कागजों पर हस्ताक्षर किया था। आगे चलकर वर्ष 2022 में इसी जमीन को अग्रवाल परिवार ने गोदरेज प्रॉपर्टीज को 227 करोड़ रूपए में बेच दी।
हालाँकि, इस जमीन के सौदे पर अब्दुल वहाब के एक बेटे अब्दुल बशीर ने प्रश्न खड़े करते हुए मुकदमा दायर कर दिया। अब्दुल बशीर ने दावा किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कहता है कि शौहर की मौत के बाद उसकी विधवा उसके बच्चों की देखरेख के लिए वैध अभिभावक नहीं हो सकती। इसीलिए वह बच्चों का हिस्सा नहीं बेच सकती। ऐसे में जमीन की बिक्री अवैध है।
इस मामले में नागपुर के एक सिविल जज ने निर्णय दिया कि मुस्लिम कानून के अंतर्गत उठाए गए इस प्रश्न को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून के अंतर्गत पिता की मौत के बाद उसके बच्चों का सम्पत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार तुरंत बन जाता है। इस जमीन को तभी बाँटा जा सकता है, जब कोई वारिस यह चाहे। इसके लिए कोर्ट में अर्जी दाखिल की जा सकती है।
इस मामले में कोर्ट ने कहा कि यह मुकदमा इसलिए भी जायज है, क्योंकि इस पर अधिकार रखने वाले लोग कभी इससे बाहर हुए ही नहीं। ऐसे में 34 वर्षों के बाद दायर किया गया मामला कोर्ट के अंदर सुना जा सकता है। अब ऐसे में आगे और मामलों की सुनवाई की जा सकेगी।

गोदरेज को जमीन मिलने में एक और रोड़ा

इस मामले में अक्टूबर 2022 में एक और मुकदमा किया गया। यह मुकदमा अब्दुल वहाब के बेटे अब्दुल जब्बार की तरफ से मुनव्वरा बेगम ने दायर किया। अब्दुल जब्बार मानसिक रूप से स्थिर नहीं है। इस मामले में कहा गया कि जब्बार की अम्मी ने बिना कोई वैध अभिभावक नियुक्त किए उसका हिस्सा बेच दिया। ऐसे में उनके मानसिक स्वास्थ्य कानून का भी उल्लंघन किया है।
मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि अब्दुल वहाब की विधवा से जमीन खरीदने वाले अग्रवाल परिवार को इस जमीन से मोटा मुनाफा हुआ है। उन्होंने यह जमीन गोदरेज को 227 करोड़ रूपए में बेची है, जो कि उन्होंने 1988 में काफी कम दामों में खरीदी होगी। वहीं, साल 1988 में अब्दुल वहाब के वारिसों को छोटी-मोटी रकम मिली होगी।

मुस्लिम पर्सनल लॉ में कमियाँ और इसका दुरूपयोग

जहाँ एक ओर कोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर मामले का निपटारा कर रहा है, वहीं इससे मुस्लिम पर्सनल लॉ की कमियाँ भी जाहिर हो रही हैं। यह मामला दिखाता कि धार्मिक कानून के जरिए कैसे एक विधवा महिला के अधिकारों को छीना जा रहा है। मुस्लिम महिला को उसके अधिकारों वंचित करने वाले ऐसे कई मामले सामने आ सकते हैं।
अब्दुल वहाब के वारिसों ने इस मामले में जहाँ दशकों तक कुछ नहीं किया, वहीं अब वह इस बड़ी डील को देखकर सक्रिय हो गए हैं। वे इस बड़ी बिजनेस डील को लटकाकर मोटा पैसा बनाना चाह रहे हैं। इस मामले से यह समस्या भी सामने आई है कि जो बड़े कॉर्पोरेट विकास के लिए जमीनें खरीदते हैं, वे बाद में जाकर कानूनी पचड़ों में फँस जाते हैं।
समस्या यह है कि भारत में अभी भी यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं है जो विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में समान रूप से प्रभावी हों। ऐसे में मजहबी कानूनों को अपनी मनमर्जी से उपयोग करने की खुली छूट कई समस्याएँ पैदा करती हैं, जैसा कि इस मामले में देखा जा रहा है।

यूनिफॉर्म सिविल कोड की आवश्यकता

यदि देश में सभी लोगों पर एक समान यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होता तो ऐसे मामले में कानूनी पचड़ा नहीं फँसेगा। इस मामले में विधवा के अधिकार भी सुरक्षित रहेंगे। भारत को ऐसे मामले में कानून बनाने की तरफ कदम बढ़ाने की जरूरत है, जहाँ बिजनेस डील एवं सम्पत्ति से जुड़े मामले और विधवाओं के अधिकार सुरक्षित किए जा सकें।
कानूनी पचड़े में फँसी 227 करोड़ रूपए की यह गोदरेज की डील दिखाती है कि भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड की आवश्यकता क्यों है। तथ्य ये है कि 2022 में एक 34 वर्ष पुरानी जमीन की बिक्री को चुनौती दी गई है, वह भी मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत।

यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर झूठी भ्रांतियां फैला रहे संविधान की शपथ लेने वाले

भारतीय संविधान की शपथ लेने वाले राजनेता क्या राष्ट्र को बताएंगे कि क्या यूनिफॉर्म सिविल कोड देश अथवा जन विरोध में है? जनता में झूठी भ्रांतियां फ़ैलाने वाले बतायें विश्व में ऐसा कौन-सा देश है जहां ये कानून नहीं? क्यों नहीं भारत में अब तक ये कानून लागू हुआ? क्यों इतने वर्ष लग गए? आखिर जनता में भ्रांतियां फैलाकर संविधान का क्यों अपमान कर रहे हैं? देश संविधान के अनुसार चलेगा या तुम्हारी मुस्लिम तुष्टिकरण नीति के अनुसार? आखिर मुस्लिम तुष्टिकरण करते कब तक भारतीय मुस्लिम समाज को बलि का बकरा बनाते रहोगे? जिस दिन यही मुस्लिम समाज वास्तविकता जान उन्हें अपमानित किये जाने का कारण पूछेगा, तुम्हे कहीं छिपने को भी जगह नहीं मिलेगी, और वह दिन शायद ज्यादा दूर नहीं। क्योकि नूपुर शर्मा विवाद के बाद से यही बात जोर पकड़ने लगी है। नूपुर की असली वीडियो देखने के बाद मुस्लिम देश भी भारतीय मुसलमान की मानसिकता पर अचंभित हैं।    
यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) इन दिनों सुर्खियों में है। भारतीय संविधान में यूनिफॉर्म सिविल कोड का साफ-साफ जिक्र है, उसे लागू करने के लिए अब मोदी सरकार प्रतिबद्ध है। उत्तराखंड के बाद गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा सरकारों ने यूसीसी को अपने राज्यों में लागू करने की दिशा में कदम पहले ही बढ़ा दिए हैं। यूसीसी कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसे लेकर अब तक 60 लाख से ज्यादा सुझाव लॉ कमीशन के पास आ चुके हैं। यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में मोदी सरकार की तेजी के बीच अब सोशल मीडिया पर अनर्गल भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं कि इसे लागू होना चाहिए या नहीं ? और इसके लागू होने पर किसको, क्या फायदा होने वाला है? वर्ग विशेष को क्या नुकसान होने वाला है? जबकि हकीकत यह है कि देश को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में यह बेहद मजबूत कदम साबित होगा। एक्सपर्ट बताते हैं कि यूसीसी मोटे तौर पर महिलाओं के सशक्तिकरण और उन्हें लेकर समानता पर फोकस्ड है। खासतौर से महिलाओं को सुदृढ़ और मजबूत बनाने की ओर ध्यान दिया जा रहा है। चाहे वे किसी भी समुदाय से हों। इसमें महिलाओं की धार्मिक मान्यताओं, उनके पहनावे के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। सिर्फ आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से उन्हें मजबूत करने वाले कानूनों के दायरे में उन्हें लाया जाएगा।

अजब-गजब कुतर्क…यूसीसी आया तो हम पर भी ड्रेस में थोपा जाएगा धोती-कुर्ता
प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने जब से यूसीसी के बारे में बोला है, सोशल मीडिया पर #UniformCivilCode ट्रेंड कर रहा है। न्यूज चैनलों पर विश्लेषण हो रहा है कि यह कितना जरूरी है और इससे क्या कुछ बदल जाएगा। इन सबके बीच सोशल मीडिया पर ऐसी-ऐसी भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं, जिसे देखकर आप सिर पकड़ लेंगे। यूसीसी लागू होने से पहले ही बगैर जाने लोग सवाल उठा रहे हैं कि हिंदू और मुस्लिमों को एक ही तरह से शादी करनी होगी? क्या महिलाओं की शादी के लिए निर्धारित उम्र में बदलाव आ जाएगा? राज्यों को अपने हिसाब से ही यूसीसी के प्रावधानों में बदलाव का अधिकार होगा? यूसीसी से लिव-इन को कानूनी मान्यता मिल जाएगी? ऐसी न जाने कितनी कपोल-कल्पित बातें हैं। यूसीसी पर वायरल एक वीडियो में तो एक शख्स कहता है कि कानून बनाने से पहले आम जनता को शिक्षित किया जाए कि देखिए आपके लिए ये चीज है। वह आगे कहता है, ‘जैसे UC… ड्रेस का है मतलब एक ही जैसा ड्रेस पहनेंगे। जब आएगा तो…अगर मान लीजिए धोती-कुर्ता ड्रेस बना तो हम पर भी थोपा जाएगा, तो हम क्या धोती-कुर्ता पहनेंगे?’ वीडियो देखकर साफ लग रहा है कि इस शख्स ने यूसीसी में पहले शब्द यूनिफॉर्म का मतलब ड्रेस निकाला है।

लेबनान में अभिनेत्री ने हिजाब न पहनने पर वेश्या कहे जाने पर एक लाइव टीवी कार्यक्रम के दौरान एक मौलवी की पिटाई कर दी। लेबनान जो कभी ईसाई बहुल राज्य था, अचानक जनसांख्यिकीय परिवर्तन के बाद अब इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा शासित है। दुनिया भर में 'पोशाक पहनने के अधिकार' की वकालत करने वाली नारीवादियों को इसे देखना चाहिए।

यूनिफार्म सिविल कोड से जुड़े ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब जो भ्रांतियां हैं वो दूर हो सकें….

किसी भी धर्म के लोगों के लिए धार्मिक पहनावे पर कोई पाबंदी नहीं लगेगी
भ्रांति: यूसीसी को लेकर इस तरह की दावे सोशल मीडिया पर किए जा रहे हैं कि इसके लागू होने के बाद मुस्लिमों को भी अग्नि के फेरे लेकर निकाह करना होगा। ईसाइयों को भी शादी के तौर तरीकों को बदलना पड़ेगा। शवों को दफनाने की जगह जलाना होगा। दाढ़ी रखने और कुर्ता-पायजामा पहनने पर पाबंदी लगेगी।
हकीकत : यूसीसी का किसी भी धर्म की धार्मिक मान्यताओं, पहनावे या पूजा-पाठ पर कोई असर नहीं होगा। बुरका और गाउन दोनों पहनने में कोई परहेज नहीं होगा। यूसीसी लागू होने से किसी भी धर्म की धार्मिक मान्यताओं, पहनावे या पूजा-पाठ पर कोई असर नहीं होगा। यूसीसी का मतलब यह कतई नहीं है कि सभी धर्मों की रस्में, रीति-रिवाज एक जैसे हो जाएंगे। इसका सीधा सा अर्थ ये है कि जिस तरह चोरी, डकैती, लूट, हत्या या दुष्कर्म जैसे मामलों में सभी के लिए एक कानून लागू होता है। ठीक उसी तरह शादी, तलाक, संपत्ति पर अधिकार, उसका बंटवारा, गार्जियनशिप, गोद लेना, गुजारा भत्ता वगैरह के लिए सभी पर एक कानून लागू होगा।

यूसीसी में लिव-इन-रिलेशनशिप को कानूनी जामा नहीं पहनाया जाएगा
भ्रांति: यूसीसी में लिव-इन को कानूनी जामा पहनाने के साथ ही शादी की उम्र बदली जाएगी
हकीकत : विशेषज्ञों के मुताबिक यह तय है कि लिव इन रिलेशनशिप जैसे कंसेप्ट को यूसीसी के तहत नहीं लिया जाएगा। लिव-इन को कोई कानूनी जामा नहीं पहनाया जाएगा। अबतक इस मसले को कंसीडरेशन में नहीं लिया गया है। लिव इन को वैध करने की भी इस कानून के तहत कोई योजना नहीं है। जहां तक शादी की उम्र का सवाल है तो इसको सभी समुदायों के लिए एक समान किया जा सकता है। इसमें पुरुषों की उम्र 21 ही रहेगी। मगर महिलाओं की उम्र को 18 से बढ़ाकर 21 साल की जा सकती है। वहीं, शादी का रजिस्ट्रेशन वर्तमान की ही तरह जरूरी होगा। इसे और सख्त और सुनिश्चित करने का मसौदा तैयार हो रहा है।

आदिवासी समुदाय की प्रैक्टिसेज के साथ भी छेड़छाड़ नहीं की जाएगी
भ्रांति: आदिवासी समुदायों को सदियों से जारी अपनी परंपराएं बदलनी होंगी
हकीकत: विशेषज्ञ बताते हैं कि आदिवासियों को संविधान में जो संरक्षण प्राप्त है। उन्हें ज्यों का त्यों रखा जाएगा। सभी जनजातियों का संरक्षण यथावत रखेंगे। आदिवासी समुदाय और उनकी प्रैक्टिसेज के साथ यूसीसी में छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। यूसीसी के कानूनों से ट्राइब्ल्स को छूट मिलेगी। उनकी प्रैक्टिसेज पर किसी प्रकार से यूसीसी से कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि उनकी स्वेच्छा रहेगी कि यूसीसी की प्रैक्टिस को वे अडॉप्ट करना चाहते हैं या नहीं। संविधान के आर्टिकल 371 के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। इसे लेकर यह तर्क भी रखे गए हैं कि ट्राइबल्स में प्रोग्रेसिव प्रैक्टिसेज हैं, उनकी परम्पराएं प्रगतिशील विचारों की हैं, ऐसे में उन्हें छेड़ने की जरूरत नहीं है।

50 से ज्यादा देशों ने पॉलिगैमी बैन, भारत कैसे पिछड़ा रह सकता है
भ्रांति: मुस्लिम वोट बैंक के लिए बहू-पत्नी प्रथा को जारी रखा जाएगा
हकीकत: जानकारों का तर्क है कि 50 से ज्यादा देशों ने पॉलिगैमी को बैन किया हुआ है। ऐसे में भारत कैसे पिछड़ा रह सकता है। सूत्रों का कहना है कि पॉलिगैमी या बहू-पत्नी प्रथा को पूरी तरह से यूसीसी में बैन कर दिया जाएगा। यह फिर चाहे किसी भी धर्म या प्रैक्टिस की वजह से हो, मगर इसे बैन कर दिया जाएगा। जहां तक बाल विवाह और विधवा विवाह का सवाल है तो इससे संबंधित जो कानून अभी बने हैं, वो उसी तरह चलते रहेंगे। चाइल्ड मैरिज एक्ट यथावत काम करेगा। इसे और मजबूती से लागू करने की पैरवी की जाएगी। विधवा या तलाकशुदाओं की शादी को लेकर फिलहाल जो कानून बने हुए हैं, उसी अनुसार यूसीसी में भी सभी के लिए वही कानून मान्य होंगे। विधवा या तलाकशुदा महिलाएं शादी कर सकेंगी।

यूसीसी में महिलाओं को सुदृढ़ और मजबूत बनाने पर पूरा फोकस
भ्रांति: महिलाओं की मान्यताओं के साथ छेड़छाड़ करेगा नया कानून
हकीकत: यूनिफॉर्म सिविल कोड की हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। यूसीसी में खासतौर से महिलाओं को सुदृढ़ और मजबूत बनाने की ओर ध्यान दिया जा रहा है। यूसीसी के एक्सपर्ट बताते हैं कि पहले फेज में यूसीसी मोटे तौर पर महिलाओं के सशक्तिकरण और उन्हें लेकर समानता पर फोकस्ड है। चाहे वे किसी भी समुदाय से हों। इसमें महिलाओं की धार्मिक मान्यताओं, उनके पहनावे के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। सिर्फ आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से उन्हें मजबूत करने वाले कानूनों के दायरे में उन्हें लाया जाएगा। सभी धर्म की महिलाओं को गार्जियनशिप अधिकारों की मजबूती मिलेगी। संभावना है कि फिलहाल महिलाओं को जो एक सीमा तक गार्जियनशिप का अधिकार मिलता है, उसमें उन्हें पुरुषों के साथ बराबरी का हक मिले। गार्जियनशिप के नजरिए से बहुत बड़ा कदम होगा। गार्जियनशिप, अडॉप्शन में वुमन को बराबरी के राइट मिलेंगे। इसके अलावा अभी जो अधिकार हिंदू महिलाओं को मिल रहा है, वो दूसरे धर्म के महिलाओं को भी मिलेगा। पुश्तैनी जमीन में जहां भी बराबर का हक नहीं दिया जाता है वहां बराबर का हक मिलने लगेगा।

आधी आबादी को आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से सशक्तिकरण
देश में पर्सनल लॉज को लेकर समानता लाने के लिए इसे बनाने की तैयारी है। संविधान के आर्टिकल 44 में इसका जिक्र है। इसमें भारतीय नागरिकों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात कही गई। बीजेपी के कोर इश्यूज में शामिल यूसीसी के लागू होने से देश में लैंगिक समानता कायम होगी। इस कोड के जरिए देश में सभी जाति और धर्म की महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हो सकती है। पीएम मोदी के नेतृत्व में 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद बीजेपी संवैधानिक प्रक्रिया को अपनाते हुए अनुच्छेद 370 को हटाने और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के वादे को पूरा कर चुकी है। अब उसके लिए तीन बड़े वादों में से सिर्फ यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा ही बचा है, जिसे लागू करने के लिए केंद्र गंभीरता से मंथन कर रहा है। जानकार मानते हैं कि जिस प्रकार से कई समुदायों में महिलाओं के साथ असमानता है। उस असमानता को दूर करते हुए देश की आधी आबादी को आर्थिक, सामाजिक, और शैक्षिक दृष्टि से सुदृढ़ करने के लिए यह लाया जाएगा। पर्सनल लॉज से जुड़े कायदों में एकरूपता होगी। यूसीसी किसी भी व्यक्ति को धार्मिक रूप से किसी चीज के लिए बाध्य नहीं करेगा। इसका मकसद सिर्फ महिलाओं से जुड़े कानूनों में यूनिफॉरमिटी लाना होगा। किसी की भी धार्मिक मान्यताओं के साथ छेड़छाड़ नहीं होगी।

कौन तैयार कर रहा है यूसीसी का ड्राफ्ट, क्या रहेगी इसकी प्रक्रिया
यूसीसी का ड्राफ्ट भारत का लॉ कमीशन तैयार कर रहा है। यूसीसी लागू करने के लिए लॉ कमीशन की ओर से देशभर से सुझाव मांगे गए। अब तक देश के अलग-अलग तबके और हिस्से से लाखों सुझाव लॉ कमीशन को मिले हैं। इसके बाद कमीशन इन सुझाव पर गौर करेगा। सुझावों के आधार बैठकें की जाएगी। इसमें स्टेकहोल्डर्स, धर्मगुरु, बुद्धिजीवी सहित तमाम महत्वपूर्ण श्रेणी के लोग होंगे। उनसे चर्चा की जाएगी। इसके बाद इसका ड्राफ्ट तैयार कर सरकार को भेज दिया जाएगा। सरकार फिर इसे अपने तरीके से बिल के रूप में लोकसभा, राज्यसभा में पेश कर कानून बनाएगी। यूसीसी का ड्राफ्ट विशेष तौर से लॉ कमीशन के चेयरमैन जस्टिस रितुराज अवस्थी, लॉ कमीशन के सदस्य जस्टिस केटी संकरन और प्रोफेसर आनंद पालीवाल तैयार कर रहे हैं। इनके अलावा लॉ कमीशन से जुड़े अन्य अस्थाई सदस्य और विशेषज्ञ शामिल हैं। जानकार बताते हैं कि यूसीसी क्रिमिनल लॉ, एडमिनिस्ट्रेशन लॉ, गर्वनेंस लॉ और लैंड लॉ को नहीं छेड़ेगा। फिलहाल यूसीसी में जिन चीजों को शामिल करने की बात चल रही है उनमें यूसीसी को सिर्फ पर्सनल लॉ तक ही सीमित रखा गया है।

धारा-370 और राम मंदिर के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड की ओर बढ़े कदम
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि धारा-370 और राम मंदिर के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड की ओर मोदी सरकार ने कदम बढ़ा दिए हैं। पहले दोनों अहम वादे बीजेपी पूरा कर चुकी है। ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार यूसीसी को लाना चाहती है। संविधान के भाग चार में जिस यूनिफॉर्म सिविल कोड का जिक्र किया गया है, उसे अब लागू करने के लिए बीजेपी कटिबद्ध है। इसी दिशा में भाजपा शासित कुछ राज्य सरकारों ने कदम बढ़ा दिए हैं। उत्तराखंड की पहल के बाद गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक की सरकारों ने यूनिफॉर्म सिविल कोड अपने राज्यों में लागू करने के लिए एक्सपर्ट कमेटियों का गठन करके ड्राफ्ट की तैयारियां शुरू कर दी हैं। बीजेपी के कोर इश्यूज में शामिल यूनिफॉर्म सिविल कोड के लागू होने से देश में लैंगिक समानता कायम होगी। इस कोड के जरिए देश में सभी जाति और धर्म की महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हो सकती है। पीएम मोदी के नेतृत्व में 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद बीजेपी संवैधानिक प्रक्रिया को अपनाते हुए अनुच्छेद 370 को हटाने और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के वादे को पूरा कर चुकी है। अब उसके लिए तीन बड़े वादों में से सिर्फ यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा ही बचा है, जिसे लागू करने के लिए राज्यों के साथ केंद्र भी गंभीरता से मंथन कर रहा है।

तीन तलाक पर कानून बनने के बाद यूसीसी की उम्मीद बढ़ी भारतीय जनता पार्टी काफी वर्षों से समान नागरिक संहिता को लागू करने के पक्ष में है। पहली बार 1989 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में समान नागरिक संहिता को जगह दी थी। तभी से इस पर बहस हो रही है। 2014 और 2019 के घोषणापत्र में भी बीजेपी ने इसे शामिल किया। बीजेपी ने दिल्ली में अप्रैल 2019 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में पार्टी मुख्यालय में इस संकल्प पत्र को जारी किया। ऐसे में पिछले पांच साल से देश का एक बड़ा तबका समान नागरिक संहिता को लागू करने की मांग कर रहा है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2017 में मुस्लिम समाज में एक बार में तीन तलाक बोल कर शादी को खत्म करने की परंपरा (तलाक-ए-बिद्दत) पर ऐतिहासिक फैसला देते हुए इसे असंवैधानिक बताया। इसके बाद जुलाई 2019 में संसद से तीन तलाक के दंश से छुटकारा देने के लिए मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) कानून बना। इसके जरिए तीन तलाक को अवैध मानते हुए अपराध माना गया। तीन तलाक पर संसद से कानून के बनने के बाद सियासी हल्कों से लेकर आम लोगों के बीच यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने पर बहस तेज हो गई।

भारत का कायल हुआ ‘मुस्लिम वर्ल्ड लीग’, उधर जावेद अख्तर बोले – UCC लागू करना संभव नहीं

मोदी से मिलते अल-ईसा और जावेद अख्तर (साभार: सोशल मीडिया, आजतक)
मुस्लिम वर्ल्ड लीग के महासचिव शेख डॉक्टर मोहम्मद बिन अब्दुल करीम अल-ईसा भारत दौरे पर हैं। उन्होंने बुधवार (12 जुलाई 2023) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। ईसा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और अन्य धार्मिक नेताओं से मुलाकात पर खुशी जताते हुए भारत के लोकतंत्र एवं बहुलतावाद की जमकर तारीफ की। उधर, बॉलीवुड अभिनेता जावेद अख्तर को अलग तरह का दुख है।

अल-ईसा ने संबोधित करते हुए कहा, “मैं भारतीय लोकतंत्र को तह-ए-दिल से सलाम करता हूँ। मैं भारत के संविधान को सलाम करता हूँ। मैं दुनिया को सद्भावना सिखाने वाले भारतीय दर्शन और परंपरा को भी नमन करता हूँ। भारत में जो मैंने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व देखा, वह भी अपने आप में यूनिक है।”

‘Harmony of Dialogue among Religions’ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “जब भी संवाद की कमी होती है तो दो लोगों के बीच में गलतफहमी और समस्या खड़ी होती है। इसलिए संवाद का पुल बनाना आवश्यक है। सांस्कृतिक टकराव (Clash of Civilisation) को रोकने के लिए हमें अगली पीढ़ी का बचपन से ही मार्गदर्शन करना होगा और उन्हें इससे बचाना होगा।”

आतंकवाद पर बोलते हुए उन्होंने कहा, “गलतफहमी, घृणा और गलत अवधारणाओं ने कट्टरपंथ फैलाकर आतंकवाद बढ़ाने में सहयोग दिया है। अपनी ताकत को बढ़ाने वाले बहुत से नेता हेट नैरेटिव का प्रयोग करते हैं और अपनी प्रासंगिकता एवं नियंत्रण सुनिश्चित करते हैं।” उन्होंने कहा कि कुछ ही संस्थाएँ इस तरह की गलत विचार परोसते हैं।

इससे पहले 11 जुलाई 2023 को सऊदी अरब के पूर्व न्याय मंत्री अल-ईसा ने कहा था, “भारत ने हिंदू बहुल राष्ट्र होने के बाद भी धर्मनिरपेक्ष संविधान अपनाया। विभिन्न संस्कृतियों में संवाद स्थापित करना समय की माँग है। सहनशीलता जीवन का हिस्सा है। इस्लाम प्यार और संवाद के लिए खुला है।”  

अल-ईसा ने कहा, “भारत के बारे में पाकिस्तान दुष्प्रचार किया करता है। भारत में मुस्लिम और उनके मज़हब को कोई खतरा नहीं है। मुस्लिम देश इंडोनेशिया को छोड़ दें तो भारत में विश्व की सर्वाधिक मुस्लिम आबादी रहती है। इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के 33 सदस्य देशों के बराबर मुसलमान भारत में रहते हैं।”

एक तरफ सऊदी अरब के नेता भारत की तारीफ कर रहे हैं तो दूसरी तरफ जावेद अख्तर का अपना रोना है। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता (यानी अलग-अलग धर्म के लोगों के रहने की वजह से) देखते हुए भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करना संभव नहीं है।

उन्होंने कहा, “भारत एक औसत यूरोपीय देश की तरह नहीं है जहाँ एक धर्म, एक संस्कृति और एक परंपरा है। यहाँ संस्कृतियों, उप-संस्कृतियों, रीति-रिवाजों, परंपराओं की विविधता है। यह विविधता इतनी अधिक है कि यह कल्पना करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि इसे कैसे हासिल किया जा सकता है।”

भारत में अलग-अलग रीति-रिवाजों का हवाला देते हुए अख्तर ने कहा, “दक्षिण भारतीय राज्यों में एक लड़की अपने मामा से शादी कर सकती है। उत्तर भारत में यह अकल्पनीय है। इसे अनाचार माना जाएगा। समान नागरिक संहिता के तहत इन चीजों को कैसे संतुलित किया जा सकता है?”

बात बात पर संविधान की बात करने वाले समान नागरिक संहिता पर क्यों हो जाते हैं खामोश?

 


स्वदेश कुमार, उगता भारत 

देश के बंटवारे के समय जिन दो-तीन प्रतिशत मुसलमानों ने पाकिस्तान जाने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि वे लोकतांत्रिक देश हिंदुस्तान में रहना ज्यादा पसंद करेंगे। उन्हें हिंदुस्तान की गंगा जमुनी संस्कृति से प्यार है। यह उनका मादरे वतन है। उन्हीं मुसलमानों की जब देश में आबादी बढ़ी तो उनकी सोच भी बदल गई। अब यह दबाव की राजनीति करने लगे हैं। लोकतंत्र की जगह शरीयत की बात करते हैं। अब लोकतंत्र और भारत का संविधान इनके लिए कोई मायने नहीं रखता है। सरकार को किसी भी फैसले से रोकने के लिए यह लोग देश का सांप्रदायिक माहौल खराब हो जाने की बात करने लगते हैं। सीएए, एनआरसी जैसे कानून बनाने की सरकार की मंशा के खिलाफ जगह-जगह आंदोलन करते हैं, जबकि इन कानूनों का भारत में रहने वाले किसी वर्ग या कौम से कोई संबंध नहीं होता है। यह कानून पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों में रह रहे अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के संबंध में बनाया जा रहा है। 

जो काम 1947 में आज़ादी मिलने के बाद होना था, अगर अब हो रहा है, उस पर हिन्दू-मुसलमान कर अशांति फ़ैलाने का प्रयास कर रहे हैं। इतना ही नहीं, बात बात पर संविधान की बात करने वाले CAA विरोध में हिन्दुत्व के लिए आपत्तिजनक शब्द(देखिए संलग्न चित्र) इस्तेमाल होने पर क्यों चुप रहे? सबसे ज्यादा शर्म उन हिन्दुओं को आनी चाहिए, जो हिन्दुत्व के विरुद्ध घोर आपत्तिजनक शब्द बोले जाने पर इस विरोध में शामिल रहे। काश, इसी तरह की बात इस्लाम के विरुद्ध बोल दी होती, नारेबाजों का जनाजा निकलने के साथ-साथ CAA विरोध भी ख़त्म हो गया होता। कोसते होंगे उनके पूर्वज कि हमारी संताने हिन्दुत्व विरोधियों के साथ क्यों खड़ी हैं? दूसरे, इनका संविधान प्रेम हिन्दुओं की गैर-मौजूदगी में कही जाती थी कि जब तक हिंदुस्तान इस्लामिक नहीं बन जाता हाथ में तिरंगा थामो, भारत माता की जय बोलो। संविधान की शपथ लेने वाले इनके किसी समर्थक ने विरोध नहीं किया,क्यों? देखिए अब तक लगभग 3 लाख से अधिक पाठकों पढ़ा गया लेख, जो इनके दोगलेपन को उजागर करता है:-

सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार

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सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार ऐसा लगता है मानो जैसे-जैसे समय बीत रहा है, CAA-NRC का विरोध अब शाहीन बाग़ से होते हुए अपने असल....

इसी दबाव की राजनीति के अगले चरण में समान नागरिक संहिता का भी मुस्लिम संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। इन लोगों को उन राजनीतिक दलों का भी समर्थन मिल रहा है जो इनके वोट बैंक के सहारे अपनी राजनीति चमकाते हैं। इसमें कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे दल भी शामिल हैं। इसी क्रम में सपा के दिग्गज नेता आजम खान, समाजवादी पार्टी के सांसद शफीक उर रहमान वर्क और डॉ. एसटी हसन समान नागरिक संहिता के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। यह लोग एक सुर में चिल्ला रहे हैं कि समान नागरिक संहिता कानून भाजपा का चुनावी हथकंडा है। भाजपा समाज में दूरियां बढ़ाने के लिए यह कानून लाना चाहती है लेकिन हम मुसलमान शरीयत को ही मानेंगे। इस प्रकार के कानून को स्वीकार नहीं करेंगे। सपा सांसदों ने अपने बयान में कहा कि आखिर समान नागरिक संहिता कानून लाने की जरूरत क्यों पड़ी। इसका मुख्य कारण 2024 का चुनाव है। भाजपा हिंदू मुसलमान के बीच दूरियां बढ़ाने के लिए यह सब कर रही है। 1400 से अधिक साल पहले मुसलमानों में शरीयत के अनुसार पैतृक संपत्ति में लड़कियों को उनका हक दिया जाता है।

कुराने पाक के हुक्म पर मुसलमान शरीयत के अनुसार काम करता है। इससे कोई मुसलमान समझौता नहीं करेगा। सवाल उठाया कि आखिर दूसरे लोगों को शरीयत से क्या परेशानी है। दूसरी शादी भी मजबूरी में लोग करते हैं। किसी की पत्नी बीमार हो गई या बच्चे नहीं हो रहे हैं। इस मामले में पहली पत्नी की इजाजत ली जाती है। इसमें एक संस्कार छिपा होता है। सरकार पर आरोप लगाया जा रहा है कि आजकल लिव इन रिलेशनशिप को सरकार ने मान्यता दे दी है। क्या यही हिंदुस्तानी संस्कृति है। कुरान ने जो हुक्म दिया है। उसी को मुसलमान मानेंगे। इस मामले में किसी मौलाना की भी नहीं चलेगी। इसी प्रकार वक्फ की संपत्ति का मामला है। कानून बनने पर संविधान की धारा 29 और 30 को भी देखना पड़ेगा।

बहरहाल, बंटवारे के समय लोकतंत्र की दुहाई देकर जो मुसलमान यहां रुक गए थे, उनको यह जान और समझ लेना जरूरी है कि समान नागरिक संहिता एक पंथनिरपेक्ष (सेक्युलर) कानून होता है जो सभी पंथ के लोगों के लिये समान रूप से लागू होता है। दूसरे शब्दों में, अलग-अलग पंथों के लिये अलग-अलग सिविल कानून न होना ही ‘समान नागरिक संहिता’ की मूल भावना है। समान नागरिक कानून से अभिप्राय कानूनों के वैसे समूह से है जो देश के समस्त नागरिकों (चाहे वह किसी पंथ, क्षेत्र से संबंधित हों) पर लागू होता है। यह किसी भी पंथ, जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है। इस कानून के बनने से केवल मुसलमानों को ही नहीं अन्य धर्म के लोगों को भी देश हित में कुछ समझौते करने पड़ेंगे जो बदलते समय के हिसाब से जरूरी भी है। जब अन्य धर्मों के लोग समान नागरिक संहिता पर हो हल्ला नहीं कर रहे तो मुसलमानों को भी समझना होगा कि यह देश की बात है। देश से बड़ा कोई मजहब नहीं होता। विश्व के अधिकतर देशों में ऐसे कानून हैं। समान नागरिक संहिता से संचालित पन्थनिरपेक्ष देशों की संख्या बहुत अधिक है। अमेरिका, आयरलैंड, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान, इजिप्ट जैसे कई देश हैं जिन्होंने समान नागरिक संहिता को लागू किया है।

सामाजिक एकता बढ़ाएगा समान कानून

 सुरेश हिंदुस्थानी, उगता भारत 

वर्तमान में समान नागरिक कानून की चर्चा बहुत ज्यादा है। होना भी चाहिए, क्योंकि विश्व के अधिकांश देश समान कानून की अवधारणा को स्वीकार करते हैं। आज जो देश विश्व की महाशक्ति मानने का साहस रखते हैं, उन सभी देशों में कानून के नाम पर कोई समझौता नहीं किया जाता। भारत में कानून के नाम पर जो प्रावधान हैं, उनमें कई प्रकार की खामियां देखने को मिलती हैं। जो समाज में असमानता का भाव पैदा करने वाले कहे जा सकते हैं। विसंगति यह है कि मुस्लिमों के लिए जो पर्सनल कानून बनाए हैं, वे सामाजिक उत्थान और मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने का ही एक प्रयास था, लेकिन इसका परिणाम क्या हुआ है, यह हम सभी के सामने है। मुस्लिम समाज का कुछ वर्ग देश की वास्तविकता से परिचित होना नहीं चाहता। इतना ही नहीं वह अभी तक भारत के उन संस्कारों से समरस नहीं हो सका है, जो मुगलों और अंग्रेजों से पहले से चले आ रहे हैं। भारत के मुसलमानों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि यह मुसलमान सनातन काल से भारत के ही हैं। वह अपना इतिहास खोजेंगे तो उन्हें इसके प्रमाण भी मिल जाएंगे। आज कई मुस्लिम अपने पूर्वजों द्वारा की गई गलतियों को सुधारने का प्रयास भी करने लगे हैं। वसीम रिजवी और जफर शेख ने इस पहल को गति देने का कार्य किया है। अभी मुस्लिम समाज को सुबह का भूला निरूपित किया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, लेकिन यकीनन वो शाम भी आ रही है, जिसमें सब घर लौटने की कवायद करेंगे।
समान नागरिक संहिता को लेकर कुछ संस्थाओं द्वारा यह प्रचारित करने का प्रयास किया जा रहा है कि यह कानून भारत के मुस्लिमों के विरोध में है। जबकि इस पर गंभीरता पूर्वक मंथन किया जाए तो समान नागरिकता कानून मुस्लिमों के लिए बड़ा हितकारक ही सिद्ध होगा। हम जानते हैं कि आज देश का बहुत बड़ा मुस्लिम समाज मुख्य धारा से कटा हुआ है। इसके पीछे एक मात्र कारण देश की राजनीति को माना जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद राजनीतिक दलों ने मुस्लिमों के वोट प्राप्त करने के लिए तमाम तरीके से प्रलोभन देने का काम किया, यही प्रलोभन मुस्लिम समाज के विकास में बाधक बनकर सामने दिखाई दिया। अगर सारे समाज के लिए देश में एक समान कानून बन जाएगा तो स्वाभाविक रूप से समाज में भेदभाव भी समाप्त होगा, जो अपरिहार्य भी है। इसलिए अब देश के मुस्लिम समाज को स्वयं ही समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग करना चाहिए, जो न्यायोचित कदम होगा।
वर्तमान में हम देख रहे हैं कि कुछ लोग समान नागरिक कानून का विरोध कर रहे हैं, जबकि मुस्लिम समाज की महिलाएं इस कानून के समर्थन करने के लिए आगे आ रही हैं। समान नागरिक कानून समान व्यवहार करने वाला ही साबित होगा। ऐसा किया जाना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि निजी कानूनों के चलते समाज में भेदभाव की खाई लगातार गहरी होती जा रहा है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक बार तलाक के एक प्रकरण में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया था कि समान नागरिक संहिता समय की जरूरत है। हम जानते हैं कि गोवा में समान नागरिक संहिता लागू है और इस राज्य के किसी भी वर्ग को किसी भी प्रकार की कोई समस्या नहीं है। उत्तराखंड में इसे लागू करने की प्रक्रिया चल रही है। गोआ में समान नागरिक संहिता के होने से समाज को किसी भी प्रकार की कोई समस्या नहीं है। समस्या तो केवल उन राजनीतिज्ञों को है जो समाज में विभाजन की लकीर को बड़ा करना चाहते हैं। ऐसे राजनीतिज्ञों को विचार करना चाहिए कि जो काम गोवा में किया जा सकता है, वह शेष देश में क्यों नहीं हो सकता? राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि समान नागरिक संहिता न तो किसी के विरोध में है और न ही किसी के समर्थन में है। समान नागरिक संहिता देश के हर नागरिक नागरिक को समानता का अधिकार देता है।
विश्व के कई देशों में संवैधानिक प्रावधानों के तहत किसी वर्ग को विशेष अधिकार नहीं हैं, सबको देश में एक ही कानून को मानना होता है, लेकिन भारत में राजनीतिक फायदे के लिए तुष्टिकरण का ऐसा खेल खेला गया, जो विविधता में एकता के दर्शन को तार-तार कर रहा है। निजी कानूनों के कारण कहीं कहीं विसंगति के हालात भी पैदा हो रहे हैं। सामुदायिक घटनाओं को भी राजनीतिक दृष्टि से देखा जाता है, घटना को देखने का यह नजरिया वास्तव में वर्ग भेद को बढ़ावा देने वाला है। देश का मुस्लिम भी समाज का एक हिस्सा है, जिसे इसी रूप में प्रस्तुत करने की परिपाटी चलन में आ जाए तो भेद करने वाले विचारों पर लगाम लगाई जा सकती है। लेकिन हमारे देश के कुछ राजनीतिक दलों ने मुसलमानों को ऐसे भ्रम में रखने के लिए प्रेरित किया कि वह भी ऐसा ही चिंतन करने लगा, जबकि सच्चाई यह है कि आज के मुसलमान बाहर से नहीं आए, वे भारत के ही हैं। परिस्थितियों के चलते उनके पूर्वज मुसलमान बन गए। वे सभी स्वभाव से आज भी भारतीय हैं और विचार से सनातनी हैं, लेकिन देश के राजनैतिक दल मुसलमानों के इस सनातनी भाव को प्रकट करने का अवसर नहीं दे रहे।
जहां तक निजी कानूनों का सवाल है तो यह कहीं न कहीं समाज से दूर करने का बड़ा कारण ही सिद्ध हो रहा है। इन कानूनों से अगर किसी वर्ग को लाभ मिलता तो वह आज मुस्लिम समाज प्रगति कर चुका होता, जबकि वास्तविकता यही है कि अल्पसंख्यकों के नाम पर दी जाने वाली सरकारी सुविधाएं ही उनकी प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। हम जानते हैं कि सुविधाओं के सहारे किसी भी समाज को स्वावलम्बी नहीं बनाया जा सकता। लेकिन भारत में मुस्लिम पर्सनल कानून को लेकर जहां मुस्लिम समाज के पैरोकार समाज में भ्रम की स्थिति पैदा कर समाज को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने से वंचित कर रहे हैं, वहीं देश के कुछ राजनीतिक दल भी आग में घी डालने जैसा कृत्य करते हुए दिखाई देते हैं। वास्तव में यह कदम कहीं न कहीं देश में वैमनस्यता को बढ़ावा देने का ही काम कर रहे हैं। जहां तक साम्प्रदायिक सद्भाव की बात है तो सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोगों को एक दूसरे के रीति रिवाजों को समान भाव से सम्मान देना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो सामाजिक समरसता के तमाम प्रयास महज खोखले ही साबित होंगे।

भाजपा शुरू से ही इस पक्ष में रही है कि एक देश में एक ही कानून लागू होना चाहिए। किसी को भी पर्सनल लॉ के तहत काम करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। जो राजनीतिक दल इसे भाजपा या कांग्रेस के नजरिये से देखते हैं, उन्हें एक बार फिर से इस कानून को समझने का प्रयास करना चाहिए। अगर हम यह चिंतन भारतीय भाव से करेंगे तो स्वाभाविक रूप से यही दिखाई देगा कि समान नागरिक कानून देश और समाज के विकास का महत्वपूर्ण आधार बनेगा। अगर इसे हिन्दू मुस्लिम के संकुचित भाव से देखेंगे तो खामी न होने के बाद भी खामियां दिखाई देंगी। यह मसला वास्तव में केंद्र की मौजूदा सरकार ने अपनी तरफ से शुरू नहीं किया है। यह मांग तो पिछली सरकारों के समय भी उठती रही है, इसलिए वर्तमान केंद्र सरकार को दोषी ठहराना किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं है। मौजूदा सरकार पूरे देश में हर नागरिक को समान अधिकार देने के पक्ष में है। वह पुरुष हो या महिला। हिंदू हो या मुसलमान या किसी दूसरे मजहब को मानने वाले नागरिक। ऐसा होगा तभी देश में सामाजिक समरसता की स्थापना संभव हो सकेगी।
(लेखक राजनीतिक चिंतक व विचारक हैं)