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समान नागरिक संहिता और आर्य समाज

डॉ राकेश कुमार आर्य, मुख्य संपादक, उगता भारत   

आज भारत में समान नागरिकता संहिता की बात करने को मुस्लिम कट्टरपंथी और छद्दम सेक्युलरिस्ट छाती पीट मातम कर देश का माहौल ख़राब करते रहे हैं। इन अशिक्षित से भी बत्तर और शैतान बने शिक्षितों को नहीं ज्ञान कि सनातन धर्म कितना महान और क्षीर सागर से भी अधिक गहरा है। जिसका अध्ययन और समझने के लिए असंख्य ऋषि-मुनियों ने हज़ारों वर्ष तपस्या की है, जिस कारण सनातन पर प्रहार करने वालों का विश्व में कोई नामलेवा नहीं, इतिहास साक्षी है। लेकिन अपनी तिजोरी और अय्याशी के लिए धन एकत्र करने बेगुनाह जनता को गुमराह कर उनका जीवन अंधकारमय बना रहे हैं। सनातन की थोड़ी-से गहराई में जाने पर ज्ञात होता है कि सनातन कितना व्यापक और आसमान से बहुत ऊँचा है।
जनता को-चाहे वह किसी भी जाति, समुदाय अथवा मजहब से हो- इन समाज के दुश्मनों से पूछो की मानव को जातियों में किसने बांटा? कुर्मी,अनुसूचित, शिया, सुन्नी, वहाबी, कैथोलिक और बैप्टिस्ट आदि जातियों में मानव को किसने बांटा और क्यों? ये सब किया भटकी आत्माओं ने अपनी दुकानदारी चलाने के लिए।
लेखक 
भारत में प्रत्येक राष्ट्रवासी को (नागरिक नहीं) समान अधिकार प्राप्त हों और प्रत्येक व्यक्ति अपनी मानसिक, शारीरिक और आत्मिक उन्नति कर सके, इसके लिए ऋषियों ने तप किया। स्वामी दयानंद जी महाराज भारत के आधुनिक इतिहास के ऐसे पहले महानायक हैं जिन्होंने तप को राष्ट्र का आधार बनाया। उन्होंने इस बात को गंभीरता से अनुभव किया कि बिना तप के राष्ट्र निर्माण संभव नहीं है । यही कारण था कि उन्होंने सारे देश को तपस्वियों का देश बनाने के लिए कार्य करना आरंभ किया। अपनी इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए उन्होंने गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को लागू करने के साथ-साथ वेदों की ओर लौटने का आवाहन देशवासियों से किया । वह जानते थे कि वेदों का स्वराज्य चिंतन जब तक लोगों की दृष्टि में नहीं आएगा तब तक देश तप के लिए तैयार नहीं होगा। एक प्रकार से स्वामी दयानंद जी महाराज ने भारत की आत्मिक चेतना को उस परमचेतना के साथ जोड़ दिया जिसे आप ऊर्जा का अजस्र स्रोत कह सकते हैं।
ऋषि का यह बहुत बड़ा उपकार था। उनके इतना करने मात्र से भारत अपने मूल्य को अपने आप समझ गया। जैसे ही वह परम चेतना से जुड़ा और जुड़ने के पश्चात ऊर्जा से भरा तो वह बब्बर शेर की भांति अपने शत्रु पर टूट पड़ा। उसका यह शत्रु कई क्षेत्रों में कई रूपों में खड़ा हुआ था । यदि राजनीतिक क्षेत्र में देखें तो वह विदेशी शासको के रूप में खड़ा था । सामाजिक क्षेत्र में देखें तो वह अज्ञानता और पाखंड के रूप में खड़ा था। यदि धार्मिक क्षेत्र में देखें तो वहां पर भी अज्ञानता का साम्राज्य था। इसी प्रकार आर्थिक क्षेत्र में जबरदस्त शोषण के रूप में यह शत्रु दिखाई दे रहा था।
महर्षि दयानंद जी के प्रयास से जगे हुए भारत ने अपने सामने खड़े शत्रुओं को पहचाना और उनके विनाश पर काम करने लगा।
स्वामी दयानंद जी महाराज ने जब भारत के लोगों को वेदों की ओर लौटने का आवाहन किया तो वेदों के समान दृष्टिकोण से लोगों का अपने आप परिचय हो गया। आर्य समाज एक ऐसा क्रांतिकारी संगठन है जो पहले दिन से समान नागरिक संहिता का समर्थक रहा है। इसने अपने चिंतन से, अपने लेखन से , अपने व्याख्यानों से और उपदेशों से हर स्थान पर मनुष्य मनुष्य के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव न करने का संकल्प बार-बार दोहराया है। यदि यह कहा जाए कि आर्य समाज ही वह पवित्र संस्था है जो भारत ही नहीं संपूर्ण संसार में समान नागरिक संहिता की पैरोकार है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। हम सभी जानते हैं कि ऊंच, अस्पृश्यता की खाई को पाटने और समाज से जातिवाद को मिटाने की पहल करने वाली संस्था आर्य समाज ही रही है। स्वामी दयानंद जी महाराज ने सभी देशवासियों को आर्य शब्द दिया। इस प्रकार उन्होंने सभी देशवासियों को एक नाम 'आर्य' देकर इस पवित्र शब्द को हमारी राष्ट्रीयता के साथ संलग्न किया। इससे पता चलता है कि स्वामी दयानंद जी महाराज हम देशवासियों के भीतर तो श्रेष्ठता का भाव पैदा करना चाहते ही थे, वह हमारी राष्ट्रीयता को भी सर्वोच्च श्रेष्ठता में परिवर्तित कर देना चाहते थे। यह एक ऐसा शब्द है जो मनुष्य मनुष्य के बीच में किसी भी प्रकार की दूरी नहीं रहने देता। सबको एक मुख्यधारा में समान स्तर पर और समान सम्मान के भाव से स्थापित कर देना चाहता है अर्थात आर्य शब्द हमारे लिए समान नागरिक संहिता की सबसे बड़ी गारंटी है।
ऋषियों का तप और भारतीय राष्ट्र
भारतीय राष्ट्र की मानवतावादी चिंतनधारा के पीछे ऋषियों का तप काम करता रहा है। बड़े परिश्रम और पुरुषार्थ के बाद हमारे ऋषियों ने राष्ट्र की सुव्यवस्थित योजना और स्वरूप को तैयार किया। भारत के ऋषियों के द्वारा बनाई गई यह राष्ट्र की व्यवस्था करोड़ों वर्ष तक निर्विघ्न काम करती रही। इस संबंध में अथर्ववेद ( 19: 41: 1) का यह मंत्र बड़ा प्रसिद्ध है कि :-
भद्रमिच्छन्त : ऋषय: स्वविर्द : तपोदीक्षामुपसेदुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजस्वजातं तस्मै देवा: उपसन्नु मन्तु।
“भद्रमिच्छन्त : ऋषय” विश्व के कल्याण की कामना रखने वाले और भद्र की उपासना करने वाले ऋषियों ने तप किया। हमारे ऋषियों ने भद्र के माध्यम से राष्ट्र की पवित्रता को बनाए रखने का प्रशंसनीय प्रयास किया। उनके तप से राष्ट्र को बल मिला, तेज मिला। बल और तेज के सम्मिश्रण से जो अग्नि पैदा होती है वह राष्ट्र को तेजस्विता से ओतप्रोत करती है। उपरोक्त मंत्र का भावार्थ है कि उनके परिश्रम पूर्ण त्याग, तपस्या और राष्ट्र की ऊंची साधना के फलस्वरूप जिस प्रकार के राष्ट्र ने आकार लिया उसे देखकर देवता भी आकर इस राष्ट्र को नमस्कार करते हैं। लोक कल्याण की उच्चतम साधना में रत रहे भारत के ऋषियों के इस प्रकार के परिश्रम के पश्चात जो राष्ट्र बना उसे लोगों ने देव निर्मित देश अर्थात ऋषियों के द्वारा निर्मित किया गया देश कहा। देव निर्मित देश कहने से एक और भी बड़ी शंका का या कहिए कि इतिहास के एक महाझूठ का निराकरण अपने आप हो जाता है कि हम सब ऋषियों के त्याग तपस्या के फलों को भोगने वाले सौभाग्यशाली जन हैं । हमने कभी लोगों को ना तो उत्पीड़ित किया और ना किसी ऐसे कबीलाई संघर्ष में अपने देश को कभी फंसाया, जिसमें लोगों को अपने अधीन कर अर्थात अपना गुलाम बनाकर उन पर अपना अमानवीय शासन थोपने की प्रवृत्ति संसार के अन्य देशों में देखी जाती है। हमने पूर्ण व्यवस्थित योजना के साथ आगे बढ़ना आरंभ किया और सबको सबके अधिकारों का उपयोग करने का सुंदर परिवेश उपलब्ध कराया। हमने किसी के अधिकारों का शोषण नहीं किया बल्कि अपनी ओर से अधिकार देने की या दूसरों के अधिकारों का संरक्षण करने की मानवोचित प्रवृत्ति को अपना कर मानवता का हित संरक्षण किया। अपनी इसी सोच और पवित्र भावना के कारण भारत प्राचीन काल से ही समान नागरिक संहिता का समर्थक ही नहीं बल्कि संस्थापक देश रहा है। जो लोग दूसरों के अधिकारों का संरक्षण करने की प्रवृत्ति वाले होते हैं वही देव होते हैं । भारत देव निर्मित देश इसीलिए है कि यहां के ऐसे ही देव भावना वाले लोगों ने या ऋषि पूर्वजों ने इस राष्ट्र का निर्माण किया है।
भारतीय राष्ट्र का निर्माण और हमारे ऋषि पूर्वज
इस देव निर्मित देश में हम करोड़ों वर्ष से निवास करते चले आए हैं। भारत राष्ट्र का निर्माण ऋषियों के द्वारा हुआ है। उनके तप से दीक्षित राष्ट्र प्राचीन काल से ही शांति और व्यवस्था का समर्थक रहा है । इस राष्ट्र ने धर्म के साये में आंखें खोली हैं। धर्म से ऊर्जा प्राप्त कर भारतीय राष्ट्र ने ऐसे धर्म-राज्य की स्थापना की जो नीति अर्थात निश्चित व्यवस्था पर आधारित था। इसी निश्चित व्यवस्था को दूसरे संदर्भ में आप धर्म का सकते हैं तो निश्चित व्यवस्था का समर्थक होने के कारण राष्ट्र के रूप में भी इसका उपयोग हो सकता है। हमारी दृष्टि में राष्ट्र ऐसे लोगों से बनता है जिनका चिंतन धर्म की भट्टी में तपा हो और जो स्वाभाविक रूप से एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर आगे बढ़ने वाले हों। जो शोषण, उत्पीड़न, छोटे-बड़े , ऊंचनीच के भाव से मुक्त हों और जो सबको एक साथ, एक दिशा में लेकर चलने की पवित्र भावना से भरे हों।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि वही व्यक्ति राष्ट्र निर्माता की श्रेणी में आता है जो अपने देशवासियों के प्रति सहानुभूति का भाव रखता हो, जो अपने इतिहास नायकों से प्रेम करता हो, अपने देश की संस्कृति और धर्म के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखता हो और देश पर मर मिटने की भावना से ओतप्रोत हो। मानवता के हत्यारे लोग जिन्होंने तुर्क, मुगल या अंग्रेजों के रूप में हमारे देश पर जबरन शासन किया, कभी भी राष्ट्र निर्माता नहीं हो सकते थे। उनके आचरण ,कार्य शैली और व्यवहार को देखकर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ऐसे लोग तो राष्ट्र के हत्यारे होते हैं। ऐसे हत्यारे लोगों का अनुकरण करने वाले लोग भी राष्ट्र निर्माता नहीं हो सकते। यह आर्य समाज ही था जिसने सबसे पहले इस बात को लोगों को समझाया कि राष्ट्र के हत्यारों को हत्यारा कहो और राष्ट्र निर्माताओं को राष्ट्र निर्माता कहो। आज भी आर्यसमाज इसी विचारधारा में विश्वास रखता है। यही कारण है कि वह किसी भी प्रकार के तुष्टिकरण या छद्मवाद का समर्थक नहीं है।
जिन लोगों की मानसिकता में दोष था या दोष है वह कभी भी 'सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया…. ' की पवित्र भावना के उपासक नहीं हो सकते। राष्ट्र की अवधारणा उनके मानस में खंडित रूप में प्रवाहित होती है और राष्ट्र कभी भी खंडित रूप में साकार रूप नहीं ले सकता।
हमने अपनी ऋषि परंपरा को सम्मान देने और उसे जीवित रखने की भावना से प्रेरित होकर देश में गोत्र परंपरा को अपने अपने महान ऋषियों के नाम से प्रचलित किया। भारतवर्ष की सभी कुल, वंश ,परंपराएं ऋषि गोत्रों के आधार पर चल रही हैं। गोत्र परंपराओं को जीवित रखकर हम अपने महान पूर्वजों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यह अलग बात है कि हम अपनी वंश, गोत्र परंपरा के पीछे खड़े ऋषियों के चिंतन को भूल गए हैं।
वेद व्यक्ति की स्वतंत्रता का उद्घोषक
आज पश्चिमी जगत के अनेक विद्वान इस बात पर बल देते हैं कि संसार को व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाने वाला पश्चिमी जगत है, पर सच यह नहीं है। पश्चिमी जगत का इतिहास उठाकर देखिए , वहां पर लाखों करोड़ों लोगों को मार-मारकर समाप्त किया गया । इसके पीछे व्यक्ति के अधिकारों को छीनने की मनुष्य की अमानवीय भावना ही काम कर रही थी। जबकि भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ जब किसी एक वर्ग ने दूसरे वर्ग के ऊपर हमला कर उसके लाखों निरपराध लोगों को मौत के घाट उतार दिया हो।
वेद को व्यक्ति की स्वतन्त्रता का उद्घोषक कहा जा सकता है। वैदिक काल में राष्ट्रचिन्तक ऋषियों ने वास्तविक प्रजातन्त्र की अवधारणा का सूत्रपात करते हुए पंचायती राज्य व्यवस्था का शुभारम्भ किया था।
ऋ. 10/62/11 में कहा गया है:-
सहस्रदा ग्रामणीर्मा रिषन्मनुः सूर्येणास्य यतमानैतु दक्षिणा।
यहाँ ऋषि ग्राम प्रधान (ग्रामणी) के प्रजा के प्रति कल्याण भावना से ओत- प्रोत होने की बात कह रहा है। ऋषि का कहना है कि ग्राम प्रधान प्रभूत धन देने वाला सहस्रदा मनु है। उसकी दक्षिणा सूर्य से प्रतिद्वन्द्विता करे। कहने का अभिप्राय ये है कि जिस प्रकार सूर्य सभी लोगों पर बिना किसी भेदभाव के अपनी किरणों को बिखेरता है, उसी प्रकार ग्रामणी प्रत्येक व्यक्ति और ग्रामवासी के प्रति स्नेहासिक्त हो तथा उसके हृदय में किसी के प्रति भी द्वेषभाव ना हो। जैसे सूर्य की किरणें सबके लिए जीवन प्रद हैं, उसी प्रकार ग्राम प्रधान सबके लिए जीवन प्रद हो ।
ग्राम प्रधान से लेकर राष्ट्र प्रधान तक लोक कल्याण की इसी पवित्र भावना में वसुधैव कुटुंबकम , कृण्वंतो विश्वमार्यम् और सर्वे भवंतू सुखिन: …. का उदात्त भाव छुपा हुआ है जो प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकार तो प्रदान करता ही है राज्य को उसके मौलिक अधिकारों का संरक्षक भी बनाता है। नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करने की प्रक्रिया ईसाइयत और इस्लाम की देन है।
शायद किसी भी ग्रामणी या ग्राम प्रधान के रहते हुए जैसे गांव में कोई भी नागरिक नंगा भूखा नहीं रह सकता , वैसे ही देश के राष्ट्रपति के रहते हुए कोई भी देशवासी नंगा भूखा नहीं रह सकता। इस प्रकार की न्यायिक व्यवस्था करते राजा या राष्ट्रपति को हर स्थिति में व्यक्तियों के बीच पूर्ण न्याय करना चाहिए। उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए उनमें पारस्परिक बंधुता की भावना को सुनिश्चित करना राजा का दायित्व होता है। राजा या शासक वर्ग वोटों की राजनीति करते हुए आरक्षण, रेवड़ी बांटने या तुष्टीकरण के माध्यम से विभेद उत्पन्न करता है या विभेदकारी नीतियां अपनाता है तो ऐसा राजा या शासन व्यवस्था उत्तम नहीं होती। देश के शासक वर्ग को चाहिए कि देश में समरूपता स्थापित करने के लिए एक प्रकार के कानून, एक प्रकार की विधि व्यवस्था, एक प्रकार के रीति रिवाज ,विवाह आदि संस्कारों के एक प्रकार के नियम लागू हों। जिससे देश में समरूपता स्थापित होकर राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूती प्रदान हो।
शासन की नीतियों का आधार विभिन्नताओं को पोषित करना नहीं है,अपितु राष्ट्रहित में विभिन्नताओं को समेकित करना है।
नेहरु और समान नागरिक संहिता
नेहरू समान नागरिक संहिता को लागू करने के पक्षधर होकर भी विभिन्नताओं को पोषित करने वाले प्रधानमंत्री थे।
शासन के उपरोक्त उदात्त भाव ( जिसे हमारे यहां राष्ट्रधर्म कहा जाता है) से प्रेरित होकर हमारे संविधान में समान नागरिक संहिता की पवित्र भावना का समावेश करने का प्रयास इसलिए किया गया कि संविधान सभा के अनेक सदस्य इस बात पर सहमत थे कि पिछली कई शताब्दियों में भारतीय राज्य व्यवस्था में होती रही उथल-पुथल के चलते तुर्क , मुगल और ब्रिटिश शासकों ने लोगों के बीच विभेदकारी नीतियां अपनाई । जिससे तुष्टीकरण, फूट डालो और राज करो की देशघाती परंपरा देश की शासन व्यवस्था में आरम्भ हो गई। संविधान सभा के अनेक सदस्य इस बात से सहमत थे कि स्वतंत्र भारत में शासन की इस प्रकार की विभेदकारी नीतियों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू तो 1930 से समान नागरिक संहिता की बात कर रहे थे। इस सबके उपरांत भी नेहरू एक ऐसे नेता थे जो समान नागरिक संहिता का अपना ही अर्थ निकाल रहे थे। वे नहीं चाहते थे कि देश में समान नागरिक संहिता सही संदर्भ और सही अर्थों में लागू हो जाए। राजनीति में दक्षिणा के संस्कार को नेहरू ने कभी स्वीकार नहीं किया। उन्हें इस प्रकार का संस्कार या दक्षिणा देने का विचार सांप्रदायिक दिखाई देता था। जिसे वह हिंदू मानसिकता से पूर्वाग्रहग्रस्त मानते थे। नेहरू का झुकाव इस्लाम की ओर था। अतः उनके बारे में कहा जा सकता है कि वह स्वयं सांप्रदायिक थे। क्योंकि हर वह व्यक्ति सांप्रदायिक होता है जो सांप्रदायिक आधार पर लोगों में तुष्टीकरण जैसी बीमारी के आधार पर विभेद पैदा करता है। नेहरू की इस प्रकार की नीति ने समान नागरिक संहिता की भावना को चोटिल किया।
वेद ने ग्राम प्रधान को नरपति की संज्ञा दी थी।
ऋ. 10/107/5 में कहा गया है:-
“तमेवमन्ये नृपतिं जनानां यः प्रथमो दक्षिणा मा विवाय।”
अर्थात् “जिसने पहले दक्षिणा आरम्भ की उसे ही मैं लोगों का नरपति मानता हूँ।”
नेहरू भारतीय शासन व्यवस्था के इस सूत्र वाक्य के निकट तक भी नहीं थे। वह नहीं जानते थे कि दक्षिणा का अभिप्राय राष्ट्र की उन्नति के प्रति मन से समर्पित हो जाना है। उन्होंने मंदिरों में होने वाली दक्षिणा के बारे में सुना था। वेद की आत्मिक और मानसिक दक्षिणा के विषय में उन्हें कोई बोध नहीं था। इस्लाम की या ईसाइयत की मान्यताओं को उन्होंने व्यक्ति की व्यक्तिगत पवित्रता के साथ जोड़कर देखा। बस, यही कारण था कि वे समान नागरिक संहिता की संवैधानिक वचनबद्धता के प्रति अपनी ईमानदारी प्रकट नहीं कर पाए। समय आने पर उन्होंने इस्लामिक तुष्टीकरण के सामने समान नागरिक संहिता को बौना करके देखा।
यदि कोई प्रधानमंत्री आर्य समाज की विचारधारा से प्रेरित होकर काम करता तो वह वैदिक चिन्तन से अभिभूत होकर राष्ट्र को वास्तविक समान नागरिक संहिता का बोध कराता। हमारे देश का यह दुर्भाग्य ही रहा कि देश को पहला प्रधानमंत्री ऐसा व्यक्ति मिला जो भारतीय संस्कृति से तो दूरी बनाकर रहता ही था, उसे आर्य समाज नाम की पवित्र संस्था से तो बहुत ही अधिक द्वेष भाव था।

आर्य समाज अशोक विहार :राष्ट्र धर्म और संस्कृति का चिंतन : राष्ट्र जागरण में रहा है आर्य समाज का विशेष योगदान : विधायक राजेश गुप्ता

नई दिल्ली। यहां स्थित आर्य समाज अशोक विहार की ओर से आयोजित किए गए चार दिवसीय चारों वेदों के यज्ञ में विभिन्न विद्वानों के माध्यम से राष्ट्र धर्म और संस्कृति पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया गया । स्थानीय विधायक श्री राजेश गुप्ता ने इस अवसर पर कहा कि आर्य समाज का राष्ट्र जागरण में विशेष योगदान रहा है । इस संस्था ने अनेक क्रांतिकारी पैदा किये जिन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित कर राष्ट्र को आजाद करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

यज्ञ के ब्रह्म रहे राजू वैज्ञानिक ने निरंतर प्रत्येक सत्र में उपस्थित धर्म प्रेमी राष्ट्र प्रेमी सज्जनों का मार्गदर्शन करते हुए राष्ट्र और धर्म के प्रति गहन चिंतन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वेद का आदर्श और उत्कृष्ट चिंतन राष्ट्र और धर्म को अन्योन्याश्रित संबंध के साथ समन्वित करता है। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति राष्ट्र और धर्म दोनों को समान रूप से लेकर चलती है । इसलिए भारत जैसे देश के लिए धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत पूर्णतया अमान्य है । उन्होंने कहा कि धर्महीन व्यक्ति कर्तव्य हीन होता है और जो कर्तव्य हीन हो जाता है उसका जीवन निरर्थक और दूसरों पर बोझ बन जाता है।आज की अधिकांश समस्याओं का कारण यही है कि व्यक्ति को धर्म का वास्तविक स्वरूप नहीं समझाया जा रहा है। 

श्री वैज्ञानिक ने कहा कि वेद धर्म की व्यवस्था कर संपूर्ण सृष्टि को व्यवस्था के अंतर्गत लाने का श्रेष्ठ मार्ग बताता है। यदि आज हम धर्म की व्यवस्था के अंतर्गत अपने आप को लाकर स्थापित कर लें तो विश्व शांति बड़ी शीघ्रता से स्थापित हो सकती है।

इस अवसर पर भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता और सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ राकेश कुमार आर्य ने कहा कि भारत के इतिहास का विलुप्तिकरण करने वाले पापी इतिहासकारों ने भारत के वीर वीरांगनाओं के साथ घोर अन्याय किया है। उन्होंने कहा कि निरर्थक रूप से ऐसे इतिहासकारों ने कबीर दास जी के देहांत के बारे में भी यह भ्रांति फैली दी कि जब वह मृतक हुए तो उनके मृत शरीर के फूल बन गए थे । जबकि इस सत्य को छिपा लिया गया कि उस समय रीवा के राजा वीर सिंह बाघेला और उनके सेनापति ढमेलचंद व उनके साथी कीर्तिमल और भीमपाल ने अपने अनेक बलिदान देकर उनके मृत शरीर का अंतिम संस्कार वैदिक विधि विधान से किया था।

डॉ आर्य ने कहा कि हमारे अनेक वीर वीरांगनाओं ने विभिन्न कालों में चोटी और जनेऊ की रक्षा के लिए ऐसे अनेक बलिदान दिए जिनसे धर्म संस्कृति की रक्षा हो पाना संभव हुआ। आज भी राष्ट्र को बचाने का काम वही लोग कर रहे हैं जो राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने को तत्पर है। डॉ आर्य ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की तभी रक्षा हो पाती है जब वहां के निवासी अपने मौलिक राष्ट्र चिंतन के प्रति समर्पित होकर काम करते हैं । अतः भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए वेद का राष्ट्र चिंतन और धर्म चिंतन आवश्यक है। जिसे प्राचीन काल से मंदिर ही देते आए हैं। आज भी ऋषि दयानंद जी की 200 वीं जयंती के अवसर पर आर्य समाज मंदिरों से ही राष्ट्र धर्म और संस्कृति का चिंतन निकल रहा है।

इस अवसर पर सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय वैदिक विद्वान डॉ महेश विद्यालंकार ने अपना मार्गदर्शन देते हुए कहा कि भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए वेद का आदर्श राष्ट्रवाद और धर्म चिंतन अपनाना समय की आवश्यकता है । इसी प्रकार बहन संगीता आर्या ,वसुधा आर्या ,कविता आर्या के द्वारा भजनोपदेशन के माध्यम से विभिन्न विषयों को बड़ी गंभीरता, सरलता और सुरीले भजनों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। अंतिम सत्र की अध्यक्षता डॉ राकेश कुमार आर्य द्वारा की गई और कार्यक्रम का सफल संचालन यहां के पूर्व प्रधान रहे श्री प्रेम सचदेवा जी द्वारा किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में आर्य समाज के प्रधान श्री राकेश खुल्लड़ , श्रीमती आशा भटनागर,  मंत्री श्री जीवनलाल आर्य, विजय अरोड़ा, कोषाध्यक्ष सुधीर सक्सेना, विजय जिंदल, किरण आनंद उप प्रधान विक्रांत चौधरी, किशोर आर्य आदि का विशेष योगदान रहा।

महिला द्वारा आभूषण धारण करना हिन्दू संस्कृति पूर्णतः विज्ञान से जुड़ी है

आज पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण हम युगों प्राचीन सनातनी रीति-रिवाज को नज़रअंदाज करने के आदी हो गए हैं, जिस कारण संस्कारों की बात करने वालों को रूढ़िवादी अथवा सठियाया बता झूठलाने का प्रयत्न करते हैं। हर नारी को स्वर्ण का मोह होता है, जिसे झूठलाया नहीं जा सकता। हिन्दू वेद, पुराण, उपनिषद एवं भारतीय संस्कृति इस बात की साक्षी है कि नारी द्वारा अपने अंगों पर धारण किए आभूषण का अपना महत्व होता है।
स्वर्ण आभूषण धारण कर नारी सुन्दर ही नहीं, अपितु देवी का स्वरुप मानी जाती है। यही कारण है कि जब घर में बहु का पदापर्ण होने पर कहते हैं, घर में लक्ष्मी आयी है। इसी कारण जिस परिवार में नारी का अनादर किया जाता है, उस परिवार में देवी माता का प्रकोप बना रहता है।
बहुत सी ऐसी चीजें है जो हम सदियों से करते चले आ रहे हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हाथ जोड़ कर नमस्कार करना, बड़ों के पैर छूना, मंदिर की घंटी बजाना, आदि हम सिर्फ संस्कृति के हिसाब से ही नहीं करते, बल्कि इनके पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं। तो आइये जानें इन रीति-रिवाजों से जुड़े कुछ ऐसे वैज्ञानिक कारण जो आपको हैरान कर देंगे।

1. हाथ जोड़कर प्रणाम करना
हिन्दू संस्कृति में लोग, अपने हाथ जोड़ कर लोगों का अभिवादन करते हैं जिसे हम नमस्कार कहते हैं। इसका मतलब लोगों को सम्मान देना है। इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण है, जब हम नमस्कार करते हैं तो हमारे हाथों की हथेलियां आपस में जुड़ती हैं जिससे अंगुलियों के माध्यम से एक प्रेशर पैदा होता है, जो हमारी याददाश्त को मजबूत बनाने में सहायक होता है।
2. महिलाओ का पैर में बिछुआ पहनना
पैरों में बिछुआ पहनना शादीशुदा महिलाओं का आइडेंटिफिकेशन ही नहीं है बल्कि इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी है। पैर की दूसरी अंगुली नर्व के माध्यम से यूटरस औऱ दिल से जुड़ी होती है। बिछुआ पहनने से प्रेशर के द्वारा यूटरस मजबूत बनता है और Periods के दौरान होने वाले ब्लड सर्कुलेशन को सही तरीके से चलाने में मददगार होता है। चांदी एक अच्छा कंडक्टर है इसलिये चांदी की अंगूठी पहनना ज़्यादा फायदेमंद साबित होता है।
3. नदी में सिक्के फ़ेंकना
साधारण रूप से नदी में सिक्के फ़ेंकने को गुडलक माना जाता है, लेकिन इसके पीछे एक वैज्ञानिक सच छिपा है। वर्तमान समय में जिस तरह से स्टील के सिक्के बनते हैं। प्राचीन काल में कॉपर के सिक्के बना करते थे। कॉपर हमारे शरीर के लिए बेहद आवश्यक धातु है जो पानी में घुल कर हमारे शरीर में प्रवेश करता है।
4. माथे पर बिंदी लगाना
माथे पर दो भौंहों के बीच एक नर्व प्वाइंट होता है जिसे आज्ञा चक्र कहा जाता है। यह प्वाइंट हमारी एकाग्रता को नियंत्रित करता है। इस प्वाइंट पर बिंदी लगाने से एकाग्रता शक्ति संतुलित होती है।
5. मंदिर में घंटी बजाना
शास्त्रों के अनुसार मंदिर में प्रवेश करने से पहले घंटी बजाने से सभी बुरी शक्तियां दूर होती हैं. लेकिन इसका वैज्ञानिक कारण है कि हमें पूजा करने में एकाग्रता मिलती है. और इसकी आवाज से हमारे शरीर के हीलिंग सेंटर एक्टीवेट होते हैं।
6. भोजन के बाद मीठा खाना
हमारे पूर्वज खाने के बाद मीठा खाते थे. इसके पीछे भी एक वैज्ञानिक राज़ है। इससे हमारे पाचक रस और एसिड, एक्टिवेट होकर हमारा डाइजेशन अच्छी तरह से चलाते हैं।
7. हाथ-पैर मे मेंहदी लगाना
मेंहदी एक औषधीय हर्ब है जिसे लगाने से हमारा शरीर ठंडा रहता है और शादी के समय इसे लगाने से वर-वधु तनाव-मुक्त रहते हैं।
8. खाना खाते समय पैर समेटकर बैठना
जब हम दोनों पैरों को समेटकर बैठते हैं तो इसे योगासन की भाषा में सुखासन कहा जाता है, इस अवस्था में बैठकर खाने से शांती मिलती है जो हमारे डाइजेशन के लिए मददगार होती है।
9. सोते वक़्त उत्तर दिशा की तरफ़ सर न करना
इसके पीछे यह मान्यता है कि उत्तर की ओर मरे हुए लोगों को लिटाया जाता है। लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि पृथ्वी में बहुत बड़ा मैग्नेटिक फील्ड है। मानव में भी एक मैग्नेटिक फील्ड होता है. अगर हम उत्तर की तरफ़ सोयेंगे तो हमारा शरीर और पृथ्वी एक दूसरे के अट्रैक्शन सेन्टर में होंगे। जिससे ब्लड प्रेशर और हेडेक होने की संभावना अधिक होती है।
10. कान में छेद करना
पश्चिम देशों में इसे फैशन के तौर पर देखा जाता है, लेकिन भारतीय संस्कृति में इसकी महत्वपूर्ण उपयोगिता है, भारतीय फिजीशियन और फिलॉसफर्स के अनुसार ऐसा करने से मनुष्य की सोचने व समझने की क्षमता का विकास होता है।
11. सूर्य नमस्कार करना
हिंदू परम्परा के अनुसार तड़के सूर्य को जल चढ़ा कर उसकी पूजा की जाती है. इसके पीछे यह वैज्ञानिक कारण हैं कि सूर्य को जल देते समय सूर्य की किरणें जल से हो कर हमारी आंखो पर पड़ती हैं, जिससे हमारी आंखें स्वस्थ होती है।
12. सर पर चोटी रखना
हिंदू धर्म में लोग अपने सर के बीच में चोटी रखते हैं। आयुर्वेदाचार्यों ने कहा है कि “हमारे सर के बीच में सेंसटिव स्पॉट होता है जो नर्व का मिडिल सेंटर है और चोटी रखने से वह सुरक्षित रहता है”।
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13. व्रत रखना
भारत में व्रत को आस्था से जोड़ कर देखा जाता है लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि मानव शरीर में होने वाले अधिकांश रोगों का मुख्य कारण डाइजेस्टिव सिस्टम में टॉक्सिक मटेरियल का जमा होना होता है। इस प्रकार व्रत रखने से हमारे डाइजेस्टिव ऑर्गन को आराम मिलता है और टॉक्सिक मटेरियल की मात्रा भी कम होती है जिससे हमारा शरीर स्वस्थ होता है।
14. चरण स्पर्श करना
हिंदू धर्म में इसे आस्था और संस्कार के रूप में देखा जाता है लेकिन जनाब इसके पीछे भी एक वैज्ञानिक कारण है, पैर छूने से दो शरीरों के बीच पैर व हाथ के माध्यम से एक सर्किट बनता है जिससे शरीर में कॉस्मिक एनर्जी का आदान-प्रदान होता है।
15. सिंदूर लगाना
भारत में सिंदूर लगाना शादीशुदा महिलाओं की पहचान है, इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि सिंदूर को बनाने में मर्करी का प्रयोग होता है जिसे मांग में लगाने से ब्लड प्रेशर नियंत्रित हो कर हमारे सेक्सुअल ड्राइव को एक्टिवेट रखता है। विवाहित नारी द्वारा मांग में सिन्दूर धारण करना उसके सुहागन होना ही नहीं दर्शाता बल्कि सिन्दूर का भी अलग ही महत्व है। लेकिन आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में नारी सिन्दूर मात्र विवाहित मान मांग कहीं सिन्दूर कहीं लगा कर सिन्दूर का अपमान कर रही है। वैसे मांग निकालने का चलन भी एक सीमा तक समाप्त सा हो गया है। अधिकतर नारियां नहीं निकालती। अगर निकाल भी रही हैं, तो इधर-उधर, जबकि मांग सिर के मध्य में होने पर नारी की सुंदरता में चार चाँद लगा देती हैं।
16. पीपल के पेड़ की पूजा करना
हिंदू धर्म में पीपल को भगवान मान कर इसकी पूजा की जाती है। इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण देंखे तो पीपल का पेड़ अन्य वृक्षों के मुकाबले सबसे अधिक ऑक्सीजन देता है जो हमारे जीवन के लिए अति आवश्यक है।
17. तुलसी के पेड़ की पूजा करना
हिंदू धर्म में तुलसी को मां कहा जाता है, इसमें वैज्ञानिक कारण हैं कि तुलसी एक महत्वपूर्ण मेडिसिनल प्लांट है। यह हमारे इम्यून सिस्टम, कोलेस्ट्राल, आदि को नियंत्रित करने के साथ कीड़े-मकौड़ों को भी दूर भगाता है।
18. मूर्ति पूजा करना
अन्य धर्मों की अपेक्षा हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा सबसे अधिक होती है। ऐसा माना जाता है कि मूर्ति पूजा करने से हमारा ध्यान भटकता नहीं है लेकिन वैज्ञानिक कारण देंखे तो ऐसा करने से हमारी स्पिरिचुअल एनर्जी बढ़ती है और एकाग्रता शक्ति का भी विकास होता है।
19. हाथों में चूड़ियां पहनना
चूड़ियां पहनने से ब्लड सर्कुलेशन नियंत्रित होता है और शरीर से निकलने वाली उर्जा भी बचती है।
20. मंदिर जाना
मंदिर तो हम सभी जाते हैं लेकिन आपने कभी ये सोचा है कि इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी है। जी हां मंदिर की बनावट कुछ इस तरह कि होती है कि पृथ्वी के उत्तर व दक्षिण पोल के द्वारा अधिक मात्रा में पॉजिटिव ऊर्जा का निर्माण होता है जो मनुष्य के लिए बेहद लाभदायक होता है।
21. नाभि से नीचे स्वर्ण धारण करना निषेध
नारी अपने समस्त शरीर को स्वर्ण आभूषणों से ढक सकती हैं, लेकिन नाभि से नीचे नहीं। जिसका गूढ़ रहस्य हमारे वेद, पुराण, उपनिषद एवं अन्य पुराणों में विस्तार से वर्णित है। और जो महिला नाभि से नीचे किसी भी रूप में अथवा आकृति(कमरबंध, पायल अथवा बिछुआ) को धारण करती है, वह प्रत्यक्ष रूप से जग के पालनहार विष्णु और उनकी धर्मपत्नी माता लक्ष्मी का अपमान करते स्वयं की अग्नि में जलती रहती है। इसी लिए इन तीनों आकृतियों को केवल चांदी में ही पहनने का विधान है। किसी भी वेद अथवा पुराण में नाभि से नीचे स्वर्ण धारण करना नहीं बताया है, उसका कारण यह है कि स्वर्ण तेज(गर्मी) प्रदान करता है, जबकि चांदी ठंठाई(शरीर के तापमान को नियंत्रित) देने के ही कारण महिलाएं तगड़ी(कमरबंध) से लेकर पायल, और बिछुए चांदी के ही प्रयोग करती हैं।
गायत्री शिखा बंधन क्या है?

शिखाबन्धन (वन्दन) आचमन के पश्चात् शिखा को जल से गीला करके उसमें ऐसी गाँठ लगानी चाहिये, जो सिरा नीचे से खुल जाए।
इसे आधी गाँठ कहते हैं। गाँठ लगाते समय गायत्री मन्त्र का उच्चारण करते जाना चाहिये ।
शिखा, मस्तिष्क के केन्द्र बिन्दु पर स्थापित है। जैसे रेडियो के ध्वनि विस्तारक केन्द्रों में ऊँचे खम्भे लगे होते हैं और वहाँ से ब्राडकास्ट की तरंगें चारों ओर फेंकी जाती हैं, उसी प्रकार हमारे मस्तिष्क का विद्युत् भण्डार शिखा स्थान पर है, उस केन्द्र में से हमारे विचार, संकल्प और शक्ति परमाणु हर घड़ी बाहर निकल-निकलकर आकाश में दौड़ते रहते हैं।
इस प्रवाह से शक्ति का अनावश्यक व्यय होता है और अपना कोष घटता है। इसका प्रतिरोध करने के लिये शिखा में गाँठ लगा देते हैं। सदा गाँठ लगाये रहने से अपनी मानसिक शक्तियों का बहुत-सा अपव्यय बच जाता है।
सन्ध्या करते समय विशेष रूप से गाँठ लगाने का प्रयोजन यह है कि रात्रि को सोते समय यह गाँठ प्रायः शिथिल हो जाती है या खुल जाती है। फिर स्नान करते समय केश-शुद्धि के लिये शिखा को खोलना पड़ता है। सन्ध्या करते समय अनेक सूक्ष्म तत्त्व आकर्षित होकर अपने अन्दर स्थिर होते हैं, वे सब मस्तिष्क केन्द्र से निकलकर बाहर न उड़ जाए इसलिये शिखा में गाँठ लगा दी जाती है।
इसमें गाँठ लगा देने से भीतर भरी हुई वायु बाहर नहीं निकल पाती। गाँठ लगी हुई शिखा से भी यही प्रयोजन पूरा होता है। वह बाहर के विचार और शक्ति समूह को ग्रहण करती है । भीतर के तत्त्वों का अनावश्यक व्यय नहीं होने देती ।
आचमन से पूर्व शिखा बन्धन इसलिये नहीं होता, क्योंकि उस समय त्रिविध शक्ति का आकर्षण जहाँ जल द्वारा होता है, वह मस्तिष्क के मध्य केन्द्र द्वारा भी होता है। इस प्रकार शिखा खुली रहने से दुहरा लाभ होता है । तत्पश्चात् उसे बाँध दिया जाता है।
हिदीं में पत्नी के 47नाम देखिये
पत्नी | अर्धांगिनी | लुगाई | बीवी | धर्मपत्नी | घरवाली | संगिनी | औरत | कलत्र | कांता | गृहस्वामिनी | गृहिणी | जनाना | जाया | जोरू | दारा | नारी | परिणीता | भार्या | वधू | वल्लभा | वामा | वामांगना | वामांगिनी | सजनी | सहचरी | सहधर्मिणी | स्त्री | गेहिनी | अंकशायिनी | गृहलक्ष्मी | प्राणप्रिया | जीवनसंगिनी | तिय | तिरिया | दयिरा | दुलहन | दुलहिन | प्राणवल्लभा | प्राणेश्वरी | प्रिया | प्रियतमा | बन्नी | वनिता | बेगम | हृदयेश्वरी | श्रीमती | सहगामिनी |
और अंग्रेजी में सिर्फ एक Wife

भारतीय संस्कृति में नारी का महत्व

आज पश्चिमी सभ्यता के कारण भारतीय अपनी ही संस्कृति को भूल रहे हैं। जबकि विदेशी हमारी भारतीय संस्कृति की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हैं।
मैंने एक दिन अपनी पत्नी से पूछा - क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता कि मैं बार-बार तुमको कुछ भी बोल देता हूँ, और डाँटता भी रहता हूँ, फिर भी तुम पति भक्ति में ही लगी रहती हो, जबकि मैं कभी पत्नी भक्त बनने का प्रयास नहीं करता?

मैं भारतीय संस्कृति के तहत वेद का विद्यार्थी रहा हूँ और मेरी पत्नी विज्ञान की, परन्तु उसकी आध्यात्मिक शक्तियाँ मुझसे कई गुना ज्यादा हैं, क्योकि मैं केवल पढता हूँ और वो जीवन में उसका अक्षरतः पालन भी करती है।
मेरे प्रश्न पर जरा वह हँसी और गिलास में पानी देते हुए बोली- यह बताइए कि एक पुत्र यदि माता की भक्ति करता है तो उसे मातृ भक्त कहा जाता है, परन्तु माता यदि पुत्र की कितनी भी सेवा करे उसे पुत्र भक्त तो नहीं कहा जा सकता ना!
मैं सोच रहा था, आज पुनः ये मुझे निरुत्तर करेगी। मैंने फिर प्रश्न किया कि ये बताओ, जब जीवन का प्रारम्भ हुआ तो पुरुष और स्त्री समान थे, फिर पुरुष बड़ा कैसे हो गया, जबकि स्त्री तो शक्ति का स्वरूप होती है..?
मुस्कुरातें हुए उसने कहा- आपको थोड़ी विज्ञान भी पढ़नी चाहिए थी।
मैं झेंप गया और पत्नी ने कहना प्रारम्भ किया-दुनिया मात्र दो वस्तु से निर्मित है-ऊर्जा और पदार्थ।
पुरुष ऊर्जा का प्रतीक है और स्त्री पदार्थ की। पदार्थ को यदि विकसित होना हो तो वह ऊर्जा का आधान करता है, ना की ऊर्जा पदार्थ का। ठीक इसी प्रकार जब एक स्त्री एक पुरुष का आधान करती है तो शक्ति स्वरूप हो जाती है और आने वाले पीढ़ियों अर्थात् अपने संतानों के लिए प्रथम पूज्या हो जाती है, क्योंकि वह पदार्थ और ऊर्जा दोनों की स्वामिनी होती है जबकि पुरुष मात्र ऊर्जा का ही अंश रह जाता है।
मैंने पुनः कहा- तब तो तुम मेरी भी पूज्य हो गई ना, क्योंकि तुम तो ऊर्जा और पदार्थ दोनों की स्वामिनी हो?
अब उसने झेंपते हुए कहा- आप भी पढ़े लिखे मूर्खो जैसी बात करते हैं। आपकी ऊर्जा का अंश मैंने ग्रहण किया और शक्तिशाली हो गई तो क्या उस शक्ति का प्रयोग आप पर ही करूँ, ये तो सम्पूर्णतया कृतघ्नता हो जाएगी। वास्तव में स्त्री महान होती है।
मैंने कहा- मैं तो तुम पर शक्ति का प्रयोग करता हूँ फिर तुम क्यों नहीं?
उसका उत्तर सुन मेरे आँखों में आँसू आ गए:उसने कहा- जिसके साथ संसर्ग करने मात्र से मुझमें जीवन उत्पन्न करने की क्षमता आ गई और ईश्वर से भी ऊँचा जो पद आपने मुझे प्रदान किया जिसे माता कहते हैं, उसके साथ मैं विद्रोह नहीं कर सकती। दूसरे, राक्षसों का नरसंहार करने देवताओं ने देवी माता को समस्त शक्तियां और शस्त्र देकर पूज्यनीय बना दिया। फिर मुझे चिढ़ाते हुए उसने कहा कि यदि शक्ति प्रयोग करना भी होगा तो मुझे क्या आवश्यकता... मैं तो माता सीता की भाँति लव-कुश तैयार कर दूँगी, जो आपसे मेरा हिसाब किताब कर लेंगे। समय परिवर्तन को देख आभास भी हो रहा है, करना भी चाहिए, समय को शायद यही स्वीकार है।
सहस्त्रों नमन है सभी मातृ शक्तियों को, जिन्होंने अपने प्रेम और मर्यादा में समस्त सृष्टि को बाँध रखा है।