समान नागरिक संहिता और आर्य समाज

डॉ राकेश कुमार आर्य, मुख्य संपादक, उगता भारत   

आज भारत में समान नागरिकता संहिता की बात करने को मुस्लिम कट्टरपंथी और छद्दम सेक्युलरिस्ट छाती पीट मातम कर देश का माहौल ख़राब करते रहे हैं। इन अशिक्षित से भी बत्तर और शैतान बने शिक्षितों को नहीं ज्ञान कि सनातन धर्म कितना महान और क्षीर सागर से भी अधिक गहरा है। जिसका अध्ययन और समझने के लिए असंख्य ऋषि-मुनियों ने हज़ारों वर्ष तपस्या की है, जिस कारण सनातन पर प्रहार करने वालों का विश्व में कोई नामलेवा नहीं, इतिहास साक्षी है। लेकिन अपनी तिजोरी और अय्याशी के लिए धन एकत्र करने बेगुनाह जनता को गुमराह कर उनका जीवन अंधकारमय बना रहे हैं। सनातन की थोड़ी-से गहराई में जाने पर ज्ञात होता है कि सनातन कितना व्यापक और आसमान से बहुत ऊँचा है।
जनता को-चाहे वह किसी भी जाति, समुदाय अथवा मजहब से हो- इन समाज के दुश्मनों से पूछो की मानव को जातियों में किसने बांटा? कुर्मी,अनुसूचित, शिया, सुन्नी, वहाबी, कैथोलिक और बैप्टिस्ट आदि जातियों में मानव को किसने बांटा और क्यों? ये सब किया भटकी आत्माओं ने अपनी दुकानदारी चलाने के लिए।
लेखक 
भारत में प्रत्येक राष्ट्रवासी को (नागरिक नहीं) समान अधिकार प्राप्त हों और प्रत्येक व्यक्ति अपनी मानसिक, शारीरिक और आत्मिक उन्नति कर सके, इसके लिए ऋषियों ने तप किया। स्वामी दयानंद जी महाराज भारत के आधुनिक इतिहास के ऐसे पहले महानायक हैं जिन्होंने तप को राष्ट्र का आधार बनाया। उन्होंने इस बात को गंभीरता से अनुभव किया कि बिना तप के राष्ट्र निर्माण संभव नहीं है । यही कारण था कि उन्होंने सारे देश को तपस्वियों का देश बनाने के लिए कार्य करना आरंभ किया। अपनी इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए उन्होंने गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को लागू करने के साथ-साथ वेदों की ओर लौटने का आवाहन देशवासियों से किया । वह जानते थे कि वेदों का स्वराज्य चिंतन जब तक लोगों की दृष्टि में नहीं आएगा तब तक देश तप के लिए तैयार नहीं होगा। एक प्रकार से स्वामी दयानंद जी महाराज ने भारत की आत्मिक चेतना को उस परमचेतना के साथ जोड़ दिया जिसे आप ऊर्जा का अजस्र स्रोत कह सकते हैं।
ऋषि का यह बहुत बड़ा उपकार था। उनके इतना करने मात्र से भारत अपने मूल्य को अपने आप समझ गया। जैसे ही वह परम चेतना से जुड़ा और जुड़ने के पश्चात ऊर्जा से भरा तो वह बब्बर शेर की भांति अपने शत्रु पर टूट पड़ा। उसका यह शत्रु कई क्षेत्रों में कई रूपों में खड़ा हुआ था । यदि राजनीतिक क्षेत्र में देखें तो वह विदेशी शासको के रूप में खड़ा था । सामाजिक क्षेत्र में देखें तो वह अज्ञानता और पाखंड के रूप में खड़ा था। यदि धार्मिक क्षेत्र में देखें तो वहां पर भी अज्ञानता का साम्राज्य था। इसी प्रकार आर्थिक क्षेत्र में जबरदस्त शोषण के रूप में यह शत्रु दिखाई दे रहा था।
महर्षि दयानंद जी के प्रयास से जगे हुए भारत ने अपने सामने खड़े शत्रुओं को पहचाना और उनके विनाश पर काम करने लगा।
स्वामी दयानंद जी महाराज ने जब भारत के लोगों को वेदों की ओर लौटने का आवाहन किया तो वेदों के समान दृष्टिकोण से लोगों का अपने आप परिचय हो गया। आर्य समाज एक ऐसा क्रांतिकारी संगठन है जो पहले दिन से समान नागरिक संहिता का समर्थक रहा है। इसने अपने चिंतन से, अपने लेखन से , अपने व्याख्यानों से और उपदेशों से हर स्थान पर मनुष्य मनुष्य के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव न करने का संकल्प बार-बार दोहराया है। यदि यह कहा जाए कि आर्य समाज ही वह पवित्र संस्था है जो भारत ही नहीं संपूर्ण संसार में समान नागरिक संहिता की पैरोकार है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। हम सभी जानते हैं कि ऊंच, अस्पृश्यता की खाई को पाटने और समाज से जातिवाद को मिटाने की पहल करने वाली संस्था आर्य समाज ही रही है। स्वामी दयानंद जी महाराज ने सभी देशवासियों को आर्य शब्द दिया। इस प्रकार उन्होंने सभी देशवासियों को एक नाम 'आर्य' देकर इस पवित्र शब्द को हमारी राष्ट्रीयता के साथ संलग्न किया। इससे पता चलता है कि स्वामी दयानंद जी महाराज हम देशवासियों के भीतर तो श्रेष्ठता का भाव पैदा करना चाहते ही थे, वह हमारी राष्ट्रीयता को भी सर्वोच्च श्रेष्ठता में परिवर्तित कर देना चाहते थे। यह एक ऐसा शब्द है जो मनुष्य मनुष्य के बीच में किसी भी प्रकार की दूरी नहीं रहने देता। सबको एक मुख्यधारा में समान स्तर पर और समान सम्मान के भाव से स्थापित कर देना चाहता है अर्थात आर्य शब्द हमारे लिए समान नागरिक संहिता की सबसे बड़ी गारंटी है।
ऋषियों का तप और भारतीय राष्ट्र
भारतीय राष्ट्र की मानवतावादी चिंतनधारा के पीछे ऋषियों का तप काम करता रहा है। बड़े परिश्रम और पुरुषार्थ के बाद हमारे ऋषियों ने राष्ट्र की सुव्यवस्थित योजना और स्वरूप को तैयार किया। भारत के ऋषियों के द्वारा बनाई गई यह राष्ट्र की व्यवस्था करोड़ों वर्ष तक निर्विघ्न काम करती रही। इस संबंध में अथर्ववेद ( 19: 41: 1) का यह मंत्र बड़ा प्रसिद्ध है कि :-
भद्रमिच्छन्त : ऋषय: स्वविर्द : तपोदीक्षामुपसेदुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजस्वजातं तस्मै देवा: उपसन्नु मन्तु।
“भद्रमिच्छन्त : ऋषय” विश्व के कल्याण की कामना रखने वाले और भद्र की उपासना करने वाले ऋषियों ने तप किया। हमारे ऋषियों ने भद्र के माध्यम से राष्ट्र की पवित्रता को बनाए रखने का प्रशंसनीय प्रयास किया। उनके तप से राष्ट्र को बल मिला, तेज मिला। बल और तेज के सम्मिश्रण से जो अग्नि पैदा होती है वह राष्ट्र को तेजस्विता से ओतप्रोत करती है। उपरोक्त मंत्र का भावार्थ है कि उनके परिश्रम पूर्ण त्याग, तपस्या और राष्ट्र की ऊंची साधना के फलस्वरूप जिस प्रकार के राष्ट्र ने आकार लिया उसे देखकर देवता भी आकर इस राष्ट्र को नमस्कार करते हैं। लोक कल्याण की उच्चतम साधना में रत रहे भारत के ऋषियों के इस प्रकार के परिश्रम के पश्चात जो राष्ट्र बना उसे लोगों ने देव निर्मित देश अर्थात ऋषियों के द्वारा निर्मित किया गया देश कहा। देव निर्मित देश कहने से एक और भी बड़ी शंका का या कहिए कि इतिहास के एक महाझूठ का निराकरण अपने आप हो जाता है कि हम सब ऋषियों के त्याग तपस्या के फलों को भोगने वाले सौभाग्यशाली जन हैं । हमने कभी लोगों को ना तो उत्पीड़ित किया और ना किसी ऐसे कबीलाई संघर्ष में अपने देश को कभी फंसाया, जिसमें लोगों को अपने अधीन कर अर्थात अपना गुलाम बनाकर उन पर अपना अमानवीय शासन थोपने की प्रवृत्ति संसार के अन्य देशों में देखी जाती है। हमने पूर्ण व्यवस्थित योजना के साथ आगे बढ़ना आरंभ किया और सबको सबके अधिकारों का उपयोग करने का सुंदर परिवेश उपलब्ध कराया। हमने किसी के अधिकारों का शोषण नहीं किया बल्कि अपनी ओर से अधिकार देने की या दूसरों के अधिकारों का संरक्षण करने की मानवोचित प्रवृत्ति को अपना कर मानवता का हित संरक्षण किया। अपनी इसी सोच और पवित्र भावना के कारण भारत प्राचीन काल से ही समान नागरिक संहिता का समर्थक ही नहीं बल्कि संस्थापक देश रहा है। जो लोग दूसरों के अधिकारों का संरक्षण करने की प्रवृत्ति वाले होते हैं वही देव होते हैं । भारत देव निर्मित देश इसीलिए है कि यहां के ऐसे ही देव भावना वाले लोगों ने या ऋषि पूर्वजों ने इस राष्ट्र का निर्माण किया है।
भारतीय राष्ट्र का निर्माण और हमारे ऋषि पूर्वज
इस देव निर्मित देश में हम करोड़ों वर्ष से निवास करते चले आए हैं। भारत राष्ट्र का निर्माण ऋषियों के द्वारा हुआ है। उनके तप से दीक्षित राष्ट्र प्राचीन काल से ही शांति और व्यवस्था का समर्थक रहा है । इस राष्ट्र ने धर्म के साये में आंखें खोली हैं। धर्म से ऊर्जा प्राप्त कर भारतीय राष्ट्र ने ऐसे धर्म-राज्य की स्थापना की जो नीति अर्थात निश्चित व्यवस्था पर आधारित था। इसी निश्चित व्यवस्था को दूसरे संदर्भ में आप धर्म का सकते हैं तो निश्चित व्यवस्था का समर्थक होने के कारण राष्ट्र के रूप में भी इसका उपयोग हो सकता है। हमारी दृष्टि में राष्ट्र ऐसे लोगों से बनता है जिनका चिंतन धर्म की भट्टी में तपा हो और जो स्वाभाविक रूप से एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर आगे बढ़ने वाले हों। जो शोषण, उत्पीड़न, छोटे-बड़े , ऊंचनीच के भाव से मुक्त हों और जो सबको एक साथ, एक दिशा में लेकर चलने की पवित्र भावना से भरे हों।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि वही व्यक्ति राष्ट्र निर्माता की श्रेणी में आता है जो अपने देशवासियों के प्रति सहानुभूति का भाव रखता हो, जो अपने इतिहास नायकों से प्रेम करता हो, अपने देश की संस्कृति और धर्म के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखता हो और देश पर मर मिटने की भावना से ओतप्रोत हो। मानवता के हत्यारे लोग जिन्होंने तुर्क, मुगल या अंग्रेजों के रूप में हमारे देश पर जबरन शासन किया, कभी भी राष्ट्र निर्माता नहीं हो सकते थे। उनके आचरण ,कार्य शैली और व्यवहार को देखकर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ऐसे लोग तो राष्ट्र के हत्यारे होते हैं। ऐसे हत्यारे लोगों का अनुकरण करने वाले लोग भी राष्ट्र निर्माता नहीं हो सकते। यह आर्य समाज ही था जिसने सबसे पहले इस बात को लोगों को समझाया कि राष्ट्र के हत्यारों को हत्यारा कहो और राष्ट्र निर्माताओं को राष्ट्र निर्माता कहो। आज भी आर्यसमाज इसी विचारधारा में विश्वास रखता है। यही कारण है कि वह किसी भी प्रकार के तुष्टिकरण या छद्मवाद का समर्थक नहीं है।
जिन लोगों की मानसिकता में दोष था या दोष है वह कभी भी 'सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया…. ' की पवित्र भावना के उपासक नहीं हो सकते। राष्ट्र की अवधारणा उनके मानस में खंडित रूप में प्रवाहित होती है और राष्ट्र कभी भी खंडित रूप में साकार रूप नहीं ले सकता।
हमने अपनी ऋषि परंपरा को सम्मान देने और उसे जीवित रखने की भावना से प्रेरित होकर देश में गोत्र परंपरा को अपने अपने महान ऋषियों के नाम से प्रचलित किया। भारतवर्ष की सभी कुल, वंश ,परंपराएं ऋषि गोत्रों के आधार पर चल रही हैं। गोत्र परंपराओं को जीवित रखकर हम अपने महान पूर्वजों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यह अलग बात है कि हम अपनी वंश, गोत्र परंपरा के पीछे खड़े ऋषियों के चिंतन को भूल गए हैं।
वेद व्यक्ति की स्वतंत्रता का उद्घोषक
आज पश्चिमी जगत के अनेक विद्वान इस बात पर बल देते हैं कि संसार को व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाने वाला पश्चिमी जगत है, पर सच यह नहीं है। पश्चिमी जगत का इतिहास उठाकर देखिए , वहां पर लाखों करोड़ों लोगों को मार-मारकर समाप्त किया गया । इसके पीछे व्यक्ति के अधिकारों को छीनने की मनुष्य की अमानवीय भावना ही काम कर रही थी। जबकि भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ जब किसी एक वर्ग ने दूसरे वर्ग के ऊपर हमला कर उसके लाखों निरपराध लोगों को मौत के घाट उतार दिया हो।
वेद को व्यक्ति की स्वतन्त्रता का उद्घोषक कहा जा सकता है। वैदिक काल में राष्ट्रचिन्तक ऋषियों ने वास्तविक प्रजातन्त्र की अवधारणा का सूत्रपात करते हुए पंचायती राज्य व्यवस्था का शुभारम्भ किया था।
ऋ. 10/62/11 में कहा गया है:-
सहस्रदा ग्रामणीर्मा रिषन्मनुः सूर्येणास्य यतमानैतु दक्षिणा।
यहाँ ऋषि ग्राम प्रधान (ग्रामणी) के प्रजा के प्रति कल्याण भावना से ओत- प्रोत होने की बात कह रहा है। ऋषि का कहना है कि ग्राम प्रधान प्रभूत धन देने वाला सहस्रदा मनु है। उसकी दक्षिणा सूर्य से प्रतिद्वन्द्विता करे। कहने का अभिप्राय ये है कि जिस प्रकार सूर्य सभी लोगों पर बिना किसी भेदभाव के अपनी किरणों को बिखेरता है, उसी प्रकार ग्रामणी प्रत्येक व्यक्ति और ग्रामवासी के प्रति स्नेहासिक्त हो तथा उसके हृदय में किसी के प्रति भी द्वेषभाव ना हो। जैसे सूर्य की किरणें सबके लिए जीवन प्रद हैं, उसी प्रकार ग्राम प्रधान सबके लिए जीवन प्रद हो ।
ग्राम प्रधान से लेकर राष्ट्र प्रधान तक लोक कल्याण की इसी पवित्र भावना में वसुधैव कुटुंबकम , कृण्वंतो विश्वमार्यम् और सर्वे भवंतू सुखिन: …. का उदात्त भाव छुपा हुआ है जो प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकार तो प्रदान करता ही है राज्य को उसके मौलिक अधिकारों का संरक्षक भी बनाता है। नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करने की प्रक्रिया ईसाइयत और इस्लाम की देन है।
शायद किसी भी ग्रामणी या ग्राम प्रधान के रहते हुए जैसे गांव में कोई भी नागरिक नंगा भूखा नहीं रह सकता , वैसे ही देश के राष्ट्रपति के रहते हुए कोई भी देशवासी नंगा भूखा नहीं रह सकता। इस प्रकार की न्यायिक व्यवस्था करते राजा या राष्ट्रपति को हर स्थिति में व्यक्तियों के बीच पूर्ण न्याय करना चाहिए। उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए उनमें पारस्परिक बंधुता की भावना को सुनिश्चित करना राजा का दायित्व होता है। राजा या शासक वर्ग वोटों की राजनीति करते हुए आरक्षण, रेवड़ी बांटने या तुष्टीकरण के माध्यम से विभेद उत्पन्न करता है या विभेदकारी नीतियां अपनाता है तो ऐसा राजा या शासन व्यवस्था उत्तम नहीं होती। देश के शासक वर्ग को चाहिए कि देश में समरूपता स्थापित करने के लिए एक प्रकार के कानून, एक प्रकार की विधि व्यवस्था, एक प्रकार के रीति रिवाज ,विवाह आदि संस्कारों के एक प्रकार के नियम लागू हों। जिससे देश में समरूपता स्थापित होकर राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूती प्रदान हो।
शासन की नीतियों का आधार विभिन्नताओं को पोषित करना नहीं है,अपितु राष्ट्रहित में विभिन्नताओं को समेकित करना है।
नेहरु और समान नागरिक संहिता
नेहरू समान नागरिक संहिता को लागू करने के पक्षधर होकर भी विभिन्नताओं को पोषित करने वाले प्रधानमंत्री थे।
शासन के उपरोक्त उदात्त भाव ( जिसे हमारे यहां राष्ट्रधर्म कहा जाता है) से प्रेरित होकर हमारे संविधान में समान नागरिक संहिता की पवित्र भावना का समावेश करने का प्रयास इसलिए किया गया कि संविधान सभा के अनेक सदस्य इस बात पर सहमत थे कि पिछली कई शताब्दियों में भारतीय राज्य व्यवस्था में होती रही उथल-पुथल के चलते तुर्क , मुगल और ब्रिटिश शासकों ने लोगों के बीच विभेदकारी नीतियां अपनाई । जिससे तुष्टीकरण, फूट डालो और राज करो की देशघाती परंपरा देश की शासन व्यवस्था में आरम्भ हो गई। संविधान सभा के अनेक सदस्य इस बात से सहमत थे कि स्वतंत्र भारत में शासन की इस प्रकार की विभेदकारी नीतियों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू तो 1930 से समान नागरिक संहिता की बात कर रहे थे। इस सबके उपरांत भी नेहरू एक ऐसे नेता थे जो समान नागरिक संहिता का अपना ही अर्थ निकाल रहे थे। वे नहीं चाहते थे कि देश में समान नागरिक संहिता सही संदर्भ और सही अर्थों में लागू हो जाए। राजनीति में दक्षिणा के संस्कार को नेहरू ने कभी स्वीकार नहीं किया। उन्हें इस प्रकार का संस्कार या दक्षिणा देने का विचार सांप्रदायिक दिखाई देता था। जिसे वह हिंदू मानसिकता से पूर्वाग्रहग्रस्त मानते थे। नेहरू का झुकाव इस्लाम की ओर था। अतः उनके बारे में कहा जा सकता है कि वह स्वयं सांप्रदायिक थे। क्योंकि हर वह व्यक्ति सांप्रदायिक होता है जो सांप्रदायिक आधार पर लोगों में तुष्टीकरण जैसी बीमारी के आधार पर विभेद पैदा करता है। नेहरू की इस प्रकार की नीति ने समान नागरिक संहिता की भावना को चोटिल किया।
वेद ने ग्राम प्रधान को नरपति की संज्ञा दी थी।
ऋ. 10/107/5 में कहा गया है:-
“तमेवमन्ये नृपतिं जनानां यः प्रथमो दक्षिणा मा विवाय।”
अर्थात् “जिसने पहले दक्षिणा आरम्भ की उसे ही मैं लोगों का नरपति मानता हूँ।”
नेहरू भारतीय शासन व्यवस्था के इस सूत्र वाक्य के निकट तक भी नहीं थे। वह नहीं जानते थे कि दक्षिणा का अभिप्राय राष्ट्र की उन्नति के प्रति मन से समर्पित हो जाना है। उन्होंने मंदिरों में होने वाली दक्षिणा के बारे में सुना था। वेद की आत्मिक और मानसिक दक्षिणा के विषय में उन्हें कोई बोध नहीं था। इस्लाम की या ईसाइयत की मान्यताओं को उन्होंने व्यक्ति की व्यक्तिगत पवित्रता के साथ जोड़कर देखा। बस, यही कारण था कि वे समान नागरिक संहिता की संवैधानिक वचनबद्धता के प्रति अपनी ईमानदारी प्रकट नहीं कर पाए। समय आने पर उन्होंने इस्लामिक तुष्टीकरण के सामने समान नागरिक संहिता को बौना करके देखा।
यदि कोई प्रधानमंत्री आर्य समाज की विचारधारा से प्रेरित होकर काम करता तो वह वैदिक चिन्तन से अभिभूत होकर राष्ट्र को वास्तविक समान नागरिक संहिता का बोध कराता। हमारे देश का यह दुर्भाग्य ही रहा कि देश को पहला प्रधानमंत्री ऐसा व्यक्ति मिला जो भारतीय संस्कृति से तो दूरी बनाकर रहता ही था, उसे आर्य समाज नाम की पवित्र संस्था से तो बहुत ही अधिक द्वेष भाव था।

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