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अब CJP की ‘टूलकिट’ वाली ग्रेटा थनबर्ग हुईं मुरीद: SFI UK के मंच से की तारीफ, बोलीं- ‘प्रदर्शन करने पर ही मिलती हैं बड़ी चीजें’

किसान आंदोलन की 'टूलकिट' से चर्चित ग्रेटा थनबर्ग ने SFI UK कार्यक्रम में CJP के नेतृत्व वाले प्रदर्शन के प्रति जताई एकजुटता (फोटो साभार: SFI UK)
लंदन में SFI यूके द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में ग्रेटा थनबर्ग ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व वाले प्रदर्शन का समर्थन किया है। खुद को जलवायु कार्यकर्ता बताने वाली ग्रेटा थनबर्ग इससे पहले किसान आंदोलन की टूलकिट को लेकर भी चर्चा में रही थीं।

कार्यक्रम में बोलते हुए ग्रेटा थनबर्ग ने कहा कि भारत में छात्रों के प्रदर्शन ने पूरी दुनिया के लोगों को गर्व महसूस कराया है। उन्होंने आगे कहा कि इन प्रदर्शनों ने यह साबित कर दिया है कि जब आम लोग मिलकर विरोध करते हैं, तो बड़ी चीजें हासिल की जा सकती हैं।

उन्होंने कहा, “ये प्रदर्शन लोगों की ताकत का सही अर्थ बताते हैं। न्याय के लिए भारतीय छात्रों का संघर्ष और लोकतंत्र व आजादी के लिए व्यापक लड़ाई हमारी भी लड़ाई है।” इसके साथ ही उन्होंने समर्थकों से ‘भारत के साथ एकजुट होकर खड़े होने’ की अपील की।

सप्ताह के अंत में में आयोजित इस कार्यक्रम को SFI UK ने आंदोलन की ‘जीत का जश्न’ बताया। संगठन ने दावा किया कि इस आंदोलन के कारण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। SFI UK ने यह भी आरोप लगाया कि NEET मामले को संभालने के दौरान 21 छात्रों की जान गई और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस ने ‘क्रूर दमन’ किया।

हालाँकि कार्यक्रम में उन घटनाओं का कोई उल्लेख नहीं किया गया, जिनमें छात्र प्रदर्शनकारियों के रूप में मौजूद उपद्रवियों पर पथराव करने, पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के जवानों के साथ धक्का-मुक्की और हमले करने के आरोप लगे थे।

इससे पहले SFI ने अपने एक बयान में कहा था कि ‘लड़ाई जारी रहेगी’, जिससे भविष्य में भी ऐसे प्रदर्शन होने के संकेत मिले थे।

यह कार्यक्रम ऐसे समय में हुआ, जब CJP ने शनिवार (25 जुलाई 2026) को अपना 36 दिन लंबा आंदोलन समाप्त करने का ऐलान किया था। संगठन ने दावा किया कि केंद्र सरकार ने उसकी बची हुई माँगें भी मान ली हैं। इनमें NEET पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले बताए गए छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR वापस लेने जैसी माँगें शामिल थीं।

लंदन में आयोजित यह कार्यक्रम SFI UK की ओर से इस आंदोलन के समर्थन में किया गया पहला प्रयास नहीं था। इससे पहले Opindia ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि SFI UK की विभिन्न इकाइयों ने लंदन, लीड्स और एडिनबर्ग में पहले से तय कार्यक्रमों के जरिए समर्थकों को जुटाया था।

संगठन ने प्रदर्शन के स्थान और समय पहले ही तय किए, पोस्टर जारी किए और अपने नेटवर्क के माध्यम से इन कार्यक्रमों का समन्वय किया। हालाँकि कुछ मीडिया संस्थानों, जिनमें The Wire भी शामिल है, ने लंदन में हुए इस कार्यक्रम को भारतीय प्रवासी समुदाय की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया के रूप में पेश करने की कोशिश की।

ग्रेटा थनबर्ग इससे पहले 2021 के किसान आंदोलन के दौरान भी भारत के राजनीतिक विवाद का हिस्सा बनी थीं। उस समय उन्होंने सोशल मीडिया पर एक ऑनलाइन ‘टूलकिट’ साझा की थी, जिसका उद्देश्य किसान आंदोलन के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियान को समन्वित करना बताया गया था। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने उस टूलकिट के तैयार करने वालों के खिलाफ मामला दर्ज किया था, हालाँकि उस FIR में ग्रेटा थनबर्ग का नाम शामिल नहीं था।

सरकारें और अदालतें पेशेवर प्रदर्शनकारी योगेंद्र यादव और इसकी पैरवी करने वाले वकीलों पर कब सख्ती से पेश आएंगे? योगेंद्र यादव की भीड़-तंत्र को सामान्यीकृत करने की खतरनाक जहरीली मानसिकता

                                                       (फोटो साभार: इंडिया टूडे, बिजनेस स्टैंडर्ड)
कई वर्षों से योगेंद्र यादव खुद को लोकतंत्र, संवैधानिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति प्रतिबद्ध एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में पेश करते रहे हैं। लेकिन उनके राजनीतिक हस्तक्षेप लगातार लोकतांत्रिक राजनीति की एक अलग ही अवधारणा को सामने रखते हैं।

यह ऐसी सोच है, जिसमें संसदीय प्रक्रियाओं से अधिक महत्व लगातार आंदोलनों को दिया जाता है, चुनावों से मिली वैधता से ऊपर सड़क पर होने वाली लामबंदी (Mobilization) को रखा जाता है और सरकारों को चुनौती देने तथा बदलने के लिए संविधान के सामान्य लोकतांत्रिक तरीकों के बजाय ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को प्राथमिकता दी जाती है।

NEET पेपर लीक को लेकर हुए आंदोलन पर उनका हालिया लेख केवल एक विरोध प्रदर्शन के बारे में नहीं है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक व्यापक राजनीतिक रणनीति सामने आती दिखाई देती है। योगेंद्र यादव ने तर्क दिया है कि विपक्ष को चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर जाना चाहिए।

उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए हिंसक आंदोलन को इस नई राजनीति के एक मॉडल के रूप में भी प्रस्तुत किया है।

                                                            (साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

इस तर्क की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए, खासकर 2026 में पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत और उसके बाद शुभेंदु अधिकारी का राज्य के पहले BJP मुख्यमंत्री बनना केवल एक और विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं था। यह उस राजनीतिक धारणा के टूटने का संकेत था, जिसमें BJP के वैचारिक विरोधी पश्चिम बंगाल को भगवा दल के लिए आखिरी बड़ा राजनीतिक गढ़ मानते थे।

लंबे समय तक पश्चिम बंगाल को वामपंथी-उदारवादी राजनीति, क्षेत्रीय प्रतिरोध और BJP विरोधी वैचारिक एकजुटता का केंद्र बताया जाता रहा। ऐसे में राज्य में BJP की जीत ने सिर्फ चुनावी समीकरण ही नहीं बदले, बल्कि भारतीय राजनीति की मनोवैज्ञानिक तस्वीर भी बदल दी।

BJP विरोधी खेमे का लंबे समय से मानना था कि जैसे ही पार्टी की राजनीतिक रफ्तार कमजोर होगी, उसका सामाजिक गठबंधन बिखरेगा या कुछ मजबूत राज्य उसके विस्तार को रोक देंगे, वैसे ही उसे चुनाव में हराया जा सकेगा।

लेकिन BJP ने बार-बार यह दिखाया कि वह बदलते हालात के अनुसार खुद को ढाल सकती है, अपना जनाधार बढ़ा सकती है, राष्ट्रवाद को अपने मुख्य आधार के रूप में बनाए रख सकती है, सुशासन के मुद्दों को चुनावी समर्थन में बदल सकती है और उन इलाकों में भी अपनी जगह बना सकती है जिन्हें कभी उसके लिए पूरी तरह प्रतिकूल माना जाता था।

पश्चिम बंगाल के नतीजों ने इस पूरी बहस की दिशा बदल दी। ऐसे में कुछ कार्यकर्ताओं और वैचारिक समूहों के बीच लगातार सार्वजनिक आंदोलनों के प्रति बढ़ते उत्साह को केवल ‘लोकतांत्रिक असहमति’ के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे चुनावी राजनीति की सीमाओं से पैदा हुई निराशा के रूप में भी समझा जा सकता है।

इसका यह मतलब नहीं है कि हर प्रदर्शनकारी या कार्यकर्ता की सोच एक जैसी है या फिर हर सार्वजनिक आंदोलन गलत है। लेकिन इससे एक अहम सवाल जरूर उठता है कि जब चुनावी राजनीति बार-बार मनचाहा राजनीतिक परिणाम देने में असफल रहती है और राजनीतिक आंदोलनों पर वही पुराने चेहरे हावी हो जाते हैं, तो क्या सड़क को निर्णायक राजनीतिक मैदान बनाने का आकर्षण बढ़ने लगता है? योगेंद्र यादव के हालिया बयान भी इसी तरह के बदलाव की ओर इशारा करते दिखाई देते हैं।

फिर से आ गया पेशेवर प्रदर्शनकारी

पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हुए शायद ही किसी बड़े आंदोलन में ऐसा हुआ हो, जिसमें योगेंद्र यादव किसी न किसी रूप में सक्रिय भागीदार, टिप्पणीकार या वैचारिक समर्थक के तौर पर नजर न आए हों।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और शाहीन बाग धरने से लेकर किसान आंदोलन और अब परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन तक, योगेंद्र यादव लगातार ऐसे आंदोलनों के साथ खड़े दिखाई दिए हैं, जिनका उद्देश्य मोदी सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाना रहा है।

सिर्फ इससे उन्हें अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। किसी भी सार्वजनिक बुद्धिजीवी को किसी मुद्दे या आंदोलन का समर्थन करने का अधिकार है। लेकिन एक पैटर्न लगातार दिखाई देता है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है, जब जनता के गुस्से को भड़काने और उन्हें हिंसा की ओर उकसाने की कोशिश की जाती है।

हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो में योगेंद्र यादव कहते नजर आए कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा। इस बयान को कई लोगों ने हिंसक और टकराव वाली राजनीति को समर्थन देने वाला बताया।

यही राजनीतिक तरीका बार-बार सामने आता दिखाई देता है। किसी एक विशेष शिकायत को पूरे संस्थागत ढाँचे पर आरोप में बदल दिया जाता है। किसी सरकारी नीति पर मतभेद को लोकतंत्र के पूरी तरह विफल हो जाने का प्रमाण बताया जाता है। एक विरोध प्रदर्शन को चुनी हुई सरकार की वैधता पर नैतिक जनमत-संग्रह की तरह पेश किया जाता है।

और धीरे-धीरे जवाबदेही की भाषा की जगह हिंसा और टकराव की भाषा लेने लगती है। CJP का आंदोलन इसी बदलाव का ताजा उदाहरण माना जा सकता है।

NEET परीक्षा में हुई अनियमितताओं की निष्पक्ष और गंभीर जाँच होना जरूरी था। परीक्षा में गड़बड़ियों या पेपर लीक से प्रभावित छात्रों को न्याय मिलना चाहिए और प्रशासनिक लापरवाही से परेशान परिवारों के प्रति जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी भी सरकार को ऐसी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

लेकिन प्रशासनिक सुधार की माँग करने और हर सार्वजनिक शिकायत को हिंसक सड़क आंदोलन में बदल देने के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। यह अंतर तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब कुछ कार्यकर्ता जनता के गुस्से को केवल सुधार की माँग के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक टकराव का आधार बनाने की कोशिश करने लगते हैं।

‘ऑक्युपाई इंडिया’ को खड़ा करना

अपने Indian Express के लेख में योगेंद्र यादव ने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को भारत का ‘ऑक्युपाई मोमेंट’ बताया। उन्होंने इस आंदोलन के बड़े पैमाने, इसमें शामिल विभिन्न वर्गों की भागीदारी और इसकी स्वतःस्फूर्त प्रकृति की सराहना करते हुए इसे ऐसा ‘स्वाभाविक जन आंदोलन’ कहा, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों की व्यवस्था से अलग खड़ा हुआ।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विपक्ष को अब अपनी राजनीति का केंद्र चुनावों से आगे बढ़ाकर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर ले जाना चाहिए।

यहाँ इस्तेमाल की गई भाषा महत्वपूर्ण है।

‘प्रतिरोध की राजनीति’ सुनने में तब तक सामान्य लग सकती है, जब इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध और लोकतांत्रिक असहमति के समर्थन में किया जाए। किसी भी लोकतंत्र में नागरिकों का अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, विरोध करना और सरकार से जवाबदेही माँगना जरूरी होता है। लेकिन यही शब्द तब कहीं अधिक गंभीर अर्थ लेने लगते हैं, जब इनके जरिए यह संकेत दिया जाए कि प्रतिनिधिक लोकतंत्र और चुनावी राजनीति अब पर्याप्त नहीं रह गई है।

योगेंद्र यादव का तर्क इस धारणा पर आधारित है कि भारत उस दिशा में बढ़ रहा है, जिसे वह ‘चुनावी निरंकुशता’ (Electoral Autocracy) कहते हैं। इस सोच के अनुसार चुनाव तो होते रहते हैं, लेकिन चुनावी व्यवस्था को इस तरह पेश किया जाता है मानो वह अब वास्तविक लोकतांत्रिक बदलाव लाने में सक्षम नहीं रह गई हो।

इसका राजनीतिक संदेश साफ है।

अगर चुनावों को पर्याप्त नहीं माना जाएगा, तो फिर सड़क पर होने वाले आंदोलन नैतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण माने जाने लगेंगे। वे केवल लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रहेंगे, बल्कि राजनीति का एक वैकल्पिक मंच बन जाएँगे। संसद की भूमिका पीछे छूटने लगेगी, चुनावी जनादेश पर सवाल उठाए जाएंगे और सार्वजनिक प्रदर्शन ही राजनीतिक वैधता का नया आधार बनने लगेंगे।

यही वह बिंदु है, जहाँ खतरा पैदा होता है।

भारत ऐसा देश नहीं है, जहाँ चुनाव खत्म हो गए हों। यहां आज भी सरकारें चुनाव जीतती और हारती हैं। कई राज्यों में विपक्ष की सरकारें हैं। अदालतें सार्वजनिक विवादों में हस्तक्षेप करती हैं। संसद काम कर रही है और चुनावी मुकाबले लगातार होते रहते हैं। पश्चिम बंगाल में BJP की जीत भी, चाहे उसका राजनीतिक आँकलन कुछ भी हो, यह दिखाती है कि भारतीय राजनीति में चुनावों के जरिए बदलाव की पूरी संभावना बनी हुई है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि बीजेपी राजनीतिक रूप से मजबूत है या नहीं। वह है।

असल सवाल यह है कि इस राजनीतिक बढ़त का जवाब नए जनसमर्थन और चुनावी प्रतिस्पर्धा के जरिए दिया जाना चाहिए या फिर लगातार आंदोलनों की ऐसी स्थायी राजनीति के जरिए, जिसका उद्देश्य बैलट बॉक्स के बाहर चुनी हुई सरकार की वैधता को कमजोर करना हो।

बंगाल और हताशा की राजनीति

पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उसने एक लंबे समय से बनी वैचारिक धारणा को झटका दिया है।

कई वर्षों तक BJP के आलोचक पश्चिम बंगाल को एक प्रतीकात्मक सीमा के रूप में देखते रहे। उनका मानना था कि यह ऐसा राज्य है, जहाँ हिंदुत्व की राजनीति चुनावी स्तर पर सीमित रहेगी, जहाँ की राजनीतिक संस्कृति भगवा दल के विस्तार को रोक देगी और जहाँ वामपंथी-उदारवादी विचारधारा की जड़ें सबसे मजबूत बनी रहेंगी।

लेकिन अब यह धारणा टूट चुकी है। पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने केवल पार्टी को एक और राज्य नहीं दिया, बल्कि उन लोगों की सोच को भी बड़ा झटका दिया, जो मानते थे कि चुनावी राजनीति अंततः BJP के विस्तार की एक स्वाभाविक सीमा तय कर देगी। शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के साथ BJP अब उस राजनीतिक क्षेत्र में पहुँच चुकी है, जिसे कभी उसके लिए लगभग असंभव माना जाता था।

बदले हुए इसी राजनीतिक माहौल में योगेंद्र यादव का ‘प्रतिरोध की राजनीति’ पर जोर और अधिक महत्वपूर्ण नजर आता है।

इसकी एक व्याख्या यह हो सकती है कि योगेंद्र यादव और उनके जैसे वैचारिक समूह अब यह महसूस करने लगे हैं कि पारंपरिक चुनावी राजनीति के जरिए BJP को हराना उनकी अपेक्षा से कहीं अधिक कठिन है। लगातार आलोचनाओं, सत्ता विरोधी माहौल की कोशिशों और राजनीतिक हमलों के बावजूद BJP ने अपना व्यापक जनसमर्थन बनाए रखा है और उन राज्यों में भी विस्तार किया है, जिन्हें कभी उसके लिए वैचारिक रूप से बंद माना जाता था।

ऐसे में CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन को केवल परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों की प्रतिक्रिया के रूप में ही नहीं, बल्कि BJP विरोधी वैचारिक समूहों के लिए एक नए राजनीतिक मंच के रूप में भी देखा जा सकता है। ऐसा मंच, जिसकी नींव जन असंतोष, गुस्से, कैंपस आधारित लामबंदी, सोशल मीडिया पर वायरल अभियानों और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आंदोलनों पर टिकी हो।

इसका यह मतलब नहीं है कि इस आंदोलन में शामिल हर छात्र या प्रतिभागी राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है। कई छात्रों की चिंताएँ पूरी तरह वास्तविक और जायज हो सकती हैं। लेकिन जब प्रभावशाली वैचारिक समूह ऐसे आंदोलनों से जुड़ते हैं, तो वे केवल निष्पक्ष पर्यवेक्षक बनकर नहीं आते। वे अपने साथ राजनीतिक सोच, संगठनात्मक अनुभव और दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य भी लेकर आते हैं।

योगेंद्र यादव द्वारा इस आंदोलन का खुलकर समर्थन करना यह संकेत देता है कि वह इसे केवल परीक्षा सुधार के अभियान के रूप में नहीं देखते। उनकी नजर में यह भविष्य की राजनीति का एक संभावित मॉडल या खाका हो सकता है।

जब विरोध धीरे-धीरे ‘सड़क पर वीटो’ का रूप लेने लगता है

विरोध प्रदर्शन और ‘सड़क के जरिए वीटो’ (Street Veto) के बीच का अंतर केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। एक विरोध प्रदर्शन सरकार से अपनी बात सुनने और उस पर विचार करने की मांग करता है। वहीं स्ट्रीट वीटो की सोच यह मानकर चलती है कि सरकार को सड़क पर जुटी भीड़ के दबाव के आगे झुकना ही होगा।

विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य सरकार की नीतियों को प्रभावित करना हो सकता है, लेकिन स्ट्रीट वीटो का लक्ष्य लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता पर सवाल खड़े करना होता है।

कोई भी विरोध प्रदर्शन तेज, असुविधाजनक या व्यापक हो सकता है, लेकिन यदि वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहता है तो वह लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता है। स्ट्रीट वीटो की स्थिति तब पैदा होती है, जब कोई संगठित समूह यह दावा करने लगे कि संसद के बाहर उसकी मौजूदगी और उसका जनसमर्थन, संसद के भीतर मौजूद चुनावी जनादेश से अधिक वैध और महत्वपूर्ण है।

इसी वजह से योगेंद्र यादव का वह वायरल वीडियो चिंता का विषय माना जा रहा है, जिसमें वह कहते हैं कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा।

संसद कोई सामान्य संस्था नहीं है। यह जनता की संप्रभुता की संवैधानिक अभिव्यक्ति है। सांसदों को अपनी वैधता सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के जरिए मिले जनादेश से प्राप्त होती है। सरकारें जनता के वोट से चुनी जाती हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से जवाबदेह बनाई जाती हैं और चुनावों के जरिए ही बदली जाती हैं।

भारतीय संविधान शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से एकत्र होने तथा विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है, लेकिन वह कानून बनाने या शासन चलाने का अधिकार उस समूह को नहीं देता, जो सबसे बड़ी या सबसे शोरगुल वाली भीड़ जुटा ले।

अगर संसद से ऊपर सड़क को रखा जाने लगे, तो लोकतांत्रिक राजनीति धीरे-धीरे टकराव और अवरोध की प्रतिस्पर्धा में बदल सकती है। तब चुनाव हारने वाला हर राजनीतिक दल या समूह मतपेटी के बजाय सड़क जाम, घेराव, दबाव और लगातार आंदोलनों के जरिए दूसरा जनादेश हासिल करने की कोशिश करेगा।

यह लोकतंत्र को मजबूत करने का रास्ता नहीं है। बल्कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का खतरा पैदा करता है, जिसके आधार पर लोकतंत्र कायम रहता है।

हिंसा के सवाल को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज

यह चिंता इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि CJP का आंदोलन केवल भाषणों, तख्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा।

मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस के अनुसार, जंतर-मंतर के पास प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, जिसमें पुलिसकर्मी भी घायल हुए। अधिकारियों का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया और सुरक्षा बलों पर हमला किया, जबकि प्रदर्शनकारियों और विपक्ष ने इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इन दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष जाँच और जहाँ आवश्यक हो, न्यायिक प्रक्रिया के जरिए सत्य सामने आना चाहिए। लेकिन एक बात केवल इसलिए विवाद का विषय नहीं बननी चाहिए क्योंकि इस आंदोलन के इर्द-गिर्द राजनीति हो रही है। पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा को लोकतांत्रिक प्रतिरोध कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

पथराव को संवैधानिक असहमति नहीं कहा जा सकता और सुरक्षा बलों पर हमला लोकतांत्रिक भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकता। जो भी आंदोलन नैतिक आधार पर खुद को सही ठहराने का दावा करता है, उसे ऐसी हिंसक घटनाओं की बिना किसी शर्त के निंदा करनी चाहिए। यही कारण था कि महात्मा गाँधी हिंसक प्रदर्शनों के सख्त विरोधी थे।

हालाँकि आज जो लोग खुद को गाँधी की वैचारिक परंपरा का प्रतिनिधि बताते हैं, वे कई बार तथाकथित ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शनों’ के दौरान हुई हिंसा की उतनी स्पष्ट आलोचना करते नजर नहीं आते। यहीं पर योगेंद्र यादव की भाषा और बयान महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जब कोई सार्वजनिक बुद्धिजीवी लगातार किसी सरकार को तानाशाही प्रवृत्ति वाला, संसद को अपर्याप्त और ‘प्रतिरोध’ को लोकतंत्र का सबसे बड़ा माध्यम बताने लगे, तो ऐसा माहौल बन सकता है जिसमें टकराव और उग्रता राजनीतिक रूप से उचित या सार्थक दिखाई देने लगें।

हो सकता है कि वे सीधे तौर पर हिंसा का आह्वान न करें, लेकिन ऐसी भाषा, जो हर राजनीतिक विवाद को अत्याचार के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश करती है, लोगों को यह महसूस करा सकती है कि टकराव नैतिक रूप से उचित है। क्योंकि शब्द कभी भी शून्य में अस्तित्व नहीं रखते, उनके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी होते हैं।

अंबेडकरवादी विरोधाभास

योगेंद्र यादव और उनके वैचारिक समर्थक अक्सर डॉ भीमराव आंबेडकर, संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा की बात करते हैं। लेकिन डॉ आंबेडकर की संवैधानिक सोच इस विचार पर आधारित नहीं थी कि भीड़ प्रतिनिधिक संस्थाओं की जगह ले ले।

इसके विपरीत, उनका स्पष्ट मानना था कि जब भारत ने राजनीतिक बदलाव के लिए संवैधानिक रास्ते अपना लिए हैं, तब नागरिकों और राजनीतिक दलों को सत्ता परिवर्तन के लिए संविधान से बाहर के तरीकों को सामान्य नहीं बनाना चाहिए। संविधान किसी भी सरकार को चुनौती देने के लिए कई लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ते उपलब्ध कराता है।

नागरिक चुनाव में वोट दे सकते हैं। विपक्षी दल चुनाव लड़ सकते हैं। अदालतों में याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं। संसद में कानूनों पर बहस हो सकती है। मीडिया सरकार की कार्यप्रणाली की जाँच और आलोचना कर सकता है। वहीं, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी जनमत को प्रभावित करने का एक लोकतांत्रिक माध्यम है।

लेकिन इनमें से कोई भी संवैधानिक व्यवस्था यह नहीं कहती कि किसी निर्वाचित सरकार की वैधता को लगातार सड़क पर होने वाले आंदोलनों या भीड़ के दबाव के भरोसे रखा जाए।विडंबना यह है कि जो लोग खुद को संविधान का रक्षक बताते हैं, वही कई बार उसके सबसे मूल सिद्धांत को कमजोर करते हुए दिखाई देते हैं।

संविधान का मूल सिद्धांत यही है कि राजनीतिक सत्ता और उसकी वैधता संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से संचालित होनी चाहिए, न कि वैचारिक दबाव बनाने वाले ऐसे आंदोलनों के जरिए जिनका उद्देश्य शासन को प्रभावी ढंग से चलने से रोकना हो।

लोकतंत्र में विरोध जरूरी, लेकिन इसे विरोध के जरिए नहीं चलाया जा सकता

भारत को असहमति की जरूरत है। देश को ऐसे छात्र आंदोलन, नागरिक समाज संगठन, विपक्षी दल और सार्वजनिक बुद्धिजीवी चाहिए, जो सत्ता से सवाल पूछ सकें और सरकार को जवाबदेह बना सकें। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि लोकतांत्रिक दबाव और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश के बीच का अंतर स्पष्ट बना रहे।

पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने इस अंतर को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। इस जीत ने दिखाया कि BJP का राजनीतिक विस्तार अब केवल उसके पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि उसके विरोधी लंबे समय तक इस उम्मीद पर निर्भर नहीं रह सकते कि चुनावी राजनीति अपने आप उनके पसंदीदा वैचारिक संतुलन को वापस ले आएगी।

संभव है कि यही कारण हो कि लगातार आंदोलनों की राजनीति कुछ वर्गों को अधिक आकर्षित करने लगी है। भारत के सामने चुनौती यह है कि चुनावी नतीजों से असंतोष कहीं चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास में न बदल जाए।

योगेंद्र यादव ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम बताकर पेश कर सकते हैं। लेकिन जब इसे लगातार उग्र सड़क आंदोलनों के महिमामंडन, संसद के प्रति अविश्वास और हर सार्वजनिक शिकायत को सरकार की वैधता के संकट में बदलने की कोशिशों के साथ देखा जाता है, तो यह एक अलग तरह की राजनीति का रूप लेती दिखाई देती है।

ऐसी राजनीति, जो लोकतांत्रिक अधिकार का केंद्र जनता के वोट और चुनावी जनादेश से हटाकर सड़कों पर होने वाले राजनीतिक प्रदर्शनों की ओर ले जाने का प्रयास करती है।

यह एक बेहद जोखिम भरा विचार माना जा सकता है। योगेंद्र यादव के हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह नहीं है कि वह विरोध प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन करते हैं। शांतिपूर्ण विरोध किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है।

असली चिंता यह है कि उनकी अवधारणा सड़क पर होने वाले आंदोलनों को केवल लोकतांत्रिक अधिकार तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें राजनीतिक वैधता के समानांतर स्रोत के रूप में स्थापित करती दिखाई देती है। ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की वकालत और यह कहना कि लोकतंत्र ‘संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा’, ऐसी राजनीतिक सोच को सामने रखता है, जो भारतीय गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था के साथ सहज मेल नहीं खाती।

भारतीय संविधान के अनुसार सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार जनता में निहित है, जो चुनावों और प्रतिनिधिक संस्थाओं के माध्यम से लागू होता है। विरोध प्रदर्शन इसलिए संरक्षित है क्योंकि वह लोकतंत्र को मजबूत करता है, न कि इसलिए कि वह उन संस्थाओं की जगह ले सकता है, जिनके जरिए लोकतांत्रिक सत्ता संचालित होती है।

लोकतंत्र विरोध प्रदर्शनों को दबाने से मजबूत नहीं होता। वह तब मजबूत होता है, जब विरोध प्रदर्शन संविधान के दायरे में रहकर जनमत को प्रभावित करने का माध्यम बने, न कि जनता की संप्रभुता और चुनावी जनादेश का विकल्प।

सड़कों पर उठने वाली आवाज सुनी जानी चाहिए, लेकिन संप्रभुता का अंतिम स्रोत सड़क नहीं, बल्कि जनता का लोकतांत्रिक जनादेश और संविधान ही होना चाहिए।


भारत का कायल हुआ ‘मुस्लिम वर्ल्ड लीग’, उधर जावेद अख्तर बोले – UCC लागू करना संभव नहीं

मोदी से मिलते अल-ईसा और जावेद अख्तर (साभार: सोशल मीडिया, आजतक)
मुस्लिम वर्ल्ड लीग के महासचिव शेख डॉक्टर मोहम्मद बिन अब्दुल करीम अल-ईसा भारत दौरे पर हैं। उन्होंने बुधवार (12 जुलाई 2023) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। ईसा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और अन्य धार्मिक नेताओं से मुलाकात पर खुशी जताते हुए भारत के लोकतंत्र एवं बहुलतावाद की जमकर तारीफ की। उधर, बॉलीवुड अभिनेता जावेद अख्तर को अलग तरह का दुख है।

अल-ईसा ने संबोधित करते हुए कहा, “मैं भारतीय लोकतंत्र को तह-ए-दिल से सलाम करता हूँ। मैं भारत के संविधान को सलाम करता हूँ। मैं दुनिया को सद्भावना सिखाने वाले भारतीय दर्शन और परंपरा को भी नमन करता हूँ। भारत में जो मैंने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व देखा, वह भी अपने आप में यूनिक है।”

‘Harmony of Dialogue among Religions’ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “जब भी संवाद की कमी होती है तो दो लोगों के बीच में गलतफहमी और समस्या खड़ी होती है। इसलिए संवाद का पुल बनाना आवश्यक है। सांस्कृतिक टकराव (Clash of Civilisation) को रोकने के लिए हमें अगली पीढ़ी का बचपन से ही मार्गदर्शन करना होगा और उन्हें इससे बचाना होगा।”

आतंकवाद पर बोलते हुए उन्होंने कहा, “गलतफहमी, घृणा और गलत अवधारणाओं ने कट्टरपंथ फैलाकर आतंकवाद बढ़ाने में सहयोग दिया है। अपनी ताकत को बढ़ाने वाले बहुत से नेता हेट नैरेटिव का प्रयोग करते हैं और अपनी प्रासंगिकता एवं नियंत्रण सुनिश्चित करते हैं।” उन्होंने कहा कि कुछ ही संस्थाएँ इस तरह की गलत विचार परोसते हैं।

इससे पहले 11 जुलाई 2023 को सऊदी अरब के पूर्व न्याय मंत्री अल-ईसा ने कहा था, “भारत ने हिंदू बहुल राष्ट्र होने के बाद भी धर्मनिरपेक्ष संविधान अपनाया। विभिन्न संस्कृतियों में संवाद स्थापित करना समय की माँग है। सहनशीलता जीवन का हिस्सा है। इस्लाम प्यार और संवाद के लिए खुला है।”  

अल-ईसा ने कहा, “भारत के बारे में पाकिस्तान दुष्प्रचार किया करता है। भारत में मुस्लिम और उनके मज़हब को कोई खतरा नहीं है। मुस्लिम देश इंडोनेशिया को छोड़ दें तो भारत में विश्व की सर्वाधिक मुस्लिम आबादी रहती है। इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के 33 सदस्य देशों के बराबर मुसलमान भारत में रहते हैं।”

एक तरफ सऊदी अरब के नेता भारत की तारीफ कर रहे हैं तो दूसरी तरफ जावेद अख्तर का अपना रोना है। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता (यानी अलग-अलग धर्म के लोगों के रहने की वजह से) देखते हुए भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करना संभव नहीं है।

उन्होंने कहा, “भारत एक औसत यूरोपीय देश की तरह नहीं है जहाँ एक धर्म, एक संस्कृति और एक परंपरा है। यहाँ संस्कृतियों, उप-संस्कृतियों, रीति-रिवाजों, परंपराओं की विविधता है। यह विविधता इतनी अधिक है कि यह कल्पना करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि इसे कैसे हासिल किया जा सकता है।”

भारत में अलग-अलग रीति-रिवाजों का हवाला देते हुए अख्तर ने कहा, “दक्षिण भारतीय राज्यों में एक लड़की अपने मामा से शादी कर सकती है। उत्तर भारत में यह अकल्पनीय है। इसे अनाचार माना जाएगा। समान नागरिक संहिता के तहत इन चीजों को कैसे संतुलित किया जा सकता है?”

एक्टिविस्ट बने पूर्व जजों से क्यों नहीं पूछे जाते सवाल : आलोचकों और देश विरोधी गठबंधन को जस्टिस रंजन गोगोई का जवाब

आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 
कांग्रेस अब तक अपने मतलब के हिसाब से इतिहास बनाती और बिगाड़ती आई है। लेकिन दुर्भाग्य है कि कांग्रेस को अपना ही इतिहास याद नहीं रहता। हद तो तब हो जाती है, जब संविधान, संवैधानिक संस्थाओं और लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने वाली कांग्रेस संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देने लगती है। जब उसके मन के मुताबिक कोई फैसले नहीं होते हैं, तो अपने नापाक गठजोड़ के माध्यम से जजों को बेवजह विवाद में घसीटकर उन्हें बदनाम करने की कोशिश करती है। पूर्व प्रधान न्यायाधीश और राज्यसभा सदस्य रंजन गोगोई ने बुधवार को ऐसे ही गठजोड़ पर करारा हमला किया। उन्होंने कहा कि ‘एक्टिविस्ट न्यायाधीशों’ और उन लोगों से सवाल क्यों नहीं पूछे जाते जो सेवानिवृत्ति के बाद वाणिज्यिक मध्यस्थता के कामकाज करते हैं
एक्टिविस्ट जज किसके साथ काम कर रहे हैं?
गोगोई ने इशारों – इशारों में गठजोड़ पर हमला करते हुए एक बड़ा सवाल किया, “ये एक्टिविस्ट जज किसके साथ काम कर रहे हैं? ये सब कहने के लिए उन्हें कौन प्लेटफॉर्म दे रहा है? इस पर कोई सवाल नहीं पूछा गया।”
बाकी लोगों से सवाल क्यों नहीं पूछे जाते- गोगोई
सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीशों को मिलने वाले कामकाज के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में गोगोई ने कहा कि उनकी तीन श्रेणियां होती हैं ”एक्टिविस्ट न्यायाधीश”, वाणिज्यिक मध्यस्थता का कामकाज लेने वाले और अन्य प्रकार के कामकाज लेने वाले। गोगोई ने कहा, ”तीसरी श्रेणी वालों को ही विवादों में क्यों घसीटा जाता है? दो अन्य श्रेणी के लोगों से सवाल क्यों नहीं पूछे जाते?” गोगोई एक कानूनी समाचार पोर्टल के सहयोग से नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी फाउंडेशन के पूर्व छात्रों के परिसंघ द्वारा आयोजित वेबिनार में बोल रहे थे।
किसी मकसद की बात न थोपें- गोगोई
पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं है, लेकिन एक ईमानदार, बौद्धिक और सार्थक आलोचना होनी चाहिये। उन्होंने कहा, ”व्यवस्था (न्यायिक) आलोचना के खिलाफ नहीं है और इसमें सुधार के लिए गुंजाइश है, लेकिन जहां तक किसी निर्णय का संबंध है तो उसपर ईमानदार, बौद्धिक और सार्थक बहस होनी चाहिये। किसी मकसद की बात न थोपें। यह विनाशकारी है …।”
राज्यसभा मनोनयन पर विपक्ष ने उठाया था सवाल
गोगोई के इस बयान को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राज्यसभा में उनके मनोनयन की कांग्रेस सहित विभिन्न सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने आलोचना की थी। कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों ने इसकी आलोचना करते हुए कहा था कि ‘सरकार के इस निर्लज्ज कृत्य ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को हड़प लिया है।’ पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के अनुसार, ‘जस्टिस गोगोई ने मुख्य न्यायाधीश रहते हुए रिटायरमेंट के बाद पद ग्रहण करने को संस्था पर धब्बे जैसा बताया था।’ माकपा ने इसे न्यायपालिका को कमजोर करने का शर्मनाक प्रयास करार दिया था।
पूर्व जज, वकील, पत्रकार और राजनीतिज्ञों के गठजोड़ पर हमला
जस्टिस रंजन गोगोई ने अपने बयाने के माध्यम से पूर्व जज, वकील, पत्रकार और राजनीतिज्ञों के उस गठजोड़ की ओर इशारा किया है, जो समय-समय पर अपनी साजिशों को अंजाम देते रहते हैं। मोदी सरकार के खिलाफ साजिशें करते रहते हैं। वर्ष 2018 में जब 5 जजों ने पहली बार तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी तब कुछ एजेंडा पत्रकार जैसे शेखर गुप्ता और वकील जैसे इन्दिरा जय सिंह प्रेस कॉन्फ्रेंस होने से पहले वहां मौजूद थे। सवाल उठता है कि यह प्रेस कॉन्फ्रेंस जब अचानक से हुई तो उन्हें पहले से कैसे पता था और वे उस स्थान पर कैसे मौजूद थे? ये सभी सवाल एक ही इशारा करते हैं और वह है गठजोड़ का। पूरे प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, शेखर गुप्ता को न्यायाधीशों के पीछे खड़े देखा गया। जब पत्रकारों ने जयसिंह से कुछ सवाल किए, तो उन्होंने कहा था कि वह देश के एक नागरिक के तौर पर आई हैं।
विपक्ष ने की राजनीतिकरण की कोशिश
रिपोर्ट के अनुसार उसी दिन बाद में, सीपीआई नेता डी राजा ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चेलमेश्वर के आवास का दौरा किया था। इससे स्पष्ट था कि विपक्ष ने इस मामले का राजनीतिकरण करने की भरपूर कोशिश की थी।
गठजोड़ दीमक की तरह देश को खोखला कर रहा है
हालांकि, रंजन गोगोई भी उन जजों में शामिल थे लेकिन अब गोगोई ने ही  जजों, वकीलों और पत्रकारों की मिलीभगत पर अब बोलना शुरू किया है। जस्टिस गोगोई का जजों पर सवाल उठाना दिखाता है कि किस तरह रिटायरमेंट के बाद वे इस गठजोड़ के जाल में फंस जाते हैं जो पूरे भारत में दीमक की तरह फैला हुआ है और देश को अंदर से खोखला कर रहा है।
राम मंदिर पर फैसले के खिलाफ भड़काने की कोशिश
रंजन गोगोई ने यह भी खुलासा किया कि “कुछ लोग” राम मंदिर के फैसले में भी देरी करवाना चाहते थे। यहां तक रामंदिर के पक्ष में फैसले आने के बाद कई पूर्व नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों ने एक समुदाय विशेष को न्यायपालिका के खिलाफ खुलेआम भड़काने की कोशिश की थी। 
PIL डाल कर कोर्ट का समय नष्ट किया जाता है
यह तो सभी ने देखा है कि किस तरह से बार-बार प्रशांत भूषण और हर्ष मंदर जैसे लोगों द्वारा PIL डाल कर न सिर्फ कोर्ट का समय नष्ट किया जाता है, बल्कि किसी महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर भी स्टे लगवाया जाता है। इसी तरह से देश में जारी गठजोड़ जजों को भी प्रभावित करते हैं और उन्हें अपना ऐक्टिविस्ट बना लेते हैं या वे स्वयं बन जाते है। रंजन गोगोई ने जिस तरह से वकीलों और जजों की किसी मामले को लेकर दोस्ती के बारे में सवाल किया है वह भी जजों के Conflict of Interest को दिखाता है।
देश विरोधी गठजोड़ से न्यायपालिका की मुक्ति का समय 
जिस तरह से जस्टिस रंजन गोगोई ने आलोचकों को जवाब दिया है और अपना स्टैंड लिया है, साथ ही लगातार खुलासे कर रहे हैं, उससे स्पष्ट हो गया है कि अब मोदी सरकार को पूर्व जज, वकील, पत्रकार और राजनीतिज्ञों के इस गठजोड़ को खत्म करने के लिए कदम उठाना होगा। ताकि न्यायपालिका को इस देश विरोधी गठजोड़ से मुक्ति मिल सके।
जज और फैसला मनमाफिक ना हो तो कांग्रेस करने लगती है साजिश
जस्टिस ए के सीकरी को बेवजह विवाद में घसीटकर कांग्रेस ने अपनी उस मानसिकता को उजागर कर दिया कि वो जज भी अपने माफिक चाहती है और इंसाफ भी। दरअसल जस्टिस सीकरी उस हाई पावर्ड कमेटी में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के प्रतिनिधि थे जिसमें आलोक वर्मा को सीबीआई डायरेक्टर पद से हटा दिया गया था। आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी जांच में कई संगीन आरोप सही पाए गए।


जस्टिस सीकरी सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के बाद सबसे सीनियर जज थे। उन्हें साल 2018 में केंद्र सरकार ने सी-सैट यानी कॉमनवेल्थ सचिवालय पंचाट ट्रिब्यूनल का प्रेसिडेंट/मेंबर नामित किया था। लेकिन कांग्रेस और उसके समर्थक मीडिया ने आरोप लगाया कि वर्मा को हटाने के फैसले के लिए ही जस्टिस सीकरी को ईनाम दिया गया।
हालांकि जस्टिस काटजू समेत कई हस्तियों ने कांग्रेस के आरोपों को बकवास बताया लेकिन जस्टिस सीकरी ने खुद ही इस पद के लिये मना कर दिया।

कांग्रेस ने किस तरह उसके हित में फैसले देने वाले न्यायाधीशों को इनाम दिया था।
सिख विरोधी दंगों में क्लीनचिट देने वाले जस्टिस को भेजा राज्यसभा
जस्टिस गोगोई से पहले भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश राज्यसभा के सांसद रह चुके हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि जस्टिस गोगोई जहां नामित सदस्य के तौर पर राज्यसभा सांसद बने हैं, वहीं पहले वाले जज कांग्रेस पार्टी के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे थे। इससे पहले कांग्रेस ने पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा को वर्ष 1998 में राज्यसभा के लिए भेजा था। जस्टिस मिश्रा वर्ष 1998 से 2004 तक राज्यसभा के सांसद थे। 

हिन्दुस्तान की खबर के अनुसार जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सांसद बनाए जाने पर सवाल उठे थे। उस समय कहा गया था कि 1984 के सिख विरोधी दंगों की जांच रिपोर्ट में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को क्लीनचिट देने का उन्हें इनाम दिया गया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों की जांच के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 26 अप्रैल 1985 में रंगनाथ मिश्रा आयोग बनाया था। जस्टिस मिश्रा ने अपनी रिपोर्ट में कांग्रेस को क्लीनचिट दी थी। जस्टिस मिश्रा को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का चेयरमैन भी बनाया गया था।
जगन्नाथ मिश्रा को क्लीनचिट देने वाले जस्टिस को बनाया सांसद
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बहरुल इस्लाम का मामला तो काफी दिलचस्प है। शायद यह पहला मामला है कि कोई व्यक्ति राज्यसभा सांसद बनने के बाद जज बना हो। जस्टिस बहरुल इस्लाम पहले राज्यसभा सांसद बने फिर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज बने। बहरुल इस्लाम 1962 में असम से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर राज्यसभा के लिए चुने गए।

कांग्रेस पार्टी ने उन्हें दूसरी बार 1968 में फिर राज्यसभा भेजा, लेकिन कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्हें 1972 में तत्कालीन असम और नागालैंड हाईकोर्ट (गुवाहाटी हाईकोर्ट) का जज बना दिया गया।
विकीपीडिया के अनुसार जस्टिस इस्लाम 1980 में रिटायर होने के बाद सक्रिय राजनीति में चले गए, लेकिन इंदिरा गांधी ने हाई कोर्ट के जज के रूप में रिटायर होने के 9 महीने बाद फिर से उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया। एक रिटायर जज का फिर से जज बनाने का फैसला अपनेआप में अकेला था।
ऑपइंडिया के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में उन्होंने बिहार के उस समय के कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के खि‍लाफ जालसाजी और भ्रष्टाचार के मामले में क्लीन चिट देते हुए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने से मना कर दिया था। 1983 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद उन्हें तीसरी बार कांग्रेस पार्टी ने राज्यसभा भेज दिया।

जामिया के विद्यार्थियों’ का ऐलान : "हम अल्लाह को मानते हैं, लोकतंत्र को नहीं"

Students of Jamia द्वारा शेयर किया गया फेसबुक पोस्ट
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
देशद्रोह के आरोपित शरजील इमाम के समर्थन में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों द्वारा रैली निकालने के बाद अब इन छात्रों ने ऐलान किया है कि वो लोकतंत्र को नहीं, अल्लाह को मानते हैं। 
Students of Jamia द्वारा इस तरह की पोस्ट पर हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई भाई-भाई, गंगा-यमुना तहजीब की राग रागने वाले, संविधान और लोकतन्त्र की दुहाई देने वाले, #not in my name, #award vapsi और #intolerance गैंग क्यों चुप हैं? क्या जब दूसरी तरफ से प्रतिक्रिया होने पर होश में आएंगे?  
फेसबुक पर Students of Jamia नाम के पेज ने ये पोस्ट किया है। इसमें लिखा गया है कि ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मद रसुल्लाह, लोकतंत्र के खिलाफ है।
इस पेज ने Al Haya Min Allah नाम के एक पेज को शेयर किया है। जिस पर लिखा गया है कि लोकतंत्र के सिद्धांत के विपरीत, इस्लाम जोर देकर कहता है कि हक को मेजॉरिटी के साथ परिभाषित नहीं किया गया है।
इसमें मसनद अहमद के हवाले से कहा गया है कि पैगंबर मोहम्मद ने कहा था कि कई दुष्ट लोगों के बीच धार्मिक लोग भी होते हैं। जो उनकी अवहेलना करते हैं, उनकी संख्या उनके मानने वालों की तुलना में अधिक होती है। अल्लाह सार्वजनिक रूप से स्वीकृत मेजरिटेरिज्म के खिलाफ बात करते हैं। और यदि आप उन लोगों की बातें मानते हैं तो वो आपको अल्लाह के रास्ते से गुमराह करेंगे।


एक तरफ जहाँ सीएए का विरोध करते हुए ये कहा जा रहा है कि वो लोकतंत्र और संविधान का पालन कर रहे हैं, उसकी रक्षा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जामिया के छात्रों का इस तरह से खुले तौर पर कहना कि उनके अल्लाह लोकतंत्र के खिलाफ हैं, कई सवाल खड़े करता है। जब जामिया के दंगाईयों पर पुलिस ने कार्रवाई की थी तो वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल समेत कई नेताओं ने इस पर आपत्ति जताते हुए इसे लोकतंत्र की हत्या बताया था। उनका कहना था कि लोकतंत्र कमजोर हो रहा है, मगर अब जो जामिया के छात्र कर रहे हैं, वो क्या है?
इसी जामिया के छात्रों ने असम को हिंदुस्तान से काटने की बात करने वाले शरजील इमाम के समर्थन में मार्च निकाला था। इस दौरान नारे लगाए गए थे, “शरजील तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। शरजील तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं। शरजील को रिहा करो।”
शरजील ही शाहीन बाग विरोध प्रदर्शन का मुख्य चेहरा था, जो घूम-घूम कर भड़काऊ भाषण दे रहा था। उसने मस्जिदों में आपत्तिजनक पोस्टर्स बाँटे थे। ऐसे में शरजील के समर्थन में जामिया के छात्रों का खड़ा होना संदेह पैदा करता है। मार्च के दौरान इन छात्रों ने हज़ारों शरजील इमाम पैदा करने की बात कही। इससे पहले लखनऊ में भी शरजील इमाम के समर्थन में मार्च निकालने की कोशिश की गई थी। हालाँकि योगी आदित्यनाथ की सरकार के प्रयासों के कारण ये संभव नहीं हो सका।

कांग्रेस का तेलंगाना हार पर विवादित पोस्टर

telangana congress posters
तेलंगाना में कांग्रेस के पोस्टर पर विवाद 
तेलंगाना में दूसरी बार के चंद्रशेखर राव सत्ता पर काबिज हैं। समय से पहले चुनाव कराने का उनका फैसला हिट रहा। टीआरएस के विरोध में कांग्रेस और टीडीपी ने गठबंधन चुनाव में उतरी थी। लेकिन तेलंगाना की जनता ने उन्हें नकार दिया। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद दोनों दलों ने ये आरोप लगाना शुरू किया कि के चंद्रशेखर राव की जीत लोकतंत्र का हरण है और इसके साथ ही निर्वाचन आयोग को भी निशाने पर लिया जाने लगा। ताजा मामला एक पोस्टर ने जुड़ा हुआ है जिसकी वजह से तेलंगाना की राजनीति में उबाल है। तेलंगाना बीजेपी ने कांग्रेस के पोस्टर को हिन्दू महिलाओं का अपमान बताया है। 
अवलोकन करें:--
जनता कांग्रेस से यह जानना चाहती है कि इतने वर्ष सत्ता में रहने पर किसानों की दुर्दशा क्यों? क्यों किसान कर्ज़े में डूबा? देश से गरीबी क्यों नहीं दूर हुई, जबकि तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी ने एक चुनाव केवल "गरीबी हटाओ" के नारे पर ही जीता था? कांग्रेस पार्टी हमेशा कहती है कि जवाहर लाल नेहरु ने देश में अच्छा काम करते हुए अभूतपूर्व योगदान दिया, इसी मामले पर आतिफ रशीद ने कटाक्ष कर दिया। लोकतन्त्र की निर्मम हत्या तो कांग्रेस ने भारत के पहले ही चुनाव में कर दी थी, जब उत्तर प्रदेश के रामपुर में हिन्दू महासभा के उम्मीदवार विशन सेठ ने कांग्रेस उम्मीदवार मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को लगभग 6000 मतों से हरा दिया था। जो जवाहर लाल नेहरू को बर्दाश्त नहीं हुई और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोबिन्द बल्लब पन्त को हारे हुए उम्मीदवार आज़ाद को किसी भी कीमत पर जितवाने को कहा,और पंत ने तुरन्त जिला अधिकारी को नेहरू जी की बात पूरी करने को कहा।
इस वेबसाइट का परिचय
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आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार आम चुनाव 2019 के लिए भारत का राजनीतिक स्टेज सज चुका है। सभी राजनीतिक दलों की निगाह है कि क....

तेलंगाना में चुनावी नतीजों के खिलाफ कांग्रेस ने आरपार की लड़ाई का मन बना लिया है। इस संबंध में कांग्रेस की तरफ से एक पोस्टर जारी किया गया है जो विवादों में है। तेलंगाना बीजेपी का कहना है कि विरोध के लिए जिस तरह से एक महिला के वस्त्रहरण का जिक्र किया गया है उससे हिंदू औरतों का अपमान है। इसके लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का माफी मांगनी चाहिए। 
अब मुद्दे की बात ये है कि कांग्रेस के पोस्टर में क्या कुछ दिखाया और बताया गया है। दरअसल तस्वीर में एक महिला के चीरहरण को दिखाया गया है। उस तस्वीर के जरिए बताया गया है कि कैसे महाभारत के समय द्रौपदी का चीरहरण हुआ था और कुछ वैसे ही तेलंगाना में लोकतंत्र का चीरहरण हुआ जिसके लिए निर्वाचन आयोग जिम्मेदार है। तेलंगाना में लोकतंत्र के साथ मजाक हुआ है।