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दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा : इस्लामी देश बनाना चाहता था भारत को’ – जामिया छात्र आसिफ इक़बाल का कबूलनामा

आसिफ इकबाल तन्हा
गिरफ्तार आसिफ इकबाल तन्हा (साभार: सियासत)
जैसे-जैसे नागरिकता संशोधक कानून की आड़ में हुए दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों की जाँच आगे बढ़ रही है, दंगाइयों के नापाक मंसूबे उजागर होने पर उन समस्त हिन्दुओं को शर्म आनी चाहिए, जो चंद सिक्कों और मुफ्त की कोरमा, बिरयानी  की खातिर उन्हीं के कंधे सवार होकर उन्हीं के विनाश का खेल खेल रहे थे। 
शंका है, जो लोग हिन्दू विरोधी षड्यंत्र को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर स्वांग रच रहे थे, बकरा या चिकन के साथ उस मांस को मिश्रित कर दिया हो, जो हिन्दुओं में प्रतिबंधित है। इनकी नापाक हिन्दू विरोधी हरकतों से ये लालची हिन्दू तब भी नहीं चेते, जब प्रदर्शनों और धरनों में हिन्दू एवं हिन्दुत्व विरोधी नारे लग रहे थे। और लालची हिन्दू गंगा-जमुनी तहजीब और सेकुलरिज्म जैसे भ्रमिक नारों की आड़ में अपने ही खिलाफ रची जा रही साज़िश का हिस्सा बन रहे थे। समस्त देशप्रेमी संगठनों को एकजुट होकर इन नारों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए आवाज़ उठानी चाहिए। शर्म उन नेताओं को भी आनी चाहिए जो संविधान की शपथ लेकर, देश को तोड़ने वालों का समर्थन कर रहे थे/कुछ किसी न किसी प्रकार से अभी भी कर रहे हैं। जनता को चाहिए आने वाले चुनावों में ऐसे नेताओं और उनकी पार्टियों का बहिष्कार कर ईंट का जवाब पत्थर से दें।   
खूब अपना फ्लैट बेचकर लंगर लगाने के स्वांग को मीडिया भी हवा दे रहा था, जबकि पार्टी फण्ड से ख़रीदे फ्लैट को बेचकर ये नौटंकी की गयी थी। इस्लामिक राष्ट्र बनाने वाले साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और शांति के दुश्मन बेचारे गरीब, मजलूम और शांतिदूत इतने शातिर दिमाग के थे कि हिन्दुओं के सामने कुछ बयान और हिन्दुओं के पीछे इस्लामिक राष्ट्र बनाने के लिए जद्दोजहद करने पर कवायत की जाती थी। (पढ़िए नीचे दिए लिंक) जब इन हिन्दू विरोधी दंगाइयों को पकड़ा जा रहा था, तब तुष्टिकरण और सेकुलरिज्म का शोर मचा कर Victim Card खेला जा रहा था। इनके समर्थक मुस्लिम होने की सजा देने का जहर फैलाकर वास्तविकता को छुपाने का घिनौना खेल खेल कर देश को गुमराह कर रहे थे। अब किसी की आवाज़ नहीं निकल रही कि इन पर देशद्रोह का केस दर्ज कर सख्त से सख्त सजा दी जाए। लेकिन वोट बैंक के डर से कोई नहीं बोलेगा।  
बहुत शोर मचाया जा रहा था कि "देखो मोदी देश को तोड़ रहा है, बर्बाद कर रहा है, क्या जरुरत थी इस बिल को लाकर कानून बनाने की?" आदि आदि, लेकिन दंगों की जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, असली मंसूबे सामने आ रहे हैं, वैसे तो नीयत प्रदर्शन और धरनों में ही नज़र आ गयी थी, लेकिन मीडिया ने भी अपनी TRP को बनाये रखने के लिए नज़रअंदाज करती रही। मुफ्त में कोरमा, बिरयानी और स्वादिष्ट फलों से भरपूर नाश्ता और दिनभर की दहाडी भी ने इन दंगाइयों का हौंसला आफजाई करती रही। 
UAPA के तहत गिरफ्तार जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा ने पुलिस पूछताछ के दौरान कुछ बड़े खुलासे करते हुए बताया है कि किस तरह से नागरिकता कानून (CAA) और NRC के विरोध के नाम पर उन्होंने लोगों को भड़काने के साथ बसों और घरों को जलाया था। आसिफ इकबाल तन्हा ने कहा कि वो देश को इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहता था और इसीलिए हिंदुओं को तंग कर धार्मिक भावनाएँ आहत करने की साज़िश रची।
जी न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन (SIO) के सदस्य और जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र आरोपित आसिफ इकबाल तन्हा ने पुलिस को दिए बयान में बताया की जब CAA/NRC बिल आया, तो उसे ये बिल मुसलमानों के खिलाफ लगा, जिसके बाद आसिफ इस बिल का विरोध करने के लिए जामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों के साथ जुड़ गया। आरोपित आसिफ जामिया यूनिवर्सिटी का छात्र है और 2014 से स्टूडेंट इस्लामिस्क ऑर्गेनाइजेशन (SIO) का सदस्य भी है।
दिल्ली पुलिस के हवाले से जी न्यूज़ की इस रिपोर्ट में बताया गया है- “आरोपित आसिफ इकबाल ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि ’12 दिसंबर को हम 2500-3000 लोग जामिया यूनिवर्सिटी के गेट नम्बर 7 पर मार्च कर रहे थे, उसके बाद 13 दिसंबर को शरजील इमाम भड़काऊ भाषण देते हुए चक्का जाम करने की बात कहता है। मैंने खुद लोगों को उकसाया। जामिया मेट्रो से पार्लियामेंट तक मार्च की कॉल दी, जिसमें कई संगठन हमें समर्थन देते हैं। जब हम मार्च कर रहे थे, तो पुलिस ने हमें बैरिकेड लगाकर रोक लिया। तभी मैंने कहा कि तुम आगे बढ़ो, पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं, जो हमें रोक ले। फिर इसी दौरान जब हम जबरदस्ती आगे बढ़े, तो पुलिस ने हमें रोक लिया और लाठीचार्ज हुआ, जिसमें पुलिस और छात्रों को चोट भी आई।”
जी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपित आसिफ इकबाल तन्हा ने कबूलनामे में बताया, “हमने प्लानिंग के तहत 15 दिसंबर को पार्लियामेंट तक मार्च का ऐलान किया, जिसका नाम हमने गाँधी पीस मार्च दिया, ताकि दिखने में ठीक लगे। फिर उसके बाद हम मार्च को जामिया से लेकर जाकिर नगर, बटला हाउस से होते हुए जामिया ले आए। फिर सूर्या होटल के पास पुलिस बैरिकेड लगे थे। हम जबरन बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ गए, पुलिस हमें रोकने की कोशिश की। भीड़ बेकाबू हो गई और पथराव शुरू हो गया। बसों में आग लगा दी जाती है, बहुत दंगा फसाद हो जाता है। इस दौरान JMI के कई छात्र समेत पुलिस वाले घायल हो जाते हैं।”
आरोपित आसिफ इकबाल ने कहा कि जामिया में हुई हिंसा के बाद जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी (JCC) का गठन किया गया था, जिसमें AISA, JSF, SIO, MSF, CYSS, CFI, NSUI जैसे संगठन से जुड़े लड़के शामिल थे। आसिफ ने कहा कि SIO (स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाईजेशन) के कहने पर उसने दिल्ली से बाहर के अन्य कई राज्यों में भारत सरकार के खिलाफ मुस्लिमों को सड़कों पर उतरने के लिए उकसाया था और जरूरत पड़ने पर हिंसक प्रदर्शन के लिए भी कहा था।
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साभार : यूट्यूब आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार शीर्षक देख आप सोंचगे...
आसिफ इकबाल ने दंगों को लेकर होने वाली फंडिंग पर खुलासा किया कि एलुमिनाई एसोसिएशन ऑफ जामिया मिल्लिया इस्लामिया (AAJMI) भी इस मूवमेंट में जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी के साथ थी और AAJMI और PFI से ही इस योजना की फंडिंग होती थी।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगे : जकात के फंड से भड़काए दंगे: जामिया के मीरान हैदर का कबूलनामा

मीरान हैदरजामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्र मीरान हैदर ने दिल्ली में फरवरी में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के सिलसिले में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। हैदर लालू यादव की पार्टी राजद के युवा विंग की दिल्ली इकाई का अध्यक्ष भी है। उसे दिल्ली पुलिस ने दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया था।
जी न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार, हैदर ने जाँचकर्ताओं को बताया है कि जामिया हिंसा के बाद पूर्वोत्तर दिल्ली में सांप्रदायिक दंगों की योजना बनाई गई थी। उसने पुलिस को बताया कि केंद्र सरकार के अनुच्छेद 370 हटाने, सुप्रीम कोर्ट द्वारा बाबरी मस्जिद के फैसले और फिर CAA के लागू होने से उसके मन में गुस्सा और नफरत भर गया था और उसने सरकार के खिलाफ मुसलमानों को एकजुट करने के बारे में सोचा।
अनुच्छेद 370, CAA और बाबरी का गुस्सा 
जरूरत पड़ने पर उसने केंद्र के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों के लिए तैयार रहने का भी आह्वान किया। आरोपित मीरान हैदर ने पुलिस को बताया कि वह खुद सभी राज्यों में सहायता जुटाने और सीएए-एनआरसी के खिलाफ लोगों को उकसाने के लिए गया था।
मीरान हैदर के अनुसार, दिसंबर 15, 2019 को JCC (जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी) का गठन किया गया। फिर इसी JCC के नाम से ही व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया गया, जिस पर आगे की प्लानिंग होने लगी। इसी ग्रुप में AAJMI ( Allumani Association of Jamia Milliya islamaiya) और कई छात्र संगठन भी शामिल थे।
मीरान हैदर ने दिल्ली पुलिस को बताया था कि जामिया विश्वविद्यालय के परिसर में भड़की हिंसा के बाद दंगों को लेकर साजिश रची गई थी। मीरान को दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन और दंगों के लिए भीड़ इकट्ठा करने के साथ ही अन्य व्यवस्थाओं की देखरेख करने का काम सौंपा गया था।
मुस्लिम बहुल क्षेत्र को चुना 
उसने खुलासा किया कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) ने दिल्ली में सांप्रदायिक दंगों के लिए फंड उपलब्ध कराया था। हैदर ने खुद दंगों के लिए लगभग 5 लाख रूपए इकट्ठा किए थे। हैदर ने दिल्ली पुलिस को बताया कि दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाकों जाफराबाद और सीलमपुर को पहले दंगों के लिए चुना गया था, जिसके लिए मीरान और अन्य लोगों ने चाकू, पेट्रोल और पत्थर आदि इकट्ठा किए थे।
मीरान हैदर, जिसे UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था और न्यायिक हिरासत में है, ने दंगों से पहले एक रजिस्टर तैयार किया था, जिसमें उसने इस उद्देश्य के लिए एकत्रित किए जा रहे सभी फंड्स का रिकॉर्ड रखा था।
मीरान हैदर के मुताबिक दिल्ली में दंगा करवाने के लिए सबसे पहले दिल्ली के नॉर्थ-ईस्ट सीलमपुर और जाफराबाद को ही चुना गया था, क्योंकि मुस्लिम बाहुल्य इलाके में ऐसी गतिविधियाँ चलाना उन्हे ज्यादा आसान लगा। खुद हैदर ने लोगों से चाकू, पेट्रोल और पत्थर इकठ्टा करने के लिए कहा था।
जकात के धन से किए दिल्ली में दंगे 
फंड्स की मदद से उसके निर्देश पर गैजेट्स खरीदे गए। हैदर ने बताया कि ‘ज़कात’ के रूप में जुटाए गए धन का उपयोग उसने पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए दंगों के लिए किया गया था। 
जकात से इकट्ठे किए धन से उपद्रव मचाने से एक बात उजागर हो रही है कि 'जकात सुंनते थे कि गरीब, असहाय और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को दिया है, लेकिन अब यह भ्र्म भी दूर हो गया और मालूम हुआ कि इसका उपयोग देश में अराजकता फ़ैलाने के लिए भी होता है।' इसका मतलब है कि गरीब और मजलूम कहे जाने वालों का दिमाग कितना शातिर है। आरोप सिद्ध हो रहे हैं मीरान हैदर के बयान से। अब देखना यह भी होगा कि जकात देने वालों ने तो जकात दे दी, और जेबों में कितना गया, यह जकात जमा करने वालों का ईमान। क्योकि ऐसे लोग बिना स्वार्थ के पत्ता भी नहीं छूने वाले। 
रिपोर्ट्स के अनुसार, मीरान हैदर ने खुलासा किया कि दंगे की स्क्रिप्ट को 3 हिस्सो में बाँटा गया था- पहला प्रोटेस्ट, दूसरा रोड ब्लॉक और आखिर में भयानक दंगे। दिल्ली पुलिस को दिए अपने बयान में आरोपित मीरान हैदर ने बताया की वो दंगों के पहले से ही जेनयू (JNU) के पूर्व छात्र उमर खालिद और खालिद सैफी को जानता था।
मीरान हैदर ने दिल्ली पुलिस को बताया कि वह भी 2014 से 2017 तक आम आदमी पार्टी में था, लेकिन नगर निगम चुनाव लड़ने के लिए टिकट ना मिलने पर उसने 2017 में पार्टी छोड़ दी और राजद में शामिल हो गया।

जामिया हिंसा : हर दंगाई के पास पहले से थे पत्थर, पेट्रोल बम: दिल्ली पुलिस

जामिया हिंसा, दिल्ली पुलिस
जामिया दंगे में जलती बस 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
1976 से लेकर 2020 तक दिल्ली में इतने दंगे हुए, लेकिन कभी इतनी गंभीरता से जाँच नहीं हुई, जितनी गंभीरता से आज हो रही है। वास्तव में केन्द्र में मोदी सरकार से पूर्व जितनी भी सरकारें रहीं, तुष्टिकरण के कारण किसी दंगे की सघन जाँच नहीं हुई, जिस कारण दंगाइयों के हौसले बुलंद रहे। समय ने ऐसी करवट ली, दंगाई दंगा करते वक़्त यह नहीं सोंच रहे कि "आखिर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी?" 
लाल कुआँ दिल्ली में जब उग्र मुस्लिमों ने मन्दिर पर हमला करने के अलावा घरों में घुसकर हिन्दू महिलाओं को प्रताड़ित करते समय "ला इला इल्ललला", नारा ए तकबीर, अल्लाह हु अकबर" आदि नारों से लाल कुआँ क्षेत्र गूंज उठा था, हौज़ काज़ी थाने को घेर लिया गया था, परन्तु जैसे ही दिल्ली सरकार नहीं बल्कि केन्द्र सरकार हरकत में आयी, वही लाल कुआँ क्षेत्र "हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई" और "गंगा-जमुना तहजीब" के नारों से गूंजने लगा था। 
आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं, दंगाई कोई भी हो, किसी भी धर्म अथवा जाति से बक्शा नहीं जायेगा। बेगुनाहों के खून की होली खेलने वालों को उनके उचित स्थान पर पहुँचाया जाएगा। दंगे में साज़िशकर्ताओं के घर के पक्षी तक को कुछ नहीं होता, मरने वाला बेगुनाह होता है।   
जून 4, 2020 को जामिया हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाई कोर्ट में हलफनामा दायर किया। दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया कि पिछले साल दिसंबर माह में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के ख़िलाफ हुई हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। यह ये एक सुनियोजित घटना थी। हर दंगाई के पास पहले से पत्थर, लाठी और पेट्रोल बम थे।
जामिया मिलिया इस्लामिया के कैंपस में बीते साल 13 और 15 दिसंबर को हिंसा हुई थी। दिल्ली पुलिस के वकील अमित महाजन और रजत नैयर ने जामिया हिंसा मामले में इस दौरान 6 याचिकाओं पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उस समय भीड़ का इरादा केवल कानून और व्यवस्था को बाधित करना था।
दिल्ली पुलिस की ओर से कोर्ट में कुछ वीडियोज और तस्वीरें भी सबूत के तौर पर पेश की गई। इनके जरिए बताया गया कि छात्रों के आंदोलन की आड़ में वास्विकता में कुछ लोगों ने स्थानीय लोगों की मदद से दंगा भड़काने की कोशिश की।
क्राइम ब्रांच ने कहा, “जामिया हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। बल्कि सुनियोजित घटना थी, जहाँ दंगाइयों के पास पत्थर, लाठियाँ , पेट्रोल बम, ट्यूबलाइट आदि पहले से थीं। इससे साफ होता है कि भीड़ का इरादा केवल कानून-व्यवस्था को बाधित करना था।”

जामिया हिंसा में छात्र नहीं बाहरी लोग 
जामिया हिंसा पर दायर 3 एफआईआर के मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने कहा कि 20 लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट साकेत कोर्ट में दाखिल हुई है। इनमें से कोई भी यूनिवर्सिटी का छात्र नहीं है।
जाँच में ये भी खुलासा हुआ कि स्थानीय नेताओं और राजनेताओं ने भड़काऊ नारे लगाकर प्रदर्शनकारियों को भड़काने का काम किया।
पुलिस ने बताया, “जामिया हिंसा में दंगाइयों ने गाड़ी के टायर जलाए और पुलिस की ओर फेंके। एक एंबुलेंस, जिससे एक मरीज को यूनिवर्सिटी के रास्ते ले जाया जा रहा था, उसे भी क्षतिग्रस्त किया गया। कानून को तोड़ते हुए इस भीड़ के कई समूहों ने कैंपस में एंटर किया और फोर्स के ऊपर पत्थरबाजी की।”
दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को कोर्ट से ये भी अपील की कि जामिया हिंसा मामले में अलग से जाँच करने की कोई जरूरत नहीं है। वह पहले से ही इस संबंध में व्यापक जाँच कर रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हलफनामे में पुलिस ने उन याचिकाओं को खारिज करने की भी माँग की, जिसमें छात्रों की गिरफ्तारी और चिकित्सा सहायता न दिए जाने का हवाला देकर फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी के गठन की माँग हुई थी।
पुलिस ने दिल्ली हाइकोर्ट में इन याचिकाओं को खारिज करने की माँग करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि जामिया में हुआ प्रदर्शन सिर्फ़ एक छात्र विरोध था और शांतिपूर्ण प्रदर्शन था, जो कि पूर्ण रूप से झूठ है, इसलिए इन दलीलों को अस्वीकार किया जाए।
दंगाइयों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई के संबंध में कुछ याचिका नबीला हसन, स्नेहन मुखर्जी और सिद्धार्थ द्वारा दाखिल की गई थी। इसके अलावा कुछ याचिकाएँ हिंसा के आरोपितों के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर को निरस्त करने के लिए विभिन्न वकीलों, जामिया छात्रों, ओखला निवासियों और यहाँ तक की जामा मस्जिद के इमामों द्वारा दायर की गई थी।
दिल्ली पुलिस ने उच्च न्यायालय में यह भी कहा कि असहमति के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन किसी को भी अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कानून हाथ में लेने, हिंसा भड़काने, आगजनी करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

जामिया के विद्यार्थियों’ का ऐलान : "हम अल्लाह को मानते हैं, लोकतंत्र को नहीं"

Students of Jamia द्वारा शेयर किया गया फेसबुक पोस्ट
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
देशद्रोह के आरोपित शरजील इमाम के समर्थन में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों द्वारा रैली निकालने के बाद अब इन छात्रों ने ऐलान किया है कि वो लोकतंत्र को नहीं, अल्लाह को मानते हैं। 
Students of Jamia द्वारा इस तरह की पोस्ट पर हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई भाई-भाई, गंगा-यमुना तहजीब की राग रागने वाले, संविधान और लोकतन्त्र की दुहाई देने वाले, #not in my name, #award vapsi और #intolerance गैंग क्यों चुप हैं? क्या जब दूसरी तरफ से प्रतिक्रिया होने पर होश में आएंगे?  
फेसबुक पर Students of Jamia नाम के पेज ने ये पोस्ट किया है। इसमें लिखा गया है कि ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मद रसुल्लाह, लोकतंत्र के खिलाफ है।
इस पेज ने Al Haya Min Allah नाम के एक पेज को शेयर किया है। जिस पर लिखा गया है कि लोकतंत्र के सिद्धांत के विपरीत, इस्लाम जोर देकर कहता है कि हक को मेजॉरिटी के साथ परिभाषित नहीं किया गया है।
इसमें मसनद अहमद के हवाले से कहा गया है कि पैगंबर मोहम्मद ने कहा था कि कई दुष्ट लोगों के बीच धार्मिक लोग भी होते हैं। जो उनकी अवहेलना करते हैं, उनकी संख्या उनके मानने वालों की तुलना में अधिक होती है। अल्लाह सार्वजनिक रूप से स्वीकृत मेजरिटेरिज्म के खिलाफ बात करते हैं। और यदि आप उन लोगों की बातें मानते हैं तो वो आपको अल्लाह के रास्ते से गुमराह करेंगे।


एक तरफ जहाँ सीएए का विरोध करते हुए ये कहा जा रहा है कि वो लोकतंत्र और संविधान का पालन कर रहे हैं, उसकी रक्षा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जामिया के छात्रों का इस तरह से खुले तौर पर कहना कि उनके अल्लाह लोकतंत्र के खिलाफ हैं, कई सवाल खड़े करता है। जब जामिया के दंगाईयों पर पुलिस ने कार्रवाई की थी तो वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल समेत कई नेताओं ने इस पर आपत्ति जताते हुए इसे लोकतंत्र की हत्या बताया था। उनका कहना था कि लोकतंत्र कमजोर हो रहा है, मगर अब जो जामिया के छात्र कर रहे हैं, वो क्या है?
इसी जामिया के छात्रों ने असम को हिंदुस्तान से काटने की बात करने वाले शरजील इमाम के समर्थन में मार्च निकाला था। इस दौरान नारे लगाए गए थे, “शरजील तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। शरजील तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं। शरजील को रिहा करो।”
शरजील ही शाहीन बाग विरोध प्रदर्शन का मुख्य चेहरा था, जो घूम-घूम कर भड़काऊ भाषण दे रहा था। उसने मस्जिदों में आपत्तिजनक पोस्टर्स बाँटे थे। ऐसे में शरजील के समर्थन में जामिया के छात्रों का खड़ा होना संदेह पैदा करता है। मार्च के दौरान इन छात्रों ने हज़ारों शरजील इमाम पैदा करने की बात कही। इससे पहले लखनऊ में भी शरजील इमाम के समर्थन में मार्च निकालने की कोशिश की गई थी। हालाँकि योगी आदित्यनाथ की सरकार के प्रयासों के कारण ये संभव नहीं हो सका।

क्या पुलिस का कोई मानवाधिकार नहीं?

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
क्या पुलिसकर्मियों का कोई मानवाधिकार नहीं होता? मीडिया का एक बड़ा वर्ग आजकल पत्थरबाजों, दंगाइयों, उपद्रवियों और प्रदर्शनकारियों को एक श्रेणी में रख कर उन्हें बचाने में लगा हुआ है। जब पुलिस ऐसे उत्पातियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करती है तो उलटा पुलिस को ही दोषी ठहराया जाता है, सरकार को दोष दिया जाता है और दंगाइयों का महिमामंडन किया जाता है। 
प्रश्न यह है कि आखिर किस कारण मीडिया दंगाइयों का महिमामंडन करती है? कभी मीडिया ने पुलिस पर हो रहे हमलों पर मानवाधिकार को दोषी नहीं बताया, क्यों? कश्मीर ने जब पुलिस और सुरक्षाकर्मियों पर हमले होते थे, कभी मीडिया ने प्रश्न नहीं किया कि क्यों पुलिस को निशाना बनाया जा रहा है? और जब कश्मीर में आर्मी ने एक पत्थरबाज को पकड़ जीप के आगे बांध पत्थरबाजों पर कार्यवाही करने पर मीडिया और मानवाधिकार ने आर्मी पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया, लेकिन पत्थरबाजों का किसी ने विरोध नहीं किया? 
जामिया लाइब्रेरी कांड में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कटे-छँटे वीडियो के आधार पर आरोप लगाया गया कि दिल्ली पुलिस पढ़ाई कर रहे छात्रों को पीट रही है। पूरा वीडियो आया तो पता चला कि पुलिस से बचने के लिए दंगाई लाइब्रेरी में घुस गए थे।
Image result for पुलिस पर पथरावआज सुप्रीम कोर्ट ने भी शाहीन बाग़ उपद्रव को लेकर कह दिया कि विरोध प्रदर्शन जायज है, लेकिन इसके लिए सड़क जाम कर के लोगों को परेशानी में नहीं डाला जा सकता। वहीं सुपरस्टार रजनीकांत का भी एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वो अपने बेबाक अंदाज़ में पुलिसकर्मियों पर हमला करनेवालों को लताड़ते हुए नज़र आ रहे हैं। रजनीकांत का ये वीडियो मई 2018 का है लेकिन सीएए विरोधी हिंसा मामले में ये आज भी उतना ही प्रासंगिक है, इसीलिए इसे आपको देखना चाहिए।
Image result for पुलिस पर पथरावमीडिया से बात करते हुए रजनीकांत ने कहा था कि समस्याएँ तभी शुरू हुईं, जब असामाजिक तत्वों ने वर्दीधारियों पर हमला किया। अर्थात, पुलिसकर्मियों को निशाना बनाने से ही समस्या की शुरुआत हुई। सुपरस्टार ने इस सम्बन्ध में बोलते हुए आगे कहा था:
“पुलिसकर्मियों पर हमले किए जाने को कभी सही नहीं ठहराया जा सकता है। वर्दी में ड्यूटी पर लगे पुलिसवालों पर हमले करने के पक्ष में मैं कोई भी तर्क बर्दाश्त नहीं करूँगा। मैं तो कहता हूँ कि इसके बचाव में कोई तर्क हो ही नहीं सकता।”
Image result for पुलिस पर पथरावउस समय जब मीडियाकर्मियों ने इस मसले पर रजनीकांत को घेरना चाहा तो उन्होंने धूर्त पत्रकारों डपटते हुए स्पष्ट कहा कि अगर उनके पास कोई अन्य सवाल है तो पूछें। रजनीकांत ने तभी कहा था कि अगर हर बार पर हर रोज विरोध प्रदर्शन होने लगे तो पूरा तमिलनाडु ही एक कब्रगाह में तब्दील हो जाएगा।
जामिया हिंसा मामले में उनकी बातें प्रासंगिक हैं लेकिन ये भी जानना ज़रूरी है कि उन्होंने मई 2018 में ये बयान क्यों दिया था। मई 22, 2018 को तनिलनाडु के थोट्टुकुंडी में स्टरलाइट फैक्ट्री के विरोध में 20 हज़ार लोग सड़क पर उतरे थे। इसी बीच असामाजिक तत्वों ने पुलिस पर हमला कर दिया, जिसके बाद पुलिस ने गोली चलाई। हिंसा में 13 लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए। रजनीकांत घायलों का हलचल जानने अस्पताल पहुँचे थे, तब उन्होंने ये बयान दिया था।

हाथों में पत्थर लिए जामिया PhD छात्र ने कटाए बाल, दाढ़ी, डिलीट किए अकाउंट

दिन- रविवार। तारीख- 16 फरवरी। केजरीवाल का शपथग्रहण। जामिया के वर्तमान और पूर्व छात्रों से बनी जामिया कोआर्डिनेशन कमिटी ने बहुत चालाकी से इस दिन को चुना। चुना इसलिए ताकि बीते साल 15 दिसंबर को जामिया कैंपस में हुई कथित हिंसा से जुड़े एक विडियो को छेड़छाड़ कर वायरल किया जा सके। बाकी काम वामपंथी मीडिया और लिबरल गिरोहों द्वारा कर ही दिया जाएगा। लेकिन ऐसा हो न सका। क्योंकि जिस विडियो को ये काट-छाँट कर वायरल करने की फिराक में थे, उसी का एक लंबा विडियो ऑपइंडिया के हाथ लग गया।
इसमें कथित रूप से लाइब्रेरी के भीतर कुछ लोग पुलिस यूनिफार्म में स्टूडेंट्स को लाठियों से मारते नजर आ रहे हैं। इस एडिटेड वीडियो में कुछ 7-8 लोग, जिन्हें पुलिस का बताया जा रहा है, यूनिवर्सिटी के ओल्ड रीडिंग हॉल में प्रवेश कर स्टूडेंट्स को लाठियों से मारते नजर आ रहे हैं। यह वीडियो रविवार तड़के सुबह जारी किया गया है।

मजे की बात यह है कि ट्विटर पर वीडियो जारी करने वाली यह कोआर्डिनेशन कमिटी, जिसे 15 दिसंबर को हुए एंटी CAA प्रोटेस्ट्स के नाम पर हुए दंगे के बाद बनाया गया था और जो जामिया कैंपस के साथ शाहीन बाग़ समेत कई अन्य जगहों पर भी नागरिकता कानून के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों में अग्रणी रही है, छात्रों द्वारा चुनी गई आधिकारिक स्टूडेंट्स बॉडी नहीं है।
इस वीडियो में स्पष्ट तौर पर नजर आ रहा है कि जिस समय पुलिस लाइब्रेरी में घुस रही है, उस समय ‘स्टूडेंट्स’ किताबें बंद किए बैठे हैं। दाईं तरफ बैठा ‘स्टूडेंट’ पुलिस के अंदर घुसते ही चेहरे को रुमाल से ढँकता नजर आ रहा है। वीडियो के टॉप लेफ्ट कॉर्नर में दीवार के साथ खड़ा दिखता ‘स्टूडेंट’ भी चेहरे पर रूमाल बांधे नजर आ रहा है।
जैसे ही जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी ने इस वीडियो को रिलीज किया, लिबरल सेक्युलर मीडिया गैंग के कथित पत्रकारों ने इसे हाथों-हाथ लेते हुए प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू कर दिया। मीडिया गैंग के अनुसार इस वीडियो में साफ़ नजर आ रहा है कि पुलिस ने ही पहले छात्रों पर बर्बरता दिखाई, जिसके बाद कैंपस में हिंसा भड़की।
एडिटेड वीडियो की मदद से हिंसा का सारा दोष मोदी सरकार और दिल्ली पुलिस पर डालते लेफ्ट विंग के पत्रकार नागरिकता कानून के विरोध नाम पर मुस्लिम भीड़ को पुलिस पर किए गए हमलों से बचाते नजर आते हैं।
एक ट्विटर हैंडल @cjwerleman है। यह देश विरोधी और हिन्दू विरोधी प्रोपेगेंडा के लिए कुख्यात है। इसने भी अपने मोदी विरोधी प्रोपेगेंडा को दिशा देने के उद्देश्य से यह एडिटेड वीडियो शेयर किया। इसने अपने ट्वीट में लिखा – “दिल्ली पुलिस अधिकारियों द्वारा जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों को लाइब्रेरी में पीटने का CCTV फुटेज। सरकार मुस्लिम विरोधी नागरिकता कानून के विरोध में उठने वाली हर आवाज को क्रूरता से दबा रही है।”
रेडियो जॉकी सायमा, जो कि हिन्दू विरोधी और फेक खबरों को फैलाने के लिए जानी जाती हैं, ने भी यह वीडियो फ़ौरन ट्विटर पर शेयर करते हुए मुस्लिम भीड़ के अपराधों को ढकने के लिए सारा दोष दिल्ली पुलिस के माथे थोप दिया। उन्होंने पुलिस पर व्यंग्य करते हुए लिखा है- “वो आए और उन्होंने कहा- तुम्हारे साथ, तुम्हारे लिए, हमेशा। और चले गए। 15 दिसंबर की शाम उन्होंने जामिया के छात्रों पर गुलाब बरसाए (जैसा कि आप देख सकते हैं)
इसी प्रकार की भावनाएँ कई अन्य पत्रकारों ने भी दिखाई -@AnooBhu ने लिखा- हम इसके लायक नहीं हैं, हम यह नहीं भूलेंगे।
वरदराजन उर्फ़ टुंकु (Tunku), Hoover इंस्टिट्यूट के एडिटर ने सरकार को गालियाँ देते हुए लिखा कि धार्मिक रूप से कट्टरपंथी सरकार ने छात्रों से, शिक्षा से, आधुनिकता से युद्ध छेड़ रखा है।
स्मिता शर्मा नाम की एक अन्य महिला, जो खुद को ‘स्वतंत्र’ के साथ ही ‘पत्रकार’ होने का दावा करती हैं, अपनी ख़ुशी रोक नहीं पाई और दिल्ली पुलिस के लिए अपशब्द कहने लगी। उसने कहा कि दिल्ली पुलिस पर तो धब्बा है ही, और इस कथित क्रूरता के लिए किसी भी प्रकार का स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता है। उन्होंने अपने ट्वीट में यह भी लिखा कि दिल्ली पुलिस को शर्म आनी चाहिए, पुलिस के राजनीतिक मास्टर्स तो आते-जाते रहेंगे लेकिन इस घटना ने उन पर दाग लगा दिया है।
वहीं, राणा अयूब नामक इस्लामी ट्रोल, जो पत्रकार होने की एक नकल भर है, एक कदम आगे जाकर लाइब्रेरी में नकाब लगाकर बैठे कथित छात्र को ही छुपा दिया और लिखा- “मुझे याद नहीं है कि देश के साथ मैं आखिरी बार कब इतनी निराश थी। दिल्ली पुलिस ने एक पवित्र जगह पर हेल्प-लेस छात्रों पर लाठी बरसाई। मैं अब इंडिया को नहीं पहचानती हूँ।”
इसी बीच, एक ऐसा वीडियो सामने आया है, जिसमें CAA विरोधी ‘छात्र’ को पहले सड़क पर बाइक को आग लगाने के बाद लाइब्रेरी में बैठे हुए देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि जामिया यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में बैठा यही ‘छात्र’ दोनों CCTV फुटेज में देखा जा रहा है। इस कथित छात्र ने दोनों वीडियो में लाल धारियों वाली एक स्वेटर पहनी हुई है और चेहरे को छुपाने के लिए एक ही कपड़ा इस्तेमाल किया है।
CAA के विरुद्ध जामिया संघर्ष 
दरअसल, दिल्ली में जामिया के लगभग 2,000 ‘छात्र’ CAB का विरोध कर रहे थे। CAB के खिलाफ जामिया के प्रदर्शनकारियों ने कानून का विरोध व्यक्त करने के लिए विश्वविद्यालय परिसर से संसद भवन तक मार्च निकाला था। हालाँकि इस दौरान वो हिंसा पर उतर आए और पुलिस बैरिकेड तोड़ दिए। जैसे ही पुलिस ने छात्रों को शांत करने के लिए लाठीचार्ज करना शुरू किया, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस के खिलाफ पथराव किया। छात्रों के हमले में कई पुलिसकर्मी घायल हुए हैं और तीन पुलिसकर्मी आईसीयू में गंभीर हालत में हैं।
हाथों में पत्थर लिए जामिया PhD छात्र ने कटाए बाल, दाढ़ी, डिलीट किए अकाउंट
जामिया यूनिवर्सिटी चर्चा में है। पढ़ाई नहीं पत्थरबाजी को लेकर। मारपीट और आगजनी को लेकर। CCTV फुटेज पुलिस-प्रशासन को देने के बजाय खुद के पास रखने को लेकर। एक घंटा के विडियो होने का दावा करके मात्र 5 मिनट के एडिटेड विडियो को वायरल करने को लेकर। और सबसे ज्यादा चर्चा में इसलिए है क्योंकि यहाँ के PhD वाले स्टूडेंट भी रिसर्च से ज्यादा पत्थर पर ध्यान लगाते हैं।
बीते साल 15 दिसंबर को दिल्ली के जामिया में हिंसा हुई। हिंसा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की विरोध की आड़ में की गई। सारा दोष दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार पर मढ़ा गया। लेकिन 16 फरवरी को इसी जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी हिंसा कांड से जुड़े कुछ विडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुए। पहले कुछ सेकंड वाले, बाद में कुछ मिनट वाले विडियो भी आए। सभी विडियो में पत्थरबाज जामिया स्टूडेंट्स की कलई खुलती नजर आई।
जामिया हिंसा विडियो
इन विडियो में एक चेहरा पहचान लिया गया (सूत्रों के अनुसार, जो इस चेहरे को व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं, उनके अनुसार)। जिस शख्स का चेहरा वायरल हुआ है, उसका नाम मो. अशरफ भट बताया जा रहा है। यह जामिया में PhD का स्टूटेंड है और प्रोफेसर कडलूर सावित्री के गाइडेंस में “Biometrics in India Aadhar: Governmentality , Surveillance and privacy” पेपर पर रिसर्च कर रहा है।
जामिया के छात्रों के अनुसार मो. अशरफ का कल से पहले तक फेसबुक व अन्य सोशल मीडिया पर प्रोफाइल था। लेकिन हिंसा वाले दिन का विडियो वायरल होने और तस्वीरें बाहर आते ही न सिर्फ इसने सारे प्रोफाइल डिलीट/डीएक्टिवेट कर दिए, बल्कि सूत्र बताते हैं कि उसने अपने बाल और दाढ़ी भी कटवा ली है। सूत्र की बात को स्पष्ट करने के लिए हमने प्रोफेसर कडलूर सावित्री को मेल भी किया है, जिसका जवाब रिपोर्ट लिखे जाने तक नहीं आया है।
मो. अशरफ कितना शातिर है, इसका अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है। हमने जामिया के सूत्र की बात को स्पष्ट करने के लिए कई तरह से इसके नाम को गूगल पर सर्च किया। नाम के साथ जामिया, PhD, सब्जेक्ट से लेकर और भी कई की-वर्ड का यूज किया, लेकिन नतीजा हर बार नील बटे सन्नाटा। फिर हमने नाम के साथ इमेज सर्च और इमेज से इमेज सर्च भी किया – नतीजा फिर वही! यह शख्स ने अपने हर सोशल मीडिया प्रोफाइल को डिलीट कर अंडरग्राउंड हो चुका है।
सोशल मीडिया में कुछ जगहों पर यह भी चल रहा है कि जिस लड़के के हाथ में एयरगन वाली गोली कुछ दिन पहले एक शख्स ने मारी थी, मो. अशरफ वही है। ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों की दाढ़ी है, लंबे बाल हैं। लेकिन यह केवल अफवाह है। दोनों अलग-अलग शख्स हैं।

गज़ब की स्क्रिप्ट और प्लानिंग

जिसे कथित तौर पर गोली लगी है उस से ज्यादा दर्द तो महिला के चेहरे पर दिख रहा है, और लाल बोतल को छिपाना दोनों ही कदाचित भूल गए, अब युवक को कोई दर्द इसलिए नहीं हो रहा क्योकि रंग या टोमेटो केचप लगाने से दर्द थोड़ी होता है।  
जामिया के पास जो कुछ हुआ अब उसका सच सामने आने लगा है, 2 दर्जन से ज्यादा कैमरे पहले से तैनात थे, उन्होंने आराम से HD में विडियो बनाये और तस्वीरें ली, फिर तुरंत ही बन्दुक लहराने वाले शख्स का फेसबुक अकाउंट खोज लिया गया 
और उसका नाम बताया गया "रामभक्त गोपाल", उसका जो फेसबुक अकाउंट था वो बना था 2018 में पर उसमे पहला राजनितिक पोस्ट जनवरी 2020 में किया गया, और कुछ हिन्दुवादी पोस्ट के स्क्रीनशॉट लेने के बाद उस अकाउंट को अब डिलीट कर दिया गया है 
ये 'रामभक्त गोपाल' तो पुलिस की हिरासत में है तो उसका फेसबुक अकाउंट कौन चला कर डिलीट कर रहा है, बढ़िया स्क्रिप्ट की पोल तो तब खुल गयी जब उस अकाउंट में 'रामभक्त गोपाल' ने हिन्दुवादी दिखने के लिए कुछ पेज लाइक किये थे, उनमे हिन्दुवादी नेता भी थे, पर महाशय ने इस्लामिक उन्मादी एजाज खान और भीम आर्मी के सरगना रावण के पेज भी लाइक किये हुए थे


 
लोगो ने तुरंत ही इसका भी स्क्रीनशॉट लेकर डालना शुरू किया और इस से पहले की लोग उस अकाउंट को पूरी तरह देखते, वो अकाउंट डिलीट कर दिया गया, जबकि आरोपी तो पुलिस की हिरासत में है एक चीज तो साफ़ है की जो कुछ काण्ड हुआ उस से आतंकवादी सरजील इमाम का मामला, शाहीन बाग़ में जिहाद का मामला दब सा गया, दिल्ली में कल(फरवरी 8) को वोटिंग है, और उम्मीद है की इस तरह के कई स्क्रिप्ट अभी और चलाये जायेंगे

महीनों से रची जा रही थी साज़िश ; जामिया में मिले 750 फ़र्ज़ी आईडी कार्ड

जामिया इस्लामिया, नागरिकता क़ानूनजामिया मिलिया इस्लामिया में चल रहे विरोध-प्रदर्शन के बीच एक बड़ा खुलासा हुआ है। जामिया यूनिवर्सिटी प्रशासन ने ख़ुद जानकारी दी है कि उसके कैम्पस में 750 फेक आईडी कार्ड मिले हैं। कहा गया है कि यूनिवर्सिटी में बड़ी संख्या में बाहरी लोग घुसपैठ कर रहे हैं और 750 फ़र्ज़ी आईडी कार्ड का मिलना सदेह पैदा करता है। जामिया के प्रॉक्टर ने हिंसा के लिए इसी घुसपैठ को जिम्मेदार ठहराया है। जामिया की कुलपति नज़मा अख्तर ने भी इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि यूनिवर्सिटी कैम्पस में बाहर से लोग आ रहे हैं और वो फ़र्ज़ी आईडी कार्ड बना कर रह रहे हैं।
कुलपति ने कहा कि यही घुसपैठिए हिंसा फैला कर जामिया के छात्रों को बदनाम भी कर रहे हैं। पिछले 3 महीनों के अंदर 750 फ़र्ज़ी आईडी कार्ड बरामद किए गए हैं। इससे पता चलता है कि जामिया में हो रही हिंसा की साजिश पिछले 3 महीने से रची जा रही थी। हिंसा भड़काने की तैयारी काफ़ी पहले से थी और संशोधित नागरिकता क़ानून के रूप में उन्हें एक नया हथियार मिल गया। अब सवाल यह उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में फ़र्ज़ी आई कार्ड मिलने के बाद क्या पुलिस में इसकी शिकायत की गई? अगर शिकायत हुई तो पुलिस की जाँच में क्या निकला?

पुलिस के बयान से भी इसके पीछे बड़ी साज़िश की बू आती है। साउथ ईस्ट दिल्ली के एडिशनल डीसीपी कुमार ज्ञानेश ने कहा कि पुलिस ने जब आँसू गैस के गोले छोड़े, तब उससे बचने के लिए प्रदर्शनकारियों ने भींगे हुए कम्बलों का प्रयोग किया। ये उनके पास बड़ी तादाद में थे। इससे पता चलता है कि वो पूरी तैयारी के साथ आए थे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ये विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक नहीं था, बल्कि जो कुछ भी हिंसक वारदातें हुईं उसकी पहले से योजना बनाई गई थी।
फ़िलहाल जामिया नगर में हुई हिंसा के मामले में मंगलवार (दिसंबर 17, 2019) को 10 लोगों को गिरफ़्तार किया है। ऊपर संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर लगातार प्रदर्शनकारी छात्रों से अपील कर रहे हैं कि वे पत्थरबाजी न करें लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। पुलिस ने पूरी तरह संयम का परिचय दिया लेकिन 4 बसों को जलाए जाने और 100 से भी अधिक वाहनों को क्षतिग्रस्त किए जाने के बाद पुलिस को हालात पर काबू पाने के लिए जामिया कैम्पस में प्रवेश करना पड़ा।

जामिया मिलिया के बाहर ANI पत्रकारों पर हमला, हॉस्पिटल भेजे गए: अन्य रिपोर्टरों से भी हो चुकी है बदसलूकी

तस्वीर ANI से साभारनागरिकता विधेयक में संशोधन के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन की नकली परतें उतर रहीं हैं, और असली चेहरा सामने आ रहा है। पहले ‘शांतिपूर्ण’ की परत उतरी, और प्रदर्शनकारियों ने पथरबाज़ी शुरू कर दी। फिर ‘सेक्युलर’ की परत उतरी, जब “हिन्दुओं से आज़ादी” के नारे लगे, और अपनी बात साबित करने के लिए (अंग्रेज़ी में कहें तो, टु ड्राइव होम ए पॉइंट) प्रदर्शन स्थल पर हुजूम ने नमाज़ पढ़ी, मुहर्रम की तरह नंगे बदन ‘मातम’ मनाने तथाकथित छात्र सड़क पर उतर पड़े।
अब ‘लोकतान्त्रिक’ का भी नकली मुलम्मा उतर कर गिर गया है, जब ‘लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ’ बताए जाने वाले मीडिया पर हमला हो रहा है। वह भी केवल इसलिए, क्योंकि मीडिया ने वह करने की ‘जुर्रत’ की, जो उसका काम है- लोगों का, प्रदर्शनों का सच कवर करना। 
ABP News की महिला के साथ बदसलूकी 
समाचार एजेंसी एएनआई के दो कर्मचारियों पर आज (16 दिसंबर, 2019 को) दोपहर हमला कर दिया गया, जब वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों को कवर करने गए थे।

एएनआई के पत्रकार और कैमरामैन पर हमला यूनिवर्सिटी के गेट नंबर-1 के पास हुआ।

पत्रकार उज्जवल रॉय और कैमरामैन सरबजीत सिंह को होली फैमिली हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है।

दिल्ली पुलिस के पब्लिक रिलेशंस अफ़सर एमएस रंधावा ने घटना के बारे में कहा है कि फ़िलहाल हमलावरों की शिनाख्त नहीं हो पाई है, लेकिन पुलिस उनकी पहचान ढूँढ़ निकलेगी और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

इस विरोध प्रदर्शन के दौरान मीडिया पर हमले की यह पहली घटना नहीं है। आज दिन में ही उनके एबीपी न्यूज़ की पत्रकार से भी बदसलूकी का भी वीडियो सामने आया था। इसके पहले भी जब 13 दिसंबर को प्रदर्शन शुरू हुए थे तो एक समूह ने पत्रकारों पर हमला कर दिया था, घेर लिया था और उनके काम में बाधा डालने की भरपूर कोशिश की थी- उनके कान पर खड़े हो कर चिल्ला रहे थे, ताकि पत्रकार न अपने फ़ोन पर बात कर पाए, न ही माइक में कुछ बोल पाए। इसके अलावा ज़ी न्यूज़ के पत्रकार राहुल सिन्हा ने दावा किया था कि अन्य दो मीडिया कर्मियों को मारने-पीटने के बाद उनके चैनल के पत्रकारों को बाकायदा निशाना बनाकर ढूँढ़ा जा रहा था

जामिया हिंसा: कुमार विश्वास ने AAP पर साधा निशाना

जामिया हिंसा: कुमार विश्वास ने AAP पर साधा निशाना- दिल्ली को आग में झोंकने वाले वक़्त तेरा हिसाब करेगाकवि कुमार विश्वास ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में पुलिस-छात्र झड़प के लिए आम आदमी पार्टी पर हमला बोला है. कुमार विश्वास ने ट्वीट कर केजरीवाल पर आरोप लगाया है कि सत्ता के लिए ये देश-सेना-जनता-सिद्धांत-बच्चे-दोस्त-माँ,बाप कुछ भी दांव पर लगा सकते है. साथ ही उन्होंने लिखा है "आदतन कमीनेपन को लागू करने के लिए फिर एक बार अपने उसी “अमानती गुंडे” का इस्तेमाल? नस-नस से वाक़िफ़ हूं बौने,पता है कि अपनी टुच्ची सी कुर्सी व सत्ता के लिए देश-सेना-जनता-सिद्धांत-बच्चे-दोस्त-मां,बाप कुछ भी दांव पर लगा सकता है! दिल्ली को आग में झोंकने वाले वक़्त तेरा हिसाब करेगा"

भाजपा ने भी रविवार को दक्षिणी दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हिंसा के लिए आम आदमी पार्टी (आप) को जिम्मेदार ठहराया था और मांग की थी कि वह ‘लोगों को उकसाना' बंद करे. हालांकि, आप ने इससे इनकार किया था दिल्ली भाजपा प्रमुख मनोज तिवारी ने एक ट्वीट में कहा था कि आप के एक विधायक जनता को ‘उकसा' रहे थे. उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ‘गद्दार'  बताया था. मनोज तिवारी ने लिखा था, ‘‘अरविंद केजरीवाल के इशारे पर आप का विधायक जनता को भड़का रहा है. भारत का मुसलमान भारत के साथ है, तुम जैसे गद्दारों की बातों में आने वाला नहीं. लोगों को उकसाना बंद करो. दिल्ली की जनता गद्दारों को सबक सिखाएगी. आप का पाप सामने आ रहा है.'' यद्यपि ओखला विधायक अमानतुल्ला खान उनके ऊपर लग रहे आरोपों को गलत बताया था.
दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में नागरिकता क़ानून के विरोध में चल रहे प्रदर्शन के दौरान पुलिस और छात्रों के बीच झड़प हो गयी थी जिसके बाद जमकर राजनीतिक बयानवाजी तेज हो गयी है.

रेडियो मिर्ची की RJ सायमा ने पहले लोगों को पुलिस मुख्यालय घेरने के लिए बुलाया, फिर ट्वीट डिलीट कर भागी

RJ सायमा
RJ सायमा
रेडियो मिर्ची की रेडियो जॉकी (RJ) सायमा ने दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर विरोध-प्रदर्शन करने के लिए भीड़ जुटाने के लिए अपने ट्विटर हैंडल का इस्तेमाल किया। उन्होंने ट्वीट कर दिल्ली के लोगों को पुलिस मुख्यालय के बाहर बड़े पैमाने पर इकट्ठा होने का आग्रह किया, जिससे ‘दिल्ली पुलिस द्वारा’ हिंसा के ख़िलाफ़ ‘शांतिपूर्ण ढंग से विरोध किया जा सके।’
दिल्ली पुलिस को जामिया नगर में प्रदर्शनकारियों द्वारा की जा रही हिंसात्मक गतिविधियों पर विराम लेने के लिए सख़्ती से कार्रवाई करनी पड़ी। बता दें कि जामिया मिलिया इस्लामिया में CAB के विरोध में सरकारी सम्पत्ति को नुक़सान पहुँचाते हुए बसों में आग लगा दी और मज़हबी नारे भी लगाए गए। इसके बाद सायमा ने ITO स्थित दिल्ली पुलिस के पुराने मुख्यालय पर एकजुट होने का आह्वान किया।

सायमा के इस ट्वीट के बाद, यूज़र्स ने रेडियो चैनल रेडियो मिर्ची कंपनी से पूछा कि क्या वो भी सायमा के विचारों का समर्थन करती है।

सायमा, जो आम आदमी पार्टी की समर्थक हैं, वो हमेशा से अरविंद केजरीवाल के समर्थन में काफ़ी मुखर रही हैं।

इससे पहले, सायमा शेहला रशिद के समर्थन में उतरीं थी, जब उन्होंने (शेहला) रिपब्लिक भारत टीवी चैनल के एक पत्रकार को लताड़ लगाई थी।

भाजपा दिल्ली के प्रवक्ता ने भी ट्वीट किया कि वह यह सुनिश्चित करेंगे कि भाजपा दिल्ली आगामी चुनावों के दौरान रेडियो मिर्ची को कोई विज्ञापन नहीं देगी।

हालाँकि, बाद में, सायमा ने भीड़ जुटाने वाले अपने इस ट्वीट को अब डिलीट कर दिया है।