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मुस्लिम नरसंहार के लिए मोदी सरकार कर रही कोरोना का इस्तेमाल: अरुंधति रॉय

अरुंधति रॉय, कोरोना वायरस
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि कोरोना जिसने विश्व में अपनी चादर फैला रखी है, कहीं हिन्दू-मुस्लिम नहीं हो रहा, लेकिन भारत में हिन्दू-मुसलमान ढूंढा जा रहा है, कोरोना को मोदी सरकार का मुस्लिम संहार के लिए प्रयोग कर रही है, और इस जहर को वामपंथी मीडिया फ़ैलाने के लिए दिन-रात एक किए हुए है। वामपंथी यह घिनौना काम इसलिए कर रहे हैं क्योकि यह वैश्विक बीमारी कहीं और से नहीं बल्कि वामपंथियों की जन्मस्थली चीन से फैली है। 
भारत में वामपंथी हिन्दू-मुसलमान करने का साहस तो कर सकते हैं, लेकिन चीन में मुसलमान नहीं इस्लाम पर हो रहे कुठाराघातों के विरुद्ध किसी वामपंथी में लिखना तो दूर बोलने तक का साहस नहीं। कुछ दिनों बाद रमजान हैं, देखते हैं रोजा न रखने पर कितने वामपंथी चीन सरकार के विरुद्ध लिखते अथवा मुंह खोलते हैं? 
घनघोर वामपंथन अरुंधति रॉय को भारतीय मीडिया में अब कवरेज नहीं मिल रहा है। ऐसे में उन्होंने अपना प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए एक जर्मन मीडिया संस्थान का सहारा लिया। ‘डीडब्ल्यू न्यूज़’ को इंटरव्यू देते हुए अरुंधति ने न सिर्फ़ भारत में कोरोना वायरस के प्रसार को लेकर अफवाह फैलाई, बल्कि मोदी सरकार को बदनाम करने के चक्कर में लोगों के बीच डर का माहौल बनाने का भी प्रयास किया। बिना किसी सबूत के उन्होंने भारत में कोरोना के आँकड़ों को ग़लत बताना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि ये आधिकारिक आँकड़े मोदी सरकार के हैं, वो इस पर जरा भी विश्वास नहीं करतीं।
इसके बाद अरुंधति अपना वही पुराना ‘हिन्दू-मुस्लिम विवाद’ और ‘मुस्लिमों पर अत्याचार’ वाला राग लेकर बैठ गईं और कहा कि कोरोना के कारण भारत की ‘पोल खुल गई’ है। उन्होंने दावा किया कि भारत न सिर्फ़ कोरोना वायरस, बल्कि घृणा और भूख से भी बेहाल है। उन्होंने कहा कि कोरोना के कारण मुस्लिमों के ख़िलाफ़ घृणा में बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को भी मुस्लिमों के नरसंहार करार दिया और कहा कि उसके बाद से ही घृणा में बढ़ोतरी हुई है। वो यहाँ तक झूठ बोल बैठीं कि दिल्ली में हुए दंगे सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर अत्याचार के रूप में हुए थे।
जमातियों को बचाने पगलाई 
अरुंधति रॉय का ये बयान तबलीगी जमात वालों को बचाने की मुहिम सी लगती है, जिन्होंने देश भर में कोरोना फैलाया। दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ में हज़ारों मुसलमानों का जुटना और फिर लॉकडाउन तोड़ने वाली हरकत छिपी नहीं है। जगह-जगह मुसलमानों के मोहल्ले में पुलिस और मेडिकल टीम पर हमले हुए। इसलिए, अरुंधति एक ऐसा नैरेटिव बनाना चाह रही हैं, जैसे मुस्लिमों पर ही अत्याचार हुआ हो। ताज़ा हिंसा की घटनाओं को देखें तो स्पष्ट है कि कई मुसलमान इसे ‘काफिरों को दिए सज़ा’ के रूप में देख रहे हैं।
तबलीगी जमात का मुख्यालय भारत में कोरोना का हॉटस्पॉट बन गया। जमातियों ने पुलिस व प्रशासन के साथ सहयोग नहीं किया। जमातियों को खोजने गई पुलिस पर हमले हुए। उनके मोहल्लों में मेडिकल टेस्ट करने गए स्वास्थ्यकर्मियों को खदेड़ दिया गया। इन सबका दोषी कौन है? क्या अरुंधति रॉय इसे ही ‘मुसलमानों के ख़िलाफ़ अत्याचार’ मानती हैं? दिल्ली दंगों को लेकर उनके दावे झूठे हैं, क्योंकि ताहिर हुसैन जैसों की हरकतों पर उन्होंने चुप्पी साध ली। दिल्ली में हुए दंगे शाहीन बाग़ और जाफराबाद में मुस्लिम भीड़ द्वारा सड़कों पर कब्ज़ा किए जाने और स्थानीय लोगों को लगातार परेशान करने के बाद हुआ। पेट्रोल बम भी उन्होंने ही फेंके।
अरुंधति का दावा है कि मोदी सरकार कोरोना की आड़ में मीडिया को दबा रही है। युवा नेताओं को गिरफ़्तार किया जा रहा है और विरोधियों को कुचला जा रहा है। वो राजद छात्र नेता हैदर की ओर इशारा कर रही थीं, जिसे दिल्ली दंगों में उसकी भूमिका के कारण गिरफ्तार किया गया है। अरुंधति दंगा करने वालों पर कार्रवाई का विरोध करती हैं। साथ ही वे जिन पत्रकारों और कथित एक्टिविस्ट्स की बात कर रही हैं, उनमें से कई हिंसा फैलाने के आरोपित हैं। किसे नहीं पता कि भीमा-कोरेगाँव हिंसा मामले में जो आज जेल में हैं, वो भी एक्टिविस्ट्स ही कहे जाते हैं।
अरुंधति इसके बाद आरएसएस को गाली बकने लगीं। उन्होंने कहा कि भाजपा और संघ भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। यहाँ तक कि वो हिटलर के नाजी काल से मोदी सरकार की तुलना करने लगीं और कहा कि जैसे जर्मनी में उस दौर में यहूदियों के नरसंहार के लिए तिकड़म आजमाए जाते थे, ठीक उसी तरह आज कोरोना का इस्तेमाल भारत में किया जा रहा। जबकि, मुल्ला-मौलवियों ने ही अधिकतर सरकारी दिशा-निर्देशों को धता बताते हुए मेडिकल सलाहों का मखौल उड़ाया। मोदी सरकार कोरोना से प्रभावी तरीके से निपट रही है, ऐसे में अरुंधति का ‘नाजी कार्ड’ खेलना वामपंथियों का पुराना पेशा है।
ये वामपंथी ‘नरसंहार’ जैसे शब्द का ऐसे प्रयोग करते हैं, जैसे किसी को एक थप्पड़ लगने का मतलब भी यही हुआ। उन्होंने झूठा आरोप लगाया कि मोदी सरकार मुसलमानों के लिए डिटेंशन सेंटर बनवा रही है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे अरुंधति रॉय फिक्शन लिखते-लिखते कथा-कहानियों की दुनिया में ही जीने लगी हैं। अरुंधति रॉय फेक न्यूज़ फैलाने वाले और झूठे फैक्ट चेकिंग करने वाले ‘ऑल्टन्यूज़’ को भी डोनेशन देती रही हैं।
TheTelegraph का झूठ: दलित का खाना मुसलमान ने नहीं खाया
मीडिया का प्रोपेगेंडा कैसे काम करता है, इसको TheTelegraph के झूठ से समझिए। TheTelegraph का झूठ विचार को लेकर नहीं बल्कि पत्रकारिता के साथ है, खबरों के साथ है। भ्रामक हेडलाइन, गुमराह करने वाली तस्वीरें और बेहद अतार्किक आँकड़े, दक्षिणपंथी सत्ता-विरोधी मीडिया गुटों का यह प्रमुख हथियार हमेशा से ही रहा है। लेकिन यह चिंता का विषय तब बन जाता है, जब द टेलीग्राफ़ (The Telegraph) जैसे प्रोपेगेंडा-प्रमुख, कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के बीच भी ऐसे कुत्सित प्रयास करने से बाज नहीं आते।
द टेलीग्राफ़ ने उत्तर प्रदेश की एक घटना में 3 तरह की कलाकारी कर के पेश की हैं –
शीर्षक – खबर का शीर्षक है: “क्वारंटाइन में भी अस्पृश्यता” (Untouchability, even in quarantine)
फीचर फोटो – इस खबर के साथ बेहद अप्रासंगिक तस्वीर लगाई गई है, जिसमें कि आरएसएस की ड्रेस पहने कुछ लोग खाना खिला रहे हैं।
आरोपित का नाम – इस घटना में दलित से खाना ना लेने वाले का नाम सिराज अहमद है, जो कि ना ही खाना परोसने वाला आरएसएस कार्यकर्ताओं में से एक है, ना ही पीड़ित दलित! सिराज वह आदमी है, जिसने दलित प्रधान के हाथों से खाना लेने से इनकार कर दिया था।

दलित महिला प्रधान द्वारा भोजन नहीं करने पर सिराज अहमद पर केस 
वास्तव में, यह घटना गत 10 अप्रैल को घटी है। घटना उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले की है, जहाँ ग्राम प्रधान लीलावती देवी ने भुजौली खुर्द गाँव के स्कूल में बने क्वारंटाइन सेंटर में रसोईया ना होने की वजह से खुद ही क्वारंटाइन में रखे गए पाँच लोगों के लिए खाना बनाया था।
द टेलीग्राफ़ ने उत्तर प्रदेश में एक व्यक्ति द्वारा दलित से खाना ना लेने की घटना को बेहद भ्रामक तरह से पेश करने का नया कारनामा किया है। इसमें उसने आरएसएस की छवि खराब करने का एक और असफल प्रयास किया है। लेकिन, अब कम से कम यह तो स्पष्ट है कि दलितों की तुलना कोरोना वायरस से करने वाले द टेलीग्राफ के लिए अस्पृश्यता और छुआ-छूत समाजिक चिंतन से कहीं अधिक उसके अपने निजी प्रोपेगेंडा का हिस्सा है और इससे अधिक कुछ नहीं।
इस घटना के बाद ग्राम प्रधान ने उप जिलाधिकारी देश दीपक सिंह और खंड विकास अधिकारी रमाकांत यादव को इस बारे में सूचना दी और पुलिस से लिखित शिकायत की। उन्होंने बताया कि इस मामले में सिराज अहमद के खिलाफ दलित अत्याचार विरोधी अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है।
इन पाँच लोगों में से 2 मुस्लिम थे। इनमें से एक सिराज अहमद नाम के व्यक्ति ने दलित के हाथ बना खाना खाने पर बिरादरी से बहिष्कृत हो जाने की बात कहकर भोजन करने से इंकार कर दिया था।
TheTelegraph का झूठ 
बंगाल से छपने वाले इस दैनिक अंग्रेजी ‘द टेलीग्राफ’ ने इस एक खबर के जरिए कई निशाने साधने की कोशिश की है। सबसे पहला मकसद तो यह कि लोगों का ध्यान खींचने में सफलता। क्योंकि भारत में ‘कॉन्ग्रेस काल’ से वैचारिकता दासता का प्रतीक यह तथाकथित समाचार पत्र निरंतर ही ऐसी हरकतें करता आया है, जिस कारण यह चर्चा का विषय बना रहा।
हाल ही में यही वामपंथी अखबार देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पर अपमानजनक और जातिसूचक व्यंग्य करते हुए उन्हें वायरस तक कह चुका है। अब द टेलीग्राफ़ के दोगले स्तर की पहचान यहीं पर की जा सकती है, कि महज कुछ दिन पहले ही समाज के वंचित समुदाय के किसी व्यक्ति को उसकी निजी गरिमा और पद को नजरअंदाज करते हुए उन्हें ‘वायरस’ तक कह देता है और कुछ ही दिन में अस्पृश्यता जैसे गंभीर विषय पर ज्ञान देते हुए एक हेडलाइन में बेचता नजर आता है।
द टेलीग्राफ के लिए अपनी विषैली मानसिकता के प्रसार के लिए तथ्यों से लेकर नैरेटिव को लेकर झूठ और भ्रम परोसना कोई नई बात नहीं है, वह सावरकर से लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पर अपमानजनक व्यंग्य करता हुआ पाया गया है।
एक सबसे बड़ा ध्येय जो टेलीग्राफ का इस खबर के पीछे रहा, वह ये कि आरएसएस की छवि को धूमिल करने का प्रयास! इस रिपोर्ट में द टेलीग्राफ ने सभी बातों से ऊपर फीचर इमेज के लिए चुनी गई तस्वीर को रखा है, जिसमें आरएसएस के लोगों को खाना परोसते हुए दिखाया गया है, ताकि पहली दृष्टि में भ्रामक शीर्षक के साथ यही सन्देश जाए कि सिराज अहमद ने नहीं बल्कि खाना परोसने में आरएसएस लोगों को साथ जातिगत भेदभाव कर रहा है।
वास्तविकता तो यह है कि आरएसएस के कार्यकर्ता देशभर में क्वारंटाइन में भी वंचित, बेसहारा और भूखे लोगों को राशन उपलब्ध कराने से लेकर लोगों को हर प्रकार की मदद उपलब्ध करवा रहा है। लेकिन द टेलीग्राफ यहाँ पर बस यही साबित करता नजर आता है कि वह एक ‘घृणोपजीवी’ है और वह कभी भी विरोधी विचारधारा के कार्यों से संतुष्ट नहीं रहेगा। क्योंकि यदि वह ऐसा समझौता करता है, तो उसका अस्तित्व ही कुछ शेष नहीं रह जाता।
कश्मीरी पत्थरबाजों के बाद अब डॉक्टरों पर पत्थर फेंकने वालों के समर्थन में
भारत में कोरोना को फैलाने में तबलीगी जमात के लोगों की भूमिका स्पष्ट तौर पर सामने आई है। देश भर में कोरोना मरीजों की कुल संख्या के 30 प्रतिशत का जुड़ाव तबलीगी जमात से है। उत्तर प्रदेश और दिल्ली में तो यह आंकड़ा 60 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। लेकिन, संकट के इस दौर में लोगों की मदद करने की बजाय अरुंधति रॉय जैसी कथित बुद्धिजीवी अपने जहरीले बयानों से एक खास वर्ग को उकसाने के काम में जुटी हैं। और भी दुखदायी यह है कि अरुंधती जैसे लोग यह काम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कर रहे हैं। ये वही लोग हैं जो कोरोना का इलाज कर रहे डॉक्टरों पर होने वाले हमलों पर चुप्पी साधे रखते हैं। जर्मन न्यूज एजेंसी नेटवर्क डॉचे वेले को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि कोरोना संकट से निपटने की सरकार की रणनीति भारत में मुस्लिमों के खिलाफ नरसंहार के हालात पैदा कर रही है। अरुंधती के इस बयान को पाकिस्तान के पीटीवी ने प्रमुखता से दिखाया और इसे भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने में जुटा है। यह पहला मौका नहीं है जब अरुंधती ने देश के खिलाफ विषवमन किया हो। कश्मीरी पत्थरबाजों से लेकर अफजल गुरु और एनपीआर तक पर अरुंधती का रुख देश के खिलाफ रहा है।
देश को धता बताते अरुंधती के बोल
  • NPR पर जानकारी मांगी जाए तो अपना नाम रंगा-बिल्ला बताइए
  • कश्मीर समस्या का एकमात्र हल कश्मीर की आजादी है
  • 70 लाख भारतीय सैनिक मिलकर ‘आजादी गैंग’ को हरा नहीं पाते
  • अफजल गुरु के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे
  • 1998 में अटल सरकार का परमाणु परीक्षण करना गलत था। (एजेंसीज इनपुट्स सहित)
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चीन से निकला कोरोना वायरस विश्व अर्थव्यवस्था को जरूर प्रभावित कर रहा है, वैसे भारत भी इससे अछूता नहीं। लेकिन जिस त.....

क्या पुलिस का कोई मानवाधिकार नहीं?

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
क्या पुलिसकर्मियों का कोई मानवाधिकार नहीं होता? मीडिया का एक बड़ा वर्ग आजकल पत्थरबाजों, दंगाइयों, उपद्रवियों और प्रदर्शनकारियों को एक श्रेणी में रख कर उन्हें बचाने में लगा हुआ है। जब पुलिस ऐसे उत्पातियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करती है तो उलटा पुलिस को ही दोषी ठहराया जाता है, सरकार को दोष दिया जाता है और दंगाइयों का महिमामंडन किया जाता है। 
प्रश्न यह है कि आखिर किस कारण मीडिया दंगाइयों का महिमामंडन करती है? कभी मीडिया ने पुलिस पर हो रहे हमलों पर मानवाधिकार को दोषी नहीं बताया, क्यों? कश्मीर ने जब पुलिस और सुरक्षाकर्मियों पर हमले होते थे, कभी मीडिया ने प्रश्न नहीं किया कि क्यों पुलिस को निशाना बनाया जा रहा है? और जब कश्मीर में आर्मी ने एक पत्थरबाज को पकड़ जीप के आगे बांध पत्थरबाजों पर कार्यवाही करने पर मीडिया और मानवाधिकार ने आर्मी पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया, लेकिन पत्थरबाजों का किसी ने विरोध नहीं किया? 
जामिया लाइब्रेरी कांड में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कटे-छँटे वीडियो के आधार पर आरोप लगाया गया कि दिल्ली पुलिस पढ़ाई कर रहे छात्रों को पीट रही है। पूरा वीडियो आया तो पता चला कि पुलिस से बचने के लिए दंगाई लाइब्रेरी में घुस गए थे।
Image result for पुलिस पर पथरावआज सुप्रीम कोर्ट ने भी शाहीन बाग़ उपद्रव को लेकर कह दिया कि विरोध प्रदर्शन जायज है, लेकिन इसके लिए सड़क जाम कर के लोगों को परेशानी में नहीं डाला जा सकता। वहीं सुपरस्टार रजनीकांत का भी एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वो अपने बेबाक अंदाज़ में पुलिसकर्मियों पर हमला करनेवालों को लताड़ते हुए नज़र आ रहे हैं। रजनीकांत का ये वीडियो मई 2018 का है लेकिन सीएए विरोधी हिंसा मामले में ये आज भी उतना ही प्रासंगिक है, इसीलिए इसे आपको देखना चाहिए।
Image result for पुलिस पर पथरावमीडिया से बात करते हुए रजनीकांत ने कहा था कि समस्याएँ तभी शुरू हुईं, जब असामाजिक तत्वों ने वर्दीधारियों पर हमला किया। अर्थात, पुलिसकर्मियों को निशाना बनाने से ही समस्या की शुरुआत हुई। सुपरस्टार ने इस सम्बन्ध में बोलते हुए आगे कहा था:
“पुलिसकर्मियों पर हमले किए जाने को कभी सही नहीं ठहराया जा सकता है। वर्दी में ड्यूटी पर लगे पुलिसवालों पर हमले करने के पक्ष में मैं कोई भी तर्क बर्दाश्त नहीं करूँगा। मैं तो कहता हूँ कि इसके बचाव में कोई तर्क हो ही नहीं सकता।”
Image result for पुलिस पर पथरावउस समय जब मीडियाकर्मियों ने इस मसले पर रजनीकांत को घेरना चाहा तो उन्होंने धूर्त पत्रकारों डपटते हुए स्पष्ट कहा कि अगर उनके पास कोई अन्य सवाल है तो पूछें। रजनीकांत ने तभी कहा था कि अगर हर बार पर हर रोज विरोध प्रदर्शन होने लगे तो पूरा तमिलनाडु ही एक कब्रगाह में तब्दील हो जाएगा।
जामिया हिंसा मामले में उनकी बातें प्रासंगिक हैं लेकिन ये भी जानना ज़रूरी है कि उन्होंने मई 2018 में ये बयान क्यों दिया था। मई 22, 2018 को तनिलनाडु के थोट्टुकुंडी में स्टरलाइट फैक्ट्री के विरोध में 20 हज़ार लोग सड़क पर उतरे थे। इसी बीच असामाजिक तत्वों ने पुलिस पर हमला कर दिया, जिसके बाद पुलिस ने गोली चलाई। हिंसा में 13 लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए। रजनीकांत घायलों का हलचल जानने अस्पताल पहुँचे थे, तब उन्होंने ये बयान दिया था।

जामिया मिलिया प्रशासन CCTV फुटेज क्यों नहीं दे रहा?

दिल्ली पुलिस, जामिया मिल्लिया इस्लामिया
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
नागरिकता कानून का विरुद्ध करने वाले जामिया मिलिया के छात्रों द्वारा पुलिस पर पत्थराओ करने पर कार्यवाही करने पर, सारे तुष्टिकरण पुजारी एकजुट होकर मजलूम, असहाय, निर्दोष और गरीब छात्रों पर पुलिस द्वारा कैंपस में घुसकर की जाने वाली कार्यवाही पर दिल्ली से लेकर पूरे भारत में उपद्रव मचा दिया। लेकिन जब पुलिस दूध का दूध और पानी का पानी करने कैंपस में लगे CCTV के फुटेज लेने गयी, क्यों नहीं दिए? क्या उनसे छेड़छाड़ कर पुलिस को दिए जाएंगे? क्या कारण है फुटेज लेने से पुलिस को रोका गया? जो इस बात को प्रमाणित करता है कि कैंपस के अन्दर से पुलिस पर पत्थराओ किया गया था, और मुस्लिम तुष्टिकरण पुजारी अपने वोटबैंक की खातिर देश की कानून व्यवस्था को धूमिल करने में व्यस्त रहे। जामिया प्रशासन और वोट के भूखे नेता अन्य जगहों पर दंगाइयों पर होती सख्त कार्यवाही से इतने अधिक भयभीत हो गए हैं कि जामिया के दोषी दंगाइयों को बचाने किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। 
अब सीसीटीवी फुटेज को लेकर जामिया मिलिया इस्लामिया प्रशासन और दिल्ली पुलिस के बीच ठन गई है। जहाँ एक तरफ़ यूनिवर्सिटी ने आरोप लगाया था कि दिल्ली पुलिस ने कैम्पस में बिना अनुमति घुस कर तोड़फोड़ मचाई, वहीं पुलिस ने कहा था कि नियंत्रण से बाहर होने पर पुलिस को एक्शन लेना पड़ा। सीएए विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसा, आगजनी और दंगे करने वाले जामिया के छात्रों ने पुलिस पर पत्थरबाजी भी की थी। जाँच में सीसीटीवी फुटेज का अहम रोल होगा, लेकिन अभी तक दिल्ली पुलिस को सीसीटीवी फुटेज नहीं मिला है। ये घटना दिसंबर 15 को हुई थी।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज लेने के लिए जामिया नगर के एसएचओ को यूनिवर्सिटी प्रशासन के पास भेजा गया था। जब पुलिस वहाँ पर पहुँचीं, तब भारी संख्या में जामिया के छात्र जमा हो गए और उन्होंने पुलिस का विरोध किया। छात्रों ने सीसीटीवी फुटेज देने से इनकार कर दिया। हालाँकि, अभी तक ये नहीं पता चल सका है कि छात्र सीसीटीवी फुटेज पुलिस के पास क्यों नहीं पहुँचने देना चाहते हैं? सवाल ये है कि क्या वो कुछ छिपा रहे हैं? मजबूरन एसएचओ को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।
हालाँकि, जामिया मिलिया इस्लामिया प्रशासन ने पुलिस के साथ बैठक के दौरान लिखित में वादा किया था कि सीसीटीवी रिकॉर्डिंग्स को पुलिस को सौंपा जाएगा, ताकि घटना की सही तरीके से जाँच हो सके। अब यूनिवर्सिटी प्रशासन अपने वादे से पलटता दिख रहा है। अगर उन रिकॉर्डिंग्स के साथ कुछ भी होता है तो पुलिस इसे ‘सबूतों के साथ छेड़छाड़’ मान कर आगे की कार्रवाई करेगी, ऐसा वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है। जामिया के चीफ प्रॉक्टर वसीम अहमद ने यूनिवर्सिटी का पक्ष रखते हुए कहा:
“15 दिसंबर को दिल्ली पुलिस ने जामिया के कई छात्रों को हिरासत में लिया था। उसी समय पुलिस ने हमसे उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा लिए थे, जिसमें कहा गया था कि हमें जाँच के लिए सीसीटीवी फुटेज पुलिस को सौंपनी पड़ेगी। उन्होंने फुटेज की माँग की है और हम इस पर अभी सोच-विचार कर रहे हैं। एक पुलिस अधिकारी इसके लिए आया था लेकिन जैसे ही छात्र आए, वो यहाँ से चला गया।”

जामिया मिलिया इस्लामिया ने मानव संसाधन मंत्रालय से माँग की है कि इस पूरे मामले की न्यायिक जाँच कराई जाए। इसीलिए, वो सीसीटीवी फुटेज पुलिस को नहीं सौंपना चाह रहे। जामिया प्रशासन ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से भी इस मामले की शिकायत की है।

अलगाववादी घाटी में युवकों से फेंकवाते हैं पत्थर, लेकिन अपने 220 बच्चों को विदेशों में रखे हैं सुरक्षित

Separatists leaders hypocrisy exposed
आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 
80 के दशक में स्वतन्त्र पत्रकारिता करते दिल्ली के मुस्लिम बहुत क्षेत्र के एक जाने-माने तत्कालीन जनता पार्टी के मुस्लिम नेता से दंगों पर उनसे प्रश्न किया था जब भी दंगा होता तो दंगा प्रभावित क्षेत्र में रह रहे नेताओं के परिवार के किसी पक्षी तक को चोट नहीं आती, लेकिन दंगे में हमेशा आम नागरिक मरता है, जख्मी होता है, क्यों? अक्सर अपने लेखो में जनजागृति लाने के लिए इन प्रश्नों को उजागर करता रहा हूँ, लेकिन फिरकापरस्त आदि नामों से अलंकृत किया जाता रहा। लेकिन ख़ुशी इस बात से है कि आज वही बातें उजागर हो रही हैं। 
यही बात कुछ दिन पूर्व पुरानी दिल्ली के लाल कुआँ में हुए साम्प्रदायिक दंगे पर लिखे एक लेख में भी स्पष्ट लिखा है कि "जो लोग यह कहते हैं की बाहरी लोगों ने हमारे वर्षों पुराने भाईचारे को कलंकित कर दिया। ऐसा कहने वालों को अगर रिमांड पर लेना पड़े, रिमांड पर लेकर उन बाहरी लोगों के दलालों के ठिकाने पूछे जाएं ताकि बाहरी लोगों की आड़ लेकर साम्प्रदायिकता का नंगा नाच खेलने में आम जनमानस का कोई नुकसान न होने पाए।"
वही बात कश्मीर के अलगाववादियों की है, जो अपने बच्चों को तो कश्मीर से दूर विदेशों में रख, निर्दोष बच्चों के हाथ में पत्थर देकर, उनके भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। उनको देश की निगाह में अपराधी बना कर, अपने बच्चों को होनहार और समृद्ध , यह कौन की सियासत है? 
कश्मीर के युवकों के हाथ पत्थर पकड़ाने वाले और उन्हें गुमराह करने वाले अलगाववादी नेताओं एवं उनके समर्थकों को गृह मंत्री अमित शाह ने बेनकाब किया है। गृह मंत्री ने उनकी असलियत देश और दुनिया के सामने रखी है। गृह मंत्री ने बताया है कि ये अलगाववादी नेता घाटी के बच्चों से पत्थर फेंकवाते हैं लेकिन अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेज देते हैं। गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक घाटी के 112 अलगाववादी नेताओं एवं उनसे सहानुभूति रखने वालों के कम से कम 220 बच्चे विदेशों में रच-बस गए हैं। गृह मंत्री के इस खुलासे से कश्मीर के युवाओं का भविष्य चौपट करने वाले इन अलगाववादियों की पोल खुल गई है कि ये अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए उनकी अच्छी तालीम की व्यवस्था करते हैं लेकिन अपने फायदे के लिए वे घाटी के युवाओं को बरगलाने और उन्हें हिंसा की राह पर धकेलने से गुरेज नहीं करते।
संसद में जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन छह महीने और बढ़ाने का प्रस्ताव रखते हुए गृह मंत्री ने पिछले सप्ताह इन अलगाववादियों का 'पोल-खोल अभियान' शुरू किया। आने वाले दिनों में इन अलगाववादी नेताओं की असलियत के बारे में और खुलासा हो सकता है। संसद में शाह ने घाटी के 130 हुर्रियत नेताओं का लेखा-जोखा पेश किया। उन्होंने बताया कि इन 130 अलगाववादी नेताओं ने उच्च शिक्षा दिलाने के लिए अपने बच्चों को विदेश भेजा है जबकि ये घाटी के आम नागरिकों के बच्चों को सुरक्षाबलों के साथ टकराव और उन पर पत्थर फेंकने के लिए उकसाते हैं। 
Separatist leaders of Jammu Kashmir
Separatist leaders of Jammu Kashmirगृह मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि तहरीक-ए-हुर्रियत के चेयरमैन अशरफ सेहराई के दो बेटे खालिद और आबिद अहरफ सऊदी अरब में रहते हैं और ये दोनों वहीं बस गए हैं। जबकि जमात-ए-इस्लामी के अध्यक्ष गुलाम मोहम्मद भट्ट का बेटा सऊदी अरब में डॉक्टर है। वहीं, दुख्तरन-ए-मिल्लत की आसिया अंद्राबी के दोनों बेटे विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं। अंद्राबी का एक बेटा मोहम्मद बिन कासिम मलेशिया में और दूसरा बेटा अहमद बिन कासिम ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रहा है। 
हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी के बेटे नीलम गिलानी ने हाल ही में पाकिस्तान में अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की है। हुर्रियत नेता मीरवाइज की बहन राबिया फारूक पेशे से डॉक्टर है और वह अमेरिका में रहती है। जबकि बिलाल लोन की लड़की और दामाद लंदन में रच-बस गए हैं। लोन की छोटी लड़की ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रही है। मुस्लिम लीग के नेताओं मोहम्मद यूसुफ मीर और फारूक गटपुरी की बेटियां पाकिस्तान में मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं। इसके अलावा डेमोक्रेटिक पॉलिटिकल मूवमेंट के नेता ख्वाजा फरदौस वानी की लड़की भी पाकिस्तान में मेडिकल की छात्रा है। वाहिदत-ए-इस्लामी के नेता निसार हुसैन की बेटी ईरान में काम करती है और वहीं अपने पति के साथ बस गई है।
घाटी के अलगाववादी नेता अपने अपने सियासी लाभ के लिए कश्मीर के स्थानीय युवकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इन युवकों के भविष्य की चिंता यदि उन्हें रहती तो वे इनके हाथों में पत्थर नहीं पकड़ाते बल्कि अपने बच्चों की तरह उन्हें शिक्षा के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते। गृह मंत्री ने अब इनकी पोल-खोल दी है। संसद में गृह मंत्री ने कहा, 'हम कश्मीर के लोगों का दिल जीतेंगे...और वे हमें अपनाएंगे।' भारत के खिलाफ गतिविधियों में संलिप्त लोगों को नसीहत देते हुए गृह मंत्री ने कहा, 'भारत के खिलाफ काम करने वाले लोगों को उन्हीं की भाषा में उचित जवाब दिया जाएगा।' 
शाह ने इस मौके पर कश्मीर के प्रति सरकार की नीति 'जम्हूरियत, इंसानियत, कश्मीरियत' का जिक्र किया लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि जो ताकतें भारत को बांटना चाहती हैं उन्हें बख्श दिया जाएगा। बता दें कि राज्यसभा ने सर्वसम्मति से जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन छह महीने बढ़ाने के प्रस्ताव एवं जम्मू-कश्मीर (आरक्षण) संसोधन विधेयक को मंजूरी दे दी है।

जम्‍मू-कश्‍मीर : पत्‍थरबाजों के लिए घाटी में हर रास्‍ता होगा बंद

जम्‍मू और कश्‍मीर में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन के दौरान होने वाली पत्‍थरबाजी सुरक्षाबलों के लिए बडी चुनौती बन चुकी है! बीते दिनों दो से तीन ऐसी घटना हुई हैं, जिसमें पत्‍थरबाजी का फायदा उठाकर आतंकी मौके से भागने में सफल रहे हैं! इन घटनाओं के बाद सुरक्षाबलों ने एक बार फिर पत्‍थरबाजों के खिलाफ सख्‍त कार्रवाई का फैसला किया है। फैसले के अंतर्गत, सुरक्षाबलों पर पत्‍थर बरसाने वाले पत्‍थरबाजों के खिलाफ जल्‍द एक विशेष अभियान की शुरूआत की जाएगी! इस अभियान को प्रभावी बनाने के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स(सीआरपीएफ) और जम्‍मू-कश्‍मीर पुलिस की स्‍पेशल ऑपरेशन स्‍क्‍वाड के कमांडो वाली ज्‍वाइंट टीम का गठन कर दिया गया है!
जम्‍मू और कश्‍मीर की कानून-व्‍यवस्‍था से जुड़े वरिष्‍ठ अधिकारी ने बताया कि इस अभियान को सफल बनाने के लिए स्‍थानीय पुलिस, सीआरपीएफ और आर्मी इंटेलीजेंस की मदद भी ली जा रही है। उन्‍होंने बताया कि सुरक्षाबलों की यह कार्रवाई, बीते वर्षों में हुई कार्रवाई से बिल्‍कुल अलग होगी! कार्रवाई को सफल बनाने के लिए सुरक्षाबलों की ज्‍वाइंट टीम ने ऐसे अराजक तत्‍वों की पहचान करना शुरू कर दिया है, जो घाटी के नौजवानों को पत्‍थरबाजी के लिए उकसाते हैं! इस अभियान के अंतर्गत उन लोगों की भी पहचान करने की कवायद जारी है, जो पत्‍थरबाजी करनेवाले नौजवानों तक आर्थिक मदद पहुंचाते हैं! उन्‍होंने बताया कि, पत्‍थरबाजों के सरगनाओं की पहचान पूरी होते ही उनके खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी !

पत्‍थरबाजों ने पकड ली है कानून की कमजोर नस

घाटी की कानून-व्‍यवस्‍था से जुड़े वरिष्‍ठ अधिकारी ने बताया कि घाटी में बेहद सोची-समझी साजिश के अंतर्गत पत्‍थरबाजी की वारदातों को अंजाम दिलाया जाता है। दरअसल, आतंकियों के हमदर्द और पत्‍थरबाजों के सरगना यह जानते हैं कि भारतीय कानून में नाबालिगों के कडी सजा देने का प्रावधान नहीं है! उन्‍हें यह भी मालूम है कि सुरक्षा बल स्‍कूल और कालेज के छात्रों के प्रति सहानुभूति वाला नजरिया रखते हैं! इन्‍हीं दोनों बातों का फायदा पत्‍थरबाजों के सरगना बाखूबी उठा रहे हैं! यही, वजह है कि बीते दिनों घाटी में हुई पत्‍थरबाजी की घटनाओं में या तो 15 से 16 साल के किशोर थे या फिर स्‍कूल और कालेज में पढने वाले छात्र! यही वजह है कि पत्‍थरबाजी के दौरान सुरक्षा बल किसी तरह की कार्रवाई से हिचकते रहे, जिसका फायदा उठाकर आतंकी मौके से फरार में सफल हो गए!

खास रणनीति के अंतर्गत होगी पत्‍थरबाजों पर कार्रवाई

सुरक्षाबल से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि, अभी तक कार्रवाई के नाम पर नाबालिग पत्‍थरबाजों को हिरासत में लेने के बाद हिदायत के साथ छोड दिया जाता था। वहीं, बालिग पत्‍थरबाजों पर ज्‍यादा से ज्‍यादा अशांति फैलाने का मामला दर्ज कर कार्रवाई की जाती थी, जिसमें पत्‍थरबाजों को बेहद आसानी से जमानत मिल जाती थी! जिसके बाद, ये पत्‍थरबाज एक बार फिर आतंकियों का सुरक्षा कवच बनकर सड़कों पर उतर आते थे। इस बार, यह फैसला किया गया है कि उन लोगों पर पहले नकेल कसी जाए जो पत्‍थरबाजों को पत्‍थरबाजी के लिए उकसाते हैं और पकड़े जाने पर उनकी जमानत के लिए धन उपलब्‍ध कराते हैं! सुरक्षाबल की संयुक्‍त टीम इन लोगों के पहचान करने की कवायद में जुटी हुई है !

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Jammu and Kashmir: Stones pelted at security forces near Jamia Masjid in Srinagar; and posters supporting terrorist Zakir Musa and UN designated terrorist Masood Azhar seen in the area.

जल्‍द शुरू होगी पत्‍थरबाजों के हमदर्दों की गिरफ्तारी

सुरक्षाबल के वरिष्‍ठ अधिकारी ने बताया कि, इस बार हम कोई भी कदम जल्‍दबाजी में नहीं उठाना चाहते हैं! हर संदिग्‍ध शख्‍स के खिलाफ पुख्‍ता सबूत एकत्रित किए जा रहे हैं। जिससे गिरफ्तारी के बाद उसे वाजिब सजा दिलाई जा सके! उन्‍होंने बताया कि घाटी में अलग-अलग पत्‍थरबाज को पकड़ने से बेहतर है कि उस शख्‍स को गिरफ्तार किया जाए, जिनसे पत्‍थरबाजों और आतंकियों के हमदर्दों को ऑक्‍सीजन मिल रही है! उन्‍होंने कहा कि जल्‍द ही सुरक्षाबलों की इस कार्रवाई के सकारात्‍मक परिणाम घाटी में दिखना शुरू हो जाएगा! सुरक्षाबलों के इस कदम से घाटी में अमन के साथ रहने वाले लोगों को भी सुकून मिलेगा!
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महबूबा मुफ्ती की बेटियां इर्तिका और इल्तिजा जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नया मोड़ आ गया है. जम्मू-कश्मीर में भारतीय...

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार कश्मीर में मस्जिदों का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए होना नई बात नहीं है ले.....

कश्मीर की मस्जिद में आतंकियों ने तंज़ीम के नाम पर धन जमा किया

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कश्मीर में मस्जिदों का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए होना नई बात नहीं है लेकिन अब यहां खुले तौर पर आतंकवादी मस्जिद में भारत के खिलाफ जहरीले भाषण देकर युवाओं को चरमपंथ एवं हिंसा के लिए उकसा रहे हैं। यह स्थिति उस समय है, जब आर्मी ने वहां आतंकवादियों के विरुद्ध "all out operation" चलाया हुआ है। 
कुलगाम की एक मस्जिद का एक ऐसा ही वीडियो सामने आया है जिसमें लश्कर ए-तैयबा के दो आतंकवादी मस्जिद में दाखिल होकर वहां लोगों को भारत के खिलाफ उकसाते हैं। इनमें से एक आतंकवादी को खुले में पिस्टल लहराते और भारत विरोधी बातें करते हुए देखा जा सकता है। यह वीडियो ईद के दिन का बताया जा रहा है। 
मस्जिद में दाखिल हुए दोनों आतंकवादी पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाते और युवकों को आतंकवाद के रास्ते पर चलने के लिए उकसाते नजर आए हैं। दोनों आतंकियों ने तंजीम के नाम पर वहां मौजूद लोगों से दान करने के लिए भी कहा। आतंकियों ने कहा कि वे कश्मीर की आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने धर्म को जिहाद और राजनीति से जोड़कर वहां मौजूद लोगों का ब्रेन वाश किया।  
यह वीडियो चिंतित करने वाला है क्योंकि इस तरह का चलन पाकिस्तान में देखा जाता है जहां आतंकवादी खुले तौर पर जिहाद के लिए फंड इकट्ठा करते हैं। घाटी में घृणा फैलाने वाले लोग अब तक अपनी चरमपंथी विचारों के लिए मस्जिदों का इस्तेमाल करते आ रहे थे लेकिन अब आतंकवादी मस्जिदों में बेरोक-टोक दाखिल हो रहे हैं और तंजीम के नाम पर फंड इकट्ठा करने लगे हैं। यह बेहद चिंता की बात है।

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Jammu and Kashmir: Stones pelted at security forces near Jamia Masjid in Srinagar; and posters supporting terrorist Zakir Musa and UN designated terrorist Masood Azhar seen in the area.
11:37 AM - Jun 5, 2019 
सेना के ऑपरेशन 'ऑल आउट' में बड़ी संख्या में आतंकवाद मारे गए हैं। आतंकियों की कमर टूट चुकी है। हाल ही में सुरक्षाबलों ने लश्कर के आतंकी जाकिर मूसा को भी ढेर कर दिया। अपने कमांडरों के मारे जाने के बाद आतंकी हताश हो गए हैं। घाटी में पत्थरबाजी और भारत विरोधी गतिविधियों के लिए युवाओं को उकसाने वाले ज्यादातर अलगाववादी या तो नजरबंद हैं या हिरासत में हैं। आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस की नीति जारी रखते हुए सेना ने साफ कर दिया है कि जो भी आतंक के रास्ते पर चलेगा उसे बख्शा नहीं जाएगा। 
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आसिया अंद्राबी | तस्वीर साभार: BCCL भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के केन्द्रीय गृह मंत्री बनने के बाद से कश्मीर ...

ईद के पावन अवसर पर नमाज़ के बाद पत्थरबाज़ी करना इस बात को सिद्ध करता है कि कश्मीर में अभी भी आतंकवादियों का जमावड़ा है। देखना यह भी है कि इनमें पाकिस्तानी कितने हैं और पाकिस्तान समर्थक कश्मीरी कितने, आखिरकार, आतंकवादी आतंकवादी ही होता है। नमाज़ के बाद हुई पत्थरबाज़ी पर न किसी मानवाधिकार ने आलोचना कर, ऐसे तत्वों पर सख्त कार्यवाही की माँग की, और न ही कोई #not in my name, #moblynching, #intolerance, #award vapsi, #metoo आदि गैंग ने। किसी भी छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेता ने भर्त्सना तक नहीं की। इन सबका चुप्पी साधना प्रमाणित करता है कि ये सब देश के टुकड़े-टुकड़े करने वालों के संरक्षक हैं। आज तक किसी ने यह तक प्रश्न नहीं किया कि "कश्मीर की आज़ादी माँगने वाले आखिर अपना मुँह ढक कर क्यों पत्थरबाज़ी करते हैं? ये पत्थरबाज कोई और नहीं आतंकवाद ही है, इन पत्थरबाजों पर पत्थरबाज़ी करने पर उसी भाँति कार्यवाही होनी चाहिए जिस तरह प्रमाणित आतंकवादियों पर की जाती है। और जब इन पत्थरबाजों पर कोई कठोर कार्यवाही होने की स्थिति में इनके माँ-बाप सरकार से रहम की भीख माँगते नज़र आएंगे। इनके संरक्षक आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खुलवाएँगे।