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नूपुर शर्मा का डीपी लगाने पर डरे हुए मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथियों ने युवक पर किया तलवार से हमला, चेहरे पर थूका


कुछ भी कहो नूपुर विवाद ने यूट्यूब पर एक्स मुसलमानों द्वारा कुरान, हदीस और पैगम्बर की जीवनी को जगजाहिर कर दिया है, और इसके जिम्मेदार कोई और नहीं मुस्लिम कट्टरवाद है जो नूपुर विवाद को जिन्दा रख रहा है। वैसे NewsNation चैनल ने भी "इस्लाम क्या कहता है" शो शुरू किया हुआ है। CAA विरोध से लेकर आज नूपुर विवाद तक टीवी पर होती चर्चाओं में आने वाले मुस्लिम कट्टरपंथी कहते हैं कि 'मुसलमान डरा हुआ है', उनके इस बात का समर्थन करने वाले जवाब दें, 'यदि डरा हुआ मुस्लिम समाज कत्लेआम कर सकता है, अगर यह डरा हुआ नहीं होता, तब तो पता नहीं ये मुग़ल युग की याद ताज़ा करवा देते।' अब कहाँ है #mob lynching, #intolerance, #award vapsi, #not in my name, धर्म-निरपेक्ष की बात करने वाला  और 
गंगा-जमुनी तहजीब का ढोंगी नारा लगाने वाला गैंग? मुस्लिम विद्वान डॉ रिज़वान अहमद अपने #Face To Face शो में ठीक कहते हैं कि "जिस दिन 50% हिन्दू जाग गया, तुम्हारा क्या हाल होगा?" फिर कोई किसी कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर या नितेश राणा को दोष न दे।     

हम सभी अपने मोबाइल से सोशल मीडिया पर अपने अपने विचार शेयर करते हैं लेकिन यह विचारों की अभिव्यक्ति अब लोगों के लिए घाटक होते जा रही हैं। पिछलें कुछ दिनों में हिंसा करने वाले उपद्रवी इस कदर बेखौफ हो गये हैं कि धर्म के नाम पर खून बहाने की सनक में लोगों की हत्या करने पर अमादा हो गये हैं। कुछ ही समय पहले मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने उदयपुर में दर्जी की नुपुर शर्मा का समर्थन करने पर बेरहमी से हत्या कर दी थी। उन्होंने बड़ी ही शान से सोशल मीडिया पर इस घटना का वीडियो भी शेयर करते हिंदू समुदाय के लोगों का डराया था। उसके बाद भी कई घटनाएं सामने आयी जिसमें हिंदू समुदाय के लोगों की केवल इस लिए हत्या की गयी क्योंकि उन्होंने सोशल मीडिया पर नुपुर शर्मा का समर्थन किया था। अब एक नया मामला भी सामने आया हैं। जहां एक बार फिर नुपुर शर्मा के समर्थन में स्टेटस लगाने पर युवक पर धारदार हिथयार से मुस्लिम समुदाय के कुछ कट्टरपंथी लोगों ने हमला कर दिया। 

अहमदनगर जिला मुख्यालय से 222 किलोमीटर दूर कर्जत शहर के अक्काबाई चौक पर एक मेडिकल दुकान के सामने बृहस्पतिवार शाम को मुस्लिम समुदाय के कम से कम 14 लोगों ने तलवार, दरांती, लाठी और हॉकी स्टिक से पवार पर हमला किया। अधिकारी ने बताया कि यह घटना उस समय हुई जब मामले में शिकायतकर्ता पवार और अमित माने अपने दोपहिया वाहन पर एक कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे और मेडिकल दुकान के पास एक मित्रकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उसी समय मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग दोपहिया वाहनों से उनके पास पहुंचे। प्राथमिकी के अनुसार, वे तलवार, दरांती और हॉकी स्टिक लिए हुए थे। माने ने शुक्रवार को दर्ज कराई गई अपनी शिकायत में कहा कि उनमें से एक ने पवार पर चिल्लाते हुए कहा कि उसने नुपुर शर्मा के समर्थन में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखा था और कन्हैया लाल के बाद इंस्टाग्राम पर स्टेटस भी डाला था और फिर उन लोगों ने हमला कर दिया।

नूपुर शर्मा का समर्थन करने के कारण महाराष्ट्र में एक युवक पर जानलेवा हमले की खबर सामने आई है। पीड़ित युवक का नाम प्रतीक पवार उर्फ सनी है। रिपोर्टों के अनुसार कुछ मुस्लिम युवकों ने प्रतीक को घेरकर उस पर जानलेवा हमला किया। उसके चेहरे पर थूका। हमलावर उसे मरा समझ छोड़कर चले गए। फिलहाल प्रतीक का इलाज चल रहा है।

घटना 4 अगस्त 2022 की है। महाराष्ट्र के अहमदनगर के कर्जत में इस घटना को अंजाम दिया गया। यह मामला तब सामने आया, जब 6 अगस्त 2008 को महाराष्ट्र के बीजेपी विधायक नीतेश राणे ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस हमले के बारे में बताया। राणे के अनुसार प्रतीक को 35 टाँके लगे हैं और जिंदगी की जंग लड़ रहा है। उन्होंने दावा किया कि नूपुर शर्मा का डीपी लगाने के कारण प्रतीक पर हमला हुआ।

मामले में 14 लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 307 (हत्या का प्रयास), 143 (गैरकानूनी जमावड़ा का सदस्य होना), दंगा, 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाने के लिए सजा) और 504 (शांति भड़काने के इरादे से किया गया कृत्य) तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई एवं चार मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। घटना की निंदा करते हुए, भाजपा विधायक नितेश राणे ने कहा कि पवार को मुस्लिम समुदाय के 10 से 15 लोगों ने घेर लिया और उनसे सवाल किया कि वह नुपुर शर्मा की तस्वीर को अपने डीपी के रूप में क्यों रख रहे हैं और दूसरों को ऐसा करने के लिए कह रहे हैं। नितेश ने मुंबई में संवाददाताओं से कहा, ‘‘मैं चेतावनी देना चाहता हूं कि यदि हिंदुओं को इस तरह से निशाना बनाया जाता है, तो हमारे हाथ बंधे नहीं हैं।

जब तक सभी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हो जाती हम चुप नहीं बैठेंगे। उनमें से कुछ अभी भी फरार हैं।’’ नितेश ने कहा, ‘‘उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस मामले की निगरानी कर रहे हैं। महा विकास आघाड़ी (एमवीए) और नवाब मलिक अब सत्ता में नहीं हैं। हिंदुओं पर हमला करने वालों को वैसा जवाब दिया जाएगा। हम भीम राव आंबेडकर के संविधान का पालन करते हैं। इस देश में कोई शरिया कानून नहीं है।

एबीपी न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार 23 साल के प्रतीक और उनके दोस्त अमित माने 4 अगस्त को कर्जत जा रहे थे। अक्कबाई चौक के नजदीक वे अपने दोस्तों का इंतजार कर रहे थे, तभी एक सफेद रंग की स्विफ्ट कार, काले रंग की बुलेट, लाल रंग की पल्सर और एक सफेद रंग की स्कूटी पर सवार होकर 12 से 14 मुस्लिम युवक वहाँ आ गए। इन युवकों ने उन्हें घेर लिया। माने के अनुसार, “मुस्लिम युवकों ने प्रतीक पवार से कहा- तुम्हें हिंदुत्व का बड़ा कीड़ा है। तुम लगातार नूपुर शर्मा और कन्हैयालाल के समर्थन में सोशल मीडिया पर पोस्ट और स्टेटस लगा रहे हो। इसके कारण कई और लोग इनका समर्थन करने लगे हैं। तेरा भी उमेश कोल्हे करना पड़ेगा।”

नूपुर शर्मा का समर्थन करने के कारण उमेश कोल्हे की महाराष्ट्र के अमरावती में ही 21 जून 2022 को हत्या कर दी गई थी। यह मामला कई दिनों तक मीडिया की सुर्खियों से दूर रहा। लेकिन जब उदयपुर में 28 जून 2022 को कन्हैयालाल का मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद ने गला काट दिया उसके बाद इस मामले की भी परतें खुलने लगी।

काफिर को जिंदा नहीं छोड़ना है

एबीपी की रिपोर्ट बताती है कि प्रतीक प्रवार पर हमले को लेकर दर्ज एफआईआर में कहा गया है कि तीखी बहस के बाद शाहरुख खान पठान ने प्रतीक पर जानलेवा हमला किया। प्रतीक ने बचाव की कोशिश की तो तलवार उसके हाथ पर लग गई। इसके बाद पीछे से निहाल खान पठान और सोहेल खान पठान ने प्रतीक के सिर पर वार किया। इससे वह नीचे गिर गया और उसके सिर से खून बहने लगा। इस हालत में भी वे प्रतीक पर तब तक हमला करते रहे जब तक वह बेहोश नहीं हो गया। इसके बाद वे मौके से फरार हो गए। इस दौरान हमलावर कह रहे थे कि इस काफिर को जिंदा नहीं छोड़ना है।
इस मामले में अब तक 4 आरोपितों की गिरफ्तारी की खबर है। विधायक नितेश ने इस घटना को लेकर बताया, “हमलावरों ने प्रतीक से कहा कि तू बहुत हिन्दू-हिन्दू करता रहता है। तू सबको नूपुर की DP रखने के लिए कहता है। हमले के दौरान उसका गला काटने की भी धमकी दी गई।”

आमिर खान : सबसे बड़ा हेटर गुजरात दंगे और नरेन्द्र मोदी को लेकर बोला झूठ, देवी-देवताओं का किया अपमान, देश में फैलाया डर


बॉलीवुड सुपरस्टार आमिर खान इस समय अपनी आने वाली फ़िल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ को लेकर सूर्खियों में हैं। यह फ़िल्म 11 अगस्त को रिलीज होने वाली है। इससे पहले ही इस फ़िल्म के बायकॉट की मांग हो रही हैं। ट्विटर पर #BoycottLaalSinghChaddha जमकर ट्रेंड हो रहा है। इधर, फिल्म के बायकॉट की मांग से आमिर खान दुखी नजर आ रहे हैं। आमिर ने कहा कि ‘लाल सिंह चड्‌ढा’ फिल्म का बायकॉट करना दुखद है। पता नहीं क्यों लोगों को लगता है कि मैं अपने देश से प्यार नहीं करता, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। आमिर के इस बयान से स्पष्ट है कि उन्हें अपने अंदर भरी नफरत का ज्ञान नहीं है। तो चलिए आपको आमिर की नफरत और लोगों के बायकॉट और विरोध की वजह बताते हैं।

बायकॉट से परेशान आमिर खान सफाई देने पर मजबूर

दरअसल, आमिर खान को पता नहीं है कि वो जिस थाली में खाना खा रहे हैं, उसी में छेद कर रहे हैं। अब लोगों ने उनकी फ़िल्म के बायकॉट और विरोध के जरिए आमिर खान को सोचने और सफाई देने पर मजबूर कर दिया है। लोगों का आरोप है कि आमिर खान ने 2002 के गुजरात दंगों और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर झूठ बोला था। यहां तक कि जिस देश में वो शांतिपूर्वक रहते हैं। फिल्म के जरिए पैसे और प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं। उसको लेकर लोगों में डर पैदा करने की कोशिश की। इसके अलावा अपनी फिल्मों में हिंदू संस्कृति और देवी-देवताओं का अपमान करते हैं और उसे नीचा भी दिखाते हैं।

आमिर खान का भारत विरोधी तुर्की से संबंध

फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ की शूटिंग के लिए आमिर खान की तुर्की यात्रा भी विवादों के घेरे में हैं। आमिर खान ने भारत विरोधी तुर्की में जाकर किस तरह वहां के राष्ट्रपति से मुलाकात की और वहां के पर्यटन को प्रमोट किया, इससे भी उनके अंतरराष्ट्रीय इस्लामी एजेंडे को समझा जा सकता है। पाकिस्तान का यार तुर्की अक्सर कश्मीर राग अलापता है और भारत के मुस्लिमों को भड़काता है। जब भारत ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया था, तब उन्होंने इस कार्रवाई का विरोध किया था। कुछ रिपोर्ट्स में यह दावा भी किया जा चुका है कि तुर्की भारत में कट्टर इस्लामिक संगठनों को फंडिंग भी करता है। तुर्की की प्रथम महिला एमीन एर्दोगन से आमिर खान 15 अगस्त, 2020 को मिले थे। इस मुलाकात की फोटो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं।

नरेन्द्र मोदी के खिलाफ फैलाई नफरत 

पिछले 21 सालों में ऐसा कोई भी मौका नहीं है, जब नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने और उनकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिशें नहीं की गई हों। आखिरकार 24 जून, 2022 को सत्य की जीत हुई और सुप्रीम कोर्ट ने 2002 गुजरात दंगा मामले में ज़किया जाफरी की याचिका खारिज करते हुए दंगे की साज़िश के आरोप से तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को मुक्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कुछ लोगों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का प्रयास किया, ताकि मामला चर्चा में बना रहे। दरअसल नरेन्द्र मोदी को झूठे तथ्यों के आधार पर बदनाम करने की मुहिम चलाई गई, जिसमें राजनीतिज्ञ, पत्रकार और फर्जी सामाजिक कार्यकर्ता से लेकर आमिर खान जैसे बॉलीवुड अभिनेता भी शामिल थे। 

नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने की मुहिम में शामिल थे आमिर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से आमिर खान की नफरत जगजाहिर है। गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक कई मौकों पर आमिर खान ने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अपनी नफरत को प्रदर्शित किया है। सोशल मीडिया पर एक वीडिया वायरल हो रहा है, जिसमें आमिर खान पत्रकार शेखर गुप्ता से बात करते हुए दिख रहे हैं। वर्ष 2002 के इस इंटरव्यू में आमिर खान ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को गुजरात दंगों में लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया था। और उनकी पार्टी पर भी सवाल खड़े किए थे। लेकिन गुजरात दंगे की बात करते हुए आमिर खान ने गोधरा में ट्रेन जलाए जाने और 59 हिन्दुओं की निर्मम हत्या का जिक्र नहीं किया था। 

गुजरात दंगों पर बोला झूठ

इंटरव्यू में आमिर खान ने कहा था, “एक इंसान के तौर पर मैं ये समझता हूं कि लोगों के दिमाग में बहुत जहर भरा है। गुजरात में जो हुआ बहुत बुरा हुआ। कोई आदमी मोदी जैसा, वहां गुजरात में इंडियन मारे गए थे। चाहे वो हिंदू हों, मुसलमान हों, सिख हों, ईसाई हो। मारे गए एक नेता के हाथों, जिसे सोचा गया था कि वो लोगों का नेता होगा, वो जिम्मेदार है लोगों के मरने के लिए। वो और उनकी पार्टी। वहां जो हुआ वो बहुत एंटी-इंडियन था। ये मानवता के खिलाफ था। लोगों ने इसके खिलाफ आवाज भी उठाई ये अच्छा हुआ। ये देख कर अच्छा लगा, मुझे भारत के लोगों में भरोसा है। वो थोड़ा भटकेंगे लेकिन मुझे उम्मीद है उन्हें प्यार में भरोसा है।”

अमेरिका का वीजा न मिलना राष्ट्रीय गौरव- आमिर

इसी इंटरव्यू में शेखर गुप्ता से बात करते हुए आमिर खान ने कहा था कि जो लोग इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते हैं, वो पूरी तरह से देश विरोधी हैं। ये लोग मानवता और स्वस्थ समाज की अवधारणा को ठेस पहुंचाते हैं। कुछ ही लोग इसके खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं। आजकल खबर में आ रहा है कि अमेरिका ने नरेन्द्र मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया है और ये राष्ट्रीय गौरव की बात हो गई है। बताया जाता है कि आमिर खान ने नरेन्द्र मोदी को अमेरिका का वीजा न मिले इसके लिए भी एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया था।

मेधा पाटेकर के साथ नर्मदा डैम प्रोजेक्ट के खिलाफ चलाया अभियान

आमिर ने साल 2006 में मेधा पाटेकर के साथ मिलकर नर्मदा डैम प्रोजेक्ट को लेकर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अभियान चलाया था। और गुजरात के विकास में बांधी डाली थी। 15 अप्रैल, 2006 को आमिर ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहीं एक्टिविस्ट मेधा पाटेकर का समर्थन किया था। मेधा उस समय गुजरात सरकार के एक फैसले का विरोध कर रही थी जिसमें ये कहा गया था कि सरदार सरोवर बांध की लंबाई बढ़ाई जाएगी। उस दौरान आमिर की फिल्म रंग दे बसंती रिलीज़ होने वाली थी और वे अपनी पूरी टीम के साथ मेधा का समर्थन करने पहुंचे थे। आमिर की नर्मदा बचाओ आंदोलन में सक्रियता देखकर कई लोग हैरान हुए थे।

इन्टॉलरेंस पर कहा था- देश का माहौल खराब है

आमिर खान ने कुछ साल पहले देश में बढ़ रहे इन्टॉलरेंस पर रिएक्ट किया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें अपने बच्चों को लेकर पहली बार डर लग रहा है, क्योंकि देश का माहौल बहुत खराब है। साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि उनकी पूर्व पत्नी किरण ने उनसे पूछा कि क्या हमें भारत छोड़ देना चाहिए? किरण अपने बच्चे की सेफ्टी को लेकर डर महसूस कर रही थीं। आमिर ने पत्नी के कहने पर देश तो नहीं छोड़ा लेकिन सलाह देने वाली पत्नी किरण राव को ही छोड़ दिया। अब उनका और किरण राव का तलाक हो चुका है। अब आमिर खान इससे नाराज़ हैं कि लोग ऐसा क्यों कह रहे हैं कि उन्हें देश से प्यार नहीं। इस पर सवाल उठ रहे हैं कि देश में जिसे डर लगता हो, वो देश से कैसे प्यार कर सकता है?

पीके फिल्म में भगवान का अपमान किया था

आमिर की पिछली फिल्म ‘पीके’ को लेकर भी लोगों के मन में गुस्सा है। लोगों का कहना है कि कैसे आमिर ने फिल्म में ‘भगवान’ का मजाक उड़ाया था और ‘हिंदू धर्म’ का ‘अपमान’ किया था। फिल्म के रिलीज के समय हिन्दू संगठनों ने फिल्म पर कथित रूप से धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। फिल्म में ‘गौ माता’ और भगवान शिव जैसे देवी देवताओं को जिस तरह दिखाया गया है वह सनातन धर्म का आपमान है। लोग आमिर की फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ के बहिष्कार की अपील कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि हिन्दू-देवी देवताओं और भारत का अपमान करने वाली मानसिकता पर लगाम लगाने की जरूरत है। ताकि आगे से कोई अपमान करने की हिम्मत नहीं कर सके।

शिव पर दूध चढ़ाने वाला विवादित बयान

आमिर ने अपने शो ‘सत्यमेव जयते’ में कहा था कि शिव की मूर्ति पर 20 रुपये का दूध चढ़ाने के बजाय किसी बच्चे को खाना खिलाना ज्यादा बेहतर होगा। इस बात पर भी काफी विवाद हुआ था। अपने इस बयान के चलते आमिर खान को काफी ज्यादा ट्रोल होना पड़ा था। अब लोग कह रहे हैं कि वो ‘लाल सिंह चड्ढा’ पर पैसे खर्च करने के बजाय गरीब बच्चों को खाना खिलाएंगे।

ABP ने कांग्रेस की शर्त क्यों मानी? फ्री स्पीच पर एक बार फिर सामने आया कांग्रेस का दोहरा रवैया, शहजाद को डिबेट में आने से रोका

क्या मीडिया अभी भी कांग्रेस के इशारे पर ही नाचती है? यदि नहीं, फिर किस कारण से ABP चैनल को कांग्रेस के दबाव के आगे झुकना पड़ा? क्या चैनल कांग्रेस स्पोंसर समाचार प्रसारित करता है? चैनल कांग्रेस के दबाव में आकर इस बात को इस बात को भी साबित कर दिया कि टीवी पर होने वाली चर्चाएं सिर्फ अपनी TRP के लिए की जाती हैं। अन्यथा वह क्या कारण थे कि चैनल को शहज़ाद पुणेवाला को चर्चा में आने से रोका? 
कहते हैं, इतिहास लिखा नहीं जाता दोहराया जाता है, जिसे कांग्रेस के आगे घुटने टेक कर ABP चैनल ने सिद्ध कर दिया। जितने भी वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विद्वान जानते होंगे कि जब राहुल के दादा फिरोज जहांगीर संसद में बोलने के लिए खड़े होते थे, जवाहर लाल नेहरू के पसीने छूटने लगते थे। लगभग वही स्थिति मई 21 को ABP चैनल पर कांग्रेस द्वारा शहज़ाद को रोक दोहरायी गयी है। अंतर केवल इतना उन दिनों फिरोज को रोकने वाला कोई नहीं था। जो काम जवाहर लाल नहीं कर पाए, नातियों ने कर दिया। काश! उनके पोता-पोती यानि राहुल और प्रियंका अपने दादा की मजार पर जाकर सजदा कर, उनका आशीर्वाद लेते।  
फ्री स्पीच पर एक बार फिर कांग्रेस का दोहरा रवैया सामने आया है। शहजाद पूनावाला को एबीपी न्यूज पर डिबेट में आने से रोक दिया गया है। शहजाद को एबीबी न्यूज चैनल पर टूलकिट विवाद पर होने वाली चर्चा में आमंत्रित किया गया था। लेकिन ऐन टाइम पर यह कहकर चर्चा में भाग लेने से रोक दिया गया कि कांग्रेस नेता नहीं चाहते कि आप डिबेट में हिस्सा लें। इसके बाद शहजाद पूनावाला ने ट्विटर पर एबीपी न्यूज चैनल के साथ हुई बातचीत के ऑडियो को शेयर कर दिया।

एबीपी चैनल द्वारा शहज़ाद को कांग्रेस के दबाव में चर्चा में भाग लेने से रोकने पर लोगों की प्रक्रियाएं तो सामने आ ही रही हैं, लेकिन यह भी सिद्ध हो रहा है कि सत्ता में न होते हुए भी कांग्रेस ने किस तरह मीडिया को अपनी मुट्ठी में कर रखा है। यह उन लोगों को करारा जवाब है, जो कहते हैं, "मोदी ने मीडिया को खरीद लिया है", दूसरे एबीपी चैनल ने भी सिद्ध कर दिया है कि सच्चाई के उजागर होने के डर से कांग्रेस ने चैनल को खरीद लिया है। मीडिया जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है, अन्य चैनलों की भांति ABP ने साबित कर दिया कि 'वही समाचार प्रसारित होंगे, जिसे कांग्रेस चाहेगी। देखिए ट्विटर पर लोगों की प्रक्रियाएं :

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शहजाद पूनावाला कांग्रेस के नेता रह चुके हैं। शहजाद पूनावाला कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा के पति राबर्ट वाड्रा के बहनोई तहसीन पूनावाला के भाई हैं। साल 2017 में तत्कालीन कांग्रेस नेता शहजाद पूनावाला से ये कहकर तहलका मजा दिया था कि पार्टी में इलेक्शन नहीं सिलेक्शन होता है। उन्होंने कहा था कि अगर कांग्रेस में निष्पक्ष चुनाव होता है तो वह भी चुनाव लड़ेंगे। इसके बाद शहजाद और तहसीन के संबंधों में दरार आ गई।

आंध्र प्रदेश : मोदी जी ईसाई धर्मांतरण की पोल खोलने वाले सांसद पर अत्याचार क्यों?: अपने ही सांसद के पीछे क्यों जगन की CID

                      आंध्र में ईसाई धर्मांतरण की पोल खोलने वाले MP को 'टॉर्चर' करने की तस्वीरें 
आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी वाईएसआर कांग्रेस के बागी सांसद रघुराम कृष्णम राजू ने हिरासत में टॉर्चर करने का आरोप सीआईडी पर लगाया है। नर्सापुरम से सांसद राजू को सीआईडी ने 14 मई 2021 को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया था। उन्हें जब मजिस्ट्रेट के पास पेश किया गया तो उनके वकील ने दावा किया कि उन पर पुलिस ने थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया। इसकी वजह से अब वे चलने में भी सक्षम नहीं हैं।

वकील ने यह भी कहा कि कुछ महीने पहले ही उनकी बाइपास सर्जरी हुई थी। लिहाजा टॉर्चर किए जाने के बाद उनकी मेडिकल जाँच बेहद जरूरी है। वकील के मुताबिक राजू को 14 मई की रात 11 बजे के करीब उनके गुंटूर स्थित आवास से गिरफ्तार किया गया था। उस वक्त वे सोने जा रहे थे। अचानक पाँच लोग उनके कमरे में दाखिल हुए। उन लोगों ने रूमाल से अपना चेहरा ढक रखा था। वकील के अनुसार उन्हें सांसद ने बताया कि उन लोगों ने रस्सी से उनके पैर बाँध दिए। इसके बाद एक ने छड़ी से और दूसरे ने रबर की मोटी छड़ी से उनके पैर पर वार किए।

ऐसे में यह भी प्रश्न पूछा जा रहा है कि जब सांसदों को सरकारी सुरक्षा मिली होती है, तो जिस समय सांसद पर अत्याचार हो रहा था, सांसद की सुरक्षा कहाँ थी? इस बात की भी जाँच होनी चाहिए। 

टॉर्चर करने के बाद उन लोगों ने उन्हें चलने का आदेश दिया। उन्हें चलता देख दोबारा उन्हें प्रताड़ित किया गया। जब वे चलने में सक्षम नहीं रहे तो उन लोगों ने उन्हें कमरे में छोड़ दिया। मजिस्ट्रेट ने वकील की बातें सुनने के बाद वाई सिक्योरिटी सुरक्षा की मौजूदगी में उनकी मेडिकल जाँच के निर्देश दिए हैं।

सीआईडी के एडिशनल एसपी ने बताया है कि राजू के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया था। YSRCP सांसद कृष्णम राजू आंध्र प्रदेश में धर्मांतरण में लिप्त ईसाई मिशनरियों के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे हैं। पूर्व में अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं से जान का खतरा होने की बात भी वे कह चुके हैं।

राजू की गिरफ्तारी तब हुई है जब उन्होंने 27 अप्रैल को CBI की विशेष अदालत से मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की जमानत रद्द करने की माँग की थी। उन्होंने कहा था कि जगन मोहन रेड्डी ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है। उन्हें आईपीसी की धारा 50(2), 124(A), 153 और 505 के तहत नोटिस देने के बाद गिरफ्तार किया गया। राजू के परिजनों ने गिरफ़्तारी का विरोध भी किया। बावजूद उन्हें गिरफ्तार करके गुन्टूर के सीआईडी ऑफिस ले जाया गया।  

ट्विटर पर पायल मेहता नाम की एक यूजर ने कृष्णम राजू की हिरासत की तस्वीरें पोस्ट की हैं जिनमें कृष्णम राजू के पैरों में निशान देखे जा सकते हैं।

राजू ने अपनी ही पार्टी से जान को ख़तरा बताते हुए केन्द्रीय सुरक्षा की माँग की थी। उन्होंने जून 2020 में कहा था कि पार्टी के विधायक और समर्थक लगातार उन्हें जान से मार डालने की धमकी दे रहे हैं और राज्य सरकार तथा स्थानीय प्रशासन उनकी शिकायतों पर ध्यान नहीं दे रहा है। मई 2020 में एक न्यूज़ डिबेट में उन्होंने कहा था कि आंध्र प्रदेश में मिशनरी के लोग खुलेआम धर्मांतरण हो रहा है।

जब आंध्र प्रदेश में तिरुपति तिरुमला देवस्थानम बोर्ड (TTD) ने मंदिर की संपत्ति को नीलाम करने का निर्णय लिया था तब राजू ने हिन्दुओं की भावनाओं को देखते हुए इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी। हाउस-साइट डिस्ट्रीब्यूशन और बालू बेचने में हुए भ्रष्टाचार को लेकर भी उन्होंने मंदिर प्रशासन पर सवाल खड़े किए थे] जिसके बाद उनकी अपनी ही पार्टी विधायकों के साथ तीखी बहस हुई थी। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के होते ईसाईकरण का विरोध करने पर जब एक सांसद को उसी की पार्टी के राज्य में इतनी उत्पीड़िन झेलनी पड़ रही है, आम नागरिक का क्या हाल होता होगा, कल्पना की जा सकती है। अब किसी को कोई असहिष्णुता नज़र नहीं आ रही। कहां है #intolerance गैंग?

आंध्र प्रदेश में धर्मांतरण के मुद्दे पर राजू ने एक चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा था कि प्रदेश में सरकारी आँकड़ों में भले ईसाइयों की संख्या 2.5% बताई जाती है, लेकिन वास्तविकता में यह 25% से कम नहीं है। गौरतलब है कि आंध्र प्रदेश में धर्मांतरण को लेकर साल 2019 में खबर आई थी कि जगन मोहन रेड्डी सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाओं को रफ़्तार देने पर फोकस नहीं है। वह लोगों को मुफ़्त में चीजें देने की नीति पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इससे न सिर्फ़ सार्वजनिक संपत्ति को भारी क्षति पहुँच रही है, बल्कि राज्य में धर्मांतरण को भी बढ़ावा मिल रहा है।

मद्रास हाई कोर्ट में मुस्लिम बहुल इलाके की याचिका : हिन्दू त्योहार ‘पाप’, हमारी गलियों से नहीं निकलने दें जुलूस

तमिलनाडु के पेरंबलुर जिले का वी कलाथुर मुस्लिम बहुल इलाका है, जहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। यहाँ का बहुसंख्यक समुदाय हिन्दू मंदिरों से जुलूस या भ्रमण निकालने का लंबे समय से विरोध करता रहा है। इसी को लेकर मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, इलाके के कुछ स्थानीय मुस्लिम 2012 से हिन्दू जुलूसों को निकाले जाने का विरोध कर रहे थे। इन इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिन्दू त्योहारों को ‘पाप’ करार दे रखा था। इसी को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता ने अनुष्ठानों और जुलूसों के संचालन के दौरान सुरक्षा प्रदान करने के लिए पुलिस से संपर्क किया था। आश्चर्य यह कि सुरक्षा एजेंसियों ने इन अनुरोधों को कुछ प्रतिबंधों के साथ मान भी लिया था।

देश में 'गंगा-जमुनी तहजीब' का भ्रमिक नारा, #intolernce (असहिष्णुता), 'संविधान की दुहाई' और 'सेकुलरिज्म की दुहाई' देने वाले आदि गैंगस्टर मद्रास के इन कट्टरपंथियों पर चुप क्यों? क्या इन सबके घरों में कोई अनहोनी हो गयी है? समय है इन कट्टरपंथियों के विरुद्ध खड़े होने का। कोर्ट ने तो अपना काम कर दिया, अब काम उन पाखंडी हिन्दुओं का है जो इन कट्टरपंथियों की हाँ में हाँ मिलाकर इन भ्रमित नारों को बुलंद कर रहे हैं। जब इन कट्टरपंथियों को इनकी अपनी कौम ही नहीं समझा सकी, तुम लोगों की क्या बिसात।  

इस मामले में सुनवाई करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस एन किरुबकर्ण और पी वेलमुरुगन की 2 सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला सुनाया। बेंच ने धार्मिक असहिष्णुता को देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए खतरनाक बताया है। कोर्ट ने कहा कि अगर एक पक्ष से संबंधित धार्मिक त्योहारों के आयोजन का विरोध दूसरे धार्मिक समूह द्वारा किया जाता है, तो इससे दंगे और अराजकता फैल सकती है।

पुलिस उपाधीक्षक के हलफनामे को पढ़ने के दौरान मद्रास उच्च न्यायालय ने देखा कि 2012 के बाद से मंदिर के जुलूसों पर आपत्ति जताई गई थी। जबकि, उससे पहले इस तरह की कोई समस्या नहीं थी। न्यायालय ने जानकारी दी कि मंदिरों से जुलूस निकालने को लेकर कोर्ट की अनुमति के बावजूद मुस्लिम कट्टरपंथियों ने आपत्ति जताई। (डिस्ट्रिक्ट मुनिसीपैलिटी एक्ट 1920 के सेक्शन 180 ए के अनुसार)।

मद्रास हाई कोर्ट का फैसला 

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले के दौरान टिप्पणी की, “केवल इसलिए कि एक धार्मिक समूह विशेष इलाके में हावी है, इसलिए दूसरे धार्मिक समुदाय को त्योहारों को मनाने या उस एरिया की सड़कों पर जुलूस निकालने से नहीं रोका जा सकता है। अगर धार्मिक असहिष्णुता की अनुमति दी जाती है, तो यह एक धर्मनिरपेक्ष देश के लिए अच्छा नहीं है। किसी भी धार्मिक समूह द्वारा किसी भी रूप में असहिष्णुता पर रोक लगाई जानी चाहिए।”

अदालत ने आगे कहा, “इस मामले में, एक विशेष धार्मिक समूह की असहिष्णुता उन त्योहारों पर आपत्ति जताते हुए दिखाई जा रही है, जो दशकों से एक साथ आयोजित किए जा रहे हैं। गलियों और सड़कों से निकलने वाले जुलूस को सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित करने की माँग की गई क्योंकि इलाका मुस्लिम बहुल है यहाँ कोई भी हिन्दू त्योहार या जुलूस नहीं निकाला जा सकता है।”

इस मामले में जजों ने एक साथ दोहराया कि इलाके में एक धार्मिक समूह का वर्चस्व होने के कारण दूसरे धार्मिक समूहों और जुलूसों को इलाके से नहीं हटा सकते। न्यायालय ने तर्क दिया कि अगर इस तरह के मामलों को स्वीकार किया गया, तो कोई भी अल्पसंख्यक समुदाय देश के ज्यादातर हिस्सों में अपने त्योहारों को मना ही नहीं पाएगा। मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि इस तरह के विरोध से धार्मिक लड़ाई झगड़े बढ़ेंगे, दंगे भड़केंगे, जिसमें जानें जाएँगी और जानमाल का भारी नुकसान झेलना पड़ेगा।

बंगाल हिंसा वाली रिपोर्ट राज्यपाल तक नहीं पहुँचे: ममता बनर्जी का ऑफिसरों को आदेश

यदि ममता बनर्जी के प्रथम कार्यकाल से ही हिन्दुओं पर हो रहे प्रहारों को भाजपा ने गंभीरता से लिया होता, आज बंगाल की सत्ता भाजपा के हाथों में होती और जितनी सीटें अभी संपन्न हुए चुनाव में आयी हैं, उससे अधिक पिछली विधान सभा में होतीं। फिर ममता द्वारा बांग्लादेशियों, रोहिंग्यों आदि के आधार कार्ड और पहचान पत्र आदि बनाए जाने के मुद्दे को भी भाजपा ने गंभीरता से नहीं लिया। वैसे यथासंभव दिल्ली की भी ऐसी ही स्थिति है, लेकिन दिल्ली भाजपा भी सोई हुई है। दिल्ली से लेकर बंगाल तक हिन्दुओं पर होते हमलों पर सारे छद्दम सेक्युलरिस्ट, संविधान की दुहाई देने वाले, #award vapasi, #mob lynching, #intolerance और "गंगा-जमुनी तहजीब" का नारे आदि लगाने वाले गैंगस्टर खामोश हैं, क्यों? यदि यही विपरीत दुर्घटनाएं किसी भाजपा शासित राज्य में हो रही होती, सबके सब सड़क से लेकर UNO तक पहुँच गए होते।  

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर यह आरोप लगाया है कि उन्होंने राज्य के अधिकारियों को चुनाव परिणाम के बाद शुरू हुई हिंसा पर रिपोर्ट देने से मना कर दिया। हिंसा पर आधारित यह रिपोर्ट राज्यपाल को दी जानी थी लेकिन सीएम ममता बनर्जी के कहने पर गृह सचिव ने राज्य की कानून व्यवस्था की रिपोर्ट राज्यपाल को दी ही नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि डीजीपी और पुलिस कमिश्नर द्वारा दी गई रिपोर्ट भी आगे नहीं बढ़ाई गई।

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने हिंदुस्तान टाइम्स के विनोद शर्मा से बात करते हुए उक्त आरोप लगाए हैं। इसके अलावा उन्होंने ट्वीट करके भी यह जानकारी साझा की।

Another sleepless night with reports of rampant post poll violence continually pouring. Ashamed of such anarchy and lawlessness @MamataOfficial.

In morning another shocker from print media! All is well ? How can this be ?

And today Central Minister attacked. pic.twitter.com/xgKlEltWeJ

— Governor West Bengal Jagdeep Dhankhar (@jdhankhar1) May 6, 2021

चुनाव बाद शुरू हुई हिंसा पर बात करते हुए राज्यपाल धनखड़ ने कहा कि बंगाल में 02 मई को विधानसभा चुनाव परिणाम के आने के बाद से ही हत्या, लूटपाट और महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ अपराध जारी है। ऐसे में राज्यपाल ने बताया कि उन्होंने राज्य के गृह सचिव, डीजीपी और कोलकाता पुलिस कमिश्नर को हिंसा की रिपोर्ट देने के लिए आदेशित किया। उन्होंने बताया कि इस दौरान उनके द्वारा कई बार मुख्यमंत्री से बात की गई लेकिन उनके द्वारा किसी भी प्रकार का कोई एक्शन नहीं लिया गया।

राज्यपाल धनखड़ से यह प्रश्न किया गया कि हिंसा प्रारंभ होने के समय ममता बनर्जी ने राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ नहीं ली थी तो क्या उन पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होंने अधिकारियों को रिपोर्ट सबमिट करने से मना किया होगा?

इस पर राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने उत्तर देते हुए कहा कि राज्य गृह सचिव ने उनसे खुद यह बात कही कि उन्हें ममता बनर्जी द्वारा रिपोर्ट न देने के बारे में निर्देश आया था। इसके अलावा गृह सचिव ने राज्यपाल धनखड़ को यह भी अवगत कराया कि उन्हें डीजीपी और पुलिस कमिश्नर द्वारा राज्य कानून व्यवस्था पर दी गई रिपोर्ट भी राज्यपाल को न देने का निर्देश दिया गया था। राज्यपाल ने बताया कि 03 मई को चुनाव आचार संहिता समाप्त होने के बाद ममता बनर्जी के पास मुख्यमंत्री की सभी शक्तियाँ थीं।

ममता बनर्जी के शपथ ग्रहण के बाद वक्तव्य देने के प्रश्न पर राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कहा कि स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ही इसके लिए उनसे आग्रह किया था और राज्य में लगातार चल रही हिंसा को देखते हुए उन्होंने इस मुद्दे को शपथ ग्रहण के बाद उठाना उचित समझा।

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने हिंसा के दौरान राज्य का दौरा किया और हिंसा से पीड़ित लोगों से मिले। भाजपा अध्यक्ष के इस दौरे पर अपनी राय देते हुए बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कहा कि वह एक संवैधानिक प्रमुख हैं और भाजपा अध्यक्ष के दौरे के विषय में विचार करना उनका अधिकार क्षेत्र नहीं है जब तक कि Covid-19 के प्रोटोकॉल्स का कोई उल्लंघन न हो। उन्होंने कहा कि वर्तमान में बंगाल की स्थिति को देखते हुए यह आवश्यक है कि सभी पार्टियाँ इस मुद्दे पर आगे आएँ और लोगों में विश्वास उत्पन्न करें।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद से ही लगातार हिंसा हो रही है। भाजपा के कार्यकर्ताओं को प्रमुख रूप से निशाना बनाया जा रहा है। हजारों की तादाद में भाजपा कार्यकर्ता बंगाल से पलायन कर रहे हैं और असम की ओर जा रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में न केवल राज्यपाल अपितु गृह मंत्रालय ने भी राज्य में हो रही हिंसा की रिपोर्ट माँगी लेकिन उचित कार्रवाई न होने पर गृह मंत्रालय ने अपनी एक 4 सदस्यीय टीम बंगाल भेजी है जो सीधे गृह मंत्रालय को हिंसा की रिपोर्ट सौंपेगी।

तांडव मुद्दा : हिन्दुओं के आराध्यों का अपमान बन गया है कमाई का जरिया: इलाहाबाद हाई कोर्ट

                                तांडव मामले में अपर्णा पुरोहित की अग्रिम जमानत याचिका खारिज
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) से ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजॉन प्राइम इंडिया की नेशनल हेड अपर्णा पुरोहित को बड़ा झटका लगा है। ‘तांडव’ वेब सीरीज (Tandav Web Series) को लेकर दर्ज एफआईआर के मामले में हाईकोर्ट ने अमेजॉन प्राइम की इंडिया हेड अपर्णा पुरोहित की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी है। अपर्णा पुरोहित पर यूपी पुलिसकर्मियों का गलत चित्रण, हिंदू देवी-देवताओं और प्रधानमंत्री के किरदार को गलत तरह से पेश किए जाने का आरोप लगाया गया है।

पुरोहित की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने 20 पेज के आदेश में कहा, “ऐसे लोग बहुसंख्यक समुदाय के आराध्य देवी देवताओं को गलत तरह से दिखाकर इसके जरिए पैसा कमाना चाहते हैं और देश की उदार और सहिष्णु परंपरा का फायदा उठाना चाहते हैं।”

न्यायाधीश ने आगे कहा कि जब देश के किसी नागरिक द्वारा इस तरह के अपराध किए जाते हैं और इसे प्रदर्शन और सामाजिक विरोध का विषय बना दिया जाता है तो वो देख के हितों के लिए सक्रिय हो जाते हैं। इसके बाद वो इसे विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाते हैं और आरोप लगाते हैं कि भारतीय नागरिक असहिष्णु हो गए हैं और ‘भारत’ रहने के लिए असुरक्षित जगह बन गया है।

 

        अपर्णा पुरोहित की जमानत याचिका को खारिज करते हुए इलाहाबाद HC की एकल न्यायाधीश पीठ की टिप्पणी
स्टैंड-अप ‘कॉमेडियन’ मुन्नवर फारुकी, जिसे इंदौर पुलिस ने गिरफ्तार किया था और शहर में एक शो के दौरान हिंदू देवताओं और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बारे में अभद्र टिप्पणी करने के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया था, का संदर्भ देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि हिंदुओं के आराध्यों का अपमान कमाने के जरिया के स्रोत के रूप में उपयोग किया जाता है।

वेब सीरीज के विवादित दृश्यों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा, “विवादित दृश्यों के कारण कानून व्यवस्था के लिए खतरा फैलाने वाले हैं। हिंदू देवी देवताओं के चित्रण को सही नहीं ठहराया जा सकता है। विदेशी फिल्ममेकर्स ईसा मसीह या हजरत मोहम्मद को गलत तरीके से दिखाने से बचते हैं मगर हिंदी फिल्ममेकर्स लगातार गलत तरह से हिंदू देवी-देवताओं को अभी तक दिखा रहे हैं।”

जज ने इस बात को लेकर चिंता जताई कि हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने का यह ट्रेंड फिल्मों से लेकर कॉमेडी शो तक कैसे चला। आगे कहा गया है कि आवेदक (अपर्णा पुरोहित) ने सतर्कता नहीं बरती और गैर-कानूनी तरीके से उसे आपराधिक कार्यवाही के लिए विवश किया।

अदालत ने कहा, “हमें देखने में आया है कि कई फिल्मों में हिंदू देवी-देवताओं के नाम का उपयोग किया गया है और उन्हें गलत ढंग से दिखाया गया है जैसे ‘राम तेरी गंगा मैली’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’, ‘पीके’, ‘ओह माई गॉड’ आदि में। यही नहीं, ऐतिहासिक और पौराणिक हस्तियों की छवि भी विकृत करने के प्रयास किए गए हैं। बहुसंख्यक समुदाय की आस्था से जुड़े नामों का उपयोग पैसा कमाने के लिए किया गया है, जैसे कि ‘गोलियों की रासलीला रामलीला।” उन्होंने कहा कि हिंदी फिल्म उद्योग की यह प्रवृत्ति बढ़ रही है और यदि समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो इसके भारतीय सामाजिक, धार्मिक और सांप्रदायिक स्थिति के लिए विध्वंसक परिणाम होंगे।

कोर्ट ने कहा कि उक्त मामलों से पता चलता है कि याचिकाकर्ता और अन्य सह आरोपितों के कृत्य से केवल एक व्यक्ति ही प्रभावित नहीं है, बल्कि देश भर में अनेक लोगों को लगता है कि यह वेब सीरीज उनकी भावना को ठेस पहुँचाती है। इसलिए आवेदक को किसी तरह की राहत देना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि जो फिल्म बहुसंख्यक समुदाय के मूल अधिकारों का हनन करती है उसे प्रदर्शित करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है और याचिकाकर्ता के जीवन की स्वतंत्रता के मूल अधिकार को बचाव का आधार रखते हुए अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती है।

इस याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस सिद्धार्थ ने कहा, एक तरफ तो गलत तरीके से किरदार दिखाने के कारण एक बड़े समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई गई है और दूसरी तरफ सवर्ण और दलित जातियों के बीच दूरी बढ़ाए जाने का काम किया है, जबकि राज्य की जिम्मेदारी समुदायों के बीच की दूसरी को कम कर सामाजिक, सांप्रदायिक और राजनीतिक तौर पर उन्हें एक कर देश को जोड़ने का काम करना है।”

अग्रिम जमानत अर्जी खारिज होने के बाद अपर्णा पुरोहित की मुश्किलें बढ़ सकती हैं और पुलिस उन्हें गिरफ्तार भी कर सकती है। इससे पहले कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखे जाने तक अपर्णा पुरोहित की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। 

गौतम बुद्ध नगर जिले में अपर्णा पुरोहित समेत अन्य के खिलाफ तांडव वेब सीरीज के प्रसारण के जरिए हिंदू देवी-देवताओं और हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई गई थी। अपर्णा पुरोहित और अन्य के खिलाफ धारा 153- A (1) (B), 295- A, 505 (1) (B), 505 (2) धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। पिछले दिनों अपर्णा का बयान बंद कमरे में दर्ज किया गया। लगभग साढ़े 3 घंटे तक उनका बयान दर्ज किया गया।

दिल्ली : कहाँ है mob lynching और intolerance गैंग, अंकित और राहुल की हत्या के बाद अब सुशील की हत्या?

उत्तर प्रदेश के हाथरस की घटना पर हंगामा करने वाले अंकित, राहुल की हत्या पर मुंह में दही जमाए बैठे रहे और अब सुशील की हत्या पर। कहाँ है #mob lynching, intolerance, गंगा-जमुनी तहजीब राग रागने वाला गैंग और इनकी समर्पित पार्टियां एवं मीडिया? क्यों नहीं अरविन्द केजरीवाल के विरुद्ध आवाज़ उठाते? क्या इन पाखंडियों को भाजपा शासित राज्यों में किसी भी घटना को राई का पहाड़ बनाना आता है? 
दिल्ली में एक व्यक्ति की सिर्फ इसीलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि उसने तेज़ आवाज़ में बज रहे गाने पर आपत्ति जताई। मंगलवार (अक्टूबर 27, 2020) को हुई इस घटना में 29 साल के सुशील की हत्या कर दी गई और उनके दोनों भाइयों को पीट-पीट कर घायल कर दिया गया। इस मामले में सुशील के ही पड़ोसी अब्दुल सत्तार और उसके 4 बेटों पर हत्या का मामला दर्ज किया गया है। ये घटना महेंद्र पार्क थाना क्षेत्र की है।

अब्दुल सत्तार के घर में काफी तेज़ आवाज़ में डीजे बज रहा था, जिससे आसपास के लोगों को खासी परेशानी हो रही थी। उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के सराय पीपल थाला क्षेत्र में ये घटना मंगलवार को दोपहर में हुई। अब्दुल सत्तार और उसके 4 बेटों सहित 6 लोगों ने सुशील के परिवार पर हमला किया, जिसमें से 4 को गिरफ्तार कर लिया गया है और 2 अभी भी फरार हैं। इन सभी के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया है।

उस इलाके में पुलिस को तैनात कर दिया गया है क्योंकि मामला दो समुदायों के बीच का होने के कारण आशंका है कि सांप्रदायिक तनाव फ़ैल सकता है। पुलिस का कहना है कि उसे मामले की पूरी जानकारी है और कार्रवाई भी की जा रही है, ऐसे में किसी को भी अफवाहों पर भरोसा करने की ज़रूरत नहीं है। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ की खबर के अनुसार, एडिशनल डीएसपी विक्रम हरिमोहन मीणा ने कहा कि इस मामले में कोई सांप्रदायिक एंगल नहीं है।

उन्होंने कहा कि ये दो पड़ोसी परिवारों का मामला है, जो तेज़ में गाने बजाने को लेकर लड़ गए। दिल्ली पुलिस ने बताया कि बृहस्पतिवार की दोपहर 3:15 बजे उनके कण्ट्रोल रूम को एक कॉल आई जिसमें बताया गया कि आदर्श नगर मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 4 के पास के इलाके में स्थित एक झोपड़पट्टी में लड़ाई-झगड़ा हो रहा है। वहाँ पहुँची पुलिस ने देखा कि सुशील व उनके दोनों भाइयों पर अब्दुल सत्तार व उसके परिवार के 6 लोगों ने हथियारों से हमला किया गया था।

तुरंत ही घायलों को बाबू जगजीवन राम मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया। सुशील की मौत हो गई। उनके दोनों भाइयों सुनील और अनिल का बयान दर्ज किया गया है। उन्हें इलाज के लिए सफदरगंज अस्पताल रेफर किया गया है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि इन तीनों पर चाकुओं से हमला किया गया था। पीड़ित परिवार का कहना है कि आरोपित पहले से हत्या की ताक में थे, तेज़ आवाज़ में गाने बजाना तो एक बहाना था।

PTI की खबर के अनुसार, अब्दुल सत्तार आज़ादपुर मंडी में लहसुन का व्यापार करता है। उसके चारों बेटे का नाम शाहनवाज, आफ्ताक, चाँद और हसीं है। इस घटना में अब्दुल की पत्नी शाहजहाँ को भी चोट आई है। हालाँकि, सुशील के बारे में पुलिस ने बताया है कि उस पर पहले शराब की तस्करी का आपराधिक मामला दर्ज था। सुशील की पत्नी और एक बेटा है। शाहनवाज और आफ्ताक को गिरफ्तार कर लिया गया है। अनिल की हालत अभी भी गंभीर है।

आदर्श नगर इलाके में ही हुई थी राहुल की हत्या

ज्ञात हो कि दिल्ली के आदर्श नगर में ही कुछ दिनों पहले राहुल राजपूत की हत्या कर दी गई थी। 19 वर्षीय राहुल राजपूत दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के स्कूल ऑफ ओपन लर्निग (SOS) से बीए अंग्रेजी ऑनर्स की पढ़ाई कर रहा था। उसकी लड़की दोस्त ने बताया था कि वो कहती रही कि राहुल की तबियत खराब है, उसे मत मारो – लेकिन उसके भाई मुहम्मद और अफरोज उसे पीटते रहे। पिटाई के समय राहुल को किशोरी बचाने की कोशिश कर रही थी। 

राजनीति से प्रेरित बलात्कार पर मचता शोर

                                     प्रतीकात्मक 
जब भी देश के किसी भी कोने में चुनाव होने को होते हैं, विपक्ष सरकार की नाकामी पर प्रहार करने की बजाए कभी #me too, #intolerance, #award vapasi, #not in my name, #mob lynching और #freedom of expression आदि गैंग जनता को भ्रमित करने सडकों पर उतर आते हैं। क्योकि मोदी सरकार का विरोध करने लायक इनके पास कोई मुद्दा ही नहीं है। जबकि मुद्दे बहुत हैं, परन्तु विपक्ष को डर है कि कहीं सत्ता पक्ष उन्ही मुद्दों पर विपक्ष को ही घेर कर कहीं का न छोड़े। इन्ही लोगों के कांड जानने के लिए नीचे दिए लिंक का गंभीरता से मनन कर वास्तविकता से रूबरू हों।  
ये वही विपक्ष है जब अखिलेश यादव के कार्यकाल में बलात्कार होने पर मुलायम सिंह ने कहा था कि "बच्चों से गलती हो जाती है", किसी के विरोधी स्वर नहीं निकले, सब मुंह में दही जमाए बैठे रहे। दूसरे, उत्तर प्रदेश की घटनाओं पर इतना अधिक हंगामा करने वाले अपने शासित राज्य राजस्थान में चुप्पी साध लेते हैं। क्यों? आखिर इस दोगली नीति से कब तक जनता को भ्रमित किया जाता रहेगा?   

वर्तमान विपक्ष जनता को यह भी बताए कि उनके कार्यकाल में क्या बलात्कार नहीं हुए? लेकिन कोई शोर नहीं मचा। पार्षद नौकरी दिलाने अथवा स्थायी करवाने के महिला अध्यापिकाओं को देर रात घर बुलाकर अपनी रातें रंगीन करते थे। विश्वास न हो 80 दशक के पंजाब केसरी का अवलोकन करें। तंदूर कांड और न जाने कितने कांड हुए। कुछ प्रकाश में आ गए और कुछ ठंठे बस्ते में दफ़न हो गए।   

लेकिन अब पिछले कुछ दिनों से अपहरण और बलात्कार की जिन घटनाओं ने देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है, वे पहली बार हुई हों ऐसा तो नहीं है और आगे भी वे नहीं होंंगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। हमें तो बचपन से सिखा दिया जाता है कि लड़की लडके में फर्क तो ईश्वर ने ही कर दिया है तभी तो वह शारीरिक रूप से कमजोर है, कि वह तो घर की इज्जत है। उसे किसी ने छू लिया या उसका दैहिक शोषण किया तो घर की इज्जत तो गई ही उस लड़की का लोक परलोक भी गया; मुंह छिपा कर जीने के सिवाय उसके पास और कोई उपाय है क्या ? इसके बावजूद आजतक किसी भी मां-बाप या उसके अध्यापक ने उसे अच्छी बुरी छुवन का फर्क समझाना भी कभी जरूरी नहीं समझा; कुल मिला कर इन सब का नतीजा यह निकला कि हमने इतिहास से कभी कोई सबक नहीं सीखा। हमारे आसपास ऐसे हादसे रोज होते रहे और हम यह सोच कर मुंह ढांप कर सोते रहे कि छोड़ो यार हमारे साथ ऐसा थोड़े न हुआ है !

भले ही कुछ दिनों से अपहरण और बलात्कार की जिन घटनाओं ने देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है, वे पहली बार हुई हों ऐसा तो नहीं है और आगे भी वे नहीं होंंगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। हमें तो बचपन से सिखा दिया जाता है कि लड़की लडके में फर्क तो ईश्वर ने ही कर दिया है तभी तो वह शारीरिक रूप से कमजोर है, कि वह तो घर की इज्जत है। उसे किसी ने छू लिया या उसका दैहिक शोषण किया तो घर की इज्जत तो गई ही उस लड़की का लोक परलोक भी गया ; मुंह छिपा कर जीने के सिवाय उसके पास और कोई उपाय है क्या ? इसके बावजूद आजतक किसी भी मां-बाप या उसके अध्यापक ने उसे अच्छी बुरी छुवन का फर्क समझाना भी कभी जरूरी नहीं समझा; कुल मिला कर इन सब का नतीजा यह निकला कि हमने इतिहास से कभी कोई सबक नहीं सीखा। हमारे आसपास ऐसे हादसे रोज होते रहे और हम यह सोच कर मुंह ढांप कर सोते रहे कि छोड़ो यार हमारे साथ ऐसा थोड़े न हुआ है !

गनीमत है कि जागरूक और जिम्मेदार मीडिया ने 1972 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर की एक आदिवासी लड़की मथुरा का केस उछाल दिया वरना इस देश में आदिवासी और दलित लड़कियों/महिलाओं की भी भला कोई इज्जत होती है !!! जब चाहो चुटकियों में मसल दो, कोई आंख तक उठा कर नहीं देखेगा । दो स्थानीय सिपाहियों ने बलात्कार किया था उस आदिवासी लड़की मथुरा का। पर असल बात तो अभी बताई ही नहीं। ऐसा जघन्य अपराध करने के बावजूद सरकार उन पर मुकदमा नहीं चलाती, बल्कि शाबासी देते हुए उनका केस लड़ती है ! सरकारी पक्ष अदालत में इसे उचित ठहराते हुए दलील देता‌ है कि मथुरा को तो अलग अलग मर्दों के साथ शारीरिक संबंध बनाने की ‘आदत’ है। सरकारी वर्दीधारी आरोपी हों और जबरदस्ती बनाए गए सरकारी गवाह, तो‌ फैसला क्या होगा अनुमान लगाना कठिन नहीं है ! देखते ही देखते बरी हो गए वे दोनों सिपाही जिला अदालत से। हाई कोर्ट की कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया और मामले का निपटारा आज 46 साल के बाद भी नहीं हुआ।

1973 में एक क्रूरतम बलात्कार का शिकार हुई थी केरल की नर्स अरुणा शानबाग जिसकी मौत 42 साल कोमा में रहने के बाद हुई। चूँकि उस समय तक सोडोमी को कोई अपराध ही नहीं माना जाता था, इसलिए आरोपी पर बलात्कार कानून के तहत न तो कोई केस चला और न हीं कोई सजा हुई।

बलात्कार के घृणित मामलों में भी जाति और वर्ण कितनी अहम भूमिका निभाता है इसका एहसास एक बार फिर 1992 में हुए भंवरी देवी मामले में हुआ। छोटी सी सामाजिक कार्यकर्ता भंवरी देवी राजस्‍थान के भतेरी गांव में काम कर रही थीं। उसने जब बाल विवाह के खिलाफ बोलना शुरू किया तो यह ऊंची जाति के लोगों को सहन नहीं हुआ। उसे सबक सिखाने के लिए पांच लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया। बहुत दिनों तक मीडिया में बने रहने के बावजूद भंवरी देवी को छोटी जाति का होने की वजह से आज तक न्याय नहीं मिल सका।

1996 में सामने आया 25 साल की प्रियदर्शिनी मट्टू का मामला जो दिल्ली में कानून की पढ़ाई कर रही थी। सतोष कुमार सिंह नामक शख्स ने उसी के घर में बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी थी। इस केस में भी स्‍थानीय अदालत ने संतोष कुमार सिंह को बरी कर दिया था।

2005 में हुए इमराना रेप ने तो अलग धर्म के लिए अलग कानून की नई समस्या ही देश के सामने खड़ी कर दी । इस मामले में उत्तर प्रदेश के एक गांव में इमराना का बलात्कार उसके अपने ससुर ने ही किया था। फिर भी गांव के बुजुर्गों ने इसे आपसी सहमति का मामला माना और इमराना को फरमान सुनाया कि वह अपने पति को छोड़ कर अब से अपने ससुर को ही पति मान ले। लेकिन जागरूक मीडिया ने खबर खोद निकाली और नतीजतन मामला कोर्ट में पहुंचा और पीड़िता इमराना को न्याय देते हुए अदालत ने ससुर को 10 साल की सजा सुनाई।

2012 में सबसे ज्यादा भयानक और क्रूरतम रेप केस दिल्ली रेप केस निर्भया का माना जाता है जिसने देश को दहला कर रख दिया जिसके चलते संसद को एक कड़ा भी बनाना पड़ा। इसमें छः लोग शामिल थे जिनमें से एक नेआत्महत्या कर ली, चार को फांसी और एक नाबालिक को सुधार गृह भेजा गया।

लेकिन हुआ क्या? आज भी किसी न किसी जगह पर एक घंटे में चार रेप होते हैं; घरों में बाप और दूसरे रक्त संबंधी इन्हीं पाक रिश्तों की आड़ में उसे अपना शिकार बनाते हैं, पुलिस स्टेशनों तक में भी उनसे रेप किया जाता है !

क्या महिला सुरक्षित है?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ही साल 2013 से ले कर आज तक रोजाना 88 रेप और गैंगरेप की वारदातें होती हैं, यानी एक घंटे में चार ! ये तो वो आंकड़े हैं जिनकी रिपोर्ट हुई ! बहुत से मामलों में तो अलग अलग वजहों से रिपोर्ट तक नहीं होती ! कानून तो यह भी कहता है बिना सहमति पत्नी से शारीरिक संबंध बनाना भी रेप है ! लेकिन होता है और कोई महिला मुंह तक नहीं खोल पाती ! घर के अंदर ही नजदीकी रक्त संबंधी ही बच्चियों से बलात्कार कर जाते हैं लेकिन घर की बड़ी बूढ़ियाएं घर की इज्जत के नाम पर मामले को वहीं का वहीं दबा देती हैं! किससे फरियाद करें ये बेचारी बच्चियां?

घर भी अगर उनके लिए सुरक्षित स्थान नहीं है तो और कहां होगा ?

इस अवधि के दौरान तो किरण खेर जैसे सांसद बलात्कार को भारतीय संस्कृति का अंग तक बताने लगे हैं ! बलात्कारियो के समर्थन में तिरंगा लेकर जलूस तक निकलने लगे हैं ! धर्म (न्याय) से धड़ा प्यारा की नीति पर चलने वाली भाजपा सरकार के लिए हत्या, डकैती, बलात्कार जैसे अपराध तो जैसे अर्थहीन हो गए बशर्ते उन्हें करने वाले लोग आंख मूंद कर उसका समर्थन करते हों ! कथुआ, उन्नाव, अहमदाबाद से होते हुए हाथरस/ बलरामपुर तक एक लंबा सफर तय कर लिया है इन संगीन अपराधों ने ! मीडिया, अदालत, दूसरी सांविधिक संस्थाओं पर जबरदस्त पकड़ के बावजूद सरकार न तो‌ इसके खिलाफ जनमत ही खड़ा कर पाई है और न ही इस पर लगाम लगा पाने में कामयाब हो सकी है ! कई बार तो यह भी लगता है जैसे वह यौन अपराधों से मुंह ही मोड़ चुकी है और चुपचाप अपराधियों के साथ खड़ी हो गई है !

अवलोकन करें:-

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यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को जल्द से जल्द न्याय दिलाने के लिए देश में 275 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए हैं। लेकिन ये कोर्ट भी महिलाओं को कम वक्त में न्याय दिलाने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं।

  • महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े 332 से ज्यादा मामले इस वक्त सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।
  • देश भर के उच्च न्यायालयों में ऐसे लंबित मामलों की संख्या 31 हज़ार 386 है।
  • देश की निचली अदालतों में 95 हज़ार से ज्यादा महिलाओं को न्याय का इंतज़ार है।