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राजदीप सरदेसाई ने रथ यात्रा पर फैलाया TMC का प्रोपेगेंडा तो इंडियन एक्सप्रेस निकला एक कदम आगे: ममता सरकार के बनाए मंदिर को बता दिया पुरी जगन्नाथ धाम के बराबर

        सागरिका घोष (बाएं), द इंडियन एक्सप्रेस (दाएं) के साथ राजदीप सरदेसाई(फोटो साभार -ऑपइंडिया इंग्लिश)
‘प्रोपेगेंडा बाज’ राजदीप सरदेसाई ने ममता बनर्जी की चरणवंदना की सभी हदें पार कर दी हैं। इसी कड़ी में राजदीप सरदेसाई ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। दरअसल, इस बार उन्होंने ओडिशा के पुरी में बने 900 साल पुराने जगन्नाथ धाम की तुलना पश्चिम बंगाल के दीघा में ममता बनर्जी सरकार द्वारा बनाए गए नए जगन्नाथ मंदिर से कर दी है।

राजदीप को पुरी जगन्नाथ धाम की तुलना दीघा से करने पहले पुरी का इतिहास पढ़ लेना चाहिए था, जबरदस्ती में उल्टियां कर गंद मत फैला। जगन्नाथ जी के मन्दिर और धाम में जमीन आसमान का फर्क है महामूर्ख पत्रकार। राजदीप जैसे जयचंदियों की वजह से गौरवमयी हिन्दू सम्राट का पतन हुआ था। इन सनातन विरोधियों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि संयम की भी एक सीमा होती है।   

मौजूदा समय में पुरी जगन्नाथ की रथ यात्रा चल रही है। इस पवित्र मौके को भी उन्होंने ममता सरकार के लिए प्रोपेगेंडा फैलाने में इस्तेमाल किया। ऐसे में शुक्रवार (27 जून 2025) को राजदीप ने ट्वीट किया, “जगन्नाथ यात्रा के अब दो ठिकाने हैं: एक असली पुरी में, दूसरा नया दीघा में।”

                                                       राजदीप सरदेसाई के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

ये ट्वीट एक सोची-समझी चाल का हिस्सा लगता है, जिसमें पुरी के ऐतिहासिक जगन्नाथ धाम को दीघा के नए मंदिर के बराबर दिखाने की कोशिश की गई। बता दें, दीघा का मंदिर अभी दो महीने पहले ही (30 अप्रैल 2025) को खुला है।

माना जा रहा है कि यह ममता बनर्जी की सरकार की एक रणनीति है, जो हिंदू भावनाओं को भुनाकर आगामी विधानसभा चुनावों में लाभ लेना चाहती है। टीएमसी सरकार द्वारा बनाए गए दीघा मंदिर को पुरी के पौराणिक मंदिर के समकक्ष दिखाने की यह कोशिश न केवल धार्मिक परंपराओं का अपमान है, बल्कि जनता की आस्था से भी सीधा खिलवाड़ है। इस बयान को लेकर सोशल मीडिया से लेकर धार्मिक संस्थानों तक विरोध हो रहा है।

कौन हैं राजदीप सरदेसाई?

राजदीप सरदेसाई की पत्नी सागरिका घोष पहले पत्रकार थीं और अब तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की राज्यसभा सांसद हैं। ऐसे में राजदीप का ये ट्वीट TMC के लिए प्रचार करने की कोशिश माना जा रहा है। रथ यात्रा जैसे पवित्र मौके पर उन्होंने ऐसा दिखाने की कोशिश की जैसे ममता सरकार ने दीघा में भगवान जगन्नाथ के लिए कोई नया और खास ठिकाना बना दिया हो।

दरअसल, यह टीएमसी सरकार की चुनाव से पहले हिंदू वोटरों को लुभाने की कोशिश मानी जा रही है। सालों तक मुस्लिम तुष्टिकरण और ‘बाहरी बनाम बंगाली’ जैसे नैरेटिव पर चलने वाली पार्टी को अब समझ आ गया है कि सिर्फ इन्हीं बातों से चुनाव नहीं जीता जा सकता।

इसलिए अब पार्टी दीघा में बने जगन्नाथ मंदिर जैसे धार्मिक प्रयासों को दिखाकर हिंदुओं को अपनी तरफ करने की कोशिश कर रही है। राजदीप सरदेसाई के इस पोस्ट इसी एजेंडा को बढ़ावा देने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

इंडियन एक्सप्रेस ने भी फैलाया ऐसा ही झूठ

‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ ने भी शनिवार (28 मार्च 2025) को एक लेख छापा, जिसमें पुरी के जगन्नाथ धाम को दीघा के नए मंदिर के बराबर दिखाने की कोशिश की गई। लेख का शीर्षक था, “दीघा में नए जगन्नाथ मंदिर के उभरने के बीच ओडिशा ने पुरी में रथ यात्रा के लिए पूरी ताकत झोंक दी।” इस लेख में ऐसा दिखाया गया जैसे दोनों मंदिरों के बीच कोई तुलना हो सकती है।

                                            इंडियन एक्सप्रेस की समाचार रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

पुरी जगन्नाथ धाम और दीघा के मंदिर की कोई तुलना नहीं

पुरी के जगन्नाथ मंदिर और पश्चिम बंगाल के दीघा में बने नए जगन्नाथ मंदिर दोनों की आपस में न तो कोई तुलना हैं और न ही इनमें कोई प्रतिस्पर्धा है। पुरी का मंदिर 12वीं शताब्दी में राजा अनंतवर्मन चोडगंगा देव ने बनवाया था।
यह 900 साल पुराना है और हिंदू आस्था परंपरा और कलिंग शैली की वास्तुकला का केंद्र माना जाता है। इसका संचालन गजपति महाराजा की अध्यक्षता में एक समिति करती है। वहीं दीघा का मंदिर हाल ही में करीब दो महीने पहले खुला है और इसे पश्चिम बंगाल सरकार ने बनवाया है।
यह पुरी मंदिर की एक प्रतिकृति (रेप्लिका) मात्र भर है। इस मंदिर के उद्घाटन के समय ये विवादों में भी घिर गया था, खासकर ‘हलाल प्रसाद‘ और मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों को लेकर। ममता सरकार अब इस नए मंदिर को ‘जगन्नाथ धाम‘ कहकर राजनीतिक रूप से इस्तेमाल कर रही है, जिससे लोगों को यह भ्रम हो कि यह पुरी के प्राचीन मंदिर जितना ही महत्वपूर्ण है। इससे यह भी आरोप लग रहा है कि सरकार जानबूझकर असली जगन्नाथ धाम की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

TMC का दोहरा चरित्र हो चुका है बेनकाब

ममता सरकार ने जहाँ दीघा में नया मंदिर बनाकर हिंदुओं को लुभाने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल के मुस्लिम-बहुल मालदा जिले में 629 साल पुरानी ‘रथ मेला‘ पर रोक लगा दी। ये दिखाता है कि TMC की हिंदू-समर्थक छवि सिर्फ दिखावा है।

पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने साफ कहा है कि दीघा का मंदिर ‘भगवान जगन्नाथ के प्रति भक्ति से कोई लेना-देना नहीं रखता।’ फिर भी राजदीप सरदेसाई और इंडियन एक्सप्रेस जैसे मीडिया हाउस दीघा के मंदिर को पुरी के जगन्नाथ धाम के बराबर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। इसकी वजह से लोगों में गलतफहमी और नाराजगी दोनों ही बढ़ती जा रही है।

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ममता सरकार कर रही हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़

ममता बनर्जी की TMC सरकार ने दीघा में मंदिर बनाकर और उसे ‘जगन्नाथ धाम’ कहकर हिंदू धर्म की परंपराओं और शास्त्रों का अपमान किया है। राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार और इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार इस प्रचार में शामिल होकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। पुरी का जगन्नाथ धाम 900 साल की आस्था और संस्कृति का प्रतीक है, जबकि दीघा का मंदिर सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए बनाया गया नया मंदिर है, जो दिखने में जगन्नाथ धाम की तरह हो सकता है। ऐसे में इस तरह का प्रचार न सिर्फ गलत है, बल्कि हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ भी है।

‘दुर्गा पूजा मेले की तरह एक धर्मनिरपेक्ष त्योहार है, धार्मिक नहीं’: कलकत्ता हाईकोर्ट ; पूजा पांडाल बनाने पर लगी प्रशासनिक रोक को हटाया

                                                                                                                      फोटो साभार : जी न्यूज
कलकत्ता हाईकोर्ट ने 25 अगस्त 2023 को दुर्गा पूजा के पांडाल लगाने पर लगाई गई प्रशासनिक रोक को हटा दिया। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा है कि दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल की राजधानी के लिए किसी धार्मिक प्रतीक की बजाय सांस्कृतिक पहचान की तरह है। इसे धर्म के नजरिए से देखने की जगह सेक्युलर नजरिए से देखा जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि इस दौरान होने वाली धार्मिक जुटान को आम मेले की देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने इसे सबसे सेक्युलर त्योहार बताया।

कोलकाता प्रशासन को दिए निर्देश-लगवाए जाएं पांडाल

कलकत्ता हाईकोर्ट 25 अगस्त को एक याचिका पर सुनवाई कर रही था। इसमें सार्वजनिक मैदान पर दुर्गा पूजा का पांडाल लगाने से प्रशासन ने रोक दिया था। केस की सुनवाई करते हुए जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य ने ये टिप्पणी की। उन्होंने कोलकाता प्रशासन को निर्देश दिया कि वो दुर्गा पूजा के लिए निर्धारित जगह पर याचिकाकर्ताओं को पांडाल लगाने की अनुमति दे।

दुर्गा पूजा में शामिल होते हैं सर्व समाज के लोग

बार एंड बेंच की खबर के मुताबिक, याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से अपील की थी कि उन्हें कोलकाता के न्यू टाउन मेला ग्राउंड में पांडाल लगाने की अनुमति दी जाए, क्योंकि प्रशासन इसकी अनुमति नहीं दे रहा है। इस पर जस्टिस सब्यासाची भट्टाचार्य ने अपनै फैसले में कहा, “दुर्गा पूजा का उत्सव कई संस्कृतियों के मिलन की तरह है। ये नारी शक्ति का प्रतीक है। इस उत्सव में धार्मिक के साथ सामाजिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। इसे सेक्युलर नेचर का माना जाए, धार्मिक नेचर का नहीं। इसमें सभी समाज के लोग शामिल होते हैं।”

हाईकोर्ट बोला- सही जगह लगाया जा रहा पांडाल

इस मामले में प्रशासन सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाने के नियमों के तहत रोक लगाया था। कोलकाता प्रशासन ने कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए ऐसा फैसला लिया था। इसे कोर्ट में संविधान के आर्टिकल 14 को दृष्टि में रखकर चुनौती दी गई थी। इसमें सभी धर्म के लोगों को अपनी धार्मिक गतिविधियों को अंजाम देने का अधिकार दिया गया है।
इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने किसी सड़क, गली, फुटपाथ और खेल के मैदान में नहीं, बल्कि मेले के लिए निर्धारित जगह पर दुर्गा पूजा का पांडाल लगाने की अनुमति माँगी थी। हाईकोर्ट ने अब इसकी इजाजत दे दी है।

दिल्ली के मुहर्रम जुलूस में पुलिस पर क्यों हुआ पथराव? 10 पुलिस वाले घायल… पश्चिम बंगाल में मुहर्रम पर दुर्गा मंदिर का रास्ता ही बंद

मुहर्रम से पहले बैरिकेड लगा ब्लॉक किया गया दुर्गा मंदिर, दिल्ली में तो पुलिस पर ही पथराव
पश्चिम बंगाल में मुहर्रम से एक दिन पहले शुक्रवार (28 जुलाई 2023) को बैरिकेड लगाकर एक दुर्गा मंदिर का रास्ता बंद करने का मामला सामने आया। यह मंदिर मालदा जिले के कालियाचक में स्थित है। बंगाल से दूर दिल्ली के नांगलोई में मुहर्रम पर ताजिया निकलने के दौरान कट्टरपंथी मुस्लिमों ने पथराव किया। इसके कारण पुलिस की गाड़ियों को भी नुकसान पहुँचा।

दिल्ली पुलिस ने शांति बनाए रखने के लिए लाठीचार्ज किया। दिल्ली पुलिस के अधिकारी हरेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि नांगलोई में ताजिये के जुलूस में 8-10 हजार लोग मौजूद थे। इनमें से 1-2 आयोजनकर्ता ताजिये का जो रूट पहले से तय था, उससे अलग जाना चाह रहे थे। पुलिस ने जब मना किया तो जुलूस में शामिल लोगों ने पुलिस पर पथराव किया। इसमें 10 पुलिस वाले घायल हुए हैं।

नमाज में व्यवधान के नाम पर आतंक, शादी-ब्याह में DJ नहीं बजने देने के नाम पर बवाल काटने वाली कट्टरपंथी मुस्लिम सोच पर अब लोग सवाल उठा रहे। लोग पूछ रहे कि 29 जुलाई 2023 को मुहर्रम के दिन न तो कोई हिंदू त्योहार था, न ही काँवड़ियों की बात थी… फिर सड़कों पर आतंक किसने मचाया, क्यों मचाया?

दिल्ली पुलिस ने आतंक मचा रही कट्टर इस्लामी भीड़ पर जम कर लाठियाँ बरसाई हैं। सवाल यह उठता है कि पत्थरबाजी वाली मानसिकता से ग्रसित भीड़ को जुलूस का परमिशन दिया ही क्यों जाता है? अगर दिया जाता है तो देश के ही दूसरे राज्य बंगाल में हिंदू मंदिरों की बैरिकेडिंग क्यों कर दी जाती है?

हिंदू मंदिर की बैरिकेडिंग वाली घटना को लेकर भाजपा ममता बनर्जी सरकार पर हमलावर है। इसके बाद हालाँकि बैरिकेड हटा दिए गए। पश्चिम बंगाल बीजेपी के कार्यकर्ता अमित ठाकुर ने ट्वीट कर लिखा, “यह चौंकाने वाली तस्वीर पश्चिम बंगाल के मालदा के कालियाचक की है। जहाँ मुहर्रम के जुलूस के लिए दुर्गा मंदिर को ब्लॉक कर दिया गया है। पश्चिम बंगाल में हिंदुओं की यही हालत है। I.N.D.I.A. के सेक्युलर लोग इस बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं?”

इस ट्वीट के साथ उन्होंने ‘कालियाचक थाना शरबजनिन दुर्गा मंदिर’ नामक मंदिर की तस्वीर भी शेयर की। तस्वीर में देखा जा सकता है कि बाँस की बल्लियाँ लगाकर मंदिर को पूरी तरह से ब्लॉक करने की कोशिश की गई थी।

इस मामले पर भाजपा नेता अमित मालवीय ने ममता बनर्जी के इशारे पर पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा मंदिर में बेरिकेडिंग करने का आरोप लगाया। उन्होंने ट्वीट कर लिखा, ”पश्चिम बंगाल पुलिस ने मुहर्रम की पूर्व संध्या पर कालियाचक में दुर्गा मंदिर को ब्लॉक करते हुए बैरिकेड लगाए। यह ममता बनर्जी की सेक्युलरिज्म का ब्रांड है। यह हिंदुओं को नीचा दिखाने और बदनाम करने के लिए हो रहा है। ममता बनर्जी सरकार ने हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया है।”

मालवीय ने यह भी कहा, “यह कानून व्यवस्था सँभालने में ममता बनर्जी की असफलता को दिखाता है। सीएम का ऐसा पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण सामाजिक एकजुटता को खत्म करता है और खाइयों को बढ़ाता है। उनकी राजनीति इसके बल पर ही फलती-फूलती है।”

पश्चिम बंगाल बीजेपी के विधायक शुभेंदु अधिकारी ने TMC सरकार की आलोचना करते हुए लिखा, “मैं शर्त लगाता हूँ कि उस इलाके की कोई भी मुहर्रम आयोजन समिति इस तरह के कदम की माँग नहीं कर सकती थी, जिससे सनातनियों को ठेस पहुँचे। सीधे तौर पर यह पश्चिम बंगाल पुलिस की ‘अतिसक्रियता’ है। ममता बनर्जी के शब्दकोश में ‘सेक्युलरिज्म’ ‘वोट बैंक की राजनीति’ का दूसरा नाम है। यही कारण है कि सरकार धार्मिक त्योहारों के दौरान ‘अतिसक्रियता की समस्या’ से ग्रस्त है। ममता बनर्जी सरकार में आम तौर पर कुछ ऐसा होता रहा है, जिससे सनातनियों की भावनाएँ आहत होती हैं।”

राज्य के मुख्य सचिव के तत्काल हस्तक्षेप का अनुरोध करते हुए, शुभेंदु अधिकारी ने कहा, “ममता बनर्जी अपनी ओछी राजनीति के लिए जानबूझकर बैरिकेडिंग लगवा रही हैं और दोनों समुदायों के बीच दरार पैदा कर रही हैं। वह कलह पैदा करने और दोनों समुदायों के बीच सद्भाव को बिगाड़ने की कोशिश कर रही हैं।”

हालाँकि बाद में शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि दुर्गा मंदिर के बाहर से बैरिकेड्स हटा दिए गए हैं।

वहीं, कुछ सोशल मीडिया यूजर्स का दावा है कि मुहर्रम के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए हिंदुओं ने ही मंदिर के बाहर बैरिकेड्स लगाए थे।

बहरहाल, यहाँ यह बताना जरूरी है कि ममता बनर्जी ने मुहर्रम जुलूस को रास्ता देने के लिए साल 2016 और 2017 में माँ दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन पर रोक लगा दी थी।


पश्चिम बंगाल : ‘हमलोग भी महिला हैं, हमारी बेटियाँ कहाँ जाएँगी’: फूट-फूटकर रोईं बंगाल की बीजेपी MP, कहा- TMC के गुंडों ने हाथों में बंदूकें, उम्मीदवार को नंगा कर घुमाया

 

                                  BJP सांसद लॉकेट चटर्जी बंगाल की घटना का जिक्र करते हुए रो पड़ीं
हम लोग भी महिला हैं। हम लोग भी देश की बेटी हैं। हम लोग कहाँ जाएँगे।

यह सवाल है पश्चिम बंगाल से बीजेपी की सांसद लॉकेट चटर्जी का। शुक्रवार (21 जुलाई 2023) को मीडिया से बात करते हुए वह फूट-फूटकर रोने लगीं। वे पार्टी के बंगाल अध्यक्ष सुकांत मजूमदार के साथ पंचायत चुनाव के दौरान हुई हिंसा की घटनाओं पर बात कर रहीं थी। 8 जुलाई को मतदान के दिन एक महिला उम्मीदवार को नंगा कर गाँव में घुमाने का मामला सामने आया है।

चटर्जी ने पत्रकारों से कहा, “आपलोग बताइए हम लोग कहा जाएँगे। हम भी महिलाएँ हैं। हम भी अपनी बेटियों को बचाना चाहते हैं। हम भी देश की बेटियाँ हैं। पश्चिम बंगाल देश का एक हिस्सा है। पीएम मोदी ने कल मणिपुर घटना की निंदा की। उन्होंने कहा कि हर राज्य में महिला सुरक्षा के लिए कानून-व्यवस्था का काम होना चाहिए। हमारे लिए भी आप लोग कुछ बात करें। हमारी बेटियाँ कहाँ जाएँगी।” नीचे वीडियो में आप 10 मिनट 11 सेकेंड से चटर्जी का यह बयान सुन सकते हैं।

बंगाल की हिंसा पर कॉन्ग्रेस की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए चटर्जी ने कहा कि राज्य में यह सब कुछ तब हो रहा है जब एक महिला मुख्यमंत्री (ममता बनर्जी) हैं। उन्होंने पूछा कि महिला प्रत्याशी को नग्न कर जो अत्याचार किए गए क्या उसकी जाँच होगी? चटर्जी ने कहा कि साउथ पांचला की इस घटना का वीडियो नहीं है, क्योंकि सभी की हाथों में बंदूकें थीं। उन्होंने कहा, “बंगाल में पंचायत के चुनाव नहीं बल्कि खून के चुनाव हुए। इसमें बहुत हिंसा और महिलाओं के साथ अत्याचार हुए। ममता बनर्जी एक महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद भी महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को रोक नहीं रही हैं।”

वहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांता मजूमदार ने कहा कि मणिपुर में जो घटना हुई, उसे लेकर उत्तेजना पैदा करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इसे दुःखद घटना बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की और कहा कि कहीं भी ऐसी घटना नहीं होनी चाहिए। इसके बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल के हावड़ा स्थित साउथ पांचला की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वहाँ भाजपा के लिए पंचायत चुनाव लड़ने वाली एक महिला को नग्न कर घुमाया गया।

सुकांता मजूमदार ने पूछा कि क्या ये मणिपुर से कम दुःखद घटना है? उन्होंने कहा कि अंतर सिर्फ इतना है कि इसका वीडियो उपलब्ध नहीं है, क्योंकि ‘ममता बनर्जी के गुंडे’ किसी को वीडियो बनाने नहीं दे सकते। इस दौरान उन्होंने अख़बारों के हवाले से 2 घटनाओं का जिक्र किया, जिनमें से एक उत्तरी बंगाल स्थित अलीपुरद्वार की है और एक दक्षिणी बंगाल के बीरभूम की। उन्होंने बताया कि एक महिला को नग्न कर के और गदहे की पीठ पर बिठा कर घुमाया गया। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं का कारण जो भी हो, लेकिन महिलाओं के सम्मान के साथ पश्चिम बंगाल में जिस तरह से खिलवाड़ किया जा रहा है वो चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की रिपोर्ट में भी ये सामने आ चुका है। 

ANI की रिपोर्ट के अनुसार पांचला में महिला उम्मीदवार को पीटा गया। सरेआम छेड़छाड़ की गई। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार एक महिला उम्मीदवार ने तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं पर छेड़छाड़ और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हुए नामजद शिकायत की है। कहा है कि आठ जुलाई को उसे नंगा कर पूरे गाँव में घुमाया गया। महिला ने बताया है कि टीएमसी के करीब 40 से 50 गुंडों ने उसके साथ मारपीट की। उसके सीने और सिर पर डंडे से हमला किया। उसे मतदान केंद्र के बाहर फेंक दिया। रिपब्लिक की रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित महिला के अनुसार उसके कपड़े फाड़ने की कोशिश की गई। उसे नग्न होने के लिए मजबूर किया गया। उसे गलत तरीके से छुआ गया और सरेआम छेड़छाड़ की गई। 

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पश्चिम बंगाल : TMC गुंडों ने ‘साड़ी फाड़ी, अंडरवियर उतारा, नंगा घुमाया’

पीड़िता के अनुसार जब टीएमसी के कुछ कार्यकर्ता उसके साथ मारपीट कर रहे थे तो उनके एक नेता ने उन्हें उनके कपड़े फाड़ने के लिए उकसाया। बंगाल भाजपा के सह प्रभारी अमित मालवीय ने ट्वीट कर दावा किया है इस मामले में एफआईआर भी तब दर्ज की गई, जब बीजेपी ने इसके लिए दबाव बनाया।

पश्चिम बंगाल : TMC गुंडों ने ‘साड़ी फाड़ी, अंडरवियर उतारा, नंगा घुमाया’ ; मोदी विरोधी खामोश क्यों?

              बंगाल में टीएमसी के गुंडों पर महिला उम्मीदवार के नग्न परेड का आरोप (फोटो साभार: दैनिक जागरण)
मणिपुर घटना पर लोक और राज्य सभा सदनों पर हंगामा करने वाले गैर-भाजपाई सरकारों में हो रही अमाननीय घटनाओं पर क्यों चुप्पी साधे हुए है? दिल्ली मुख्यमंत्री तो दामिनी कांड के एक आरोपी को सिलाई मशीन और नकद राशि देने वाले किस मुंह से मणिपुर पर बोल रहे है? उन्हें तो कोई अधिकार ही नहीं। दिल्ली संभाली नहीं जाती, जनता को भ्रमित करने भाजपाई राज्यों में पहुँच जाते हैं, जबकि दिल्ली में ही घटती घटनाओं पर मुंह में दही जमाकर बैठ जाते हैं। 

मणिपुर में महिलाओं के नग्न परेड का वीडियो वायरल होने के बाद अब पश्चिम बंगाल से भी इस तरह की एक घटना सामने आई है। कथित तौर पर पंचायत चुनाव के दौरान एक महिला उम्मीदवार को नंगा कर सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस (TMC) के गुंडों ने पूरे गाँव में घुमाया। ANI की रिपोर्ट के अनुसार उन्हें पीटा गया, सरेआम छेड़छाड़ की गई। घटना 8 जुलाई 2023 की है। इसी दिन राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात बंगाल में पंचायत चुनाव के लिए वोट डाले गए थे।

जागरण की रिपोर्ट के अनुसार ग्राम पंचायत चुनाव की एक महिला उम्मीदवार ने तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर छेड़छाड़ और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। कहा है कि आठ जुलाई को उसे नंगा कर पूरे गाँव में घुमाया गया। घटना हावड़ा जिले के पांचला इलाके की है। पांचला थाने में इस संबंध में एफआईआर दर्ज कराई गई है। एफआईआर में टीएमसी कैंडिडेट हेमंत राय, नूर आलम, अल्फी एसके, रणबीर पांजा संजू, सुकमल पांजा समेत कई को नामजद किया गया है।

महिला ने बताया है कि टीएमसी के करीब 40 से 50 गुंडों ने उसके साथ मारपीट की। उसके सीने और सिर पर डंडे से हमला किया। उसे मतदान केंद्र के बाहर फेंक दिया। रिपब्लिक की रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित महिला के अनुसार उसके कपड़े फाड़ने की कोशिश की गई। उसे नग्न होने के लिए मजबूर किया गया। उसे गलत तरीके से छुआ गया और सरेआम छेड़छाड़ की गई। पीड़िता के अनुसार जब टीएमसी के कुछ कार्यकर्ता उसके साथ मारपीट कर रहे थे तो उनके एक नेता ने उन्हें उनके कपड़े फाड़ने के लिए उकसाया।

बंगाल भाजपा के सह प्रभारी अमित मालवीय ने ट्वीट कर दावा किया है इस मामले में एफआईआर भी तब दर्ज की गई, जब बीजेपी ने इसके लिए दबाव बनाया। उन्होंने कहा है, “क्या आपको जरा भी शर्म है ममता बनर्जी? आपके सचिवालय से कुछ ही दूर हावड़ा के पंचला में 8 जुलाई 2023 को पंचायत चुनाव के दिन ग्राम सभा की एक महिला उम्मीदवार को पीटा गया, नग्न कर घुमाया गया। आपकी पुलिस ने तब एफआईआर दर्ज की जब बीजेपी ने दबाव डाला।” उन्होंने ममता बनर्जी को असफलत मुख्यमंत्री बताते हुए बंगाल पर ध्यान देने की सलाह दी है।

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झाड़खंड, पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और प. बंगाल पर जवाब देने से बचने के लिए विपक्ष ने उछाला मणिपुर

उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल में 63229 ग्राम पंचायतों के लिए 8 जुलाई को वोट पड़े थे। 11 जुलाई को मतगणना हुई थी। यह चुनाव नतीजों से ज्यादा हिंसा के लिए चर्चा में रहा था। मतदान के दिन मुर्शिदाबाद, कूच बिहार, मालदा, दक्षिणी 24 परगना, उत्तरी दिनाजपुर और नादिया सहित कई जिलों से बूथ पर कब्जे, बैलेट बॉक्स को नुकसान पहुँचाने, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं और चुनावी अधिकारियों को निशाना बनाने के आरोप टीएमसी के गुंडों पर लगे थे। इसी तरह मतगणना के दिन भी कर्मचारियों से लेकर नेताओं की पिटाई के कई मामले सामने आए थे। टीएमसी को 28985 और बीजेपी को 7764 सीटों पर जीत मिली थी।

‘बंगाल मतलब बाकी देश से अलग, इसे बचाने के लिए राष्ट्रवादी क्रांति जरूरी’: पंचायत चुनाव में हिंसा, समाज, सिस्टम, अर्थव्यवस्था पर स्वप्न दासगुप्ता

पश्चिम बंगाल में हाल ही में पंचायत चुनाव संपन्न हुए, जिसमें भाजपा ने 22.88% वोट शेयर हासिल किया और 10,000 से भी अधिक सीटें हासिल की। ये सब इसके बावजूद हुआ, जब चुनाव में राज्य भर में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। कहीं से बूथ लूटने की खबरें आईं तो कहीं-कहीं भाजपा प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं पर हमले किए गए। कहीं बैलेट बॉक्स को ही आग के हवाले कर दिया गया तो कहीं मतपेटी पर पानी उड़ेल दिया गया।

इन सबके बीच हमने स्वप्न दासगुप्ता से बात की, 2 बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में काम करने के लिए पद्म भूषण का पुरस्कार पा चुके 67 वर्षीय स्वप्न दासगुप्ता 1990 से ही भाजपा से जुड़े हुए हैं। वो ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी स्थित नफ़ील्ड कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएट फेलो भी रहे हैं। उन्होंने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ और ‘इंडिया टुडे’ और ‘द स्टेट्समैन’ जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में संपादकीय जिम्मेदारियाँ निभाई हैं।

सवाल: बंगाल में 40 से ज्यादा लोगों की हत्या पंचायत चुनाव में कर दी जाती है। तृणमूल से अलग जिन लोगों ने जीत दर्ज की, उनमें से कुछ डर के कारण असम चले गए। डर के इस माहौल में लोकतंत्र को आप कहाँ देखते हैं? क्या सिर्फ वोटिंग करवाना ही लोकतंत्र है?

जवाब: देखिए, इस बार जो पंचायत चुनाव हुआ है इसमें हिंसा सिर्फ मतदान के दौरान ही नहीं हुई है, बल्कि जिस दिन नामांकन की प्रक्रिया हुई उसी समय से ये शुरू हो गया और अब काउंटिंग के बाद तक भी ये चल रहा है। 50 लोगों की हत्या कर दी गई है। इनमें सभी पार्टियों के लोग हैं – TMC, भाजपा, लेफ्ट और ISF (इंडियन सेक्युलर फ्रंट)।

हिंसा अधिकतर मुस्लिमों के प्रभाव वाले इलाकों में हुई है। इसके पीछे कारण ये है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस ने मुस्लिमों के सारे वोटों पर कब्ज़ा कर लिया था, 90-95% वोट उन्हें गए थे। तब भाजपा की जो हार हुई, उसका एक प्रधान कारण था – शत-प्रतिशत मुस्लिम ध्रुवीकरण। लेकिन, इस बार मुस्लिम वोटों में एक विभाजन आ गया है, जिस कारण हिंसा की इतनी घटनाएँ हुई हैं।

मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में सबसे ज्यादा हिंसा हुई है। एक साइलेंट इंटिमीडेशन चल रहा है। ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ और ‘Winner Takes All’ वाला लोकतंत्र विरोधी कल्चर आ गया है, जिसे लेफ्ट ने शुरू किया था और TMC इसकी कार्बन कॉपी है।

मार्क्सवादियों और तृणमूल का संगठन अलग है, लेकिन दोनों समान हैं। बस एक फर्क है – CPM का भ्रष्टाचार सीमित था और ये पार्टी कंट्रोल्ड करप्शन था, लेकिन तृणमूल के मामले में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। ये राज्य सरकार से लेकर पंचायत स्तर तक, सब मिले हैं और सबका हिस्सा बँटा हुआ है।

असीमित भ्रष्टाटार के कारण केंद्र सरकार की जो योजनाएँ आती हैं और उनके फंड्स आते हैं (मनरेगा, आवास योजना, हर घर जल इत्यादि), इन सबमें चोरी हुई है। इस कारण पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई है और भ्रष्टाचार को ही आय का स्रोत बना दिया गया है। इसी कारण ये जीत के लिए इतने बेचैन रहते हैं, ताकि 5 वर्षों के लिए सब सेट हो जाएँ। इसी कारण, वहाँ भारी सुधार की आवश्यकता है।

सवाल: 2014 में 34 और 2019 में 22 लोकसभा सीट पर तृणमूल की जीत। अब 2024 से पहले पंचायत स्तर पर ऐसी हिंसा भाजपा या किसी भी विपक्ष को बंगाल से साफ करने की रणनीति तो नहीं?

जवाब: इस पंचायत चुनाव का जो परिणाम है, उसके साथ पब्लिक ओपिनियन का क्या संपर्क है – ये चिंतन का विषय है। इतनी लूट हुई है, इतना फ्रॉड हुआ है। ये चुनाव बैलेट बॉक्स से कराया गया था राज्य चुनाव आयोग के जरिए, इतने फर्जी वोट पड़े, हमले हुए हैं और लोग तनाव में थे। इसीलिए, अनुमान लगाना मुश्किल है। फिर भी, लोकसभा के चुनाव में इसका असर जरूर देखने को मिलने वाला है।

उस समय (लोकसभा के चुनाव में) TMC के भ्रष्टाचार का असर नहीं पड़ता, क्योंकि राज्य में सांसद की उतनी शक्ति नहीं होती और दिल्ली के लिए वोट दिए जाते हैं। ये फ्लेक्सिबल होता है, इसीलिए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस वोट देने वाले भी लोकसभा चुनाव में भाजपा को देते हैं।

राज्य स्तर पर भाजपा की एक कमजोरी ये है कि अब तक संगठन मजबूत नहीं है। संगठन में बहुत कमजोरियाँ हैं। 3 महीने पहले अगर कॉन्फिडेंस बनाने के लिए केंद्रीय बलों को लाया जा सकता है और चुनाव आयोग 8-10 से लेकर जितने भी चरण में चुनाव कराए, हर पोलिंग बूथ पर सुरक्षाबल सुनिश्चित हो, तब आप देखेंगे कि पंचायत चुनाव से लोकसभा का चुनाव एकदम अलग होगा।

सवाल: ममता बनर्जी की राजनीति से अलग बंगाल के समाज पर आपकी राय क्या है? लंबे समय तक वामपंथी सत्ता के कारण हिंसा की राजनीति या “सत्ता बंदूक की नाल से निकलती है” जैसी बात आम समाज में भी घर कर गई है?

जवाब: 2 चीजें हैं। पहला, राजनीतिक प्रभाव। वामपंथियों के संघर्ष में हिंसा की संस्कृति रही है। ये समाज में भी घुस जाता है। वामपंथी तकनीक से ही TMC ने वामपंथियों को हराया। ये प्रभाव समाज में रह गया।

पश्चिम बंगाल स्वाधीनता के समय नंबर एक या दो राज्य था, अब समय बीतते-बीतते 17-18 नंबर पर पहुँच गया और ओडिशा भी आगे निकल गया। असम भी कुछ दिनों में आगे निकल जाएगा। यहाँ कोई विकास नहीं हो रहा है, कोई रोजगार नहीं पैदा हो रहा। व्यवसायी लोग टोलबाजी से परेशान हैं, जिसे ‘Illegal Extraction’ कह लीजिए। पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार का जो आलम है, नेताओं के बिस्तर से रुपए निकलने की घटनाएँ सामने आईं।

कहने का मतलब है कि अर्थव्यवस्था के बर्बाद हो जाने के कारण भ्रष्टाचार हावी है और जिसे जहाँ से मिल रहा है, वो लूट रहा है। इसके साथ हिंसा भी जुड़ गई है, इसका हिस्सा बन गई है। सामाजिक व्यवस्था ऐसी हो गई है कि जो पढ़े-लिखे और प्रतिभावान लोग हैं, वो वन-वे टिकट लेकर देश के महानगरों या विदेश में चले जाते हैं, यहाँ नहीं रुकते।

पलायन की समस्या के कारण कोलकाता में औसत उम्र बाकी नगरों से ज्यादा है। इसका कारण है कि जिनकी रियायरमेंट की उम्र हो गई है या जो रिटायर हो गए हैं, वहीं बंगाल में बचे हैं। जो प्रोडक्टिव जनरेशन है, युवा है, वो यहाँ नहीं ठहरते हैं। इसीलिए, पश्चिम बंगाल माइग्रेंट लेबर में आजकल नंबर वन हो गया है।

सवाल: बिहार ने कभी चुनावी हिंसा झेला, बहुत भयावह और बड़े स्तर पर। वहाँ जाति का समीकरण था, अगड़ा-पिछड़ा था, जमींदार-मजदूर था। फिर सब खत्म हो गया। बंगाल में चुनावी हिंसा के सामाजिक कारण क्या हैं? और यह खत्म क्यों नहीं हो रहे?

जवाब: पहले हिंसा होती थी तो लोग कहते थे कि बिहार की तरफ हो रहा है। बिहार देश की हर सड़ी हुई समस्या का प्रतीक बन गया था। यह हाल लगभग 15 साल पहले तक था। लेकिन आजकल बिहार में थोड़ी-बहुत हिंसा होती है, बड़े स्तर पर वैसा कुछ नहीं होता। पहले MCC और रणवीर सेना जैसे संगठनों की हिंसा की खबरें आती थीं।

बिहार में बदलाव हुआ है। बिहार आर्थिक रिकवरी की ओर बढ़ रहा है। बहुत बाकी है वहाँ करना-होना लेकिन थोड़ा-थोड़ा कर रहा है, जबकि पश्चिम बंगाल पीछे जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था बर्बाद हो गई है, जिसकी शुरुआत लेफ्ट ने ही की थी।

बंगाल के सामाजिक पतन के लिए एक और बड़ी वजह है। यहाँ प्रादेशिकता की मानसिकता आ गई है, जो बंगाल को बाकी देश से अलग समझते हैं। यानी, एक इमोशनल अलगाववाद की भावना घर कर गई है। इसी कारण अन्य राज्यों से आने वालों को ‘बाहरी’ कहा जाता है। पहले तो कई जगहों से लोग बंगाल में आते थे, यूपी-बिहार के लोग यहाँ जीवन का हिस्सा बन गए और इनमें से कई बंगाली बोलते हैं तो कई नहीं भी बोलते हैं।

बिहार से यहाँ हजारों मजदूर, काम करने वाले, छोटे-बड़े व्यवसायी आए थे। अब सब खत्म हो रहा है। पुराने संपर्क हैं, लेकिन बंगाल का एक प्रभाव जो झारखंड वगैरह में पूरा था, मधुपुर, देवघर या भागलपुर तक उसका असर था। अब कुछ है ही नहीं।

पश्चिम बंगाल के लोगों को इस वास्तविकता को स्वीकार करना पड़ेगा, जो पूरी तरह नीचे जा रहे हैं – सांस्कृतिक रूप से, राजनीतिक रूप से और आर्थिक रूप से। राजनातिक प्रभाव पश्चिम बंगाल का कुछ है ही नहीं। प्रणब मुखर्जी थे लेकिन उनकी बंगाल से ज्यादा दिल्ली में चलती थी। पश्चिम बंगाल ने खुद को लंबे समय से मुख्यधारा से अलग कर रखा है, जिसका अब असर दिख रहा है।

सवाल: समाज से अलग अब बात सिस्टम की, सरकारी तंत्र की, पुलिस की। बंगाल से लगभग हर हफ्ते, 2 हफ्ते पर – बम बनाते समय विस्फोट, झोले में मिला क्रूड बम – जैसी खबरें हम देखते हैं। अगर यह इतना आम हो गया है तो क्या वहाँ पुलिस रिफॉर्म्स की जरूरत नहीं?

जवाब: पुलिस रिफॉर्म्स से पहले पुलिस रिक्रूटमेंट को सुधारना होगा। असली पुलिस से ज्यादा वहाँ सिविक पुलिस की भर्ती कर ली गई है। जिस तरह के प्रोफेशनल पुलिस की भर्ती की जानी थी, वो नहीं की गई। वो फंड्स की कमी को इसकी वजह बता रहे। हकीकत में पुलिस व्यवस्था का पूरा का पूरा राजनीतिकरण कर दिया गया है।

इस बार पंचायत चुनाव में जो बूथ लूटे गए हैं, इसमें पुलिस ने मदद की है। अदालतों में अधिकतर शिकायतें पुलिस के खिलाफ हैं। पुलिस ने हिंसा में हिस्सा लिया है। पुलिस रिफॉर्म से ज्यादा पश्चिम बंगाल में इन्हें (पूरे पुलिस विभाग को) रीकंस्ट्रक्ट करने की जरूरत है।

पहले अच्छी पुलिस फ़ोर्स थी, लेकिन पूरा बर्बाद कर दिया गया। आज भी कोलकाता की पुलिस बाकी बंगाल की पुलिस से अच्छी है। पश्चिम बंगाल की शासन व्यवस्था ध्वस्त हो गई है, शासन प्रणाली की संस्कृति बर्बाद हो गई है।

मुझे लगता है कि बंगाल को बचाने के लिए एक अलग प्रकार की क्रांति की ज़रूरत है – रेड रेवोलुशन या तृणमूल रेवोलुशन नहीं, राष्ट्रवादी क्रांति की जरूरत है। बंगाली संस्कृति का सभी सम्मान करते हैं, लेकिन वो भारत से अलग नहीं है बल्कि भारत को समृद्ध करता है। आप हर जगह जाकर ‘हमारा है, हमारा है’ कहेंगे तो कुछ नहीं होगा।

सवाल: आखिरी सवाल पार्टी के कार्यकर्ताओं को लेकर, चाहे वो किसी भी पार्टी के हों। क्योंकि चुनावी हिंसा का सबसे पहला और मारक असर इन्हीं पर पड़ता है। लंबे समय तक वामपंथी सत्ता और विचार का यह प्रभाव कि – “पार्टी ही सब कुछ, पार्टी के लिए मारना या मरना” – क्या यह दूसरी राजनीतिक पार्टियों में भी घर कर गई है? क्योंकि सत्ता परिवर्तन से बंगाल में चुनावी हिंसा के पैटर्न में कोई बदलाव नहीं दिख रहा।

जवाब: आप हिंदी बेल्ट में जाएँगे तो किसी पॉलिटिकल वर्कर के बारे में कहा जाता है कि वो ‘राजनीति’ करता है। जबकि, पश्चिम बंगाल में कहा जाता है कि ‘पार्टी कोर छी (वो पार्टी करता है)।’ पार्टी कौन सी? कोई सी भी लेकिन वहाँ महत्व पार्टी का ही है।

‘राजनीति’ से अलग ‘पार्टी’ वाले ट्रेंड को CPM ने शुरू किया था और TMC ने भी यही किया। हालत यह है कि आप जो भी करो, आपको पार्टी में आना पड़ेगा। हाल के दिनों में तृणमूल ने इस पार्टी कल्चर को भी बढ़ा दिया है।

पहले तृणमूल में सेंट्रलाइज्ड सिस्टम था, सिंगल विंडो क्लियरेंस था, लेकिन अब अलग-अलग स्तरों पर तृणमूल के भीतर कई समूह बन गए हैं। सब कुछ पार्टी ही बन गई है, पार्टी ही माई-बाप है। ये जो मानसिकता है, ये सभी पार्टियों में घर कर गई है।

स्वप्न दासगुप्ता के बारे में बता दें कि उन्होंने सन् 1975 में दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। लंदन स्थित SOAS यूनिवर्सिटी से उन्होंने Ph.D की। उस जमाने में उन्होंने पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में विभाजन और भेदभाव वाली राजनीति पर गहरा अध्ययन कर के थीसिस लिखी थी। वो JNU में विजिटिंग ऑनररी प्रोफेसर भी रहे हैं। उन्होंने ‘Awakening Bharat Mata: The Political Beliefs of the Indian Right’ नामक पुस्तक भी लिखी है।(साभार: चंदन कुमार https://hindi.opindia.com/परफेक्शन को कैसे इम्प्रूव करें :)

बंगाल : फुरफुरा शरीफ दरगाह के पीरजादा MLA नौशाद सिद्दीकी ने 'निकाह का झाँसा दे किया सेक्स’

ISF विधायक नौशाद सिद्दीकी
पश्चिम बंगाल के एक विधायक के खिलाफ रेप का मामला दर्ज किया गया है। ये विधायक हैं- नौशाद सिद्दीकी। सिद्दीकी इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF MLA Naushad Siddiqui) के राज्य में इकलौते विधायक हैं। 2021 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने दक्षिण 24 परगना के भांगड़ सीट से जीत हासिल की थी। वे हुगली जिले के श्रीरामपुर स्थित फुरफुरा शरीफ मजार के पीरजादा भी हैं।

सिद्दीकी पर एक महिला ने निकाह का झाँसा देकर ‘यौन संबंध’ बनाने के आरोप लगाए हैं। कहा है कि डेढ़ साल में विधायक कई बार उसके साथ संबंध बनाए। लेकिन जब उसने शादी की बात की तो वे मुकर गए। इसके बाद विधायक ने अपने लोगों के साथ मिलकर उसे धमकी भी दी। सिद्दीकी पर मामला ऐसे समय में दर्ज कराया गया है, जब पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव होने हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामला भांगर विधानसभा के बाउबाजार थाना क्षेत्र का है। पीड़िता ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में कहा है कि नौशाद सिद्दकी ने उसे अपने बीबी गांगुली स्ट्रीट इलाके में बने ऑफिस में करीब डेढ़ साल गलत तरीके से रोका। फिर निकाह का वादा करके उसके साथ ‘यौन संबंध’ बनाए। इसके बाद लंबे समय तक उसके साथ शरीरिक संबंध बनाए रखा। लेकिन जब वह शादी करने की बात करने लगी तो नौशाद सिद्दीकी अपनी बात से मुकर गए और उसे दूर करने की कोशिश करने लगे। पीड़िता अपनी जिद्द पर अड़ी रही तो कथित तौर पर सिद्दीकी ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर उसे डराया-धमकाया।

इसके बाद महिला और उसके भाई ने TMC नेता सब्यसाची दत्ता को पूरे मामले की जानकारी दी। दत्ता ने पीड़िता को लेकर न्यू टाउन पुलिस स्टेशन पहुँचे। महिला की शिकायत के आधार पर पुलिस ने बयान दर्ज करते हुए आरोपित विधायक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। मामला बाउबाजार थाना क्षेत्र का है। ऐसे में न्यू टाउन पुलिस ने बाउबाजार थाने को महिला द्वारा दर्ज शिकायत की कॉपी भेजी गई। इसके अलावा, डीसी न्यू टाउन से भी बाउ बाजार पुलिस को एक पत्र भेजा गया है।

वहीं, आरोपित विधायक नौशाद सिद्दीकी ने खुद को निर्दोष बताते हुए इस पूरी घटना को अपने खिलाफ साजिश करार दिया है। इस मामले में ऑपइंडिया से बात करते हुए बंगाल BJP के मीडिया पैनलिस्ट आशुतोष झा ने कहा, “नौशाद सिद्दीकी ने गलत किया है तो उसे कड़ी सजा होनी ही चाहिए। लेकिन पीड़िता के साथ TMC नेता के होने से राजनीति की भी बू रही है। ममता बनर्जी ने बंगाल के पुलिस थानों को तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यालय की तरह बना दिया है। यहाँ TMC नेताओं के साथ गए बिना कोई कार्रवाई नहीं होती।”