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जहाँ कर रहे मजदूरी-काम, वहीं से मतदान: 90-95% वोटिंग का हो लक्ष्य, NOTA को लेकर बने कड़े कानून

लोकसभा चुनाव 2024 के पहले दो चरणों में हुए कम मतदान ने ‘अनिवार्य मतदान’ संबंधी प्रस्ताव को एक बार फिर बहस का विषय बना दिया। हालाँकि, चुनाव आयोग द्वारा थोड़े विलंब से जारी किए गए इन दोनों चरणों के अंतिम आँकड़ों और बाद के चरणों के मतदान प्रतिशत ने इस चिंता को कम कर दिया। वर्तमान चुनाव और लोकसभा चुनाव 2019 और 2014 के मतदान सम्बन्धी आँकड़ों में अब कोई उल्लेखनीय अंतराल नहीं है।

दो चरणों के बाद मतदान प्रतिशत बढ़ाने में भारत के चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियान, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बार-बार की गई अपील और राष्ट्रीय सेवा योजना, राष्ट्रीय कैडेट कोर आदि सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं, विविध छात्र संगठनों तथा समाज के प्रबुद्ध और जागरूक वर्ग द्वारा किए गए जनजागरण की उल्लेखनीय भूमिका है।

65 प्रतिशत के आसपास मतदान हालाँकि कोई उत्साहजनक उपलब्धि भी नहीं है। 90-95 प्रतिशत मतदान लोकतंत्र की स्वीकार्यता, सशक्तता और गतिशीलता की आधारभूत शर्त है। भारतीय लोकतंत्र को इस लक्ष्य को पाने के लिए अभी काफी मेहनत-मशक्कत करने की आवश्यकता है। अधिकतम लोगों की सक्रिय और सुनिश्चित भागीदारी ही लोकतंत्र के लक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति का आधार है। यह भागीदारी ही लोकतंत्र की जड़ों को व्यापकता और गहराई देकर उसे मजबूती और स्थायित्व देती है।

हमारे पड़ोसी देशों- चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और नेपाल आदि में लोकतंत्र की दुर्दशा से हम अनभिज्ञ नहीं हैं। वहाँ जारी लोकतंत्र का क्षरण उसकी अपर्याप्तता, सीमितता और उसमें जनता की अनास्था का ही परिणाम है। भारत इस मामले में सौभाग्यशाली है कि यहाँ लोकतंत्र इन बुराइयों से बचा हुआ है। परंतु उसे और मजबूत बनाने के लिए मतदान प्रतिशत को 65 प्रतिशत से 90-95 प्रतिशत तक बढ़ाने की जरूरत है।

मतदान सबंधी इस लक्ष्य-प्राप्ति के लिए कुछ ‘थिंक टैंक’ पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हए मतदान को अनिवार्य बनाने का सुझाव देते हैं। परन्तु उनके द्वारा प्रस्तावित मतदान की अनिवार्यता लोकतंत्र की मूलभावना के विरुद्ध है। यह भारत के संविधान में प्रदत्त स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का अतिक्रमण होगी। इसे नागरिक कर्तव्यों में हालाँकि अवश्य शामिल किया जा सकता है।

मतदान प्रतिशत बढ़ाने संबंधी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मतदान को अनिवार्य बनाने की जगह कम मतदान के कारणों को चिह्नित करने और उनका व्यावहारिक समाधान करना समीचीन है।

रोटी-रोजगार की खोज में अपने गॉंव-शहर से दूर किसी अन्य गाँँव-शहर में अस्थायी रूप से रहने वालों की संख्या भारत में बहुत अधिक है। कोरोना काल में पहली बार इस संख्या की अधिकता का अंदाजा लग पाया था। इसी प्रकार पढ़ाई के लिए लाखों छात्र-छात्राएँ यूरोप-अमेरिका और लाखों कामकाजी लोग खाड़ी देशों और यूरोप-अमेरिका आदि में प्रवासी हैं। मतदान के लिए उनका अपने गाँव-घर आगमन संभव नहीं हो पाता। उनकी अनुपस्थिति मतदान प्रतिशत को प्रभावित करती है।

मतदान को प्रभावित करने वाले कई प्रमुख कारणों में से एक मतदाताओं का देश-विदेश में प्रवासन है। यह प्रवासन देश के विभिन्न भागों में बहुत बड़ी संख्या में होता है। प्रवासन सरकारी-गैरसरकारी नौकरी, शिक्षा और रोजगार आदि के कारण होता है। उदारीकरण के बाद यह प्रक्रिया बहुत अधिक बढ़ी है।

इन प्रवासी मतदाताओं के लिए सेना की तरह अपने कार्यस्थल से मतदान का विकल्प दिया जाना चाहिए। सैन्य बल और अर्धसैनिक बल के रूप में कार्यरत लाखों भारतीयों को अपने कार्यस्थल (पोस्टिंग की जगह) से ही मतदान करने की सुविधा है। यह सुविधा सभी प्रवासी मतदाताओं को दिए जाने के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए; क्योंकि वे कई दिन का समय और किराया-भाड़ा लगाकर मतदान के लिए अपने गाँव-घर वापस नहीं जा पाते।

काफी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है, जो मतदान के महत्व से अनभिज्ञ हैं। वे मानते हैं कि उनके मतदान करने या न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसी प्रकार ऐसे लोगों की संख्या भी काफी अधिक है, जो क्रमशः सिनिकल या यथास्थितिवादी हो गए हैं। उन्हें सभी राजनीतिक दल और नेता ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ या ‘एक ही थैली के चट्टे-बट्टे’ नज़र आते हैं। उन्हें सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन की कोई संभावना नज़र नहीं आती। उनके इस मनोभाव ने उनमें मतदान के प्रति अरुचि पैदा की है। यह दृष्टिकोण नकारात्मक है क्योंकि सभी दलों और नेताओं को एकसमान नहीं माना जा सकता है। लेकिन सभी नेताओं और राजनीतिक दलों को इस दृष्टिकोण के मद्देनजर आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए।

आज लोकतंत्र अपराधियों, भ्रष्टाचारियों और धन-पशुओं की गिरफ्त में हाँफ/काँप रहा है। प्रत्याशियों के चयन हेतु राजनीतिक दल सिर्फ और सिर्फ ‘जिताऊपन’ को पैमाना बनाते हैं। प्रत्याशी की योग्यता, आचार-व्यवहार, सामाजिक-राजनीतिक प्रतिबद्धता का कोई मूल्य-महत्व नहीं है। इसीलिए प्रत्येक राजनीतिक दल में दल-बदलुओं का वर्चस्व है। चुनाव दल-बदल की बाढ़ का मौसम है। ये दल-बदलू चुनाव जीतने के तंत्र और तकनीक को साधने में सिद्धहस्त हैं। इससे संवेदनशील और चिंतनशील मतदाताओं की काफी बड़ी संख्या मतदान को समय की बर्बादी या महत्वहीन मानने लगी है। इस मनःस्थिति से भी मतदान प्रतिशत कम होता है।

राजनीतिक विमर्श और चुनाव प्रचार में प्रयुक्त भाषा-भंगिमा में भी क्रमशः गिरावट आ रही है। निजी आरोप-प्रत्यारोप और हवाई घोषणाएँ भी मतदाताओं को मतदान विमुख करके चुनाव-प्रक्रिया के प्रति उदासीन बना देती हैं। ये बातें मनोरंजन के लिए तो ठीक हो सकती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवहार/वातावरण के प्रतिकूल हैं। सभी राजनीतिक दलों को एक साथ बैठकर पारस्परिक संवाद करना चाहिए और चुनावी विमर्श के साथ-साथ अपनी भाषा-भंगिमा की भी ‘लक्ष्मण-रेखा’ तय करनी चाहिए। यह मर्यादा लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण होगी।

ऐसे लोगों की चिंता को ध्यान में रखते हुए ही ‘नोटा’ का प्रावधान किया गया है। अभी ‘नोटा’ अप्रभावी और अनुपयोगी है। उसे प्रभावी बनाए जाने की आवश्यकता है। यदि ‘नोटा’ को सबसे ज्यादा मत मिलते हैं तो संबंधित निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे सभी प्रत्याशियों को अगले पाँच साल तक कोई चुनाव न लड़ने की अनिवार्य ‘कूल-इन’ अवधि होनी चाहिए। साथ ही, संबंधित राजनीतिक दलों को पाँच साल तक उस निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्याशी खड़ा करने पर रोक लगनी चाहिए।

मौसम की मार से भी मतदान प्रभावित होता है। मई-जून की चिलचिलाती धूप ने इस बार मतदान प्रतिशत को कम किया है। विविधताओं वाले विशाल देश भारत में एकसाथ कई मौसम रहते हैं। इसलिए सबके लिए उपयुक्त एक मौसम चिह्नित करना बड़ा मुश्किल है। फिर भी दीपावली के एकदम आसपास का समय अधिकांश भारतीयों के लिए अनुकूल होगा। बड़ा त्योहार होने के कारण इस अवसर पर प्रवासी प्रायः अपने गाँव-घर आते ही हैं। कम चरणों में मतदान कराते हुए एक बड़ा चरण दीवावली के ठीक पहले और दूसरा बड़ा चरण दीपावली के ठीक बाद कराने से मतदान प्रतिशत में उछाल आने की पूरी संभावना है।

इसके अलावा सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों/संस्थानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों-औद्योगिक इकाइयों, कॉरपोरेट्स आदि को मतदान करने वाले जागरूक नागरिकों के लिए विविध लाभ, छूटें और सहूलियतें प्रदान करनी चाहिए। निश्चय ही, ये योजनाएँ नागरिकों को मतदान के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करेंगी। सरकारी कर्मचारियों को मतदान के लिए दिए जाने वाला अवकाश ऐसी ही एक प्रशंसनीय पहल है। इसे अन्य गैर-सरकारी प्रतिष्ठानों, संस्थाओं और संगठनों में भी अनिवार्यतः लागू किया जाना चाहिए। इसी प्रकार मॉलों, शॉपिंग सेंटरों, होटलों-रेस्त्राओं, सिनेमाघरों आदि में मतदान करने वाले नागरिकों को मतदान वाले दिन कुछ प्रतिशत छूट का प्रावधान करके भी लोगों को मतदान के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।

व्यापक सामाजिक प्रभाव वाले सेलेब्रिटीज़, सोशल मीडिया इंफ्लूएन्सरों, स्वयंसेवी संगठनों, शिक्षण संस्थानों को भी नागरिकों को मतदान के महत्व के प्रति जागरूक करते हुए उन्हें मतदान के लिए प्रेरित करना चाहिए। इन सबकी सक्रिय भूमिका और भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग को व्यापक योजना बनानी चाहिए।

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने चुनाव सुधार की दिशा में निर्णायक पहल की है। सरकार ने मतदाता पहचान-पत्र को आधार कार्ड से जोड़ने, पंचायत/निकाय चुनावों और विधानसभा/लोकसभा चुनावों की मतदाता सूचियों को एक करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए हैं।

मतदाता सूचियों को आधार कार्ड से जोड़ने से फ़र्जी मतदाताओं को चिह्नित करने और उनका नाम काटने का काम आसान हो गया है। भारत में अनेक व्यक्तियों का नाम जाने-अनजाने में एकाधिक जगहों पर मतदाता सूची में शामिल होता है। एक मतदाता का नाम कई जगह होने से न सिर्फ ‘एक व्यक्ति एक मत’ के संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन होता है; बल्कि वास्तविक जनादेश का भी हरण हो जाता है। एक व्यक्ति का नाम एकाधिक मतदाता सूचियों में होने से मतदान का प्रतिशत भी कम हो जाता है। मतदाता पहचान-पत्र को आधार कार्ड से जोड़कर फर्जी मतदाताओं का उन्मूलन किया जा सकता है।

मतदाताओं के नाम के दुहराव और मतदाता सूचियों के दुहराव को रोकने के लिए किए गए प्रावधानों की तरह चुनाव-प्रक्रिया के दुहराव को रोकने की दिशा में भी काम किया जाना चाहिए। “एक देश, एक चुनाव” इस दुहराव का सही समाधान है। लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव एकसाथ कराकर श्रम, समय और संसाधनों की बड़ी भारी बचत की जा सकती है। बार-बार होने वाले मतदान की जगह पाँच साल में एकबार होने वाले मतदान के लिए लोग अतिरिक्त श्रम, समय और संसाधन लगाकर भी मतदान के लिए आगे आएँगे और उससे मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी होगी।

मतदान प्रतिशत बढ़ाने की दिशा में प्राथमिकता के आधार पर पहल करने की आवश्यकता है। मतदान लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आधार है। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नागरिकों के दृढ़ विश्वास और गहरी आस्था का परिचायक है। इस भाव के अभाव में लोकतंत्र न तो सुरक्षित रह सकता है और न ही परिपक्व और विकसित हो सकता है। लोकतंत्र की मूल भावना अधिकतम लोगों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। चुनाव विजेता यही करता है। कम मतदान से लोकतंत्र की यह मूल भावना प्रश्नांकित होती है।

चुनाव ब्रिटेन का और वोट ‘कश्मीर की आजादी’ के नाम पर ; हिंदू-भारत घृणा से भरा है चुनावी अभियान

                        मार्को लोंगी ने उगला भारत विरोधी जहर (फोटो साभार : Yahoo News)
यूके के संसदीय चुनाव में कश्मीर की ‘आजादी’ की आवाज उठाने को मुद्दा बनाकर वोट माँगा जा रहा है। कंजर्वेटिव पार्टी के नेता ने अपने इलाके के मुस्लिमों को हिंदू घृणा, नरेंद्र मोदी से नफरत और भारत विरोधी प्रचारों के जरिए आकर्षित करने की कोशिश की है। इस नेता का नाम मार्को लोंगी है, जो इस्लामियों से वोट माँग रहा है, ताकि वो ब्रिटेन की संसद में कश्मीर “आज़ादी” का मुद्दा उठा सकें।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, डुडले में ब्रिटिश पाकिस्तानी और कश्मीरी समुदाय के लोगों को संबोधित करते हुए कंजर्वेटिव पार्टी के नेता मार्को लोंगी ने पहले तो बकरीद की शुभकामनाएँ दी, उसके बाद भारत विरोधी आग उगलना शुरू किया। उसने कहा, ‘भारत में बीजेपी फिर से चुनी गई है, इसका मतलब है कि आने वाले महीनों में ‘कश्मीर के लोगों के लिए कठिन समय’ होगा। नरेंद्र मोदी ने हाल में साफ कहा कि वो कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्ज देने जा रहे हैं, जिसका मतलब होगा कि कश्मीरियों की संप्रभुता का अधिकार और स्पेशल स्टेटस छिन जाएगा।’ इस दौरान हिंदू विरोधी, भारत विरोधी पर्चा भी बाँटा गया।

कंजर्वेटिव पार्टी में टोरियों के तौर पर माने जाने वाले मार्को लोंगी ने कहा कि वो साल 2019 में सांसद बने थे, तो ‘कश्मीरी पर हो रहे भारत सरकार के अत्याचारों’ को लेकर मुखर रहे थे। लोंगी ने दावा किया कि उन्होंने कश्मीर से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और कश्मीर में भारत सरकार की कार्रवाईयों की निंदा की।

इस पर्चे में लेबर पार्टी की संसदीय उम्मीदवार सोनिया कुमार पर विशेष तौर पर निशाना साधा गया है और उनके उपनाम ‘कुमार’ को हाईलाइट किया गया है। पर्चे में लिखा है, “मैं यह फैसला आप पर छोड़ता हूँ। अगर आप मुझे वोट देते हैं, तो मैं आपसे वादा करता हूं कि मैं संसद में कश्मीर के लिए अपनी आवाज और भी बुलंद करूँगा और संसद में कश्मीरियों के लिए खड़े होने में सबसे आगे रहूँगा।”

लीसेस्टर ईस्ट में लेबर संसदीय उम्मीदवार राजेश अग्रवाल ने लोंगी द्वारा जारी किए गए पर्चे की निंदा की और कहा, “यह समुदायों को विभाजित करने का एक शर्मनाक प्रयास है और मुस्लिम और हिंदू दोनों समुदायों के लिए अपमानजनक है। लोंगी जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं, वो बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।” उन्होंने यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक से लोंगी का समर्थन वापस लेने की अपील की। उन्होंने कहा, “ऋषि सुनक को पार्टी से पहले देश को प्राथमिकता देनी चाहिए और लोंगी के अभियान के लिए अपनी पार्टी का समर्थन तुरंत वापस लेना चाहिए और ब्रिटिश भारतीयों को अलग-थलग करने के प्रयास के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए।”

दूसरी ओर, मार्को लोंगी ने पर्चे का बचाव करते हुए कहा कि वह बस “अपने निर्वाचन क्षेत्र में अपने कश्मीरी समुदाय का मुखर समर्थन कर रहे थे।” उसने आगे तर्क दिया कि डुडले में बहुत ही मिश्रित समुदाय है और वह बहुत से लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने कहा, “अतीत में उनमें से कई लोगों ने मुझसे कहा है कि वे कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, उससे बहुत चिंतित हैं।”

लोंगी ने इस बात पर जोर दिया कि यह पर्चा “राजनीति” का हिस्सा है, “यह राजनीति है, है न? क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को चाहते हैं जो लगातार कश्मीरियों का समर्थन करता रहा है, जहाँ मानवाधिकारों का हनन हुआ है या आप सोनिया कुमार नामक किसी ऐसे व्यक्ति को चाहते हैं, जिसके बारे में किसी ने कभी सुना ही न हो? मुझे नहीं लगता कि मेरे लिए अपने कश्मीरी समुदाय के सदस्यों के सामने इस बात को उजागर करना कोई समस्या है।” जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने कुमार के उपनाम को क्यों उजागर किया, तो उन्होंने कहा, “उनके पास सिर्फ़ स्टारमर का एक पर्चा है। मैं चाहता हूँ कि लोग जानें कि मैं स्टारमर के खिलाफ़ नहीं खड़ा हूँ, मैं कुमार के खिलाफ़ खड़ा हूँ।”

लोंगी ने आगे दावा किया कि वह केवल व्यापक समुदायों के भीतर एक समूह का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और यह विशेष रूप से कश्मीरियों का प्रतिनिधित्व कर रहा था। सोनिया कुमार ने पर्चे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

अमेरिका : पति के साथ सेक्स करते बायडेन की पार्टी की उम्मीदवार सुज़ाना गिब्सन को लोगों ने देखा लाइव: चुनाव प्रचार पर निकलीं तो मिला जबर्दस्त समर्थन

         वर्जीनिया की डेमोक्रेटिक महिला उम्मीदवार का पति के साथ सेक्स वीडियो लीक (साभार-वाशिंगटन पोस्ट)
अमेरिका के वर्जीनिया में चुनाव प्रचार एक अलग ही लेवल पर पहुँच गया है। यहाँ 11 सितम्बर, 2023 को वर्जीनिया के विधायिका (लेजिस्लेटिव) के चुनाव में एक जो बायडेन की पार्टी डेमोक्रेट की महिला उम्मीदवार का उसके पति के साथ सेक्स सम्बन्ध बनाते हुए वीडियो का लाइव प्रसारण हो गया। वाशिंगटन पोस्ट सहित कुछ मीडिया रिपोर्ट में यौन सम्बन्ध की लाइव स्ट्रीमिंग को चुनावी फायदे के लिए उपयोग करने की बात कही जा रही है क्योंकि वीडियो को लाइव करने के बाद देखने वालों से चुनाव के लिए धन की माँग भी की गई थी। वहीं कई रिपोर्ट में दावा है कि वीडियो लीक हुआ है, जिसे विरोधी रिपब्लिकन पार्टी द्वारा बदनाम करने के लिए किया गया है।

हालाँकि, अब इस मामले में 12 सितम्बर को जो खबर आई है उसके अनुसार वर्जीनिया की डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को महिलाओं और राज्य सीनेटर एल लुईस लुकास आदि डेमोक्रेटस का ज़बरदस्त समर्थन मिल रहा है। 

वर्जीनिया की डेमोक्रेटिक उम्मीदवार का नाम सुज़ाना गिब्सन, जो पेशे से एक नर्स हैं, साथ ही दो बच्चों की माँ भी हैं। सुजाना ने जून में डेमोक्रेटिक प्राइमरी जीती और राज्य के सबसे प्रतिस्पर्धी जिलों में से एक वर्जीनिया में रिपब्लिकन व्यवसायी डेविड ओवेन के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं। इस चुनाव में लाइव सेक्स वीडियो के अलावा सुजाना को एक एबॉर्शन राइट एक्टिविस्ट (गर्भपात के अधिकार के लिए लड़ने वाली महिला) के रूप में भी लोगों का समर्थन मिल रहा है।

 रिपोर्ट के अनुसार, लोगों ने सुजाना को लाइव स्ट्रीम के बाद भारी मात्रा में चुनाव लड़ने के लिए धन देकर मदद की। दरअसल, अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में गर्भपात के लिए शख्त कानून है। यहाँ रेयर मामलों में ही गर्भपात की इजाजत है। 

हालाँकि, इस मामले में सुजाना के समर्थन में आए दूसरे डेमोक्रेट सीनेटर लुकास ने कहा कि उनका मानना ​​है कि सेक्स वीडियो सुजाना गिब्सन को शर्मिंदा करने और उनके चुनाव अभियान को नुकसान पहुँचाने  के लिए एक रिपब्लिकन द्वारा लीक किया गया था।

लुकास ने कहा, “वे (रिपब्लिकन) किसी भी उम्मीदवार के बारे में ऐसी किसी भी चीज़ की तलाश कर रहे हैं जो उन्हें लगता है कि मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है। यह सब इस बात से संबंधित है कि सीनेट का नियंत्रण किसे मिलने वाला है और सदन का नियंत्रण किसे मिलने वाला है। सारा मामला महज नियंत्रण का है।”

वर्जीनिया में डेमोक्रेट और रिपब्लिकन के बीच काँटे की इस चुनावी लड़ाई में इस सेक्स वीडियो लीक कांड के बाद सुजाना के समर्थन में डेमोक्रेटिक महिला उम्मीदवारों के लिए वकालत करने वाले समूह एमिली लिस्ट ने भी गिब्सन का बचाव किया।

सेक्स वीडियो लीक होने के बाद वर्जीनिया में चुनाव का पूरा नैरेटिव ही बदलता नजर आ रहा है। जहाँ कुछ राजनितिक विश्लेषक इसे बड़ा गेम मान रहे हैं वहीं कुछ का कहना है कि यह कदम राजनीति को और नीचे ले जाने वाला है। चुनाव में नीतियों पर बात न होकर सेक्स वीडियो चर्चा का विषय बना हुआ है। 

क्या कहा डेमोक्रेटिक उम्मीदवार ने

वहीं अब इस मामले में सुजाना का बयान भी आ गया है जिसमें उन्होंने उनके पति के साथ सेक्स वीडियो लीक को गटर छाप राजनीति कहा है। 
सुजाना ने अपने बयान में कहा, “इससे मैं डरने वाली नहीं और न मुझे यह चुप करा पाएगा। मेरे राजनीतिक विरोधियों और उनके रिपब्लिकन सहयोगियों ने यह साबित कर दिया है कि वे मुझ पर और मेरे परिवार पर हमला करने के लिए इस हद तक गिरने को तैयार हैं क्योंकि जब महिलाएँ बोलती हैं तो उन्हें चुप कराने के लिए ऐसी कोई सीमा नहीं है जिसे वे पार नहीं करेंगे।”
इस मामले में गिब्सन ने कहा, “सेक्स वीडियो को लीक करना मेरी गोपनीयता के अधिकार पर अवैध आक्रमण है जो मुझे और मेरे परिवार को अपमानित करने के लिए किया गया है।” गिब्सन के वकील, डैनियल पी. वॉटकिंस ने कहा कि वीडियो का प्रसार वर्जीनिया के रिवेंज पोर्न कानून का उल्लंघन है, जो जबरदस्ती, परेशान करने के इरादे से किसी अन्य व्यक्ति की नग्न या सेक्स वीडियो को दुर्भावनापूर्ण रूप से प्रसारित करना या बेचना अपराध है।
वॉटकिंस ने 2021 वर्जीनिया कोर्ट ऑफ अपील्स के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सहमति से यौन संबंध के दौरान भी अपनी प्रेमिका को गुप्त रूप से रिकॉर्ड करना गैरकानूनी था, भले ही उसने अन्य लोगों को वीडियो न दिखाया हो। 

‘बंगाल मतलब बाकी देश से अलग, इसे बचाने के लिए राष्ट्रवादी क्रांति जरूरी’: पंचायत चुनाव में हिंसा, समाज, सिस्टम, अर्थव्यवस्था पर स्वप्न दासगुप्ता

पश्चिम बंगाल में हाल ही में पंचायत चुनाव संपन्न हुए, जिसमें भाजपा ने 22.88% वोट शेयर हासिल किया और 10,000 से भी अधिक सीटें हासिल की। ये सब इसके बावजूद हुआ, जब चुनाव में राज्य भर में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। कहीं से बूथ लूटने की खबरें आईं तो कहीं-कहीं भाजपा प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं पर हमले किए गए। कहीं बैलेट बॉक्स को ही आग के हवाले कर दिया गया तो कहीं मतपेटी पर पानी उड़ेल दिया गया।

इन सबके बीच हमने स्वप्न दासगुप्ता से बात की, 2 बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में काम करने के लिए पद्म भूषण का पुरस्कार पा चुके 67 वर्षीय स्वप्न दासगुप्ता 1990 से ही भाजपा से जुड़े हुए हैं। वो ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी स्थित नफ़ील्ड कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएट फेलो भी रहे हैं। उन्होंने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ और ‘इंडिया टुडे’ और ‘द स्टेट्समैन’ जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में संपादकीय जिम्मेदारियाँ निभाई हैं।

सवाल: बंगाल में 40 से ज्यादा लोगों की हत्या पंचायत चुनाव में कर दी जाती है। तृणमूल से अलग जिन लोगों ने जीत दर्ज की, उनमें से कुछ डर के कारण असम चले गए। डर के इस माहौल में लोकतंत्र को आप कहाँ देखते हैं? क्या सिर्फ वोटिंग करवाना ही लोकतंत्र है?

जवाब: देखिए, इस बार जो पंचायत चुनाव हुआ है इसमें हिंसा सिर्फ मतदान के दौरान ही नहीं हुई है, बल्कि जिस दिन नामांकन की प्रक्रिया हुई उसी समय से ये शुरू हो गया और अब काउंटिंग के बाद तक भी ये चल रहा है। 50 लोगों की हत्या कर दी गई है। इनमें सभी पार्टियों के लोग हैं – TMC, भाजपा, लेफ्ट और ISF (इंडियन सेक्युलर फ्रंट)।

हिंसा अधिकतर मुस्लिमों के प्रभाव वाले इलाकों में हुई है। इसके पीछे कारण ये है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस ने मुस्लिमों के सारे वोटों पर कब्ज़ा कर लिया था, 90-95% वोट उन्हें गए थे। तब भाजपा की जो हार हुई, उसका एक प्रधान कारण था – शत-प्रतिशत मुस्लिम ध्रुवीकरण। लेकिन, इस बार मुस्लिम वोटों में एक विभाजन आ गया है, जिस कारण हिंसा की इतनी घटनाएँ हुई हैं।

मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में सबसे ज्यादा हिंसा हुई है। एक साइलेंट इंटिमीडेशन चल रहा है। ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ और ‘Winner Takes All’ वाला लोकतंत्र विरोधी कल्चर आ गया है, जिसे लेफ्ट ने शुरू किया था और TMC इसकी कार्बन कॉपी है।

मार्क्सवादियों और तृणमूल का संगठन अलग है, लेकिन दोनों समान हैं। बस एक फर्क है – CPM का भ्रष्टाचार सीमित था और ये पार्टी कंट्रोल्ड करप्शन था, लेकिन तृणमूल के मामले में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। ये राज्य सरकार से लेकर पंचायत स्तर तक, सब मिले हैं और सबका हिस्सा बँटा हुआ है।

असीमित भ्रष्टाटार के कारण केंद्र सरकार की जो योजनाएँ आती हैं और उनके फंड्स आते हैं (मनरेगा, आवास योजना, हर घर जल इत्यादि), इन सबमें चोरी हुई है। इस कारण पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई है और भ्रष्टाचार को ही आय का स्रोत बना दिया गया है। इसी कारण ये जीत के लिए इतने बेचैन रहते हैं, ताकि 5 वर्षों के लिए सब सेट हो जाएँ। इसी कारण, वहाँ भारी सुधार की आवश्यकता है।

सवाल: 2014 में 34 और 2019 में 22 लोकसभा सीट पर तृणमूल की जीत। अब 2024 से पहले पंचायत स्तर पर ऐसी हिंसा भाजपा या किसी भी विपक्ष को बंगाल से साफ करने की रणनीति तो नहीं?

जवाब: इस पंचायत चुनाव का जो परिणाम है, उसके साथ पब्लिक ओपिनियन का क्या संपर्क है – ये चिंतन का विषय है। इतनी लूट हुई है, इतना फ्रॉड हुआ है। ये चुनाव बैलेट बॉक्स से कराया गया था राज्य चुनाव आयोग के जरिए, इतने फर्जी वोट पड़े, हमले हुए हैं और लोग तनाव में थे। इसीलिए, अनुमान लगाना मुश्किल है। फिर भी, लोकसभा के चुनाव में इसका असर जरूर देखने को मिलने वाला है।

उस समय (लोकसभा के चुनाव में) TMC के भ्रष्टाचार का असर नहीं पड़ता, क्योंकि राज्य में सांसद की उतनी शक्ति नहीं होती और दिल्ली के लिए वोट दिए जाते हैं। ये फ्लेक्सिबल होता है, इसीलिए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस वोट देने वाले भी लोकसभा चुनाव में भाजपा को देते हैं।

राज्य स्तर पर भाजपा की एक कमजोरी ये है कि अब तक संगठन मजबूत नहीं है। संगठन में बहुत कमजोरियाँ हैं। 3 महीने पहले अगर कॉन्फिडेंस बनाने के लिए केंद्रीय बलों को लाया जा सकता है और चुनाव आयोग 8-10 से लेकर जितने भी चरण में चुनाव कराए, हर पोलिंग बूथ पर सुरक्षाबल सुनिश्चित हो, तब आप देखेंगे कि पंचायत चुनाव से लोकसभा का चुनाव एकदम अलग होगा।

सवाल: ममता बनर्जी की राजनीति से अलग बंगाल के समाज पर आपकी राय क्या है? लंबे समय तक वामपंथी सत्ता के कारण हिंसा की राजनीति या “सत्ता बंदूक की नाल से निकलती है” जैसी बात आम समाज में भी घर कर गई है?

जवाब: 2 चीजें हैं। पहला, राजनीतिक प्रभाव। वामपंथियों के संघर्ष में हिंसा की संस्कृति रही है। ये समाज में भी घुस जाता है। वामपंथी तकनीक से ही TMC ने वामपंथियों को हराया। ये प्रभाव समाज में रह गया।

पश्चिम बंगाल स्वाधीनता के समय नंबर एक या दो राज्य था, अब समय बीतते-बीतते 17-18 नंबर पर पहुँच गया और ओडिशा भी आगे निकल गया। असम भी कुछ दिनों में आगे निकल जाएगा। यहाँ कोई विकास नहीं हो रहा है, कोई रोजगार नहीं पैदा हो रहा। व्यवसायी लोग टोलबाजी से परेशान हैं, जिसे ‘Illegal Extraction’ कह लीजिए। पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार का जो आलम है, नेताओं के बिस्तर से रुपए निकलने की घटनाएँ सामने आईं।

कहने का मतलब है कि अर्थव्यवस्था के बर्बाद हो जाने के कारण भ्रष्टाचार हावी है और जिसे जहाँ से मिल रहा है, वो लूट रहा है। इसके साथ हिंसा भी जुड़ गई है, इसका हिस्सा बन गई है। सामाजिक व्यवस्था ऐसी हो गई है कि जो पढ़े-लिखे और प्रतिभावान लोग हैं, वो वन-वे टिकट लेकर देश के महानगरों या विदेश में चले जाते हैं, यहाँ नहीं रुकते।

पलायन की समस्या के कारण कोलकाता में औसत उम्र बाकी नगरों से ज्यादा है। इसका कारण है कि जिनकी रियायरमेंट की उम्र हो गई है या जो रिटायर हो गए हैं, वहीं बंगाल में बचे हैं। जो प्रोडक्टिव जनरेशन है, युवा है, वो यहाँ नहीं ठहरते हैं। इसीलिए, पश्चिम बंगाल माइग्रेंट लेबर में आजकल नंबर वन हो गया है।

सवाल: बिहार ने कभी चुनावी हिंसा झेला, बहुत भयावह और बड़े स्तर पर। वहाँ जाति का समीकरण था, अगड़ा-पिछड़ा था, जमींदार-मजदूर था। फिर सब खत्म हो गया। बंगाल में चुनावी हिंसा के सामाजिक कारण क्या हैं? और यह खत्म क्यों नहीं हो रहे?

जवाब: पहले हिंसा होती थी तो लोग कहते थे कि बिहार की तरफ हो रहा है। बिहार देश की हर सड़ी हुई समस्या का प्रतीक बन गया था। यह हाल लगभग 15 साल पहले तक था। लेकिन आजकल बिहार में थोड़ी-बहुत हिंसा होती है, बड़े स्तर पर वैसा कुछ नहीं होता। पहले MCC और रणवीर सेना जैसे संगठनों की हिंसा की खबरें आती थीं।

बिहार में बदलाव हुआ है। बिहार आर्थिक रिकवरी की ओर बढ़ रहा है। बहुत बाकी है वहाँ करना-होना लेकिन थोड़ा-थोड़ा कर रहा है, जबकि पश्चिम बंगाल पीछे जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था बर्बाद हो गई है, जिसकी शुरुआत लेफ्ट ने ही की थी।

बंगाल के सामाजिक पतन के लिए एक और बड़ी वजह है। यहाँ प्रादेशिकता की मानसिकता आ गई है, जो बंगाल को बाकी देश से अलग समझते हैं। यानी, एक इमोशनल अलगाववाद की भावना घर कर गई है। इसी कारण अन्य राज्यों से आने वालों को ‘बाहरी’ कहा जाता है। पहले तो कई जगहों से लोग बंगाल में आते थे, यूपी-बिहार के लोग यहाँ जीवन का हिस्सा बन गए और इनमें से कई बंगाली बोलते हैं तो कई नहीं भी बोलते हैं।

बिहार से यहाँ हजारों मजदूर, काम करने वाले, छोटे-बड़े व्यवसायी आए थे। अब सब खत्म हो रहा है। पुराने संपर्क हैं, लेकिन बंगाल का एक प्रभाव जो झारखंड वगैरह में पूरा था, मधुपुर, देवघर या भागलपुर तक उसका असर था। अब कुछ है ही नहीं।

पश्चिम बंगाल के लोगों को इस वास्तविकता को स्वीकार करना पड़ेगा, जो पूरी तरह नीचे जा रहे हैं – सांस्कृतिक रूप से, राजनीतिक रूप से और आर्थिक रूप से। राजनातिक प्रभाव पश्चिम बंगाल का कुछ है ही नहीं। प्रणब मुखर्जी थे लेकिन उनकी बंगाल से ज्यादा दिल्ली में चलती थी। पश्चिम बंगाल ने खुद को लंबे समय से मुख्यधारा से अलग कर रखा है, जिसका अब असर दिख रहा है।

सवाल: समाज से अलग अब बात सिस्टम की, सरकारी तंत्र की, पुलिस की। बंगाल से लगभग हर हफ्ते, 2 हफ्ते पर – बम बनाते समय विस्फोट, झोले में मिला क्रूड बम – जैसी खबरें हम देखते हैं। अगर यह इतना आम हो गया है तो क्या वहाँ पुलिस रिफॉर्म्स की जरूरत नहीं?

जवाब: पुलिस रिफॉर्म्स से पहले पुलिस रिक्रूटमेंट को सुधारना होगा। असली पुलिस से ज्यादा वहाँ सिविक पुलिस की भर्ती कर ली गई है। जिस तरह के प्रोफेशनल पुलिस की भर्ती की जानी थी, वो नहीं की गई। वो फंड्स की कमी को इसकी वजह बता रहे। हकीकत में पुलिस व्यवस्था का पूरा का पूरा राजनीतिकरण कर दिया गया है।

इस बार पंचायत चुनाव में जो बूथ लूटे गए हैं, इसमें पुलिस ने मदद की है। अदालतों में अधिकतर शिकायतें पुलिस के खिलाफ हैं। पुलिस ने हिंसा में हिस्सा लिया है। पुलिस रिफॉर्म से ज्यादा पश्चिम बंगाल में इन्हें (पूरे पुलिस विभाग को) रीकंस्ट्रक्ट करने की जरूरत है।

पहले अच्छी पुलिस फ़ोर्स थी, लेकिन पूरा बर्बाद कर दिया गया। आज भी कोलकाता की पुलिस बाकी बंगाल की पुलिस से अच्छी है। पश्चिम बंगाल की शासन व्यवस्था ध्वस्त हो गई है, शासन प्रणाली की संस्कृति बर्बाद हो गई है।

मुझे लगता है कि बंगाल को बचाने के लिए एक अलग प्रकार की क्रांति की ज़रूरत है – रेड रेवोलुशन या तृणमूल रेवोलुशन नहीं, राष्ट्रवादी क्रांति की जरूरत है। बंगाली संस्कृति का सभी सम्मान करते हैं, लेकिन वो भारत से अलग नहीं है बल्कि भारत को समृद्ध करता है। आप हर जगह जाकर ‘हमारा है, हमारा है’ कहेंगे तो कुछ नहीं होगा।

सवाल: आखिरी सवाल पार्टी के कार्यकर्ताओं को लेकर, चाहे वो किसी भी पार्टी के हों। क्योंकि चुनावी हिंसा का सबसे पहला और मारक असर इन्हीं पर पड़ता है। लंबे समय तक वामपंथी सत्ता और विचार का यह प्रभाव कि – “पार्टी ही सब कुछ, पार्टी के लिए मारना या मरना” – क्या यह दूसरी राजनीतिक पार्टियों में भी घर कर गई है? क्योंकि सत्ता परिवर्तन से बंगाल में चुनावी हिंसा के पैटर्न में कोई बदलाव नहीं दिख रहा।

जवाब: आप हिंदी बेल्ट में जाएँगे तो किसी पॉलिटिकल वर्कर के बारे में कहा जाता है कि वो ‘राजनीति’ करता है। जबकि, पश्चिम बंगाल में कहा जाता है कि ‘पार्टी कोर छी (वो पार्टी करता है)।’ पार्टी कौन सी? कोई सी भी लेकिन वहाँ महत्व पार्टी का ही है।

‘राजनीति’ से अलग ‘पार्टी’ वाले ट्रेंड को CPM ने शुरू किया था और TMC ने भी यही किया। हालत यह है कि आप जो भी करो, आपको पार्टी में आना पड़ेगा। हाल के दिनों में तृणमूल ने इस पार्टी कल्चर को भी बढ़ा दिया है।

पहले तृणमूल में सेंट्रलाइज्ड सिस्टम था, सिंगल विंडो क्लियरेंस था, लेकिन अब अलग-अलग स्तरों पर तृणमूल के भीतर कई समूह बन गए हैं। सब कुछ पार्टी ही बन गई है, पार्टी ही माई-बाप है। ये जो मानसिकता है, ये सभी पार्टियों में घर कर गई है।

स्वप्न दासगुप्ता के बारे में बता दें कि उन्होंने सन् 1975 में दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। लंदन स्थित SOAS यूनिवर्सिटी से उन्होंने Ph.D की। उस जमाने में उन्होंने पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में विभाजन और भेदभाव वाली राजनीति पर गहरा अध्ययन कर के थीसिस लिखी थी। वो JNU में विजिटिंग ऑनररी प्रोफेसर भी रहे हैं। उन्होंने ‘Awakening Bharat Mata: The Political Beliefs of the Indian Right’ नामक पुस्तक भी लिखी है।(साभार: चंदन कुमार https://hindi.opindia.com/परफेक्शन को कैसे इम्प्रूव करें :)

केरल चुनाव : चर्च का कांग्रेस को सख्त निर्देश : हमारे परामर्श के बिना नहीं दिए जाएं टिकट

                                                 आर्कबिशप जोसेफ पेरुमोत्तम/और राहुल गाँधी
भारतीय जनता पार्टी पर तत्कालीन भारतीय जनसंघ के समय से मुस्लिम विरोधी हिन्दुओं की पार्टी के नाम से जनता को पागल बनाया जा रहा है, लेकिन आज तक किसी मठ ने उनकी सलाह के बिना किसी को टिकट न देने के लिए नहीं कहा। जबकि कांग्रेस और अन्य पार्टियाँ जो धर्म-निरपेक्ष पार्टी होने का दावा करती रही है, उसका असली रूप कुछ समय से सार्वजनिक होने लगा है। राहुल गाँधी चुनावों में कोट के ऊपर जनेऊ पहन हिन्दू होने की बात करते हैं, और दूसरे, कोरोना काल में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं की मृत्यु होने पर अब स्थिति सामान्य होने पर हुई शोक सभा में यह बात भी मुखरित हुई कि डी.एन.सिंह ने अयोध्या पर भ्रमित किया।  

खैर, केरल विधानसभा चुनाव मई 2021 में होने वाला है। देश के लगभग सभी राज्यों में शर्मनाक हार झेल चुके कांग्रेस पार्टी के लिए यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है। वहीं अब चुनाव को मद्देनजर रखते हुए केरल के सिरो मालाबार चर्च ने कांग्रेस पार्टी को एक सख्त निर्देश जारी किया है।

दरअसल, चंगनास्सेरी आर्कबिशप मार जोसेफ पेरुमोत्तम (Changanassery Archbishop Mar Joseph Perumthottam) ने चर्च के परामर्श के बिना आगामी विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी उम्मीदवारों को तय करने के खिलाफ कांग्रेस पार्टी को चेतावनी दी है।

मेट्रोपॉलिटन आर्कबिशप ने निर्देश दिया है कि अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में अपने उम्मीदवारों का चयन करने से पहले कांग्रेस को अल्पसंख्यकों से परामर्श करना चाहिए। यह भी कहा कि पार्टी को राज्य में ईसाई क्षेत्रों के लिए उम्मीदवार तय करने से पहले चर्च से परामर्श करना चाहिए।

चर्च के आधिकारिक मुखपत्र दीपिका के एक संपादकीय में, मार जोसफ पेरुमोत्तम ने कहा कि कांग्रेस को समुदाय के बाहर के उम्मीदवारों को मैदान में नहीं उतारना चाहिए। संपादकीय के एक हिस्से में कहा गया है कि 1951 में, जवाहरलाल नेहरू ने पीसीसी अध्यक्षों को एक समान निर्देश जारी किया था।

आर्कबिशप ने लिखा कि उम्मीदवार केवल वही होने चाहिए जिन्होंने उस क्षेत्र में अल्पसंख्यकों का विश्वास जीता है जहाँ से उन्हें मैदान में उतारा जा रहा है। इसमें कहा गया है कि बाहरी लोग, जो विश्वास या जन्म से समुदाय के नहीं हैं, को अल्पसंख्यक ईसाई निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार के रूप में नहीं उतारा जाना चाहिए।

2021 के केरल विधानसभा को मद्देनजर रखते हुए चुनावी भागदौड़ का समय है। जो लोग केरल की जनसांख्यिकी और राजनीति से परिचित हैं, उन्हें पता होगा कि राजनीतिक रूप से, केरल बाई पोलर रहा है, विधानसभा चुनावों में सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के बीच सत्ता बारी-बारी से आई है।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहित पिछले तीन दशकों से यूडीएफ अपने घटते प्रदर्शन से गुजर रहा है, कांग्रेस लगातार अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है। ऐसे में, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कॉन्ग्रेस सिरो-मालाबार चर्च की माँगों को मानेगी और उनके अनुसार चलेगी या नहीं।

कर्नाटक पंचायत चुनाव : मतगणना के दौरान पाकिस्तान के समर्थन में नारे

   एसपी बीएम लक्ष्मी प्रसाद (बाएँ), और पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाते उपद्रवी (साभार: ANI, social media)

एक बात आज तक समझ से बाहर है कि आखिर किस आधार पर भारत की धरती पर पल रहे पाकिस्तान समर्थक वेन्टीलेटर पर जीवित पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाते हैं? क्या किसी में पाकिस्तान जाकर हिन्दुस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाने का साहस है? पाकिस्तान में हिन्दुस्तान ज़िंदाबाद नारे लगाने से पहले सबकी नानी मर जाएगी, वरना पाकिस्तान सरकार द्वारा उन्हें ही... वहां कोई नहीं चिल्लाने वाला मिलेगा कि "देखो मुसलमानों पर ज़ुल्म हो रहे हैं। देखों पाकिस्तान में बोलने की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर तानाशाही गोली या हंटर चल रहे हैं।" ये नमकहरामी केवल भारत में ही संभव है, क्योकि यहाँ बिकाऊ लोग और बिकाऊ नेताओं की कमी नहीं। ऐसे लोगों और इनके समर्थकों के साथ भारत सरकार और न्यायालय को सख्ती से पेश ही नहीं इनके बैंक खातों की भी जाँच कर चल एवं अचल संपत्ति को कब्जे में कर नीलम कर देना चाहिए।  

कर्नाटक में ग्राम पंचायत चुनावों की मतगणना के दौरान दिसंबर 30, 2020 को पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए जाने का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ है। इस वीडियो में कुछ उपद्रवी उजीरे में ग्राम पंचायत चुनाव की मतगणना के दौरान पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाते दिख रहे हैं।

इस संबंध में कर्नाटक के दक्षिण कन्नड के एसपी बीएम लक्ष्मी प्रसाद ने कहा, ”सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें कुछ उपद्रवी उजीरे में ग्राम पंचायत चुनावों की मतगणना के दौरान पाकिस्तान समर्थक नारे लगाते हुए दिखे। हम मामले की जाँच करेंगे।”

भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया है कि प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के राजनीतिक संगठन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) की रैली के दौरान पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए गए। बीजेपी ने इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है।

हालाँकि SDPI बेल्थांगडी विधानसभा इकाई के अध्यक्ष हैदर अली ने आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि SDPI कार्यकर्ता ‘SDPI ज़िंदाबाद’ कहते हैं न कि ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’। फिलहाल कर्नाटक पुलिस मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर वायरल हुए वीडियो की जाँच कर रही है। 

टाइम्स नाउ के मुतबाकि जब ग्राम पंचायत चुनावों के परिणाम घोषित किए जा रहे थे और जीत का जश्न मनाया जा रहा था, तभी पाकिस्तान समर्थित नारे लगाए गए। बताया जा रहा है कि वीडियो को फॉरेंसिक जाँच के लिए भेज दिया गया है। इसके अलावा, पुलिस सीसीटीवी फुटेज की भी जाँच कर रही है और अधिक सबूत इकट्ठा करने के लिए चश्मदीदों से भी बात कर रही है। 

जानकारी के मुताबिक 15 एसडीपीआई कार्यकर्ताओं के खिलाफ धारा 124 (ए) (राजद्रोह) और भारतीय दंड संहिता की 143 (गैरकानूनी विधानसभा) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

कर्नाटक में पंचायत चुनाव के लिए दिसंबर 30 को मतगणना के शुरुआती रुझानों से अधिकतर सीटों पर भाजपा समर्थित उम्मीदवारों के जीतने के संकेत मिले हैं। राज्य निर्वाचन आयोग के मुताबिक, अभी 36781 ग्राम पंचायत पदों के परिणाम लंबित हैं। शुरुआती रुझानों में 82616 सीटों में से बीजेपी 5340 पर, कांग्रेस 3150 पर और जेडीएस 1580 पर आगे थे। वहीं 600 से अधिक सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी आगे रहे।

कर्नाटक ग्राम पंचायत चुनाव में 5728 ग्राम पंचायतों की 82616 सीटों पर दो चरणों (22 और 27 दिसंबर) में हुए चुनाव में बैलट पेपर का इस्तेमाल किया गया था और इस दौरान 78.58 फीसदी मतदान हुआ। चुनावी मैदान में 2,22,814 उम्मीदवार थे। अभी तक आधिकारिक रूप से किसी नतीजे की घोषणा नहीं हुई, लेकिन बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष नलिन कुमार कतील और कांग्रेस नेता व पूर्व सीएम सिद्धारमैया ने अपनी-अपनी पार्टी के समर्थन वाले उम्मीदवारों के जीतने का दावा किया।