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वेतन लेते थे, ड्यूटी के दौरान मर गए… उन्हें शहीद क्यों कहें: सिखा सर्मा, असम की लेखिका

छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में 22 जवानों के बलिदान होने के बाद असम की एक लेखिका को उनके फेसबुक पोस्ट के कारण गुवाहटी में गिरफ्तार किया गया है। 48 साल की सिखा सर्मा (शिखा शर्मा) नाम की लेखिका को गुवाहटी पुलिस ने देशद्रोह की धारा के तहत हिरासत में लिया। पुलिस का कहना है कि उन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा।

गुवाहटी पुलिस कमिश्नर मुन्ना प्रसाद गुप्ता ने कहा, “गुवाहटी की लेखिका सिखा सर्मा के विरुद्ध आईपीसी की 124-ए धारा समेत विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।”

सर्मा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव हैं और कथित तौर पर उन्होंने सोमवार को बलिदान हुए जवानों के बारे में लिखा, “वेतनभोगी पेशेवर जो अपनी ड्यूटी के दौरान मरे, उन्हें शहीद नहीं कहा जा सकता। इस तर्क से तो अगर विद्युत विभाग में कोई वर्कर करंट लगने से मरता है तो उसे भी शहीद कहा जाना चाहिए। मीडिया, इसे लोगों की भावना मत बनाओ।”

असम की लेखिका के इस पोस्ट का ऑनलाइन बहुत विरोध हुआ। सोमवार को गुवाहटी हाई कोर्ट के दो वकील उमी डेका बरुआ और कंगकना गोस्वामी ने उनके विरुद्ध डिसपुर थाने में एफआईआर करवाई। इसमें कहा गया, “यह हमारे सैनिकों के सम्मान में पूरी तरह से अपमानजनक है और इस तरह की भद्दी टिप्पणी न केवल हमारे जवानों के बलिदान को कम करती है बल्कि राष्ट्र भावना और पवित्रता पर मौखिक हमला भी है।”

शिकायतकर्ताओं ने अपनी याचिका में लेखिका के विरुद्ध सख्त से सख्त कार्रवाई करने का अनुरोध किया। वहीं सर्मा ने सोमवार रात इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “क्या मेरी बात को गलत लेना मानसिक प्रताड़ना नहीं हुई। क्या मेरे ख़िलाफ़ फर्जी का प्रोपगेंडा चलाना कानून के तहत आता है? आखिर हत्या और रेप की धमकी के मामले में जो मैंने शिकायत की थी, उसके बारे में कोई जाँच क्यों नहीं हुई?”

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, इस मामले पर डिसपुर पुलिस स्टेशन ओसी प्रफुल्ल कुमार दास ने जानकारी देते हुए बताया, “मामले में शिकायत के आधार पर गिरफ्तारी हो गई है। आरोपित लेखिका थीं।” इसके अलावा उनके फेसबुक प्रोफाइल से पता चलता है कि वह ऑल इंडिया रेडियो की आर्टिस्ट भी रह चुकी हैं। अक्टूबर में पिछले साल सरकार विरोधी टिप्पणी करने पर उन्हें कथित तौर पर रेप की धमकियाँ मिली थीं।

छत्तीसगढ़ के बस्तर डिवीजन के बीजापुर जिले में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में 4 अप्रैल को 22 जवान बलिदान हुए थे। नक्सलियों ने शनिवार को घेर कर 700 जवानों पर हमला किया था। घटनास्थल से एक वीडियो भी आया था जिसमें 20 जवानों के शव मौके पर ही दिखाई पड़ रहे थे। इस हमले के बाद CRPF के डीजी ने एनकाउंटर में 12-15 नक्सलियों को मार गिराए जाने की बात कही थी। साथ ही 20 के घायल होने का दावा किया था। 

‘CAA विरोधी आंदोलन सत्याग्रह नहीं, यह आतंकी गतिविधि के दायरे में’: गुवाहाटी हाईकोर्ट

                                        अखिल गोगोई की जमानत याचिका गुवाहाटी हाईकोर्ट ने की खारिज
गुवाहाटी हाई कोर्ट ने गुरुवार (7 जनवरी 2021) को ‘एक्टिविस्ट’ अखिल गोगोई की जमानत याचिका खारिज की दी। वह देशद्रोह और सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान हिंसा भड़काने सहित कई आरोपों में दिसंबर 2019 से जेल में बंद है। हाई कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज करते हुए विशेष एनआईए कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अखिल को असम में ऐंटी सीएए हिंसा में उसकी भूमिका को लेकर राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। 

उच्च न्यायालय ने एनआईए की एक विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें गोगोई के खिलाफ दर्ज 13 मामलों में से एक मामले में जमानत याचिका खारिज कर दिया गया था। बता दें कि गोगोई को इस मामले के अलावा सभी अन्य मामलो में जमानत मिल चुकी है।

कोर्ट ने कहा कि असम में जो ऐंटी सीएए आंदोलन हुआ था वह सत्याग्रह नहीं था, बल्कि गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) में परिभाषित टेररिस्ट ऐक्ट के तहत आता है। जस्टिस कल्याण राय सुराना और अजीत बाठकुर की बेंच ने आदेश में कहा, “हिंसा का इस्तेमाल करते हुए अखिल के नेतृत्व वाली भीड़ ने अहिंसक आंदोलन की अवधारणा को ही खारिज कर दिया था। आंदोलन के जरिए सरकारी मशीनरी को कमजोर करने, आर्थिक नाकेबंदी, समुदायों के बीच नफरत फैलाने और शांति में बाधा उत्पन्न करके सरकार के प्रति अंसतोष पैदा करने की कोशिश की गई थी।” कोर्ट ने कहा कि इस तरह की गतिविधि यूएपीए की धारा 15 के तहत आतंकी कार्य के रूप में परिभाषित है।

इसमें कोई दो राय नहीं, सीसीए विरोध में दिल्ली में भी "हिन्दुत्व विरोधी", "हिन्दू विरोधी", "मोदी और योगी विरोधी" आदि नारों का क्या मतलब था?(देखिए चित्र) और संविधान की दुहाई देने वाली बेशर्म पार्टियां चुप्पी साधे रहीं। हाँ, अगर नारे विपरीप होते यही बेशर्म पार्टियां "गंगा-जमुनी तहजीब" आदि स्वांग भरे बोल बोल रहे होते। जो इस बात को सिद्ध करता है कि सीसीए विरोध की आड़ में भारत में अराजकता फैलाना ही इनका मुख्य उद्देश्य था। 

गोगोई ने एनआईए द्वारा असम में सीएए के खिलाफ हिंसक विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में दर्ज दो मामलों में से एक में जमानत हासिल करने में कामयाबी हासिल की थी। यह एकमात्र मामला बचा था जहाँ विशेष एनआईए अदालत ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। गुवाहाटी कोर्ट की एक खंडपीठ ने एनआईए अदालत के फैसले को बरकरार रखा और गोगोई द्वारा दायर जमानत याचिका को खारिज कर दिया।

अखिल गोगोई, कृषक मुक्ति संग्राम परिषद और राइजोर दल का नेता है। संशोधित नागरिकता कानून (CAA) के खिलाफ कथित हिंसक प्रदर्शन के मामले में गोगोई को जोरहाट से दिसंबर 2019 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वह गुवाहाटी केंद्रीय कारागार में बंद है।

यह मामला शुरू में गुवाहाटी के चंदमारी पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में इसे एनआईए को ट्रांसफर कर दिया गया। गोगोई पर कड़े गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, राजद्रोह, आपराधिक साजिश, आतंकवादी संगठनों को समर्थन, सहित अन्य आरोप लगाए गए हैं। 

उसे 12 दिसंबर 2019 को CAA के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों में भूमिका के लिए गिरफ्तार किया गया था। केंद्र सरकार द्वारा पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से संबंधित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए यह कानून पारित किया गया था। उसके तीन साथियों को एक दिन बाद गिरफ्तार किया गया था।

गोगोई को बाद में एनआईए को सौंप दिया गया और एक अदालत ने उसे 17 दिसंबर को एजेंसी की 10 दिन की हिरासत में भेज दिया। उसे पूछताछ के लिए नई दिल्ली भी लाया गया। गोगोई को 25 दिसंबर को वापस गुवाहाटी ले जाया गया और तब से वह न्यायिक हिरासत में है।

कर्नाटक पंचायत चुनाव : मतगणना के दौरान पाकिस्तान के समर्थन में नारे

   एसपी बीएम लक्ष्मी प्रसाद (बाएँ), और पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाते उपद्रवी (साभार: ANI, social media)

एक बात आज तक समझ से बाहर है कि आखिर किस आधार पर भारत की धरती पर पल रहे पाकिस्तान समर्थक वेन्टीलेटर पर जीवित पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाते हैं? क्या किसी में पाकिस्तान जाकर हिन्दुस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाने का साहस है? पाकिस्तान में हिन्दुस्तान ज़िंदाबाद नारे लगाने से पहले सबकी नानी मर जाएगी, वरना पाकिस्तान सरकार द्वारा उन्हें ही... वहां कोई नहीं चिल्लाने वाला मिलेगा कि "देखो मुसलमानों पर ज़ुल्म हो रहे हैं। देखों पाकिस्तान में बोलने की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर तानाशाही गोली या हंटर चल रहे हैं।" ये नमकहरामी केवल भारत में ही संभव है, क्योकि यहाँ बिकाऊ लोग और बिकाऊ नेताओं की कमी नहीं। ऐसे लोगों और इनके समर्थकों के साथ भारत सरकार और न्यायालय को सख्ती से पेश ही नहीं इनके बैंक खातों की भी जाँच कर चल एवं अचल संपत्ति को कब्जे में कर नीलम कर देना चाहिए।  

कर्नाटक में ग्राम पंचायत चुनावों की मतगणना के दौरान दिसंबर 30, 2020 को पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए जाने का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ है। इस वीडियो में कुछ उपद्रवी उजीरे में ग्राम पंचायत चुनाव की मतगणना के दौरान पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाते दिख रहे हैं।

इस संबंध में कर्नाटक के दक्षिण कन्नड के एसपी बीएम लक्ष्मी प्रसाद ने कहा, ”सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें कुछ उपद्रवी उजीरे में ग्राम पंचायत चुनावों की मतगणना के दौरान पाकिस्तान समर्थक नारे लगाते हुए दिखे। हम मामले की जाँच करेंगे।”

भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया है कि प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के राजनीतिक संगठन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) की रैली के दौरान पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए गए। बीजेपी ने इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है।

हालाँकि SDPI बेल्थांगडी विधानसभा इकाई के अध्यक्ष हैदर अली ने आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि SDPI कार्यकर्ता ‘SDPI ज़िंदाबाद’ कहते हैं न कि ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’। फिलहाल कर्नाटक पुलिस मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर वायरल हुए वीडियो की जाँच कर रही है। 

टाइम्स नाउ के मुतबाकि जब ग्राम पंचायत चुनावों के परिणाम घोषित किए जा रहे थे और जीत का जश्न मनाया जा रहा था, तभी पाकिस्तान समर्थित नारे लगाए गए। बताया जा रहा है कि वीडियो को फॉरेंसिक जाँच के लिए भेज दिया गया है। इसके अलावा, पुलिस सीसीटीवी फुटेज की भी जाँच कर रही है और अधिक सबूत इकट्ठा करने के लिए चश्मदीदों से भी बात कर रही है। 

जानकारी के मुताबिक 15 एसडीपीआई कार्यकर्ताओं के खिलाफ धारा 124 (ए) (राजद्रोह) और भारतीय दंड संहिता की 143 (गैरकानूनी विधानसभा) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

कर्नाटक में पंचायत चुनाव के लिए दिसंबर 30 को मतगणना के शुरुआती रुझानों से अधिकतर सीटों पर भाजपा समर्थित उम्मीदवारों के जीतने के संकेत मिले हैं। राज्य निर्वाचन आयोग के मुताबिक, अभी 36781 ग्राम पंचायत पदों के परिणाम लंबित हैं। शुरुआती रुझानों में 82616 सीटों में से बीजेपी 5340 पर, कांग्रेस 3150 पर और जेडीएस 1580 पर आगे थे। वहीं 600 से अधिक सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी आगे रहे।

कर्नाटक ग्राम पंचायत चुनाव में 5728 ग्राम पंचायतों की 82616 सीटों पर दो चरणों (22 और 27 दिसंबर) में हुए चुनाव में बैलट पेपर का इस्तेमाल किया गया था और इस दौरान 78.58 फीसदी मतदान हुआ। चुनावी मैदान में 2,22,814 उम्मीदवार थे। अभी तक आधिकारिक रूप से किसी नतीजे की घोषणा नहीं हुई, लेकिन बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष नलिन कुमार कतील और कांग्रेस नेता व पूर्व सीएम सिद्धारमैया ने अपनी-अपनी पार्टी के समर्थन वाले उम्मीदवारों के जीतने का दावा किया।

JNU देशद्रोह मामले में केजरीवाल सरकार से कोर्ट ने मॉंगी स्टेटस रिपोर्ट

कन्हैया कुमार, जेएनयू, केजरीवाल
आखिर कब तक देशद्रोह मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं देंगे केजरीवाल ?
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जेएनयू में देशविरोधी नारे लगाने के मामले में विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथियों की मुसीबत बढ़ती दिख रही है। दिल्ली की एक अदालत ने इस मामले में दिल्ली सरकार से स्टेटस रिपोर्ट मॉंगी है। रिपोर्ट दाखिल करने के लिए केजरीवाल सरकार को 3 अप्रैल तक का वक्त दिया गया है। उल्लेखनीय है कि पिछली सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने अदालत को बताया था कि कन्हैया और अन्य पर देशद्रोह का मामला चलाने की अनुमति दिल्ली सरकार नहीं दे रही है।
क्या कारण है कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल देशद्रोही नारे लगाने वालों पर कार्यवाही करने की इजाजत नहीं दे रहे? क्या वह मुख्यमंत्री होते हुए हुए टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ हैं?
बुधवार(फरवरी 19) को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट (सीएमएम) पुरुषोत्तम पाठक ने दिल्ली पुलिस को भी निर्देश दिया कि वह दिल्ली सरकार को कन्हैया पर अभियोजन के लिए जरूरी मॅंजूरी के बारे में याद दिलाए। इससे पहले पुलिस ने एक बार फिर कोर्ट को बताया कि मुकदमा चलाने की मॅंजूरी अभी तक नहीं दी गई है। मॅंजूरी का अनुरोध करने वाला पत्र जीएनसीटीडी (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार) के पास लंबित है। इसके बाद अदालत ने निर्देश जारी किए।
इससे पहले इस मामले की सुनवाई 11 दिसंबर 2019 को पटियाला हाउस कोर्ट में हुई थी। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने कहा कि अभी भी दिल्ली सरकार से देशद्रोह के सेक्शन पर अप्रूवल नहीं मिला है। दिल्ली पुलिस कहा था कि दिल्ली सरकार से अनुमति माँगी गई है, लेकिन वह अनुमति दे नहीं रहे थे और इसी वजह से सीधा अदालत में चार्जशीट दायर कर दी गई। इसके बाद अदालत ने चार्जशीट पर यह कहते हुए संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था कि दिल्ली सरकार देशद्रोह की धारा को लेकर अपना रुख साफ करे।

दिल्ली पुलिस ने 14 जनवरी 2019 को करीब 1200 पन्ने का चार्जशीट अदालत में दाखिल किया था। इसमें कन्हैया कुमार और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन के सदस्य उमर खालिद को मुख्य आरोपित बनाया था। वहीं, सात अन्य आरोपितों में आकिब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन, उतर गुल, रईस रसूल, बसरत अली व खालिद बशीर भट का नाम शामिल है। इसके अलावा रामा नागा, आशुतोष, शहला राशिद, डी राजा की बेटी अपराजिता राजा, रुबैना सैफी, समर खान समेत 36 छात्रों को भी आरोपित बताया गया है।
9 फरवरी 2016 को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी परिसर में देश विरोधी नारे लगाने के कई वीडियो सामने आए थे। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने तत्कालीन जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उमर खालिद समेत कई अन्य आरोपितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जाँच की थी। इसी आधार पर पिछले साल अदालत में चार्जशीट दायर की थी जिसमें कन्हैया कुमार समेत अन्य आरोपितों पर देशद्रोह की धारा लगाई गई थी। इन पर आरोप है इन्होंने जेएनयू परिसर में हुए कार्यक्रम में इन्होंने एक जुलूस की अगुवाई की थी और देशद्रोही नारे लगाए थे।
CPI नेता और जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार बिहार में इन दिनों ‘जन-गण-मन यात्रा’ पर निकले हुए है। नागरिकता कानून के विरोध में आयोजित इस यात्रा के दौरान वे जहॉं भी जा रहे उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। उन पर कई जगहों पर हमले भी हो चुके हैं। ऐसी ही एक घटना में बीते दिनों चप्पल फेंकने वाले युवक चंदन कुमार को उनके समर्थकों ने पीट-पीटकर अधमरा कर दिया था।

राष्ट्र विरोधी ताकतो के बुलन्द होते हौसले


लोकसभा चुनाव 2019 में सभी राजनीतिक दल मतदाताओं को रिझाने में लगे हुए। परन्तु कांग्रेस का एक बहुत ही विवादित बयान लगभग चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ बन सामने आया, वह यह कि "देशद्रोही कानून ख़त्म करना", आखिर कांग्रेस देश को किस आग में झोंकने जा रही है। शायद विश्व में कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है, जो देशद्रोह कानून को समाप्त करने की बात कर रही है। 
शायद यही कारण है कि दिल्ली सरकार दिल्ली पुलिस को जेएनयू में देश तोड़ने के नारे लगाने वालों के विरुद्ध देशद्रोह के अंतर्गत कार्यवाही की इजाजत नहीं दे रही है। 
9 फरवरी 2016 को दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य व उनके सहयोगियों के विरुद्ध पटियाला हाऊस कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल किया है। गौरतलब है कि संसद पर हमला करने के मास्टर माइंड अफजल गुरु की फांसी की बरसी पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान उपरोक्त आरोपियों पर राष्ट्र विरोधी नारे लगाने का आरोप है। पुलिस का आरोप है कि कन्हैया कुमार ने भीड़ को भारत विरोधी नारे लगाने के लिए उकसाया था। कुमार जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे और उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में देशविरोधी नारे लगाने का समर्थन किया था। एबीवीपी ने कथित आयोजन को राष्ट्रविरोधी बताते हुए शिकायत की थी जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसकी अनुमति रद्द कर दी थी। इसके बावजूद यह आयोजन हुआ था। इस मामले में कश्मीरी छात्रों आकिब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन, उमर गुल, रईया रसूल, बशीर भट, बशरत के खिलाफ भी आरोपपत्र दाखिल किए गए। इनमें से कुछ उस वक्त जेएनयू, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ाई कर रहे थे। 
दिल्ली पुलिस सूत्रों ने बताया कि आरोप पत्र के कॉलम संख्या 12 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआइ) के नेता डी राजा की पुत्री अपराजिता, जेएनयूएसयू की तत्कालीन उपाध्यक्ष शहला राशिद, राम नागा, आशुतोष कुमार और बनोज्योत्सना लाहिड़ी सहित कम से कम 36 अन्य लोगों के नाम शामिल हैं। इन पर 36 अन्य लोगों के नाम शामिल हैं। पर इन लोगों के खिलाफ सबूत अपर्याप्त हैं। मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट सुमित आनंद ने आरोप पत्र सक्षम अदालत में विचार के लिए सूचीबद्ध किया। पुलिस सूत्रों के मुताबिक आरोप पत्र में सीसीटीवी के फुटेज, मोबाइल फोन के फुटेज और दस्तावेजी प्रमाण भी शामिल हैं। पुलिस का आरोप है कि कन्हैया कुमार ने भीड़ को भारत विरोधी नारे लगाने के लिए उकसाया था। 
भाजपा के सांसद महेश गिरी और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की शिकायत पर वसंत कुंज उत्तरी, पुलिस थाने में 11 फरवरी, 2016 को अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए तथा 120बी के तहत मामला दर्ज किया गया था। कन्हैया कुमार को भारतीय दंड संहिता की 124ए (राजद्रोह), 323 (किसी को चोट पहुंचाने के लिए सजा), 143 (गैरकानूनी तरीके से एकत्र समूह का सदस्य होने के लिए सजा), 147 (दंगा फैलाने के लिए सजा), 149 (गैरकानूनी तरीके से एकत्र समूह का सदस्य होना) और 120बी (आपराधिक साजिश) के तहत आरोपी बनाया गया है। वहीं, उमर खालिद को भारतीय दंड संहिता की 124ए, 323, 465, 471, 143, 147, 149 और 120बी धाराओं के तहत आरोपी बताया है। आरोप पत्र में केवल उमर खालिद के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 465 (जालसाजी) भी जोड़ी गई है। 
तकरीबन 1200 पन्नों के आरोप पत्र में पुलिस ने दावा किया कि सभी फुटेज वास्तविक थे और कुछ कश्मीरी छात्रों की मौजूदगी की मोबाइल क्लिप और वीडियो के जरिए पुष्टि हुई। पुलिस ने बताया कि जुलूस के दौरान कश्मीरी छात्रों ने नकाब लगा रखे थे, लेकिन वापसी के समय उनका चेहरा ढका हुआ नहीं था। वह उनकी संलिप्तता को दर्शाता है। 10 आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र सीसीटीवी फुटेज और मोबाइल फुटेज समेत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर दायर किया गया है। इसमें छात्रों और सुरक्षा गार्डों के बयान भी शामिल हैं। अंतिम रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कार्यक्रम आयोजित करने के लिए कोई अनुमति नहीं दी गई थी और हर सदस्य गैरकानूनी सभा का हिस्सा था। आरोप पत्र के अनुसार जब आरोपियों को कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति नहीं होने के बारे में सूचित किया गया तो उन्होंने बहस और झगड़ा शुरू कर दिया। पुलिस सूत्रों के मुताबिक इस मामले में सबूत के तौर पर घटना के समय के कई वीडियो फुटेज, मौके पर मौजूद कई लोगों के बयान, मोबाइल फुटेज, फेसबुक पोस्ट, बैनर-पोस्टर शामिल हैं।
आरोपियों ने आरोपों को खारिज करते हुए इसे राजनीति से प्रेरित बताया है। यह देश का दुर्भाग्य है कि आजादी के सात दशक बाद भी देश के भीतर राष्ट्र विरोधी ताकतें अपने पैर पसारे जा रही हैं। विदेशी धन और समर्थन व संरक्षण के कारण देश के विभिन्न प्रांतों में एक छोटा वर्ग देश के नायकों को खलनायक के रूप में पेश करने का प्रयास कर रहा है। विशेषतया अल्पसंख्यकों में एक वर्ग केंद्र से टकराव की नीति अपनाकर तथा समुदाय की धार्मिक भावनाओं को उकसाकर कुछ न कुछ ऐसा करने का प्रयास लगातार करता चला आ रहा है जिससे टकराव व तनाव बढ़ाने की आशंका हमेशा बनी रहती है।
जेएनयू के छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार तथा उनके सहयोगियों ने जो किया तथा जो कश्मीर घाटी तथा पंजाब में हुआ तथा हो रहा है वह सब देश की एकता तथा अखण्डता को चुनौती देने के अलग-अलग ढंग ही कहे जा सकते हैं। लक्ष्य सबका देश की एकता व अखण्डता को चुनौती देना ही है। देश का जन जिनको नायक व राष्ट्र नायक के रूप में देखता है यह अलगाववादी तत्व उन नायकों को खलनायक के रूप में देखते हैं और धार्मिक व क्षेत्रीय भावनाएं भड़का कर स्थिति को खराब करने की कोशिश करते हैं।
राजनीतिक लाभ हेतु राष्ट्र विरोधी तत्वों को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करते कई राजनीतिज्ञ भी देखने को मिल जाते हैं। प्रशासनिक स्तर पर देरी स्थिति को बद से बदतर बना देती है। समय की मांग है कि राष्ट्र विरोधी तत्वों विरुद्ध सख्त से सख्त कार्रवाई बिना किसी विलम्ब के होनी चाहिए। न्यायप्रक्रिया और प्रशासनिक स्तर पर देरी अलगाववादी तत्वों को प्रोत्साहित करती है। इसलिए सरकार को चाहिए कि देशविरोधी तत्वों विरुद्ध कार्रवाई जल्द और ठोस आधार पर होनी चाहिए और सख्त सजा भी मिले ताकि अलगाववादी ताकतों के हौंसले न बढ़े।