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कितना पैसा बर्बाद होगा दिल्ली सरकार का केजरीवाल और उसके गिरोह के मुकदमों पर? कोर्ट सरकार को वकीलों के बिलों का भुगतान करने के लिए कह सकती है, लेकिन केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए नहीं, क्यों?

सुभाष चन्द्र

दिल्ली हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और लोअर कोर्ट में आए दिन केजरीवाल एक के बाद एक मुकदमा दायर करता है और वकीलों को मोटी कमाई का मौका दे रहा है। केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और संजय सिंह सभी के मुकदमों में वकीलों की फीस तो दिल्ली सरकार ही भर रही है और जनता का पैसा बर्बाद हो रहा है।

परसों(जुलाई 2) केजरीवाल की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी ने दिल्ली हाई कोर्ट में उसकी CBI द्वारा की गई गिरफ़्तारी को चुनौती दी और कहा कि CBI ने 2022 में केस दर्ज किया, तब कोई arrest की बात नहीं थी, फिर उसे 2023 में summon करके 9 घंटे पूछताछ की और 2024 में गिरफ्तार कर लिया जिसकी कोई जरूरत नहीं थी।

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चर्चित YouTuber 
सिंघवी साहब, 2022 से 2024 तक CBI के संज्ञान में कुछ तथ्य आए होंगे, तभी तो CBI ने कोर्ट से अनुमति मांगी उसे गिरफ्तार करने की और Rouse Avenue कोर्ट ने 3 दिन की custody दे दी और उसके बात न्यायिक हिरासत में भेज दिया 14 दिन के लिए। मतलब उसे CBI ने अपने आप गिरफ्तार नहीं किया बल्कि कोर्ट की अनुमति से किया और इसलिए सिंघवी साहब तथ्यों तोड़ मरोड़ कर पेश मत कीजिये।

कल एक और जमानत की अर्जी हाईकोर्ट में लगाई है केजरीवाल ने जबकि Rouse Avenue कोर्ट से मिली जमानत पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी और सुनवाई लंबित है, ऐसे में उसी कोर्ट में जमानत  लगाई जा सकती है। 

अब सवाल उठता है कि इतने सारे मुकदमों के बिल जनता के पैसे से क्यों भरे जाएं जबकि घोटाला किया केजरीवाल और उसके गिरोह ने। घोटाला ऐसे साबित होता है कि एक शराब नीति पहले से चल रही थी लेकिन केजरीवाल सरकार ने उसे बदल कर नई नीति बना कर लागू कर दी और उसी में जब घोटाला पकड़ा गया तो नई नीति हटा कर पुरानी फिर से शुरू कर दी। 

इसका मतलब साफ़ है कि नई नीति में गड़बड़ तो की गई और तभी उसे Scrap किया गया।अगर उसमे कुछ गलत नहीं होता तो वह नीति लागू रहती। 

सबसे बड़ी बात यह है कि केजरीवाल, सिसोदिया, जैन और संजय सिंह घोटाले में शामिल थे जिसकी वजह से वे गिरफ्तार हुए और संजय को छोड़ कर किसी को जमानत नहीं मिल रही। क्या कोई कानून इन लोगों को घोटाला करने की अनुमति देता है? कभी नहीं ऐसी अनुमति कोई कानून नहीं दे सकता लेकिन फिर भी घोटाला किया जिसका मतलब साफ़ है कि संवैधानिक पद का दुरूपयोग करके पैसा कमाया गया। 

लेकिन हर कोर्ट में दहाड़ मार मार कर चीखते रहे केजरीवाल और उसकी गिरोह के लोग कि घोटाला हुआ तो पैसा कहां गया, हमारे घर में तो एक चवन्नी भी नहीं मिली? पैसा कभी हेराफेरी का घर में नहीं रखा जाता, उसे तो हाथों हाथ बट्टे खाते लगा दिया जाता है।

वकील अपने मुवक्किलों से हर तारीख पर अपनी फ़ीस के अलावा रूपए की मांग करते रहते हैं, होता है क्या उसका कोई हिसाब? वही हाल रिश्वत में लिए धन का होता है। 

इसलिए किसी भी गैर कानूनी काम करके उसके बचाव में लड़े जाने वाले मुकदमों पर सरकार का खर्च करना किसी तरह भी उचित नहीं है और इसका उपचार केवल यह है कि केजरीवाल की सरकार को बर्खास्त कर दिया जाए जिससे बर्खास्त होने के बाद सरकार कोई बिल का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं होगी।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने LG को आप पार्टी के वकीलों के बिलों का भुगतान करने के जो आदेश दिए थे, वे अनुचित थे क्योंकि LG ने वकीलों का पैनल और उनकी फीस तय ही नहीं की थी। फिर भुगतान कैसे किया जा सकता है?

केरल हाईकोर्ट :नाबालिग भाई से हुई 12 साल की 34 हफ्ते की गर्भवती लड़की की गर्भ गिराने की याचिका ठुकराई, आदेश – ऑपरेशन से हो बच्चे का जन्म

                                                                                                       प्रतीकात्मक चित्र साभार: Bing AI
केरल हाई कोर्ट ने एक मामले में एक 12 वर्ष की गर्भवती लड़की को गर्भपात की अनुमति देने से मना कर दिया है। बच्ची के अपने ही नाबालिग भाई से सम्बन्ध थे जिसके कारण वह गर्भवती हो गई और अब उसने इस मामले में केरल हाईकोर्ट के सामने गर्भ गिराने की इजाजत माँगी थी। यह निर्णय केरल हाईकोर्ट ने 22 दिसम्बर, 2023 को सुनाया था।

न्यायिक मामलों के बारे में रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट ‘लाइव लॉ’ के अनुसार, एक 12 वर्षीय नाबालिग ने कोर्ट के सामने यह याचिका लगाई थी कि उसे चिकित्सीय तौर पर गर्भपात की इजाजत दी जाए। इस मामले में केरल हाईकोर्ट ने बच्ची के गर्भ की जाँच के लिए एक मेडिकल बोर्ड के गठन का आदेश दिया था।

मेडिकल बोर्ड के गठन के बाद यह सामने आया था कि बच्ची 34 सप्ताह की गर्भवती है और ऐसे में उसे गर्भपात की इजाजत उसकी कम आयु के चलते दी जा सकती है और यह उसकी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित नहीं करेगा। हालाँकि, कोर्ट ने इस पर दुबारा जाँच करने को कहा। कोर्ट को गर्भपात की जगह पर मेडिकल बोर्ड ने सुझाया कि 2-3 सप्ताह के बाद बच्ची के ऑपरेशन के जरिए उसके गर्भ को निकाला जाए क्योंकि वो बच्चे को जन्म देने के लिए पूरी तरह से स्वस्थ है। ऐसे में कोर्ट ने गर्भ के विकसित हो जाने और अन्य कारणों को सामने रखते हुए गर्भपात की इजाजत देने से मना कर दिया।

केरल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “गर्भ अब 34 सप्ताह का हो गया है और अब पूरी तरह से विकसित हो कर बाहर की जिन्दगी की तैयारी कर रहा है। ऐसे में गर्भपात की इजाजत नहीं दी जा सकती और बच्चे को जन्म लेने दिया जाएगा।” उच्च न्यायालय ने इस बात पर हैरानी जताई कि बच्ची के गर्भवती होने के विषय में अब तक माता-पिता को जानकारी ही नहीं थी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्ची को उसके माता-पिता के साथ रखा जाए ताकि उसकी देखभाल की जाए। साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि नाबालिग के बच्चे के जन्म के लिए ऑपरेशन का सहारा लिया जाए या फिर सामान्य तरीके से जन्म इसका निर्णय लेने की छूट माता-पिता को दी है।

कोर्ट ने बच्ची के नाबालिग भाई, जिसके ऊपर उसे गर्भवती करने के आरोप हैं, उसे उसके आसपास आने देने से रोकने को कहा है। उन्होंने कहा है कि उसका नाबालिग भाई बच्ची से किसी भी तरह का सम्बन्ध ना स्थापित कर पाए। इसकी जिम्मेदारी बच्ची के माता-पिता को दी गई है।

शराब घोटाले की फांस के बीच अरविंद केजरीवाल को डिग्री विवाद में गुजरात हाईकोर्ट से झटका!

शराब घोटाले की फांस के बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पीएम मोदी की डिग्री मामले में कोर्ट से झटका लगा है। गुजरात हाईकोर्ट ने 9 नवंबर को केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के गुजरात विश्वविद्यालय को दिए गए निर्देश को रद्द करने के आदेश पर समीक्षा करने की अपील की थी। इस मामले में कोर्ट ने केजरीवाल पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था। उच्च न्यायालय गुजरात विश्वविद्यालय द्वारा दायर मानहानि मामले पर रोक लगाने के अरविंद केजरीवाल के अनुरोध को पहले ही खारिज कर चुका है। वहीं इससे पहले अगस्त 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने पीएम मोदी की डिग्री से जुड़े विवाद में गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली केजरीवाल की याचिका खारिज कर दी थी। इस तरह शराब घोटाले से लेकर पीएम डिग्री मामले में केजरीवाल की मुश्किलें लगातार बढ़ती ही जा रही है।

पीएम डिग्री मामले में केजरीवाल को गुजरात हाईकोर्ट से झटका
प्रधानमंत्री की डिग्री के विवाद में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को झटका लगा है। दरअसल गुजरात हाईकोर्ट ने पीएम मोदी की डिग्री के विवाद में सीएम केजरीवाल की समीक्षा याचिका 9 नवंबर 2023 को खारिज कर दी। जस्टिस बीरेन वैष्णव ने अपने पूर्व के आदेश को बरकरार रखा। न्यायाधीश वैष्णव ने यह कहा कि कोर्ट सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर से दी गई दलील से सहमत रखती है। साथ ही यह भी अवलोकन किया कि जिस तरीके से पुनर्विचार याचिका दायर की गई है वह सार्वजनिक जीवन में उचित नहीं दिखता। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि पुनर्विचार कानून में विकल्प है लेकिन मौजूदा याचिका के आधार व दलीलों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ता ने विकल्प का इस्तेमाल पूरी तरह कानूनी समाधान को लेकर किया है।

केजरीवाल को अगस्त में सुप्रीम कोर्ट भी नहीं मिली राहत
इससे पहले अगस्त 2023 में उच्चतम न्यायालय ने पीएम मोदी की डिग्री से जुड़े विवाद में गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की याचिका को खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय ने गुजरात विश्वविद्यालय द्वारा दायर मानहानि मामले पर रोक लगाने के अरविंद केजरीवाल के अनुरोध को खारिज कर दिया था। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने कहा कि वह याचिका पर नोटिस जारी नहीं कर रही है क्योंकि मामला गुजरात उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है और 29 अगस्त को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। पीठ ने कहा कि गुजरात विश्वविद्यालय और केजरीवाल अपनी शिकायतें उच्च न्यायालय के समक्ष उठा सकते हैं।

मोदी की डिग्री को लेकर दिया था ‘व्यंग्यात्मक’ बयान
आप के दोनों नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की डिग्री के सिलसिले में ‘व्यंग्यात्मक’ एवं ‘अपमानजनक’ बयान दिया था जिसे लेकर गुजरात विश्वविद्यालय द्वारा दर्ज कराए गए आपराधिक मानहानि मामले का सामना कर रहे हैं। केजरीवाल और सिंह ने इस मामले की त्वरित सुनवाई का अनुरोध किया क्योंकि अदालत ने आगे की सुनवाई के लिए 16 सितंबर की तारीख तय की। उनके वकील ओम कोतवाल ने अदालत से अनुरोध किया कि गुजरात हाई कोर्ट में 29 अगस्त और मेट्रोपोलिटन अदालत में 31 अगस्त को संबंधित मामलों की सुनवाई होने से पहले वह इस विषय पर आगे बढे़। लेकिन निचली अदालत ने 22 अगस्त को त्वरित सुनवाई की अर्जी खारिज कर दी। इस बीच मेट्रोपोलिटन अदालत ने इन दोनों को समन को लेकर 30 अगस्त को उसके सामने पेश होने का समय दिया।

हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से किया था इनकार
केजरीवाल और संजय सिंह ने सत्र अदालत में अपने पुनरीक्षण आवेदन का निस्तारण होने तक अपने विरूद्ध आपराधिक मानहानि सुनवाई पर स्थगन का अनुरोध करते हुए गुजरात हाई कोर्ट का रूख किया था। हाई कोर्ट ने 11 अगस्त को राज्य सरकार और गुजराज विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार पीयूष पटेल को नोटिस जारी कर 29 अगस्त तक जवाब मांगा था। साथ ही, उसने केजरीवाल और सिंह को कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था।

केजरीवाल और संजय के खिलाफ पहले भी जारी हुए थे समन
गुजरात यूनिवर्सिटी की मानहानि से जुड़े मामले में केजरीवाल और संजय सिंह को निचली अदालत से एक बार पहले समन जारी किए जा चुके हैं। जिस पर दोनों बार नेताओं ने पेशी से छूट ली थी। गुजरात यूनिवर्सिटी ने पिछली सुनवाई पर दोनों नेताओं को वारंट जारी करने की मांग की थी। तब मेट्रोपॉलिटन कोर्ट ने इस पर सुनवाई करने के लिए 31 अगस्त की तारीख निर्धारित की थी। मानहानि केस में कानूनी दांवपेंच का सामना कर रहे अरविंद केजरीवाल और संजय सिंह ने निचली कोर्ट मानहानि की कार्रवाई रोकने की मांग को लेकर हाई कोर्ट का रुख किया था। 11 अगस्त की सुनवाई में हाई कोर्ट ने दोनों नेताओं के रोक लगाने की मांग से इनकार कर दिया और सुनवाई के लिए 29 अगस्त की तारीख रखी थी।

सात साल पुराना है यह केस, केजरीवाल पर लग चुका 25 हजार जुर्माना
पीएम मोदी की डिग्री से जुड़ा यह पूरा मामला सात साल पुराना है। अप्रैल, 2016 में केंद्रीय सूचना आयोग ने केजरीवाल से उनके चुनावी फोटो पहचान पत्र के बारे में जानकारी मांगी थी। इसके जवाब में केजरीवाल ने कहा था कि वह सीआईसी को जानकारी देने के लिए तैयार हैं लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री का खुलासा करने के लिए कहा जाना चाहिए। केजरीवाल के जवाब को आरटीआई का आवेदन मानते हुए सीआईसी ने एक ऑर्डर पास किया था। इसमें गुजरात यूनिवर्सिटी को पीएम मोदी की डिग्री का ब्योरा देने का निर्देश दिया था। इस ऑर्डर के खिलाफ गुजरात यूनिवसिर्टी हाई कोर्ट चली गई थी। हाई कोर्ट ने इस 31 मार्च, 2023 को फैसला सुनाते हुए सीआईसी को ऑर्डर को रद्द कर दिया था और केजरीवाल पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया था। केजरीवाल ने हाई कोर्ट के फैसले के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस की थी। गुजरात यूनिवर्सिटी का आरोप है कि इसमें केजरीवाल ने विश्वविद्यालय की मानहानि की। इसके बाद यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार की तरफ से केस दाखिल किया गया, जिसमें केजरीवाल के साथ-साथ संजय सिंह मानहानि के आरोपी हैं।

ताजमहल को शाहजहाँ ने नहीं बनवाया, यह था हिंदू राजा का महल… गलत लिखा इतिहास में: दिल्ली हाईकोर्ट में मामला, ASI करेगी विचार


दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार (3 अक्टूबर 2023) को अपने एक फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को ताजमहल के ‘सही इतिहास’ को प्रकाशित करने वाले आवेदन पर विचार करने का निर्देश दिया। अपनी जनहित याचिका में हिंदू सेना ने कहा कि ताजमहल को मुगल बादशाह शाहजहाँ ने नहीं, बल्कि राजपूताना (वर्तमान राजस्थान) के कच्छावा वंश के क्षत्रिय राजा मान सिंह ने बनवाया था।

इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सतीशचंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने इस मामले में ASI को निर्देश देते हुए याचिका का निपटारा कर दिया। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने पहले भी इस तरह की प्रार्थनाओं के साथ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। शीर्ष अदालत ने तब संगठन से ASI के समक्ष एक आवेदन दाखिल करने को कहा था।

शुक्रवार को उच्च न्यायालय को याचिकाकर्ता ने बताया कि ASI ने अभी तक उनके प्रत्यावेदन पर निर्णय नहीं लिया है। इसलिए, बेंच ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से उस अभ्यावेदन पर गौर करने के लिए कहा है। हिंदू सेना के अध्यक्ष सुरजीत सिंह यादव ने दायर याचिका में कहा है कि ताजमहल मूल रूप से राजा मान सिंह का महल था और बाद में शाहजहाँ द्वारा इसका जीर्णोद्धार किया गया था।

यादव ने अपनी याचिका में हाईकोर्ट से आग्रह किया कि इतिहास की किताबों से ताजमहल के निर्माण से संबंधित ‘ऐतिहासिक रूप से गलत तथ्यों’ को हटाने के लिए ASI, केंद्र सरकार, भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार और उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दे। याचिका में ASI से ताजमहल की उम्र और राजा मान सिंह के महल के अस्तित्व के बारे में जाँच करने का निर्देश देने की भी माँग की गई है।

याचिकाकर्ता सुरजीत यादव का कहना है कि उन्होंने ताजमहल के बारे में ‘गहरा अध्ययन और शोध’ किया है। इसलिए इतिहास के तथ्यों को सुधारना और लोगों को ताजमहल के बारे में सही जानकारी देना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने जेडए देसाई द्वारा लिखित ‘ताज संग्रहालय’ नामक पुस्तक का भी उल्लेख किया, जिसमें मुमताज महल को दफनाने के लिए एक ‘ऊँची और सुंदर’ जगह का चयन किया गया था।

इस पुस्तक का हवाला देते हुए उन्होंने अपनी याचिका में आगे कहा कि यह ऊँची और सुंदर जगह राजा मान सिंह की हवेली थी, जो उस समय उनके पोते राजा जय सिंह के कब्जे में थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि इस हवेली को कभी ध्वस्त नहीं किया गया था। यादव का कहना है कि ताजमहल की वर्तमान संरचना राजा मान सिंह की हवेली का एक संशोधन और नवीनीकरण भर है, जो पहले से मौजूद थी।

सुरजीत यादव ने कहा है, “ता संग्रहालय नामक पुस्तक में उल्लेख किया गया है कि मुमताज महल का मृत शरीर राजा जय सिंह के भूमि परिसर के भीतर एक अस्थायी गुंबददार संरचना के तहत दफनाया गया था। यह उल्लेख करना उचित है कि ऐसा कोई विवरण नहीं है, जो बताता हो कि राजा मान सिंह की हवेली को ताजमहल के निर्माण के लिए ध्वस्त किया गया था।”

याचिकाकर्ता ने कहा है कि उन्होंने ताजमहल पर कई किताबों की जाँच की और एक किताब में कहा गया है कि शाहजहाँ की पत्नी आलिया बेगम थीं। मुमताज महल का कहीं कोई जिक्र नहीं है। ASI की वेबसाइट पर विरोधाभासी जानाकारी देने का आरोप लगाते हुए याचिका में कहा गया है कि ASI ने बेवसाइट पर कहा है कि 1631 में मुमताज महल की मृत्यु के 6 महीने बाद शव को ताजमहल के मुख्य मकबरे के तहखाने में दफनाने के लिए आगरा लाया गया था।
याचिका में कहा गया है कि ASI की उसी वेब पेज पर उल्टा जानकारी दी गई है, जहाँ कहा गया है कि 1648 में ताजमहल का निर्माण पूरा होने में लगभग 17 साल लगे थे। याचिका में कहा गया है कि जब ताजमहल को पूरा होने में 17 साल लगे और वह 1648 में बनकर तैयार हुआ तो मुमताज महल का शव 1631 ईस्वी में दफनाने के लिए आगरा कैसे लाया गया। यह विरोधाभासी और भ्रामक है।

रामलीला मैदान में नहीं होगी मुस्लिम महापंचायत, हाई कोर्ट का इजाजत देने से इनकार: पोस्टर ‘सांप्रदायिक’, पुरानी दिल्ली में बढ़ सकता तनाव

                                                                                                                            प्रतीकात्मक फोटो
दिल्ली के रामलीला मैदान में 29 अक्टूबर 2023 को ‘ऑल इंडिया मुस्लिम महापंचायत’ नहीं होगी। दिल्ली हाई कोर्ट ने आयोजन की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। माना है कि आयोजन के जो पोस्टर हैं, उसे देखकर यह ‘सांप्रदायिक’ लगता है। साथ ही इससे पुरानी दिल्ली में तनाव बढ़ने की आशंका भी जताई है।

इससे पहले दिल्ली पुलिस और दिल्ली नगर निगम ने भी इसकी इजाजत देने से इनकार किया था। इसके खिलाफ ‘मिशन सेव कॉन्स्टीट्यूशन’ नाम की संस्था ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस संस्था का राष्ट्रीय संयोजक वकील महमूद प्राचा है। इस संस्था का दावा है कि वह जनता खासकर दलितों के बीच संवैधानिक अधिकारों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए काम करती है।

ऐसे में ज्वलंत प्रश्न यह हो रहा है कि कौन-से दलितों के हित की बात कर रहे हैं, या हिन्दू दलितों के कंधों पर बैठ अपना खेल खेल रहे हैं? 

लेकिन प्राचा की पहचान उसके हिंदू विरोधी बयानों से है। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हिंदुवादी संगठनों के खिलाफ जहर उगलता रहता है। कुछ महीने पहले ही उसने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मिलने वालों को गद्दार बताया था।

हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा गया था कि दिल्ली पुलिस ने ‘मनमाने तरीके से कार्यक्रम को सांप्रदायिक’ बताते हुए अनुमति रद्द कर ही। लेकिन 25 अक्टूबर को सुनवाई करते हुए जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने दिल्ली पुलिस के फैसले को बरकरार रखा। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम के पोस्टर को देखकर दिल्ली पुलिस के फैसले को मनमाना नहीं माना जा सकता।

हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दिल्ली पुलिस की आपत्तियों को नजरअंदाज कर कोई आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि श्राद्ध के अंत से लेकर दिवाली तक का समय हिन्दुओं के लिए महत्वपूर्ण होता है और यह पोस्टर दिखाते हैं कि इनसे मजहबी तनाव हो सकता है।

हालाँकि, हाई कोर्ट ने कहा है कि त्योहारों के बाद वह फिर से एक नई याचिका पर सुनवाई कर सकती है। इसके लिए आयोजकों को कार्यक्रम में बोलने वाले लोगों के विषय में बताना होगा। इसके पश्चात ही अनुमति देने पर विचार किया जाएगा।

‘तहजीब सीखो… सारी वकालत बंद हो जाएगी’: बागेश्वर बाबा की कथा रुकवाने हाईकोर्ट पहुंचे वकील को जज ने दी जेल की धमकी

बिना अध्ययन याचिका लेकर पहुँच गया वकील, जज ने सुनाई खरी-खरी
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने सोमवार (22 मई, 2023) को प्रदेश में बागेश्वर धाम के धार्मिक आयोजन को रोकने के लिए दायर हुई दूसरी जनहित याचिका को भी खारिज कर दिया। यह आयोजन इसी माह 23 मई और 24 मई को जिला बालाघाट के गाँव लिंगा स्थित रानी दुर्गावती महाविद्यालय मैदान में होना प्रस्तावित है। यह याचिका एक वकील द्वारा कथित आदिवासी संगठन की तरफ से लगाई थी, जिसमें आयोजन से उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचने का आरोप था।

याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान गलत ढंग से बहस की जिस पर कोर्ट ने उसे चेतावनी भी दी।

इस याचिका पर हुई बहस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में याचिकाकर्ता के वकील ने धीरेन्द्र शास्त्री की कथा आदिवासियों के धर्मस्थल बड़ा देव भगवान के बजाय कहीं और करवाने की माँग की। इस माँग पर जस्टिस विवेक अग्रवाल ने सवाल किया कि जहाँ अभी कथा होनी है वहाँ किस बात से आदिवासी लोगों की भावनाएँ आहत होंगी और वहाँ की मान्यताएँ क्या हैं? कोर्ट के इस सवाल पर याचिकाकर्ता के वकील कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए।

इस दौरान उन्होंने संविधान का हवाला दिया और जज पर अपनी बात न सुनने का आरोप लगा दिया। वकील ने कहा, “ये संविधान में प्रावधान हैं। वही तो बता रहा हूँ। आप समझने को तैयार नहीं हैं।"

वकील के जवाब पर जस्टिस विवेक ने उन्हें ठीक से बात करने के लिए कहा। हालाँकि, इसके बाद भी वकील ने कोर्ट में जज से कहा, “आप सुनने को तैयार नहीं हैं। कुछ भी बोले जा रहे हैं।” वकील के इन शब्दों पर जज ने उन्हें अवमानना का नोटिस जारी करने के आदेश दिए। जस्टिस विवेक ने कहा, “आपको हाईकोर्ट में बहस करने का तरीका नहीं मालूम है। अपना जवाब आप नोटिस में दीजिएगा।” जज ने आगे से गलत बहस करने पर वकील को जेल भेजने की भी चेतावनी दी।

इस वीडियो में आगे जस्टिस विवेक ने वकील से ‘सर्व आदिवासी समाज’ के बारे में पूछते हुए सवाल किया कि उन्हें बहस के लिए किसने अधिकृत किया। साथ ही कहा, “ध्यान रहे। जरा सी भी उल्टी-सीधी बहस की तो यहीं से जेल भेजूँगा। वकालत ख़त्म हो जाएगी। तहजीब से बात करना सीखो। बदतमीजी करना भूल जाओगे सारी। तुम लोगों ने ये सोच लिया है कि बदतमीजी करके अपने आप के लिए बहुत बड़ी TRP जमा कर लोगे? ये भूल जाते हो कि जिस दिन हमने जेल भेज दिया उस दिन सारी वकालत बंद हो जाएगी। तुम लोगों को सिखा कर भेजा जाता है कि बदतमीजी करो।”

जज ने वकील से माफ़ी माँगने के लिए भी कहा। एक सवाल के सवाब में वकील ने खुद के हाईकोर्ट में साल 2007 से प्रैक्टिस किए जाने की बात कही। याचिकाकर्ता के नाम के तौर पर हेमलता दुर्वे और कर्नल हरनाम का नाम था। याचिकाकर्ता समूह सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष का नाम के तौर पर सादे कागज में मंशाराम मरावी दर्ज था। जस्टिस विवेक ने इस संगठन के रजिस्ट्रेशन और लेटर हेड आदि के बारे में पूछा तो वकील ने रजिस्ट्रेशन होने पर कोर्ट में न लगाने की जानकारी दी। इस जवाब पर जस्टिस विवेक ने टिप्पणी करते हुए ऐसी याचिका को ‘स्पॉन्सर पेटिशन’ कहा।

आखिरकार हाईकोर्ट ने यह याचिका ख़ारिज कर दी। जस्टिस विवेक ने वकील से रजिस्ट्रेशन लगा कर केस फिर से फाइल करने की सलाह दी। साथ ही अंत में कहा, “पक्षकार को बताइएगा कि हमारी गर्मी दिखाने की वजह से कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया।” अपने आदेश में जस्टिस विवेक अग्रवाल ने इस बात का भी जिक्र किया कि तथाकथित ‘सर्व आदिवासी समाज’ के वकील ने सवालों के जवाब देने के बजाय बेवजह की बहस की। आदेश के मुताबिक, अधूरे कागजातों के साथ पेश हुआ याचिकाकर्ता ये साबित नहीं कर पाया कि प्रस्तावित कथा से आदिवासी समाज की भावनाएँ कैसे आहत होंगी।

खास बात ये रही कि यह याचिका दायर करने वाले वकील को इसी मामले में जस्टिस विवेक अग्रवाल द्वारा 18 मई को दिए गए आदेश की जानकारी नहीं थी। तब जस्टिस विवेक ने धीरेन्द्र शास्त्री के कार्यक्रम को रोकने की याचिका ख़ारिज कर दी थी।

18 मई को ख़ारिज हुई थी पहली याचिका

गौरतलब है कि धीरेन्द्र शास्त्री के 23-24 मई वाले इसी कार्यक्रम को रद्द करवाने संबंधी एक याचिका 18 मई को जस्टिस विवेक अग्रवाल की बेंच ने ख़ारिज कर दी थी। तब दिवासी विकास परिषद के दिनेश कुमार ध्रुव की ओर से पेश हुए वकील प्रह्लाद चौधरी ने कथा से आदिवासी क्षेत्रों के प्रभावित होने, आदिवासियों की मर्जी के विरुद्ध आयोजन होने, ग्रामसभा की अनुमति न होने और साल 2023 विधानसभा चुनावों को प्रभावित करने जैसी दलीलें दी थीं। एडवोकेट चौधरी ने धीरेन्द्र शास्त्री पर धार्मिक वैमनस्यता फैलाने का भी आरोप लगाया था।
इन दलीलों के जवाब में जस्टिस विवेक अग्रवाल ने आपत्ति होने पर किसी संगठन की बजाय सीधे ग्रामसभा को कोर्ट आने की बात कही थी। आयोजन के लिए ग्रामसभा की अनुमति की जरूरत न होने की जानकारी देते हुए उन्होंने याचिका को प्रायोजित बताया था। साथ ही जस्टिस विवेक ने बताया था कि इस बात के भी सबूत नहीं हैं कि कथा से आदिवासियों पर असर पड़ेगा। कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी उन्होंने राज्य सरकार की बताई थी।
गौरतलब है कि हिन्दू धर्म को बढ़ावा देने वाले वीडियो के वायरल होने के बाद से बागेश्वर धाम के महंत पंडित धीरेंद्र शास्त्री को फायरब्रांड कथावाचक कहा जाने लगा है। अभी कुछ समय पहले ही बिहार सरकार द्वारा उनके एक कार्यक्रम को रोकने का प्रयास किया गया था। खुद पर हो रहे इन हमलों पर टिप्पणी करते हुए धीरेंद्र शास्त्री ने उस हाथी का उदाहरण दिया जिसके गाँव में जाने पर कई लोग उसे केले, पूड़ी और तरह-तरह के पकवान खिलाते कर गणेश मानकर उसकी पूजा करते हैं तो दूसरी तरफ आवारा कुत्ते भौंकने लगते हैं।
बकौल धीरेन्द्र शास्त्री, अगर हाथी कुत्तों को जवाब देने लगे तो लोग हाथी को पागल ही कहेंगे, इसलिए हाथी उन कुत्तों को अनदेखा करते हुए अपने रास्ते पर आगे बढ़ता रहता है।

BBC के खिलाफ 10,000 करोड़ रूपए की मानहानि का मुकदमा, हाई कोर्ट ने जारी किया नोटिस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गुजरात दंगों को लेकर प्रोपेगंडा डॉक्यूमेंट्री बनाने के मामले में BBC पर मानहानि का मुकदमा दायर हुआ है। ब्रिटेन की मीडिया संस्थान को इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने नोटिस भी जारी किया है। एक NGO ने 10,000 करोड़ रुपए के अपने मानहानि के मुक़दमे में आरोप लगाया है कि इस डॉक्यूमेंट्री ने भारत की प्रतिष्ठा को मलीन करने का कार्य किया है। साथ ही न्यायपालिका और प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा को भी बदनाम किया है।

‘ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (BBC)’ को ये समन सोमवार (22 मई, 2023) को जारी किया गया। गुजरात के NGO ‘जस्टिस फॉर ट्रायल’ ने दिल्ली उच्च-न्यायालय में मुकदमा दायर किया है। इस मामले में ‘BBC (UK)’ के अलावा ‘बीबीसी इंडिया’ को भी नोटिस जारी कर जवाब देने के लिए कहा गया है। डॉक्यूमेंट्री ‘India: The Modi Question’ को दो हिस्सों में जारी किया गया था। ‘BBC (UK)’ ने इसे जारी किया था, जबकि ‘बीबीसी इंडिया’ इसी की भारतीय शाखा है।

NGO की तरफ से 67 वर्षीय वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे दिल्ली हाईकोर्ट में पेश हुए। भारत के सॉलिसिटर जनरल रहे हरीश साल्वे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पाकिस्तान में बंद भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव का केस भी लड़ चुके हैं, जिसके बाद उनकी मौत की सज़ा पर रोक लग गई थी। उन्होंने कहा कि इस डॉक्यूमेंट्री ने भारत और इसकी पूरी व्यवस्था को बदनाम किया है, न्यायपालिका सहित। इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।

जस्टिस सचिन दत्ता ने सुनवाई करते हुए ये नोटिस जारी किया। इससे पहले 3 मई को एक भाजपा नेता की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली की एक अदालत ने BBC और Wikimedia को नोटिस जारी किया गया था। माँग की गई थी कि इन्हें RSS और VHP को बदनाम करने वाले कंटेंट्स प्रकाशित करने से रोका जाए। एक विकिपीडिया पेज पर इस डॉक्यूमेंट्री का लिंक उपलब्ध था, जबकि भारत में ये बैन है। इस प्रोपेगंडा डॉक्यूमेंट्री के जरिए मुस्लिम कट्टरपंथियों का भी बचाव किया गया था।

पाकिस्तान : काॅलर पकड़ इमरान खान को गिरफ्तार कर धकियाते हुए ले गए, हाई कोर्ट का शीशा तोड़ा

                                                                                                     साभार: वायरल वीडियो का स्क्रीनग्रैब
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान (Imran Khan) गिरफ्तार कर लिए गए हैं। उन्हें इस्लामाबाद हाई कोर्ट से मंगलवार (9 मई 2023) को पाकिस्तानी रेंजर्स ने गिरफ्तार किया। वे दो मामलों में जमानत के लिए अदालत पहुँचे थे। इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने अपने नेता को टाॅर्चर किए जाने का दावा किया है। पाकिस्तान में इस घटना के बाद से तनाव की स्थिति पैदा हो गई है। हिंसा की आशंका जताई जा रही है। जानकारों का मानना है कि दिवालिया हो चुके देश में गृहयुद्ध छिड़ सकता है।

पाकिस्तानी वेबसाइट द डाॅन के मुताबिक अल कादिर ट्रस्ट स्कैम में पूर्व प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी हुई है। यह घोटाला 50 अरब रुपए से अधिक का बताया जाता है। आरोप है कि इसका फायदा इमरान खान और उनकी बेगम बुशरा बीबी को हुआ था। इमरान खान की गिरफ्तारी (Imran Khan Arrest) के दौरान बल प्रयोग का भी दावा किया गया है। उनके वकील घायल हैं। विरोध में पार्टी ने बड़े प्रदर्शन का ऐलान किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जमानत के लिए इस्लामाबाद हाई कोर्ट पहुँचे इमरान खान जब बायोमेट्रिक एंट्री करा रहे थे तभी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के कुछ वीडियो भी सामने आए हैं। वीडियो में पाकिस्तानी रेंजर्स इमरान खान को कॉलर पकड़कर जबरस्ती धक्का देकर ले जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। एक अन्य वीडियो में पाकिस्तानी रेंजर्स कोर्ट की खिड़कियों में लगे काँच तोड़कर अंदर घुसते देखे जा सकते हैं।

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पाकिस्‍तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की नेता मुसर्रत चीमा ने दावा किया है कि इमरान खान के साथ मारपीट कर उन्हें टॉर्चर किया जा रहा है।

इमरान खान के वकील ने कहा है कि इमरान खान हाई कोर्ट में बायोमैट्रिक मशीन में हाजिरी लगाने के लिए पहुँचे थे, इसी दौरान जवान आए और उन्हें खींचकर ले गए। रेंजर्स कोर्ट रूम में लगे शीशे तोड़कर अंदर दाखिल हुए थे। कोर्ट में मौजूद इमरान समर्थकों द्वारा विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई। पीटीआई ने इमरान के वकील का वीडियो भी शेयर किया है। इसमें वह खून से लथपथ दिखाई दे रहे हैं।

पूर्व मंत्री फवाद चौधरी ने ट्वीट कर कहा है, “पूर्व पीएम इमरान खान को कोर्ट परिसर से अगवा कर लिया गया है। सैकड़ों वकीलों और आम लोगों को प्रताड़ित किया गया। इमरान खान को अज्ञात लोगों द्वारा अज्ञात स्थान पर ले जाया गया है। इस्लामाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने आंतरिक सचिव और आईजी पुलिस को 15 मिनट के भीतर अदालत में पेश होने का आदेश दिया है।”

इमरान खान की गिरफ्तारी को लेकर इस्लामाबाद पुलिस ने ट्वीट कर कहा है कि इमरान खान को अल कादिर ट्रस्ट केस मामले में गिरफ्तार किया गया है। फिलहाल स्थितियाँ सामान्य हैं। इस्लामाबाद में धारा 144 लगाई गई है। उल्लंघन करने पर कार्रवाई की जाएगी। अल कादिर ट्रस्ट केस एक यूनिवर्सिटी से जुड़ा हुआ मामला है। इमरान खान ने प्रधानमंत्री रहते हुए मनमाने ढंग से करोड़ों रुपए की जमीन इस ट्रस्ट के नाम कर दी थी। बड़ी बात यह है कि इस ट्रस्ट के दो ही ट्रस्टी हैं, एक इमरान खान और दूसरी उनकी बीवी बुशरा। इस पूरे मामले का खुलासा पाकिस्तान के सबसे अमीर व्यक्ति मलिक रियाज ने किया था।

संघ के महासचिव राकेश कोच का आरोप : विनेश फोगाट और साक्षी के साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ।; क्या सुप्रीम कोर्ट से ऊपर खाप पंचायत? विनेश फोगाट के वीडियो पर बवाल

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर पहलवानों का विरोध प्रदर्शन जारी है। इस बीच विनेश फोगाट का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वह खाप पंचायत के फैसले को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट से पहले बता रही हैं। वहीं, जाट समाज ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर गुरुवार (4 मई, 2023) को जानकारी दी कि 7 मई को सभी खाप जंतर-मंतर जाएँगी। जाट समाज ने ट्वीट किया, “सोरम मुजफ्फरनगर में सर्वखाप मुख्यालय पर आयोजित खाप चौधरियों की बैठक के निर्णयानुसार, 7 मई को सभी खाप जंतर-मंतर जाएँगी।

दिल्ली पुलिस द्वारा खिलाड़ियों से अभद्रता करने वाले तैनात पुलिस कर्मियों को सस्पेंड करने के लिए 2 दिन का वक्त दिया गया है। बाकी सभी निर्णय जंतर-मंतर पहुँचकर लिए जाएँगे।”

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे विनेश फोगाट के वीडियो को सबसे पहले ट्विटर पर रवि भदौरिया नाम के एक इन्फ्लुएंसर ने शेयर किया था। वीडियो में भारतीय पहलवान को यह कहते हुए सुना जा सकता है, “हमारे बुजुर्ग और खाप पंचायतें ही हमारे सभी बड़े फैसले लेती आ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट से पहले हमारा जो भी फैसला होता है, वह हमारी खाप पंचायत लेती है। इसलिए खाप पंचायत जो भी फैसला करेगी, हम उनका पालन करेंगे।”

भारतीय पहलवान द्वारा देश के सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय से ऊपर खाप पंचायत के फैसले को बताने से विवाद गहरा गया है। लेकिन, पूरी वीडियो में विनेश को यह कहते हुए भी सुना गया कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करती हैं और सभी कानूनी विकल्पों की तलाश कर रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 4 मई को महिला पहलवानों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई बंद करने का फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने कहा कि पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के लिए याचिका दाखिल की थी। दिल्ली पुलिस ने सिंह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है, इसलिए अब इस मामले में आगे की सुनवाई बंद की जाती है।

दरअसल, बबीता फोगाट, विनेश फोगाट, संगीता फोगाट, साक्षी मलिक सहित 7 महिला पहलवानों ने बृजभूषण सिंह पर खिलाड़ियों का यौन शोषण करने का आरोप लगाया है। इन खिलाड़ियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर कहा था कि दिल्ली पुलिस उनकी शिकायत पर FIR दर्ज नहीं कर रही है।

7 मई को उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान की तक़रीबन एक दर्जन खाप देशवाल, राठी, बुड़ियांन, दुड्डा, बेनीवाल, कुंड, निर्वाल, बालियान, घनघस, लाटीयान, अहलावत और बत्तीसा के चौधरी दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे खिलाड़ियों के विरोध प्रदर्शन पर एकजुट होंगे और आगे की रणनीति तय करेंगे। इससे पहले खाप पंचायतों ने पहलवानों की माँगे जल्द पूरी नहीं करने पर बंद की धमकी दी थी।

उल्लेखनीय है कि खाप पंचायतें अक्सर गलत कारणों से चर्चा में रही हैं, जिसमें अंतर-जातीय विवाह को ‘अवैध’ घोषित करने का प्रयास और ऑनर किलिंग को लेकर उनके फैसले शामिल हैं।

हरियाणा कुश्ती संघ के महासचिव ने पहलवानों पर आरोप लगाया

वहीं, हरियाणा कुश्ती संघ के महासचिव राकेश कोच ने भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह का समर्थन किया है। उन्होंने महावीर फोगाट परिवार पर गंभीर आरोप भी लगाए हैं। राकेश कोच ने बीते दिनों कहा था कि उनका परिवार कुश्ती संघ पर कब्जा करना चाहता है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता भूपेंद्र हुड्डा अपने बेटे दीपेंद्र हुड्डा को WFI का अध्यक्ष बनवाना चाह रहे हैं। इसलिए वे खिलाड़ियों को भड़का रहे हैं।
अवलोकन करें:-
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे खिलाड़ियों पर निशाना साधते हुए राकेश कोच ने यह भी कहा था कि ये खिलाड़ी किसी कार्यक्रम में आने के लिए पैसे लेते हैं। बजरंग पुनिया सरकारी अधिकारी हैं और रेलवे की अनुमति के बिना वे धरने पर बैठे हैं। विनेश फोगाट और साक्षी के साथ कुछ भी गलत नहीं हुआ।

उम्रकैद की सज़ा सुनते ही बेहोश हो गया अतीक अहमद: वकीलों ने लगाए ‘फाँसी दो, फाँसी दो’ के नारे

प्रयागराज जिले की MP-MLA कोर्ट ने उमेश पाल अपहरण के 28 फरवरी 2006 के केस में माफिया अतीक अहमद को 2 अन्य साथियों सहित उम्रकैद की सजा सुनाई है। हालाँकि इसी केस में आरोपित अतीक के छोटे भाई अशरफ को बरी कर दिया गया है। इस फैसले के बाद उमेश पाल और अतीक अहमद दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में अपील करने का ऐलान किया। जहाँ उमेश पाल का परिवार अशरफ की रिहाई से नाखुश है तो वहीं अतीक के वकील ने इस सजा को ऊपरी अदालत में चुनौती देने की बात कही है।

कहा जा रहा है कि कोर्ट में अतीक अहमद की सजा मुकर्रर होते ही वो कोर्ट रूम में बेहोश हो गया और भाई से गले मिल रोया भी। जबकि प्रयागराज कोर्ट में उसके ही आगे वकीलों ने ‘फाँसी दो-फाँसी दो’ की नारेबाजी की।

दोनों पक्ष जाएँगे हाईकोर्ट

अतीक अहमद को मिली सजा पर उमेश पाल की माँ ने उसे फाँसी के लायक बताया। उन्होंने कहा कि कई साल तक फैसले का इंतजार करना पड़ा। उमेश पाल की माँ ने शांति देवी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर पूरा विश्वास जताया है। वहीं उमेश पाल की पत्नी जया देवी ने अशरफ को बरी किए जाने के फैसले को समाज के लिए नुकसानदेह बताया है। उन्होंने अपने वकील से बात कर के इस फैसले को हाईकोर्ट में चैलेन्ज देने की जानकारी दी। उमेश पाल के वकील ने भी हाईकोर्ट में सजा को चुनौती देने का एलान किया है। वकील ने कहा कि घटना में अशरफ की पिस्टल शामिल थी ऐसे में अशरफ को बरी करने को हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी।

अतीक के वकील भी जाएँगे हाईकोर्ट

अतीक अहमद को मिली उम्रकैद की सजा पर उनके वकील दयाशंकर मिश्रा की भी प्रतिक्रिया सामने आई। दयाशंकर ने अतीक अहमद को मिली उम्रकैद की सजा को हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही। वकील दयाशंकर ने अपील को अधिकार बताया है। गौरतलब है कि 100 केसों में नामजद अतीक को पहली बार कोई सजा सुनाई गई है।

उमेश पाल के 8 गवाह अतीक के 51 गवाहों पर भारी पड़े

उमेश पाल के वकील ने बताया कि उनकी तरफ से 8 गवाहों ने कोर्ट में गवाही दी थी। वहीं अतीक अहमद ने अपने पक्ष में 51 गवाह पेश किए। हालाँकि अतीक के गवाहों में अधिकतर लोग आपराधिक प्रवित्ति के बताए जा रहे हैं। अंत में कोर्ट ने उमेश पाल के गवाहों को विश्वसनीय माना।
मिल रही जानकारी के मुताबिक फ़िलहाल अभी अतीक अहमद को प्रयागराज की नैनी जेल में ही रखा जाएगा। अब पुलिस उमेश पाल हत्याकांड में दर्ज हुए नए केस में उस से जल्द ही पूछताछ कर सकती है। इस बाबत पुलिस टीम अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ का रिमांड भी लेने की तैयारी कर रही है।

केरल : ‘ईसाई बनने के बाद हिंदू होने का दावा नहीं कर सकते’: माकपा के MLA ए राजा की सदस्यता रद्द, SC सीट से जीते थे : हाई कोर्ट

धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनने वाले वामपंथी विधायक ए राजा की सदस्यता केरल हाई कोर्ट ने समाप्त कर दी है। वह CPI(M) के टिकट पर अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीट से चुने गए थे। हाई कोर्ट ने उनकी विधायकी निरस्त करते हुए कहा कि ईसाई बनने के बाद कोई भी व्यक्ति हिंदू होने का दावा नहीं कर सकता है।

कांग्रेस नेता डी कुमार ने याचिका दायर कर उनके निर्वाचन को चुनौती दी थी। आरोप लगाया था कि ईसाई बनने के बाद ए राजा ने फर्जी जाति प्रमाण-पत्र का उपयोग कर चुनाव लड़ा था। इस याचिका पर 20 मार्च 2023 को सुनवाई करते हुए केरल हाई कोर्ट के जस्टिस पी सोमराजन ने कहा है कि केरल की देवीकुलम सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। चूँकि नामांकन भरने से पहले ए राजा ईसाई बन चुके थे। इसलिए वह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते थे।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि ईसाई बनने के बाद ए राजा हिंदू धर्म से संबंधित होने का दावा नहीं कर सकते। इस आधार पर निर्वाचन अधिकारी को भी उनका नामांकन खारिज कर देना चाहिए था। अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून, 98 की धारा 1951 के तहत ए राजा का निर्वाचन अमान्य घोषित कर दिया।

साल 2021 में केरल में विधानसभा चुनाव हुए थे। इस चुनाव में देवीकुलम विधानसभा सीट से माकपा ने ए राजा और कॉन्ग्रेस ने डी कुमार को मैदान में उतारा था। नामांकन दाखिल करने के दौरान डी कुमार ने निर्वाचन अधिकारी के समक्ष इस मुद्दे को उठाते हुए कहा था कि ए राजा ईसाई हैं, इसलिए वह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते। लेकिन तब निर्वाचन अधिकारी ने उनकी दलील खारिज कर दी थी।

इसके बाद डी कुमार ने हाई कोर्ट का रुख किया। वहाँ भी उन्होंने ए राजा के जाति-प्रमाण पत्र पर सवाल उठाए। ए राजा की शादी की तस्वीर, सीएसआई चर्च के पारिवारिक रजिस्टर के रिकॉर्ड, चर्च में हुए बपतिस्मा के रजिस्टर के रिकॉर्ड को कोर्ट में पेश किया। डी कुमार ने बताया कि ए राजा की पत्नी भी ईसाई हैं। उनकी शादी एक चर्च में हुई थी। तमाम सबूतों और दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने ए राजा का निर्वाचन रद्द कर दिया। साल 2021 में हुए केरल विधानसभा चुनाव में देवीकुलम सीट से माकपा प्रत्याशी रहे ए राजा ने कांग्रेस प्रत्याशी डी कुमार को 7847 वोटों से हराया था।

दिल्ली : पाटियाला हाउस कोर्ट परिसर में बार बालाओं का डांस: हाई कोर्ट ने फटकार लगाई

                                                                                                        साभार: भास्कर/सोशल मीडिया
दिल्ली के पाटियाला हाउस कोर्ट परिसर में होली मिलन समारोह के दौरान बार बालाओं के डांस कराने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार (10 मार्च 2023) को फटकार लगाई। हाईकोर्ट ने कहा कि यह कानूनी पेशे के उच्च नैतिक मानकों के खिलाफ है और इससे न्यायिक संस्थान की छवि धूमिल हुई है। सोशल मीडिया पर वीडियो ट्वीट करने वाले शख्स ने दावा किया है कि उस समारोह में कई जजों को भी बतौर मेहमान बुलाया गया था।

नई दिल्ली बार एसोसिएशन (NDBA) द्वारा पटियाला हाउस कोर्ट परिसर में होली मिलन समारोह में किया गया था। इस समारोह में पेशेवर डांसरों ने फिल्मी गानों पर डांस किया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले में डिस्ट्रिक्ट जज को जल्द से जल्द मामले में रिपोर्ट सौंपने के आदेश दिए हैं।

यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसका संज्ञान लेते हुए अदालत ने कहा कि प्रधान जिला और सत्र न्यायाधीश पटियाला हाउस कोर्ट तीन दिनों के अंदर नई दिल्ली बार एसोसिएशन को कारण बताओ नोटिस जारी करेंगे और नई दिल्ली बार एसोसिएशन से जवाब मिलने के बाद वह उचित कार्रवाई करेंगे।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि बार एसोसिएशन किसी कार्यक्रम के लिए न्यायालय परिसर का उपयोग करने की अनुमति माँगे तो संबंधित जिला प्रमुख और सत्र न्यायाधीश यह सुनिश्चित करेंगे कि कार्यक्रम पेशे के अनुकूल हो। अदालत ने कहा कि कार्यक्रम ऐसा नहीं होना चाहिए जिसमें कानूनी पेशे के उच्च नैतिकता, कानूनों, नियमों ईमानदारी से पालन किया जाए और जो न्यायिक संस्थान, कानूनी पेशे की गरिमा की छवि को धूमिल नहीं करता हो।

नई दिल्ली बार एसोसिएशन द्वारा 6 मार्च 2023 को पटियाला हाउस कोर्ट परिसर में आयोजित ‘होली मिलन’ समारोह की दो वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। इसमें पेशेवर डांसर बॉलीवुड के गानों पर नाचते हुए देखी जा सकती हैं।

केरल : वामपंथी दंपत्ति ने शफी के कहने पर की दो महिलाओं की हत्या; मीडिया ने बता दिया ‘बलि’

                                                                                                                                                                                                   साभार: ऑर्गेनाइजर
केरल में CPI (M) कार्यकर्ता और उसकी बीवी ने काले जादू के चक्कर में पड़कर दो महिलाओं की हत्या कर डाली। उन्हें फेसबुक पर मिले मोहम्मद शफी उर्फ रशीद नाम के शख्स ने कहा था कि अगर वह इंसान की कुर्बानी देंगे तो उनके घर में पैसा ही पैसा होगा।

इसी लालच के बाद वामपंथी कार्यकर्ता भगवंत सिंह और उसकी बीवी लैला ने दो औरतों को किडनैप किया। फिर उन्हें मार डाला। घटना के बारे में सुन सीएम पिनराई विजयन ने भी हैरानी जताई। वहीं केरल हाईकोर्ट ने भी कहा कि आखिर राज्य किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।

शफी ने वामपंथी कार्यकर्ता और उसकी पत्नी से करवाया कत्ल

पुलिस ने इस केस का खुलासा 11 अक्टूबर 2022 को किया था। उन्होंने बताया कि दो महिलाओं के अपहरण और हत्या केस में कोच्चि पुलिस ने तीन लोगों को पकड़ा है। इनकी पहचान मोहम्मद शफी, भगवंत सिंह और उनकी पत्नी लैला के तौर पर हुई है।
पुलिस ने बताया कि मोहम्मद शफी ने महिलाओं की कुर्बानी देने के लिए उकसाया और फिर औरतों को पैसों का लालच देकर घर तक बुलाया। इसके बाद हत्या को अंजाम दिया गया। इन औरतों की पहचान लॉटरी डीलर पद्मा और सेल्सवुमन रोजलिन के तौर पर हुई। 
दोनों की उम्र 50 पार थी। ये त्रिशूर जिले वड्डाक्केनचेरी की रहने वाली थीं। घटना के दौरान वह एर्नाकुलम के कलाड़ी में थीं। दंपती ने शफी के कहने पर इनकी हत्या के बाद इनके शरीर के 50 से ज्यादा टुकड़े किए और इन्हें दफना दिया गया।

कैसे हुआ खुलासा?

दोनों हत्याओं का खुलासा तब हुआ जब पद्मा के बेटे ने अपनी माँ के गायब होने की शिकायत दी। बेटे ने बताया कि उनकी माँ हमेशा उनको कॉल करती थीं लेकिन जब एक दिन उन्होंने ऐसा करना बंद कर दिया तो वो केरल में उन्हें खोजने आए। यहाँ वह नहीं थीं। पुलिस ने शिकायत पर जाँच शुरू की। पुलिस ने उनका मोबाइल ट्रेस किया और उस जगह पहुँची जहाँ शरीर के हिस्से दफन थे। उसी जगह पुलिस को रोजलिन के शव के भी टुकड़े मिले।
                                मीडिया में कुर्बानी के नाम पर करवाए गए कत्ल को बताया गया ‘बलि’
कथिततौर पर पहले पैसों की लालच में पहले रोजलिन को मारा गया, लेकिन जब घर की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरी तो फिर शफी ने एक और कुर्बानी देने को कहा गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, दंपती ने औरतों को पहले चारपाई से बाँधा था। फिर लैला ने शफी के बताए अनुसार उन औरतों का सिर तन से अलग किया और फिर पूरी बॉडी को धारदार हथियार से काट डाला। शरीर बाद में दफना दिया गया।

मीडिया ने कत्ल को लिखा ‘बलि’

अब ये तो साफ है कि इस घटना में शफी की सबसे मुख्य भूमिका थी। उसने दो अधेड़ उम्र की औरतों का कत्ल करवाया वो भी उनको लालच देकर। लेकिन मीडिया ने हिंदी मीडिया ने इसे ‘बलि’ का नाम देकर परोसा ताकि घटना को एक नया एंगल दिया जा सके। हालाँकि पुलिस के बयान ने ये साफ कर दिया कि हत्या की मंशा क्या थी। वामपंथी कार्यकर्ता और उसकी पत्नी ने लालच में घटना को अंजाम दिया।

आतंकी एंगल की हो जाँच

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने बताया कि ये पहली दफा नहीं है जब सीपीआईएम का सक्रिय कार्यकर्ता काला जादू करते पकड़ा गया। पुलिस को इस केस में कट्टरपंथी गतिविधियों की जाँच करनी चाहिए। केस में शपी का नाम है उसके संबंध इस्लामी आतंकी संगठनों से हैं।

हाईकोर्ट ने जताई चिंता

घटना को सुनने के बाद सीएम ने आरोपितों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए जबकि हाईकोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा कि ये मूर्खता से भी परे है। हमें हैरानी की केरल कहाँ जा रहा हैं। आधुनिक होने की राह में हम भटक रहे हैं। लोग अजीब रास्तों पर जा रहे हैं। जस्टिस देवान रामचंद्रन ने कहा, “मैंने अपने 54 सालों में ऐसा कुछ नहीं सुना था।”

मध्य प्रदेश : ‘काजी के पास जाओ और मुस्लिम बन जाओ’: हाई कोर्ट जज का वायरल Video

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस रोहित आर्य का हिन्दू को मुस्लिम बनने की सलाह देते वीडियो वायरल (चित्र साभार- 'Be a Judge' फेसबुक पेज)
सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें एक जस्टिस एक मुस्लिम लड़की के हिन्दू बनने पर काफी नाराजगी जता रहे हैं। इसी वीडियो में जज साहब लड़के के मुस्लिम बनने की सलाह दे रहे हैं। वीडियो में उन्होंने लड़की के हिन्दू बनने को ‘फ्रॉड’ बताया और इसे खुद स्वीकार करने पर ‘समाज का क्या होगा’ जैसी टिप्पणी की है।

लेखिका शेफाली वैद्य ने 30 जुलाई 2022 को इस वीडियो को शेयर किया है। उन्होंने लिखा, “पहले मुझे लगा कि यह किसी फिल्म का सीन है लेकिन यह असली निकला। मुझे बताया गया कि ये मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस रोहित आर्य है।” शेफाली ने लोगों से अपनी बातों की पुष्टि करने के लिए भी कहा है।

शेफाली वैद्य के अलावा स्वाति गोयल शर्मा, रितु सत्य साधक, योगी योगेश अग्रवाल, रितेश झा आदि ने अपने-अपने ट्विटर हैंडलों से इसे शेयर किया है। इस वीडियो में 2 न्यायाधीश एक साथ बैठे दिखाई दे रहे है। उनमें से एक ने कहा, “ये तमाशा हम स्वीकार नहीं करेंगे। ये अभी जेल जाएगा। तुम काजी के पास जाओ और मुस्लिम बन जाओ। वही ज्यादा अच्छा है। फ्रॉड कर के उसका धर्मांतरण कर दिया, ये कोई तरीका है? किसी मुस्लिम को हिन्दू बना रहे हो, मज़ाक बात है?

यह सुनवाई मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ में 18 जनवरी 2022 हो हुई थी। इस बहस का मूल आधार मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले की एक मुस्लिम लड़की को आर्य समाज मंदिर में हिन्दू धर्म स्वीकार करवाने को ले कर था। जस्टिस रोहित आर्य ने तब आर्य समाज मंदिरों द्वारा कराए जाने वाले वाले धर्म परिवर्तन पर सवाल खड़े किए थे। मामले की जवाबदेही तय करने के लिए गाजियाबाद स्थित आर्य समाज मंदिर को नोटिस भी जारी हुआ था। वीडियो में दिखाई दे रहे दूसरे न्यायाधीश का नाम जस्टिस राजीव कुमार श्रीवास्तव है।

जब ऑपइंडिया ने इस वीडियो की पड़ताल की, तब यह वीडियो 2 हिस्सों में लगभग 27 मिनट का मिला। इसे 19 और 20 जून 2022 को ‘Be a Judge’ नाम के फेसबुक पेज पर शेयर किया है।

पहले वीडियो में जस्टिस रोहित आर्य ने दिल्ली से आए एक वकील को पहले बोलने पर टोका। इस वीडियो में हुई बहस के मुताबिक, केस एक मध्य प्रदेश की मुस्लिम लड़की के अपहरण का था जिसका आरोप एक हिन्दू लड़के पर था। लड़की को पुलिस ने बरामद कर लिया था, जिसने अपने अम्मी-अब्बू के साथ जाने से मना कर दिया था। लड़की लगातार उस लड़के के साथ जाने की जिद पर अड़ी थी, जिस पर उसके अपहरण का आरोप था।

लड़की ने बाद में गाजियाबाद के आर्य समाज मंदिर में धर्म परिवर्तन कर लिया। इसे लड़की के परिजनों ने अवैध धर्मांतरण बता कर लड़की को लड़के के घर जाने से रोकने की माँग की थी।” इस बहस में जस्टिस रोहित आर्य को एक बार कहते सुना गया कि ‘बिलकुल सही बात है।’

इसी बहस के बीच में 5:30वें मिनट पर जस्टिस रोहित आर्य ने SSP को कुल पुलिस फ़ोर्स उपलब्ध करवाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मामले में कुछ फ्रॉड की आशंका दिखाई दे रही है। इसी क्रम में उन्होंने लड़की को हिन्दू बनाने वाले गाजियाबाद के आर्य समाज मंदिर को मात्र एक ट्रस्ट डीड बना कर रखने वाला बताया। जज ने आर्य समाज मंदिर के वकील से पहले मंदिर की प्रमाणिकता साबित करने को कहा।

वीडियो के 9वें मिनट में हिन्दू युवक के वकील ने लड़की को सरकारी नारी निकेतन से खुद के हवाले करने की माँग की, तब जज रोहित आर्य ने लड़के को मुस्लिम बनने की सलाह दी। लड़के के वकील ने सवाल भी किया कि लड़की बालिग है और लड़का मुस्लिम बन कर क्या करेगा तब जज ने कहा, “जो तुम समझो। इसमें हम काजी को भी बुलवाएँगे। ये मामूली बात नहीं है।” इसके बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

इसके बाद की बहस वीडियो के दूसरे पार्ट में है:

वीडियो के शुरुआत में आर्य समाज मंदिर के वकील ने कहा, “लड़की का धर्म हमने नहीं बदलवाया। ऐसा उसने खुद से किया है। लड़की खुद आर्य समाजी बनी है।” इस पर जज रोहित आर्य ने कहा, “ऐसे नहीं होता। कल आप ऐसे ही हिन्दू को मुस्लिम भी बनाने का काम शुरू कर दोगे। ये गोरखधंधा बंद करो।” आर्य समाज मंदिर के वकील ने कहा कि अगर कोर्ट इसे गैर कानूनी कह दे तो हम इसे बंद कर देंगे। इसके जवाब में जज रोहित आर्य ने इसे 100% गैर कानूनी बताया। जज रोहित आर्य ने कहा, “आप कोई भी धर्म पालन करो, उसके अपने भी कुछ नियम होते हैं। “

बहस के चौथे मिनट पर जज रोहित आर्य ने धर्म परिवर्तन के मामले में मुस्लिम कानूनों की नियमावली भी तलब करवाई। उन्होंने आर्य समाज मंदिर के कागजातों की जाँच करने के भी आदेश दिए। जज रोहित आर्य ने बहस के अंत में इस मामले में एक सीनियर वकील फैज़ल को नियुक्त किया। जज के मुताबिक “फैज़ल इस केस की सुनवाई में ‘पवित्र कुरान’ के नजरिए से सहयोग करेंगे।