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क्रूज पर्यटन को दिया विस्तार, दुर्गा पूजा को दिलाई UNESCO में पहचान: मोदी सरकार ने बंगाल टूरिज्म को बढ़ाने के लिए क्या-क्या किया, सारा क्रेडिट ले रहीं ममता बनर्जी

                                          बंगाल बना तीसरा पसंदीदा पर्यटन स्थल (साभार-toi, nbt)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टूरिज्म क्रांति ने विदेशी सैलानियों की संख्या में जबरदस्त इजाफा किया है, जिसने तमाम राज्यों को फायदा पहुँचाया है। इस कड़ी में बंगाल जो 2023-2024 में पर्यटन के मामले में तीसरे नंबर पर था वो 2025 में दूसरे नंबर पर आ गया है। भारत के लिए जाहिर है कि ये गर्व की बात है लेकिन इस ग्रोथ का सारा क्रेडिट अब अकेले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लेती दिख रही हैं।

जिस ममता के राज में हिन्दुओं को अपने त्यौहार(दुर्गा पूजा) मनाने के अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हो, ममता बनर्जी को शर्म आनी चाहिए कि जिस दुर्गा पूजा के बंगाल के हिन्दुओं को तुम्हारे कट्टरपंथी गुंडों से झूझना पड़ता है उसी दुर्गा पूजा को UNESCO में पहचान दिलवाने का काम नरेंद्र मोदी ने किया। 

उन्होंने इस संबंध में ट्वीट कर खुद अपनी पीठ थपथपाई है। जबकि सच्चाई ये है कि 2011 से सत्तासीन ममता बनर्जी का प्रयास कहीं नजर नहीं आता है। वहीं मोदी सरकार आने के बाद शुरू किए गए प्रयास जैसे- इनक्रेडिबल इंडिया, ई वीजा, मेडिकल वीजा के साथ-साथ क्रूज से लेकर सड़क तक किए गए विकास का फायदा बंगाल को मिला है।

बंगाल बना तीसरा पसंदीदा स्पॉर्ट

 विदेशी पर्यटकों के लिए बंगाल पहले तीसरा और अब दूसरा सबसे पसंदीदा टूरिस्ट स्पॉट बन गया है। पूर्व में सबसे आगे महाराष्ट्र और उसके बाद गुजरात था। मगर, अब लिस्ट में बंगाल ने राजस्थान और दिल्ली को पीछे छोड़ते हुए जगह बनाई है।

बंगाल को लेकर इस साल के शुरुआत में ही खबरें आ रही थी कि इस वर्ष बंगाल में आने वाले टूरिस्टों की पहले के मुकाबले ज्यादा हो सकती हैं। अब ये रिपोर्ट देखकर लगता है कि इस वर्ष हुआ भी यही। बता दें कि केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के ‘भारत पर्यटन डेटा संग्रह 2025’ ने राज्य को अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या के मामले में देश भर में दूसरे स्थान पर रखा है। देख सकते हैं बंगाल विदेशी टूरिस्टों की लुभाने में नंबर 2 पर आया है। संख्या 3.12 मिलियन रही।

अब ये वृद्धि अचानक से बंगाल में कैसे देखने को मिली। इसके पीछे के कारण मोदी सरकार के अथक प्रयास हैं।

                                             भारत पर्यटन डेटा संग्रह 2025

दुर्गा पूजा को मिली वैश्विक पहचान

सांस्कृतिक समृद्धि और त्यौहारों ने विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया है। कोलकाता में होने वाले दुर्गापूजा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल गई है। दुर्गा पूजा वह समय है जब बंगाल में बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक आते हैं। लेकिन, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की मेहनत का नतीजा है कि दिसंबर 2021 में यूनेस्को ने कोलकाता में होने वाले दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया। इसे ‘धर्म और कला के समन्वय का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण’ माना। जाहिर है इससे शिल्पकारों, कलाकारों को भी प्रोत्साहन मिला, जो सालभर माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाने में मशगूल रहते हैं।

ई वीजा और मेडिकल वीजा

बंगाल के प्राइवेट अस्पतालों में बांग्लादेशी मेडिकल विज़िटर्स बड़ी संख्या में आते हैं। इसकी वजह बंगाल का सीमा से सटा होना और आसानी से मेडिकल वीजा मिलना है। ये लोग ममता के गिरते हुए हेल्थ सिस्टम को भी नजरअंदाज कर यहाँ पहुँचते हैं।
पीएम मोदी की ‘हील इन इंडिया’ पहल निजी क्षेत्र के साथ मिलकर स्वास्थ्य सेवा को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने का कार्यक्रम है। इसका फायदा बंगाल को भी हो रहा है। केन्द्र सरकार ने मेडिकल वीजा मिलना भी आसान कर दिया है। इसलिए बांग्लादेशी मेडिकल विजिटर्स रिकॉर्ड संख्या में बंगाल पहुँचे। ई वीजा की वजह से लोगों को वीजा मिलना भी सुलभ हो गया है। इसलिए पर्यटकों की संख्या में काफी बढोतरी हुई है।

इनक्रेडिबल इंडिया

भारत में रिकॉर्ड तोड़ विदेशी टूरिस्ट आने का कारण इनक्रेडिबल इंडिया है, जिसे अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू किया था और PM नरेंद्र मोदी ने ई-वीज़ा, मेडिकल वीज़ा, ग्लोबल कैंपेन और आसान एंट्री से इसे सुपरचार्ज किया है। अतिथि देवो भव: अवधारणा के साथ शुरू इस योजना को 2017 में नई जान आ गई। ‘इनक्रेडिबल इंडिया 2.0’ को डिजिटल और सोशल मीडिया पर काफी प्रोत्साहित किया गया। सरकार ने तो ‘वन स्टेट, वन ग्लोबल डेस्टिनेशन’ भी शुरू कर रही है। इसका लक्ष्य 2027 तक हर राज्य को फायदा पहुँचाना है।
अतुल्य भारत डिजिटल पोर्टल शुरू किया गया। इसे भारत में आने वाले पर्यटकों के लिए खास तौर पर बनाया गया। यह यात्रियों को पर्यटन स्थलों को ढूँढने और शोध से लेकर योजना बनाने, बुकिंग करने, यात्रा करने और वापस लौटने तक सभी जरूरी जानकारी और सेवाएँ देता है। ‘बुक योर ट्रैवल’ फीचर उड़ानों, होटलों, कैब की बुकिंग की सुविधा प्रदान करता है, जिससे यात्रियों की पहुँच बेहतर होती है। जाहिर से इसका फायदा भी बंगाल को मिला।

अतुल्य भारत होमस्टे योजना

पर्यटकों की सुविधा के लिए केन्द्र सरकार ने स्वैच्छिक होमस्टे योजना शुरू की, ताकि पर्यटकों को कहीं ठहरने में दिक्कत न हो और स्थानीय जनता को भी आमदनी हो। योजना के तहत 5 से 6 गाँव में 5 से 10 होम स्टे हो सकता है जिसके लिए 5 करोड़ रुपए तक की सहायता की जा रही है।

जनजातीय पर्यटन सर्किट का विकास

स्वदेश दर्शन योजना के तहत थीम आधारित सर्किट विकसित की जा रही है। रामायण सर्किट, बौद्ध सर्किट आदि। इस योजना के तहत जनजातीय होम स्टे परियोजना भी शुरू किया गया है। ताकि पर्यटकों के आने जाने वाली जगहों का विकास किया जा सके। इसके लिए केन्द्र सरकार धन मुहैया कराती है।

तीर्थयात्रा को बढ़ावा देने के लिए प्रशाद योजना

इसके तहत राज्य के अहम तीर्थस्थलों को संरक्षित करना और उन तक पहुँचने के लिए सुविधाएँ बढ़ाया गया है। जैसे त्रिपुरा संदुरी मंदिर, चामुंडेश्वरी देवी मंदिर, पटना साहिब की विकास योजनाएँ।
घरेलू पर्यटकों को अपने देश के पर्यटन स्थलों को देखने के लिए सरकार ने प्रोत्साहित किया। इसके लिए ‘देखो अपना देश’ पहल की गई
विशिष्ट पर्यटन उपक्षेत्रों को विकसित किया गया है जैसे उत्सव पर्यटन, साहसिक पर्यटन, विवाह पर्यटन और क्रूज पर्यटन। इसमें भारत के त्यौहारों, आयोजनों से लेकर पर्वतारोहण को बढ़ावा देने, ‘इंडिया सेज आई डू’ के तहत मैरिज डेस्टिनेशन सेंटर को बढ़ावा देना शामिल है।

क्रूज पर्यटन का विकास

क्रूज पर्यटन का फायदा भी कोलकाता को मिला है। बंगाल में कई तरह की क्रूज सेवाएं शुरू हो गई हैं, जिनमें ‘बंगाल गंगा क्रूज’ अहम है। इसके अतिरिक्त, भारत और आसियान देशों के बीच बंगाल की खाड़ी में एक नए क्रूज पर्यटन कॉरिडोर भी विकसित किया जा रहा है। कोलकाता से शुरू होने वाली एक लग्जरी क्रूज सेवा भी है, जो हुगली नदी के किनारे बंगाल की संस्कृति और वास्तुकला को दर्शाती है।
बीजेपी ने ममता बनर्जी के पर्यटकों की संख्या में इजाफे को लेकर सवाल किया है। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट कर सीएम ममता बनर्जी से पूछा है कि आखिर किस काम का वे क्रेडिट ले रही हैं, जबकि पर्यटन को मोदी सरकार की प्राथमिकता में एक है।
जाहिर है विधानसभा चुनाव को देखते हुए ममता सरकार हर क्रेडिट लेना चाहेगी। पर्यटन से न सिर्फ राज्य की आय बढ़ती है बल्कि आम नागरिक को काफी फायदा होता है। करीब 15 सालों से ममता बनर्जी ने पर्यटन के विकास के लिए कुछ खास नहीं किया। सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध बंगाल को इन सालों में काफी फायदा पहुँचाया जा सकता था।

राजदीप सरदेसाई ने रथ यात्रा पर फैलाया TMC का प्रोपेगेंडा तो इंडियन एक्सप्रेस निकला एक कदम आगे: ममता सरकार के बनाए मंदिर को बता दिया पुरी जगन्नाथ धाम के बराबर

        सागरिका घोष (बाएं), द इंडियन एक्सप्रेस (दाएं) के साथ राजदीप सरदेसाई(फोटो साभार -ऑपइंडिया इंग्लिश)
‘प्रोपेगेंडा बाज’ राजदीप सरदेसाई ने ममता बनर्जी की चरणवंदना की सभी हदें पार कर दी हैं। इसी कड़ी में राजदीप सरदेसाई ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। दरअसल, इस बार उन्होंने ओडिशा के पुरी में बने 900 साल पुराने जगन्नाथ धाम की तुलना पश्चिम बंगाल के दीघा में ममता बनर्जी सरकार द्वारा बनाए गए नए जगन्नाथ मंदिर से कर दी है।

राजदीप को पुरी जगन्नाथ धाम की तुलना दीघा से करने पहले पुरी का इतिहास पढ़ लेना चाहिए था, जबरदस्ती में उल्टियां कर गंद मत फैला। जगन्नाथ जी के मन्दिर और धाम में जमीन आसमान का फर्क है महामूर्ख पत्रकार। राजदीप जैसे जयचंदियों की वजह से गौरवमयी हिन्दू सम्राट का पतन हुआ था। इन सनातन विरोधियों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि संयम की भी एक सीमा होती है।   

मौजूदा समय में पुरी जगन्नाथ की रथ यात्रा चल रही है। इस पवित्र मौके को भी उन्होंने ममता सरकार के लिए प्रोपेगेंडा फैलाने में इस्तेमाल किया। ऐसे में शुक्रवार (27 जून 2025) को राजदीप ने ट्वीट किया, “जगन्नाथ यात्रा के अब दो ठिकाने हैं: एक असली पुरी में, दूसरा नया दीघा में।”

                                                       राजदीप सरदेसाई के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

ये ट्वीट एक सोची-समझी चाल का हिस्सा लगता है, जिसमें पुरी के ऐतिहासिक जगन्नाथ धाम को दीघा के नए मंदिर के बराबर दिखाने की कोशिश की गई। बता दें, दीघा का मंदिर अभी दो महीने पहले ही (30 अप्रैल 2025) को खुला है।

माना जा रहा है कि यह ममता बनर्जी की सरकार की एक रणनीति है, जो हिंदू भावनाओं को भुनाकर आगामी विधानसभा चुनावों में लाभ लेना चाहती है। टीएमसी सरकार द्वारा बनाए गए दीघा मंदिर को पुरी के पौराणिक मंदिर के समकक्ष दिखाने की यह कोशिश न केवल धार्मिक परंपराओं का अपमान है, बल्कि जनता की आस्था से भी सीधा खिलवाड़ है। इस बयान को लेकर सोशल मीडिया से लेकर धार्मिक संस्थानों तक विरोध हो रहा है।

कौन हैं राजदीप सरदेसाई?

राजदीप सरदेसाई की पत्नी सागरिका घोष पहले पत्रकार थीं और अब तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की राज्यसभा सांसद हैं। ऐसे में राजदीप का ये ट्वीट TMC के लिए प्रचार करने की कोशिश माना जा रहा है। रथ यात्रा जैसे पवित्र मौके पर उन्होंने ऐसा दिखाने की कोशिश की जैसे ममता सरकार ने दीघा में भगवान जगन्नाथ के लिए कोई नया और खास ठिकाना बना दिया हो।

दरअसल, यह टीएमसी सरकार की चुनाव से पहले हिंदू वोटरों को लुभाने की कोशिश मानी जा रही है। सालों तक मुस्लिम तुष्टिकरण और ‘बाहरी बनाम बंगाली’ जैसे नैरेटिव पर चलने वाली पार्टी को अब समझ आ गया है कि सिर्फ इन्हीं बातों से चुनाव नहीं जीता जा सकता।

इसलिए अब पार्टी दीघा में बने जगन्नाथ मंदिर जैसे धार्मिक प्रयासों को दिखाकर हिंदुओं को अपनी तरफ करने की कोशिश कर रही है। राजदीप सरदेसाई के इस पोस्ट इसी एजेंडा को बढ़ावा देने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

इंडियन एक्सप्रेस ने भी फैलाया ऐसा ही झूठ

‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ ने भी शनिवार (28 मार्च 2025) को एक लेख छापा, जिसमें पुरी के जगन्नाथ धाम को दीघा के नए मंदिर के बराबर दिखाने की कोशिश की गई। लेख का शीर्षक था, “दीघा में नए जगन्नाथ मंदिर के उभरने के बीच ओडिशा ने पुरी में रथ यात्रा के लिए पूरी ताकत झोंक दी।” इस लेख में ऐसा दिखाया गया जैसे दोनों मंदिरों के बीच कोई तुलना हो सकती है।

                                            इंडियन एक्सप्रेस की समाचार रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

पुरी जगन्नाथ धाम और दीघा के मंदिर की कोई तुलना नहीं

पुरी के जगन्नाथ मंदिर और पश्चिम बंगाल के दीघा में बने नए जगन्नाथ मंदिर दोनों की आपस में न तो कोई तुलना हैं और न ही इनमें कोई प्रतिस्पर्धा है। पुरी का मंदिर 12वीं शताब्दी में राजा अनंतवर्मन चोडगंगा देव ने बनवाया था।
यह 900 साल पुराना है और हिंदू आस्था परंपरा और कलिंग शैली की वास्तुकला का केंद्र माना जाता है। इसका संचालन गजपति महाराजा की अध्यक्षता में एक समिति करती है। वहीं दीघा का मंदिर हाल ही में करीब दो महीने पहले खुला है और इसे पश्चिम बंगाल सरकार ने बनवाया है।
यह पुरी मंदिर की एक प्रतिकृति (रेप्लिका) मात्र भर है। इस मंदिर के उद्घाटन के समय ये विवादों में भी घिर गया था, खासकर ‘हलाल प्रसाद‘ और मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों को लेकर। ममता सरकार अब इस नए मंदिर को ‘जगन्नाथ धाम‘ कहकर राजनीतिक रूप से इस्तेमाल कर रही है, जिससे लोगों को यह भ्रम हो कि यह पुरी के प्राचीन मंदिर जितना ही महत्वपूर्ण है। इससे यह भी आरोप लग रहा है कि सरकार जानबूझकर असली जगन्नाथ धाम की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

TMC का दोहरा चरित्र हो चुका है बेनकाब

ममता सरकार ने जहाँ दीघा में नया मंदिर बनाकर हिंदुओं को लुभाने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल के मुस्लिम-बहुल मालदा जिले में 629 साल पुरानी ‘रथ मेला‘ पर रोक लगा दी। ये दिखाता है कि TMC की हिंदू-समर्थक छवि सिर्फ दिखावा है।

पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने साफ कहा है कि दीघा का मंदिर ‘भगवान जगन्नाथ के प्रति भक्ति से कोई लेना-देना नहीं रखता।’ फिर भी राजदीप सरदेसाई और इंडियन एक्सप्रेस जैसे मीडिया हाउस दीघा के मंदिर को पुरी के जगन्नाथ धाम के बराबर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। इसकी वजह से लोगों में गलतफहमी और नाराजगी दोनों ही बढ़ती जा रही है।

अवलोकन करें:-

पश्चिम बंगाल : क्या ममता बनर्जी मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथों की कठपुतली बन चुकी है? रथ यात्रा प
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पश्चिम बंगाल : क्या ममता बनर्जी मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथों की कठपुतली बन चुकी है? रथ यात्रा प
मालदा कालियाचक रथ मेला (फोटो साभार - न्यूज़ बाज़ार और एचटी बांग्ला से ली गई हैं) क्या बंगाल की मुख्यमंत्री ममता ... 

ममता सरकार कर रही हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़

ममता बनर्जी की TMC सरकार ने दीघा में मंदिर बनाकर और उसे ‘जगन्नाथ धाम’ कहकर हिंदू धर्म की परंपराओं और शास्त्रों का अपमान किया है। राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार और इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार इस प्रचार में शामिल होकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। पुरी का जगन्नाथ धाम 900 साल की आस्था और संस्कृति का प्रतीक है, जबकि दीघा का मंदिर सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए बनाया गया नया मंदिर है, जो दिखने में जगन्नाथ धाम की तरह हो सकता है। ऐसे में इस तरह का प्रचार न सिर्फ गलत है, बल्कि हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ भी है।

बंगाल की CPIM सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को ममता सरकार ने आगे बढ़ाया: सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे में चौंकाने वाले खुलासे

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार ने बिना किसी जाँच-पड़ताल के मुस्लिम समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) कोटे में शामिल कर लिया, ताकि अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधा जा सके। तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सरकार ने न केवल राज्य में पिछली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) सरकार द्वारा अपनाई गई तुष्टिकरण नीति को जारी रखा, बल्कि उसमें और इजाफा भी किया।

अब, ममता बनर्जी की सरकार पर 77 जातियों को मनमाने ढंग से ओबीसी श्रेणी में शामिल करने के लिए आलोचना हो रही है। इन 77 जातियों में 75 जातियाँ मुस्लिमों से संबंधित हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट ने 22 मई को अपने ऐतिहासिक फैसले में 5 मार्च 2010 और 11 मई 2012 के बीच वामपंथी और टीएमसी सरकारों द्वारा 77 समूहों को जारी किए गए ओबीसी प्रमाण पत्र को रद्द कर दिया था।

इस बीच, पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर करके अपने फैसले का बचाव किया। CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने 5 अगस्त के अपने आदेश में ओबीसी श्रेणी में शामिल होने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया के बारे में सरकार से विवरण माँगा था। हालाँकि, इसके विवरणों से पता चलता है कि मुस्लिम मतदाताओं को खुश करने के लिए सभी मानदंडों का उल्लंघन किया।

जटिल 3-स्तरीय प्रक्रिया, लेकिन कई खामियाँ

TOI के अनुसार, सरकार ने दावा किया कि ओबीसी सूची का विस्तार एक जटिल तीन-स्तरीय प्रक्रिया के माध्यम से किया गया। इसमें दो सर्वेक्षण और पिछड़ा वर्ग आयोग की एक सुनवाई शामिल थी। दूसरी ओर यह खुलासा किया गया है कि कुछ मुस्लिम समूहों के लिए यह प्रक्रिया एक दिन से भी कम समय में पूरी की गई। यह जटिलता और सरकारी मशीनरी की गति को देखते हुए असंभव प्रतीत होता है।
यह बात सामने आई है कि खोट्टा मुस्लिम समुदाय ने 13 नवंबर 2009 को आवेदन किया और उसी दिन पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग ने उसे ओबीसी सूची में शामिल करने की सिफारिश कर दी। इसी तरह 21 अप्रैल 2010 को आवेदन करने वाले जमादार मुस्लिम समूह को उसी दिन ओबीसी श्रेणी में शामिल कर लिया गया।
इसने एक दिन के भीतर गायेन और भाटिया मुस्लिम समुदायों को शामिल करने की सिफारिश की गई। चार दिनों में चुटोर मिस्त्री मुस्लिम समुदाय को शामिल किया और एक महीने से भी कम समय में एक दर्जन अन्य मुस्लिम समूहों को ओबीसी सूची में शामिल कर लिया गया। ओबीसी आयोग ने इस मामले में आश्चर्यजनक गति से काम किया।
ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ उप-वर्गीकरण सर्वेक्षण का काम समुदाय के सदस्यों द्वारा ओबीसी श्रेणी में शामिल होने के लिए आयोग में आवेदन करने से पहले ही कर दिया गया। काजी, कोटल, हजारी, लायेक, खस और कुछ अन्य मुस्लिम समुदायों के लिए सर्वेक्षण जून 2015 में पूरा कर लिया गया था, लेकिन उन्हें OBC में शामिल करने का आवेदन काफी बाद में, यहाँ तक ​​कि एक या दो साल बाद दिए गए।
पश्चिम बंगाल की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में इसके पक्ष में अपना तर्क दिया। राज्य सरकार ने दावा किया, “विस्तृत जाँच और/या मौखिक या दस्तावेजी प्रकृति में उसके समक्ष प्रस्तुत सामग्री पर विचार करने के बाद ही 34 समुदायों में से प्रत्येक पर अंतिम रिपोर्ट आयोग द्वारा अंतिम सिफारिश के साथ तैयार की गई थी।”
अभिजीत मुखर्जी द्वारा प्रस्तुत हलफनामे के अनुसार, प्रक्रिया उन समुदायों द्वारा आवेदन से शुरू होती है जो ओबीसी सूची में शामिल होना चाहते हैं। इनमें वर्ग का नाम, उसकी जनसंख्या, उसका निवास क्षेत्र के साथ-साथ उनकी सामाजिक, शैक्षिक, वैवाहिक, व्यावसायिक और आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी दी जाती है। मुखर्जी फिलहाल पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग में अतिरिक्त सचिव और पदेन संयुक्त आयुक्त (आरक्षण) हैं।
अभिजीत मुखर्जी ने अपने हलफनामे में दावा किया है कि पश्चिम बंगाल की सरकार ने इस मामले में तीन-स्तरीय प्रक्रिया का बेहद सावधानीपूर्वक पालन किया है। आयोग अपने सदस्यों (2012 से पहले) या राज्य सरकार के सांस्कृतिक अनुसंधान संस्थान (CRI) और उनके साथ काम करने वाले मानवविज्ञानियों (2012 के बाद) के माध्यम से अनुरोध करने पर क्षेत्र का सर्वेक्षण करता है।
आयोग आवेदन की सुनवाई और ऐसे सर्वेक्षण के दौरान दावे के किसी भी विरोध के बारे में जनता को सूचित करता है। आयोग प्रस्ताव को स्वीकृत या अस्वीकृत करने का निर्णय लेने से पहले सार्वजनिक सुनवाई में प्रस्तुत दस्तावेजों, सर्वेक्षण प्रतिक्रियाओं, प्रश्नों और साक्ष्यों की समीक्षा करता है।
राज्य सरकार ने कहा कि यह सिफारिश स्वीकृति के बाद सरकार पर सामान्य रूप से बाध्यकारी है और सरकार उस समूह को ओबीसी सूची में शामिल कर लेती है। उसके बाद कैबिनेट को इसे स्वीकृत करने के लिए कहा जाता है और बाद में प्राधिकरण के बाद इसे आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है।

कलकत्ता हाई कोर्ट की टिप्पणी

इस साल मई में कलकत्ता हाई कोेर्ट की न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती और राजशेखर मंथा की पीठ ने 5 मार्च 2010 और 11 मई 2012 के बीच वामपंथी और तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकारों द्वारा 77 समूहों को जारी किए गए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) प्रमाण पत्र रद्द कर दिए थे। न्यायाधीशों ने पाया कि पश्चिम बंगाल प्रशासन ने 2006 की सच्चर समिति की रिपोर्ट का ‘व्यापक रूप से’ उपयोग किया।
कोर्ट ने यह पाया कि इसके व्यापक उपयोग से कुख्यात निष्कर्ष निकाला गया कि भारत में मुस्लिम अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के सदस्यों की तुलना में बदतर स्थिति में हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट के अनुसार, मुस्लिमों को पिछड़ा बताने और उन्हें ओबीसी के रूप में वर्गीकृत करने के लिए राज्य द्वारा इस्तेमाल की गई सच्चर समिति की रिपोर्ट में संवैधानिक वैधता का अभाव था।
न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा नियुक्त आयोग की लापरवाही पर भी सवाल उठाया, क्योंकि उसने ओबीसी श्रेणी में शामिल समूहों के सामाजिक वंचना की गहराई का पता लगाने के लिए गहन जाँच करने में विफल रहा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल पुरानी हो चुकी मंडल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर 2011 से 2022 के बीच ओबीसी श्रेणियों को अधिसूचित करना उचित नहीं है।
इसके अलावा, कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम 2012 पारित करके और नए ओबीसी की पहचान करने की प्रक्रिया में आयोग की भागीदारी को समाप्त करके, पश्चिम बंगाल सरकार ने ‘राज्य की संवैधानिक शक्ति के साथ धोखाधड़ी’ की है।
विद्वान न्यायाधीशों ने इस बात पर जोर दिया कि आयोग ने मुसलमानों को ओबीसी के रूप में वर्गीकृत करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों की कैसे अवहेलना की। अदालत ने आगे बताया कि कलकत्ता विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान विभाग ने धार्मिक मानदंडों पर आधारित नए ओबीसी के पहले समूह की घोषणा करने के फैसले को सही ठहराने के लिए पिछली वामपंथी सरकार के साथ सहयोग किया था।
न्यायाधीशों ने मुस्लिमों को ‘राजनीतिक वस्तु’ के रूप में इस्तेमाल करके अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पश्चिम बंगाल प्रशासन की कड़ी आलोचना की। कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा लगभग पाँच लाख ओबीसी प्रमाण-पत्रों को रद्द करने के बाद सीएम ममता बनर्जी ने घोषणा की, “मैं कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले को स्वीकार नहीं करती। ओबीसी आरक्षण वैसे ही जारी रहेगा।”
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने जून 2023 में पाया कि पश्चिम बंगाल में रोहिंग्या मुस्लिमों और बांग्लादेश से आए अवैध अप्रवासियों मुस्लिमों को भी ओबीसी प्रमाण-पत्र जारी कर दिए गए थे। एनसीबीसी ने आगे पाया कि पश्चिम बंगाल में हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन राज्य में मुस्लिम ओबीसी जातियाँ हिंदू ओबीसी जातियों से अधिक हैं।

विवाद की पृष्ठभूमि

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉनग्रेस (TMC) से पहले राज्य में सीपीआईएम की सरकार थी। उसने सन 1994 से सन 2009 के बीच 66 वर्गों को ओबीसी घोषित किया था। इनमें से करीब 12 वर्ग मुस्लिम समुदाय के थे। सीपीआईएम सरकार ने 5 मार्च से 10 सितंबर 2010 के बीच सात कार्यकारी आदेश जारी करके 42 अतिरिक्त वर्गों को ओबीसी की मान्यता दी।
यह कदम संभवतः 2011 के चुनावों को ध्यान में रखते हुए लिया गया था। इन 42 वर्गों में से 41 मुस्लिम समुदाय से थे। नतीजतन, ये नए समूह पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा प्रस्तावित नौकरियों में प्रतिनिधित्व और आरक्षण के लिए योग्य हो गए। अपने मुस्लिम वोट बैंक को और अधिक समायोजित करने के लिए सीपीआईएम ने फरवरी 2010 में सरकारी पदों पर मुस्लिमों के लिए 10% आरक्षण भी दे दी।
हालाँकि, इन सब कामों के बावजूद सीपीआईएम चुनाव में हार गई और तृणमूल कॉन्ग्रेस जीत गई। इसके बाद मई 2011 में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार सँभाला। उन्होंने वामपंथी शासन की तुष्टिकरण नीति को जारी रखा। 11 मई 2012 के कार्यकारी आदेश में TMC सरकार ने ओबीसी के रूप में अतिरिक्त 35 नए वर्गों जोड़ा।
इनमें से 34 वर्ग मुस्लिम समुदाय के थे। इस तरह केवल दो वर्षों में वामपंथी और टीएमसी सरकारों ने ओबीसी समूह में 77 नए वर्ग (जिनमें से 75 मुस्लिम थे) जोड़े। ममता बनर्जी की सरकार ने एक नए कानून के जरिए इन 77 समूहों को ओबीसी ए (अधिक पिछड़ा) और ओबीसी बी (पिछड़ा) नाम की दो श्रेणियों में विभाजित कर दिया।
इसके बाद 18 जनवरी 2011 को अमल चंद्र दास नाम के व्यक्ति ने वामपंथी सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए पहली याचिका दायर की। उन्होंने 42 जातियों को केवल धार्मिक मान्यताओं के आधार पर ओबीसी के रूप में नामित करने के फैसले पर सवाल उठाया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ओबीसी की पहचान में मदद करने के लिए स्थापित आयोग का सर्वेक्षण पूर्वनिर्मित था।
साल 2012 से साल 2020 तक अमल चंद्र दास, पूरबी दास और आत्मदीप ने पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम 2012 की संवैधानिकता और इसके कई प्रावधानों को चुनौती देते हुए तीन और याचिकाएँ दायर कीं। सभी चार याचिकाओं को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक साथ जोड़ा और उन पर फैसला सुनाया।