Showing posts with label human rights. Show all posts
Showing posts with label human rights. Show all posts

बलूचिस्तान की महिला को लोगों के सामने नंगा नचाया, सस्पेंड हुई पुलिस इंस्पेक्टर शबाना: पूछताछ के दौरान उतार लिए थे कपड़े

                                        पाकिस्तान पुलिस पर लगा महिला को नंगा नचवाने का आरोप
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में पुलिस की अमानवीयता इस समय सुर्खियां बनी हुई है। यहाँ पर हिरासत में ली गई एक महिला को नग्न हो कर डाँस करने पर मजबूर किया गया है। इस अमानवीयता का आरोप एक महिला पुलिस इंस्पेक्टर पर लगा है। जाँच के बाद आरोपित महिला इंस्पेक्टर को बर्खास्त कर दिया गया है। यह बर्खास्तगी 11 नवम्बर 2021 को की गई है।

बर्खास्त महिला पुलिस इंस्पेक्टर का नाम शबाना इरशाद है। शबाना के अमानवीय कृत्य की जाँच क़्वेटा की एडिशनल SP परी गुल को सौंपी गई थी। उन्होंने अपनी जाँच में शबाना को दोषी पाया और उनकी बर्खास्तगी की संस्तुति की। परी गुल की रिपोर्ट के आधार पर इंस्पेक्टर शबाना को DIG क़्वेटा मुहम्मद अज़हर अकरम ने बर्खास्त कर दिया। जाँच अधिकारी एडिशनल SP परी गुल ने जाँच रिपोर्ट को अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर करते हुए लिखा है कि न्याय की जीत होनी चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जिन्ना टाउनशिप में एक बच्चे की हत्या के सिलसिले में महिला को पूछताछ के लिए बुलाया गया था। जाँच में पाया गया कि पुलिस हिरासत में इंस्पेक्टर शबाना ने महिला को निर्वस्त्र किया। इसी के साथ पीड़िता को बिना कपड़ों के नाचने पर मजबूर किया गया। DIG मोहम्मद अज़हर अकरम ने महिला इंस्पेक्टर शबाना के इस कृत्य पर नाराजगी जताई है। उनके अनुसार यह अधिकारों का दुरूपयोग है। बताया जा रहा है कि जब महिला को नग्न नृत्य करने पर मजबूर किया गया तब वहाँ पर और भी लोग मौजूद थे।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार आरोपित महिला इंस्पेक्टर ने अपने बचाव में कुछ नहीं कहा। सुरक्षा के दृष्टिकोण से जेल में महिला कैदियों से पूछताछ के लिए महिला पुलिस अधिकारी की ही नियुक्ति की गई थी। यहाँ गौरतलब है कि बलूचिस्तान के निवासी पाकिस्तान की पुलिस और फ़ौज पर आए दिन अमानवीयता का आरोप लगाया करते हैं।

आंध्र प्रदेश: जहाँ रहते है केवल हिंदू वहाँ बनाया जा रहा चर्च, शिकायत पर प्रशासन ने ग्रामीणों का किया उत्पीड़न

आन्ध्र प्रदेश-चर्च
अवैध चर्च उस रिहायशी इलाके के बीच बन रहा है,
जहाँ केवल हिन्दू परिवार रहते हैं
कुछ ही समय पूर्व आंध्र प्रदेश के सत्ताधारी दल के ही एक सांसद ने ईसाई धर्मांतरण को सरकारी संरक्षण दिए जाने का खुलासा किया था। अब एक ऐसे इलाके में चर्चा का निर्माण किए जाने का मामला सामने आया जहॉं केवल हिंदू ही रहते हैं। इतना ही नहीं जब ग्रामीणों ने इस पर आपत्ति जताई तो प्रशासन ने उनका कथित तौर पर उत्पीड़न किया।
आंध्र प्रदेश के मूलस्थानम अग्रहारम (Moolasthanam Agraharam) गाँव में इसाई मिशनरियों द्वारा पूर्वी गोदावरी जिले में एक अवैध चर्च का निर्माण कार्य शुरू किया गया है। निर्माण रिहायशी इलाके में चल रहा है और यहाँ केवल हिन्दू परिवार रहते हैं।
इस मामले में ग्रामीणों ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, भारत (एनएचआरसी) को भी लिखा है कि अधिकारियों द्वारा उनके साथ द्वितीय श्रेणी के नागरिक जैसा व्यवहार किया जा रहा है। अब वे अपने अधिकारों की रक्षा हेतु NHRC की मदद का इन्तजार कर रहे हैं।

‘ऑर्गेनाइजर’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस चर्च निर्माण के अवैध होने के कारण ग्रामीणों ने इस पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि यह गाँव में शांति और सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान पैदा कर रहा है। मिशनरियों द्वारा चर्च निर्माण रोकने के लिए ग्रामीणों की दलील अनसुनी कर दी गई और इसके बाद उन्होंने पंचायत और पुलिस से संपर्क करने का फैसला किया।
मूलस्थानम अग्रहारम के ग्रामीणों द्वारा स्थानीय अधिकारियों के पास एक आरटीआई भी दायर की गई थी। उम्मीद के अनुसार ही आरटीआई के जवाब में पता चला कि चर्च के निर्माण के लिए कोई अनुमति नहीं दी गई थी।
संयोग से, नवम्बर 29, 2012 को आंध्र प्रदेश के पंचायत राज और ग्रामीण विकास विभाग द्वारा एक आदेश (GOMS 376) जारी किया गया था, जिसमें कहा गया था कि किसी भी धार्मिक स्थल के निर्माण की अनुमति केवल तभी दी जा सकती है जब पड़ोसी को इससे कोई ऐतराज ना हो और जिला कलेक्टर से अनुमति प्राप्त की गई हो।
लेकिन उक्त चर्च ने ऐसी कोई अनुमति नहीं ली थी और गाँव के निवासियों ने भी इसके निर्माण पर आपत्ति जताई थी। फिर भी यह निर्माण नहीं रोका गया। ग्रामीणों ने इसके बाद ग्राम राजस्व अधिकारी से संपर्क किया, फिर आवश्यक कार्रवाई के लिए मंडल राजस्व अधिकारी और जिला कलेक्टर सहित उच्च अधिकारियों से संपर्क किया। उनमें से किसी ने भी मामले में हस्तक्षेप नहीं किया और इसके विपरीत स्थानीय पुलिस ने शिकायत करने के लिए हिंदुओं को ही परेशान करना शुरू कर दिया।
प्रशासन के इस व्यवहार के बाद ग्रामीणों ने अवैध चर्च के निर्माण को रोकने के लिए भूख हड़ताल की। स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने फिर से शिकायत कर रहे ग्रामीणों को परेशान करना शुरू कर दिया। उन्हें बार-बार पुलिस स्टेशन बुलाया गया और बात न मानने पर आपराधिक मामले दर्ज करने की धमकी दी जाती थी। इससे ही स्पष्ट होता है कि इसाई मिशनरियों कि पुलिस और प्रशासन में कितनी गहरी पैठ है।
उत्पीड़न के बाद ग्रामीणों ने जिला पुलिस अधीक्षक से संपर्क किया और स्थानीय पुलिस के व्यवहार के बारे में उन्हें अवगत कराया। साथ ही उन्होंने पूरे मामले में न्याय की भी माँग की। लेकिन उन्हें यहाँ से भी कोई न्याय नहीं मिला। कोई विकल्प शेष ना बचने के बाद अब ग्रामीणों ने न्याय मिलने की उम्मीद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का दरवाजा खटखटाया है।
मूलस्थान अग्रहारम के ग्रामीणों ने एनएचआरसी के अध्यक्ष को पत्र लिखकर पूरे मामले की व्याख्या की है। इस पत्र में कहा गया है कि बिना किसी डर के शांतिपूर्वक जीवन जीने के उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया गया है।
पत्र के अनुसार, ग्रामीणों ने कहा है कि उनकी शिकायतों पर विचार ना करने और अपनी शिकायतों के कारण उन्हें निशाना बनाने को नजरअंदाज कर भी दिया जाए तो भी उनके साथ संविधान द्वारा प्रदत्त उनके समानता के अधिकार का हनन किया गया है।
मूलस्थान अग्रहारम के ग्रामीणों द्वारा एनएचआरसी को लिखा गया पत्र (साभार ऑर्गेनाइजर साप्ताहिक )
अपनी अपील में ग्रामीणों ने एनएचआरसी के पुलिस महानिदेशक, आंध्र प्रदेश के मुख्य सचिव, पूर्वी गोदावरी के जिला कलेक्टर, जिला पुलिस अधीक्षक से इस मामले में हस्तक्षेप करने की माँग की है और उनसे इस मामले में जाँच करने और सख्त कानूनी कार्रवाई करने का आग्रह किया है। उन्होंने दलील दी है कि चर्च का निर्माण सार्वजनिक शांति और व्यवस्था के लिए हानिकारक है।
अवलोकन करें:-
About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
सांसद कृष्णम राजू और लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात करते YSRCP प्रतिनिधिमंडल वाईएसआर (YSR) कॉन्ग्रेस के सांसद रघुराम कृष्णम...
कोरोना वायरस की महामारी के दौरान इसाई मिशनरियों द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में अवैध चर्च निर्माण से लेकर धर्मांतरण के कई मामले सामने आए हैं। ऑपइंडिया की ही एक रिपोर्ट में हमने बताया था कि किस प्रकार उत्तराखंड राज्य में भी प्रलोभन देकर और युवाओं को गुमराह कर अनुसूचित जाति के लोगों को निशाना बनाकर उन्हें चर्च निर्माण और धर्मांतरण के लिए उकसाया जाता था है।

तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने निर्भया को मिले न्याय को बताया- बदले की कार्रवाई, एमनेस्टी इंडिया ने कहा- ‘काला दाग’

निर्भय को न्याय मिलने में देरी का कारण लगता है तथाकथित मानवाधिकार और एमनेस्टी के इशारे पर ही फांसी से पूर्व आरोपियों के वकील कोई न कोई बहाना कर कोर्ट का दरवाज़ा खट-खटा कर फांसी टलवाने का प्रयास किया जा रहा था। 
दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 को एक 23 वर्षीय फिजियोथैरेपी की छात्रा निर्भया के साथ हुए सामूहिक बलात्कार एवं हत्या के मामले के चारों दोषियों को शुक्रवार (मार्च 20, 2020) की सुबह साढ़े पाँच बजे फाँसी दे दी गई। इसके साथ ही देश को झकझोर देने वाले, यौन उत्पीड़न के इस भयानक अध्याय का अंत हो गया। दोषी मुकेश सिंह, पवन गुप्ता, विनय शर्मा और अक्षय कुमार सिंह तिहाड़ जेल में फाँसी के फंदे पर लटकाए जाने के बाद चहुँओर न्याय की जीत के जयकारे लग रहे हैं। 
How supposed human rights activists claimed, "moral high ground" to denounce justice to Nirbhaya by classifying it as an act of revenge?
वहीं कुछ स्वघोषित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने दोषियों को मिली मौत की सजा को बदले की कार्रवाई बताया। ऐसे ही जयंत भट्टाचार्य ने निर्भया की माँ आशा देवी पर अपनी बेटी के लिए न्याय माँगने के लिए ‘गंदी मानसिकता’ और ‘खून की लालसा’ रखने का आरोप लगाया।
एक अन्य ट्विटर यूजर प्रकाश शास्त्री ने कहा कि कोई बलात्कारियों को फाँसी की सजा नहीं दे सकता। साथ ही उन्होंने दावा किया कि अगर मृत्युदंड देना बंद नहीं किया जाता है, तो भारत एक ‘प्रतिगामी समाज’ बन जाएगा। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि निर्भया मामले में दोषियों को फाँसी देने से उन्हें यह कहने में खुशी नहीं होगी कि न्याय दिया गया है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का छात्र होने का दावा करने वाले मोहम्मद मोजाहिद के नाम से एक ट्विटर यूजर ने लिखा कि मृत्युदंड ‘पलायनवाद’ और ‘हिंसा की संस्कृति’ का संकेत है।
जस्टिस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए, एमनेस्टी इंडिया, जो चुनिंदा आक्रोश और फेक प्रोपेगेंडा के लिए प्रसिद्ध है, ने दावा किया कि मौत की सजा कभी भी समाधान नहीं हो सकती और शुक्रवार के फाँसी की सजा से कथित तौर पर भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड में ‘एक और काला दाग’ लगा है।
मार्च 19, 2020 को कारवाँ मैगजीन, जो कि अपनी पतित प्रोपेगेंडा के लिए जाना जाता है, ने अपनी लेख में दोषी मुकेश सिंह के लिए सहानुभूति दिखाया था, जबकि असली पीड़िता निर्भया के लिए उसकी लेख में कोई सहानुभूति नहीं थी।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के विवादित जज (रिटायर) कुरियन जोसेफ ने पूछा था कि अगर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के दोषियों को फाँसी दी जाती है तो क्या ये बंद हो जाएगा? उन्होंने कहा कि मृत्युदंड जैसी सजा दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में दिया जाना चाहिए। यानी कि इनके हिसाब से क्रूर गैंगरेप और हत्या दुर्लभ मामला नहीं है।
दुष्कर्म के मामले में आखिरी फॉंसी 14 अगस्त 2004 को धनंजय चटर्जी को अलीपुर सेंट्रल जेल में दी गई थी। वह कोलकाता में 14 साल की छात्रा से दुष्कर्म कर उसकी हत्या करने का दोषी था। इसके बाद 3 आतंकियों अफजल गुरु, अजमल कसाब और याकूब मेनन को सूली पर लटकाया गया था।
अगर हम भारत में मिले मृत्युदंड की संख्या का दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र यानी संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ तुलना करें तो जानकर आश्चर्य होगा कि सिर्फ 2019 में ही वहाँ पर 22 लोगों को फाँसी की सजा दी गई। इसके मुकाबले भारत काफी सावधानी पूर्वक मृत्युदंड के सजा का इस्तेमाल करता है।
हालाँकि, निर्भया के दोषियों के वकील ने अंत तक अपनी कोशिशें जारी रखी। इस कोशिश में पहले हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट में इस फाँसी को टालने की कोशिश की लेकिन वो काम नहीं आई। गुनहगारों को बचाने के लिए उनके वकीलों ने हर दॉंव आजमाया। यहॉं तक कि 19 मार्च की रात भी फॉंसी टालने की हरसंभव कोशिशें हुई।
अवलोकन करें:-
About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
गुमनाम और आजाद जिंदगी जी रहा है निर्भया गैंगरेप का छठा नाबालिग दोषी (फाइल फोटो) 16 दिसंबर 2012 की रात को निर्भया के साथ द....
निर्भया की माँ आशा देवी ने 7 वर्षों तक यह लंबी लड़ाई लड़ी, जो कि आखिरकार दोषियों की फाँसी के साथ समाप्त हुई। इसके साथ ही शुक्रवार की सुबह दोषियों की फाँसी ने समाज को एक कठोर संदेश भी दिया कि इस तरह के अपराधों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

कश्मीर : मस्जिदों से लगते नारे : हमें हिन्दू औरतें चाहिए

कश्मीरी पंडित, नरसंहार
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 रहते हिन्दुओं का किस तरह उपहास, बलात्कार एवं मान-मर्यादा की क्षति हो रही थी, उसे जानने के लिए 30 वर्ष पीछे जाना पड़ेगा। जिसे जनहित की बात करने छद्दम धर्म-निरपेक्ष अपने वोटबैंक की खातिर अनदेखा करते रहे। 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से जिस तरह पत्थरबाजों और आतंकवादियों पर प्रहार हुआ, उससे इन छद्दम धर्म-निरपेक्षों का विचलित होना स्वाभाविक था। शायद इसी कारण सर्जिकल और एयर स्ट्राइक के सबूत मांग अपने वोटबैंक को सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया था। परन्तु हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं की लुटती अस्मिता का किसी ने संज्ञान नहीं लिया। यदि स्थिति विपरीत होती, समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्षों ने हिन्दुओं पर न जाने कितनी दफाएं लगाकर जेलों में सड़ने के लिए फेंक दिया होता। दुनियां भर के मानवाधिकार कश्मीर पहुँच गए होते, लेकिन ये अत्याचार हिन्दुओं पर हो रहे थे, इसलिए किसी ने सुध नहीं ली, बैठे रहे अफीमचियों की तरह। 
शर्म आती हैं, उन हिन्दू नेताओं और कार्यकर्ताओं पर, जो इतना सबकुछ होते हुए भी अपनी पार्टी का विरोध करने का साहस तक नहीं कर पाए, शायद यही कारण है कि कश्मीर में दुष्टों द्वारा हिन्दू अस्मिता को हनन किया जा रहा था। 
अत्याचार के 30 साल    
कश्मीर घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए 19 जनवरी प्रलय का दिन माना जाता है, क्योंकि वर्ष 1990 में हालात बिगड़ने के कारण इसी तारीख में कश्मीरी पंडित समुदाय ने कश्मीर घाटी से पलायन करना शुरू कर दिया था। मई 1990 तक करीब पाँच लाख कश्मीरी पंडित जान बचाने के लिए अपनी मातृभूमि को छोड़ कश्मीर से पलायन कर चुके थे, जो स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा पलायन माना जाता है। इसी के चलते हर वर्ष 19 जनवरी को जहां कहीं भी कश्मीरी पंडित रहते हैं, वहाँ वह इस तारीख को ‘होलोकॉस्ट/एक्सोडस डे’ (प्रलय/बड़ी संख्या में पलायन की तारीख) के तौर पर मनाते हैं।
90 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं पर हुआ हत्याचार एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जिसे चाहकर भी भुला पाना असंभव है। रातों-रात खुद को बचाने के लिए कश्मीर में अपना घर, संपत्ति छोड़कर भागे लोगों के मन में आज भी उस रात की टीस बाकी है, जब उन्होंने इस्लामिक कट्टरपंथी का शिकार होते अपनी आँखों के सामने बर्बरता से अपने लोगों को जिंदा जलते-मरते देखा और जिन्हें इंसाफ की लड़ाई लड़ते-लड़ते 30 साल हो गए।

बीते साल 14 नवंबर 2019 को ऐसी ही अनगिनत कहानियों को अपने दिल में समेट कर भारतीय स्तंभकार सुनंदा वशिष्ठ टॉम लैंटॉस एचआर द्वारा आयोजित यूएस कॉन्ग्रेस की बैठक के लिए वॉशिंगटन डीसी पहुँचीं थीं। हालाँकि वहाँ जाने से पहले ही उन्होंने ट्वीट कर इस बात की जानकारी दे दी थी कि आयोजन में वह सिर्फ़ कश्मीर से जुड़ी उन कहानियों के बारे में बात करने वाली हैं, जिन्हें लोगों ने कभी नहीं सुना होगा या फिर जिन्हें बताने से हमेशा बचा गया। लेकिन जब उन्होंने वहाँ बोलना शुरू किया और कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अत्याचारों की आवाज बनीं… तो मानो जैसे सब सिहर गए।
कश्मीर के हालातों की चश्मदीद, उन्होंने आयोजन में बोलना प्रारंभ किया। इस दौरान घाटी में पसरे इस्लामिक कट्टरपंथ के कारण उन्होंने कश्मीर की तुलना सीरिया से की। उन्होंने 30 साल पहले का समय याद करते हुए कहा कि उन लोगों ने ISIS के स्तर की दहशत और बर्बता कश्मीर में झेली है। इसलिए उन्हें खुशी है कि आज इस तरह मानवाधिकारों की बैठक यहाँ हो रही हैं, क्योंकि जब मेरे जैसों ने अपने घर और अपनी जिंदगी सब गँवा दी थी, तब पूरा विश्व शांत था।
अपना गुस्सा जाहिर करते हुए सुनंदा वशिष्ठ ने लोगों से पूछा कि आखिर तब मानवाधिकार के वकील कहाँ थे, जब हमारे अधिकार हमसे छीने गए।
“कहाँ थे वो लोग जब 19 जनवरी 1990 की रात घाटी के हर मस्जिद से एक ही आवाज आ रही थी कि हमें कश्मीर में हिंदू औरतें चाहिए, लेकिन बिना किसी हिंदू मर्द के।”
उस रात की पीड़ा को जाहिर करते हुए सुनंदा ने आगे पूछा, “इंसानियत के रखवाले उस समय कहाँ थे जब मेरे दादाजी रसोई की चाकू और जंग लगी कुल्हाड़ी लेकर हमें मारने के लिए हमारे सामने केवल इसलिए खड़े थे, ताकि वो हमें उस बर्बरता से बचा सकें, जो जिंदा रहने पर हमारा आगे इंतजार कर रही थी।”
बैठक में उन्होंने बताया था कि उनके लोगों को आतंकियों ने उस रात केवल 3 विकल्प दिए थे। या तो वे कश्मीर छोड़कर भाग जाएँ, या फिर धर्मांतरण कर लें या फिर उसी रात मर जाएँ। सुनंदा वशिष्ठ के अनुसार उस रात करीब 4 लाख कश्मीरी हिंदुओं ने दहशत में आकर अपनी घर- संपत्ति सब जस का तस छोड़ दिया और खुद को बचाने के लिए वहाँ से भाग निकले।
जब इस्लाम न कबूलने पर डेनियल पर्ल का सिर कलम कर दिया था 
कश्मीर पर बात करते हुए उन्होंने उस अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल को भी याद किया, जिसका मजहब इस्लाम न होने के कारण ISIS ने उसका सिर कलम कर दिया था, लेकिन फिर भी उसके आखिरी शब्द थे- “मेरे पिता एक यहूदी थे, मेरी माता एक यहूदी थी और मैं भी एक यहूदी ही हूँ।”
इस दौरान अपनी तुलना डेनियल पर्ल से करते हुए सुनंदा ने उनके आखिरी शब्दों को अपनी स्थिति बयान करने के लिए इस्तेमाल किया और कहा, “मेरे पिता एक कश्मीरी हैं, मेरी माता कश्मीरी हिंदू हैं और मैं भी एक कश्मीरी हिंदू ही हूँ। ”
19 जनवरी नरसंहार, कश्मीरी पंडितजब मस्जिदों से लगे नारे- ज़लज़ला आ गया है कुफ़्र के मैदान में
इस बैठक में आपबीती सुनाते हुए भारतीय स्तंभकार ने दावा किया कि कश्मीर में उनका और उनके लोगों का पूरा जीवन कट्टरपंथ इस्लाम के कारण बर्बाद कर दिया गया। वे इस दौरान गिरिजा टिक्कू जैसी औरतों का भी जिक्र करती नजर आईं, जिनका अपहरण करके क्रूरता के साथ मार दिया। जिनके साथ सामूहिक बलात्कार हुए और जिन्हें टुकड़ों में काटकर फेंक दिया गया। उन्होंने बीके गंजू जैसे लोगों के बारे में भी बात की। जिन्हें अपने पड़ोसियों पर विश्वास करने के बदले सिर्फ़ विश्वासघात मिला। जिन्हें कंटेनर में ही गोली मार दी गई और उनकी पत्नी को खून से सने चावल (वो भी पति के ही खून से सने) खाने को मजबूर किया गया।
सुनंदा द्वारा यूएस कॉन्ग्रेस की बैठक में कही गई इन बातों के लिए उन्हें खूब सराहा गया था। स्वयं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उनके वीडियो को शेयर कर उन्हें शाबाशी दी थी। उन्होंने लिखा था कि ये वो आवाज है, जो सुनी जानी चाहिए।

30 वर्षों से संघर्षरत कश्मीरी पंडित 
देश-दुनिया में बसे विस्थापित कश्मीरी पंडितों के संगठन कश्मीर में वापसी के लिए 30 साल से आंदोलनरत हैं। उन्होंने सरकार से इस दिशा में सकारात्मक क़दम उठाने की माँग की। कश्मीर समिति दिल्ली के अध्यक्ष समीर चंगू का कहना है कि हमारा तो सबकुछ लुट गया। परिवार-रिश्तेदार और पड़ोसी सब। पीड़ा तो थी ही ज़बरदस्त गुस्सा भी था। लेकिन, हम उनकी तरह जवाब नहीं दे सकते थे। हमने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। हमेशा संविधान के दायरे में रहकर ही बात की।
कश्मीरी समिति दिल्ली का इतिहास कश्मीरी सहायक समिति के तौर पर आज़ादी के कुछ साल बाद का है। एमएन कौल और हृदय नाथ कुंजरू भी इससे जुड़े हुए थे। ऑल इंडिया कश्मीरी समाज इसी संगठन से निकला है। संगठन कोशुर समाचार नाम से मासिक पत्रिका भी निकालता है।
19 जनवरी को जनसंहार के विरोध में हर साल जंतर-मंतर पर होलोकॉस्ट डे मनाया जाता है। दिल्ली-एनसीआर के सैकड़ों कश्मीरी पंडित यहाँ जुटते हैं और अपना दर्द बयाँ करते हैं। वह दुनिया को बताते हैं कि आखिर उस रात धरती का जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के साथ कैसा अत्याचार हुआ।
यह स्मरण रहे कि सन ’65 का युद्ध जम्मू कश्मीर राज्य को पूरी तरह पाकिस्तान में मिलाने के उद्देश्य से लड़ा गया था किंतु पाकिस्तान इस उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया था क्योंकि तब तक कश्मीर में पाकिस्तान परस्ती और अलगाववाद का बीज नहीं बोया जा सका था। इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अगस्त 1965 में अमानुल्लाह खान और मकबूल बट ने पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर में ‘नेशनल लिबरेशन फ्रंट’ नामक अलगाववादी आतंकी संगठन बनाया था।
इस संगठन ने जून 1966 में मकबूल बट को ट्रेनिंग देकर नियन्त्रण रेखा के इस पार भेजा। छह सप्ताह बाद ही पुलिस से हुई एक मुठभेड़ में मकबूल बट ने सी० आई० डी० सब इंस्पेक्टर अमर चंद की हत्या कर दी। दो वर्ष बाद अगस्त 1968 में मकबूल बट को तत्कालीन सेशन जज नीलकंठ गंजू ने फाँसी की सजा सुनाई। किन्तु उसी वर्ष दिसम्बर में मकबूल बट अपने एक साथी के साथ जेल तोड़कर नियन्त्रण रेखा के उस पार भाग गया। वह 1976 में लौटा और इस बार उसने कुपवाड़ा में बैंक डकैती का असफल प्रयास किया और पकड़ा गया।
डकैती के प्रयास में उसने बैंक मैनेजर की हत्या की जिसके लिए उसे पुनः फाँसी की सजा हुई। मकबूल बट के पकड़े जाने के बाद उसके साथी आतंकवादी इंग्लैंड चले गये जहाँ उन्होंने 1977 में ‘जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ (JKLF) नामक संगठन बनाया। इसी संगठन से संबद्ध ‘नेशनल लिबरेशन आर्मी’ ने मकबूल बट को जेल से छुड़ाने के लिए फरवरी 1984 में भारतीय उच्चायुक्त रवीन्द्र म्हात्रे का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी। इस घटना के पश्चात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने तत्काल मकबूल बट को तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी थी।
मक़बूल भट को फांसी के बाद बदलता परिवेश 
सन 1984 में जिस दिन मकबूल बट को फाँसी दी गई थी उस दिन कश्मीर घाटी के लोगों पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की स्थापना को अभी एक दशक भी पूरा नहीं हुआ था। इस संगठन को अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते घाटी के लोगों में अपनी पैठ बनाने की आवश्यकता महसूस हुई। मकबूल बट को फाँसी दिए जाने के दो वर्ष पश्चात् सन 1986 में फारुख अब्दुल्लाह को हटाकर गुलाम मोहम्मद शाह जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बनाये गए।
शाह ने अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते हुए जम्मू स्थित न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक प्राचीन मन्दिर परिसर के भीतर मस्जिद बनाने की अनुमति दे दी ताकि मुस्लिम कर्मचारी नमाज पढ़ सकें। इस विचित्र निर्णय के विरुद्ध जम्मू के लोग सड़क पर उतर आये जिसके फलस्वरूप दंगे भड़क गये। अनंतनाग में पंडितों पर भीषण अत्याचार किया गया, उन्हें बेरहमी से मारा गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया और उनकी संपत्ति व मकान तोड़ डाले गये। सन 1987 से जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की गतिविधियों में तेजी आई।
बाद के सालों में अलगाववादियों की दुष्प्रचार मशीनरी ने एक सुनियोजित षड्यंत्र रचकर पंडितों के विरुद्ध वैमनस्य फैलाना प्रारंभ कर दिया। यही कारण था कि जिस मकबूल बट को 1984 में कोई जानता नहीं था फरवरी 1989 में उसका ‘शहादत दिवस’ मनाने के लिए लोग सड़कों पर उतर आये थे। विश्वभर में सलमान रुश्दी की पुस्तक ‘सैटेनिक वर्सेज़’ का विरोध चरम पर था जिसकी आग कश्मीर तक भी पहुँची। परिणामस्वरूप 13 फरवरी को श्रीनगर में दंगे हुए जिसमें कश्मीरी पंडितों को बेरहमी से मारा गया।
पंडित टिकालाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या 
पं० टिकालाल टपलू पेशे से वकील और जम्मू कश्मीर बीजेपी के अध्यक्ष थे। पं० टपलू आरंभ से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे तथा उदारमना व्यक्ति थे। पं० टपलू ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई की थी परंतु पैसे कमाने के लिए उन्होंने इस पेशे का कभी दुरुपयोग नहीं किया। वकालत से वे जो कुछ भी कमाते उसे विधवाओं और उनके बच्चों के कल्याण हेतु दान दे देते थे। उन्होंने कई मुस्लिम लड़कियों की शादियाँ भी करवाई थीं। पूरे हब्बाकदल निर्वाचन क्षेत्र में हिन्दू मुसलमान सभी पं टपलू का सम्मान करते थे तथा उन्हें ‘लाला’ अर्थात बड़ा भाई कह कर सम्बोधित करते थे।
उनकी यह छवि अलगाववादी गुटों की आँखों का काँटा थी क्योंकि पं० टिकालाल टपलू उस समय कश्मीरी पंडितों के सर्वमान्य और सबसे बड़े नेता थे। वास्तव में अलगाववादियों को घाटी में अपनी राजनैतिक पैठ बनाने के लिए कश्मीरी पंडितों के समुदाय को हटाना जरुरी था जो किसी भी कीमत पर पाकिस्तान का समर्थन नहीं करते। इसीलिए जम्मू कश्मीर लिबेरशन फ्रंट ने पंडितों के विरुद्ध दुष्प्रचार के विविध हथकंडे अपनाये। कश्मीर घाटी के कुछ लोकल अखबारों ने पंडित टिकालाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू समेत कई प्रतिष्ठित पंडितों के विरुद्ध दुष्प्रचार सामग्री प्रकाशित करना आरंभ कर दिया था।
आतंकियों ने पं० टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या की रणनीति बनाई। पं० टपलू को आभास हो चुका था कि उनकी हत्या का प्रयास हो सकता है इसीलिए उन्होंने अपने परिवार को सुरक्षित दिल्ली पहुँचा दिया और 8 सितम्बर 1989 को कश्मीर लौट आये। चार दिन बाद चिंक्राल मोहल्ले में स्थित उनके आवास पर हमला किया गया। यह हमला उन्हें सचेत करने के लिए था किंतु वे भागे नहीं और डटे रहे। महज दो दिन बाद 14 सितम्बर को सुबह पं० टिकालाल टपलू अपने आवास से बाहर निकले तो उन्होंने पड़ोसी की बच्ची को रोते हुए देखा। पूछने पर उसकी माँ ने बताया कि स्कूल में कोई फंक्शन है और बच्ची के पास पैसे नहीं हैं।
पं० टपलू ने बच्ची को गोद में उठाया, उसे पाँच रुपये दिए और पुचकार कर चुप करा दिया। इसके बाद उन्होंने सड़क पर कुछ कदम ही आगे बढ़ाये होंगे कि आतंकवादियों ने उनकी छाती कलाशनिकोव की गोलियों से छलनी कर दी। सन 1989-90 के दौरान कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करने पर मजबूर करने के लिए की गयी यह पहली हत्या थी। पंडितों के सर्वमान्य नेता को मार कर अलगाववादियों ने स्पष्ट संकेत दे दिया था कि अब कश्मीर घाटी में ‘निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा’ ही चलेगा।
टिकालाल टपलू की हत्या के बाद काशीनाथ पंडिता ने कश्मीर टाइम्स में एक लेख लिखा और अलगाववादियों से पूछा कि वे आखिर चाहते क्या हैं। अगले दिन इसका जवाब जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने यह लिख कर दिया कि या तो कश्मीरी पंडित भारत राज्य को समर्थन देना बंद करें और अलगाववादी आन्दोलन का साथ दें अथवा कश्मीर छोड़ दें।
पं टपलू की हत्या के मात्र सात सप्ताह बाद जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गयी। सन 1989 तक पं० नीलकंठ गंजू- जिन्होंने मकबूल बट को फांसी की सजा सुनाई थी- हाई कोर्ट के जज बन चुके थे। वे 4 नवंबर 1989 को दिल्ली से लौटे थे और उसी दिन श्रीनगर के हरि सिंह हाई स्ट्रीट मार्केट के समीप स्थित उच्च न्यायालय के पास ही आतंकियों ने उन्हें गोली मार दी थी। इस वारदात से डर कर आसपास के दूकानदार और पुलिसकर्मी भाग खड़े हुए और खून से लथपथ जस्टिस गंजू के पास दो घंटे तक कोई नहीं आया।
कुछ दिनों बाद अमिराकदल के पास स्थानीय लड़के जस्टिस गंजू की हत्या का जश्न मनाते दिखाई दिए। आतंकियों ने जस्टिस गंजू से मकबूल बट की फाँसी का प्रतिशोध लिया था। साथ ही मस्जिदों से लगते नारों ने कश्मीर के लोगों को यह भी बता दिया था कि ‘ज़लज़ला आ गया है कुफ़्र के मैदान में, लो मुजाहिद आ गये हैं मैदान में।’ अर्थात अब अलगाववादियों के अंदर भारतीय न्याय, शासन और दंड प्रणाली का भय नहीं रह गया था।
पं० टिकालाल टपलू और जस्टिस गंजू की हत्या के बाद भी कई कश्मीरी पंडितों को मारा गया परन्तु तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्लाह कोरा दिलासा मात्र देते रहे और मार्तण्ड सूर्य मन्दिर के भग्नावशेष पर सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते रहे।
मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया का कथित अपहरण 
दिसंबर 8, 1989 को मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के बाद पंद्रह दिनों तक ड्रामा चला था जिसके बाद वी पी सिंह सरकार द्वारा अब्दुल हमीद शेख़, शेर खान, नूर मोहम्मद कलवल, अल्ताफ अहमद और जावेद अहमद जरगर नामक आतंकियों को जेल से छोड़ा गया था। चौदह साल बाद जेकेएलएफ के जावेद मीर ने रुबैया सईद के अपहरण की बात कबूल की थी।अगले साल जनवरी 25 जनवरी 1990 को जेकेएलएफ ने भारतीय वायु सेना के पाँच अधिकारियों की हत्या कर दी थी। खुद यासीन मलिक ने भी बीबीसी को दिए इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि उसने ड्यूटी पर जा रहे 40 वायुसैनिकों पर गोलियाँ चलाई थीं। यासीन मलिक और जेकेएलएफ को आज भी उनके किए की सज़ा नहीं मिल पाई है। हाँ, आज यह खबर आई कि सीबीआई ने वो केस फिर से खोला है।

बलात्कारियों को 21 दिनों में हो फांसी, 11 दिसंबर को आंध्र प्रदेश सरकार लाएगी इसके लिए बिल

Hyderabad Encounter को लेकर जगन मोहन रेड्डी ने मुख्यमंत्री KCR की तारीफ की, कही यह बात...
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आंध्रप्रदेश की जगनमोहन रेड्डी सरकार एक बिल लाने की तैयारी में है, जिसमें बलात्कार (Rape) के दोषियों को 21 दिनों में फांसी की सजा दिए जाने का प्रावधान है। सूत्रों के मुताबिक सरकार 11 दिसंबर को इस बिल को राज्य विधानसभा में पेश कर सकती है
इससे पहले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस जगनमोहन रेड्डी हैदराबाद की पशुचिकित्सक के साथ सामूहिक बलात्कार (Gang Rape) और उसकी हत्या के चार आरोपियों के कथित मुठभेड़ में मारे जाने को लेकर भी तेलंगाना के अपने समकक्ष के चंद्रशेखर राव और तेलंगाना पुलिस की प्रशंसा कर चुके हैं
हैदराबाद गैंगरेप के बाद जगनमोहन रेड्डी ने कड़ा कानून लाने की कही थी बात
जगनमोहन रेड्डी ने यह भी घोषणा की कि उनकी सरकार महिलाओं के विरूद्ध अत्याचार के मामलों की त्वरित सुनवाई और उपयुक्त सजा सुनिश्चित करने के लिए कड़ा कानून बनाने के लिए विधानसभा के वर्तमान सत्र में एक विधेयक लाएगी

उन्होंने विधानसभा में अपने भावुक भाषण में ऐसे कठोर कानूनों की वकालत की जो महिलाओं के खिलाफ अपराध (Crime Against Women) से जुड़े मामलों की शीघ्र सुनवाई और मिसाल दिये जाने योग्य सजा सुनिश्चित करेगी
एनकाउंटर के बाद जगन ने कहा था- KCR और तेलंगाना पुलिस अधिकारियों को मेरा सलाम
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने महिला पशु चिकित्सक से गैंगरेप और हत्या के चार आरोपियों के कथित एनकाउंटर (Hyderabad Encounter) में मारे जाने को लेकर तेलंगाना के अपने समकक्ष के चंद्रशेखर राव (KCR) और पुलिस की प्रशंसा की

जगन ने कहा था, 'दो बेटियों का पिता होने के नाते इस घटना से मुझे बहुत पीड़ा हुई। पिता के तौर पर मुझे ऐसी घटनाओं पर क्या प्रतिक्रिया देनी चाहिए? किस तरह की सजा अभिभावक (Guardian) को राहत देगी। हमें उसके बारे में सोचना चाहिए।'
उन्होंने कहा, 'घटना हुई। मीडिया ने दिखाया कि गलत हुआ। बाद में तेलंगाना सरकार ने जवाब दिया। KCR और तेलंगाना के पुलिस अधिकारियों को मेरा सलाम।'
जगनमोहन ने मानवाधिकार की बात करने वालों पर भी साधा था निशाना
जगनमोहन रेड्डी ने मानवाधिकार का शोर मचाने वालों को निशाने पर लेते हुए कहा, 'जब किसी फिल्म में नायक मुठभेड़ में किसी को मारता है तो हम सभी तालिया बजाते हैं और कहते हैं कि फिल्म अच्छी है।' उन्होंने कहा, '(लेकिन) यदि कोई साहसिक व्यक्ति असल जिंदगी में वही करता है.... तो कोई राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नाम पर दिल्ली से आएगा। वह कहेगा कि यह गलत है, ऐसा नहीं होना चाहिए।वह सवाल उठाता है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया।' उन्होंने कहा, 'हम देखते हैं कि ऐसे सवाल उठ रहे हैं। हमारे कानून ऐसी दयनीय दशा में हैं।' 

हमेशा मानवाधिकार पीड़ित और उसके परिवार की मान-मर्यादा को दरकिनार कर आरोपी के ही पक्ष में क्यों खड़ा होता है? क्या पीड़ित का कोई मानवाधिकार नहीं? सभी को मानवाधिकार के विरुद्ध आवाज़ बुलंद कर इसी के अस्तित्व को नकारना होगा। (एजेंसीज इनपुट्स) 

मानवाधिकार पर कश्मीर पर आज फिर पिटेगा पाकिस्तान

Related imageसंयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार परिषद यानी यूएनएचआरसी (UNHRC) की बैठक में पाकिस्‍तान, जम्‍मू-कश्‍मीर का मुद्दा उठा सकता है. जेनेवा में आयोजित यूएनएचआरसी के 42वें सत्र में भारत और पाकिस्‍तान दोनों को ही मंगलवार को अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा. हालां‍कि UNHRC में कश्मीर मुद्दा उठाने पर भारत भी पाकिस्तान पर पलटवार करेगा. पाकिस्तान के जवाब में भारत PoK में मानवाधिकार हनन का मुद्दा उठाएगा. भारत, पाकिस्तान के सिंध-बलूचिस्‍तान में सेना के दमन का मुद्दा भी उठाएगा. भारत PoK में पाकिस्तानी सेना के अत्याचार को उजागर कर सकता है. बलूचिस्तान, गिलगित, खैबर पख्तूनख्वा में मानवाधिकार उल्लंघन का जिक्र संभव है. हिंदू, सिख पर हो रहे जुल्म का भी जिक्र किया जा सकता है.
Image result for violence in pok
जेनेवा में राजनयिक अजय बिसारिया के साथ एक प्रतिनिधिमंडल लगातार इस सिलसिले में सदस्य देशों से मुलाकात कर रहा है. यूरोप, अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका के देशों से बातचीत हो रही है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के कुल 47 सदस्य हैं.
दरअसल पाकिस्तान, कश्‍मीर मुद्दे पर बहस या प्रस्ताव के लिए कह सकता है. लेकिन भारत की दमदार कूटनीति के कारण अमेरिका, फ्रांस और रूस के समर्थन मिलने की संभावना बेहद कम है. चीन भी पाकिस्तान का पुरजोर समर्थन नहीं कर पाएगा. हांगकांग में मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में चीन खुद फंसा है. चीन खुद नहीं चाहेगा कि मामला वोटिंग तक पहुंचे.
Image result for violence in pok
कश्‍मीर की हकीकत
वैसे भारत ने UNHRC के सेशन से पहले दुनिया को कश्मीर की हक़ीक़त बताई. जम्‍मू-कश्‍मीर में आर्टिकल 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर के हालात दुनिया को बताया. जम्मू-कश्मीर में 100% टेलीफोन सर्विस बहाल हो चुकी है. ज़्यादातर इलाकों में मोबाइल सर्विस भी बहाल हो गया है. 10वीं तक सभी स्कूल खुले, परीक्षाओं की तैयारी जारी है. 92% इलाकों में आने-जाने पर कोई पाबंदी नहीं है. हज यात्रा जारी, 10 हज़ार से ज़्यादा यात्री जल्द लौटेंगे. 10,281 ट्रकों के जरिए 1.67 लाख मीट्रिक टन सेब की ढुलाई हुई. जम्मू-कश्मीर में बैंकिंग और एटीएम सेवा भी सामान्य है. दफ्तरों में कर्मचारी लगातार आ रहे हैं. सरकारी कामकाज में कोई दिक्कत नहीं है.

पाकिस्‍तान में हिंदू-सिख महफूज नहीं
कश्‍मीर में मानवाधिकारों के उल्‍लंघन का आरोप लगाने वाले पाकिस्‍तान में खुद अल्‍पसंख्‍यकों के अधिकारों का किस कदर हनन हो रहा है, इसका खुलासा खुद पाक प्रधानमंत्री इमरान खान के विधायक ने किया है. इमरान खान की पार्टी पीटीआई के पूर्व विधायक बलदेव कुमार ने पाकिस्‍तान में अल्‍पसंख्‍यकों पर हो रहे अत्‍याचारों के चलते भारत में शरण मांगी है. वह इस वक्‍त अपने परिवार के साथ पंजाब आए हुए हैं.

बलदेव कुमार पख्तूनख्वां की बारीकोट सीट से विधायक रहे हैं. 43 वर्षीय पूर्व विधायक अब अपने परिवार के साथ पाकिस्‍तान नहीं लौटना चाहते हैं. उनका कहना है कि पाकिस्‍तान में हिंदू-सिख महफूज नहीं हैं. वहां उन पर अत्‍याचार होते हैं. उनकी हत्‍याएं हो रही हैं. उनका यह भी कहना है कि इमरान के पीएम बनने के बाद अल्‍पसंख्‍यकों पर जुल्‍म बढ़ा है.

कश्मीर की मस्जिद में आतंकियों ने तंज़ीम के नाम पर धन जमा किया

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कश्मीर में मस्जिदों का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए होना नई बात नहीं है लेकिन अब यहां खुले तौर पर आतंकवादी मस्जिद में भारत के खिलाफ जहरीले भाषण देकर युवाओं को चरमपंथ एवं हिंसा के लिए उकसा रहे हैं। यह स्थिति उस समय है, जब आर्मी ने वहां आतंकवादियों के विरुद्ध "all out operation" चलाया हुआ है। 
कुलगाम की एक मस्जिद का एक ऐसा ही वीडियो सामने आया है जिसमें लश्कर ए-तैयबा के दो आतंकवादी मस्जिद में दाखिल होकर वहां लोगों को भारत के खिलाफ उकसाते हैं। इनमें से एक आतंकवादी को खुले में पिस्टल लहराते और भारत विरोधी बातें करते हुए देखा जा सकता है। यह वीडियो ईद के दिन का बताया जा रहा है। 
मस्जिद में दाखिल हुए दोनों आतंकवादी पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाते और युवकों को आतंकवाद के रास्ते पर चलने के लिए उकसाते नजर आए हैं। दोनों आतंकियों ने तंजीम के नाम पर वहां मौजूद लोगों से दान करने के लिए भी कहा। आतंकियों ने कहा कि वे कश्मीर की आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने धर्म को जिहाद और राजनीति से जोड़कर वहां मौजूद लोगों का ब्रेन वाश किया।  
यह वीडियो चिंतित करने वाला है क्योंकि इस तरह का चलन पाकिस्तान में देखा जाता है जहां आतंकवादी खुले तौर पर जिहाद के लिए फंड इकट्ठा करते हैं। घाटी में घृणा फैलाने वाले लोग अब तक अपनी चरमपंथी विचारों के लिए मस्जिदों का इस्तेमाल करते आ रहे थे लेकिन अब आतंकवादी मस्जिदों में बेरोक-टोक दाखिल हो रहे हैं और तंजीम के नाम पर फंड इकट्ठा करने लगे हैं। यह बेहद चिंता की बात है।

View image on TwitterView image on TwitterView image on TwitterView image on Twitter

Jammu and Kashmir: Stones pelted at security forces near Jamia Masjid in Srinagar; and posters supporting terrorist Zakir Musa and UN designated terrorist Masood Azhar seen in the area.
11:37 AM - Jun 5, 2019 
सेना के ऑपरेशन 'ऑल आउट' में बड़ी संख्या में आतंकवाद मारे गए हैं। आतंकियों की कमर टूट चुकी है। हाल ही में सुरक्षाबलों ने लश्कर के आतंकी जाकिर मूसा को भी ढेर कर दिया। अपने कमांडरों के मारे जाने के बाद आतंकी हताश हो गए हैं। घाटी में पत्थरबाजी और भारत विरोधी गतिविधियों के लिए युवाओं को उकसाने वाले ज्यादातर अलगाववादी या तो नजरबंद हैं या हिरासत में हैं। आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस की नीति जारी रखते हुए सेना ने साफ कर दिया है कि जो भी आतंक के रास्ते पर चलेगा उसे बख्शा नहीं जाएगा। 
अवलोकन करें:-
About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आसिया अंद्राबी | तस्वीर साभार: BCCL भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के केन्द्रीय गृह मंत्री बनने के बाद से कश्मीर ...

ईद के पावन अवसर पर नमाज़ के बाद पत्थरबाज़ी करना इस बात को सिद्ध करता है कि कश्मीर में अभी भी आतंकवादियों का जमावड़ा है। देखना यह भी है कि इनमें पाकिस्तानी कितने हैं और पाकिस्तान समर्थक कश्मीरी कितने, आखिरकार, आतंकवादी आतंकवादी ही होता है। नमाज़ के बाद हुई पत्थरबाज़ी पर न किसी मानवाधिकार ने आलोचना कर, ऐसे तत्वों पर सख्त कार्यवाही की माँग की, और न ही कोई #not in my name, #moblynching, #intolerance, #award vapsi, #metoo आदि गैंग ने। किसी भी छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेता ने भर्त्सना तक नहीं की। इन सबका चुप्पी साधना प्रमाणित करता है कि ये सब देश के टुकड़े-टुकड़े करने वालों के संरक्षक हैं। आज तक किसी ने यह तक प्रश्न नहीं किया कि "कश्मीर की आज़ादी माँगने वाले आखिर अपना मुँह ढक कर क्यों पत्थरबाज़ी करते हैं? ये पत्थरबाज कोई और नहीं आतंकवाद ही है, इन पत्थरबाजों पर पत्थरबाज़ी करने पर उसी भाँति कार्यवाही होनी चाहिए जिस तरह प्रमाणित आतंकवादियों पर की जाती है। और जब इन पत्थरबाजों पर कोई कठोर कार्यवाही होने की स्थिति में इनके माँ-बाप सरकार से रहम की भीख माँगते नज़र आएंगे। इनके संरक्षक आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खुलवाएँगे।      

आतंकी को मारने के बाद आर्मी जवान ने उसकी लाश को सड़क पर घसीटा, भड़के मानवाधिकार कार्यकर्ता

13 सितंबर को भारतीय सेना ने जैश-ए-मोहम्मद के एक आतंकी को मार गिराया और उसे सड़क पर घसीटते हुए ले गए। इसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। कश्मीर घाटी में मानवाधिकार की आवाज उठाने वाले खुर्रम परवेज ने ट्वीट किया कि यह भारतीय सेना के मानवाधिकार का सबूत है। वहीं कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार अहमद अली फय्याज का कहना है कि कोई कानून, कोई इंटरनेशनल प्रोटोकॉल यह अनुमति नहीं देता कि आतंकियों के शव के साथ ऐसा बर्ताव किया जाए। वहीं नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने भी सेना की इस कवायद को बर्बर करार दिया जा रहा है। वहीं सोशल मीडिया यूजर्स इस पर भड़क गए हैं, एक यूजर ने पूछा- '...तो क्या आतंकियों पर फूल बरसाएं?'
आर्मी की इस कार्यवाही पर सियापा करने वाले जवाब दें कि जब आतंकवादी सुरक्षाकर्मियों को मार रहे थे, जनजीवन को डर से साए में जीने को विवश कर रहे थे, क्या वह देशहित में था? भारत कहे जाने वाले स्वर्ग की क्या हालत कर दी हैं, इन दहशतगर्दों ने , यह नहीं दिखता किसी को? फिर जब यही लोग कहते हैं कि आतंकवाद का कोई मजहब/धर्म नहीं होता, फिर किस आधार पर सियापा किया जा रहा है? और जहाँ तक मानवाधिकार की बात है, ऐसे संस्थानों को तो प्रतिबन्धित करना ही देशहित में हैं, क्योकि इन्हे आतंकवादी के मारे जाने पर ही दर्द होता है, आतंकवादियों की बर्बरता पर दर्द नहीं होता। पत्थरबाजों का कभी विरोध नहीं किया, मुँह से एक शब्द नहीं निकला, लेकिन आर्मी ने एक पत्थरबाज को जीप से बांध लिया, मानवाधिकार का हनन हो गया, क्या इस दोगलेपन को मानवाधिकार कहते हैं? ऐसे मुद्दे पर सुरक्षाकर्मियों को चर्चित लेखक तारिक फ़तेह की सलाह को मान कूड़े के ढेर पर जलाना शुरू करने पर परदे के पीछे आतंकवाद के शुभचिंतक और मानवाधिकार वालों को रोटी खानी और सोना भी हराम हो जाएगा। 
एनकाउंटर में 12 जवान हुए थे जख्मी
13 सितंबर को सेना ने जम्मू के धिहिटी गांव में सात घंटे चले मुठभेड़ के बाद जैश-ए-मोहम्मद के तीन आतंकियों को मार गिराया था। इस कार्रवाई में 3 सैन्य अधिकारियों समेत 12 सुरक्षाकर्मी जख्मी हुए थे। ये आतंकी सांबा सेक्टर से भारतीय सीमा में घुसे थे। तीनों आतंकियों के शव मिलने के बाद अभियान खत्म हो गया था। उसी वक्त की एक फोटो वायरल हो रही है, जिसमें जवान एक मृत आतंकी को रस्सियों से बांधकर सड़क पर घसीटते हुए ले जा रहे हैं। अब इस बात के लिए सेना की आलोचना हो रही है कि उन्होंने शव का अपमान किया।
पॉलिटिकल पार्टीज ने क्या कहा?
नेशनल कॉन्फ्रेंस के अली मोहम्मद सागर- 'यह ठीक नहीं है, अच्छा नहीं है... जब इंसान इस दुनिया से जाता है तो फिर उसके साथ ऐसा करना अच्छी बात नहीं है। मरने के बाद फिर चाहे दुश्मन ही क्यों ना हो उसका भी आदर किया जाना चाहिए, हर मजहब यही सिखाता है।'
PDP के रफी मीर- 'कानून का तकाजा अपील का तकाजा और इंसानियत का यह तकाजा है कि कोई मर गया तो उसके बाद उसे घसीटना उस को तकलीफ देना जहालत है और इंसानियत के खिलाफ है मुझे लगता है ऐसा नहीं होना चाहिए।'
कांग्रेस के राशिद अल्वी- 'जिस आतंकी को गोली मार दी उसका तो अंजाम हो गया उसे तो सजा मिल गई वहां तो फुलस्टॉप लग जाता है। अब तो वह सिर्फ लाश रह गया है उसके साथ कुछ करेंगे तो तकलीफ उसे नहीं होगी उसके घर के लोगों को तकलीफ होगी।'
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र रैना- 'मानवाधिकार के नाम पर शोरशराबा मचाने वाले कुछ लोगों के खून में गद्दारी भरी हुई है। यह गद्दार और बेईमान लोग हैं। उन्हें ये पता नहीं है कि ऐसा करना सेना के नियमों में शामिल है।'