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रघुवंश प्रसाद सिंह ने लालू यादव को भेजा इस्तीफा

रघुवंश प्रसाद सिंह का इस्तीफा
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरजेडी को बड़ा झटका लगा है। पार्टी के पूर्व उपाध्यक्ष और लालू यादव के बाद पार्टी की नींव कहे जाने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। दिल्ली एम्स में इलाज करा रहे रघुवंश प्रसाद पार्टी के उपाध्यक्ष पद से पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं। इस्तीफे की चिट्ठी रघुवंश प्रसाद ने लालू यादव को संबोधित करते हुए लिखी जिसमें उन्होंने कहा कि जननायक कर्पूरी ठाकुर के बाद 32 वर्षो तक आपके पीछे खड़ा रहा लेकिन अब नहीं। पार्टी, नेता, कार्यकर्ता और आमजन ने बड़ा स्नेह दिया, लेकिन मुझे क्षमा करें।
बिहार की राजनीति पर बारीकी से नजर रखने वाले नेता बताते हैं कि रघुवंश वैशाली से लोक जनशक्ति पार्टी के सांसद रहे रामा सिंह की आरजेडी में एंट्री से नाराज हैं। रामा सिंह को लेकर रघुवंश को बहुत मनाने की कोशिश की गई लेकिन रघुवंश नहीं माने और परिणाम इस्तीफे के रूप में सामने आया है। रघुवंश प्रसाद सिंह और रामा सिंह राजनीति में कट्टर प्रतिद्वंदी माने जाते हैं। रघुवंश प्रसाद सिंह का आरजेडी से जाना पार्टी के लिए बड़ी क्षति के रूप में देखा जा रहा है कि क्योंकि लालू यादव के बाद पार्टी में उनकी छवि पार्टी के अभिभावक के तौर पर रही है।
रघुवंश प्रसाद सिंह को नाराज करके भी रामा सिंह को पार्टी में शामिल करने को लेकर तेजस्वी यादव इसलिए अड़े हुए हैं क्योंकि तेजस्वी यादव ने वैशाली जिले के राघोपुर विधानसभा सीट से पिछला विधानसभा चुनाव लड़ा था और इस बार भी इस सीट से जीत पक्की करने के लिए तेजस्वी रामा सिंह को पार्टी में लाना चाहते हैं। रामा सिंह और रघुवंश प्रसाद के बीच के विवाद को देखते हुए लालू यादव ने उनके पार्टी में शामिल होने पर रोक लगा दी थी। इसी बीच लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने भी रघुवंश प्रसाद सिंह के खिलाफ जमकर बयानबाजी करते हुए राष्ट्रीय जनता दल को समंदर और रघुवंश प्रसाद सिंह को एक लोटा पानी बता दिया। तेज प्रताप यादव के इस बयान से नाराज होकर लालू प्रसाद ने उन्हें 2 दिन पहले रांची तलब किया और जानकारी के मुताबिक उनकी जमकर क्लास भी लगाई थी।

प्रियंका वाड्रा ने फिर से देश को पप्पू बनाया, मोदी विरोध में रेलवे का नया नामकरण कर दिया

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आज मोदी और योगी विरोधियों की हालत इतनी पतली हो गयी है कि अर्थ का अनर्थ करने को तुले हुए हैं।  
सोनिया, प्रियंका और राहुल को कम से कम इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में विपक्ष की भूमिका निभाते सत्तारूढ़ इंदिरा के दिल-ओ-दिमाग में ऐसी जगह बनायी की विषम परिस्थितियों में विपक्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी से जरूर परामर्श करती थी। लेकिन इंदिरा गाँधी और पी.वी.नरसिम्हा राव के बाद से कांग्रेस से राजनीतिक दृष्टि लुप्त होती चली गयी। जिस कारण विपक्ष में आते-आते कांग्रेस में कोई ऐसा नेता नहीं, जिससे सत्तारूढ़ भाजपा के नरेंद्र मोदी विषम परिस्थितियों में किसी भी विपक्षी पार्टी से परामर्श कर सके। 
जिसे देखो दुश्मन देश से गुप्त मंत्रणा कर जनता को मूर्ख बनाकर, मोदी पर एक के बाद दूसरा प्रहार करने से नहीं चूक रहे। कोई मोदी को हराने पाकिस्तान जा रहा है, कोई चीन, क्या ये लोग संविधान की शपथ लेकर संविधान के विरुद्ध काम कर संविधान को अपमानित नहीं कर रहे, क्यों ऐसे नेताओं को मान-सम्मान दिया जाए, यह निर्णय जनता को करना है। भारत के गौरवमयी वास्तविक इतिहास को धूमिल करने वाले भी ये ही लोग हैं। 
लोकतंत्र है विरोध करें या समर्थन ये उनका अपना हक है पर मोदी का विरोध करके आप समर्थन किसका कर रहे हो? ये बडा गंभीर सवाल है इसलिए निर्णय भी गंभीरता पूर्वक ही होना चाहिए। 
इनकी राजनीति नहीं बल्कि सियासत का नमूना देखिए:

क्या मुलायम, लालू, मायावती, सोनिया, राहुल, केजरीवाल, ममता बनर्जी, वामपंथी ये सब क्या नरेन्द्र मोदी से बेहतर है? या इनका रिकॉर्ड बेहतर?
क्या नरेन्द्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्रीकाल की तुलना मे ममता बनर्जी, अखिलेश आदि बेहतर नजर आता है? तुलना करनी है तो देखिए :
राजनीति मे प्रवेश के समय लालू और मुलायम,
दोनों के घर की ऐसी स्थिति थी की, 1 के घर पर साइकिल और एक के घर पर लालटेन खरीदने तक के पैसे नहीं थे, जाति के नाम पर चलने वाले नेता, आज अरबपति है। 
रामगोपाल चार्टर्ड प्लेन में घूमता है, तो शिवपाल महँगी ऑडी मे कहाँ से आया इतना अकुत धन? क्या ये लोग नरेन्द्र मोदी और योगी से बेहतर है ?
* सोनिया के बेटा-बेटी और दामाद आज सभी अरबपति है, 10 साल का  इनका राज हाल में ही  बीता है, क्या ये नरेन्द्र मोदी और योगी से बेहतर है?
* 35 साल बंगाल में राज करने वाले वामपंथी, नरेन्द्र मोदी से बेहतर है ?
* 5 साल केजरीवाल, 5 साल केजरीवाल, का विज्ञापन चलाकर दिल्ली के लोगों को चुना लगाने वाला, WIFI, CCTV, 150 कॉलेज, 500 स्कूल, मजहब देखकर सियासत करने वाला क्या ये नरेंद्र मोदी और योगी से बेहतर है?
* जब मायावती राजनीती करने निकली थी, और कांशीराम की साथी थी, तब उसके घर में दिया जलाने का धन नहीं था, साईकल से प्रचार करती थी, आज उसका सैंडल भी प्लेन से आता है, उसके भाई के पास 497 कंपनिया है, क्या मायावती नरेंद्र मोदी और योगी से बेहतर है?
Image may contain: 4 people, text that says 'दादी की नाक के दम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाली प्रियंका का दोगलापन भाजपा सरकार में गैंगस्टर विकास दुबे मारा गया कांग्रेस सरकार में जहरीली शराब पीने से 120 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई जिन कांग्रेसी सांसदों ने अपनी सरकार पर सवाल उठाए, उन्हें पार्टी से निकालने की तैयारी शुरु कर दी प्रियंका गांधी ने उसकी मौत पर घटिया राजनीति शुरु कर दी लेकिन प्रियंका के मुंह से एक शब्द नहीं फूटा'मोदी और योगी का विरोध करने वालो, विरोध करो, पर समर्थन किसका करना है ये तो तय करो। 
थोड़ा देश का भी सोचो, कितना बर्बाद करवाना है, कितना लूटवाना है? अरे बाहर निकलो जातियो के बंधनो से इसे उबारकर ये लूटेरे जनता को ही लूटते है। 
कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा सियासत चमकाने का कोई मौका नहीं चूकती। लेकिन इस कोशिश में वह देश को पप्पू बनाने से भी बाज नहीं आती है। जिस तरह से इनके जुमले आ रहे हैं, निश्चित रूप से राहुल गाँधी को बहुत पीछे छोड़ बची-कुची कांग्रेस को एकदम हाशिये से भी नीचे लाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगी। इस दृष्टि से परिवार गुलाम ठीक काम कर रहे हैं कि अध्यक्ष परिवार का ही सदस्य रहेगा, चाहे कांग्रेस गड्ढे में ही क्यों न चली जाए। वैसे गद्दे में जाने से ज्यादा दूर नहीं। 
आज फिर प्रियंका वाड्रा ने ऐसा कुछ किया, जिससे उनके चमचे कुछ ज्यादा ही उछलने लगे। दरअसल मैडम वाड्रा ने अटके हुए रिजल्ट और परीक्षाओं को लेकर केंद्र पर निशाना साधा। इस दौरान उन्होंने एक ट्वीट किया, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में रेलवे का नया नामकरण कर दिया।
वाड्रा ने जुमले से बनाया पप्पू
प्रियंका वाड्रा ने कर्मचारी चयन आयोग की सीजीएल परीक्षा के परिणाम घोषित करने और रेलवे की परीक्षा को लेकर छात्रों की मांग का समर्थन करते हुए ट्वीट किया। प्रियंका ने अपने ट्वीट में लिखा, “SSC और रेलवे ने कई सारी परीक्षाओं के परिणाम सालों से रोक कर रखे हैं। किसी का रिजल्ट अटका हुआ है, किसी की परीक्षा। कब तक सरकार युवाओं के धैर्य की परीक्षा लेगी, कब तक? युवाओं की बात सुनिए सरकार। युवा को भाषण नहीं नौकरी चाहिए।
रेलवे का नामकरण ‘SSCRaliwaystudents’

इस ट्वीट के साथ मैडम वाड्रा ने #speakupforSSCRaliwaystudents शेयर किया। इसमें रेलवे का एक नया नाम ‘SSCRaliwaystudents’ दिया गया है। इस नाम के सामने आते ही सोशल मीड‍िया पर कांग्रेस के चमचे उछलने लगे। कांग्रेस के जो चमचे कल तक कोरोना काल में JEE और NEET की परीक्षा आयोजित करने का विरोध कर रहे थे, वे अचानक रेलवे की परीक्षा को लेकर सोशल मीडिया में सक्रिय हो गए। 
प्रियंका के इस ट्वीट पर ट्विटर पर भी बहार आ गयी:





इससे पूर्व, ट्विटर पर आज प्रियंका का #SpeakUpForStudentSaftey ट्रेंड होता देख पूरी दुनिया हैरान-परेशान हो गई कि आखिर ये कौन सा शब्द है। यूजर्स ने पता लगाने की कोशिश कि ये ट्रेंड कहां से हो रहा है तो पता चला कि ये तो वाड्रा भौजी है। असल में नीट और जेईई परीक्षाओं को लेकर राबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक ट्वीट किया। प्रियंका ने ट्वीट के साथ हैशटैग SpeakUpForStudentSaftey इस्तेमाल किया। प्रियंका वाड्रा ने गलत अंग्रेजी लिखकर #SpeakUpForStudentSaftey को ट्रेंड करा पूरे भारतीयों को पप्पू बनाने की किस तरह कोशिश की आप भी देखिए- 



दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगे : जकात के फंड से भड़काए दंगे: जामिया के मीरान हैदर का कबूलनामा

मीरान हैदरजामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्र मीरान हैदर ने दिल्ली में फरवरी में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के सिलसिले में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। हैदर लालू यादव की पार्टी राजद के युवा विंग की दिल्ली इकाई का अध्यक्ष भी है। उसे दिल्ली पुलिस ने दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया था।
जी न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार, हैदर ने जाँचकर्ताओं को बताया है कि जामिया हिंसा के बाद पूर्वोत्तर दिल्ली में सांप्रदायिक दंगों की योजना बनाई गई थी। उसने पुलिस को बताया कि केंद्र सरकार के अनुच्छेद 370 हटाने, सुप्रीम कोर्ट द्वारा बाबरी मस्जिद के फैसले और फिर CAA के लागू होने से उसके मन में गुस्सा और नफरत भर गया था और उसने सरकार के खिलाफ मुसलमानों को एकजुट करने के बारे में सोचा।
अनुच्छेद 370, CAA और बाबरी का गुस्सा 
जरूरत पड़ने पर उसने केंद्र के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों के लिए तैयार रहने का भी आह्वान किया। आरोपित मीरान हैदर ने पुलिस को बताया कि वह खुद सभी राज्यों में सहायता जुटाने और सीएए-एनआरसी के खिलाफ लोगों को उकसाने के लिए गया था।
मीरान हैदर के अनुसार, दिसंबर 15, 2019 को JCC (जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी) का गठन किया गया। फिर इसी JCC के नाम से ही व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया गया, जिस पर आगे की प्लानिंग होने लगी। इसी ग्रुप में AAJMI ( Allumani Association of Jamia Milliya islamaiya) और कई छात्र संगठन भी शामिल थे।
मीरान हैदर ने दिल्ली पुलिस को बताया था कि जामिया विश्वविद्यालय के परिसर में भड़की हिंसा के बाद दंगों को लेकर साजिश रची गई थी। मीरान को दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन और दंगों के लिए भीड़ इकट्ठा करने के साथ ही अन्य व्यवस्थाओं की देखरेख करने का काम सौंपा गया था।
मुस्लिम बहुल क्षेत्र को चुना 
उसने खुलासा किया कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) ने दिल्ली में सांप्रदायिक दंगों के लिए फंड उपलब्ध कराया था। हैदर ने खुद दंगों के लिए लगभग 5 लाख रूपए इकट्ठा किए थे। हैदर ने दिल्ली पुलिस को बताया कि दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाकों जाफराबाद और सीलमपुर को पहले दंगों के लिए चुना गया था, जिसके लिए मीरान और अन्य लोगों ने चाकू, पेट्रोल और पत्थर आदि इकट्ठा किए थे।
मीरान हैदर, जिसे UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था और न्यायिक हिरासत में है, ने दंगों से पहले एक रजिस्टर तैयार किया था, जिसमें उसने इस उद्देश्य के लिए एकत्रित किए जा रहे सभी फंड्स का रिकॉर्ड रखा था।
मीरान हैदर के मुताबिक दिल्ली में दंगा करवाने के लिए सबसे पहले दिल्ली के नॉर्थ-ईस्ट सीलमपुर और जाफराबाद को ही चुना गया था, क्योंकि मुस्लिम बाहुल्य इलाके में ऐसी गतिविधियाँ चलाना उन्हे ज्यादा आसान लगा। खुद हैदर ने लोगों से चाकू, पेट्रोल और पत्थर इकठ्टा करने के लिए कहा था।
जकात के धन से किए दिल्ली में दंगे 
फंड्स की मदद से उसके निर्देश पर गैजेट्स खरीदे गए। हैदर ने बताया कि ‘ज़कात’ के रूप में जुटाए गए धन का उपयोग उसने पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए दंगों के लिए किया गया था। 
जकात से इकट्ठे किए धन से उपद्रव मचाने से एक बात उजागर हो रही है कि 'जकात सुंनते थे कि गरीब, असहाय और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को दिया है, लेकिन अब यह भ्र्म भी दूर हो गया और मालूम हुआ कि इसका उपयोग देश में अराजकता फ़ैलाने के लिए भी होता है।' इसका मतलब है कि गरीब और मजलूम कहे जाने वालों का दिमाग कितना शातिर है। आरोप सिद्ध हो रहे हैं मीरान हैदर के बयान से। अब देखना यह भी होगा कि जकात देने वालों ने तो जकात दे दी, और जेबों में कितना गया, यह जकात जमा करने वालों का ईमान। क्योकि ऐसे लोग बिना स्वार्थ के पत्ता भी नहीं छूने वाले। 
रिपोर्ट्स के अनुसार, मीरान हैदर ने खुलासा किया कि दंगे की स्क्रिप्ट को 3 हिस्सो में बाँटा गया था- पहला प्रोटेस्ट, दूसरा रोड ब्लॉक और आखिर में भयानक दंगे। दिल्ली पुलिस को दिए अपने बयान में आरोपित मीरान हैदर ने बताया की वो दंगों के पहले से ही जेनयू (JNU) के पूर्व छात्र उमर खालिद और खालिद सैफी को जानता था।
मीरान हैदर ने दिल्ली पुलिस को बताया कि वह भी 2014 से 2017 तक आम आदमी पार्टी में था, लेकिन नगर निगम चुनाव लड़ने के लिए टिकट ना मिलने पर उसने 2017 में पार्टी छोड़ दी और राजद में शामिल हो गया।

तहलका का चमत्कारी इंटरव्यू : ‘वो(राहुल गाँधी) नशेड़ी है, कुछ भी बोलता रहता है’

राहुल गांधी ने कहा- आगे बड़ा तूफान ...
“मुझे एक सम्पूर्ण राजनीतिज्ञ बनना है। इसके लिए मुझे एकाध चुनाव हारने पड़ेंगे। अगर मैं चुनाव नहीं हारता हूँ तो मैं एक अच्छा नेता नहीं बन पाऊँगा। मैं हार से डरता नहीं हूँ। ये मेरी ज़िंदगी का हिस्सा है।“- ये पंक्तियाँ पहली बार सांसद बने एक ऐसे व्यक्ति की है, जो इसके 12 साल बाद देश की सबसे पुरानी पार्टी का अध्यक्ष बना। ये इंटरव्यू उन्होंने ‘तहलका’ में दिया था, जिससे कांग्रेस की फजीहत हुई थी और तरुण तेजपाल को कहा गया कि वो इसे फेक साबित कर दें। 
ये इंटरव्यू ‘तहलका’ के लिए विजय सिम्हा ने लिया था। बाद में ‘ज़ी न्यूज़’ से बात करते हुए उन्होंने बताया था कि ‘तहलका’ के संपादक तरुण तेजपाल ने राहुल गाँधी के 2005 के इस इंटरव्यू को दबा दिया था। सेक्स स्कैंडल में फँसे तरुण तेजपाल फ़िलहाल जेल में हैं। विजय सिम्हा ने कहा था कि शुरुआत में तरुण तेजपाल की आवाज़ में दम होता था और बैठक वगैरह में वो काफी प्रभाव डालते थे।
उन्होंने बताया कि वो 2005 में राहुल गाँधी से मिले थे, जो उस समय नए-नए राजनीति में आए थे और उन्होंने कांग्रेस व राजनीति के बारे में काफी चीजें कही थीं। कांग्रेस की समस्याओं पर भी उस इंटरव्यू में बात हुई थी। बकौल विजय सिम्हा, उस समय कई लोग कांग्रेस में इस चिंता में पड़ गए थे कि उनकी ‘नौकरी’ चली जाएगी और वो कहने लगे थे कि ये किस व्यक्ति से बात कर लिया, ये तो नशेड़ी है।
उन्होंने आगे बताया कि इसके बाद तरुण तेजपाल दबाव में आ गए। पहले तो उन्होंने डिफेंड किया कि उनके पत्रकार ने कुछ भी गलत नहीं किया है और सब ठीक है लेकिन बाद में वो अचानक से पलट गए। सिम्हा बताते हैं कि इस प्रकरण के कारण ही उनके मन में पहली बार तेजपाल को लेकर शंका हुई। बाद में पत्रकार विजय सिम्हा पर ही आरोप लगाए गए कि उन्होंने स्टिंग कर दिया या फिर काल्पनिक बातचीत को छाप दिया।
जबकि सिम्हा इन बातों को नकारते हैं। वो कहते हैं कि इन आरोपों की कोई सच्चाई नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया था कि तरुण ने इस स्टोरी को ‘किल’ कर दिया, दबा दिया। उनके अनुसार ऐसे कई पत्रकार थे, लेकिन हाथ में चीजें न होने के कारण वो कुछ कर नहीं पाते थे। नीचे संलग्न ‘ज़ी न्यूज़’ के वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे विजय सिम्हा ने उस इंटरव्यू को दबाए जाने के बारे में खुलासा किया।
क्या कहा था राहुल गाँधी ने तहलका के इंटरव्यू में 
ट्विटर पर ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ की ट्रेजरर शीला भट्ट ने इस इंटरव्यू के स्क्रीनशॉट्स शेयर किए और कहा कि उनकी आलमारी से ये राहुल गाँधी का पुराना इंटरव्यू निकल आया है, जो काफी प्रभावी है। सितम्बर 2005 के इस इंटरव्यू के बारे में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के पत्रकार दीप्तिमान तिवारी ने याद दिलाया कि कैसे इस इंटरव्यू को दबाने के लिए कांग्रेस ने ‘तहलका’ पर भारी दबाव बनाया था। 
तिवारी ने याद दिलाया कि कैसे कांग्रेस पार्टी के आगे झुकते हुए ‘तहलका’ ने इसे पहले अनौपचारिक बातचीत करार दिया। तब मैगजीन की ओर से कहा गया था कि ये तो सिर्फ एक बातचीत है, जिसे इंटरव्यू समझा जा रहा है लेकिन ये इंटरव्यू तो है ही नहीं। और तो और, इंटरव्यू लेने वाले विजय सिम्हा को बेइज्जत तक किया गया। दरअसल, उस इंटरव्यू में राहुल गाँधी ने ऐसी-ऐसी बातें की थीं कि कांग्रेस पार्टी की खासी फजीहत हुई थी।
                                                         साभार : ZeeNews
राहुल गाँधी ने इस इंटरव्यू की शुरुआत भारत को नंबर-1 बनाने की बात से की थी और कहा था कि इसके लिए 30 से कम उम्र वाले हर युवा को कोशिश करना होगा और वो इतिहास दोहराने का रिस्क नहीं ले सकते। नीचे हम बिंदुवार तरीके से राहुल गाँधी द्वारा दिए गए बयानों को उनके शब्दों में हूबहू पेश कर रहे हैं। इसके बाद आप समझ सकते हैं कि कॉन्ग्रेस ने इसे दबाने के लिए क्यों इतना प्रयास किया:
*अमेठी में काफी मुद्दे हैं। मैं तो सिर्फ एक सांसद हूँ। मुझे MPLAD फण्ड में 2 करोड़ रुपए मिलते हैं। इससे मैं ज्यादा से ज्यादा 8 किलोमीटर सड़क बना सकता हूँ। लेकिन हम अमेठी में 500 किलोमीटर सड़क बनाने में सक्षम हुए हैं। इससे ज्यादा हम क्या कर सकते हैं? कुछ भी तो नहीं। मैं अपने प्रभाव का उपयोग कर के मंत्रियों के सामने हाथ जोड़ कर कह सकता हूँ कि ‘भैया, ये कर दो’ और काम हो सकता है।
*उत्तर प्रदेश और बिहार अलग ही कैटेगरी में आते हैं। यहाँ सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। (ये पूछे जाने पर कि कांग्रेस फिर भी मुलायम सिंह यादव की सरकार का समर्थन क्यों कर रही है): ये ऐसा नहीं चलेगा। मैं इसका समर्थन नहीं करता। मैं इसे लेकर कुछ करूँगा।
*(मुलायम और लालू के समर्थन पर): मैं घूम-घूम कर लोगों को नहीं कह सकता कि मुलायम और लालू का क्या करना है। इसमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शामिल हैं। वही ये सब निर्णय लेते हैं। ये एक जटिल मुद्दा है। इसे छोड़ कर विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
*(अमेठी में कैसे काम करते हैं): मैं NGO के माध्यम से काम करता हूँ और मीडिया की इसमें कोई रूचि नहीं है। भारत 150 करोड़ लोगों का देश है। मीडिया चाहता है कि सब कुछ कल ही चुटकियों में हो जाए। ऐसा नहीं होता है। आप एक महीने बाद अमेठी आएँगे तो पाएँगे कि हर कांग्रेस नेता एक-दो छात्रों को पढ़ा रहा है। मेरा यही तरीका है।
*(शिक्षा में आईटी के उपयोग पर): आईटी को लेकर मीडिया में कुछ ज्यादा ही हाइप है। मुझे इसका प्रभाव एक सीमित क्षेत्र में ही दिख रहा। कर्नाटक व तमिलनाडु में अच्छे कार्य हो रहे लेकिन हर जगह ऐसी स्थिति नहीं है।
*मुझे कोई कहता है कि आप फेल हो रहे हो तो मैं कहता हूँ कि ये ठीक है। उत्तर प्रदेश में कहीं कुछ भी अच्छा हो रहा है तो ये मेरी सफलता है। देश में कोई भी सांसद इतना काम नहीं कर रहा, जितना मैं कर रहा हूँ।
*दम्भ को लेकर मेरा पहला पाठ मुझे यूके में एक बाथरूम में मिला, जब मैं एक कम्पनी में काम करता था। (एक अजीब कहानी जो समझ नहीं आई।)
कांग्रेस वर्किंग कमिटी का सदस्य होकर मैं प्रधानमंत्री को नहीं बोल सकता कि आप क्या करो और क्या नहीं। मैं पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों को कुछ करने, न करने नहीं बोल सकता हूँ।
*लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं विदेश क्यों जाता हूँ। मैं बने-बनाए ढर्रे पर राजनीति करने नहीं बल्कि उसे बदलने आया हूँ। मैं अलग-अलग देशों के लोगों से मिलूँगा, वो हमसे हमारी समस्याओं के बारे में पूछते हैं, उसके समाधान पर बात होती है।
जनता की प्रतिक्रियाएं :-
राहुल गाँधी इस इंटरव्यू में काफी कन्फ्यूज नज़र आ रहे हैं। वो खुद को लाचार दिखाने के लिए कहते हैं कि उनके पास फंड्स नहीं है, वो विदेश आना-जाना जारी रखेंगे क्योंकि इससे भारत का फायदा है, पीएम व मंत्रियों को वो कुछ करने, न करने को नहीं बोल सकते। वो ये भी कहते हैं कि हाथ जोड़ के निवेदन कर सकते हैं। लालू-मुलायम के समर्थन पर भी वो कुछ-कुछ बोलते हैं। बाथरूम वाली कहानी क्या थी, ये हमारे समझ में अब तक नहीं आई।
इन्हीं कारणों से कांग्रेस ने इसे दबा दिया और इसके लिए तरुण तेजपाल का सहारा लिया। विजय सिम्हा ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि वो सीनियर एडिटर थे लेकिन रिपोर्ट तो तेजपाल को ही करते थे, इस कारण वो कुछ नहीं कर पाए। एक पत्रकार की मेहनत को एक पार्टी विशेष को खुश करने के लिए दबा दिया गया। हालाँकि खुलासा तो यह भी होना चाहिए कि किन कांग्रेस नेताओं ने राहुल गाँधी को नशेड़ी बताते हुए कहा था कि ये कुछ भी बोलते रहते हैं।

जमीन पर सो रहे गरीब मरीज, लेकिन लालू यादव RIMS में ‘स्पेशल 18 कमरे में

Lalu who is being treated at RIMS will be threatened by window ...
राँची में यूँ तो लालू यादव कहने के लिए बिरसा मुंडा कारागार में कैद हैं लेकिन पिछले कई महीनों से बीमारी के कारण वो RIMS में ही डेरा डाले हुए हैं। झारखण्ड में जब हेमंत सोरेन ने विधानसभा चुनाव जीता था तो उन्होंने RIMS जाकर लालू यादव का आशीर्वाद लिया था। ऐसे में RIMS में लालू यादव की खातिरदारी के लिए झारखण्ड सरकार ने विशेष प्रावधान किए हैं, ऐसा विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है।
RIMS में पहले 100 बेड्स का कोविड वार्ड बनाया गया था। चूँकि मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है और वो जैसे ही 135 तक पहुँची, RIMS ने अपने मेडिसिन वार्ड को भी कोविड केयर में बदल दिया। इस तरह गंभीर कोरोना मरीजों के लिए 172 बेड्स रखे गए हैं। लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि लालू यादव के वार्ड में एक भी मरीज नहीं है। इस पर राज्य के विपक्षी नेता खफा हैं।
यहाँ तक कि पेइंग वार्ड में भी मरीज है लेकिन लालू यादव का वार्ड खाली है। झारखण्ड के पूर्व-मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने सीएम हेमंत सोरेन को पत्र लिख कर इस सम्बन्ध में सवाल खड़ा किया है। मरांडी ने कहा कि जहाँ एक तरफ मरीजों को RIMS में बेड्स नहीं मिल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ लालू यादव की सुरक्षा का बहाना बना कर 18 कमरों को बंद कर दिया गया है। उन्होंने पूछा कि किसकी शह पर ऐसा किया जा रहा है?


उन्होंने पूछा कि 18 कमरों को बेवजह क्यों बंद रखा गया है? झारखण्ड में भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने कहा कि जिस राज्य में कोरोना महामारी का संक्रमण इतनी तेज़ी से फ़ैल रहा हो, वहाँ इस तरह की चीजें सही नहीं हैं। उन्होंने ध्यान दिलाया कि अगर एक कमरे में 2 मरीज भी होते तो इन कमरों में लगभग 40 मरीजों का इलाज किया जा सकता है लेकिन लालू यादव पूरी जगह खाली रखी गई है।
मरांडी ने आरोप लगाया कि प्रशासन और सरकार में कुछ लोग लालू यादव की सुरक्षा के नाम पर ये मनमानी कर रहे हैं। हालाँकि, बाबूलाल ने ये भी अंदेशा जताया कि ये सब कुछ लालू यादव को बिना बताए किया गया हो और हो सकता है कि उन्हें इसका पता चले तो वो इसका विरोध करें। उन्होंने कहा कि अगर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ध्यान में भी ये बात नहीं है तो उन्हें संज्ञान लेते हुए तुरंत सभी कमरों को खाली कराना चाहिए।
RIMS में भर्ती बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव का कोरोना टेस्ट भी किया गया है, जिसके रिजल्ट्स रविवार (जुलाई 26, 2020) को आने की सम्भावना है। कोरोना वायरस संक्रमण के लिए उनका नमूना लेकर जाँच के लिए भेजा गया है। अस्पताल प्रशासन ने बताया कि लालू यादव में कोरोना के कोई लक्षण नहीं पाए गए हैं लेकिन एहतियात के रूप में उनका कोरोना टेस्ट कराया जा रहा है।

CAA लाओ, मुस्लिमों को नागरिकता मत दो: 2003 में कांग्रेस

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सीएए पर बनी उस समिति में कपिल सिब्बल भी शामिल थे
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) को लेकर विपक्ष का हंगामा और उसकी आड़ में हिंसा अब नई बात नहीं रही। कानून को मुसलमानों के खिलाफ बताकर यह सब किया जा रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल लगातार अफवाह फैला रहे हैं कि यह क़ानून भेदभाव वाला है। बता दें कि सीएए के तहत तीनों पड़ोसी इस्लामिक मुल्क़ों पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से दिसंबर 2014 तक भारत में आ चुके प्रताड़ित अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता मिलेगी। विपक्ष का कहना है कि इसमें मुस्लिमों को क्यों शामिल नहीं किया गया? लेकिन, सच्चाई कुछ और है। वास्तविकता ये है कि जो कांग्रेस आज इसका विरोध कर रही है, कभी इसके समर्थन में थी।
2003 में एक संसदीय समिति की रिपोर्ट आई थी, जिसमें सीएए की अनुशंसा की गई थी। गृह मामलों की इस संसदीय समिति के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी थे, जो आगे चल कर भारत के राष्ट्रपति बने। इसके अलावा उसमें कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल भी शामिल थे। उस संसदीय समिति में कांग्रेस पार्टी के कई दिग्गज नेता शामिल थे। राज्य सभा के सांसदों की इस रिपोर्ट में क्या था, ये जान कर आप चौंक जाएँगे। इस रिपोर्ट को दिसंबर 12, 2003 को राज्य सभा में पेश किया गया था। ये संसदीय समिति की 107वीं रिपोर्ट थी।

यह रिपोर्ट ‘नागरिकता संशोधन बिल, 2003’ पर तैयार किया गया था। इसमें संसदीय समिति ने अनुशंसा की थी कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले अल्पसंख्यक शरणार्थियों को न सिर्फ़ राष्ट्रीय पहचान-पत्र देना चाहिए, बल्कि उन्हें नागरिकता और अधिकार भी दिए जाने चाहिए। इस रिपोर्ट में अपना घर-द्वार छोड़ कर आए अल्पसंख्यकों को अधिकार देने की बात कही गई थी। साथ ही, कांग्रेस नेताओं से भरी पड़ी इस संसदीय समिति की रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा गया था कि पाकिस्तान या बांग्लादेश से आने वाले बहुसंख्यकों (अर्थात, मुस्लिमों) को नागरिकता नहीं दी जानी चाहिए, केवल अल्पसंख्यकों को ही मिलनी चाहिए।

इसी तरह भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने भी कभी पड़ोसी इस्लामिक मुल्क़ों से आने वाले अल्पसंख्यक शरणार्थियों को अधिकार व नागरिकता देने की बात संसद में कही थी। उन्होंने कहा था कि उनका ध्यान रखना भारत का कर्तव्य है। आज वही कांग्रेस इस मुद्दे पर अफवाह फैला रही। हमने 2003 की जिस संसदीय समिति की रिपोर्ट का जिक्र किया, उस समिति में वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा, अंबिका सोनी, राजद अध्यक्ष लालू यादव और हंसराज भारद्वाज शामिल थे। इससे आज ये पता चल जाता है कि सीएए के विरोध में जो कुछ भी हो रहा है, वो महज राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए किया जा रहा है।
इसी तरह एनआरसी पर भी कांग्रेस आज विरोध कर रही है। जबकि एनआरसी की प्रक्रिया की औपचारिक शुरुआत कांग्रेस के ही कार्यकाल में हुई थी। थोड़ा और पीछे जाएँ तो ख़ुद इंदिरा गाँधी ने घुसपैठियों को निकाल बाहर करने की बात की थी। एनपीआर भी यूपीए-2 के कार्यकाल में अपडेट किया गया। आज कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष इसका भी विरोध कर रहा।
कांग्रेस का दोगला चरित्र आया सामने
इस खुलासे के बाद कांग्रेस का दोगला चरित्र साफ हो गया है। 2003 में जब ये कांग्रेस विपक्ष में थी तब इसने वाजपेयी सरकार पर पाकिस्तान और बांग्लादेश के धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने के लिए दबाब बनाया था और आज जब मोदी सरकार ने यह कर दिया है, तो यही कांग्रेस पार्टी इसका विरोध कर रही है।

प्रणब की अगुवाई वाली समिति ने बनाया था सरकार पर दबाब
कांग्रेस सांसद प्रणब मुखर्जी के नेतृत्व में इस संसदीय समिति ने अपनी सिफारिशों में स्पष्ट तौर पर कहा था कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों यानि हिंदू, जैन, पारसी, बौद्ध, ईसाई और सिखों को भारतीय नागरिकता दी जाए। इतना ही नहीं कांग्रेस नेताओं की अगुवाई वाली इस समिति ने वाजपेयी सरकार से पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए इन शरणार्थियों को तत्काल नेशनल आईडेंटिटी कार्ड भी देने को कहा था। यानि देश में एनआरसी लागू करने की मांग की थी। इस सिफारिशों में यह भी स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के किसी भी धार्मिक बहुसंख्यक यानि मुसलमान को भारतीय नागरिकता नहीं दी जाए। संसदीय समिति की इस रिपोर्ट को 12 दिसंबर, 2003 को संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा गया था।

लालू के मंत्री रहते 276 लोग बिना परीक्षा-इंटरव्यू रेलवे में भर्ती हुए

cbi Investigation against railway employeesलालू प्रसाद यादव के 2004 से 2009 के बीच रेल मंत्री रहने के दौरान राजस्थान में 276 लोग बिना परीक्षा और इंटरव्यू के रेलवे में भर्ती हुए थे। इनमें से 111 लोग बिहार के थे। अब सीबीआई इन भर्तियों की जांच कर रही है। उत्तर-पश्चिम रेलवे जोन से कर्मचारियों का ब्योरा मांगा गया है। कर्मचारियों की फाइलें खंगालने और पूछताछ के बाद लालू की भूमिका भी जांची जा सकती है। 
दरअसल, रेलवे महाप्रबंधक व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरत के अनुसार सब्सटिट्यूट के तौर पर नियुक्तियां कर सकते हैं। इसके लिए उम्मीदवार का लिखित आवेदन, फोटो और दसवीं की मार्कशीट ही मांगी जाती है। 120 दिन नियमित काम करने के बाद इन्हें अस्थायी कर्मचारी का दर्जा मिल जाता है। फिर स्क्रीनिंग के बाद बिना परीक्षा या इंटरव्यू के स्थायी कर्मचारी बना दिया जाता है।
लालू के कार्यकाल में हुई ऐसी 276 भर्तियों के खिलाफ एक शिकायत के बाद सीबीआई ने जांच शुरू की थी। इन्हें जोधपुर, जयपुर, बीकानेर और अजमेर मंडल में नियुक्ति दी गई थी। उत्तर-पश्चिम रेलवे जोन की कार्मिक अधिकारी डॉ. हिना अरोड़ा ने चारों मंडल रेल प्रबंधक से सीबीआई की जांच के संदर्भ में कर्मचारियों के मौजूदा पोस्टिंग की सूची मांगी है। 
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सीबीआई ने एक शिकायत के आधार पर लालू के दौर में दी गई इन नियुक्तियों से जुड़ी जानकारी जुटानी शुरू कर दी है। भास्कर ने इन नियुक्तियों में शामिल लोगों के घर के पते जुटाए तो पता चला कि 111 लोग तो बिहार से लाकर राजस्थान में नियुक्त किए गए थे। उत्तरप्रदेश के 16, दिल्ली के 11, हरियाणा के नौ और अन्य राज्यों के 13 लोगों को इस कोटे से नौकरी मिली। इनके अलावा 116 लोग राजस्थान के थे। 2007 और 2008 में कुल 130 लोगों की नियुक्ति हुई थी, इनमें से अकेले 95 लोग बिहार के थे।