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उत्तर प्रदेश : मदरसा रेप कांड : प्रयागराज का वो केस जब रात भर हुआ रेप; अतीक और अशरफ आरोपित थे

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 15 अप्रैल 2023 को 3 शूटरों ने माफिया अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की हत्या कर दी थी। मारे जाने के बाद इन्हें पीड़ित मुस्लिम बताकर कुछ लोग इनके जघन्य अपराधों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि ज्यातादार चर्चित मामलों के पीड़ित भी मुस्लिम ही हैं। ऐसा ही एक मामला 2007 का है, जिसे मदरसा रेप कांड के नाम से जाना जाता है। 17 जनवरी को हुई गैंगरेप की इस वारदात ने पूरे उत्तर प्रदेश को हिलाकर रख दिया था। तब राज्य में मुलायम सिंह के नेतृत्व में सपा की सरकार थी।

इस घटना में बंदूकधारियों ने दो नाबालिग लड़कियों को मदरसे से उठाया था। उनके साथ रातभर रेप किया गया। अगली सुबह गैंगरेप पीड़िताओं को लहूलुहान मदरसे के गेट पर फेंक दिया गया। अतीक अहमद के भाई अशरफ पर भी रेप के आरोप लगे थे। उस वक्त अतीक खुद सांसद और अशरफ विधायक हुआ करता था।

क्या था मदरसा रेप कांड

यह मामला 17 जनवरी 2007 का था। प्रयागराज में अतीक अहमद के प्रभुत्व वाले इलाके करेली में एक मदरसा चला करता था। इस मदरसे का संचालक वाराणसी संकटमोचन मंदिर ब्लास्ट में फाँसी की सजा पाए आतंकी वलीउल्लाह का भाई था। देर रात इस मदरसे के दरवाजे पर दस्तक हुई और दबंगई से गेट खोलने के लिए कहा गया। अंदर 3 बंदूकधारी घुसे और सीधे वहाँ पहुँचे जहाँ लड़कियाँ सोती थीं। लड़कियों के नकाब हटवाए। यहाँ से 2 लड़कियाँ चुनी गईं और उन्हें उठाकर जंगल ले जाया गया।
आरोप है कि जंगल में 5 लोगों ने दोनों लड़कियों से रेप किया। सुबह लड़कियों को लहूलुहान हालत में मदरसे के गेट पर फ़ेंक दिया गया। तब पुलिस ने प्रयागराज में ही रिक्शा चलाने वाले और दर्जी का काम करने वाले इखलाख अहमद और नौशाद अहमद सहित कुल 5 लोगों की गिरफ्तारी दिखा दी थी। जमानत पाने के बाद पाँचों ने पुलिस पर खुद को बेवजह फँसाने का आरोप लगाया था। इस घटना में अशरफ और उसके साथियों के शामिल होने की बात कही जाती रही।
मुलायम सरकार में यह घटना हुई थी। उसके बाद मायावती की सरकार आई। मामले की सीबीसीआईडी जाँच भी हुई। लेकिन नतीजा सिफर रहा। अपने पहले कार्यकाल में दिसंबर 2021 में योगी सरकार ने इस मामले की फिर से जाँच करवाने के आदेश दिए थे। इस घटना से उठी नाराजगी के बाद अतीक और उसका परिवार दुबारा कभी चुनाव नहीं जीत पाया। स्थानीय मुस्लिमों में भी एक बड़ा धड़ा अतीक अहमद के खिलाफ हो गया था।
एक मीडिया रिपोर्ट में रिटायर्ड इंस्पेक्टर नारायण सिंह परिहार के हवाले से भी इस कांड के बारे में बताया गया है। उन्होंने बताया है कि 2007 में अतीक के भाई अशरफ ने मदरसे से लड़कियों को उठवाया और फिर उनके साथ घिनौनी हरकत की। मामला कोर्ट में गया। गवाही भी हुई। लेकिन बाद में गवाह पलट गए। रिटायर्ड इंस्पेक्टर के अनुसार अतीक अहमद और उसके गुर्गे पीड़िताओं के परिजनों को धमकी देते थे। इसके कारण बाद में गवाह पलट गए और केस नहीं बन पाया। उन्होंने यह भी बताया कि जाँच के दौरान उनको भी धमकियाँ दी गई थी।

 

निहत्ते रामभक्तों से खून की होली खेलने वाले मुलायम सिंह की राम नाम सत्य होने पर महान कैसे ?

जिस तरह साधु समाज 7 नवंबर 1966 को नहीं भूलेगा जब गो-हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधुओं के खून से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की पुलिस ने पार्लियामेंट स्ट्रीट लाल कर दी थी, उसी तरह उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने 2 नवंबर 1990 को निहत्ते रामभक्तों के खून से अयोध्या की सड़क लाल कर दी थी।  
मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) का आज (10 अक्टूबर 2022) इंतकाल हो गया। इसकी पुष्टि उनके उस बेटे (अखिलेश यादव) ने भी की है, जिन पर राजनीतिक विरासत को हड़पने के लिए पिता को मुगलों वाले तरीके से बेदखल करने के आरोप लगते हैं। हमारे यहाँ सामाजिक परिपाटी है कि किसी की मौत हो जाए तो गाँधी जी का बंदर बन जाना है। न उसके बारे में बुरा कहना है। न उसके बारे में बुरा सुनना है। उसके बुरे कर्म आँखों में तैरने लगे तो आँख ही बंद कर लेनी है। सो, मुलायम सिंह के इंतकाल के बाद भी शोक संदेशों का आना स्वभाविक है। साइकिल सवार सपाई तो आँसुओं से बाढ़ भी ला सकते हैं। आखिर उनके कुल के धृतराष्ट्र जो चले गए, जो भरे मंच से कहते थे- लड़के हैं, गलती हो जाती है।

साभार: पुस्तक अयोध्या का चश्मदीद
मुलायम सिंह यादव ने यह बात उस देश में बलात्कार के अपराध को हल्का दिखाने के लिए कही, जिसकी परंपरा स्त्री सम्मान के लिए लंका दहन और महाभारत की रही है। यह सत्य है कि मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश में पिछड़ों की राजनीति को उभार दिया। हिंदुत्व को समर्पित पिछड़ों के लिए राजनीति में मजबूत जगह बनाई। लेकिन, जिनकी भावनाओं के ज्वार ने उन्हें देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया, देश का रक्षा मंत्री बनाया, आगे चलकर ‘वोट बैंक’ के लिए उन्होंने उनके ही अराध्य राम के भक्तों के रक्त से अयोध्या को लाल कर दिया। पिछड़ों की पीठ पर सवार हो मुलायम ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ में ऐसे डूबे कि उनके बगलगीर आजम खान अभिनेत्री से नेत्री बने जयाप्रदा की चड्डी का रंग बताने लगे।

खुद मुलायम सिंह पर ‘मुल्ला मुलायम’, ‘मौलाना मुलायम’ की सनक सवार हो गई। इसी सनक में उनके रहते 2 नवंबर को अयोध्या में रामधुन में रमे भक्तों पर फायरिंग हुई। अयोध्या की गलियों में रामभक्तों को दौड़ा-दौड़ा कर निशाना बनाया गया। 3 नवंबर 1990 को जनसत्ता में छपी एक रिपोर्ट में लिखा गया, “राजस्थान के श्रीगंगानगर का एक कारसेवक, जिसका नाम पता नहीं चल पाया है, गोली लगते ही गिर पड़ा और उसने अपने खून से सड़क पर लिखा सीताराम। पता नहीं यह उसका नाम था या भगवान का स्मरण। मगर सड़क पर गिरने के बाद भी सीआरपीएफ की टुकड़ी ने उसकी खोपड़ी पर सात गोलियाँ मारी।”

साभार: अयोध्या का चश्मदीद
2 नवंबर 1990 को ही कोठारी बंधुओं की हत्या हुई थी। 20 साल के शरद कोठारी को घर से बाहर निकाल सड़क पर बिठाया गया और उनके सिर को गोली से उड़ा दिया। छोटे भाई के साथ ऐसा होते देख 22 साल के रामकुमार कोठारी भी कूद पड़े। एक गोली रामकुमार के गले को भी पार कर गई। उस दिन अयोध्या में किसी भी रामभक्त के पैर में गोली नहीं मारी गई थी। सबके सिर और सीने में गोली लगी थी। तुलसी चौराहा खून से रंग गया था। राम अचल गुप्ता का अखंड रामधुन बंद नहीं हो रहा था तो उन्हें पीछे से गोली मारी गई।

रामनंदी दिगंबर अखाड़े में घुसकर साधुओं पर फायरिंग की गई। कोतवाली के सामने वाले मंदिर के पुजारी को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया। रामबाग के ऊपर से एक साधु आँसू गैस से परेशान लोगों के लिए बाल्टी से पानी फेंक रहे थे। उन्हें गोली मारी गई और वह छत से नीचे आ गिरे। फायरिंग के बाद सड़कों और गलियों में पड़े रामभक्तों के शव बोरियों में भरकर ले जाए गए।


इस सबकी शुरुआत से पहले तत्कालीन आईजी एसएमपी सिन्हा ने अपने मातहतों से कहा था, “लखनऊ से साफ निर्देश है कि भीड़ किसी भी कीमत पर सड़कों पर नहीं बैठेगी।” अब सवाल है कि उस समय लखनऊ की कुर्सी पर कौन बैठा था। जवाब है- मुलायम सिंह यादव।

उस दिन मरने वाले कारसेवकों की संख्या को लेकर अलग-अलग आँकड़े दिए जाते हैं। कारसेवकों द्वारा जारी की गई सूची में 40 कारसेवकों के मारे जाने की बात कही गई थी और उनके नामों की सूची भी प्रकाशित की गई थी। मुलायम ने बताया था कि अटल बिहारी वाजपेयी ने उनसे 56 लोगों के मारे जाने की बात कही थी। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा अपनी क़िताब ‘युद्ध में अयोध्या‘ में लिखा है कि उन्होंने 25 लाशें देखी थी। केंद्र सरकार ने 15 कारसेवकों के मारे जाने का आँकड़ा दिया था, जबकि विश्व हिन्दू परिषद ने 59 लोगों के मारे जाने की बात कही थी।

3 नवंबर 1990 को जनसत्ता में छपी रिपोर्ट
राम भक्तों के इस नरसंहार के बाद मुलायम को ‘मौलाना मुलायम’ का तमगा हासिल हुआ। वे जीवनपर्यंत अपने इस कृत्य को जायज ठहराते रहे। ऐसा ही मौका नवंबर 2017 में मुलायम सिंह के 79वें जन्मदिन पर आया था। तब मुलायम ने कहा था कि अगर और भी लोगों को मारना पड़ता तो जरूर मारते। मुलायम ने तब गर्व के साथ आँकड़े गिनाते हुए कहा था कि उस गोलीकांड में 28 कारसेवकों को मौत के घाट उतार दिया गया था।

उत्तर प्रदेश में मुलायम ने कांशीराम से हाथ मिलाया तो नारे लगे- मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम। क्या हिंदुत्व को समर्पित, राम के लिए अपना जीवन खपाने वाले दलित-पिछड़े ऐसे मुलायम को उनके इंतकाल के बाद भी माफ कर पाएँगे?

अपनी गति को पा चुके मुलायम के लिए तो बाबा तुलसीदास का लिखा यह भी नहीं कहा जा सकता कि ‘सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।’ क्योंकि बिधि ने मुलायम को ‘राम भक्त’ बनने का मौका दिया था, उन्होंने राजनीति के लिए ‘मौलाना मुलायम’ होना खुद लिखा।

‘साइकिल का बटन दबाना है, नया पाकिस्तान बनाना है’: कानपुर में सपा प्रत्याशी के जनसंपर्क अभियान में लगे देश विरोधी नारे

आज मोदी-योगी विरोधियों के दिमाग का लगता है दिवाला निकल गया है। योगी-मोदी विरोध में पाकिस्तान की बोली बोले जाने का चुनाव आयोग को संज्ञान लेकर ऐसी पार्टियों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। चुनाव चिन्ह जब्त करना चाहिए। कोई सत्ता में आने पर हिन्दुओं को सबक सिखाने की धमकी देता है तो कोई अन्य बातों से हिन्दुओं में डर बैठाने की बात करता है, यदि स्थिति विपरीत होती ये छद्दम चुनाव आयोग तो क्या कोर्ट तक पहुँच गए होते। जो पार्टी देश विभाजन की बात करे, उसे सियासत से बाहर करने में जनता को इन्हें एक भी वोट न देकर चारों खाने चित कर सबक सिखाना होगा।  
उत्तर प्रदेश के कानपुर में जिन्ना के बाद समाजवादी पार्टी प्रत्याशी का पाकिस्तान प्रेम उजागर हुआ है। बिठूर विधानसभा से सपा प्रत्याशी मुनींद्र शुक्ला के समर्थकों द्वारा पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने की बात सामने आई है। जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। वायरल वीडियो में “साइकिल का बटन दबाना है, नया पाकिस्तान बनाना है” के नारे सुनाई दे रहे हैं। वहीं वीडियो वायरल होने के बाद यूपी पुलिस इसकी जाँच में जुट गई है।

कानपुर की बिठूर विधानसभा से सपा प्रत्याशी मुनींद्र शुक्ला के समर्थकों ने कथित तौर पर पाकिस्तान के समर्थन में लगाए नारे…
साइकिल का बटन दबाना है पाकिस्तान बनाना है#SamajwadiParty #UttarPradeshElection2022 pic.twitter.com/TcDszINajx

— Alok Kumar (@dmalok) February 4, 2022

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बताया जा रहा है कि बिठूर सीट एसपी प्रत्याशी मुनींद्र शुक्ला के समर्थक जनसंपर्क कर रहे थे। इसी दौरान नारे लग रहे थे कि मोहर मारो तान के साइकिल को पहचान के। इसी बीच पाकिस्तान के नारे लगे और ढोल बजने लगा। ट्विटर पर वीडियो वायरल होने के बाद कानपुर कमिश्नरेट पुलिस ने कहा कि वीडियो के स्थान तथा व्यक्तियों के संबंध में जानकारी पता लगाई जा रही है। मामले की पुष्टि होते ही वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। वहीं यह भी कहा जा रहा है कि सपा का पाकिस्तान प्रेम नया नहीं है, इसके पहले सपा मुखिया अखिलेश यादव भी जिन्ना की तारीफ कर चुके हैं।

हालाँकि, सपा समर्थकों का दावा है कि वीडियो एडिटेड है। कानपुर की बिठूर विधानसभा सीट से सपा प्रत्याशी मुनींद्र शुक्ला ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि एक कथित वीडियो टिकरा गाँव में जनसंपर्क के दौरान राष्ट्रविरोधी नारा लगाते हुए दर्शाया गया है। ये वीडियो पूरी तरह से भ्रामक है। यह वीडियो विरोधियों की साजिश है। उनके जनसंपर्क के दौरान कहीं भी इस तरह के नारे नहीं लगाए गए हैं। यह वीडियो एडिटेड है।

विधानसभा चुनाव 2012 में एसपी से मुनींद्र शुक्ला ने जीत दर्ज की थी। वहीं, विधानसभा चुनाव 2017 बीजेपी के अभिजीत सांगा ने सपा के मुनींद्र शुक्ला को 58,987 मतों से हराया था। बीजेपी के अभिजीत सिंह सांगा को 1,13,289 वोट मिले थे। वहीं, एसपी के मुनींद्र शुक्ला को 54,302 वोट मिले थे। यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में एक दूसरे के धुर विरोधी नेता आमने सामने हैं।

उत्तर प्रदेश : बाबाजी (योगी आदित्यनाथ) से बेहतर उत्तर प्रदेश को मुख्यमंत्री नहीं मिला- अपर्णा यादव

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के बीच मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव (Aparna Yadav) ने कहा है कि उत्तर प्रदेश के इतिहास में योगी आदित्यनाथ जैसा मुख्यमंत्री अभी तक नहीं हुआ। सीएम योगी ना अपने संस्कार छोड़ें हैं और ना भविष्य को बेहतर बनाने की चिंता छोड़ी है। अपर्णा ने कहा, “मैं हिंदू राष्ट्र में हिंदी बोलने वाली व्यक्ति हूँ। ये बहुत ही जरूरी था कि राम मंदिर बने। ये सभी ने देखा था कि मैंने इसके लिए चंदा भी दिया था।” जबकि मुसलमानों को खुश करने और उनकी वोट लेने के लिए मुलायम सिंह द्वारा निहत्ते रामभक्तों पर गोलियां चलवाई गयीं थी और अखिलेश यादव भी राममंदिर का विरोध करते रहे। 

टीवी 9 के कार्यक्रम ‘सत्ता का सम्मेलन’ के दौरान 27 जनवरी 2022 को अपर्णा यादव ने सीएम योगी की जमकर तारीफ करते हुए कहा, “आदरणीय महाराज जी से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इन्होंने अपने अतीत को नहीं छोड़ा, यानी महाराज अवैद्यनाथ जी के डायरेक्शन में जो राम मंदिर का आंदोलन शुरू हुआ था, वो आज (योगी सरकार में) पूरा हो रहा है।”

उन्होंने आगे कहा, “ये आज ‘कल के लिए’ कॉलेज, मेडिकल कॉलेज बनवा रहे हैं। तात्पर्य की इन्होंने (योगी आदित्यनाथ ने) न अपने अतीत को छोड़ा है और ना आने वाले कल को छोड़ा है। ये अमेल्मेशन जो हमें देखने को मिलता है, वो हमारे यशस्वी मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी में ही देखने को मिलता है। आज तक मैंने नहीं देखा कि ऐसा कोई मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश में बना हो, जिसने आज तक ना अपने संस्कार छोड़ें हों और ना कल की चिंता छोड़ी हो। ये बहुत बड़ी बात है।”

मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के भी मुख्यमंत्री रहने के सवाल पर अपर्णा ने कहा, “मैं तो कह रही हूँ कि बाबा जी जितना अच्छा मुख्यमंत्री कोई नहीं हुआ।” उन्होंने आगे कहा, “उन्होंने (योगी आदित्यनाथ) प्रदेश में 27 मेडिकल कॉलेज दिए। 29 पॉलिटेक्निक कॉलेज दिए। कोविड के इस दौर में जब पूरा विश्व चरमरा गया है, वहीं उत्तर प्रदेश में बाबा जी ने पॉलिटेक्निक कॉलेज का निर्माण करवाया, जो ये दिखाता है कि वो शिक्षा पर फोकस कर रहे हैं।”

अपर्णा यादव ने यह भी कहा कि जब वो भाजपा में शामिल हुईं तो मुलायम सिंह यादव ने उन्हें आशीर्वाद दिया था। उन्होंने बताया कि दिल्ली में भाजपा में शामिल होकर लौटने के बाद सबसे पहले वह मुलायम सिंह यादव से मिली थीं और उनके साथ अपनी तस्वीरें साझा की थीं। अपर्णा ने बताया कि मुलायम सिंह यादव ने उनसे कहा कि जिस चीज में खुशी है, वो करिए।

अपर्णा यादव ने आगे कहा, ”मैंने बहुत काम किया और मुझे इस बात का दुख है कि भैया (अखिलेश यादव) को मेरा काम नहीं दिखा। लेकिन, मुझे खुशी इस बात की है कि महाराज जी (योगी आदित्यनाथ) को मेरा सामाजिक काम दिखा और उन्होंने इसकी प्रशंसा की।” अखिलेश यादव और सपा के खिलाफ प्रचार के सवाल पर अपर्णा यादव ने कहा कि पार्टी जो कहेगी, जहाँ कहेगी वहाँ वह प्रचार करने के लिए जाएँगी। उन्होंने कहा कि चुनाव लड़ने के लिए वह राजनीति में नहीं आई हैं। राजनीति में उनका आने का मकसद लोगों के जीवन को बेहतर बनाना है।

इंटरव्यू के दौरान अपर्णा ने भाजपा के लिए एक गाना भी गाया। जिसके बोल हैं, ‘केशरी बाना सजा है वीर का श्रृंगार कर। ले चले हम राष्ट्र नौका को भंवर से पार कर’। बता दें कि अपर्णा यादव एक बेहतरीन गायिका भी हैं।

गेस्ट हाउस कांड : ‘उस च#@र औरत को माँद से बाहर निकालो’: जब सपाई गुंडों ने मायावती के फाड़े थे कपड़े, एक संघी ने जान पर खेल बचाया

राजनीति वो चीज है, जो दोस्त को दुश्मन और दुश्मन को दोस्त बना देती है। कभी-कभी ये प्रतिद्वंद्वी को दोस्त, फिर उस दोस्त को दुश्मन, इसके बाद उस दुश्मन को दोस्त और फिर दोस्त को प्रतिद्वंद्वी बना देती है। कुछ ऐसा ही उदाहरण ‘गेस्ट हाउस कांड’ है है। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा ने कभी मिल कर सरकार बनाई थी और इस कांड के कारण दोनों दुश्मन बन गए। ‘मोदी लहर’ को थमने के लिए ढाई दशक बाद फिर दोस्त बने, लेकिन सफलता न मिलने के कारण वापस अलग हो गए।

ऐसे में आपके लिए ये जानना ज़रूरी है कि ये ‘गेस्ट हाउस कांड’ है क्या। आज इस घटना को भले 27 वर्ष हो गए, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति का ये अध्याय कभी पुराना होने का नाम नहीं लेता। अप्रैल 2019 में लोकसभा चुनावों के लिए पचार-प्रसार जोरों पर था, तब सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती का मैनपुरी में एक मंच पर आकर एक-दूसरे की प्रशंसा करना एक बड़ी खबर बन गई, क्योंकि 90 के दशक के मध्य की वो घटना लोगों के जेहन में अब भी हैं।

2 जून 1995: क्या है ‘गेस्ट हाउस कांड’ और मायावती के साथ क्या हुआ था

90 के दशक का शुरुआत वो समय था जब राम मंदिर के लिए आंदोलन अपने चरम पर था और उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा ने शीर्ष स्थान बनाया हुआ था। 1993 में भाजपा को रोकने के लिए मुलायम सिंह यादव की सपा और कांशीराम की बसपा ने गठजोड़ किया। तब ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’ वाला नारा भी इन दोनों दलों ने उछाला था। उत्तराखंड तब उत्तर प्रदेश से कट कर अलग नहीं हुआ था और सीटों की संख्या 422 हुआ करती थीं।

जहाँ सपा ने 256 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, बसपा ने 164 सीटें अपने हिस्से में पाई। चुनाव में इस गठबंधन की जीत हुई। कहा जाता है कि मुख्यमंत्री पद के लिए दोनों दलों के बीच ढाई-ढाई साल की सहमति बनी थी। विधानसभा में सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें मिली थीं, ऐसे में पहले मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। लेकिन, मनमुटाव के कारण 2 जून, 1995 को बसपा ने समर्थन वापसी की घोषणा कर दी, जिससे मुलायम सिंह यादव की सरकार गिर गई।

लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस का कमरा नंबर 1 उस समय मायावती का ठिकाना था। सरकार का अल्पमत में आना सपा वालों को रास नहीं आया और पार्टी के विधायक अपने कार्यकर्ताओं के साथ मायावती जहाँ ठहरी थीं, वहाँ कूच कर गए। कमरे में बैठ कर अपने विधायकों के साथ बैठक कर रहीं मायावती को घेर लिया गया और उन पर हमला कर दिया गया। दोपहर के तीन बजते-बजते समाजवादी पार्टी के नेताओं ने वहाँ अपना कब्ज़ा जमा लिया था।

समाजवादी पार्टी के नेता चिल्ला-चिल्ला कर मायावती को गालियाँ बक रहे थे। बसपा विधायकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन पर ही लात-घुसे बरसने लगे। 5 बसपा विधयकों को घसीटते हुए गाड़ी से मुख्यमंत्री आवास ले जाया गया। मारपीट कर कइयों से कोरे कागज पर ही हस्ताक्षर करा लिया गया। रात भर उन्हें बंदी बना कर रखा गया। वरिष्ठ बसपा नेता आरके चौधरी के साथ मारपीट हुई। वो किसी तरह कमरे में बंद हुए। कुछेक पुलिसकर्मियों को छोड़ दें तो पूरा पुलिस-प्रशासन सपा के साथ था।

अतिथि गृह की बिजली-पानी की सप्लाई काट दी गई थी और तत्कालीन लखनऊ एसएसपी आराम से सिगरेट फूँक रहे थे। मुख्यमंत्री कार्यालय की धमकी थी कि बल प्रयोग न किया जाए। जिला मजिस्ट्रेट ने इसके खिलाफ विरोध जताया तो आधी रात में उनका तबादला कर दिया गया। यही वो घटना थी, जिसने मायावती और मुलायम सिंह यादव को जानी दुश्मन बना दिया था। भाजपा और केंद्र सरकार के हस्तक्षेप से मामला शांत हुआ। मायावती और उनके साथी नेता कमरे से बाहर निकले को तैयार नहीं थे, ऐसे में उन्हें बार-बार यकीन दिलाना पड़ा कि अब खतरा टल गया है।

भाजपा विधायक ब्रह्मदत्त द्विवेदी: एक संघी ने जान पर खेल कर दलित महिला को गुंडों से बचाया

आज दलितों की बात करने वाली समाजवादी पार्टी तब एक दलित नेता पर हमले को लेकर चुप रहती है। सपा के गुंडों ने मायावती के साथ मारपीट की और उनके कपड़े तक फाड़ डाले। एक महिला की आबरू से खुलेआम खिलवाड़ किया गया। मायावती को एक कमरे में बंद कर दिया गया था। ऐसे में उस उन्मादी भीड़ के बीच भाजपा के विधायक और RSS से जुड़े रहे ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने अपने बहादुरी का प्रदर्शन किया और वहाँ पहुँच कर मायावती को गुंडों से बचाया।
दबंग नेता की छवि वाले ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने सपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। इसी घटना के बाद से मायावती उन्हें अपना भाई मानने लगी थीं और उनके खिलाफ कभी बसपा ने अपने उम्मीदवार नहीं खड़ा किए। ब्रह्मदत्त द्विवेदी चूँकि प्रशिक्षित संघी थे, उन्हें लाठी चलाना और लड़ाई की कलाबाजियाँ भी बखूबी आती थीं, जिनका उन्होंने सही समय पर इस्तेमाल किया – अपनी जान पर खेल कर। हमेशा भाजपा के खिलाफ रहीं मायावती ने ब्रह्मदत्त द्विवेदी के लिए चुनाव प्रचार तक किया
ये भी जानने लायक है कि ब्रह्मदत्त द्विवेदी की 10 फरवरी, 1997 को हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में गैंगस्टर संजीव माहेश्वरी और सपा के पूर्व विधायक विजय सिंह का नाम सामने आया था। दोनों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई। हालाँकि, निचली अदालतों से चलते-चलते ये मामला अब सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। मायावती इस हत्याकांड के बाद फूट-फूट कर रोई थीं। 1977 और 1985 में फर्रुखाबाद विधानसभा से जीत दर्ज करने वाले द्विवेदी ने 1991, 1993 और 1996 में वहाँ से हैट्रिक भी लगाई थी।

उस हत्याकांड में उनके अंगरक्षक ब्रजकिशोर तिवारी की भी जान चली गई थी। उनकी हत्या के बाद भाजपा ने उनकी पत्नी प्रभा द्विवेदी को फर्रुखाबाद से उम्मीदवार बनाया था। तब मायावती ने ब्रह्मदत्त द्विवेदी को ‘शहीद’ बताते हुए उनके लिए लोगों से वोट डालने की अपील की थी। 2017 में भाजपा ने उनके बेटे मेजर सुनील दत्त त्रिवेदी को टिकट दिया और वो यहाँ से जीत कर विधायक बने। ब्रह्मदत्त राम मंदिर आंदोलन में भी सक्रिय थे और 1971 में वार्ड संख्या 6 से सभासद चुने जाने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

गेस्ट हाउस कांड के 24 वर्षों बाद फिर एक हो गए थे मायावती और मुलायम सिंह यादव

इस मामले में लखनऊ के हजरतगंज पुलिस थाने में मुलायम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव, सपा के वरिष्ठ नेता धनीराम वर्मा, मोहम्मद आजम खान और बेनी प्रसाद वर्मा जैसों के खिलाफ 3 मुक़दमे दर्ज किए गए थे। फोटोग्राफर्स की कई तस्वीरें बतौर सबूत पेश की गईं। CB-CID ने इस मामले की जाँच अपने हाथ में ली। सरकारें बदलती रहीं और ये मुकदमा लम्बा खिंचता रहा। लेकिन, 2019 में ‘मोदी लहर’ को रोकने के लिए जब दोनों नेता साथ आए तो मायावती ने ये मुक़दमे वापस ले लिए थे।
हालाँकि, इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों को अच्छे परिणाम नहीं मिले। हाँ, बसपा ज़रूर 2014 के शून्य से 10 पर पहुँच गई। लेकिन, सपा 5 की 5 पर ही अटकी रह गई। भाजपा ने फिर से फिर से 62 सीटें अपने नाम कर ली। परिणाम ये हुआ कि सपा-बसपा का गठबंधन, जिसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ‘बुआ-बबुआ’ भी कहते हैं, टूट गई। अक्टूबर 2020 में ‘बबुआ’ ने ‘बुआ’ को धोखा देते हुए बसपा के 7 विधायकों को तोड़ कर अपनी पार्टी में मिला लिया।
गेस्ट हाउस कांड में जिस तरह के नारे लग रहे थे, उनमें चर्मकार समाज के लिए गलत शब्दों का इस्तेमाल करते हुए ‘ये पागल हो गए है, हमें उन्हें सबक सिखाना होगा’ जैसे आपत्तिजनक नारे भी थे। बसपा विधायकों के परिवारों को खत्म करने की बातें की जा रही थीं। ‘इस च#@र (जातिसूचक, गाली के सन्दर्भ में) औरत को उसकी माँद से घसीट कर निकालो’ जैसी भद्दी और भड़काऊ बातें की जा रही थीं। इसके बाद भाजपा के समर्थन से मायावती की सरकार बनी। उन्होंने एक समिति बना कर जाँच का जिम्मा सौंपा। 74 लोगों के खिलाफ आरोप-पत्र भी दायर हुए।

उत्तर प्रदेश : समाजवादी पार्टी में वरिष्ठ नेताओं का हो रहा अपमान

समाजवादी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता किस तरह अपने वरिष्ठ नेताओं का अपमान करते है, इसका एक और सबूत उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक प्रदर्शन के दौरान मिला। पूर्व मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता रविदास मल्होत्रा को उनकी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं ने हजरतगंज में धरना स्थल पर धक्का मारकर किनारे कर दिया। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद जब पार्टी की किरकिरी होने लगी तो सपा के नगर अध्यक्ष को सफाई देनी पड़ी।

12 अगस्त, 2021 को गंदा पानी पीने के कारण कई लोगों के बीमार होने के कारण सपा कार्यकर्ताओं ने नगर निगम कार्यालय में नगर निगम के खिलाफ प्रदर्शन किया और नगर आयुक्त को हटाने की मांग की। इस दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता रविदास मल्होत्रा भी पहुंचे। वो भी कार्यकर्ताओं का साथ देने के लिए धरना स्थल पर बैठ गए। लेकिन वहां पहले से बैठे लखनऊ महानगर अध्यक्ष सुशील दीक्षित को उनका बीच में बैठना रास नहीं आया। उन्होंने मल्होत्रा को धक्के मारना शुरू कर दिया। सपा कार्यकर्ताओं ने अपने वरिष्ठ नेता का किस तरह अपमान किया, उसे आप भी देख सकते हैं।

यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही समाजवादी पार्टी लोगों के निशाने पर आ गई। लोगों ने पार्टी में वरिष्ठ नेताओं के साथ बर्ताव को लेकर सवाल उठाया। कई लोगों ने कहा कि जब से अखिलेश यादव के हाथों में पार्टी की कमान आयी है, तब से वरिष्ठ नेताओं को किनारे किया जाने लगा है। अब लोग पूछ रहे हैं कि क्या यही है समाजवाद ?

सोशल मीडिया पर हो रही आलोचना और पार्टी के दवाब बाद सपा के नगर अध्यक्ष सुशील दीक्षित ने जिस तरह सफाई दी, वो भी कम दिलचस्प नहीं है। उन्होंने अपनी सफाई में जो कुछ कहा, वो वीडियो देखने के बाद किसी के गले के नीचे उतरने वाला नहीं है। सुशील दीक्षित ने रविदास मल्होत्रा के साथ वीडियो जारी कर कहा कि मैं रविदास जी को पहचान नहीं पाया। प्रदर्शन दोपहर के समय किया जा रहा था, ऐसे में वहां गर्मी का माहौल था, जिसके चलते उन्हें चक्कर आ रहा था।

उत्तर प्रदेश : ‘विधायक रहे हैं, पेशाब पिला देंगे तुम लोग को हम’ – विजय पाल, पूर्व MLA और सपा नेता ने दी UP पुलिस को धमकी

                             पुलिसकर्मियों को धमकाते पूर्व विधायक व सपा नेता विजयपाल
उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद में पत्नी के फरीदपुर ब्लॉक प्रमुख का चुनाव हारने के बाद पुलिस से हुई बहस में पूर्व विधायक एवं समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता विजयपाल सिंह ने अधिकारियों को धमकाते हुए पेशाब पिलाने की बात कही है। पूर्व विधायक ने पुलिसकर्मियों को धमकाते हुए कहा कि प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार आने पर वे अधिकारियों को पेशाब पिलाएँगे। विजयपाल सिंह की धमकी का वीडियो वायरल हो गया है।

वहीं, उत्तर प्रदेश भाजपा नेता शलभमणि त्रिपाठी ने विजयपाल सिंह का वीडियो शेयर करते हुए कुछ ऐसा ही लिखा है। उन्होंने ट्वीट में लिखा है, “समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक विजय सिंह हैं, कह रहे हैं कि अपनी सरकार में बात न मानने वाले पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों और सियासी विरोधियों को पेशाब पिलवाते थे, भाजपा सरकार में नहीं पिला पा रहे हैं तो बहुत गुस्से में हैं।”

पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने धमकी भरे इस वीडियो का संज्ञान लिया है और फरीदपुर थाने में तैनात दारोगा राजकुमार की तहरीर पर पूर्व विधायक विजयपाल सिंह और उनके 30 अज्ञात साथियों पर गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस ने वीडियो में दिखाई दे रहे सपा कार्यकर्ताओं की पहचान करना शुरू कर दिया है।

एसपी देहात राजकुमार अग्रवाल का कहना है कि पूर्व विधायक विजयपाल सिंह ने सत्ता में आने पर पुलिस को अंजाम भुगतने की धमकी दी है। इस प्रकरण में दरोगा की तहरीर पर थाना फरीदपुर में मुकदमा पंजीकृत कर लिया गया है।

वर्ष 2012 में विजयपाल सिंह फरीदपुर विधानसभा से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के विधायक निर्वाचित हुए थे। अब वे समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं।

दरअसल, ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में पूर्व विधायक विजयपाल सिंह की पत्नी सुनीता सिंह को फरीदपुर के वर्तमान विधायक श्याम बिहारी लाल की भाभी और भाजपा उम्मीदवार सोनम ने 21 मतों से हरा दिया है। हार के बाद विजयपाल सिंह अपनी पत्नी को लेने के लिए ब्लॉक जा रहे थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें और उनके समर्थकों की कार रोक लिया। इस पर विजयपाल सिंह नाराज हो गए और पुलिस से बहस करने लगे। उन्होंने सरकार आने पर देख लेने की धमकी दी।

जुलाई 10 को हुए ब्लॉक प्रमुख चुनावों में पूर्व विधायक की पत्नी और वर्तमान विधायक की भाभी सामने सामने थीं। इसलिए दोनों के बीच जारी तानातनी को देखते हुए पुलिस ने विधि-व्यवस्था को कायम रखने के लिए तमाम उपाय किये थे। पुलिस ने ब्लॉक ऑफिस की ओर जाने वाले तमाम रास्तों पर बैरिकेडिंग कर बंद कर दिया था। ब्लॉक ऑफिस की ओर सिर्फ मतदाता और उनके सहायक ही जा सकते थे।

चुनाव परिणाम घोषित होने और पत्नी के हार जाने के बाद पूर्व विधायक विजयपाल सिंह पार्टी कार्यकर्ताओं को लेकर पत्नी सुनीता सिंह को लेने के लिए मतदान केंद्र जा रहे थे। उसी दौरान पुलिसकर्मियों ने उनकी कार को रोक लिया, इसके बाद सपा के कार्यकर्ता मौके पर इकट्ठा होकर हंगामा करने लगे। सपा कार्यकर्ता अपने प्रत्याशी को कार से लाने की जिद शुरू करने लगे। हालाँकि, सुनीता सिंह पैदल चली आईं, उसे देखकर सपा कार्यकर्ता भड़क गए।

उत्तर प्रदेश : मुलायम सरकार ने मुख्तार अंसारी पर POTA लगाने वाले जिस DSP को भेज दिया था जेल, योगी सरकार ने वापस लिया केस

                              योगी आदित्यनाथ, शैलेन्द्र कुमार सिंह और मुख़्तार अंसारी (बाएँ से दाएँ)
उत्तर प्रदेश के खूँखार माफिया नेता मुख्तार अंसारी के खिलाफ POTA (आतंकवाद निरोधक अधिनियम, 2002) के तहत कार्रवाई करने वाले पूर्व डिप्टी SP शैलेन्द्र कुमार सिंह को यूपी सरकार से बड़ी राहत मिली है। उनके खिलाफ दर्ज मुकदमा योगी सरकार ने वापस ले लिया है। जनवरी 2004 में वे यूपी STF की वाराणसी यूनिट के प्रभारी डिप्टी एसपी थे। उन्होंने भाजपा विधायक कृष्णनंदन राय हत्याकांड में अहम खुलासा किया था।

उन्होंने पता लगाया था कि इस हत्याकांड के लिए मुख्तार अंसारी ने ‘लाइट मशीनगन (LMG)’ की खरीद की थी। साथ ही उन्होंने उस LMG को बरामद करने में भी सफलता प्राप्त की थी। तब राज्य में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सपा की सरकार थी। तत्कालीन राज्य सरकार शैलेन्द्र के इस कदम से नाराज़ हो गई थी और उन पर POTA वापस लेने का दबाव बनाया जाने लगा था। इसके आगे झुकने से इनकार करते हुए शैलेन्द्र सिंह ने यूपी पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया था।

इस्तीफा देने के कुछ महीने बाद ही वाराणसी के कैंट थाने में उनके खिलाफ DM कार्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी लालजी की तरफ से डीएम दफ्तर के रेस्ट रूम में घुसकर तोड़फोड़, मारपीट और हंगामा करने की FIR दर्ज कराई गई थी। पुलिस ने तुरंत चार्जशीट भी दाखिल कर दी थी और शैलेन्द्र को जेल जाना पड़ा था। अब इस केस को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने वापस ले लिया है। शैलेन्द्र ने इस पर ख़ुशी जताते हुए कहा:

“राजनीति से प्रेरित होकर मेरे ऊपर वाराणसी में आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया गया था और मुझे जेल में डाल दिया गया था। लेकिन, जब योगी जी की सरकार बनी तो उक्त मुकदमे को प्राथमिकता के साथ वापस लेने का आदेश पारित किया गया, जिसे CJM न्यायालय द्वारा मार्च 6, 2021 को स्वीकृति प्रदान की गई। न्यायालय के आदेश की प्रति आज ही प्राप्त हुई। मैं और मेरा परिवार योगी जी की इस सहृदयता का आजीवन ऋणी रहेगा।”

2004 में जब मैनें माफिया मुख्तार अंसारी पर LMG केस में POTA लगा दिया था, तो मुख्तार को बचाने के लिए तत्कालीन सरकार ने मेरे ऊपर केस खत्म करने का दबाव बनाया। जिसे न मानने के फलस्वरूप मुझे Dy SP पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। इस घटना के कुछ महीने बाद ही तत्कालीन सरकार के इशारे पर, राजनीति से प्रेरित होकर मेरे ऊपर वाराणसी में अपराधिक मुकदमा लिखा गया और मुझे जेल में डाल दिया गया।
लेकिन जब मा. योगी जी की सरकार बनी तो, उक्त मुकदमे को प्राथमिकता के साथ वापस लेने का आदेश पारित किया गया, जिसे मा. CJM न्यायालय द्वारा 6 मार्च, 2021 को स्वीकृति प्रदान की गई। मा. न्यायालय के आदेश की नकल आज ही प्राप्त हुई।
मैं और मेरा परिवार मा. योगी जी की इस सहृदयता का आजीवन ऋणी रहेगा। संघर्ष के दौरान मेरा साथ देने वाले सभी शुभेक्षुओं का, हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
जय हिंद 🙏

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शैलेन्द्र सिंह ने संघर्ष के दिनों में साथ देने वाले सभी लोगों को भी धन्यवाद दिया। सहायक अभियोजन अधिकारी की तरफ से दी गई रिपोर्ट के आधार पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (वाराणसी) ने मुकदमा वापस लेने का आदेश जारी किया। फरवरी 2004 में ततकालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री को भेजे पत्र में शैलेन्द्र ने आरोप लगाया था कि LMG जब्ती केस में मुख़्तार अंसारी का नाम हटाने के लिए उन पर ऊपर से बड़ा दबाव बनाया जा रहा है।

पंजाब की जेल में बंद मुख़्तार अंसारी के उत्तर प्रदेश प्रत्यर्पण में वहाँ की कॉन्ग्रेस सरकार कई महीनों से अड़ंगा लगा रही थी। 5 दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि गैंगस्टर मुख्तार अंसारी दो सप्ताह के भीतर उत्तर प्रदेश की बांदा जेल में शिफ्ट किया जाए। कोर्ट ने कहा था कि बांदा जेल के अधीक्षक चिकित्सा सुविधाओं की देखरेख करेंगे। पंजाब सरकार की तरफ से दावा किया गया था कि किसी राज्य को इस प्रकार के स्थानांतरण का कोई मौलिक अधिकार नहीं है।

प्रियंका वाड्रा ने फिर से देश को पप्पू बनाया, मोदी विरोध में रेलवे का नया नामकरण कर दिया

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आज मोदी और योगी विरोधियों की हालत इतनी पतली हो गयी है कि अर्थ का अनर्थ करने को तुले हुए हैं।  
सोनिया, प्रियंका और राहुल को कम से कम इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में विपक्ष की भूमिका निभाते सत्तारूढ़ इंदिरा के दिल-ओ-दिमाग में ऐसी जगह बनायी की विषम परिस्थितियों में विपक्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी से जरूर परामर्श करती थी। लेकिन इंदिरा गाँधी और पी.वी.नरसिम्हा राव के बाद से कांग्रेस से राजनीतिक दृष्टि लुप्त होती चली गयी। जिस कारण विपक्ष में आते-आते कांग्रेस में कोई ऐसा नेता नहीं, जिससे सत्तारूढ़ भाजपा के नरेंद्र मोदी विषम परिस्थितियों में किसी भी विपक्षी पार्टी से परामर्श कर सके। 
जिसे देखो दुश्मन देश से गुप्त मंत्रणा कर जनता को मूर्ख बनाकर, मोदी पर एक के बाद दूसरा प्रहार करने से नहीं चूक रहे। कोई मोदी को हराने पाकिस्तान जा रहा है, कोई चीन, क्या ये लोग संविधान की शपथ लेकर संविधान के विरुद्ध काम कर संविधान को अपमानित नहीं कर रहे, क्यों ऐसे नेताओं को मान-सम्मान दिया जाए, यह निर्णय जनता को करना है। भारत के गौरवमयी वास्तविक इतिहास को धूमिल करने वाले भी ये ही लोग हैं। 
लोकतंत्र है विरोध करें या समर्थन ये उनका अपना हक है पर मोदी का विरोध करके आप समर्थन किसका कर रहे हो? ये बडा गंभीर सवाल है इसलिए निर्णय भी गंभीरता पूर्वक ही होना चाहिए। 
इनकी राजनीति नहीं बल्कि सियासत का नमूना देखिए:

क्या मुलायम, लालू, मायावती, सोनिया, राहुल, केजरीवाल, ममता बनर्जी, वामपंथी ये सब क्या नरेन्द्र मोदी से बेहतर है? या इनका रिकॉर्ड बेहतर?
क्या नरेन्द्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्रीकाल की तुलना मे ममता बनर्जी, अखिलेश आदि बेहतर नजर आता है? तुलना करनी है तो देखिए :
राजनीति मे प्रवेश के समय लालू और मुलायम,
दोनों के घर की ऐसी स्थिति थी की, 1 के घर पर साइकिल और एक के घर पर लालटेन खरीदने तक के पैसे नहीं थे, जाति के नाम पर चलने वाले नेता, आज अरबपति है। 
रामगोपाल चार्टर्ड प्लेन में घूमता है, तो शिवपाल महँगी ऑडी मे कहाँ से आया इतना अकुत धन? क्या ये लोग नरेन्द्र मोदी और योगी से बेहतर है ?
* सोनिया के बेटा-बेटी और दामाद आज सभी अरबपति है, 10 साल का  इनका राज हाल में ही  बीता है, क्या ये नरेन्द्र मोदी और योगी से बेहतर है?
* 35 साल बंगाल में राज करने वाले वामपंथी, नरेन्द्र मोदी से बेहतर है ?
* 5 साल केजरीवाल, 5 साल केजरीवाल, का विज्ञापन चलाकर दिल्ली के लोगों को चुना लगाने वाला, WIFI, CCTV, 150 कॉलेज, 500 स्कूल, मजहब देखकर सियासत करने वाला क्या ये नरेंद्र मोदी और योगी से बेहतर है?
* जब मायावती राजनीती करने निकली थी, और कांशीराम की साथी थी, तब उसके घर में दिया जलाने का धन नहीं था, साईकल से प्रचार करती थी, आज उसका सैंडल भी प्लेन से आता है, उसके भाई के पास 497 कंपनिया है, क्या मायावती नरेंद्र मोदी और योगी से बेहतर है?
Image may contain: 4 people, text that says 'दादी की नाक के दम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाली प्रियंका का दोगलापन भाजपा सरकार में गैंगस्टर विकास दुबे मारा गया कांग्रेस सरकार में जहरीली शराब पीने से 120 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई जिन कांग्रेसी सांसदों ने अपनी सरकार पर सवाल उठाए, उन्हें पार्टी से निकालने की तैयारी शुरु कर दी प्रियंका गांधी ने उसकी मौत पर घटिया राजनीति शुरु कर दी लेकिन प्रियंका के मुंह से एक शब्द नहीं फूटा'मोदी और योगी का विरोध करने वालो, विरोध करो, पर समर्थन किसका करना है ये तो तय करो। 
थोड़ा देश का भी सोचो, कितना बर्बाद करवाना है, कितना लूटवाना है? अरे बाहर निकलो जातियो के बंधनो से इसे उबारकर ये लूटेरे जनता को ही लूटते है। 
कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा सियासत चमकाने का कोई मौका नहीं चूकती। लेकिन इस कोशिश में वह देश को पप्पू बनाने से भी बाज नहीं आती है। जिस तरह से इनके जुमले आ रहे हैं, निश्चित रूप से राहुल गाँधी को बहुत पीछे छोड़ बची-कुची कांग्रेस को एकदम हाशिये से भी नीचे लाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगी। इस दृष्टि से परिवार गुलाम ठीक काम कर रहे हैं कि अध्यक्ष परिवार का ही सदस्य रहेगा, चाहे कांग्रेस गड्ढे में ही क्यों न चली जाए। वैसे गद्दे में जाने से ज्यादा दूर नहीं। 
आज फिर प्रियंका वाड्रा ने ऐसा कुछ किया, जिससे उनके चमचे कुछ ज्यादा ही उछलने लगे। दरअसल मैडम वाड्रा ने अटके हुए रिजल्ट और परीक्षाओं को लेकर केंद्र पर निशाना साधा। इस दौरान उन्होंने एक ट्वीट किया, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में रेलवे का नया नामकरण कर दिया।
वाड्रा ने जुमले से बनाया पप्पू
प्रियंका वाड्रा ने कर्मचारी चयन आयोग की सीजीएल परीक्षा के परिणाम घोषित करने और रेलवे की परीक्षा को लेकर छात्रों की मांग का समर्थन करते हुए ट्वीट किया। प्रियंका ने अपने ट्वीट में लिखा, “SSC और रेलवे ने कई सारी परीक्षाओं के परिणाम सालों से रोक कर रखे हैं। किसी का रिजल्ट अटका हुआ है, किसी की परीक्षा। कब तक सरकार युवाओं के धैर्य की परीक्षा लेगी, कब तक? युवाओं की बात सुनिए सरकार। युवा को भाषण नहीं नौकरी चाहिए।
रेलवे का नामकरण ‘SSCRaliwaystudents’

इस ट्वीट के साथ मैडम वाड्रा ने #speakupforSSCRaliwaystudents शेयर किया। इसमें रेलवे का एक नया नाम ‘SSCRaliwaystudents’ दिया गया है। इस नाम के सामने आते ही सोशल मीड‍िया पर कांग्रेस के चमचे उछलने लगे। कांग्रेस के जो चमचे कल तक कोरोना काल में JEE और NEET की परीक्षा आयोजित करने का विरोध कर रहे थे, वे अचानक रेलवे की परीक्षा को लेकर सोशल मीडिया में सक्रिय हो गए। 
प्रियंका के इस ट्वीट पर ट्विटर पर भी बहार आ गयी:





इससे पूर्व, ट्विटर पर आज प्रियंका का #SpeakUpForStudentSaftey ट्रेंड होता देख पूरी दुनिया हैरान-परेशान हो गई कि आखिर ये कौन सा शब्द है। यूजर्स ने पता लगाने की कोशिश कि ये ट्रेंड कहां से हो रहा है तो पता चला कि ये तो वाड्रा भौजी है। असल में नीट और जेईई परीक्षाओं को लेकर राबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक ट्वीट किया। प्रियंका ने ट्वीट के साथ हैशटैग SpeakUpForStudentSaftey इस्तेमाल किया। प्रियंका वाड्रा ने गलत अंग्रेजी लिखकर #SpeakUpForStudentSaftey को ट्रेंड करा पूरे भारतीयों को पप्पू बनाने की किस तरह कोशिश की आप भी देखिए- 



तहलका का चमत्कारी इंटरव्यू : ‘वो(राहुल गाँधी) नशेड़ी है, कुछ भी बोलता रहता है’

राहुल गांधी ने कहा- आगे बड़ा तूफान ...
मुझे एक सम्पूर्ण राजनीतिज्ञ बनना है। इसके लिए मुझे एकाध चुनाव हारने पड़ेंगे। अगर मैं चुनाव नहीं हारता हूँ तो मैं एक अच्छा नेता नहीं बन पाऊँगा। मैं हार से डरता नहीं हूँ। ये मेरी ज़िंदगी का हिस्सा है।“- ये पंक्तियाँ पहली बार सांसद बने एक ऐसे व्यक्ति की है, जो इसके 12 साल बाद देश की सबसे पुरानी पार्टी का अध्यक्ष बना। ये इंटरव्यू उन्होंने ‘तहलका’ में दिया था, जिससे कांग्रेस की फजीहत हुई थी और तरुण तेजपाल को कहा गया कि वो इसे फेक साबित कर दें। 
ये इंटरव्यू ‘तहलका’ के लिए विजय सिम्हा ने लिया था। बाद में ‘ज़ी न्यूज़’ से बात करते हुए उन्होंने बताया था कि ‘तहलका’ के संपादक तरुण तेजपाल ने राहुल गाँधी के 2005 के इस इंटरव्यू को दबा दिया था। सेक्स स्कैंडल में फँसे तरुण तेजपाल फ़िलहाल जेल में हैं। विजय सिम्हा ने कहा था कि शुरुआत में तरुण तेजपाल की आवाज़ में दम होता था और बैठक वगैरह में वो काफी प्रभाव डालते थे।
उन्होंने बताया कि वो 2005 में राहुल गाँधी से मिले थे, जो उस समय नए-नए राजनीति में आए थे और उन्होंने कांग्रेस व राजनीति के बारे में काफी चीजें कही थीं। कांग्रेस की समस्याओं पर भी उस इंटरव्यू में बात हुई थी। बकौल विजय सिम्हा, उस समय कई लोग कांग्रेस में इस चिंता में पड़ गए थे कि उनकी ‘नौकरी’ चली जाएगी और वो कहने लगे थे कि ये किस व्यक्ति से बात कर लिया, ये तो नशेड़ी है।
उन्होंने आगे बताया कि इसके बाद तरुण तेजपाल दबाव में आ गए। पहले तो उन्होंने डिफेंड किया कि उनके पत्रकार ने कुछ भी गलत नहीं किया है और सब ठीक है लेकिन बाद में वो अचानक से पलट गए। सिम्हा बताते हैं कि इस प्रकरण के कारण ही उनके मन में पहली बार तेजपाल को लेकर शंका हुई। बाद में पत्रकार विजय सिम्हा पर ही आरोप लगाए गए कि उन्होंने स्टिंग कर दिया या फिर काल्पनिक बातचीत को छाप दिया।
जबकि सिम्हा इन बातों को नकारते हैं। वो कहते हैं कि इन आरोपों की कोई सच्चाई नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया था कि तरुण ने इस स्टोरी को ‘किल’ कर दिया, दबा दिया। उनके अनुसार ऐसे कई पत्रकार थे, लेकिन हाथ में चीजें न होने के कारण वो कुछ कर नहीं पाते थे। नीचे संलग्न ‘ज़ी न्यूज़’ के वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे विजय सिम्हा ने उस इंटरव्यू को दबाए जाने के बारे में खुलासा किया।
क्या कहा था राहुल गाँधी ने तहलका के इंटरव्यू में 
ट्विटर पर ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ की ट्रेजरर शीला भट्ट ने इस इंटरव्यू के स्क्रीनशॉट्स शेयर किए और कहा कि उनकी आलमारी से ये राहुल गाँधी का पुराना इंटरव्यू निकल आया है, जो काफी प्रभावी है। सितम्बर 2005 के इस इंटरव्यू के बारे में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के पत्रकार दीप्तिमान तिवारी ने याद दिलाया कि कैसे इस इंटरव्यू को दबाने के लिए कांग्रेस ने ‘तहलका’ पर भारी दबाव बनाया था। 
तिवारी ने याद दिलाया कि कैसे कांग्रेस पार्टी के आगे झुकते हुए ‘तहलका’ ने इसे पहले अनौपचारिक बातचीत करार दिया। तब मैगजीन की ओर से कहा गया था कि ये तो सिर्फ एक बातचीत है, जिसे इंटरव्यू समझा जा रहा है लेकिन ये इंटरव्यू तो है ही नहीं। और तो और, इंटरव्यू लेने वाले विजय सिम्हा को बेइज्जत तक किया गया। दरअसल, उस इंटरव्यू में राहुल गाँधी ने ऐसी-ऐसी बातें की थीं कि कांग्रेस पार्टी की खासी फजीहत हुई थी।
                                                         साभार : ZeeNews
राहुल गाँधी ने इस इंटरव्यू की शुरुआत भारत को नंबर-1 बनाने की बात से की थी और कहा था कि इसके लिए 30 से कम उम्र वाले हर युवा को कोशिश करना होगा और वो इतिहास दोहराने का रिस्क नहीं ले सकते। नीचे हम बिंदुवार तरीके से राहुल गाँधी द्वारा दिए गए बयानों को उनके शब्दों में हूबहू पेश कर रहे हैं। इसके बाद आप समझ सकते हैं कि कॉन्ग्रेस ने इसे दबाने के लिए क्यों इतना प्रयास किया:
*अमेठी में काफी मुद्दे हैं। मैं तो सिर्फ एक सांसद हूँ। मुझे MPLAD फण्ड में 2 करोड़ रुपए मिलते हैं। इससे मैं ज्यादा से ज्यादा 8 किलोमीटर सड़क बना सकता हूँ। लेकिन हम अमेठी में 500 किलोमीटर सड़क बनाने में सक्षम हुए हैं। इससे ज्यादा हम क्या कर सकते हैं? कुछ भी तो नहीं। मैं अपने प्रभाव का उपयोग कर के मंत्रियों के सामने हाथ जोड़ कर कह सकता हूँ कि ‘भैया, ये कर दो’ और काम हो सकता है।
*उत्तर प्रदेश और बिहार अलग ही कैटेगरी में आते हैं। यहाँ सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। (ये पूछे जाने पर कि कांग्रेस फिर भी मुलायम सिंह यादव की सरकार का समर्थन क्यों कर रही है): ये ऐसा नहीं चलेगा। मैं इसका समर्थन नहीं करता। मैं इसे लेकर कुछ करूँगा।
*(मुलायम और लालू के समर्थन पर): मैं घूम-घूम कर लोगों को नहीं कह सकता कि मुलायम और लालू का क्या करना है। इसमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शामिल हैं। वही ये सब निर्णय लेते हैं। ये एक जटिल मुद्दा है। इसे छोड़ कर विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
*(अमेठी में कैसे काम करते हैं): मैं NGO के माध्यम से काम करता हूँ और मीडिया की इसमें कोई रूचि नहीं है। भारत 150 करोड़ लोगों का देश है। मीडिया चाहता है कि सब कुछ कल ही चुटकियों में हो जाए। ऐसा नहीं होता है। आप एक महीने बाद अमेठी आएँगे तो पाएँगे कि हर कांग्रेस नेता एक-दो छात्रों को पढ़ा रहा है। मेरा यही तरीका है।
*(शिक्षा में आईटी के उपयोग पर): आईटी को लेकर मीडिया में कुछ ज्यादा ही हाइप है। मुझे इसका प्रभाव एक सीमित क्षेत्र में ही दिख रहा। कर्नाटक व तमिलनाडु में अच्छे कार्य हो रहे लेकिन हर जगह ऐसी स्थिति नहीं है।
*मुझे कोई कहता है कि आप फेल हो रहे हो तो मैं कहता हूँ कि ये ठीक है। उत्तर प्रदेश में कहीं कुछ भी अच्छा हो रहा है तो ये मेरी सफलता है। देश में कोई भी सांसद इतना काम नहीं कर रहा, जितना मैं कर रहा हूँ।
*दम्भ को लेकर मेरा पहला पाठ मुझे यूके में एक बाथरूम में मिला, जब मैं एक कम्पनी में काम करता था। (एक अजीब कहानी जो समझ नहीं आई।)
कांग्रेस वर्किंग कमिटी का सदस्य होकर मैं प्रधानमंत्री को नहीं बोल सकता कि आप क्या करो और क्या नहीं। मैं पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और मंत्रियों को कुछ करने, न करने नहीं बोल सकता हूँ।
*लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं विदेश क्यों जाता हूँ। मैं बने-बनाए ढर्रे पर राजनीति करने नहीं बल्कि उसे बदलने आया हूँ। मैं अलग-अलग देशों के लोगों से मिलूँगा, वो हमसे हमारी समस्याओं के बारे में पूछते हैं, उसके समाधान पर बात होती है।
जनता की प्रतिक्रियाएं :-
राहुल गाँधी इस इंटरव्यू में काफी कन्फ्यूज नज़र आ रहे हैं। वो खुद को लाचार दिखाने के लिए कहते हैं कि उनके पास फंड्स नहीं है, वो विदेश आना-जाना जारी रखेंगे क्योंकि इससे भारत का फायदा है, पीएम व मंत्रियों को वो कुछ करने, न करने को नहीं बोल सकते। वो ये भी कहते हैं कि हाथ जोड़ के निवेदन कर सकते हैं। लालू-मुलायम के समर्थन पर भी वो कुछ-कुछ बोलते हैं। बाथरूम वाली कहानी क्या थी, ये हमारे समझ में अब तक नहीं आई।
इन्हीं कारणों से कांग्रेस ने इसे दबा दिया और इसके लिए तरुण तेजपाल का सहारा लिया। विजय सिम्हा ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि वो सीनियर एडिटर थे लेकिन रिपोर्ट तो तेजपाल को ही करते थे, इस कारण वो कुछ नहीं कर पाए। एक पत्रकार की मेहनत को एक पार्टी विशेष को खुश करने के लिए दबा दिया गया। हालाँकि खुलासा तो यह भी होना चाहिए कि किन कांग्रेस नेताओं ने राहुल गाँधी को नशेड़ी बताते हुए कहा था कि ये कुछ भी बोलते रहते हैं।