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राहुल गाँधी के लिए हिंदू ‘चरमपंथी’, नरेंद्र मोदी की ईमानदारी के विरोधी भी कायल, जेट विमान से आता था मायावती का सैंडल: जूलियन असांजे की विकिलीक्स ने भारतीय नेताओं पर भी किए थे खुलासे


पूरी दुनिया में खुफिया कागजों का खुलासा कर हंगामा मचा देने वाले विकिलीक्स के फाउंडर जूलियन असांजे लंदन की जेल छूटकर अपने देश ऑस्ट्रेलिया पहुँच गए हैं। उनकी अमेरिका के साथ डील हो गई है। उन्हें अमेरिका के न्याय विभाग के सामने अपने आप को एक मामले में दोषी मान लिया है, जिसकी पाँच वर्ष की सजा वह पहले ही लंदन में काट चुके हैं।

विकिलीक्स के खुलासों से भारत में भी काफी हंगामा मचा था। विकिलीक्स के खुलासों में दावा किया गया था कि राहुल गाँधी हिन्दुओं में धार्मिकता को इस्लामी जिहाद से बड़ा खतरा मानते थे। राहुल गाँधी के अलावा विकिलीक्स में तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को लेकर भी कई खुलासे हुए थे।

राहुल गाँधी ने हिन्दुओं को बताया था खतरा

विकिलीक्स ने राहुल गाँधी और तत्कालीन अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर के बीच हुई बातचीत का खुलासा किया था। इस विकिलीक्स में दावा था कि राहुल गाँधी ने टिमोथी रोमर से एक बातचीत में हिन्दू चरमपंथियों को इस्लामी आतंक से बड़ा खतरा बताया था। अमेरिकी राजदूत के भारत में इस्लामी आतंक को लेकर बात करने पर उन्होंने उनका पूरा ध्यान हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी पर मोड़ने का प्रयास किया था। उन्होंने अमेरिका को हिन्दुओं को लेकर चेताया भी था।
राहुल गाँधी का कहना था कि ऐसे समूह जो भारत में ही पनपे हैं और पाकिस्तान और इस्लामी समूहों की तरफ से आने वाले आतंकी हमलों का जवाब देने की सोचते हैं, उन पर अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। संभवतः उनका इशारा मालेगाँव बम धमाकों की तरफ रहा होगा, इस मामले में कई निर्दोष हिन्दू कार्यकर्ताओं को तब फंसाया गया था।
राहुल गाँधी ने टिमोथी रोमर से बातचीत में यह भी माना था कि भारत में लश्कर-ए-तैयबा को लेकर स्थानीय मुस्लिमों में समर्थन बढ़ रहा था और इसके सबूत भी थे। टिमोथी रोमर ने अपने देश अमेरिका को बताया था कि वह अमेरिकी हित साधने के लिए एक अच्छा साधन हो सकते हैं।
अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा दक्षिणी एशिया में तैनात किए गए रोबर्ट ओ ब्लेक ने अमेरिका को भेजे गए नोट का खुलासा भी विकीलीक्स ने किया था। विकिलीक्स के इस खुलासे में राहुल गाँधी के बारे में अमेरिका के विचारों को लिखा गया था। यह नोट पत्रकार सईद नकवी से बातचीत पर आधारित था।
ब्लेक ने कहा था कि राहुल गाँधी की कॉन्ग्रेस पार्टी में काफी कम लोग तारीफ़ करते हैं। यह भी कहा गया था कि राहुल गाँधी लगातार दिल्ली की राजनीति से बाहर रहते हैं। ब्लेक से बातचीत में नकवी ने कहा था कि राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस के लिए फायदे से ज्यादा नुकसान करते हैं।

मायावती रखती थीं 9 खाना बनाने वाले, सैंडल लेने भेजा था जेट

विकिलीक्स के एक खुलासे में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती पर भी बात की गई थी। अमेरिकी दूतावास में तैनात पोलोफ़ ने अपनी उत्तर प्रदेश यात्रा के बाद सारा ब्यौरा अमेरिका भेजा था। इसमें कहा गया था कि मायावती ने उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार को केंद्रीकृत कर दिया था। इसमें दावा किया गया था कि मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती काफी शानदार जीवन जीती थीं। उन्होंने अपना खाना बनाने के लिए 9 शेफ रखे हुए थे।
मायावती की विलासिता के विषय में यह भी बताया गया था कि उन्होंने एक बार अपनीं पसंदीदा सैंडल मँगाने के लिए मुंबई को एक खाली विमान भेजा था। इसी खुलासे में दावा था कि मायावती ने अपने एक मंत्री को उठक बैठक भी लगवाई थी क्योंकि वह बिना उनकी इजाजत के उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के पास चला गया था।
अमेरिका को भेजे गए ब्यौरे में दावा था कि बसपा का टिकट लेने के लिए लगभग ₹1 करोड़ की धनराशि देनी पड़ती थी। इसमें यह भी कहा गया था कि इस दौरान अधिकांश पत्रकारों और नौकरशाहों के फोन तक टैप किए जाते थे। इसीलिए यह लोग मायावती के खिलाफ लिखने से बचते थे।

नरेन्द्र मोदी के विकास के बारे में की थी बात

विकिलीक्स में अमेरिका के मुंबई में काउंसल जनरल माइकल ओवेन और मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक मुलाकात का भी जिक्र था। इस मुलाक़ात में नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के विकास के विषय में ओवेन को बताया था। ओवेन ने भी गुजरात में हो रहे विकास की बात मानी थी। ओवेन ने अन्य नेताओं से भी बात की थी। इन नेताओं ने ओवेन को बताया था कि मोदी को रिश्वत नहीं दी जा सकती। इनमें कॉन्ग्रेस के नेता भी शामिल थे, इन्होने भी माना था कि गुजरात में विकास हो रहा है।

उत्तर प्रदेश : ‘… यही औकात है उसकी’ : KRK ने बसपा प्रमुख मायावती पर किया अपमानजनक ट्वीट, देवबंद में केस दर्ज

कोई महिला कितनी सहनशील हो सकती है, मायावती को देखना चाहिए। राजनीति में जितने जख्मी मोदी, योगी, अमित आदि हैं, मायावती भी कम नहीं। समाजवादी पार्टी प्रमुख रहे मुलायम सिंह ने क्या नहीं किया, वह दर्द गन्दी सियासत में "गेस्ट हाउस कांड" के नाम से चर्चित है। अगर KRK किसी महिला को सम्मान नहीं दे सकता तो अपमान करने का भी हक़ नहीं। मायावती एक महिला है। अगर मुसलमानों को टिकट देने के बाद भी कोई न जीते तो मायावती का क्या कसूर।    
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती के लिए अपशब्द बोलने के मामले में कमाल राशिद खान उर्फ KRK पर केस दर्ज हुआ है। उनके खिलाफ बसपा के जिला प्रमुख ने देवबंद थाने में शिकायत दी थी। ये शिकायत केआरके के एक पोस्ट के खिलाफ दी गई थी जिसमें उन्होंने मायावती को लेकर घटिया बात लिखी थी।

कमाल राशिद खान ने अपने ट्वीट में लिखा था- “बहन जी ने टिकट दिया! कौन है बहन जी? बहन जी को बोलो शौचालय साफ करें। यही औकात है उसकी।”

केआरके का यह ट्वीट देखने के बाद उनके ऊपर आईपीसी की धारा 500, 509 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

एसपी सागर जैन ने भी मीडिया को जानकारी दी कि बॉलीवुड अभिनेता कमाल राशिद खान, जिन्हें केआरके के नाम से जाना जाता है, पर बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की अध्यक्ष मायावती के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी करने के लिए देवबंद पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 500, 509 और एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ है।

इससे पहले मायावती को लेकर केआरके तब हमलावर हुए थे जब मायावती ने बयान दिया था कि मुस्लिम समाज ने बसपा को वोट नहीं दिया, तो आगे वो भी टिकट सोच समझकर देंगी। केआरके ने कहा था- “ना ही तेरी घटिया पार्टी का टिकट किसी मुस्लिम को चाहिए और न ही किसी मुस्लिम को तेरे को वोट देना है। अब अपने घर पर बैठकर सीएम बनने के सपने देख… देश को लूटने का मौका नहीं मिलेगा।”

इसके अलावा एक ट्वीट में केआरके ने कहा था- “हर चुनाव में हारने के बाद ये मायावती अपनी भड़ास मुस्लिमों पर उतारती है। ऐसा लगता है जैसे मुस्लिम इसके नौकर हैं। तुम्हें समझना होगा मायावती मुस्लिम तुम्हारे नौकर नहीं हैं। यूपी के मुस्लिम किसी भी पार्टी को वोट दे सकते हैं। तेरा कोई एहसान नहीं है यूपी के मुस्लिमों पर।”

इसके अलावा एक ट्वीट में केआरके ने ये भी आरोप लगाया था कि कॉन्ग्रेस और सपा को हराने के लिए बसपा ने भाजपा की मदद की।

उत्तर प्रदेश : ‘भीम’ के साथ ‘मीम’ को सवारी कराने से हाथी ने की तौबा: दिए थे 19 मुस्लिम उम्मीदवार, बोलीं मायावती- आगे सोच-समझकर ही दूँगी मौका

बसपा सुप्रीमो मायावती का भीम-मीम की सियासत से विश्वास उठ गया है। दलितों और वंचितों का दावा करने वाली बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने आगे से मुस्लिम उम्मीदवारों को सोच समझ कर मौक़ा देने की बात कही है। उत्तर प्रदेश के भीतर बसपा के मुस्लिम उम्मीदवारों की हार को देख कर साफ़ हो गया है कि यह भीम-मीम का फॉर्मूला तभी सफल है जब इसमें मुस्लिम वोटरों को अपना फायदा दिखता हो। इस बार उन्हें बसपा से फायदा नहीं दिखा, इसलिए बसपा के अपने समाज के उम्मीदवारों को भी किनारे कर दिया गया।

इस बात को बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी माना है। बसपा सुप्रीमो ने हताशाजनक परिणाम के बाद एक पत्र जारी किया गया है। इसमें का कहा गया है कि बसपा ने इस चुनाव में मुस्लिमों को काफी मौका दिया लेकिन मुस्लिम समाज उन्हें समझ नहीं पाया, ऐसे में वह पार्टी आगे सोच-समझ कर उनकी राजनीतिक भागीदारी पर निर्णय लेगी। यह एक तरह से बसपा का मुस्लिम राजनीति से दुराव का संकेत है, जिसको पत्र में स्पष्ट रूप से प्रकट किया गया है।

बसपा ने सबसे अधिक मुस्लिम उतारे, सभी हारे

बसपा ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश के भीतर सबसे अधिक मुस्लिम उम्मीदवार दिए थे। बसपा ने उत्तर प्रदेश में कई मुस्लिम बहुत और कई सामान्य सीटों पर भी मुस्लिम उम्मीदवार दिए थे। बसपा ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश के भीतर 19 मुस्लिमों को टिकट दिया था। उसने देश भर में 35 मुस्लिमों को टिकट दिया था। उसके सभी मुस्लिम उम्मीदवार हार गए हैं। उत्तर प्रदेश में उसके कोई भी मुस्लिम उम्मीदवार चुनावी लड़ाई में दूसरे नम्बर पर तक नहीं आ सके हैं।
कई सीटों पर उसके उम्मीदवारों को 1 लाख से भी कम वोट हासिल हुए हैं। इसके बाद ही बसपा सुप्रीमो का यह पत्र सामने आया है जिसमें उन्होंने मुस्लिम समाज के प्रति अपने गिले शिकवे कहे हैं। उनके इस पत्र से साफ़ है कि बसपा अब राजनीति का ट्रैक बदलेगी और उसमें मुस्लिमों का हिस्सा पहले से कम होगा।

मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों पर भी हारे बसपा के उम्मीदवार

बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार उन सीटों पर भी हार गए हैं जिन्हें बसपा के प्रभाव वाली माना जाता है। उत्तर प्रदेश के भीतर संभल, रामपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर, अमरोहा, आजमगढ़, और पीलीभीत जैसी मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों पर भी मुस्लिम उम्मीदवार दिए थे। यहाँ भी इसके कोई उम्मीदवार नहीं जीत सके। इन सभी सीटों पर बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार तीसरे नम्बर पर रहे। वह कहीं टक्कर में भी नहीं आ सके।
पीलीभीत, सहारनपुर और अमरोहा छोड़ का कोई बाकी सारी मुस्लिम प्रभाव वाली सीटें सपा के खाते में गईं, जो दिखाता है कि मुस्लिमों ने इस चुनाव में काफी रणनीतिक तरीके से सपा को अपना वोट दिया। इसके अलावा बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार वहाँ भी चुनाव नहीं जीत पाए जहाँ उनके सामने सपा ने हिन्दू उम्मीदवार दिए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मुरादाबाद की सीट है। यहाँ से सपा ने रूचि वीरा को टिकट दिया जबकि बसपा ने मोहम्मद इरफ़ान को, इस चुनावी लड़ाई में रूचि वीरा जीत गईं जबकि इरफ़ान बुरी तरह से हारे।
यह दिखाता है कि बसपा के भीम-मीम फॉर्मूला को नकारते हुए मुस्लिमों ने अपने पुराने मुस्लिम-यादव फॉर्मूला को बढ़त दिलाई। बसपा भी इस बात को समझ गई है कि दलितों को मुस्लिमों के साथ जोड़ने की सोशल इंजीनियरिंग उसके काम नहीं आने वाली और स्पष्ट रूप से उसने आगे से ऐसा करने से मना भी कर दिया है।

न NDA-न INDIA, अकेले लोकसभा चुनाव लड़ेगी BSP: मायावती- कांग्रेस के साथी भी उसके जैसे ही जातिवादी और पूँजीवादी

2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए से मुकाबले के लिए कांग्रेस विपक्षी दलों को एक साथ लाने के प्रयास कर रही है। इस क्रम में 18 जुलाई 2023 को बेंगलुरु में 26 दलों की बैठक हुई और गठबंधन का नाम INDIA रखा गया। इसी दिन 39 दलों वाले NDA की बैठक भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नई दिल्ली में हुई।

लेकिन जनता दल (सेक्युलर) JD(S), शिरोमणि अकाली दल (SAD), बहुजन समाज पार्टी (BSP), बीजू जनता दल (BJD), भारत राष्ट्र समिति (BRS), युवजन श्रमिक रायथु कांग्रेस पार्टी (YSRCP), इंडियन नेशनल लोक दल (INLD), ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) जैसे कुछ दल ऐसे भी हैं जो न तो विपक्ष की बैठक में दिखे और न एनडीए की। इनमें से बसपा ने अब अपना स्टैंड क्लियर कर दिया है। वह न तो एनडीए के साथ जाएगी और न विपक्षी गठबंधन के साथ। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती ने 19 जुलाई 2023 को बताया कि उनकी पार्टी अकेले लोकसभा चुनाव लड़ेगी।

मायावती ने विपक्षी गठबंधन और एनडीए दोनों के दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी पार्टी अकेले ही चुनाव लड़ेगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी अपने जैसी जातिवादी और पूँजीवादी सोच रखने वाली पार्टियों के साथ गठबंधन कर फिर से केंद्र की सत्ता में आने का सपना देख रही है। वहीं बीजेपी भी फिर से सत्ता में आने के लिए एनडीए को मजबूत बनाने में लगी है। साथ ही सत्ता में वापसी के दावे कर रही है। 300 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा कर रही है। लेकिन उनकी कथनी और करनी में भी विपक्षी गठबंधन की तरह ही अंतर है।

मायावती ने कहा, “हम अकेले चुनाव लड़ेंगे। हम राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना में अपने दम पर चुनाव लड़ेंगे। हरियाणा, पंजाब और अन्य राज्यों में वहाँ की क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं।” विपक्षी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनने को लेकर बसपा सुप्रीमो ने कहा, “ये पार्टियाँ लोगों के कल्याण के लिए काम नहीं करतीं। उन्होंने दलितों, मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के लिए कुछ नहीं किया है। सभी एक जैसे हैं। सत्ता में आते ही अपने वादे भूल जाते हैं। उन्होंने जनता से किया एक भी वादा पूरा नहीं किया। चाहे वह कांग्रेस हो या बीजेपी। यही सबसे बड़ा कारण है कि बीएसपी ने विपक्ष के साथ हाथ नहीं मिलाया है।”

जैसे 2024 से पहले बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन बनाने की कोशिश हो रही है, ऐसा ही प्रयोग 2019 के आम चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में हुआ था। सपा और बसपा ने पुराने मतभेद भूलाकर हाथ मिलाए थे। लेकिन ये चुनावों में बीजेपी को तगड़ी चुनौती देने में नाकाम रहे थे। इसके बाद दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए थे।

उत्तर प्रदेश : ‘तानाशाह मायावती ने कांशीराम को तड़पा कर मारा, माँ से अलग किया’: 206 से 4 सीटों पर पहुँची BSP

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा/BSP) की स्थिति से आज सब अच्छे से वाकिफ हैं। प्रचार में दिन पर दिन तेजी तो छोड़िए बसपा के नाम पर होने वाली किसी रैली की खबर भी मुश्किल से खबरों में आ रही है। पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने ही दो दिन पहले इन चुनावों के मद्देनजर आगरा रैली की तो लगा चुनावी पार्टी होने के नाते कोई औपचारिकता है जिसे प्रचार के दौरान पूरा किया जा रहा है, वरना उनका इससे भी मन उठ गया है…। 

इन चुनावों में बसपा के जो हाल हैं उन्हें देखना देश के लिए इसलिए भी अचंभित करने वाला है क्योंकि इस पार्टी का गठन एक सपने के साथ दलित नेता कांशीराम द्वारा किया गया था। उनके प्रयासों का ही नतीजा था कि एक समय तक बहुजन समाज पार्टी ने अन्य सभी पार्टियों को पछाड़कर अपनी जगह कायम की थी। लेकिन आज उनकी विचारधारा से भटकने के बाद पार्टी के हाल ऐसे हैं कि कोई न उन्हें पूछ रहा है और न कोई उनका साथ दे रहा है। हर जगह पार्टी के हाल खस्ता हैं और कुर्सी की लड़ाई में उनका दूर-दूर तक नाम नहीं है।

यूपी चुनावों से पहले आज एक बार फिर उस दौर को याद करें जब सत्ता के लिए संघर्ष करने वाली बहुजन समाज पार्टी का गठन हुआ था और दलितों के सबसे बड़े नेता कांशीराम ने मायावती को राजनीति में एंट्री दिलाकर उन्हें दलितों का चेहरा बनाया था।

कांशीराम द्वारा बहुजन समाज पार्टी का गठन और मायावती की एंट्री

समय 1984 का था जब डॉ भीम राव अंबेडकर के बाद सबसे बड़े दलित नेता कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की शुरुआत की थी। कांशीराम ही वह शख्सियत थे जिन्होंने विभिन्न पार्टियों में मौजूद दलित नेताओं को छांटकर उन्हें महसूस कराया कि एक पार्टी ऐसी होनी चाहिए जो दलितों के लिए समर्पित हो। अपने जमीनी कार्यों की बदौलत 14 अप्रैल 1984 को उन्होंने बहुजन समाज पार्टी को राजनीति अखाड़े में उतारा और तमाम दलित हितैषियों को अपने साथ जोड़ते गए। इसी क्रम में उन्हें आईएएस बनने का सपना देखने वाली मायावती भी मिलीं, जहाँ कांशीराम ने मायावती की क्षमता देख उनसे कहा कि अगर वो उनके साथ जुड़ती हैं तो वो उस मुकाम तक जाएँगी जहाँ सैंकड़ों आईएएस उनके आदेशों का पालन करेंगें।
आपातकाल के बाद राजनीति के चर्चित नाम राजनारायण ने दिल्ली की उस सभा को संबोधित करते हुए बार-बार ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग किया था, जहाँ मायावती भी मौजूद थीं और जिन्होंने राजनारायण को टोंकते हुए उन्हें हरिजन शब्द इस्तेमाल करने पर जमकर कोसा था। इसके बाद मायावती की जगह-जगह तारीफें हुईं और कांशीराम को भी इस संबंध में पता चला। मायावती की बेबाकी देख कांशीराम उनसे मिलने उनके घर गए और उन्हें अपने साथ जुड़ने को कहा। हालाँकि मायावती ने उन्हें बताया कि वो IAS बनना चाहती हैं, जिस पर कांशीराम ने उन्हें समझाया कि अगर वह उनके साथ जुड़ती हैं तो कई आईएएस उनके आदेशों को मानेंगे।

मायावती का चुनावी सफर

कांशीराम के कहने पर मायावती की जब राजनीति में एंट्री हुई तो धीरे-धीरे दलितों के बीच वह बड़ा चेहरा बनतीं गई। 1984 में बसपा ने उन्हें कैराना से चुनाव लड़ाया। 1985 में वो बिजनौर से उतारी गईं और 1987 में उन्होंने हरिद्वार में अपनी किस्मत आजमाई। हालाँकि राजनीति में उन्हें पहली सफलता 1989 को मिली जब वो बिजनौर से जीतीं। इसके बाद 1994 में भी वो राज्यसभा के लिए चुनीं गई। लेकिन असली किस्मत उनकी तब पलटी जब बसपा ने 3 जून 1995 को मायावती को यूपी का मुख्यमंत्री बना दिया। 
देश के सबसे बड़े राज्यों में शुमार यूपी की मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती की लोकप्रियता अलग स्तर पर पहुँच गई थी। उधर गेस्ट हाउस कांड के कारण भी उनकी चर्चा जगह-जगह थी। साल 1997 में मायावती ने दोबारा सीएम पद की शपथ ली। फिर 15 दिसंबर 2001 को वो दिन भी आया जब कांशीराम ने मायावती को इस पार्टी का प्रमुख बना दिया और कुछ सालों में धीरे-धीरे राजनीति से गायब होते गए। पार्टी में उनकी सक्रियता खत्म होते ही पार्टी के दिन भी ढलने लगे। मायावती के नेतृत्व में न केवल बसपा पर कांशीराम की विचारधारा से भटकने के आरोप लगे बल्कि 2006 में दलितों के दिग्गज नेता की मृत्यु के बाद उसके इल्जाम से भी मायावती अछूती नहीं रहीं।

कांशीराम की मौत के लिए मायावती जिम्मेदार?

स्वयं दलित नेता के परिजनों ने उनकी मृत्यु के लिए मायावती को जिम्मेवार माना। साल 2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार, कांशीराम के परिजनों ने मायावती पर आरोप लगाया था कि पार्टी में रहते हुए मायावती ने कांशीराम पर पार्टी अध्यक्ष बनने के लिए दबाव बनाया था। इसके साथ ही उन्हें तड़पाकर मारने, उन्हें उनकी माँ से अलग रखने, उनकी जुबान बंद करने की जिम्मेदार भी मायावती को कहा जाता है। साल 2014 में कांशीराम के परिवार ने मायावती को तानाशाह बताते हुए दावा किया कि वो मायावती हीं थीं जिन्होंने कांशीराम को उनकी माँ से अलग किया था और बाद में उनकी माँ उनके गम में चल बसीं थीं।

बसपा का UP में गिरता ग्राफ

कांशीराम की मौत के अगले ही साल 2007 में मायावती ने राज्य में 206 सीटों के साथ एक बड़ी जीत हासिल की थी, मगर उसके बाद के सालों में बसपा का ग्राफ राज्य में लगातार गिरता गया। 2012 में समाजवादी पार्टी ने मोर्चा मारा और 2017 में भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई। वहीं, कांशीराम की वो बसपा डूबती गई जिसे लेकर कभी अनुमान थे कि वो बहुजनों की राजनीति कर नई ऊँचाई हासिल करेगी।
साल 2022 के यूपी चुनावों में भी बहुजन समाज पार्टी की हालत एकदम खस्ता है। मायावती की बसपा से तमाम नेता अलविदा कह रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार साल 2017 के चुनावों में बहुजन समाज पार्टी के 19 विधायक चुने गए थे लेकिन आज इन पार्टी विधायकों की संख्या केवल और केवल 4 ही बाकी बची है। लोग हैरान है कि जो मायावती राज्य में 4 बार शासन कर चुकी हैं। पार्टी को उभारने के लिए 4 बार प्रदेश अध्यक्षों को बदल चुकी हैं। उनकी पार्टी की हालत इतनी खस्ता कैसे है कि अब उसमें केवल 4 विधायक ही शेष हैं, जिनके कारण वह न केवल कॉन्ग्रेस बल्कि भाजपा की सहयोगी पार्टी अपना दल तक से पीछे हैं।

गेस्ट हाउस कांड : ‘उस च#@र औरत को माँद से बाहर निकालो’: जब सपाई गुंडों ने मायावती के फाड़े थे कपड़े, एक संघी ने जान पर खेल बचाया

राजनीति वो चीज है, जो दोस्त को दुश्मन और दुश्मन को दोस्त बना देती है। कभी-कभी ये प्रतिद्वंद्वी को दोस्त, फिर उस दोस्त को दुश्मन, इसके बाद उस दुश्मन को दोस्त और फिर दोस्त को प्रतिद्वंद्वी बना देती है। कुछ ऐसा ही उदाहरण ‘गेस्ट हाउस कांड’ है है। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा ने कभी मिल कर सरकार बनाई थी और इस कांड के कारण दोनों दुश्मन बन गए। ‘मोदी लहर’ को थमने के लिए ढाई दशक बाद फिर दोस्त बने, लेकिन सफलता न मिलने के कारण वापस अलग हो गए।

ऐसे में आपके लिए ये जानना ज़रूरी है कि ये ‘गेस्ट हाउस कांड’ है क्या। आज इस घटना को भले 27 वर्ष हो गए, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति का ये अध्याय कभी पुराना होने का नाम नहीं लेता। अप्रैल 2019 में लोकसभा चुनावों के लिए पचार-प्रसार जोरों पर था, तब सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती का मैनपुरी में एक मंच पर आकर एक-दूसरे की प्रशंसा करना एक बड़ी खबर बन गई, क्योंकि 90 के दशक के मध्य की वो घटना लोगों के जेहन में अब भी हैं।

2 जून 1995: क्या है ‘गेस्ट हाउस कांड’ और मायावती के साथ क्या हुआ था

90 के दशक का शुरुआत वो समय था जब राम मंदिर के लिए आंदोलन अपने चरम पर था और उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा ने शीर्ष स्थान बनाया हुआ था। 1993 में भाजपा को रोकने के लिए मुलायम सिंह यादव की सपा और कांशीराम की बसपा ने गठजोड़ किया। तब ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’ वाला नारा भी इन दोनों दलों ने उछाला था। उत्तराखंड तब उत्तर प्रदेश से कट कर अलग नहीं हुआ था और सीटों की संख्या 422 हुआ करती थीं।

जहाँ सपा ने 256 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, बसपा ने 164 सीटें अपने हिस्से में पाई। चुनाव में इस गठबंधन की जीत हुई। कहा जाता है कि मुख्यमंत्री पद के लिए दोनों दलों के बीच ढाई-ढाई साल की सहमति बनी थी। विधानसभा में सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें मिली थीं, ऐसे में पहले मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। लेकिन, मनमुटाव के कारण 2 जून, 1995 को बसपा ने समर्थन वापसी की घोषणा कर दी, जिससे मुलायम सिंह यादव की सरकार गिर गई।

लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस का कमरा नंबर 1 उस समय मायावती का ठिकाना था। सरकार का अल्पमत में आना सपा वालों को रास नहीं आया और पार्टी के विधायक अपने कार्यकर्ताओं के साथ मायावती जहाँ ठहरी थीं, वहाँ कूच कर गए। कमरे में बैठ कर अपने विधायकों के साथ बैठक कर रहीं मायावती को घेर लिया गया और उन पर हमला कर दिया गया। दोपहर के तीन बजते-बजते समाजवादी पार्टी के नेताओं ने वहाँ अपना कब्ज़ा जमा लिया था।

समाजवादी पार्टी के नेता चिल्ला-चिल्ला कर मायावती को गालियाँ बक रहे थे। बसपा विधायकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन पर ही लात-घुसे बरसने लगे। 5 बसपा विधयकों को घसीटते हुए गाड़ी से मुख्यमंत्री आवास ले जाया गया। मारपीट कर कइयों से कोरे कागज पर ही हस्ताक्षर करा लिया गया। रात भर उन्हें बंदी बना कर रखा गया। वरिष्ठ बसपा नेता आरके चौधरी के साथ मारपीट हुई। वो किसी तरह कमरे में बंद हुए। कुछेक पुलिसकर्मियों को छोड़ दें तो पूरा पुलिस-प्रशासन सपा के साथ था।

अतिथि गृह की बिजली-पानी की सप्लाई काट दी गई थी और तत्कालीन लखनऊ एसएसपी आराम से सिगरेट फूँक रहे थे। मुख्यमंत्री कार्यालय की धमकी थी कि बल प्रयोग न किया जाए। जिला मजिस्ट्रेट ने इसके खिलाफ विरोध जताया तो आधी रात में उनका तबादला कर दिया गया। यही वो घटना थी, जिसने मायावती और मुलायम सिंह यादव को जानी दुश्मन बना दिया था। भाजपा और केंद्र सरकार के हस्तक्षेप से मामला शांत हुआ। मायावती और उनके साथी नेता कमरे से बाहर निकले को तैयार नहीं थे, ऐसे में उन्हें बार-बार यकीन दिलाना पड़ा कि अब खतरा टल गया है।

भाजपा विधायक ब्रह्मदत्त द्विवेदी: एक संघी ने जान पर खेल कर दलित महिला को गुंडों से बचाया

आज दलितों की बात करने वाली समाजवादी पार्टी तब एक दलित नेता पर हमले को लेकर चुप रहती है। सपा के गुंडों ने मायावती के साथ मारपीट की और उनके कपड़े तक फाड़ डाले। एक महिला की आबरू से खुलेआम खिलवाड़ किया गया। मायावती को एक कमरे में बंद कर दिया गया था। ऐसे में उस उन्मादी भीड़ के बीच भाजपा के विधायक और RSS से जुड़े रहे ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने अपने बहादुरी का प्रदर्शन किया और वहाँ पहुँच कर मायावती को गुंडों से बचाया।
दबंग नेता की छवि वाले ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने सपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। इसी घटना के बाद से मायावती उन्हें अपना भाई मानने लगी थीं और उनके खिलाफ कभी बसपा ने अपने उम्मीदवार नहीं खड़ा किए। ब्रह्मदत्त द्विवेदी चूँकि प्रशिक्षित संघी थे, उन्हें लाठी चलाना और लड़ाई की कलाबाजियाँ भी बखूबी आती थीं, जिनका उन्होंने सही समय पर इस्तेमाल किया – अपनी जान पर खेल कर। हमेशा भाजपा के खिलाफ रहीं मायावती ने ब्रह्मदत्त द्विवेदी के लिए चुनाव प्रचार तक किया
ये भी जानने लायक है कि ब्रह्मदत्त द्विवेदी की 10 फरवरी, 1997 को हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में गैंगस्टर संजीव माहेश्वरी और सपा के पूर्व विधायक विजय सिंह का नाम सामने आया था। दोनों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई। हालाँकि, निचली अदालतों से चलते-चलते ये मामला अब सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। मायावती इस हत्याकांड के बाद फूट-फूट कर रोई थीं। 1977 और 1985 में फर्रुखाबाद विधानसभा से जीत दर्ज करने वाले द्विवेदी ने 1991, 1993 और 1996 में वहाँ से हैट्रिक भी लगाई थी।

उस हत्याकांड में उनके अंगरक्षक ब्रजकिशोर तिवारी की भी जान चली गई थी। उनकी हत्या के बाद भाजपा ने उनकी पत्नी प्रभा द्विवेदी को फर्रुखाबाद से उम्मीदवार बनाया था। तब मायावती ने ब्रह्मदत्त द्विवेदी को ‘शहीद’ बताते हुए उनके लिए लोगों से वोट डालने की अपील की थी। 2017 में भाजपा ने उनके बेटे मेजर सुनील दत्त त्रिवेदी को टिकट दिया और वो यहाँ से जीत कर विधायक बने। ब्रह्मदत्त राम मंदिर आंदोलन में भी सक्रिय थे और 1971 में वार्ड संख्या 6 से सभासद चुने जाने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

गेस्ट हाउस कांड के 24 वर्षों बाद फिर एक हो गए थे मायावती और मुलायम सिंह यादव

इस मामले में लखनऊ के हजरतगंज पुलिस थाने में मुलायम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव, सपा के वरिष्ठ नेता धनीराम वर्मा, मोहम्मद आजम खान और बेनी प्रसाद वर्मा जैसों के खिलाफ 3 मुक़दमे दर्ज किए गए थे। फोटोग्राफर्स की कई तस्वीरें बतौर सबूत पेश की गईं। CB-CID ने इस मामले की जाँच अपने हाथ में ली। सरकारें बदलती रहीं और ये मुकदमा लम्बा खिंचता रहा। लेकिन, 2019 में ‘मोदी लहर’ को रोकने के लिए जब दोनों नेता साथ आए तो मायावती ने ये मुक़दमे वापस ले लिए थे।
हालाँकि, इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों को अच्छे परिणाम नहीं मिले। हाँ, बसपा ज़रूर 2014 के शून्य से 10 पर पहुँच गई। लेकिन, सपा 5 की 5 पर ही अटकी रह गई। भाजपा ने फिर से फिर से 62 सीटें अपने नाम कर ली। परिणाम ये हुआ कि सपा-बसपा का गठबंधन, जिसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ‘बुआ-बबुआ’ भी कहते हैं, टूट गई। अक्टूबर 2020 में ‘बबुआ’ ने ‘बुआ’ को धोखा देते हुए बसपा के 7 विधायकों को तोड़ कर अपनी पार्टी में मिला लिया।
गेस्ट हाउस कांड में जिस तरह के नारे लग रहे थे, उनमें चर्मकार समाज के लिए गलत शब्दों का इस्तेमाल करते हुए ‘ये पागल हो गए है, हमें उन्हें सबक सिखाना होगा’ जैसे आपत्तिजनक नारे भी थे। बसपा विधायकों के परिवारों को खत्म करने की बातें की जा रही थीं। ‘इस च#@र (जातिसूचक, गाली के सन्दर्भ में) औरत को उसकी माँद से घसीट कर निकालो’ जैसी भद्दी और भड़काऊ बातें की जा रही थीं। इसके बाद भाजपा के समर्थन से मायावती की सरकार बनी। उन्होंने एक समिति बना कर जाँच का जिम्मा सौंपा। 74 लोगों के खिलाफ आरोप-पत्र भी दायर हुए।

केजरीवाल के मंत्री इमरान हुसैन पर ऑक्सीजन कालाबाज़ारी करने पर टॉप ट्रेंड कर रहा है #OxygenChorAAP

दिल्ली में कोरोना बेकाबू है। लोग ऑक्सीजन की कमी से परेशान हैं। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार को दिल्ली हाईकोर्ट फटकार भी लगा चुकी है। ऑक्सीजन की कमी से जहां कोरोना मरीज मर रहे हैं, श्मशान और कब्रिस्तानों में लाशों की लाइन लग रही है, वहीं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के करीबी नवनीत कालरा और मंत्री इमरान हुसैन पर ऑक्सीजन कालाबाज़ारी करने का आरोप लगा है। अब जिस तरह केजरीवाल के करीबी ऑक्सीजन की कालाबाज़ारी में सामने आने से लगता है, कि मोदी सरकार को बदनाम कर लाशों पर राजनीति की जा रही है। फिर जब ऑक्सीजन ऑडिट करने का केजरीवाल सरकार द्वारा विरोध करना ही केजरीवाल की घिनौनी सियासत को प्रमाणित कर दिया है। जब पुणे में ऑडिट होते ही रोज की 30 टन ऑक्सीजन की बचत हो रही है। 
दिल्ली पुलिस ने खान मार्केट के जिस खान चाचा रेस्टोरेंट में छापेमारी करके सैकड़ों ऑक्सीजन कंसंट्रेटर बरामद किए हैं, उसका मालिक नवनीत कालरा केजरीवाल का करीबी बताया जा रहा है। इसी कालरा को केजरीवाल ने दिल्ली निर्माता बताया था। स्पष्ट है, जिस धूर्त को केजरीवाल निर्माता बताए और उसके मंत्री कभी राशन कार्ड तो कभी ऑक्सीजन की कालाबाज़ारी में शामिल हों, उस स्थिति में यह भी स्पष्ट हो रहा है कि केजरीवाल कैसी मानसिकता से हैं, किसी को अब बताने की जरुरत नहीं। जो मुख्यमंत्री केजरीवाल पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनाव दिमाग में रख काम कर रहा हो, उस केजरीवाल से पंजाब और उत्तर प्रदेश की जनता को पूछना चाहिए कि "जब दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी थी, तब क्या पंजाब के लिए दिल्ली वालों की ज़िंदगियों से खिलवाड़ किया जा रहा था?" क्यों?" सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो:  

अभी तक फ्री का माल खाने वाले जिस अरविन्द केजरीवाल को क्रांतिकारी मुख्यमंत्री बताते थे, उन्हें भी अब ज्ञात इस क्रांतिकारी मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की मानसिकता और मिठ्ठा बनकर लूट-खसोट करने की आदत भी मालूम हो गयी होगी। कल तक जिसे आरोप बताया जाता था, उन्हें केजरीवाल देखिए स्वयं सिद्ध कर रहे हैं। अगर केजरीवाल वास्तव में क्रांतिकारी हैं, 'क्या कभी केजरीवाल ने निगम पार्षद से लेकर सांसद तक को हर महीने मिलने वाली करोड़ों की सुख-सुविधाओं और पेंशन बंद करने के लिए भूख हड़ताल की?'  

इतना ही नहीं केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के विधायक इमरान हुसैन पर भी ऑक्सीजन की कालाबाजारी करने का आरोप लगा है। केजरीवाल सरकार में मंत्री इमरान हुसैन दिल्ली दंगे के आरोपी ताहिर हुसैन का भाई है। कालाबाजारी में आप के करीबी नवनीत कालरा और विधायक इमरान हुसैन का नाम आने के बाद सोशल मीडिया पर #OxygenChorAAP टॉप ट्रेंड कर रहा है…

केजरीवाल को बसपा प्रमुख मायावती की भी फटकार 

देश में कोरोना महामारी की हालत सबसे ज्यादा दिल्ली में खराब है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कोरोना से पैदा स्थिति पर काबू पाने में विफल रहे हैं। केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर सिर्फ मोहल्ला क्लिनिक बना कर दुनिया भर में वाहवाही लूटने की कोशिश की लेकिन कोरोना संकट काल में यह वैक्सीन लगाने के भी काम नहीं आ रहा है। पिछली बार की तरह इस कार्यकाल में भी बेड और ऑक्सीजव प्लांट लगाने की दिशा में भी केजरीवाल सरकार ने कोई काम नहीं किया। ऐसे में केजरीवाल के हाथ जोड़ते ही पहले की तरह इस बार भी दिल्ली से लोगों का पलायन शुरू होने पर बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने आप प्रमुख को तगड़ी फटकार लगाई।

केजरीवाल की क्लास लेते हुए मायावती ने कहा कि आपके हाथ जोड़ते ही लोग दिल्ली से पलायन करने लगे। इस तरह का नाटक आपने पहले भी किया था। मायावती ने ट्वीट किया, ‘केवल हाथ जोड़कर दिल्ली के सीएम का यह कहना कि दिल्ली से लोग पलायन न करें, यही नाटक कोरोना के दौरान् पहले भी किया गया था। यह सब अब महाराष्ट्र, हरियाणा व पंजाब आदि राज्यों में भी देखने के लिए मिल रहा है। अब पंजाब में लुधियाना से भी लोग काफी पलायन कर रहे हैं, यह अति-दुःखद।’

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा,’यदि यहाँ कि राज्य सरकारें इनमें विश्वास पैदा करके इनकी जरूरतों को समय से पूरा कर देतीं तो फिर ये लोग पलायन नहीं करते और अब यहाँ कि राज्य सरकारें इस मामले में अपनी कमियों को छिपाने हेतु किस्म-किस्म की नाटकबाजी कर रही हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। ‘

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ऑक्सीजन पर केजरीवाल सरकार से सवाल पूछने पर 7 पत्रकारों को AAP ने वॉट्सऐप ग्रुप से बाहर निकाला

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ऑक्सीजन पर केजरीवाल सरकार से सवाल पूछने पर 7 पत्रकारों को AAP ने वॉट्सऐप ग्रुप से बाहर निकाला

बीएसपी सुप्रीमो ने अगले ट्वीट में कहा, ‘साथ ही, पूरे देश में सर्वसमाज में से खासकर गरीबों, दलितों व आदिवासी समाज के लोगों को ‘‘फ्री‘‘ में वैक्सीन दी जानी चाहिये। इसके साथ-साथ, ऐसे समय में इनकी आर्थिक मदद भी जरूर की जानी चाहिये। बी.एस.पी. की केन्द्र व सभी राज्य सरकारों से भी पुनः यह माँग।’


चीन विवाद : केंद्र सरकार का साथ देने पर मायावती पर टूट पड़े कांग्रेसी, आप और मुस्लिम कट्टरपंथी

CAA Protest: BSP Leader Mayawati angry to the Citizenship ...
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भारत-चीन विवाद पर केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार को समर्थन देने के बाद दलित नेता और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती पर जून 29, 2020 को कांग्रेस, आप और मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हमला बोला।
कम्युनिस्ट पार्टी तो पहले ही जख्मी भारतीय सैनिकों के लिए खून दान करना, पार्टी नीति के विरुद्ध है, वैसे 1962 के युद्ध में कम्युनिस्ट पार्टियां चीन के साथ खड़ी नज़र आयीं थीं, भारत सरकार के साथ नहीं। देश में तुष्टिकरण की सियासत करने वाले कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और मुस्लिम कट्टरपंथी किस आधार पर चीन का साथ दे रहे हैं? क्या इनको नहीं मालूम कि चीन मुस्लिम समाज पर कितने अत्याचार कर रहा है? उइगर मुस्लिम महिलाओं के साथ कितने अत्याचार हो रहे हैं, उनका गर्भपात करवाया जा रहा है, ड्रग्स देकर उनके पीरियड्स बंद किए जा रहे हैं और यहाँ पर रोहिंग्यों पर कार्यवाही करने पर छाती पीटते हो, आखिर जनता को कब तक और कितना पागल बनाओगे? अब इसे इन लोगों का दोगलापन न कहा जाए तो क्या कहा जाए? इन दोगलों का हाल है, 'जहाँ दिखे तवा परात, वहीं बिता सारी रात।'  
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने जून 29, 2020 को कहा कि उनकी पार्टी भारत-चीन मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे पर आरोप लगाकर राजनीति कर रहे हैं, जो कि देश के हित में नहीं है।

देश की सुरक्षा मामले पर प्रधानमंत्री के साथ खड़े होने पर कांग्रेस और अन्य इस्लामियों ने उन पर जमकर हमला बोला। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट ने भारत-चीन विवाद पर भाजपा के साथ खड़े होने पर सवाल उठाते हुए कहा, “जब देश के साथ खड़े होना है तो मायावती भाजपा के साथ खड़ी हैं। भाजपा तो खुद कहीं नहीं खड़ी है। बिल में दुबकी बैठी है।”

आम आदमी पार्टी(AAP) प्रोपेगेंडा ब्लॉग के फाउंडर रिफत जावेद ने राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दे पर भाजपा के साथ खड़े होने पर उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों पर पिछले साल मायावती को वोट देने को लेकर मजाक उड़ाया।

कांग्रेस नेता उदित राज ने लिखा, “मायावती जी ने कहा कि भाजपा के साथ खड़ी हैं चीन के मुद्दे पर। झूठ! कब नहीं खड़ी थीं और हमला कांग्रेस पर बोला। मज़दूरों के मामले में भी यही किया था। कोई भाजपा में शामिल करा दे उपकार होगा। बेचारी जाने के लिए उतावली हैं।”

उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ऊपर आपत्तिजनक टिप्पणी करके चर्चा में आए ‘पत्रकार’ प्रशांत कनौजिया, जिसने दलितों की तुलना जानवरों से की थी, ने दावा किया कि दलित समुदाय को अब दलित नेता का ‘असली चेहरा’ पता चलेगा।

प्रशांत कनौजिया ने ट्विटर पर लिखा, “बहन मायावती जी पार्टी को भाजपा में विलय क्यों नहीं कर देती? आज कांशीराम जीवित होते है आपको तुरंत बाहर करते। देश के दलितों को अब इनका असली चेहरा पहचान लेना चाहिए।”

सीमा पर जारी तनाव के बीच कई इस्लामवादियों ने मायावती पर सरकार के साथ खड़े होने पर निराशा व्यक्त की।
कांग्रेस कार्यकर्ता सदाफ जाफ़र, जिन्होंने सीएए के विरोध प्रदर्शनों में भी हिस्सा लिया था और उनका आयोजन किया था, ने भी निराशा व्यक्त की।


मायावती पूर्व में भाजपा के खिलाफ खड़ी हुई थीं और कई मौकों पर सरकार के कार्यों की आलोचना की थी। हालाँकि, उन्होंने भारत-चीन मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ समर्थन किया है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस की क्षुद्र राजनीति पर भी खुलकर बोला।

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दुनिया भर में कम्युनिस्ट अथवा वामपंथी एक ऐसी प्रजाति है, जो लोकतान्त्रिक देशों में लोकतंत्र ख़त्म होने की बात करते ...
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पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की सलाह के बाद मायावती ने उन्हें याद दिलाते हुए कहा था कि विघटन की कूटनीति या निर्णायक नेतृत्व का कोई विकल्प नहीं है। मायावती ने कहा था, “ऐसे कठिन व चुनौती भरे समय में भारत सरकार की अगली कार्रवाई के सम्बंध में लोगों व विशषज्ञों की राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन मूल रूप से यह सरकार पर छोड़ देना बेहतर है कि वह देशहित व सीमा की रक्षा हर हाल में करे, जो कि हर सरकार का दायित्व भी है।”