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उत्तर प्रदेश : ‘तानाशाह मायावती ने कांशीराम को तड़पा कर मारा, माँ से अलग किया’: 206 से 4 सीटों पर पहुँची BSP

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा/BSP) की स्थिति से आज सब अच्छे से वाकिफ हैं। प्रचार में दिन पर दिन तेजी तो छोड़िए बसपा के नाम पर होने वाली किसी रैली की खबर भी मुश्किल से खबरों में आ रही है। पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने ही दो दिन पहले इन चुनावों के मद्देनजर आगरा रैली की तो लगा चुनावी पार्टी होने के नाते कोई औपचारिकता है जिसे प्रचार के दौरान पूरा किया जा रहा है, वरना उनका इससे भी मन उठ गया है…। 

इन चुनावों में बसपा के जो हाल हैं उन्हें देखना देश के लिए इसलिए भी अचंभित करने वाला है क्योंकि इस पार्टी का गठन एक सपने के साथ दलित नेता कांशीराम द्वारा किया गया था। उनके प्रयासों का ही नतीजा था कि एक समय तक बहुजन समाज पार्टी ने अन्य सभी पार्टियों को पछाड़कर अपनी जगह कायम की थी। लेकिन आज उनकी विचारधारा से भटकने के बाद पार्टी के हाल ऐसे हैं कि कोई न उन्हें पूछ रहा है और न कोई उनका साथ दे रहा है। हर जगह पार्टी के हाल खस्ता हैं और कुर्सी की लड़ाई में उनका दूर-दूर तक नाम नहीं है।

यूपी चुनावों से पहले आज एक बार फिर उस दौर को याद करें जब सत्ता के लिए संघर्ष करने वाली बहुजन समाज पार्टी का गठन हुआ था और दलितों के सबसे बड़े नेता कांशीराम ने मायावती को राजनीति में एंट्री दिलाकर उन्हें दलितों का चेहरा बनाया था।

कांशीराम द्वारा बहुजन समाज पार्टी का गठन और मायावती की एंट्री

समय 1984 का था जब डॉ भीम राव अंबेडकर के बाद सबसे बड़े दलित नेता कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की शुरुआत की थी। कांशीराम ही वह शख्सियत थे जिन्होंने विभिन्न पार्टियों में मौजूद दलित नेताओं को छांटकर उन्हें महसूस कराया कि एक पार्टी ऐसी होनी चाहिए जो दलितों के लिए समर्पित हो। अपने जमीनी कार्यों की बदौलत 14 अप्रैल 1984 को उन्होंने बहुजन समाज पार्टी को राजनीति अखाड़े में उतारा और तमाम दलित हितैषियों को अपने साथ जोड़ते गए। इसी क्रम में उन्हें आईएएस बनने का सपना देखने वाली मायावती भी मिलीं, जहाँ कांशीराम ने मायावती की क्षमता देख उनसे कहा कि अगर वो उनके साथ जुड़ती हैं तो वो उस मुकाम तक जाएँगी जहाँ सैंकड़ों आईएएस उनके आदेशों का पालन करेंगें।
आपातकाल के बाद राजनीति के चर्चित नाम राजनारायण ने दिल्ली की उस सभा को संबोधित करते हुए बार-बार ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग किया था, जहाँ मायावती भी मौजूद थीं और जिन्होंने राजनारायण को टोंकते हुए उन्हें हरिजन शब्द इस्तेमाल करने पर जमकर कोसा था। इसके बाद मायावती की जगह-जगह तारीफें हुईं और कांशीराम को भी इस संबंध में पता चला। मायावती की बेबाकी देख कांशीराम उनसे मिलने उनके घर गए और उन्हें अपने साथ जुड़ने को कहा। हालाँकि मायावती ने उन्हें बताया कि वो IAS बनना चाहती हैं, जिस पर कांशीराम ने उन्हें समझाया कि अगर वह उनके साथ जुड़ती हैं तो कई आईएएस उनके आदेशों को मानेंगे।

मायावती का चुनावी सफर

कांशीराम के कहने पर मायावती की जब राजनीति में एंट्री हुई तो धीरे-धीरे दलितों के बीच वह बड़ा चेहरा बनतीं गई। 1984 में बसपा ने उन्हें कैराना से चुनाव लड़ाया। 1985 में वो बिजनौर से उतारी गईं और 1987 में उन्होंने हरिद्वार में अपनी किस्मत आजमाई। हालाँकि राजनीति में उन्हें पहली सफलता 1989 को मिली जब वो बिजनौर से जीतीं। इसके बाद 1994 में भी वो राज्यसभा के लिए चुनीं गई। लेकिन असली किस्मत उनकी तब पलटी जब बसपा ने 3 जून 1995 को मायावती को यूपी का मुख्यमंत्री बना दिया। 
देश के सबसे बड़े राज्यों में शुमार यूपी की मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती की लोकप्रियता अलग स्तर पर पहुँच गई थी। उधर गेस्ट हाउस कांड के कारण भी उनकी चर्चा जगह-जगह थी। साल 1997 में मायावती ने दोबारा सीएम पद की शपथ ली। फिर 15 दिसंबर 2001 को वो दिन भी आया जब कांशीराम ने मायावती को इस पार्टी का प्रमुख बना दिया और कुछ सालों में धीरे-धीरे राजनीति से गायब होते गए। पार्टी में उनकी सक्रियता खत्म होते ही पार्टी के दिन भी ढलने लगे। मायावती के नेतृत्व में न केवल बसपा पर कांशीराम की विचारधारा से भटकने के आरोप लगे बल्कि 2006 में दलितों के दिग्गज नेता की मृत्यु के बाद उसके इल्जाम से भी मायावती अछूती नहीं रहीं।

कांशीराम की मौत के लिए मायावती जिम्मेदार?

स्वयं दलित नेता के परिजनों ने उनकी मृत्यु के लिए मायावती को जिम्मेवार माना। साल 2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार, कांशीराम के परिजनों ने मायावती पर आरोप लगाया था कि पार्टी में रहते हुए मायावती ने कांशीराम पर पार्टी अध्यक्ष बनने के लिए दबाव बनाया था। इसके साथ ही उन्हें तड़पाकर मारने, उन्हें उनकी माँ से अलग रखने, उनकी जुबान बंद करने की जिम्मेदार भी मायावती को कहा जाता है। साल 2014 में कांशीराम के परिवार ने मायावती को तानाशाह बताते हुए दावा किया कि वो मायावती हीं थीं जिन्होंने कांशीराम को उनकी माँ से अलग किया था और बाद में उनकी माँ उनके गम में चल बसीं थीं।

बसपा का UP में गिरता ग्राफ

कांशीराम की मौत के अगले ही साल 2007 में मायावती ने राज्य में 206 सीटों के साथ एक बड़ी जीत हासिल की थी, मगर उसके बाद के सालों में बसपा का ग्राफ राज्य में लगातार गिरता गया। 2012 में समाजवादी पार्टी ने मोर्चा मारा और 2017 में भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई। वहीं, कांशीराम की वो बसपा डूबती गई जिसे लेकर कभी अनुमान थे कि वो बहुजनों की राजनीति कर नई ऊँचाई हासिल करेगी।
साल 2022 के यूपी चुनावों में भी बहुजन समाज पार्टी की हालत एकदम खस्ता है। मायावती की बसपा से तमाम नेता अलविदा कह रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार साल 2017 के चुनावों में बहुजन समाज पार्टी के 19 विधायक चुने गए थे लेकिन आज इन पार्टी विधायकों की संख्या केवल और केवल 4 ही बाकी बची है। लोग हैरान है कि जो मायावती राज्य में 4 बार शासन कर चुकी हैं। पार्टी को उभारने के लिए 4 बार प्रदेश अध्यक्षों को बदल चुकी हैं। उनकी पार्टी की हालत इतनी खस्ता कैसे है कि अब उसमें केवल 4 विधायक ही शेष हैं, जिनके कारण वह न केवल कॉन्ग्रेस बल्कि भाजपा की सहयोगी पार्टी अपना दल तक से पीछे हैं।

उत्तर प्रदेश चुनाव : महिलाओं को साल में 3 सिलेंडर मुफ्त, सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा : प्रियंका वाड्रा

पिछले कुछ वर्षों से जो कुर्सी के भूखे नेताओं एवं उनकी पार्टियों द्वारा जो मुफ्त की रेवड़ियों बाँटने की गन्दी राजनीति खेली जा रही है, इसका चुनाव आयोग के साथ-साथ जनता को भी संज्ञान में लेना चाहिए। क्योकि पार्टियां अपनी जेब से कुछ नहीं देती, सब सरकारी खजाने से जाता है, जिसका प्रभाव प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से महंगाई के रूप में जनता पर ही पड़ता है। वैसे भी इन नेताओं ने जनप्रतिनिधि के रूप में हर महीने करोड़ों की मुफ्त सुविधाओं और पेंशन का बोझ डाला हुआ है। जन सुविधाओं के नाम पर जनता से कहीं अधिक मुफ्तखोरी का फायदा नेता ही ले रहे हैं। 
जनता है जो चुटकी भर मुफ्तखोरी के चक्कर में इन नेताओं एवं पार्टियों को अपना शुभचिंतक समझे जा रही है। मुर्ख जनता को नहीं मालूम की महंगाई के रूप हम ही इसका भुगतान कर रहे हैं। मुफ्त में मिल रही सुविधाएं लेने वाली जनता महंगाई और भ्रष्टाचार का रोना बंद कर दे। रसोई गैस पर मिलने वाली सब्सिडी बंद, यात्रा में मिलने वाली वरिष्ठ नागरिकों की सुविधा बंद। लेकिन किसी नेता अथवा पार्टी को इन सुविधाओं को पुनः शुरू करने के लिए नहीं बोलती। 
दिल्ली में कांग्रेस की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा महिलाओं को रक्षा बंधन एवं भाई दूज के दिन दिल्ली परिवहन बसों में मुफ्त सेवा की आड़ में कितने घोटाले होने के बाद आम आदमी पार्टी के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल द्वारा बिजली, पानी और महिलाओं को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की आड़ में कितने घोटाले हो रहे हैं, जनता आज तक अनजान है, उसे तो बस फ्री का माल चाहिए, उसके दुष्परिणाम चाहे कुछ भी हों।  
‘लड़की हूं, लड़ सकती हूँ ’ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी का नया नारा।  कांग्रेस पार्टी ने अबकी बार अपने महिला मोर्चा को मज़बूत किया है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा इस मोर्चे का नेतृत्व कर रही है। खूब रैलियां कर रही है। रोज़ नए बयान, रोज़ नए वाडे। अब कांग्रेस ने महिलाओं के लिए एक अलग घोषणापत्र (कांग्रेस मेनिफेस्टो फ़ॉर यूपी इलेक्शन) का ऐलान किया है। इसमें महिलाओं को साल में तीन मुफ़्त सिलेंडर और सरकारी बसों में मुफ़्त यात्रा की बात कही गई है। 

क्या है घोषणा-पत्र में 

बीते हफ़्ते एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रियंका गांधी ने महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए एक बड़ी घोषणा की थी। उन्हें पार्टी की 40% सीटें महिलाओं के लिए रिज़र्व करने की बात कही थी। इस घोषणा को ख़ूब तूल मिली और वाहवाही भी। उन्होंने आज(1 नवंबर) सुबह अपने ऑफिशियल टि्वटर हैंडल से ट्वीट किया,

“उत्तर प्रदेश की मेरी प्रिय बहनों, आपका हर दिन संघर्षों से भरा है। कांग्रेस पार्टी ने उसको समझते हुए आपके लिए अलग से एक महिला घोषणा पत्र तैयार किया है। कांग्रेस पार्टी की सरकार बनने पर सालाना भरे हुए 3 सिलेंडर मुफ़्त दिए जाएंगे. प्रदेश की सरकारी बसों में महिलाओं के लिए यात्रा मुफ़्त!”

प्रियंका ने आगे लिखा कि “आशा और आंगनबाड़ी की मेरी बहनों को प्रतिमाह 10,000 रुपये का मानदेय मिलेगा। नए सरकारी पदों पर आरक्षण के प्रावधानों के अनुसार 40% पदों पर महिलाओं की नियुक्ति होगी। प्रतिमाह 1000 रुपये वृद्धा-विधवा पेंशन मिलेगी।  कांग्रेस पार्टी 40% टिकट महिलाओं को देगी।”

शिक्षा और शिक्षा से जुड़ी सुविधाओं को संज्ञान में लेते हुए भी कुछ ऐलान कांग्रेस ने किए है। लिखा कि उत्तर प्रदेश की वीरांगनाओं के नाम पर प्रदेश भर में 75 दक्षता विद्यालय खोले जाएंगे, छात्राओं को स्मार्ट फोन और स्कूटी दी जाएगी। 

उत्तर प्रदेश चुनाव : प्रियंका वाड्रा के चुनावी वादे को यूजर्स ने लगा दी वाट

देश में जब भी चुनाव आते हैं, मतदाता को पागल बनाने का धंधा भी शुरू हो जाता है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में कांग्रेस द्वारा स्वतंत्र भारत में दूध की नदियां बहाने का प्रलोभन दिया जाता था, ब्रिटिश युग में एक पैसे सेर बिकने वाला दूध आज 60 रूपए लीटर बिक रहा है। सेर लीटर/किलो  से अधिक होता है। अधिकतर शहरों से गौशाला ख़त्म कर दी गयीं हैं। 15/18 रूपए तोला बिकने वाला सोना आज किस भाव है, सभी परिचित हैं। इंदिरा गाँधी ने सत्ता से हाथ से निकलती देख "गरीबी हटाओ" का नारा दिया था, सत्ता तो मिल गयी, लेकिन गरीबी दूर नहीं हुई और न ही बेरोजगारी।  
सत्ता से बाहर रहने पर कांग्रेस बौखला गई है। सत्ता में वापसी के लिए पार्टी तरह-तरह के जतन करने की कोशिश कर रही है। उत्तर प्रदेश में मतदाताओं को लुभाने के लिए कांग्रेस लुभावने वादे कर रही है। पार्टी कभी 40 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देने का वादा करती है, तो कभी फ्री का चुनावी लॉलीपॉप थमाने की कोशिश करती है। ताजा मामले में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की बेटियों को फ्री स्कूटर और स्मार्ट फोन देने का वादा किया, लेकिन आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि लोगों ने कांग्रेस के इस चुनावी वादे पर सोशल मीडिया पर वाट लगा दी। लोग कांग्रेस को निशाना बना रहे हैं। यूजर्स पूछ रहे हैं कि क्या यह वादा भी किसानों की लोन माफी की तरह ही पूरा किया जाएगा जो अभी तक नहीं हो पाया है। 

उत्तर प्रदेश में खिसक चुकी सियासी जमीन को फिर से हासिल करने के लिए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने चुनावी वादों का पिटारा खोल दिया है। सत्ता में आने की बेसब्री और ललक की वजह से लोक लुभावन वादों की झड़ी लगा दी है। कभी 40 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देने का वादा करती है, तो कभी फ्री स्कूटर, स्मार्ट फोन देने और 10 लाख रुपये तक मुफ्त इलाज का वादा करती है। लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में ये प्रतिज्ञाएं लागू हैं? क्या इन राज्यों में बेटियों को स्कूटी और स्मार्ट फोन दिए गए हैं ? क्या ये वादे भी राजस्थान के किसानों की कर्जमाफी की तरह है, जो अभी तक पूरा नहीं हो पायी है?

इसी तरह कांग्रेस शासित राज्यों में चुनाव से पहले कई वादे किए गए, लेकिन वो आज तक पूरे नहीं हो पाये हैं। जनता अब खुद को छला हुआ महसूस कर रही है। 6 महीने पहले कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे, जिनमें कांग्रेस के टिकट बंटवारे और उसमें महिलाओं की हिस्सेदारी की पोल चुनाव के आंकड़े खोल रहे हैं। कम भागीदारी की वजह से कई राज्यों में कांग्रेस की महिला नेताओं ने विरोध दर्ज कराया था। केरल महिला कांग्रेस की प्रमुख रहीं लतिका सुभाष ने पद से इस्तीफा दे दिया था। टिकट नहीं मिलने के चलते उन्होंने राजधानी तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस कार्यालय के सामने अपना सिर मुंडवा लिया था। दरअसल कांग्रेस सत्ता में आने के लिए चुनाव से पहले बड़े-बड़े वादे करती है, लेकिन सत्ता मिलते ही उन वादों को भूल जाती है।

जानिए कांग्रेस ने कैसे दिया जनता को धोखा

  • राजस्थान में 10 दिन में कर्जमाफी का वादा किया, लेकिन 1,20,979 करोड़ रुपये में से सिर्फ 8,676 करोड़ रुपये का कर्ज माफ किया।
  • राजस्थान में बैंकों ने कर्जमाफी के इंतजार में बैठे किसानों से वसूली में सख्ती दिखाना और जमीनें कुर्क करना शुरू कर दिया है।
  • राजस्थान में 3,500 रुपये बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया, लेकिन 2021 तक 15 लाख बेरोजगारों में से 2.5 लाख को ही भत्ता दिया।
  • पंजाब में किसानों पर कुल 77,753.12 करोड़ रुपये कर्ज थे, लेकिन अब तक मात्र 4,624 करोड़ रुपये ही माफ किए गए हैं।
  • छत्तीसगढ़ में बेटियों को स्मार्ट फोन देने के लिए बीजेपी ने स्काई योजना बनाई थी, जिसे कांग्रेस ने बंद कर लाखों स्मार्टफोन कबाड़ में फेंक दिए।
  • 6 महीने पहले बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में हुए चुनाव में कांग्रेस ने 10% से भी कम महिलाओं को टिकट दिया था।
  • 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सभी बीपीएल परिवारों को स्वास्थ्य बीमा का वादा किया था, जो पूरा नहीं कर पायी।
  • 2009 के लोकसभा चुनाव में तीन सालों के अंदर सभी बीपीएल परिवारों को स्वास्थ्य बीमा देने का वादा किया, लेकिन पूरा नहीं कर पायी।

‘हमारे नेता अखिलेश यादव ने किसानों को तबाह कर दिया’: नरेश उत्तम पटेल, सपा के प्रदेश अध्यक्ष

योगी-मोदी विरोधियों का मानसिक संतुलन इतना अधिक बिगड़ चूका है, जिसका कल्पना भी नहीं की जा सकती। नागरिक संशोधक कानून से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन तक देखो किसी की समझ में नहीं आ रहा कि हमें क्या बोलना है और क्या नहीं, जिस कारण देश विरोधी ताकतें देश में अराजकता फ़ैलाने में सक्रिय हो गयी है और योगी-मोदी विरोधी अंधे और बहरे बने उनके हाथों की कठपुतली बन कानून का मजाक बना रहे हैं। 
समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए तैयारियाँ शुरू कर दी हैं और इसके नेता जगह-जगह रैलियाँ कर रहे हैं। इसी क्रम में समाजवादी पार्टी ने जालौन में रैली का आयोजन किया। सपा की इस जनसभा में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल भी पहुँचे। लेकिन, उनके बयान के कारण पार्टी की ही फजीहत हो गई। उन्होंने अखिलेश यादव पर ही निशाना साध दिया।

अखिलेश यादव सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। जब अन्य नेताओं का भाषण चल रहा था, उस दौरान नरेश उत्तम पटेल मंच पर ही कुर्सी पर बैठे हुए थे। बैठे-बैठे ही वो ऊँघने लगे और फिर सो गए। हालाँकि, कुछ देर बाद उनकी तंद्रा भंग हुई और उन्होंने अपना भाषण दिया। फिर उन्होंने पत्रकारों से बात की। इसी दौरान उन्होंने ऐसा बयान दे दिया जिससे उनकी जम कर किरकिरी हुई। जानिए उन्होंने क्या कहा।

दरअसल, सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल ये कह बैठे कि अखिलेश यादव ने किसानों को तबाह कर दिया है। हालाँकि, कुछ देर बाद उन्हें अपने जुबान फिसलने का एहसास हुआ और फिर उन्होंने अपनी गलती को सुधारा। इस दौरान उन्होंने कहा कि भाजपा के राज में खेती घाटे का सौदा हो गया है और केंद्र की गलत नीतियों के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की तानाशाही के कारण किसानों को उनका हक़ नहीं मिल पा रहा।

उन्होंने कहा, “कांग्रेस और भाजपा में कोई अंतर नहीं है। जो भाजपा है, वही कांग्रेस है। 45 साल कांग्रेस ने राज किया। किसानों को तबाह कर दिया। अब घड़ियाली आँसू बहा रहे। किसानों को तबाह कर दिया हमारे नेता अखिलेश यादव जी ने। दो-दो करोड़ रुपए किसानों के परिवारों को देने की बात कही। एक-एक नौकरी देने की बात कही। इस्तीफा मंत्री अजय मिश्रा के बेटे को इस्तीफा देना चाहिए, लेकिन भाजपा उस पर पर्दा डाल रही है और कांग्रेस मरहम लगा रही है।”

65 वर्षीय नरेश उत्तम पटेल को जनवरी 2017 में सपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। वो 2006 से ही विधान परिषद के सदस्य भी हैं। वो 1989 में फतेहपुर के जहानाबाद विधानसभा क्षेत्र से जनता दल के टिकट पर विधायक बने थे। कुर्मी समुदाय से आने वाले नरेश उत्तम पटेल ने कानपुर विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट कर रखा है। मुलायम सिंह यादव के करीबी रहे नरेश उत्तम पटेल सपा के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं।

फिरोज की पोती प्रियंका वाड्रा रखेंगी नवरात्रि का व्रत, कांग्रेस ने मीडिया को बताया: लोगों ने ‘केरल कांग्रेस गौहत्या’ की याद दिलाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देश को सबसे बड़ी उपलब्धि कि जो कभी अपने दादा फिरोज जहांगीर की कब्र पर न जाने वाले कोट पर जनेऊ पहन रहे हैं, अपना गोत्र हिन्दू बता रहे हैं और अब हिन्दू नवरात्रों पर व्रत।  
कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा इस बार नवरात्रि के व्रत रखेंगी। ये जानकारी गुरुवार (अक्टूबर 7, 2021) को कांग्रेस  पार्टी के हवाले से मीडिया में आई है। एबीपी न्यूज के एडिटर पंकज झा ने बताया कि कांग्रेस  पार्टी की तरफ से इस बार जानकारी दी गई है कि प्रियंका गाँधी नवरात्रि का व्रत कर रही है।

इसके अलावा प्रियंका गाँधी वाड्रा ने खुद भी शारदीय नवरात्रि की सभी को शुभकामनाएँ दी हैं। इसके साथ उन्होंने देवी माता का महा मंत्र भी लिखा है, “या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।”

कांग्रेस द्वारा मीडिया में इस बात की जानकारी देने पर और मीडिया द्वारा इसका प्रचार किए जाने पर यूजर मीडिया और कांग्रेस दोनों की खिल्ली उड़ा रहे हैं। आशुतोष झा लिखते हैं, “इस व्रत के दौरान वो निर्जला रहेंगी या फलाहार पर? अगर फलाहार करेंगी तो कौन सा फल खाएँगी, कब-कब खाएँगी, कितना खाएँगी, कटा हुआ खाएँगी या पूरा खाएँगी, कितनी बार चबाएँगी, श्रीमान आपसे निवेदन है कि ये भी जरूर बताइएगा, क्योंकि यही तो न्यूज़ है जो UPSC में पूछा जाएगा।”

एक यूजर ने कहा, “वो दिन जब कांग्रेस ने बेसहाय गाय को केरल में सिर्फ इसलिए काटा था क्योंकि उन्हें भाजपा का विरोध करना था उस दिन मेरा आखिरी दिन था कि मैंने कांग्रेस को समर्थन दिया।”

रौशन नारायण लिखते हैं, “कोई नवरात्रि का व्रत करे तो इसकी भी जानकारी ट्वीट किया जाता है और हमारे आदरणीय पत्रकार इसका भी उल्लेख करते है।”

देवेश उपाध्याय ये जानकारी पढ़कर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहते हैं, “तो क्या हम लोग नाचें पंकज झा। यही न्यूज है आपकी रिपोर्टर के तौर पर कि कौन व्रत रखता है कौन शौच जाता है कौन कब सोता है। शर्म आनी चाहिए तुम्हें अपने पर और तुम्हारी जैसी पत्रकारिता पर।”

आलोक लिखते हैं, “ये तो अजूबा हो गया! इस देश में पहली बार किसी ने नवरात्रि का व्रत रखा है। घर पहुँचते में मुर्गी की टांग चबाई जाएगी या पोर्क धांसा जाएगा पास्ता के साथ। गजब लीक, ग़ज़ब की ब्रेकिंग!”

एक तरह से देखा जाए तो यूजर की प्रतिक्रिया गलत नहीं हैं क्योंकि ये वाकई हैरान करने वाला है कि कोई व्रत रखता है तो उसे मीडिया में प्रसारित कर दिया जाता है।

चुनावों से पहले हिंदू बन रहे राहुल-प्रियंका, बाकी राज्यों में कैसा हाल?

उत्तर प्रदेश चुनाव नजदीक आते-आते राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी में सनातन संस्कृति के प्रति आस्था बढ़ती देखी गई है। पिछले दिनों राहुल गाँधी वैष्णो देवी चले गए थे। इसी तरह राजनीति में सक्रिय होने के बाद से प्रियंका गाँधी भी कभी गंगा तट की सैर तो कभी पूजा अर्चना करते दिखती हैं। जबकि केरल जैसे राज्य में उनकी सत्ता के बावजूद हिंदुओं की भावनाओं की कद्र नहीं होती और खुलेआम सड़कों पर गाय के मीट से जश्न मनाया जाता है।
इसी प्रकार असम में देखें तो हिंदू विरोधी व कट्टर बयानबाजी के लिए पहचाने जाने वाले बदरुद्दीन अजमल से भी पिछले चुनावों में पार्टी ने गठबंधन किया था। बंगाल में उन्हें मौलवी अब्बास सिद्दीकी की इंडियन सेकुलर फ्रंट के साथ हाथ मिलाया था। लेकिन, इस समय बात चाहे सनातन परिधान धारण करने की हो या फिर माथे पर तिलक लगाने, जनेऊ पहनने और आरती-पूजा करने की…राहुल-प्रियंका सब करते दिखते हैं और साथ ही साथ उनकी पार्टी समुदाय विशेष के बंधुओं को रिझाने के लिए मस्जिद के सामने मेनिफेस्टो भी देने लगी है। इस दोहरे चरित्र पर कई बार सवाल भी उठा है कि आखिर मस्जिद-मजार जाने वाले कैसे अलग रूप धारण कर बैठे हैं। इसके अतिरिक्त गाँधी परिवार के नकली ‘हिंदू’ होने को लेकर भी जगह-जगह बातें होती रहती हैं।

उत्तर प्रदेश : आन्दोलनजीवी फिर हुए बेनकाब : किसान नेताओं ने 2022 चुनाव में योगीआदित्यनाथ को हराने का तय किया लक्ष्य

कुशल राजनीतिज्ञ चाणक्य का कहना है कि जब विरोधी पक्ष में हाहाकार मच रहा हो, समझ लो, राजा सख्त है। नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में शाहीन बाग बनाए गए, हिन्दू विरोधी दंगे और फिर जैसाकि 6 माह पूर्व शुरू हुए कृषि कानूनों के विरोध में हो रहे किसान आन्दोलन के बारे में कहा जा रहा था, किसान हित में हुए इस जमावड़े का कृषि कानूनों का विरोध नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध है, जो कई बार उजागर भी हो चूका है, जिसे आम जनमानस समझ नहीं पाया। ये आन्दोलनजीवी धरना स्थल को छोड़, बंगाल चुनाव में भाजपा के विरोध में पहुँच गए। और अब इनका लक्ष्य दिल्ली के बाद उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को हराकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पदमुक्त करना है, जो सबसे प्रमाण है कि ये बिके हुए आन्दोलनजीवी केवल मोदी विरोधी पार्टियों के समर्थन से किसान हित में धरने के नाम पर देश को गुमराह कर रहे हैं।  
दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन के 6 महीने पूरे होने के बाद अब ‘किसान आंदोलन’ ने उत्तर प्रदेश को अपना लक्ष्य बनाया है। किसान संगठनों का अगला लक्ष्य अब ‘मिशन उत्तर प्रदेश’ है। उत्तर प्रदेश में 2022 में विधानसभा चुनाव भी होने हैं, ऐसे में इसके पीछे की राजनीति समझी जा सकती है। ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ ने उत्तर प्रदेश में केंद्र के तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज़ करने की तैयारी शुरू कर दी है।

किसान संगठनों ने कहा है कि वो उत्तर प्रदेश सहित जिन भी राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, वहाँ भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार करेंगे। पश्चिम बंगाल में वो ऐसा कर भी चुके हैं, जहाँ योगेंद्र यादव और राकेश टिकैत जैसों ने जाकर ममता बनर्जी की पार्टी TMC के लिए चुनाव प्रचार किया था। ‘ऑल इंडिया किसान सभा’ के महासचिव हन्नान मोल्लाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केवल चुनावी हार की भाषा समझते हैं, इसलिए किसानों के सामने अब यही एक विकल्प है।

हन्नान मोल्लाह CPI (मार्क्सिस्ट) के नेता हैं और हावड़ा के उलूबेरिया से लगातार 8 बार सांसद रह चुके हैं। लगातार 29 साल सांसद रहने वाले मोल्लाह ‘किसान आंदोलन’ में खासे सक्रिय रहे हैं। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) एक एक्शन प्लान भी बना रहा है। राज्य भर में कई ‘महापंचायत’ आयोजित कर के किसानों की भीड़ जुटाई जाएगी और भाजपा को हराने का नारा दिया जाएगा।

मोल्लाह ने गुरुवार (मई 27, 2021) को TOI से कहा, “हम किसानों को ये नहीं कह रहे कि उन्हें किस पार्टी को वोट देना है, क्योंकि ये उनका व्यक्तिगत निर्णय होगा। हमारा अभियान तो इन ‘कठोर’ कृषि कानूनों के खिलाफ है, ये पक्षपाती नहीं है।” वहीं SKM के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा कि अब ये अभियान सरकार को उखाड़ फेंकने का अभियान बन गया है। उन्होंने कहा कि व्यवस्था और शासन को बदलना ही उसका मुख्य लक्ष्य है।

वहीं किसान नेता राकेश टिकैत ने केंद्र सरकार को धमकाते हुए कहा कि वो इस ग़लतफ़हमी में न रहे कि ‘किसान आंदोलन’ ख़त्म हो जाएगा, क्योंकि किसानों ने तीनों कृषि कानूनों को रद्द कराए जाने के लिए मन बना लिया है। उन्होंने दावा किया कि ये आंदोलन और मजबूत होता चला जाएगा। हालिया पंचायत चुनावों में भाजपा द्वारा अपेक्षित प्रदर्शन न करने से किसान नेता उत्साहित हैं। अब तक ये आंदोलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित था।

राकेश टिकैत ने पंचायत चुनाव के नतीजों पर भी ‘किसान आंदोलन’ का असर होने का दावा करते हुए कहा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग भी अब MSP जैसे मुद्दों पर सरकार के खिलाफ हैं। इस साल पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा के खिलाफ प्रचार करने वाले किसान नेताओं ने मई 26 को ‘काला दिवस‘ के रूप में मनाया। इसी दिन नरेंद्र मोदी ने 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।

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कल जिन कृषि कानूनों का वादा किया था, आज उसी का विरोध क्यों कर रही AAP?

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बंगाल में दिखा किसान नेताओं का असली रंग, भाजपा को वोट न देने की अपील

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उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है, जो अपने कामों का लेखा-जोखा लेकर अगले साल के विधानसभा चुनाव में उतरेगी। भाजपा सालों बाद यूपी में सीएम के चेहरे के साथ चुनाव लड़ने जा रही है, ऐसे में इ उसके लिए प्रतिष्ठा का विषय है। दिल्ली-यूपी सीमा पर पहले ही किसानों ने कब्ज़ा कर रखा था, जहाँ वो अब भी बैठे हुए हैं। हालाँकि, ‘किसान आंदोलन’ को मिलने वाला जनसमर्थन कम हो गया है।