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शंभु बाॅर्डर के Video हरियाणा पुलिस ने किए जारी : बताते हैं ‘अन्नदाता’, उनको चेहरा छुपा ‘पत्थरबाजी’ करते देखा आपने?

पुलिस पर पत्थर बरसाते प्रदर्शनकारी (चित्र साभार: Ambala Police/X)
हरियाणा और पंजाब की सीमा पर प्रदर्शनकारी किसान सुरक्षाबलों पर पत्थर बरसा रहे हैं। पुलिस के समझाने के बाद भी वे नहीं मान रहे हैं। इस बात का खुलासा हरियाणा पुलिस ने किया है। दरअसल, ये कथित किसान किसी तरह दिल्ली में घुसना चाहते हैं, लेकिन सुरक्षाबल इन्हें रोकने की कोशिश कर रहा हैं। इसको लेकर वे पुलिस पर हमलावर हैं। इसके कई वीडियो भी सामने आए हैं।

अम्बाला की अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पूजा डाबला ने बताया, “पत्थरबाजों के वीडियो हमने जारी की है। इनके प्रदर्शन को लेकर हमने तैयारी कि हुई थी। हमने बैरिकेड भी लगाए थे और पैरामिलिट्री भी तैनात की थी। 2020 में भी इसी तरह उत्पात का हो चुका है। हमारे सामने ऐसे वीडियो आए हैं, जिनमें लोग बैठकर पत्थर तोड़ रहे हैं और उससे जवानों को पत्थर मार रहे हैं।”

आगे उन्होंने बताया, “इस पत्थरबाजी में अर्धसैनिक बलों के 7 जवान और हरियाणा पुलिस के 18 जवान घायल हुए हैं। इसके अलावा, एक DSP भी पत्थर की चोट से घायल हुए हैं। हमने वीडियो जारी करके पत्थरबाजों की पहचान करने में सहायता माँगी है।” इसके अलावा हरियाणा पुलिस ने पत्थर बरसाने वालों के वीडियो भी जारी किए हैं और लोगों से इनका पहचान करने का आग्रह किया है।

हरियाणा पुलिस द्वारा जारी किए गए वीडियो में दिख रहा है कि एक तरफ सुरक्षाबलों के जवान तैनात है और दूसरी तरफ से बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी पत्थर फेंक रहे हैं। वीडियो में दिखता है कि मुँह पर कपड़ा बाँधे पत्थरबाज एक के बाद एक करके आगे आते हैं और सुरक्षाबलों पर पत्थर चलाते हैं। वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि यहाँ यह पत्थरबाज मैदान में बैठकर पत्थर तोड़ रहे हैं और फिर सुरक्षाबलों पर फेंक रहे हैं।

इसी तरह के दृश्य पहले कश्मीर से देखने को मिलते थे। हालाँकि, अनुच्छेद 370 हटाने के बाद अब वहाँ शांति है। हरियाणा बॉर्डर पर जिस तरह से प्रदर्शनकारी किसान सुरक्षाबलों पर पथराव करते दिखे, वह कश्मीर का याद दिलाता है। इस दौरान पुलिस ने आँसू गैस के गोले भी फेंके। इसके बाद भी प्रदर्शनकारी किसान पीछे नहीं हट रहे हैं।

इससे पहले भी प्रदर्शकारियों के वीडियो सामने आए थे। एक वीडियो में एक प्रदर्शनकारी कहता है कि वे लोग पुलिस के ड्रोन गिराने के लिए पत्थरों का उपयोग कर रहे थे लेकिन वे पत्थर वापस आकर उन पर कर रहे थे। इस कारण से किसान अब टेनिस बॉल का इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं एक और वीडियो में प्रदर्शनकारी पतंग उड़ाकर ड्रोन गिराने की कोशिश करते देखे गए थे।

इसी बीच सरकार किसानों से बातचीत करने का भी प्रयास कर रही है। बृहस्पतिवार (15 फरवरी 2024) को केंद्र सरकार और किसानों के बीच बातचीत बेनतीजा रही। यह दोनों पक्षों के बीच बातचीत का तीसरा दौर था। इस बातचीत में MSP को लेकर कानून की माँग सहित 13 माँगें रखी गई हैं। वहीं सरकार इसमें आने वाली अड़चनों को लेकर उन्हें समझाने का प्रयास कर रही है।

इस बीच किसानों ने शुक्रवार (16 फरवरी 2024) को भारत बंद का भी ऐलान किया है। इस बंद का मिला-जुला असर देखने को मिल रहा है। भारत बंद के ऐलान का ज्यादा असर जहाँ पंजाब में है। हरियाणा और दिल्ली में भी इसका असर सामान्य आवाजाही पर दिख रहा है। दिल्ली में कई जगह पर इस प्रदर्शन और बंद के चलते भारी जाम लगा हुआ है।

दिल्ली के गाजीपुर, टिकरी और सिंघु बॉर्डर पर भी लोग परेशान हो रहे हैं। बैरिकेडिंग की वजह से गाड़ियों की लंबी-लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं। दिल्ली पुलिस ने इस दौरान लोगों को अधिक से अधिक संख्या में मेट्रो सेवा का उपयोग करने की सलाह दी है। इन सबके बीच इन प्रदर्शनकारियों पर किसानों की माँगों का राजनीतिकरण करने का आरोप लग रहा है।


2021 की चर्चित खबरें : लाल किला से बंगाल हिंसा और तालिबान से बांग्लादेश तक

साल 2022 दस्तक दे रहा है। हर कोई उम्मीद कर रहा है ये साल नई खुशियों, नई उम्मीदों वाला हो। हर जगह सिर्फ सकारात्मक खबरें सुनाई दें, 2021 की तरह नहीं… जहाँ साल की शुरुआत हुई खालिस्तानी तत्वों से और फिर मई आते-आते ऑक्सीनजन के कारण त्राहि-त्राहि मच गई। 2021 के इस साल में कभी तालिबान ने चिंता बढ़ाई तो कभी बांग्लादेश में हिंदुओं पर होते अत्याचार ने सबको हैरान कर दिया।

इससे पहले 2022 की शुरुआत हो और नई खबरों से अखबार, मीडिया चैनल भर जाएँ, हम एक सरसरी निगाह 2021 की बड़ी खबरों पर डाल लेते हैं जो बड़े-बड़े राजनेताओं से लेकर कॉमन मैन तक के लिए चर्चा का विषय थीं।

जनवरी 2021

26 जनवरी हिंसा: नवंबर 2020 में शुरू हुआ कथित किसान आंदोलन जनवरी 2021 तक दिल्ली की हर सीमा को घेर चुका था। राकेश टिकैत जैसे किसान नेता जगह-जगह ऐलान कर रहे थे कि 26 जनवरी को लोग ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे और गणतंत्र दिवस पर अपनी एकजुटता दिखाएँगे। सरकार और प्रशासन की मनाही के बावजूद ये लोग नहीं माने और ‘बक्कल उतारने वाली धमकियाँ’ देकर 26 जनवरी 2021 को सैंकड़ों ट्रकों के साथ दिल्ली में घुसे।
नतीजन दिल्ली में गणतंत्र दिवस के मौके पर हिंसा शुरू हुई। दिल्ली की सड़कों पर जहाँ-तहाँ उत्पात मचाया गया। भीड़ जब लाल किले पहुँची तो वहाँ जमके तोड़फोड़ की गई। रास्ते में तिरंगे का अपमान किया गया। उसे रौंदा गया। प्रधानमंत्री को गालियाँ दी गईं। पुलिस वाहनों पर हमला हुआ। इन सबके अलावा निहंग सिखों को खुली सड़क पर तलवार लेकर दौड़ते देखा गया। जब मामला शांत हुआ तो उपद्रव करने वालों में दीप सिद्धू जैसे बड़े नामों का खुलासा हुआ। वहीं रिपोर्ट्स से पता चला कि इस दिन की झड़प में 300 के करीब पुलिस वाले घायल हुए थे।

फरवरी 2021

वीएचपी कार्यकर्ताओं पर हमला: राम मंदिर निर्माण के लिए धन जमा करने हेतु देश भर में चलाया गया निधि समर्पण अभियान मकर संक्रांति के बाद से चर्चा में था। अभियान में जुटे करीब 9 लाख कार्यकर्ताओं की मदद से 44 दिनों (15 जनवरी से 27 फरवरी 2021) में 2500 करोड़ रुपए जुटाने का काम किया गया। हालाँकि इस दौरान वीएचपी कार्यकर्ताओं की कोशिशों के साथ जो एक और खबर चर्चा में थी वो खबर उन पर हुए हमलों की थी। जगह-जगह कट्टरपंथी तत्वों ने उन्हें अपना निशाना बनाया और उन्हें धमकियाँ दी।
टूलकिट मामला: किसान आंदोलन की आड़ में भारत के खिलाफ़ रचे गए षड्यंत्र को साबित करने वाले दस्तावेज़ ‘टूलकिट’ का खुलासा फरवरी माह में हुआ था। ग्रेटा थनबर्ग के एक ट्वीट से इस टूलकिट के बारे में सबको पता चला था। इस टूलकिट के बारे में कहा गया था कि 18 जनवरी से पहले किसान समर्थन में और मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए तैयार कर दिया गया था। इस खुलासे के बाद लंबे समय तक टूलकिट का विवाद गरमाया रहा और आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे।

मुकेश अंबानी के घर के बाहर विस्फोटक: एक खबर जिसने फरवरी माह में तहलका मचाया वो खबर मुकेश अंबानी से जुड़ी थी। इस माह में ही देश के सबसे बड़े उद्योगपति रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी के घर से कुछ दूरी पर खड़ी सिल्वर कलर की स्कॉर्पियो कार से 20 जिलेटिन छड़ें बरामद हुई थी। महीना खत्म होते-होते पता चला कि इस हरकत के पीछे जैश उल हिंद का हाथ है। हालाँकि बाद के महीनों में इस संबंध में कई खुलासे होते रहे और पता चला कि षड्यंत्र सचिन वाजे जैसे पुलिस अधिकारी द्वारा रचा गया था।

मार्च 2021

तेलंगाना में दंगे: तेलंगाना के निर्मल जिले के भैंसा नगर में 7-8 मार्च के आसपास दंगों की खबर ने सबको हैरान कर दिया था। इस हिंसा में मीडियाकर्मी, पुलिसकर्मी व आम नागरिकों को मिला कर लगभग 10 लोग घायल हुए। इनके अतिरिक्त दो घरों व एक ऑटोरिक्शा में आग लगाई गई। तीन घायलों को अस्पताल में भर्ती करवाया गया। बाद में इस संबंध में कुल 15 मामले दर्ज हुए और 13 लोगों की गिरफ्तारी हुई। इस घटना से पहले साल 2020 में तेलंगाना का यगी इलाका सांप्रदायिक हिंसा का गवाह बना था। उस समय भी 11 लोग घायल हुए थे और 18 घरों को जला दिया गया था।
डासना देवी मंदिर वीडियो वायरल और यति नरसिंहानंद सरस्वती : मार्च में एक मामला डासना मंदिर का भी काफी चर्चा में था। उस समय खबर आई थी कि डासना में एक आसिफ नाम के मुस्लिम युवक को पानी पीने के बेरहमी से पीटा गया। हालाँकि बाद में मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती ने सामने आकर बताया कि कैसे मंदिर के बाहर कई नल लगे हैं अगर सिर्फ प्यास बुझानी थी तो उन नलों में पानी आता है। उन्होंने यह बी बताया था कि कैसे मंदिर में दूसरे समुदाय के लड़के प्रवेश करके लड़कियों को छेड़ते थे और उनपर अभद्र टिप्पणी करते थे इसलिए उन्होंने सबको मंदिर में घुसने से मना किया।

मनसुख हिरेन हत्या मामला: फरवरी माह में जिस स्कॉर्पियों को विस्फोटक सामग्री से भरके मुकेश अंबानी के घर के बाहर खड़ा किया गया, वो गाड़ी मनसुख हिरेन की थी। मनसुख की लाश 4-5 मार्च 2021 को मिली थी। शुरू में कहा गया कि हिरेन ने आत्महत्या की। लेकिन बाद में पता चला कि उसे मारा गया था। इसी हत्या की एंगल के जाँच के दौरान सचिन वाजे का नाम मीडिया में चर्चा में आया और पता चला कि वो हिरेन से लगातार संपर्क में था।

अप्रैल 2021

अनिल देशमुख का इस्तीफा: एंटीलिया केस और मनसुख हिरेन हत्या मामले की जाँच के क्रम में महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख पर 100 करोड़ रुपए की वसूली के आरोप मढ़े गए, जिसके बाद उनका जगह-जगह विरोध हुआ और अंतत: उन्हें 5 अप्रैल 2021 को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।

कोरोना की दस्तक: कोरोना की दूसरी लहर ने अप्रैल 2021 में भारत में दोबारा दस्तक दी थी। इस बीच महाराष्ट्र में कोरोना की आड़ में चल रहे कई धंधे उजागर हुए थे जिसमें फर्जी सर्टिफिकेट बनाना, प्रवासी कामगारों से वसूली करने का धंधा शामिल था। ऐसे ही कोरोना के बीच मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए की जाने वाली माँग भी इसी माह की खबर है। वहीं कोरोना के नाम पर कुंभ को बदनाम करने के प्रयास भी अप्रैल में शुरू हुए थे। इसी महीने में ऑक्सीजन के लिए हाहाकार मचना शुरू हुआ था। माह के शुरू में ही खबर आई थी कि मुम्बई में ऑक्सीजन की कमी के कारण कई मरीजों की मौत हो गई। इसके बाद ऐसी खबरों का जमावड़ा लग गया।

मई 2021

कोरोना और प्रोपगेंडा: मई आते-आते कोरोना के कारण जहाँ जगह-जगह मातम पसरता जा रहा था। कई राज्य ऑक्सीजन की किल्लत से गुज़र रहे थे। वहीं कुछ प्रोपगेंडाबाज सोशल मीडिया पर श्मशान घाट पे जल रहे शवों की तस्वीरें शेयर कर करके अलग ही प्रोपगेंडा फैला रहे थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये दिखाने का प्रयास हो रहा था कि कैसे मोदी सरकार भारत में कोरोना को कंट्रोल करने में बुरी तरह विफल हुई है।
टीकरी बॉर्डर रेप: एक सबसे बड़ी खबर जो मीडिया में इस माह आई वो टीकरी बॉर्डर पर हुए रेप की थी। इसी माह किसान प्रदर्शन स्थल की हकीकत का पर्दाफाश हुआ था और पता था चला कि कैसे बंगाल से लड़की को लाकर उसका रेप किया गया और हालत इतनी बदतर कर दी गई कि अंत मे उसने कोरोना से पीड़ित होकर तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया था।
बंगाल हिंसा: 2 मई 2021 को बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में टीएमसी की जीत के बाद राज्य में जगह-जगह हिंदू विरोधी, भाजपा विरोधी हिंसा रिपोर्ट की गई। इस दौरान सैंकड़ों हिंदुओं पर वार हुए, महिलाओं से जबरदस्ती हुई, बच्चों से बर्बरता हुई और कई घरों को आग के हवाले किया गया। पुलिस की कार्रवाई की पोल भी बाद में खुली जब अलग-अलग संगठन जमीन पर उतरे और पीड़ितों की आपबीती लाए। इसी बीच कंगना रनौत का ट्विटर अकॉउंट सस्पेंड होना भी सोशल मीडिया पर अच्छी खासी चर्चा का कारण था।
जून 2021
मई के माह में बंगाल में इतनी क्रूरता की गई कि इसका असर जून तक मीडिया खबरों में नजर आया। पूरे माह इस बात की चर्चा रही कि आखिर ममता सरकार ने कैसे हिंदुओं पर हुए हमलों को नजरअंदाज किया। बंगाल हिंसा पर हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस की एक रिपोर्ट से पता चला की बंगाल में हिंसा की 15000 घटनाएँ हुईं, 25 मौत हुईं और 7000 महिलाओं से बदसलूकी की गई।
गाजियाबाद में बुजुर्ग को पीटने का मामला: जून के महीने में गाजियाबाद की एक घटना सोशल मीडिया पर बवाल खड़ा कर दिया। एडिट की गई वीडियो के साथ बताया गया कि एक मुस्लिम को जय श्रीराम पीट-पीटकर बुलवाया जा रहा था और जब उसने ऐसा नहीं किया तो उसकी दाढ़ी काट दी गई। हालाँकि जाँच-पड़ताल के बाद खबर आई कि सपा नेता ने अब्दुल समद नाम के व्यक्ति के साथ हुई मारपीट को साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया था। हकीकत में ये विवाद ताबीज को लेकर था जिसे अब्दुल ने आरोपित के घर में दिया था।
सिख लड़कियों के धर्मांतरण का केस: जम्मू कश्मीर में सिख लड़कियों के धर्मांतरण का मामला भी जून 2021 में सामने आया था। वहाँ 28 जून को इस बाबत प्रदर्शन हुए थे। खबरें थी कि वहाँ समुदाय विशेष के लड़के सिख लड़कियों को अपना निशाना बना रहे थे और उन्हें बहला कर उनसे शादी कर रहे थे।

जुलाई 2021:

राज कुंद्रा पोर्नोग्राफी केस: जुलाई 2021 का महीना बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा से जुड़ी खबरों के नाम था। इस खबर ने न केवल मेनस्ट्रीम मीडिया में बल्कि सोशल मीडिया पर भी कई दिनों तक जगह बनाए रखी। 19 जुलाई को राज कुंद्रा को जब पोर्नोग्राफी केस में अरेस्ट किया गया तो पूरे बॉलीवुड में तहलका मच गया। पुलिस की जाँच और पूछताछ से इतर कई अभिनेत्रियों ने सामने आकर कुंद्रा पर आरोप मढ़े। मामला इतना गंभीर था कि कुंद्रा को जमानत पूरे 2 माह बाद मिली और वो 21 सितंबर को जाकर अपने घर लौटे।

अगस्त 2021:

अफगानिस्तान-तालिबान विवाद: अगस्त 2021 का पूरा महीना अफगानिस्तान और तालिबान से जुड़ी खबरों से भरा था। लंबे समय से चल रहे तनाव के बाद 15 अगस्त को तालिबान ने काबुल पर अपना कब्जा किया था। खबर आई थी कि देश के राष्ट्रपति गनी मुल्क छोड़ भाग गए और देश पर अब तालिबानी हुकूमत है। कट्टरपंथियों ने जगह-जगह फैलाया कि नया तालिबान है जो पहले से अलग है। हालाँकि, तालिबान के देश में आते ही वहाँ की सूरत बदल गई। लड़कियों को बुर्के में रहने के फरमान जारी हो गए और जगह-जगह खुले में पत्रकारों पर हमले होने लगे। सोशल मीडिया पर इसी बीच हमने कई ऐसी वीडियोज देखी थीं जिससे पता चला था कि लोग तालिबान शासित अफगानिस्तान से भागने के लिए कितनी मिन्नतें कर रहे हैं और कुछ उनके नियमों के हिसाब से कुछ को ढालने लगे हैं।

सितंबर 2021

असम हिंसा: 2021 का सितंबर महीना आधा तो तालिबान की खबरों के साथ बीता और आधार असम के दरांग में हुई हिंसा की खबरों के साथ। दरअसल, असम हिंसा 23 सितंबर की है दरांग जिले में पुलिस अतिक्रमणकारियों से जमीन खाली कराने गई तो जवानों पर हमला बोल दिया गया और 11 पुलिसकर्मी घायल हो गए। इसके बाद वामपंथियों ने राज्य में हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया। सरकार ने इस दौरान जवाब दिया कि 10,000 मुस्लिमों की भीड़ ने पुलिस को घेर कर लाठी-डंडों व ईंट-पत्थर से हमला बोल दिया था, तभी पुलिस ने कार्रवाई की। इस घटना की कई वीडियोज भी सोशल मीडिया पर सामने आई थी।

अक्टूबर 2021

आर्यन खान केस: इस माह मीडिया में जो सबसे अधिक खबर कवर की गई वो शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान से जुड़ी हुई है। 2अक्टूबर को आर्यन को मुंबई के क्रूज ड्रग केस में उनके साथियों के साथ एनसीबी ने पकड़ा और 3 हफ्ते से ज्यादा का समय उन्हें जेल में गुजारना पड़ा। इस दौरान जब उन्होंने ड्रग सेवन की बात को स्वीकारा तो सोशल मीडिया पर शाहरुख खान की खूब बदनामी हुई। जगह-जगह उनके पुराने इंटरव्यू दिखाए गए और उनकी परवरिश पर सवाल खड़ा किया गया।
बांग्लादेश हिंदू विरोधी हिंसा: यही महीना दुर्गा पूजा का भी था और इसी महीने में बांग्लादेश में हिंदुओं पर ईशनिंदा का आरोप लगाकर उनके पंडालों पर हमला हुआ और कई हिंदुओं की जान ले ली गई।

नवंबर 2021

दिवाली पटाखा बैन: साल 2021 में नवंबर का महीना वैसे तो त्योहारों के कारण चर्चा में था। लेकिन, इस माह दिवाली थी और हिंदुओं के पावन त्योहार पर एक बार फिर पटाखे बैन करने का काम राज्य सरकारें कर रही थीं। ऐसे में सोशल मीडिया पर बस सवाल किए जा रहे थे कि अगर सवाल प्रदूषण का है तो केवल दिवाली पर पटाखे क्यों बैन हुए। इन्हें क्रिसमस और न्यू ईयर पर भी बैन किया जाना चाहिए। 
इस विषय के अलावा एक टॉपिक जो विवादों में रहा वो गुरुग्राम नमाज से जुड़ा है। दरअसल वहाँ, समुदाय विशेष लोगों के खुले में नमाज पढ़ने पर कई स्थानीयों ने आपत्ति जताई थी। लेकिन प्रशासन के ढीले रवैये के कारण सुनवाई नहीं हुई। बाद में कई हिंदुओं ने विरोध जताने के लिए सड़कों पर उतर हनुमान चालीसा आदि का पाठ शुरू कर दिया और इस तरह प्रशासन को मामले पर संज्ञान लेना पड़ा। हालाँकि ये मामला अब भी शांत नहीं है। हर जुमे  की नमाज पर कई जगह मुस्लिम इकट्ठा होते हैं और खुले में नमाज पढ़ने की जुगत में रहते हैं।

दिसंबर 2021

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर: साल 2021 का दिसंबर महीना काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण के लिए हमेशा याद किया जाएगा। 13 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस कॉरिडोर के उद्घाटन को देश भर में कवरेज मिली और आज भी इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं।
स्वर्ण मंदिर में लिंचिंग: हाल में पंजाब के अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हुई एक व्यक्ति की लिंचिंग भी सुर्खियों में है। वहाँ श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी करने के आरोप में व्यक्ति की हत्या करके उसे गुरुद्वारा परिसर के बाहर फेंक दिया गया, लेकिन हैरत की बात यह है कि इस मामले में पुलिस या राजनीतिक पार्टियों ने एक भी शब्द नहीं बोला।

किसान आंदोलन खत्म, SKM का ऐलान: दिल्ली बॉर्डर से उखड़ने लगे टेंट

                                                                                                                                साभार: ANI
दिल्ली की सीमाओं पर पिछले काफी दिनों से चल रहा किसानों का आंदोलन ख़त्म हो गया। संयुक्त किसान मोर्चा ने आंदोलन ख़त्म करने की घोषणा की है। किसान जल्दी ही दिल्ली के बॉर्डर से अपने घर की ओर वापसी करेंगे।

दिल्ली में संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक के बाद किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा, “हमने अपना आंदोलन स्थगित करने का फैसला किया है। हम 15 जनवरी को समीक्षा बैठक करेंगे। अगर सरकार अपने वादे पूरे नहीं करती है, तो हम अपना आंदोलन फिर से शुरू कर सकते हैं।”

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक 11 दिसंबर को मोर्चे खाली होंगे। इस दिन दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसान लौटेंगे। केंद्र सरकार की तरफ से मिले पत्र के बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने यह फैसला किया। घोषणा से पहले एक किसान ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा था, ”हम अपने घरों के लिए निकलने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन अंतिम फैसला संयुक्त किसान मोर्चा करेगा।”

इन मुद्दों पर बनी सहमति

MSP : केंद्र सरकार कमेटी बनाएगी, जिसमें संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधि लिए जाएँगे। अभी जिन फसलों पर MSP मिल रही है, वह जारी रहेगी। MSP पर जितनी खरीद होती है, उसे भी कम नहीं किया जाएगा।
केस वापसी : हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकार केस वापसी पर सहमत हो गई है। दिल्ली और अन्य केंद्र शासित प्रदेशों के साथ रेलवे द्वारा दर्ज केस भी तत्काल वापस होंगे।
मुआवजा : मुआवजे पर भी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में सहमति बन गई है। पंजाब सरकार की तरह ही यहाँ भी 5 लाख का मुआवजा दिया जाएगा। किसान आंदोलन में 700 से ज्यादा किसानों की मौत हुई है।
बिजली बिल : बिजली संशोधन बिल को सरकार सीधे संसद में नहीं ले जाएगी। पहले उस पर किसानों के अलावा सभी संबंधित पक्षों से चर्चा होगी।
प्रदूषण कानून : प्रदूषण कानून को लेकर किसानों को सेक्शन 15 से आपत्ति थी। जिसमें किसानों को कैद नहीं, लेकिन जुर्माने का प्रावधान है। इसे केंद्र सरकार हटाएगी।

ऐसे बनी सहमति

केंद्र सरकार ने इस बार सीधे संयुक्त किसान मोर्चा की 5 मेंबरी हाईपावर कमेटी से मीटिंग की। हाईपावर कमेटी के मेंबर बलबीर राजेवाल, गुरनाम चढ़ूनी, अशोक धावले, युद्धवीर सिंह और शिवकुमार कक्का नई दिल्ली स्थित ऑल इंडिया किसान सभा के ऑफिस पहुँचे, जहाँ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के अफसर भी जुड़े। सबसे बड़ा पेंच केस पर फँसा था, जिसे तत्काल वापस लेने पर केंद्र राजी हो गया।

कभी ज़िंदा जलाया, कभी काट कर टाँगा, हत्या-बलात्कार और हिंसा : 60,000 करोड़ रूपए का नुकसान – ये सब देश को देकर जाएँगे ‘किसान’

दिल्ली की सीमाओं पर पिछले एक साल से चल रहे ‘किसान आंदोलन’ से देश को खासा नुकसान हुआ है। जहाँ एक तरफ लाखों लोगों को रोजाना दफ्तर जाने और बच्चों को स्कूल जाने में परेशानी हुई, वहीं दिल्ली की सीमाओं पर स्थित गाँव वालों को भी कम परेशानी नहीं हुई। इस ‘किसान आंदोलन’ में हिंसा, बलात्कार और हत्या जैसी घटनाएँ हुईं। 26 जनवरी, 2021 को दिल्ली में हुई हिंसा को कौन भूल सकता है? अब जब इसे खत्म किए जाने की बातें चल रही हैं, आइए जानते हैं कि कैसे इस तथाकथित आंदोलन में इस तरह की क्या-क्या हरकतें हुईं।

चर्चा चल रही है कि ‘किसान आंदोलन’ अब ख़त्म हो सकता है और ‘संयुक्त किसान मोर्चा (SKM)’ जल्द ही इसका ऐलान कर सकता है। कुल 32 किसान संगठनों की एक बैठक भी हुई है, जिसमें तय किया गया कि 1 दिसंबर, 2021 को अंतिम फैसला किया जाएगा। पंजाब के किसानों का कहना है कि हम जीत हासिल कर चुके हैं और हमारे पास अब कोई बहाना नहीं है। पराली और बिजली एक्ट से किसानों को निकाले जाने पर भी वो खुश हैं। वहीं अब मृत किसानों के आँकड़े देकर मुआवजे की भी माँग की जा रही है।

जबकि इसके उलट राकेश टिकैत कहते आए हैं कि उनके पास तो 700 माँगों की सूची है और उनमें से सभी पूरे नहीं होंगे, तब तक आंदोलन ख़त्म नहीं होगा। कोई नेता कुछ बोल रहा है, कोई कुछ। अलग-अलग जगहों पर राकेश टिकैत अलग-अलग बयान दे रहे हैं। इसमें खालिस्तानी गुट अलग है, जाट कार्ड खेलने वाला समूह अलग है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही माफ़ी माँग ली हो, लेकिन किसान नेता नहीं चाहते कि उनके समर्थक किसानों के मन में भाजपा के लिए घृणा कम हो।

किसान आंदोलन के कारण देश को 60,000 करोड़ रुपए का घाटा

‘किसान आंदोलन’ के कारण देश को 60,000 करोड़ रुपए का घाटा सहना पड़ा। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने एक आँकड़े में बताया है कि 12 महीनों में देश को इसके कारण इतना नुकसान हुआ। व्यापारियों के संगठन ने कहा है कि ये घाटा मुख्यतः इस आंदोलन के शुरुआती स्टेज में हुई। यानी, नवंबर-दिसंबर 2020 और जनवरी 2021 में ये घाटा हुआ। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में आवश्यक वस्तुओं की आवाजाही में काफी दिक्कतें आईं।
हालाँकि, व्यापारिक संगठनों के प्रयास ने जब प्रयास किया तो इन रास्तों से सामान की आवाजाही शुरू कर दी गई। लेकिन, तब भी इसमें काफी दिक्कतें आ रही थीं। सप्लाई चेन को ठीक किया गया। साथ ही सरकारों ने भी दिल्ली के रास्ते वस्तुओं को ढोने वाले ट्रक्स को भी अन्य वैकल्पिक रूट उपलब्ध कराए गए। दिल्ली में रोज 50,000 ट्रक्स सामान लेकर आते हैं। इस हिसाब से सोचा जा सकता है कि किस कदर देश को नुकसान हुआ है, जिसका आकलन करना भी मुश्किल है।

‘किसान आंदोलन’ के सहारे परवान चढ़ा खालिस्तानी एजेंडा

अक्टूबर 2021 में
‘सिख्स फॉर जस्टिस’ नाम की कट्टरवादी सिख संस्था ने तथाकथित खालिस्तान का नक्शा जारी किया। उसने कहा हैथाकि भारत को काट कर इस क्षेत्र को सिखों का अपना मुल्क बनाया जाएगा। अक्टूबर 2021 के अंत में इसके लिए उसने लंदन में रेफेरेंडम आयोजित करने का भी निर्णय ले लिया। ‘क्वीन एलिजाबेथ सेंटर’ में ये भारत विरोधी कार्यक्रम आयोजित किया गया। जब ये आंदोलन शुरू हुआ, तभी से इसमें खालिस्तानियों की हिस्सेदारी सामने आने लगी थी और भिंडरवाला के पोस्टर्स इसमें नजर आने लगे थे।
आज के माहौल की बात करें तो अब भी प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस (SFJ)’ एक बार फिर से इसका फायदा उठाने की फिराक में है और अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए वह लगातार युवाओं को भड़काने की कोशिश कर रहा है। इसमें गुरुपवंत सिंह पन्नू को यह कहते सुना जा सकता है कि देश को आजाद कराने के लिए भगत सिंह ने पार्लियामेंट में बम फेंका था। वो कहता है कि ट्रैक्टर को हथियार बनाकर तुम 29 नवंबर को खालिस्तान के केसरी झंडे को भारत की संसद पर चढ़ा दो।
सबसे बड़ी बात तो ये है कि इस आंदोलन को जिस तरह से कृषि के नाम पर सिख कट्टरवाद और खालिस्तानी अलगाववाद से जोड़ा गया, वो एक बहुत बड़ी साजिश थी। अचानक से लंदन में सिखों के अलग मुल्क के ली रेफरेंडम होने लगा, प्रतिबंधित संगठन SFJ का पन्नू वीडियोज जारी करने लगा, कनाडा के नेताओं ने इस आंदोलन का समर्थन शुरू कर दिया और ISI ने पंजाब में इस आंदोलन को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी – इस बात ने ख़ुफ़िया एजेंसियों तक के कान खड़े कर दिए थे।
सबसे बड़ी बात तो ये है कि इस आंदोलन को जिस तरह से कृषि के नाम पर सिख कट्टरवाद और खालिस्तानी अलगाववाद से जोड़ा गया, वो एक बहुत बड़ी साजिश थी। अचानक से लंदन में सिखों के अलग मुल्क के ली रेफरेंडम होने लगा, प्रतिबंधित संगठन SFJ का पन्नू वीडियोज जारी करने लगा, कनाडा के नेताओं ने इस आंदोलन का समर्थन शुरू कर दिया और ISI ने पंजाब में इस आंदोलन को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी – इस बात ने ख़ुफ़िया एजेंसियों तक के कान खड़े कर दिए थे।
पन्नू ने 4 अक्टूबर को एक वीडियो और एक पत्र जारी किया था। इसमें उसने सिखों को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ 9 अक्टूबर को ड्रोन और ट्रैक्टर का इस्तेमाल करने के लिए उकसाया था। अपने बयान में पन्नू ने कहा था, “आज यूपी के लखीमपुर में चार किसानों की हत्या कर दी गई। किसानों के विरोध प्रदर्शन शुरू होने के बाद से सैकड़ों मौतें हो चुकी हैं। अब खालिस्तान ही एकमात्र रास्ता है। किसान हल खालिस्तान।” अब आप समझ सकते हैं कि किस कदर ये सिख कट्टरवाद इस आंदोलन में घुसा रहा।
सिख फॉर जस्टिस ने भारतीय मूल वाले सभी 18 वर्ष के ऊपर वाले लोगों से वोट देने को कहा था। ये वोटिंग वेस्टमिंनस्टर के एलिजाबेथ 2 सेंटर में हुई। इस दौरान लोगों ने न केवल भारत विरोधी नारे लगाए, खालिस्तान जिंदाबाद कहा बल्कि इन लोगों के हाथों मे खालिस्तानी झंडे भी जगह-जगह दिखाई दिए। रिपोर्ट बताती है कि बैलट पेपर पर लिखा था कि क्या भारत शासित पंजाब को एक स्वतंत्र देश बनना चाहिए? संगठन के संस्थापक खालिस्तानी पन्नू ने कहा था कि 30 हजार सिखों ने जनमत संग्रह पर अपना वोट दिया।

ये कैसा आंदोलन, जहाँ बलात्कार और हत्याएँ भी

अक्टूबर 2021 में आपने भी ये खबर देखी होगी, जब लखबीर सिंह नाम के एक दलित युवक की आदिग्रन्थ की बेअदबी के आरोप में हाथ-पाँव काट कर हत्या कर दी गई थी। लखबीर के घर वालों ने भी कहा था कि वह सिंघु बॉर्डर तक जाने में सक्षम ही नहीं था। कुछ अज्ञात लोग उसे वहाँ लेकर गए थे। परिवार ने इन आरोपों पर आपत्ति जताई थी कि लखबीर ने धर्मग्रंथ का अपमान किया था। उनके अनुसार लखबीर एक धार्मिक प्रवृत्ति का इंसान था। वो किसी धर्म का अपमान कर ही नहीं सकता था।
आरोपित निहंग सरबजीत मात्र 6 वर्ष की ही उम्र में अपने मामा के साथ उनके गाँव गुरुदासपुर स्थित खुजाला में रहने लगा था। सरबजीत के पिता की उम्र 75 वर्ष और माँ की आयु 70 वर्ष है। ये दोनों बगल के गाँव विठवां में रहते हैं। कक्षा 10 पास कर सरबजीत दुबई चला गया था। वहाँ वो लगभग 5 वर्ष रहा। इस मामले में कई निहंगों की गिरफ़्तारी भी हुई, लेकिन सिख कट्टरपंथियों ने बार-बार कहा कि वो इस हत्याकांड को लेकर फख्र महसूस कर रहे हैं और उन्हें इसका कोई मलाल नहीं।
हम जानते हैं, केंद्र सरकार के कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर ‘किसानों’ का प्रदर्शन एक साल तक चला। इसी में शामिल होने के लिए बंगाल से आई 25 वर्षीय युवती के साथ टीकरी बॉर्डर पर गैंगरेप का मामला सामने आया। इस मामले में पुलिस ने पीड़िता के पिता की शिकायत पर 2 महिला आरोपितों समेत 6 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया था। पीड़िता के साथ हुई घटना के बारे में आंदोलन से जुड़े बहुत से लोगों को पता चल चुका था, मगर इस मामले में कार्रवाई की पहल नहीं की गई। उसने पीड़िता की आपबीती का वीडियो भी बनाया था।
अब एक और घटना को याद कीजिए। जगदीश चंद्र की तीन संतानों में 42 साल का मुकेश सबसे बड़ा था। लॉकडाउन में काम छूट गया था तो ज्यादातर समय गाँव में ही रहता था। इसी दौरान अपने गाँव से सटे बाइपास पर कब्जा जमाए कुछ प्रदर्शनकारियों के संपर्क में वह आया था। 16 जून की रात करीब 9 बजे परिजनों को उसे जिंदा जलाने की खबर मिली थी। मुकेश की माँ शकुंतला ने ऑपइंडिया को बताया था कि वह घर में खाना बनाने के लिए कहकर निकला था। बाद में उन्हें पता चला कि उनके बेटे को शराब पिलाकर कुछ लोगों ने जिंदा जला दिया।

किसान आंदोलन, इसमें कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे इसे आंदोलन कहा जाए

इन घटनाओं को देख कर साफ़ है कि ‘किसान आंदोलन’ को कभी जाट, कभी सिख और कभी किसानों की प्राइड से जोड़ कर इन सभी को भाजपा के खिलाफ भड़काने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध इन लोगों के मन में घृणा भरने के प्रयास किए गए। कभी राकेश टिकैत ने भड़काऊ बयान दिया, कभी गुरनाम सिंह चढूनी कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ करार के आरोपों में फँसे तो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर के उन्हें हत्या तक की धमकी दी गई।
हालाँकि, अभी देखना ये है कि ‘किसान आंदोलन’ ख़त्म होता भी है या नहीं पूरी तरह। अब इसमें भी अलग-अलग गुट हो गए हैं। हर गुट के अलग-अलग हित हैं और उन्हें साधने के लिए भी वो अलग-अलग रुख अख्तियार कर सकते हैं। कोई पंजाब में उम्मीदवार उतार रहा है तो किसी पर उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दल डोरे डाल रहे हैं। पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में भाजपा के विरुद्ध चुनाव प्रचार कर ये पहले ही दिखा चुके हैं कि इनकी घृणा किस दल और किस व्यक्ति से है। इसमें किसानों का कोई हित नहीं।

पार्लियामेंट पर खालिस्तानी झंडा फहराओ, 93+ लाख रूपए का ईनाम पाओ : गुरुपवंत सिंह पन्नू, सिख फॉर जस्टिस (SFJ)

गुरुपवंत सिंह पन्नू (फोटो साभार: इंडिया टीवी)
मोदी सरकार ने तीनों को कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला ले लिया है। बावजूद इसके प्रदर्शनकारी किसान आंदोलन को जारी रखने पर अड़े हुए हैं। इस बीच प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ एक बार फिर से इसका फायदा उठाने की फिराक में है और अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए वह लगातार युवाओं को भड़काने की कोशिश कर रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ सिख फॉर जस्टिस का चीफ गुरुपवंत सिंह पन्नू किसानों के संसद मार्च की खबर को ध्यान में रखते हुए रिकॉर्डेड ऑडियो संदेश भेजकर लाल किले की तरह ही 29 नवंबर को देश की संसद पर खालिस्तान के झंडे लगाने के लिए उकसा रहा है। इस ऑडियो में गुरुपवंत सिंह पन्नू को यह कहते सुना जा सकता है कि देश को आजाद कराने के लिए भगत सिंह ने पार्लियामेंट में बम फेंका था। ट्रैक्टर को हथियार बनाकर तुम 29 नवंबर को खालिस्तान के केसरी झंडे को भारत की संसद पर चढ़ा दो। सिख फॉर जस्टिस सवा लाख डॉलर (93,81,625 भारतीय रुपए) का ईनाम देगी। 29 नवंबर को खालिस्तान केसरी चढ़ा दो भारत की संसद पर। पंजाब, किसान, हल खालिस्तान।

इस बीच दिल्ली के पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना ने कानून व्यवस्था के मुद्दे पर प्रतिबद्धता जताते हुए कहा है कि किसी भी हाल में लॉ एन्ड ऑर्डर को खराब करने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने ये भी कहा है कि लोकतांत्रिक तरीके से विरोध पर कोई आपत्ति नहीं है। किसानों के साथ हमारा एक समझौता है और उसी के आधार पर काम किया जाएगा। अस्थाना ने ये भी कहा कि बीट पेट्रोलिंग को और अधिक मजूबत किया गया है।

29 नवंबर का ट्रैक्टर मार्च स्थगित

हालाँकि, किसानों ने 29 नवंबर को होने वाला ट्रैक्टर मार्च स्थगित कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली में शनिवार (27 नवंबर 2021) को संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) की बैठक में इस पर फैसला लिया गया। संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि वह 4 दिसंबर को अपनी अगली बैठक में सरकार के रुख की समीक्षा करके आगे की रणनीति बनाएँगे।
इससे पहले बीते दिनों संयुक्त किसान मोर्चा की 9 सदस्यीय कमिटी ने फैसला लिया गया था कि 29 नवंबर को गाजीपुर बॉर्डर और टीकरी बॉर्डर से 500-500 किसान ट्रैक्टर पर संसद भवन की ओर कूच करेंगे।

‘हमारे 700 डिमांड्स हैं…’: राकेश टिकैत

पहले भी कई बार इन आन्दोलनजीवियों साबित कर चुके हैं कि यह आंदोलन उनके हाथ से निकल चुका है, मोदी विरोधी पार्टियों के समर्थन से देश विरोधी ताकतों का इस आंदोलन पर कब्ज़ा हो चुका है, और राकेश टिकैत केवल एक मोहरा है। राकेश वही बोलते हैं जो उनसे बुलवाया जाता है। बिल वापस क्या हुए इनकी मांगें तो उड़द के आटे की फैलती ही जा रही हैं। समस्त आन्दोलनजीवी और इनको समर्थन दे रही मोदी विरोधी पार्टियां जवाब दें कि "क्या कभी हथेली पर सरसों उगी है?" जिसे देख आंदोलन समाप्त होने वाला नहीं। और सरकार द्वारा कोई सख्त कार्यवाही किये जाने पर इन आन्दोलनजीवियों और इनके समर्थकों का क्या हाल होगा? आखिर संयम की एक सीमा होती है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही 1 साल तक चले विरोध प्रदर्शन के बाद गुरु परब के दिन तीनों कृषि कानून वापस लिए जाने की घोषणा कर दी हो, लेकिन किसान नेता अब भी नहीं मान रहे हैं और दिल्ली की टिकरी सीमा पर प्रदर्शनकारियों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। 26 नवंबर, 2021 को किसान अपने आंदोलन के एक वर्ष पूरा होने पर जबरदस्त शक्ति-प्रदर्शन की योजना बना रहे हैं। खाली दिख रहे टेंट्स भी बढ़ गए हैं। पिछले मात्र 4 दिनों में किसानों की संख्या वहाँ दोगुनी हो गई है।

अब जब 29 नवंबर को संसद की तरफ ट्रैक्टर से कूच का कार्यक्रम स्थगित नहीं हुआ है, दिल्ली का पुलिस-प्रशासन भी हलकान है कि आंदोलनकारियों का अगला रास्ता क्या होगा। दिल्ली पुलिस उनसे सामंजस्य बनाने की कोशिश में लगी है। मन टटोल कर पता लगाया जा रहा है कि आगे क्या होगा। तीनों कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुए आंदोलन में अब ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)’ के तहत कानून बनाने और 750 किसानों की मौत का दावा कर के उन सब के परिवारों को मुआवजा देने की माँग की जा रही है। लेकिन उन महिलाओं के सम्मान को कौन लौटाएगा, जिनका आंदोलन स्थल पर बलात्कार हुआ है? 

किसान नेताओं और केंद्र सरकार के बीच 11 दौर की बैठकें हुई थीं, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला था। पंजाब-हरियाणा के गाँवों से किसानों को वापस दिल्ली सीमा पर बुलाया जा रहा है। उत्साहित आंदोलनकारी अब फिर से भीड़ जुटाने लगे हैं। बता दें कि 26 नवंबर को शक्ति-प्रदर्शन के अलावा 29 नवंबर से 500 किसानों के ट्रैक्टर से संसद कूच की योजना है। संसद का शीतकालीन सत्र भी शुरू हो रहा है। किसानों का कहना है कि सड़क दुर्घटना में, हार्ट अटैक से और पुलिसिसय बल प्रयोग के कारण किसानों की मौत हुई है।

वहीं राकेश टिकैत ने ‘टाइम्स नाउ’ के एक सवाल के जवाब में कहा कि हमारे पास तो 700 डिमांड्स हैं, सरकार से इन सब पर बातचीत चलती रहेगी। उन्होंने कहा, “ये जो संसद सत्र चलाते हैं, वो क्या करते हैं वहाँ पर? डिमांड्स को अप्रूव करते हैं, लागू करते हैं। दिल्ली जाएँगे। 500 किसान 30 ट्रैक्टरों के साथ संसद जाएँगे। अभी तो MSP है, 700 मृतक किसानों के परिजनों को मुआवजा है, मुकदमे वापस लेने हैं, सीड बिल है, पेस्टीसिड्स बिल है, ये सब हाउस में आना है।”

वहीं 23 नवंबर, 2021 को ‘भारतीय किसान यूनियन (BKU)’ के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने ऐलान किया था कि 60 ट्रैक्टरों के साथ 1000 किसान दिल्ली की तरफ कूच करेंगे। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा खोले गए रास्तों से ही ये ट्रैक्टर संसद तक जाएँगे। उन्होंने कहा कि सड़कें जाम करने के आरोप हम पर लगा, लेकिन हमने ऐसा नहीं किया था। उन्होंने कहा कि सड़कें जाम करना उनके अभियान का हिस्सा नहीं है। साथ ही कहा कि सरकार से बातचीत चलती रहेगी, लेकिन प्रदर्शन फ़िलहाल जारी रहेगा।

कृषि कानूनों की वापसी: BJP को उनकी ही वेबसाइट पर मौजूद ये पुस्तक पढ़नी चाहिए, जानिए क्यों

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (19 नवंबर, 2021) को राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए अचानक से तीनों कृषि कानूनों को वापस लिए जाने की घोषणा कर दी। इन कानूनों को कृषि सुधार के लिए लाया गया था। भारत में जिस तरह से कृषि उत्पादों को किसान उपजाते और फिर बेचते हैं, ये कानून उस प्रक्रिया के विविधीकरण और उसमें आने वाली बाधाओं को हटाने के लिए लाए गए थे। इस घोषणा से सभी को हैरानी हुई। सत्ताधारी दल के कई समर्थक भी बेचैन हो गए। कम से कम ऑनलाइन तो ऐसा ही देखने को मिला। अब जब लोगों का गुस्सा और चर्चाओं का बाजार थमता नजर आ रहा है, मैं पिछले एक वर्ष में हुई घटनाओं का विश्लेषण करने का खतरा मोल ले रहा हूँ।

 

सबसे पहले तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस घोषणा पर दो तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को सामने आईं। सत्ता और पार्टी के लोगों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ये फैसला लिया गया, क्योंकि खालिस्तानी ताकतों ने ‘किसान आंदोलन’ में घुसपैठ करने में कामयाबी पा ली थी। जबकि, विपक्ष और यहाँ तक कि मोदी समर्थकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ऐसा किया गया। बता दें कि अगले 4 महीनों में इन दोनों ही राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं।

पहले दूसरी वाली प्रतिक्रिया की बात करते हैं, जिसमें कहा गया है कि ये चुनाव जीतने के लिए लिया गया फैसला था। विपक्ष तो ऐसा कहेगा ही, लेकिन कुछ भाजपा समर्थक भी ऐसी ही राय रख रहे हैं। मुझे ऐसे लोगों की कोई गलती नजर नहीं आती, क्योंकि बाहर से देखने पर कई चीजें समझ में नहीं आ रही हैं।

1 वर्ष पहले जब किसान प्रदर्शनकारी दिल्ली के लिए निकले थे, तभी इस आंदोलन में खालिस्तानी तत्वों की उपस्थिति का स्पष्ट रूप से पता चल गया था। एक सिख व्यक्ति का अंग्रेजी में एक पुलिस अधिकारी से बहस करते हुए वीडियो भी सामने आया था। मीडिया के गिरोह विशेष ने तुरंत उसे ‘आधुनिक शिक्षित किसान’ बताते हुए अपने सिर पर बिठा लिया, लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही उसे ‘भाजपा एजेंट’ बताते हुए लिबरलों ने अजीबोगरीब ढंग से उससे नाता तोड़ लिया। उसने जनरैल सिंह भिंडरवाला की निंदा करने से इनकार कर दिया था। याद दिला दें कि भिंडरवाला वही व्यक्ति है, जिसने 80 के दशक में सिख अलगावाद और खालिस्तानी विचारधारा को पुनर्जीवित किया था। इसका परिणाम हमें पंजाब में हिन्दुओं के नरसंहार के रूप में देखने को मिला। फिर ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ हुआ।

वापस ‘किसान आंदोलन’ पर लौटें तो शुरू से ही इसमें भिंडरवाला की तस्वीरों वाले के पोस्टर-बैनर्स, ट्रैक्टर्स, टीशर्ट्स इसमें दिख रहे थे। कई बार आंदोलनकारियों ने अलगाववादी और हिन्दू विरोधी नारे लगाए, इस तरह की बातें की। कुछ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उसी तरह हत्या करने की धमकी दी, जिस तरह इंदिरा गाँधी की हुई थी। इसके बाद गणतंत्र दिवस (26 जनवरी, 2021) को लाल किला सहित दिल्ली में जो हिंसा हुई, वो हम सबने देखा। अगर खालिस्तानी खतरे के कारण कृषि कानूनों को वापस लिया गया है तो सरकार इतने दिनों से क्या कर रही थी? ये खतरा तो पिछले 10 महीने से यूँ ही दिख रहा है, फिर इस पर क्या किया गया?

इसीलिए, ये सारा का सारा टाइमिंग का खेल है और मैं इसे पूरी तरह समझ रहा हूँ। जब खालिस्तानी खतरा शुरू से ही किसानों के आंदोलन में मौजूद था, फिर अब कृषि कानूनों को चुनाव से पहले वापस लिए जाने की घोषणा क्यों हुई? क्या इससे इशारा नहीं मिलता कि चुनाव जीतने के लिए ऐसा किया गया है?

कृषि कानूनों की वापसी विधानसभा चुनावी जीत के लिए?

इस घोषणा का जो समय है, वही इस बात को बल देता है कि 2022 में पंजाब और उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में राजनीतिक फायदे के लिए तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया गया। लेकिन, घोषणा की टाइमिंग ही ऐसा भी इशारा करती है कि ये कारण नहीं भी हो सकता है। अगर पंजाब-यूपी विधानसभा चुनाव जीतने ही इस फैसले का कारण है, फिर तो काफी खराब समय पर घोषणा की गई।
4 महीना भारतीय लोकतंत्र में एक लंबा समय होता है और कोई मंझा हुआ राजनेता विपक्ष को फिर से रणनीति बनाने के लिए इतना लंबा समय नहीं दे सकता। ममता बनर्जी ने इसी चतुराई को अपना कर भाजपा को मात दी थी, जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से कुछ ही दिनों पहले खबर आई थी एक हमले में उनका पाँव टूट गया है। पैरों में प्लास्टर लगा कर वो अस्पताल में भर्ती हुईं और वहाँ से कई तस्वीरें मीडिया में सामने आईं। भाजपा समझ नहीं पाई कि इस ‘पीड़िता महिला कार्ड’ के जवाब में उनकी पोल खुले जाए, उनका मजाक उड़ाया जाए या फिर किसी अन्य महिला नेता को आगे कर के इसे ड्रामा साबित किया जाए। लेकिन, अगर आप कुछ हैरानी भरा लेकर सामने आना चाहते हैं तो इसके लिए उचित समय किसी चुनाव से कुछ ही दिन पूर्व तक होता है। ये वो समय होता है, जब विरोधी भी लड़खड़ा जाते हैं।
दूसरी बात ये है कि राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए टीवी पर ये घोषणा क्यों की जाएगी? ये आपके लिए खुद परेशानी भरा होगा, क्योंकि आप इससे और कमजोर नजर आएँगे। चुनाव के तारीखों की घोषणा होने के बाद किसी रैली में जनता के सामने भी तो ऐसा किया जा सकता है? लोहरी के दिन पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के साथ पंजाब की किसी रैली में भी तो ये घोषणा की जा सकती थी? लोहरी का त्योहार जब और कृषि से जुड़ा हुआ है। साथ ही ये ऐसे समय पर आ रहा है, जब पंजाब में विधानसभा चुनाव नजदीक होगा। भाजपा और अमरिंदर सिंह की नई पार्टी के गठबंधन के साथ ये घोषणा हो सकती थी। ऐसा कुछ कर के आप अपने विपक्ष को बड़ा झटका दे सकते हैं। विपक्ष और आपके समर्थक इस फैसले पर वैसे भी आपकी आलोचना करते, फिर कम से कम टाइमिंग तो सही होती?
भाजपा के रणनीतिकार, जिन पर अक्सर आरोप लगते रहते हैं कि वो चुनाव जीतने पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं, निश्चित रूप से इस घोषणा के फायदों और नुकसान पर विचार-विमर्श कर सकते हैं। अगर पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के असंतुष्ट किसानों को मनाना इस घोषणा का लक्ष्य है, फिर तो इसकी टाइमिंग बिलकुल भी सही नहीं है।
कुछ न कुछ तो ऐसा ज़रूर है, जिस कारण चुनाव से इतना पहले ही भाजपा ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की अचानक से घोषणा करने को मजबूर कर दिया। इस महीने की शुरुआत में हुए कुछ राज्यों के उपचुनाव में भाजपा का प्रदर्शन मिलाजुला रहा था। वहाँ से भी कुछ ऐसा इशारा नहीं मिलता कि उपचुनावों के परिणाम के कारण ऐसा हुआ होगा।
हालिया उपचुनाव के दौरान एकमात्र विधानसभा क्षेत्र जहाँ किसान प्रदर्शनकारियों का असर था, वो था हरियाणा का एलेनाबाद। यहाँ के विधायक INLD के अभय सिंह चौटाला ने कृषि कानूनों का विरोध करते हुए ही अपने पद से इस्तीफा दिया था। फिर से उनकी ही जीत हुई। लेकिन, भाजपा का प्रदर्शन उतना बुरा नहीं रहा जितना यहाँ 2019 के विधानसभा चुनाव में रहा था। उलटा उसे पहले से ज्यादा ही वोट मिले। इसके परिणाम उतने हैरान करने वाले नहीं थे कि आपात स्थिति में भाजपा इस तरह की कोई घोषणा कर दे। केवल पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश से भाजपा के लिए बुरी खबर आई। हिमाचल प्रदेश में भाजपा को एक भी सीट नसीब नहीं हुई। हालाँकि, इन दोनों ही राज्यों में ‘किसान आंदोलन’ का कोई असर नहीं था और हार का कारण कृषि कानून नहीं थे।

घोषणा की टाइमिंग पंजाब से ज्यादा सिखों को लेकर

अगर इरादा पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनावों को जीतने का है तो ये समय ठीक नहीं है। हालाँकि समय ये बताता है कि क्या प्राप्त करने की कोशिश हो रही है। प्रधानमंत्री ने इस घोषणा के लिए गुरु परब का अवसर चुना, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव के जन्मदिन वाला दिन। ये विचार सिख भावना से जुड़ने का या उन्हें खुश करने का है।
अब कोई ये भी तर्क दे सकता है कि अगर उद्देश्य पंजाब चुनाव नहीं जीतना है तो सिख भावना और जाट-सिख भावना को किस वजह से खुश किया जा रहा है? ये जरूरी नहीं। अगर ऐसा होगा तो ये बीजेपी के लिए बोनस होगा (मुझे नहीं लगता कि इससे पार्टी को लाभ होगा और ये हम आज से आने वाले 4-5 माह में देख लेंगे), लेकिन पहला उद्देश्य चुनाव जीतना नहीं है क्योंकि जैसे मैंने ऊपर समझाया कि ये समय उस लक्ष्य प्राप्ति का नहीं।
सरकार खालिस्तानी हैंडलर के बहकावे में आ गई है? या ये ख़ुफ़िया विफलता है? ख़ुफ़िया एजेंसियों को कैसे नहीं पता था कि खालिस्तानी इस किसान प्रदर्शन को अपना एजेंडा चलाने के लिए इस्तेमाल करेंगे? इसके मिश्रित जवाब हैं।
जाहिर तौर पर सरकार ने इसे होते नहीं देखा और वे इसे मानने की स्थिति में भी नहीं हैं। ये वो बदलाव थे जो हर पार्टी माँग रही थी और हर पार्टी ने इसके लिए वादा दिया। लेकिन बाद में ये लोग पलट गए। यहाँ तक कि तथाकथित बुद्धिजीवी भी सिर्फ ‘सरकार के बर्ताव’ में गलतियाँ निकाल पा रहा था न कि लाए गए कृषि कानूनों में। शिरोमणि अकाली दल ने भी यू टर्न लिया और एक मुद्दा पूरे पंजाब का मुद्दा बन गया और कुछ ही समय बाद इसे खालिस्तानियों द्वारा सिख मुद्दा बना दिया गया जो लंबे समय से ‘जनमत संग्रह 2020’ पर काम कर रहे थे। हमें लगा कि ये कुछ हास्यास्पद सी चीज है कि कुछ सिख लंदन और कनाडा में बैठकर इसके सपने देख रहे हैं। लेकिन हम गलत थे।
सरकारी एजेंसियों को निश्चित तौर पर खालिस्तानी खतरा महसूस हुआ, उन्होंने इसे गौर भी करवाया लेकिन जब उन्होंने ये सब किया तो उस समय उनपर किसानों को बदनाम करने का आरोप लग गया। हम लोग नहीं जानते कि शुक्रवार को गुरु परब के दिन किसानों के सामने हार मानने से पहले इतने महीनों में कितनी बार इस (खतरे) को निपटाने की कोशिश हुई। हम शायद कभी नहीं जान पाएँगे, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों और विशेष रूप से इसका मुकाबला करने की रणनीतियों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं की जाती है। वर्गीकृत सूचनाएँ और, इससे दूसरों को अपनी थ्योरी बुनने के अवसर मिलेंगे।
जो जानकारी पब्लिक डोमेन में है वो एक ऐसे परिदृश्य को चित्रित करती है जहाँ सरकार ने इस खतरे- पंजाब में खालिस्तानियों की वापसी, से निपटने के लिए पीछे हटने को सबसे अच्छा तरीका समझा। ये फैसला या तो बड़ी जीत की ओर जाना चाहिए या फिर युद्ध को जीतने के लिए एक लड़ाई हारने पर। और वह बड़ी जीत चुनावों में जीत नहीं हो सकती है या कोई ऐसा बैकडोर भी नहीं हो सकती जिसके जरिए दोबारा कानून को पेश किया जा सके। अगर ये पीछे हटना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हुआ है, तो बड़ी जीत भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए होनी चाहिए।
और यहीं पर असली चुनौती है। ये रणनीति खालिस्तानी तत्वों को प्रोत्साहित ही करेगी। अगर मुस्लिमों का तुष्टिकरण कभी काम नहीं आया तो जाट सिखों का तुष्टिकरण क्यों काम आएगा?

हिंदू-सिख संबंध

मुझे पता है कि ऐसी चिंताएँ हैं कि यह एक गलत मिसाल कायम कर सकता है। गलत मिसाल मसलन अन्य समूह भी अपनी माँगों को पूरा करने के लिए हिंसा और भीड़तंत्र वाली शक्ति का प्रदर्शन करना शुरू कर देंगे। दुर्भाग्य से हमारा देश हमेशा से ऐसा ही रहा है।
विभिन्न समूहों के लिए आरक्षण या किसी भी क्षेत्र की माँग हमेशा से व्यापक हिंसा के बाद लगभग पूरी हुई ही है। संविधान में किया गया पहला संशोधन ही एक तरह से हिंसा को वैध बना दिया। इसी के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘उचित प्रतिबंध’ लगाने की व्यवस्था की गई, क्योंकि कुछ लोग किसी अन्य की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के बाद पागल होकर बसों को जलाने निकल पड़ते थे। उसके बाद यह नियम तो नहीं बना लेकिन पैटर्न जरूर सेट हो गया।
मेरी चिंता इस बारे में नहीं है कि दूसरे समूह भी इसका अनुसरण करेंगे, वे पहले से ही कर चुके हैं। CAA को लेकर पहले दिन से ही हिंसा हो रही थी। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य जगहों पर हिंसक घटनाएँ हुईं और फिर 2020 के दिल्ली दंगे भी हुए। मैं कुछ ऐसा लिख जाऊँगा, जो प्रकाशित ही नहीं होगा लेकिन संक्षेप में कहूँ तो अगर कोई सरकार सोचती है कि कुछ लोगों पर गोलियाँ चलाई जा सकती हैं, तो चलती हैं (न केवल सरकारें, यहाँ तक कि पत्रकार भी सोचते हैं कि कुछ लोगों पर गोलियाँ चलाई जा सकती हैं)। जैसा होता आया है, मौजूदा सरकार सिखों के साथ वह जोखिम नहीं उठाना चाहती। और मेरी चिंता यही है – आगे क्या? हमने निश्चित रूप से रक्तपात होने के समय को कुछ देर के लिए टाल दिया है, लेकिन क्या हमने इस विकराल समस्या को हल करने की योजना भी बना ली है?
खालिस्तानी समस्या को हल करना मृत-समान है और पहले इसे हल करने की सोच से अब यह आगे जा चुका है… और हमारी आँखें खोलने के लिए हमें ‘किसान को धन्यवाद’ जरूर कहना चाहिए। फिर भी अगर कोई इसकी कोशिश कर रहा है तो निश्चित रूप से वो सिख वर्चस्ववादी मानसिकता के मुद्दे को हल करने की कोशिश कर रहा है, जो हिंदू-सिख संबंधों को लेकर विकृत दृष्टिकोण रखता है। मुझे नहीं पता कि इसके लिए सरकार या भाजपा की क्या योजना है, लेकिन मुझे आशा है कि वे राम स्वरूप की पुस्तक “हिंदू-सिख संबंध” पढ़ेंगे, जो संयोग से पार्टी की वेबसाइट पर उपलब्ध है।
यह पुस्तक पूरे इतिहास के उस हिस्से को विस्तार से बताती है कि कैसे सिख धर्म का एक प्रमुख हिस्सा हिंदू धर्म के एक संप्रदाय होने से दूर होता गया। इतना ही नहीं, हिंदू धर्म से दूर होते-होते यह ऐसा रूप ले लिया, जिसमें अब्राहमिक धर्म (एक खुदा, एक भगवान वाला) की छवि दिखने लगी। इतना ही नहीं, इस पुस्तक से आप जान पाएँगे कि कुछ सिखों, विशेषकर जाट सिखों के बीच यह वर्चस्ववादी मानसिकता क्यों मौजूद है।
यह पुस्तक उस समय प्रकाशित हुई थी, जब पंजाब में सिख उग्रवाद चरम पर था। संयोग से इसमें यह उल्लेख भी है कि कैसे कृषि मुद्दों ने तब पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी (और जैसा कि कहते हैं, इतिहास दोहराता है, अब हमारे सामने फिर से ‘कृषि कानून’ के माध्यम से वही एजेंडा बढ़ाया जा रहा है)। मैं इस पुस्तक के केवल तीन पैराग्राफ आपके सामने रख रहा हूँ, ये एक तरह से वर्तमान समस्या के साथ-साथ आने वाली चुनौती को भी दर्शाते हैं:
पिछले दो दशकों में, अलगाव करने वाला एक अन्य कारक भी चुपचाप काम कर रहा है। हरित क्रांति और कई अन्य कारकों की वजह से सिख अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध हो गए हैं। इसके बाद उन्होंने यह देखना-समझना शुरू कर दिया है कि हिंदुओं के साथ बंधन (मतलब हिंदू धर्म का ही संप्रदाय) उनके लिए पर्याप्त नहीं है। इसी सोच के साथ वे अपने नाम और प्रतीकों में आसानी से उपलब्ध नई पहचान की तलाश करने लगे। यह एक मानवीय कमजोरी है, अप्रत्याशित या अचंभित होने जैसा कुछ नहीं।
“आप हमारे रक्षक रहे हैं” – यह बात हिंदू सिखों को बताते रहे हैं। लेकिन वर्तमान समय में (या कह लें वर्तमान मनोविज्ञान काल में), प्रशंसा से केवल अवमानना मिलती है – और मेरा मानना गलत नहीं है। आत्म-निराशा किसी मित्र या भाई को खोने का पक्का तरीका है। यह हिंदुओं के साथ हुआ। दूसरी ओर सिखों को इससे अलग लेवल के आत्म-मूल्यांकन (अतिरेक वाला) का मौका मिला।
इस मनोविज्ञान के दबाव में – बनावटी शिकायते गढ़ी गईं; ऐसे चरमपंथी नारों को लाया गया, जिसके साथ नरमपंथी तबकों को भी चलना पड़ा। पिछले कुछ सालों में हत्या की राजनीति भी शुरू हो गई। कहीं कोई रोक नहीं, कहीं से कोई शिकंजा नहीं… अंततः इसे कहाँ रुकना है… नहीं पता था; यह अपने आप में एक कानून बन गया; यह हुक्म चलाने लगा, धमकाने लगा।                         -- राम स्वरूप की पुस्तक “हिंदू-सिख संबंध” से
और अब हम सब इसी समस्या के सामने खड़े हैं। इस खौफ पर कैसे काबू पाया जाए, यह अभी का सबसे बड़ा सवाल है। सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि हिंदू समुदाय को भी इस समस्या को समझने की जरूरत है। मुझे आशा है कि इसके लिए एक योजना तो है। और मुझे यह आशा भी है कि जिनके पास यह योजना है, उन्होंने राम स्वरूप को पढ़ा होगा। और हाँ, मेरे प्रिय पाठक, आप भी पढ़ सकते हैं।
(यह लेख OpIndia पर राहुल रौशन के अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है। )

ख़ुफ़िया एजेंसियाँ : राष्ट्रीय सुरक्षा की खातिर कृषि कानून वापस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर, 2021 को सुबह 9 बजे ऐलान किया कि केंद्र सरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस लेगी। उन्होंने कहा कि इन्हें किसानों के फायदे के लिए लाया गया था, लेकिन एक समूह को ये समझाने में हम सफल नहीं रहे। सत्ता के गलियारों में रहे लोगों के लिए ये निर्णय चकित करने वाला रहा, क्योंकि इतनी जल्दी इस तरह के फैसले की किसी को उम्मीद नहीं थी। पिछले एक वर्षों से तीनों कृषि कानूनों के विरोध में ‘किसान आंदोलन’ चल रहा है। ये कई बार हिंसक हुआ। 26 जनवरी, 2021 को लाल किला सहित दिल्ली के कई इलाकों में हुई हिंसा को कौन भूल सकता है।

कई लोगों को ऐसा लगता है कि मोदी सरकार हिंसा और भीड़तंत्र के सहारे सत्ता को अपनी हनक दिखाने वालों के समक्ष झुक गई है। कई महीनों से तीनों कृषि कानूनों के इर्दगिर्द प्रोपेगंडा का झाल बुना जा रहा था। 

इसी तरह 26 जनवरी को किसान प्रदर्शनकारियों की भीड़ ट्रैक्टर लेकर दिल्ली में घुस गई। लाल किला पर उन्होंने सिख झंडा गाड़ दिया और सार्वजनिक संपत्तियों को जम कर नुकसान पहुँचाया गया। लगभग 300 पुलिसकर्मी घायल हुए। करोड़ों रुपयों का नुक़सान हुआ। हालाँकि, उस समय सरकारी प्रतिक्रियाहीन रही। हालाँकि, कुछ किसान नेता हिंसा के आरोप में गिरफ्तार ज़रूर हुए लेकिन शायद ही दंगाई भीड़ के खिलाफ बल प्रयोग किया गया। राकेश टिकैत और योगेंद्र यादव जैसे इस पूरे आंदोलन के मास्टरमाइंड्स तो खुला घूमते रहे।

किसान आंदोलन तो 26 जनवरी को ही समाप्त हो जाता, अगर राकेश टिकैत ने देश के दुश्मनों के आगे घुटने नहीं टेके होते। लाल किला हादसे के बाद अलग हुए किसानों को राकेश और आंदोलन को समर्थन देने वाली पार्टियों से पूछे कि "किस कारण राकेश रोते हुए मीडिया के सामने आये थे? आंदोलन किसानों का था, उसमें खालिस्तानी क्यों आये थे? आंदोलन में दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों के जेलों में बंद आरोपितों को रिहा करने की मांग क्यों हुई थी? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मरने की दुआ मांगने वाली नारियां किसके इशारे पर यह कर रही थीं?" आदि अनेकों ज्वलंत प्रश्न हैं।  

एक वर्ष तक चले ‘किसान आंदोलन और इस दौरान हुई ‘हिंसा में कई आम नागरिकों को भी शिकार बनाया गया। आंदोलन स्थल व उसके आपसास के गाँवों से कई महिलाएँ गायब हैं। लखबीर सिंह की हत्या कर दी गई। एक बंगाली महिला का बलात्कार हुआ। मुकेश नाम के एक व्यक्ति को ज़िंदा जला दिया गया। ऐसी कई घटनाएँ हुईं। तीनों कृषि कानून वापस ले लिए जाने के बावजूद राकेश टिकैत ये कह रहे हैं कि आंदोलन तत्काल वापस नहीं लिया जाएगा।

मोदी समर्थक भी मान रहे हैं कि केंद्र सरकार सड़क पर उतर कर भीड़ और हिंसा के सहारे अपनी बात मनवाने की कोशिश करने वालों के सामने झुक गई है। एक ऐसी भीड़, जिसका हिस्सा खालिस्तानी अलगाववादी भी थे। कानूनों को संसद में बनाया जाता है और उन्हें वापस लिए जाने का फैसला भी संसद में ही होना चाहिए। जनता को सम्बोधन में कानून को वापस लेना और इसके लिए प्रदर्शन को वजह बताना ज़रूर सड़क पर हिंसा करने वाले इन आंदोलनकारियों को और मजबूत ही करता है।

इसके बाद अब जो भी कानून पास किए जाएँगे, उसके विरुद्ध हंगामा खड़ा किया जाएगा। जो देश में किसी न किसी बहाने अराजकता का माहौल बनाए रखना चाहते हैं, वो उस कानूनके विरुद्ध दुष्प्रचार करेंगे और सरकार पर हिंसक भीड़ के जरिए दबाव बनाएँगे। हिंसक भीड़ को उकसाएँगे और अपनी बात मनवाएँगे। इससे सरकार का मुखिया जनता की नजर में कमजोर दिखेगा। सत्ता के गलियारों में मौजूद लोगों की तरफ से भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। उनके लिए भी ये शॉकिंग ही है।

सत्ता के गलियारों में मौजूद लोगों और नीति निर्धारण करने वालों में से कइयों से संपर्क किया और इस निर्णय के पीछे की वजह जानने की कोशिश की। कई नेताओं ने इस मामले पर टिप्पणी करने से ही इनकार कर दिया। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री ने ऐलान किया है और साथ ही कारण भी गिनाए हैं, ऐसे में हमें उसी पर ध्यान देना चाहिए। हालाँकि, कुछ लोग ऑफ द रिकॉर्ड बोलने पर तैयार हुए, लेकिन ज्यादा डिटेल में नहीं गए। उनमें से एक नेता ने बताया कि देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये निर्णय लिया है।

उक्त नेता ने बताया, “जब इस बिल को पास किया था तब और अब की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है। अगर आपने ध्यान दिया होगा तो पीएम मोदी ने स्पष्ट कहा है कि किसानों के फायदे के लिए इन कृषि कानूनों को लाया गया था, लेकिन देश की सुरक्षा के लिए इसे वापस लिया जा रहा है। ये कदम पीछे खींचना ही कहा जाएगा और कोई इससे इनकार नहीं कर सकता। मैं ये समझ सकता हूँ कि सरकार को लोग किस नजर से देख रहे हैं। ऐसा नजर आ रहा है कि हम हिंसक देशद्रोहियों के समक्ष झुक गए हैं। लेकिन, इन कानूनों को लेकर फैलाया गया प्रोपेगंडा कुछ ज्यादा ही मजबूत था और इससे देश की सुरक्षा को खतरा था। केंद्र सरकार ने इन्हें वापस लेकर देश की आंतरिक सुरक्षा को चुना है। शांति को चुना है। दो खराब स्थितियों के बीच निर्णय लेना था – कानून वापस लेकर खालिस्तानी ताकतों को कमजोर करना, या फिर कानूनों को वापस लेकर कमजोर दिखना। सरकार ने कदम वापस लेना उचित समझा, ताकि अलगाववादी ताकतें इसके सहारे खुद को पुनर्जीवित न कर सकें।”

चर्चा को एक रोचक मोड़ देते हुए उक्त नेता ने बताया, “एक तरफ सीमा पर चीन खड़ा है, जो कई बार स्थितियों को गंभीर बना देता है। तालिबान ने अफगानिस्तान पर शासन शुरू कर दिया है। पाकिस्तान में जिहादी हावी हो रहे हैं। एक अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य है, जिसे हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। ढाई मोर्चों पर युद्ध की स्थिति से निपटने से अच्छा है कमजोर दिखना।” एक अन्य नेता ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुधारवादी नीतियों पर आगे बढ़ते रहेंगे। उन्होंने राष्ट्रहित के लिए पार्टी से ऊपर रखने का फैसला लिया है। उक्त नेता ने कहा कि ये एक अनिवार्य निर्णय था, भले ही वांछित नहीं हो।

जहाँ सत्ता के गलियारों में इसे शांति बनाए रखने और राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में लिया गया फैसला बताया, वहीं पंजाब से भी कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आईं। 27 मार्च को अबोहर के भाजपा विधायक अरुण नारंग पर हमला कर के उनके साथ मारपीट की गई थी। उनके कपड़े फाड़ डाले गए थे। मुक्तसर के मलौत में हुई इस घटना का वीडियोज सोशल मीडिया पर भी वायरल हुए थे। वहाँ मौजूद पुलिसकर्मियों और भाजपा कार्यकर्ताओं ने उन्हें किसी तरह बचाया।

अरुण नारंग ने इस निर्णय का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इस कानून से सिख और हिन्दू समाज के बीच एक विभाजन हो गया था, जो अब ख़त्म हो जाएगा। उनका कहना है कि इससे राष्ट्र की सुरक्षा पर भी अच्छा असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि एक कमिटी बना कर आगे का निर्णय लिया जाएगा और हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विश्वास करना चाहिए। क्या इस निर्णय से हिंसक और अलगाववादी ताकतों को बल मिलेगा? इस सवाल के जवाब में अरुण नारंग ने कहा कि भाजपा सरकार इतनी दंभी नहीं है कि लोगों की आवाज़ न सुने। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता ही सब कुछ है और लोगों की माँग पर सरकार को विचार-विमर्श करते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने साबित कर दिया है कि ये जनता की आवाज़ पर चलने वाली सरकार है और आम लोगों की आवाज़ सुनती है। उन्होंने अराजकता फैलाने में कॉन्ग्रेस का हाथ बताते हुए उसके लिए इस निर्णय को झटका बताया।

 हालाँकि, भाजपा के राज्य सेक्रेटरी सुखबीर सिंह शरण ने इन कानूनों को वापस लिए जाने पर दुःख जताया। उन्होंने कहा कि अगर वापस ही लेना था तो इन कानूनों को पास ही नहीं किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि जल्दबाजी में इसे लाया गया और जल्दबाजी में ही वापस भी लिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मजबूत प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले एक मजबूत लोकतंत्र में इस तरह की चीजें नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ये उन भाजपा कार्यकर्ताओं का अपमान है, जिन्होंने इन हिंसक तत्वों का दंश झेला।

इस सवाल पर कि क्या मोदी सरकार इन कृषि कानूनों को वापस लाएगी, सुखबीर शरण ने कहा कि इसे लेकर वो आशान्वित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं है कि किसानों के हित में आगे कोई कदम उठाए जाएँगे। उन्होंने पूछा कि अगर नरेंद्र मोदी नहीं करेंगे तो कौन करेगा, क्योंकि किसी और के पाद इच्छाशक्ति ही नहीं है। उन्होंने कहा कि हमें नरेंद्र मोदी से ज्यादा ईमानदार प्रधानमंत्री नहीं मिलेगा, क्योंकि अगर वो नहीं कर सकते हैं तो कोई नहीं कर सकता।

उन्होंने अपने पूरे बयान को प्रकाशित करने की सलाह देते हुए कहा कि वो पार्टी नहीं, बल्कि देश के लिए चिंतित हैं। उन्होंने इसे कैप्टेन अमरिंदर सिंह की जीत और भाजपा के पंजाब यूनिट की हार बताया। उन्होंने कहा, “मैं पार्टी से ज्यादा इस पार्टी के कार्यकर्ताओं को लेकर चिंतित हूँ। आज पंजाब में स्थिति ये है कि भाजपा नेताओं की बेटियों तक को बहिष्कृत किया जा रहा है। कोई भाजपा नेताइन/कार्यकर्ताओं बेटियों के साथ शादी नहीं करना चाहता। कानून को लाने या हटाने से पहले पीएम मोदी को पहले कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श करना चाहिए था। अगर पार्टी के कार्यकर्ता उसके साथ हैं तो कोई चिंता की बात नहीं होती है। लेकिन, आज पार्टी के नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ नहीं हैं।”

ख़ुफ़िया एजेंसियाँ: खालिस्तान का पुनर्जीवित होना और सिख युवकों को कट्टरवादी बनाने की साजिश

जहाँ पंजाब के नेताओं ने इस फैसले पर अलग-अलग बयान दिए, ख़ुफ़िया एजेंसियों से जुड़े लोगों का मानना है कि ये सर्वश्रेष्ठ तो नहीं लेनी ज़रूरी निर्णय हो गया था। इनपुट्स थे कि खालिस्तानी तत्व फिर से सक्रिय हो गए हैं, इसीलिए इससे बचने के लिए ऐसा किया गया।
ख़ुफ़िया एजेंसी से जुड़े रहे एक अधिकारी ने बताया कि खालिस्तानी और ISI मिल कर इस मुद्दे को हवा दे रहे थे, ताकि भारत में आतंरिक अराजकता फैलाई जा सके। स्थिति हाथ से बाहर निकलती जा रही थी, क्योंकि पंजाब में युवकों को कट्टरवादी बनाया जा रहा था और उनके मन में इन कानूनों को लेकर दुष्प्रचार कर के गलत सूचनाएँ भरी जा रही थीं।
उक्त अधिकारी ने बताया, “खालिस्तानी भिंडरवाला का पिता भी एक किसान थे। उनका नाम जोगिन्दर सिंह बरार था, जो एक स्थानीय सिख नेता थे। खालिस्तानी आंदोलन और खुद भिंडरवाला भी तब किसान आंदोलन के सहारे ही आगे बढ़ा था। इसी तरह की चीजों का इस्तेमाल कर के सिख युवकों को बहकाया जा रहा था। SFJ का पन्नू और ISI खालिस्तानी आंदोलन को पुनर्जीवित करने में लगा हुआ था। ये एक कठिन निर्णय था, लेकिन इसका लिया जाना ज़रूरी था। हम पहले से ही स्थानीय जिहादी तत्वों और स्लीपर सेल्स से जूझ रहे हैं। अब हमें भटके हुए सिख युवक और खालिस्तानी ताकतें नहीं चाहिए।
प्रमुख सिख कार्यकर्ता रमणिक सिंह मान ने कहा कि किसान नेताओं को भले ही ये अपनी जीत लग रही हो लेकिन ये देश के किसानों का नुकसान हैं। ये बदलाव किसानों के लिए दशकों बाद आए थे। उन्होंने कहा, “हमने 1991 के बाद देश में औद्योगिक क्रांति देखी। सारा आभार पीवी नरसिम्हा राव को। हम कृषि सुधारों में 30 साल की देरी कर रहे हैं। हमारे पास उसे सुधारने का अच्छा मौका था। मेरा कहना है कि आखिर हमें, किसानों के तौर पर इससे क्या मिला? पूरा आंदोलन, दिल्ली की सीमाओं पर चलता ड्रामा, किसानों को इससे क्या मिला?
मान ने कहा कि कृषि कानून वापिस होने पर उनकी मिश्रित भावनाएँ हैं। एक ओर जहाँ उन्हें लग रहा है कि किसान हार गए हैं। उनका मानना है कि कई राष्ट्र विरोधी ताकतों ने उस प्रदर्शन में घुसपैठ की थी जो कि किसान आंदोलन था। इन्हें कम करने की जरूरत थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस मुद्दे को उठाया था और प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से मुलाकात की थी। इसके बाद NSA खुद वापस जाकर गृहमंत्री से मिले थे। बाद में बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाया गया। ये सारी चींजे उस दिशा की ओर इशारा कर रही थीं जहाँ इन किसान आंदलोनों में घुसपैठ करने वाले लोगों का मुख्य एजेंडा देश को अस्थिर करने का था। पन्नू और धालीवाल जैसे लोगों ने खालिस्तान और भारत को खंडित करने पर (BALkanisation) बात करना शुरू कर दिया था। ये सब लोगों को न केवल पीएम के विरुद्ध भड़का रहे थे बल्कि भारत को लेकर भी यही कर रहे थे। राकेश टिकैत ने कहा- ‘बिल वापिसी नहीं तो घर वापिसी नहीं।’ अब जब कानून वापिस हो गए हैं तो उन्हें घर जाना चाहिए।
मान ने आगे कहा कि हालाँकि उन्हें लगता है कि प्रदर्शनकारियों को अब लौटना चाहिए, लेकिन उन्हें ये भी लगता है कि टिकैत जरूर आंदोलन जारी रखने के लिए आगे कोई न कोई रास्ता खोजेगा। वह कहते हैं 7 दिसंबर वह तारीख है जब सुप्रीम कोर्ट इन किसानों द्वारा सीमाओं पर किए गए कब्जे मामले की सुनवाई करेगा। यह लगभग उसी समय होगी जब पंजाब में आदर्श आचार संहिता भी लागू होनी है। यह देखना बिलकुल दिलचस्प नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है। यही सुप्रीम कोर्ट है जिन्होंने किसान संगठनों की तरफदारी करते हुए उन्हें बॉर्डर पर बैठने की और दिल्ली को कब्जा लेने की इजाजत दी थी। अब देखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट क्या बोलेगा। मगर अब भी यदि किसानों ने अपना आंदोलन जारी रखा, वह लोग अपनी विश्वसनीयता खो देंगे।
जब उनसे पूछा गया कि उन्हें लगता है कि यह कदम सड़कों पर एकत्रित हुए लोगों (स्ट्रीट पॉवर) के सामने आत्मसमर्पण है तो मान ने कहा कि उनके मन में इस बात को लेकर संदेह नहीं था कि यह कदम वापस लिया ही जाएगा। वह बोले, “पीएम मोदी ने अपने संबोधन में उन कार्यों पर बात की जिसे उन्होंने कृषि सेक्टर के लिए अपने कार्यकाल में किया। उन्होंने कानूनों का एक नया सेट तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों, किसानों आदि के साथ एक समिति के गठन के बारे में भी स्पष्ट रूप से बात की। उन्होंने देश से माफी माँगी है कि वह इन कानूनों के फायदों के बारे में किसानों के एक निश्चित वर्ग को समझाने में सक्षम नहीं हो पाए। उन्होंने यह नहीं कहा कि कृषि कानूनों में कुछ भी गलत है। लेकिन मुझे लगता है कि सुधार जारी रहेगा जिसकी बहुत आवश्यकता है।”
कुल मिलाकर, कानूनों को निरस्त किए जाने पर एक निराशा जैसी है। लेकिन बोर्ड भर में प्रतिक्रिया मिश्रित है। जहाँ लोग ये जान रहे हैं कि आखिर कानून वापस क्यों लिए गए। वहीं ये भी पता चल रहा है कि ये सर्वश्रेष्ठ निर्णय नहीं था जो लिया गया। हालाँकि ये आवश्यक था। इस तथ्य की भी स्वीकृति है कि इसे हिंसक ताकतों के लिए एक कदम के रूप में देखा जा सकता है जो सरकार को घेरना चाहते थे। यह खालिस्तान और आईएसआई के सामने देश की आंतरिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक कदम था जो इस किसान आंदोलन और कृषि कानून पर फैलाए प्रोपगेंडा का प्रयोग करके खालिस्तानी मूवमेंट को पुनर्जीवित करना चाहते थे।
पिछले कई दशकों से कृषि क्षेत्र में किसानों के लिए अपने कृषि उत्पादों के लिए अच्छा बाजार और उचित मूल्य पाना सबसे बड़ी चुनौती रही है। इस समस्या के समाधान के लिए विभिन्न राज्य सरकारों ने समस्य-समय पर अपने राज्य में एग्रीकल्चरल प्रोडूस मार्केट रेगुलेशन एक्ट पास किया जिसने इन राज्य सरकारों को अपने राज्य में कृषि उत्पादों की थोक बिक्री के लिए नियम और कानून बनाने का अधिकार मिला। इन थोक मंडियों की स्थापना के पीछे यह सोच थी कि किसानों को उनके उत्पादों का समुचित मूल्य मिले परन्तु गुजरते समय के साथ ये थोक मंडियां भ्रष्टाचार और अयोग्यता की शिकार हो गईं। ऊपर से इन मंडियों का स्वरुप ऐसा था कि समय के साथ इनमें समूहों और दलालों का प्रभाव लगातार बढ़ता गया और ये मंडियां जिन उद्देश्य के लिए बनी थीं उससे भटकती रहीं जिसका परिणाम मंडियों में घोर अक्षमता और भ्रष्टाचार के रूप में सामने आया।
इस समय से निपटने के लिए मोदी सरकार ने कृषि उत्पादों के विपणन को सरल बनाने के लिए और किसानों को उनके उत्पादों का समुचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से संसद में तीन कानून प्रस्तुत किये। सरकार का उद्देश्य था कि ए पी एम सी एक्ट के तहत पहले से स्थापित थोक मंडियों के अलावा कृषि उत्पादों के विपणन के लिए एक ऐसा मूल ढांचा बनाया जाए जो किसानों के लिए न केवल उनके उत्पादों की बिक्री का उचित मूल्य दिलाये बल्कि इस उद्देश्य के लिए कृषि उत्पादों के व्यापार में एक तरह की नई प्रतिस्पर्धा विकसित कर सके। ये तीन कानून थे; द फार्मिंग प्रोडूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) बिल, 2020: कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम -2020
इस कानून का उद्देश्य राज्य द्वारा स्थापित और परिचालित एपीएमसी की थोक मंडियों के अलावा एक ऐसा बाजार बनाने का था जिसमें किसानों को उनके उत्पादों का न केवल उचित मूल्य मिले बल्कि उत्पादों के व्यापार में एक प्रतिस्पर्धा हो और साथ ही किसानों को अपने उत्पादों की बिक्री के लिए एक अतिरिक्त विकल्प भी मिले।
द फार्मर (एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस अश्योरेंस एंड फार्म सर्विस बिल, 2020: कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020
इस कानून के पीछे सरकार का उद्देश्य एक ऐसा ढांचा खड़ा करने का था जिसके तहत किसानों और उनके उत्पादों के खरीदार के बीच कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग सम्बंधित समझौते की शर्तें और उनका समुचित क्रियान्वन होता। द एसेंशियल कमोडिटीज (अमेंडमेंट) बिल, 2020 : आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम 2020. इस कानून के पीछे का उद्देश्य कुछ निश्चित कृषि उत्पादों की आपूर्ति और विशेष समय और परिस्थितियों में उनके व्यापार संबंधी नियंत्रण को तय करना था। ज्ञात को कि सरकार द्वारा लाये और संसद में पास किये गए ये तीन कृषि कानून थे जिनका उद्देश्य किसानों के कृषि उत्पादों के लिए पहले से चल रहे एपीएमसी मंडियों के अलावा एक बाजार स्थापित कर किसानों को विकल्प देने का था और साथ ही अपने उत्पादों के संभावित खरीदारों के साथ सीधे तौर पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग सम्बंधित समझौते करना था। इन कृषि कानूनों का उद्देश्य किसी भी तरह से पहले से चल रही थोक मंडियों को हटाना नहीं था। सरकार किसानों को केवल यह विकल्प देना चाहती थी कि यदि किसान किन्हीं कारणों से चाहें तो अपने उत्पाद पहले से स्थापित और चलाई जा रही थोक मंडियों के बाहर भी बेंच सकें।