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दिल्ली : मथुरा-काशी के लिए चाहिए 400 पार सीटें: हिमंता बिस्वा सरमा, असम के मुख्यमंत्री, कहा- बनेंगे भव्य मंदिर, PoK में भी दिखने लगा है तिरंगा; जिसका लाभ हिन्दुओं से अधिक मुसलमानों के पक्ष में होगा


असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बड़ा दावा किया है। हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि लोकसभा में एनडीए के 400 पार सीटों के लक्ष्य को प्राप्त करने का मतलब है कि अयोध्या के बाद अब काशी और मथुरा में भव्य मंदिरों का निर्माण किया जाएगा। हिमंता बिस्वा सरमा पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट पर बीजेपी प्रत्याशी हर्ष मल्होत्रा के लिए लक्ष्मी नगर में चुनावी रैली को संबोधित कर रहे थे, जब उन्होंने ये बातें कही।

मोदी के 400+ सीटें मांगने की मंशा विपक्ष अच्छी तरह समझ चुका है कि 400 सीटों का क्या महत्व होता है। 400 सीटें या उसके आसपास होने से अधिकतर विपक्षियों की दुकानें और देश-विरोधियों की दुकानें बंद होने के कगार होंगी। हिन्दुओं से ज्यादा यह मुसलमानों के पक्ष में होंगी। अब तक जितनी भी योजनाएं शुरू हुई समस्त भारतवासियों के हुई है, केवल एक धर्म के लिए नहीं। मुसलमानों को मालूम होगा कि इन नेताओं ने हमें केवल वोटबैंक तक ही सीमित रखा, कभी मुख्य धारा से नहीं जुड़ने दिया। भारतीय जनसंघ से लेकर बीजेपी तक मुसलमानों को इसका डर दिखाया गया।  

हिमंता बिस्वा सरमा ने आगे कहा कि लोकसभा चुनाव में जब भाजपा 400 के पार जाएगी तो मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनेगा और काशी में ज्ञानवापी मस्जिद की जगह पर बाबा विश्‍वनाथ का भव्य मंदिर बनेगा। उन्होंने कहा कि मुगलों ने जो-जो कारनामे किए थे, उसमें से अभी बहुत कुछ साफ करना बाकी है। असम के मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा ने अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने का अपना वादा पूरा कर दिया है, इसलिए इस बार जीत भी बड़ी होनी चाहिए।

इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि PoK में भी भारत का झंडा दिख रहा है, जबकि कांग्रेस के शासन में अपने जम्मू-कश्मीर में भी पाकिस्तानी झंडा दिखता था। हिमंता ने कहा कि संसद में पहले कश्मीर की चर्चा नहीं होती थी, लेकिन अब PoK में भी लोग भारत का झंडा थामे दिख रहे हैं।

दिल्ली के विकास को लेकर आम आदमी पार्टी को घेरा

हिमंता बिस्वा सरमा ने दिल्ली में विकास को लेकर आम आदमी पार्टी को घेरा। हिमंता ने कहा, “पहले दिल्ली आने पर लालकिला और कुतुबमीनार देखने के लिए बोला जाता था और अब मोहल्ला क्लीनिक देखने के लिए कहा जाता है, लेकिन आज जब मोहल्ला क्लीनिक देखने गया तो आश्चर्य हुआ कि अगर दिल्ली की पहचान मोहल्ला क्लीनिक है तो फिर देश का सम्मान कहाँ है? असम में हर जिले में मेडिकल कॉलेज बन रहा है और दिल्ली में जब भाजपा की सरकार आएगी तो मोहल्ला क्लीनिक की बजाय यहां सुपर स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल और मेडिकल कॉलेज बनाएँगे।

कांग्रेस की गोद में बैठ गए केजरीवाल

लक्ष्मी नगर में जनसभा के बाद हिमंता ने मीडिया से भी बातचीत की। उन्होंने कहा, “कभी कांग्रेस के साथ हाथ नहीं मिलाने की बात कहने वाले केजरीवाल अब कांग्रेस की गोद मे जाकर बैठ गए हैं और कांग्रेस के साथ इलू-इलू कर रहे हैं।” केजरीवाल पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि परिवारवाद का विरोध करने वाले अरविंद केजरीवाल अब अपनी पत्‍नी को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। केजरीवाल खुद आलीशान बँगले में रहते हैं। उन्होंने कहा कि केजरीवाल जो भी बोलते हैं, ठीक उसके उल्टा करते हैं और अब वह मानसिक संतुलन खो चुके हैं और जब तक वह ठीक होंगे तब तक दोबारा जेल जाने का समय हो जाएगा।

स्वाति मालीवाल को क्यों पीटा गया? उपराष्ट्रपति से कार्रवाई की माँग

इस दौरान हिमंता बिस्वा सरमा ने राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल के साथ हुई मार-पीट के लिए केजरीवाल को घेरा। उन्होंने कहा कि राज्यसभा के सभापति एवं उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जी को स्वतः संज्ञान लेकर दिल्ली के सीएम के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सुनीता केजरीवाल को भी यह बताना चाहिए कि स्वाति मालीवाल की पिटाई क्यों की गई? 
जब मुख्यमंत्री आवास में महिला सुरक्षित नहीं, फिर कहाँ होगी?
माना अपने वकील को राज्य सभा भेजने के लिए इस्तीफा चाहिए था, इसका ये मतलब नहीं कि घसीट-घसीट कर मारोगे या मरवाओगे। वो भी उस महिला को जो तुम्हारी एक आवाज़ पर कुछ भी किसी भी हद तक जाने को तैयार रहती थी। जिस पीठ ने जमानत दी उसे केजरीवाल के criminal background को भी देखना था। दिल्ली के लोगों ने ऐसे आदमी को अपना मुख्यमंत्री चुना जिसने गणतंत्र के अवसर पर सेना भवन के पास धरने पर बैठ गणतंत्र दिवस में बाधा पहुँचाने का दुस्साहस किया था। बीजेपी को आम आदमी पार्टी में हुए सारे कांडों जैसे कोली हत्याकांड को जनता के सामने लाना चाहिए।  

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5 साल का कॉन्ट्रैक्ट, 4 फसलों पर MSP की गारंटी, बिना किसी लिमिट के खरीद: मोदी सरकार ने पेश किया फॉर्मूला, तथाकथित किसानों ने माँगा समय

                                         तथाकथित किसानों के सामने सरकार ने रखा प्रस्ताव (तस्वीर साभार: ANI)
केंद्र सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर प्रस्ताव लाने के बाद किसान प्रदर्शनकारी थोड़े शांत हुए हैं। उन्होंने सरकार से चौथे दौर की बातचीत के बाद अपना प्रदर्शन कुछ समय रोकने का ऐलान किया। ये प्रस्ताव सरकार रविवार (18 फरवरी 2024) को लेकर आई।
आखिर ये तथाकथित किसान देश को किस दिशा की ओर मोड़ रहे हैं? विदेशी भारत विरोधियों की कठपुतली बने लोग देश हितैषी हो ही नहीं सकते? जिस काम का वायदा पंजाब विधान सभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने किया था, उसे केंद्र पर क्यों थोपा जा रहा है? क्या केंद्र सरकार पंजाब में आम आदमी पार्टी के मकड़जाल में फंस गयी है? जो किसान खालिस्तान की मांग करे वो किसान नहीं हो सकता? अगर सरकार इन उपद्रवी किसानों के आगे झुकती है तो किसानों से इनकी आय पर टैक्स वसूला जाये। दोनों हाथों में लड्डू आखिर कब तक? पूछा जाये जो ऋण लिया था, वह कहाँ खर्च हुआ और तुम्हारे पास ये बंगले और आलीशान कारें कहाँ से आयीं? 

इसमें कहा गया कि एमएसपी पर फसल खरीदने के लिए 5 साल का कॉन्ट्रैक्ट किया जाएगा। ये कॉन्ट्रैक्ट एनसीसीएफ, NAFED और CCI जैसी सहकारी समितियों के साथ होगा। इसमें खरीद की लिमिट नहीं होगी। जिन उपजों को लेकर यह प्रस्ताव दिया दया है उनमें उड़द दाल, मसूर दाल और मक्का-कपास आदि शामिल हैं।

 

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने बातचीत को बताया सकारात्मक

केंद्र सरकार और किसानों के बीच रविवार को बातचीत हुई थी। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने इस बैठक को सकारात्मक बताया। उन्होंने कहा कि नए विचारों और सुझावों के साथ हमने भारतीय किसान मजदूर संघ और अन्य किसान नेताओं के साथ सकारात्मक चर्चा की। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने किसानों के सामने फसलों के विविधीकरण का प्रस्ताव रखा जिसके तहत अलग-अलग फसलें उगाने पर बिन किसी लिमिट के उन्हें एमएसपी पर खरीदा जाएगा।
वह बोले– “नेशनल कोऑपरेटिव कंज़्यूमर्स फ़ेडरेशन (एनसीसीएफ़) और नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फे़डरेशन ऑफ़ इंडिया (नेफ़ेड) जैसी कोऑपरेटिव सोसाइटियाँ उन किसानों के साथ समझौता करेंगी, जो तूर, उड़द, मसूर दाल या मक्का उगाएँगे और फिर उनसे अगले पाँच साल तक एमएसपी पर फसलें खरीदी जाएँगी। वहीं कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया के माध्यम से किसानों से 5 साल तक एमएसपी पर कपास की खरीद की जाएगी। इन खरीद की कोई सीमा नहीं होगी और इन सबके लिए एक पोर्टल तैयार किया जाएगा।”
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार के इस प्रस्वताव से भूमिगत जलस्तर में सुधार होगा और पहले से खराब हो रही जमीन को बंजर होने से रोका जा सकेगा।

किसान नेताओं ने बैठक के बाद लिया सोचने का फैसला

इस बैठक में किसानों के 14 प्रतिनिधि और केंद्र सरकार के किसान कल्याण मंत्री अर्जुन मुंडा, वाणिज्य मंत्री पियूष गोयल और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय शामिल हुए थे। इनके अलावा इस बैठक पंजाब के मुख्य मंत्री भगवंत मान भी मौजूद थे। किसान नेताओं ने सरकार के इस प्रस्वात के ऊपर कहा कि वह इस प्रस्ताव पर विचार करेंगे। उनका यह भी कहना है कि अभी सिर्फ एमएसपी के मुद्दे पर चर्चा हुई है। बाकी माँगे नहीं मानी गई हई हैं।
किसान नेताओं का कहना है कि वो अपने मंचों पर सरकार के प्रस्ताव पर अगले दो दिन तक चर्चा करेंगे और उसके बाद भविष्य की रणनीति तय होगी। किसान नेता सरवन सिंह पंढेर ने कहा, “हम 19-20 फ़रवरी तक इस मामले पर अलग-अलग मंचों पर चर्चा करेंगे और विशेषज्ञों की राय लेंगे। उसके बाद ही इस मामले पर कोई फैसला लिया जाएगा।” किसानों का कहना है कि अगर इन दो दिनों में प्रस्ताव पर सहमति नहीं बनी तो 21 फरवरी दिल्ली कूच करेंगे।

पंजाब सीएम भी थे बैठक में शामिल

इस बैठक में पंजाब सीएम भगवंत सिंह मान ने भी किसानों के हितों की रक्षा के लिए फसलों के लिए एमएसपी को कानूनी रूप देने की वकालत की। उन्होंने बैठक के दौरान मोजाम्बिक और कोलंबिया से दालों के आयात का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा यह आयात 2 अरब डॉलर से अधिक है, मान ने कहा कि अगर इस फसल के लिए एमएसपी दिया जाता है तो पंजाब दालों के उत्पादन में देश का नेतृत्व कर सकता है और यह दूसरी हरित क्रांति होगी।
किसानों के इस आंदोलन में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करवाने की माँग, किसानों को पेंशन सुनिश्चित करने की माँग और उनकी कर्जमाफी और पिछले किसान आंदोलन के समय जो हिंसा में केस किसानों पर दर्ज हुए थे उन सबको रद्द करने की माँग थी। किसान नेताओं का कहना है कि सरकार अभी सिर्फ एमएसपी पर ही प्रस्ताव लाई है। वो विचार करके बताएँगे अब आगे क्या होगा।


जी-20 सम्मेलन : मोदी सरकार की बड़ी कूटनीतिक जीत, ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ को मिली स्वीकृति से राजनीतिक गिद्दों और मोदी विरोधियों को लगा बड़ा झटका

भारत की राजधानी नई दिल्ली में दो दिवसीय जी-20 शिखर सम्मेलन का आगाज हो चुका है। शिखर सम्मेलन के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारत को उस समय बड़ी कूटनीतिक जीत मिली, जब भारत अफ्रीकी यूनियन को इसका सदस्य बनाने में सफल रहा और जी-20 के सदस्य देशों ने ‘नई दिल्ली लीडर्स समिट डिक्लेरेशन’ को आम सहमति से स्वीकृति दी। भारत मंडपम में चल रहे सम्मेलन के दूसरे सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोद ने कहा कि अभी-अभी अच्छी खबर मिली है कि हमारी टीम की कड़ी मेहनत और आपके सहयोग के कारण ‘नई दिल्ली जी-20 समिट डिक्लेरेशन’ पर आम सहमति बन गई है। प्रधानमंत्री मोदी की इस घोषणा के बाद सम्मेलन कक्ष और पूरे देश में खूशी की लहर दौड़ गई। यह स्वीकृति भारत के वैश्विक दबदबे का प्रमाण है। प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम ने फिर साबित कर दिया कि भारत आज वैश्विक भू-राजनीति में अहम भूमिका निभाने की पूरी योग्यता और क्षमता रखता है।

राजनीतिक गिद्द शशि थरूर की भविष्यवाणी हुई गलत

इस घोषणा से प्रधानमंत्री मोदी के विरोधियों, भारत विरोधी ताकतों के साथ ही उन राजनीतिक गिद्दों पर वज्रपात हुआ है, जो इस सम्मेलन की असफलता की कामना कर रहे थे। राजनीतिक गिद्दों को लग रहा था कि प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम जी-20 के सदस्य देशों के बीच आम सहमति बनाने में असफल होंगे। यह सम्मेलन अपेक्षित परिणाम देने में नाकाम होगा। उन्हें प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम की योग्यता पर भरोसा नहीं था। लेकिन नई दिल्ली घोषणापत्र की स्वीकृति ने फिर साबित कर दिया है कि “गिद्दों के श्राप देने से गायें नहीं मरा करती हैं।” हाल ही में CNBCTV18News से बात करते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने आशंका जताई थी कि जी-20 का यह शिखर सम्मेलन घोषणा पत्र की मंजूरी के बिना ही संपन्न हो जाएगा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का विशेषज्ञ माने जाने वाले शशि थरूर की आशंका गलत साबित हो चुकी है। इससे उनकी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की समझ पर भी सवाल उठ रहे हैं।

धरे रह गए सिद्धार्थ वरदराजन के सारे आकलन 

इसी तरह वामपंथी मीडिया पोर्टल ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने भी नई दिल्ली घोषणापत्र पर आम सहमति नहीं बनने की भविष्यवाणी की थी। उन्होंने कहा था कि इस सप्ताह के अंत में नई दिल्ली में होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन के लिए आम सहमति से घोषणापत्र तैयार करने में बाधाएं आ रही हैं। उन्होंने तंज किया कि जी-20 शेरपा, जो सोमवार से बुधवार तक हरियाणा के नूंह में मिले, आम सहमति तक पहुंचने में विफल रहे। वरदराजन ने ‘द वायर’ में ‘No Delhi Declaration? West Rejects India’s Compromise Text at G20 Sherpas Meeting’ शीर्षक से लिखे एक आर्टिकल को सोशल मीडिया एक्स में शेयर किया। उन्होंने लिखा कि पश्चिमी देशों ने शेरपा की बैठक में भारत की सहमति के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। इससे नई दिल्ली घोषणा पत्र पर सवाल खड़े हो गए हैं।

घोषणापत्र को लेकर ‘द वायर’ के दुष्प्रचार को झटका

‘द वायर’ ने सोशल मीडिया एक्स में एक पोस्ट किया था, जिसमें घोषणापत्र को लेकर सहमति नहीं बनने की बात कही गई थी। यहां तक उसे मोदी सरकार की छवि से भी जोड़ने की कोशिश की गई थी। पोस्ट में लिखा गया था कि दिल्ली घोषणापत्र जारी करने में विफलता वैश्विक स्तर पर भारत और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि पर खराब असर डालेगी, जिन्होंने जी-20 की नियमित रोटेशनल अध्यक्षता को एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रदर्शित करने की कोशिश की है। अब ‘नई दिल्ली लीडर्स समिट डिक्लेरेशन’ को स्वीकृति मिलने से ‘द वायर’ के दुष्प्रचार को जबरदस्त झटका लगा है। अगर घोषणापत्र स्वीकृत नहीं होता तो यह वामपंथी न्यूज पोर्टल प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को कोसने और बदनाम करने के लिए पूरा जोर लगा देता। इसके तमाम सरपरस्त भी इसके अभियान को आगे बढ़ाने में सक्रिय हो जाते। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम ने इनके मंसूबों पर पानी फेर दिया है।

मोदी सरकार ने ध्वस्त किया मीडिया के सारे अनुमान

प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा अभियान चलाने वालों में ‘द प्रिंट’ भी शामिल है। भारत में जी-20 सम्मेलन के एक दिन पहले (08 सितंबर, 2023) को ‘द प्रिंट’ ने ‘Xi-Putin absent, shadow of Russia-Ukraine on consensus: Geopolitical tensions set stage for G20 Delhi’ शीर्षक से एक खबर प्रकाशित की, जिसमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी-जिनपिंग के सम्मेलन में शामिल नहीं होने और उसके असर के बारे में लिखा गया था। अपने आर्टिकल में ‘द प्रिंट’ ने बताया कि रूस और चीन के राष्ट्रपतियों की अनुपस्थिति और यूक्रेन युद्ध को लेकर मतभेद का बड़ा असर पूरे सम्मेलन पर देखने को मिलेगा। जी-20 का यह समूह अपने मूल उद्देश्य को परिभाषित करने के लिए संघर्ष कर रहा है। भारत जी-20 को अधिक समावेशी निकाय बनाने और एक संयुक्त घोषणापत्र तैयार करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। ऐसे में गहराते भू-राजनीतिक मतभेदों की वजह से आम सहमति बनाना काफी मुश्किल होगा। इसी तरह बिजनेस स्टैंडर्ड जैसे समाचार पत्रों ने भी आशंकाएं व्यक्त की थीं। लेकिन मोदी सरकार सारी आशंकाओं और प्रोपेगेंडा को ध्वस्त करते हुए ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ को स्वीकार कराने में सफल रही है।

G20 देशों को राष्ट्रपति के निमंत्रण में ‘भारत’ : क्या संसद के विशेष सत्र में INDIA हटाने जा रही है मोदी सरकार


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 18 सितंबर से लेकर 22 सितंबर तक संसद का विशेष सत्र बुलाया है। इस सत्र में कोई क्वेश्चन ऑवर नहीं होगा, साथ ही प्राइवेट मेंबर बिल भी नहीं लाया जा सकेगा। साफ़ है, संसद के इस विशेष सत्र का विशेष उद्देश्य भी है, क्योंकि हाल ही में मॉनसून सत्र का समापन हुआ है। चूँकि मोदी सरकार ने बताया नहीं है कि इसका उद्देश्य क्या है, इसीलिए मीडिया में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, विपक्षी दल भी इसमें कूद पड़े हैं और बहस का एक नया दौर शुरू हो गया है।

पहले चर्चा चली कि मोदी सरकार ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ बिल लेकर आ रही है, जिसके तहत देश भर में एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव होंगे। हालाँकि, इसके लिए हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में 8 सदस्यीय कमिटी बनाई गई है, ऐसे में कमिटी को रिपोर्ट तैयार करने में लंबा समय लग सकता है। अब चर्चा है कि देश का नाम ‘India’ हटा कर सिर्फ ‘भारत’ रखे जाने की योजना है। पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने इन अटकलों को और बल दिया है और कहा है कि ये सच हो सकता है।

कांग्रेस के जयराम रमेश ने कहा – G20 के आमंत्रण में ‘India’ की जगह ‘भारत’

उन्होंने एक ट्वीट कर लिखा, “तो ये खबर वस्तुतः सच है। 9 सितंबर को G20 के डिनर के लिए राष्ट्रपति भवन की तरफ से जो आमंत्रण भेजे गए हैं, उसमें हमेशा की तरह ‘प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया’ नहीं, बल्कि इसकी जगह ‘प्रेजिडेंट ऑफ भारत’ लिखा हुआ है। अब संविधान के अनुच्छेद 1 को बदल कर ऐसे किया जा सकता है – ‘भारत, जो इंडिया था, राज्यों का एक संघ है।’ लेकिन, अब तो राज्यों के इस संघ पर भी प्रहार हो रहा है। नरेंद्र मोदी इंडिया, जो भारत है, राज्यों का संघ है, उसके इतिहास को तोड़-मरोड़ सकते हैं और इसे विभाजित कर सकते हैं। लेकिन, हम पीछे नहीं हटेंगे।”
                       राष्ट्रपति भवन द्वारा भेजे गए आमंत्रण पत्र में ‘India’ नहीं, ‘भारत’
जयराम रमेश ने ये भी बताया कि I.N.D.I.A. गठबंधन का औचित्य क्या है? उन्होंने कहा कि ये भारत है – समरसता, मेलजोल, समन्वय और विश्वास लेकर आना। उन्होंने BHARAT का फुल फॉर्म बताया – Bring Harmony, Amity, Reconciliation And Trust. साथ ही उन्होंने ‘जुड़ेगा भारत, जीतेगा इंडिया’ नामक टैगलाइन भी लगाया। यानी, विपक्षी दल भी इस अटकल को हवा दे रहे हैं कि ताज़ा संसद सत्र में देश का नाम सिर्फ ‘भारत’ रखा जाएगा और ‘India’ हटा दिया जाएगा जो अंग्रेजों ने रखा था।

क्या नए संसद सत्र के बाद देश का नाम नहीं रहेगा ‘India’?

कुछ भाजपा नेताओं के भी बयान देखें तो इशारों-इशारों में इसी तरह की बातें की गई हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का ताज़ा ट्वीट देखिए। उन्होंने लिखा है, ‘भारत का गणतंत्र: मैं खुश और गर्वित हूँ कि हमारी सभ्यता अमृत काल की तरफ बढ़ रही है।’ इससे पहले भी जब विपक्ष ने अपने गठबंधन का नाम I.N.D.I.A. रखा था तब सीएम सरमा ने खुद को भारत का निवासी बताया था और अपने ट्विटर बायो में से ‘India’ हटा दिया था। सोशल मीडिया पर भी लोग उत्साहित होकर देश का नाम केवल ‘भारत’ रखे जाने का स्वागत कर रहे हैं।
अब कुछ दिन पहले की बात करते हैं। 28 जुलाई, 2023 को ये मामला संसद में वैसे भी गूँज चुका है। भाजपा के राज्यसभा सांसद नरेश बंसल ने माँग की थी। उन्होंने कहा था कि अभी जब आज़ादी का अमृत काल चल रहा है, संविधान के अनुच्छेद-1 को संशोधित कर के इस पुण्य पावन धरा का नाम केवल ‘भारत’ रखा जाना चाहिए। कि देश का नाम सिर्फ ‘भारत’ रखा जाए और ‘इंडिया’ को हटा दिया जाए। उन्होंने याद दिलाया था कि विगत स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद कहा था कि देश को दासता के चिह्नों से मुक्ति दिलाए जाने की आवश्यकता है।

ऐसे में इन अटकलों को बल मिलना लाजिमी है कि क्या देश का नाम अब सिर्फ ‘भारत’ रहेगा, ‘India’ नहीं। प्राचीन काल से हमारे देश का नाम भारत ही रहा है। हाल ही में RSS प्रमुख भागवत ने भी कहा था कि हमें अपने देश का नाम ‘India’ की जगह ‘भारत’ ही कहना चाहिए, इससे बदलाव आएगा। ट्विटर पर लगातार लोग इसकी चर्चा कर रहे हैं कि ऐसा होता है तो ये सही है या गलत। हालाँकि, इसके लिए हमें संसद के विशेष सत्र तक इंतजार करना होगा।

संसद के विशेष सत्र में ‘एक देश, एक चुनाव’ पर आएगा बिल; मोदी सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनाई कमेटी

केंद्र सरकार ने 18 से 22 सितंबर 2023 के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया है। इस सत्र को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। इनमें से एक यह भी है कि मोदी सरकार ‘एक देश, एक चुनाव’ (One Nation, One Election) का बिल ला सकती है। अब खबर आ रही है कि इसको लेकर सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई है। 

‘एक देश, एक चुनाव’ को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अब सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली एक कमिटी का गठन किया है। कहा जा रहा है कि इस कमिटी को लेकर सरकार शुक्रवार (1 सितंबर, 2023) को नोटिफिकेशन जारी कर सकती है। इस नोटिफिकेशन में कमिटी के सदस्यों के नाम, कार्यकाल समेत अन्य जानकारियाँ होंगी।

यह कमिटी ‘एक देश, एक चुनाव’ लागू करने से जुड़े सभी कानूनी पहलुओं पर गौर करेगी। साथ ही इसको लेकर देश की जनता से भी राय लेने की बात सामने आ रही है। इस कमिटी के बनने के बाद इस बात को लेकर चर्चा तेज गई है कि मोदी सरकार संसद के विशेष सत्र में ‘एक देश, एक चुनाव’ पर बिल ला सकती है।

हालाँकि विपक्ष इसका विरोध कर रहा है। विपक्ष कहना है कि सरकार ने इसको लेकर उनसे बात नहीं की। इसके अलावा इसकी संवैधानिकता पर भी सवाल उठाया जा रहा है। वहीं मीडिया में कमिटी गठन की खबर आने के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात की है।

 ‘एक देश, एक चुनाव’ यानी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाने के मसले पर लंबे समय से बहस चल रही है। इसमें संभावना यह भी है कि त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव भी एक साथ कराए जाएँ। दरअसल, अलग-अलग चुनाव होने से देश में हर 3-4 महीने में चुनाव होते रहते हैं। इससे उन क्षेत्रों में आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है। इससे विकास कार्य ठप्प पड़ जाते हैं। इसके अलावा, चुनावों में करोड़ों रुपए भी खर्च होते हैं। इससे सरकार पर बोझ बढ़ता है। इन सब चीजों से बचने के लिए ‘एक देश, एक चुनाव’ की माँग होती रहती है।

आजादी के बाद 1951-52 में देश में पहली बार चुनाव हुए थे। तब लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव भी कराए गए थे। इसके बाद साल 1957, 1962 और 1967 में भी लोकसभा-विधानसभा चुनाव एक साथ कराए गए। इसके बाद साल 1968-69 में कई सरकारें भंग कर दी गईं। वहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने साल 1971 में समय पहले ही लोकसभा चुनाव कराए थे। इस तरह से देश में एक साथ होने वाले चुनावों की परंपरा टूट गई। इसके बाद की सरकारों ने देश में एक साथ चुनाव कराने की कोशिश नहीं की।


एशिया के सबसे बड़े एयर शो में लड़ाकू विमानों पर बजरंग बली

कर्नाटक की राजधानी में आज सोमवार (13 फरवरी, 2023) से एशिया का सबसे बड़ा एयर शो शुरू हुआ है। Aero India (एयरो इंडिया) 2023 नाम के इस शो का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। भारत की बढ़ रही आत्मनिर्भरता और स्वदेशी ताकत को दिखाने वाले इस शो में 29 देशों के वायुसेना अध्यक्ष सहित दुनिया भर के लगभग 5 लाख लोगों के शामिल होने की संभावना है। इसका समापन इसी माह 17 फरवरी को होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 5 दिनों तक चलने वाले इस शो में शुरुआत के 3 दिन बिजनेस डील और अंतिम 2 दिन जनता दर्शन के लिए रखे गए हैं। शो में 29 देशों के वायुसेना अध्यक्षो के साथ 73 बड़ी कंपनियों के CEO भी शामिल हो रहे हैं। डेमो के तौर पर विमानों का फ्लाई पास्ट भी करवाया जाएगा। इसमें जहाजों को उड़ा कर दिखाया जाता है। इस एयरो इंडिया के 14 वें भाग में भारत स्वदेशी लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टर, मिसाइलों, ड्रोन और अन्य हथियारों का प्रदर्शन करेगा। यह शो हर 2 साल में एक बार आयोजित होता है।

लड़ाकू विमान पर बजरंग बली

स्वदेशी संस्थान HAL का नया फाइटर प्लेन HLFT-42 इस शो का मुख्य आकर्षण है। इसे 5वीं पीढ़ी का एडवांस युद्धक विमान माना जाता है। इसकी टेल (पूँछ) पर हवा में उड़ते बजरंग बली का चित्र छपा हुआ है। जिस स्थान पर इस विमान को खड़ा किया गया है वहाँ संदेश के तौर पर लिखा है, “तूफ़ान आ रहा है।” यह विमान लड़ाकू पायलटों को ट्रेनिंग देने के काम आएगा।

उड़ने वाली टैक्सी भी

IIT मद्रास द्वारा साल 2017 में बनी उड़ने वाली टैक्सी भी इस शो में रखी गई है। 2 सीटों वाली इस टैक्सी का वजह 2 क्विंटल है, जो एक बार फुल चार्जिंग के बाद 200 किलोमीटर उड़ सकती है। 2 सीटों वाली इस टैक्सी को उड़ाने में बहुत जगह की भी जरूरत नहीं। इन सभी के अलावा LCA मार्क 2 और नेवल ट्विन इंजन डेस्क बेस लड़ाकू विमान भी इस शो में प्रदर्शित किए जा रहे हैं।

मोदी ने गिनाईं उपलब्धियाँ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस शो का उद्घाटन सुबह लगभग 10:30 पर इस शो का उद्घाटन किया। इस अवर पर उन्होंने इतिहास की चर्चा करते हुए कहा कि कभी भारत में या तो सिर्फ शो होते थे या इसे सिर्फ सेल टू इंडिया की विंडो माना जाता था।
मोदी ने कहा कि अपनी रक्षा के लिए सामान बनाने की सोच रखने वाले देश अब भारत को एक मजबूत साझीदार के दौर पर देख भी रखे हैं। भारत के स्वदेशी सामानों को मोदी ने कम खर्चीला होने के साथ टिकाऊ और भरोसेमंद भी बताया। अपने सम्बोधन में मोदी ने रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी निर्माण के उदाहरण में तेजस और नौसेना के युद्धपोत INS विक्रांत का नाम लिया। आँकड़ों का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि कभी दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा सामानों का खरीदार भारत अब 75 देशों को रक्षा उपकरण बेच रहा है।

2006 में ‘वोट बैंक’ को खुश करने के लिए मनमोहन सरकार द्वारा गठित अल्पसंख्यक (मुस्लिम) मंत्रालय खत्म?

साभार: newsclick
केंद्र की मोदी सरकार यूपीए सरकार द्वारा बनाए गए अल्पसंख्यक मंत्रालय (Ministry of Minority Affairs) को समाप्त करने का विचार कर रही है। ऐसा दावा डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से किया गया। इसके मुताबिक अगर ऐसा हुआ तो सरकार इस मंत्रालय का विलय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय (Ministry of Social Justice and Empowerment) के साथ करेगी। वहीं मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही स्कीम वैसी की वैसी ही चलती रहेंगी।

उल्लेखनीय है कि अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 2 (ग) के तहत छह समुदाय को केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यक के तहत अधिसूचित कर रखा है। ये हैं- मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और सिख। लेकिन इस मंत्रालय के गठन के समय से ही ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की सोच झलकती रही है, चाहे वह योजनाओं का क्रियान्वयन हो या फंडिंग या फिर उनका नामकरण।

खबर में कहा गया है कि मंत्रालय के अधिकारियों ने अभी इस मामले पर कुछ भी बताने से मना कर दिया है। लेकिन सूत्र ने कहा है, “भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का मानना है कि अल्पसंख्यक मामलों के लिए अलग से मंत्रालय की जरूरत नहीं है। उनके मुताबिक ये मंत्रालय सिर्फ यूपीए (मनमोहन सरकार) की तुष्टिकरण की राजनीति के चलते (साल 2006 में) बना। अब मोदी सरकार इसे दोबारा से सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय के अंतर्गत लाना चाहती है।”

मंत्रालय समाप्त किए जाने को लेकर अभी कोई आधिकारिक सूचना नहीं आई है। मगर कॉन्ग्रेस ने और मुस्लिम संगठनों ने अभी से अपनी नाराजगी को व्यक्त करना शुरू कर दिया।

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सदस्य सैयद नसीर हुसैन ने कहा है कि भाजपा ऐसा करके समजा को बाँटना चाहती है। ऐसा मंत्रालय कॉन्ग्रेस वाली यूपीए सरकार इसलिए लाई ताकि अल्पसंख्यक मुख्यधारा में आएँ और उनका विकास हो। मगर भाजपा सरकार तो हर अवसर को अल्पसंख्यकों के खिलाफ ही प्रयोग करती है।

वहीं जमात-ए-इस्लामी के सचिव सैयद तनवीर अहमद ने कहा कि ये सब संविधान की आत्मा के खिलाफ है इसके मानव विकास रुकेगा। सरकार को तो ज्यादा से ज्यादा पैसा देकर मंत्रालय को मजबूत करना चाहिए ताकि अल्पसंख्यकों का कल्याण हो।

पंजाब : चुनावी वादों को पूरा करने में नाकामी देख ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ने की तैयारी

‘हाँ मैं अराजक हूँ’, साल 2014 में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था। यह उनका सिर्फ कथन ही नहीं, समय-समय पर उनके कार्यों से भी इसकी झलक मिलती है। चाहे दिल्ली पुलिस को ठुल्ला कहना हो या गणतंत्र दिवस की परेड से कुछ दिन पहले अपने विधायकों सहित दिल्ली की सड़कों पर धरना देना और वहाँ सरकारी फाइलों को ले जाकर काम करने का दिखावा करना, ये कुछ ऐसे काम हैं, जिनसे उन्होंने न सिर्फ अपने कथन को सत्य साबित करने की कोशिश की, बल्कि मुख्यमंत्री के पद की गरिमा को कम किया।

पंजाब चुनाव जीतने के बाद तो उन्होंने भारतीय राजनीतिक परंपरा को चुनौती दे दी। मुख्यमंत्री कार्यालय से देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की तस्वीर हटा दी। यहाँ तक कि मुख्यमंत्री भगवंत मान की सामने आई मुख्यमंत्री कार्यालय की तस्वीर में महात्मा गाँधी की तस्वीर भी गायब रही। हालाँकि, उन्होंने भगत सिंह और बाबा भीमराव अंबेडकर की तस्वीर लगाई, लेकिन यह भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में स्थापित मानकों के ठीक उल्टा था।

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि जहाँ संंवैधानिक रास्ता खुले हों, वहाँ असंवैधानिक रास्ता अपनाना अराजकता है। इस रास्ते को जितनी जल्दी छोड़ दी जाए, उतना बेहतर है। जब केजरीवाल ने कहा था कि हाँ ‘मैं देश का सबसे बड़ा अराजकतावादी हूँ’ तो लोगों ने उनकी राजनीतिक अपरिक्वता समझकर नजरअंदाज कर दिया था, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने उनके ऊपर लगे उस लेवल को हटने में बाधा का काम किया है।

खालिस्तान का परोक्ष समर्थन, दिल्ली के शाहीन बाग के अराजक एवं देशद्रोही तत्वों को समर्थन से लेकर कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार और पलायन का मजाक, ऐसे तमाम मुद्दे हैं जिसने मुख्यमंत्री केजरीवाल की मंशा और उनकी नीति पर सवाल खड़े किए। कोरोना काल में जब देश और दुनिया में अपने-अपने लोगों को सहारा देने की कोशिश की जा रही थी, तब उनके नेता श्रमिकों को उकसा कर सड़कों पर ला रहे थे और उन्हें दिल्ली से बाहर का रास्ता दिखाकर मौत के मुँह में झोंक रहे थे। उस दौरान प्रवासी मजदूरों भूखे और लाचार थे, लेकिन सरकार अपने विज्ञापन पर करोड़ों रुपए फूँक रही थी।

केजरीवाल ने कहा था कि दिल्ली के हर नागरिक के जीवन की रक्षा करना मुख्यमंत्री के रूप में उनका पहला कर्तव्य है। दिल्ली में उन्होंने मुफ्त बिजली और पानी की जो सब्जबाग दिखाकर मुख्यमंत्री बने, उसी की घोषणा वह अन्य राज्यों में करके जनता को ठगने की कोशिश जारी है। चाहे पंजाब हो, गुजरात हो या उत्तराखंड उन्होंने हर जगह वहाँ के हालात और उसकी वित्तीय स्थिति को जाने बिना मुफ्त का लॉलीपॉप थमाने का काम किया। यह आर्थिक अराजकता का एक बड़ा उदाहरण है।

पंजाब में ‘आप’ के लोक-लुभावने वादे

पंजाब चुनावों से पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने वहाँ के लोगों को हर महीने 300 यूनिट फ्री बिजली देने की घोषणा की थी। अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि जब पंजाब में उनकी पार्टी की सरकार बनेगी तो ‘सबसे पहली कलम से जो काम होगा, वह बिजली फ्री देने का काम होगा’। उन्होंने राज्य की हर महिला को 1,000 रुपए प्रतिमाह देने की बात कही थी। अब जब सरकार बन गई तो वह अपने केंद्र से पैसे की माँग करके इसका सारा दोष केंद्र पर डालने की कोशिश कर रहे हैं।
चुनावों से पहले आम आदमी को पता था कि राज्य की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है। पंजाब पर 3 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज है, फिर भी उन्होंने लोगों से लोक-लुभावने वादे किए। चुनाव पूर्व अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि अपने वादों को पूरा करने के लिए उन्हें पता है कि पैसा कहाँ से आएगा और इसका प्रशासनिक ढाँचा कैसा होगा, इसकी पूरी तैयारी कर ली गई है। उन्होंने कहा था कि पंजाब का 1.70 लाख करोड़ रुपए का बजट है और इसमें से भ्रष्टाचार खत्म कर वह 34 हजार करोड़ रुपए बचाएँगे। रेत की चोरी बंद करके 20 हजार करोड़ रुपए आ जाएँगे। इससे वे राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाएँगे।
पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के कुछ दिन बाद ही भगवंत मान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास पहुँचे और उनसे 50,000 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष के दो किस्तों की माँग की। उनका कहना था कि राज्य की वित्तीय स्थिति को सँभालने के लिए उन्होंने केंद्र सरकार से यह पैकेज की माँग की। इस माँग को अरविंद केजरीवाल पंजाब का पैसा बताकर सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।

केजरीवाल का दावा

आम आदमी पार्टी के ट्विटर हैंडल से 7 अप्रैल को शेयर किए एक वीडियो में मुख्यमंत्री केजरीवाल एक निजी चैनल के पत्रकार से कह रहे हैं कि केंद्र सरकार के पास जो पैसा है, वह पब्लिक का पैसा है और भगवंत मान उसी पैसे को लेने के लिए गए थे। केजरीवाल का कहना है कि पंजाब के पब्लिक का पैसा केंद्र के पास पड़ा हुआ है।
राजनीति में आने से पहले अरविंद केजरीवाल भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी रहे हैं। उन्हें अच्छी तरह पता होगा कि केंद्र के आय के स्रोत क्या हैं और उसके खर्चे क्या हैं। राज्यों को किस आधार पर राशि का आवंटन होता है। ऐसा नहीं है कि उन्हें वित्त आयोग जैसी संस्थाओं और उसके कामों के बारे में नहीं पता होगा। इसके बावजूद, वह संवैधानिक व्यवस्था को दरकिनार कर माँगी गई राशि को पंजाब का पैसा बता रहे हैं।

कहाँ से आता है केंद्र के पास पैसा

केंद्र के आय में आयकर (Income Tax), कॉरपोरेट टैक्स, उधारी और GST की प्रमुख हिस्सेदारी होती है। केंद्र अपनी आय का 21 प्रतिशत कॉरपोरेट टैक्स, 20 प्रतिशत उधारी, 16 प्रतिशत आयकर और 19 प्रतिशत जीएसटी से प्राप्त करता है। इसके अलावा, केंद्र सरकार को गैर-कर आय से 9 प्रतिशत, कस्टम से 4 प्रतिशत, एक्साइज ड्यूटी से 8 प्रतिशत और गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियों से 3 प्रतिशत की आय होती है।
जहाँ तक खर्च की बात है तो केंद्र सरकार पर केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन-भत्ते, रक्षा, आधारभूत संरचना पर खर्च करना पड़ता है। केंद्र अपनी आय का सबसे अधिक हिस्सा 23 प्रतिशत राज्यों को देता है। 18 प्रतिशत कर्ज का ब्याज चुकाने और 13 प्रतिशत केंद्रीय योजनाओं तथा 9 प्रतिशत उज्ज्वला, मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर खर्च करता है। वहीं, सब्सिडी पर 8 प्रतिशत, रक्षा पर 9 प्रतिशत और पेंशन पर 5 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार खर्च करती है।

राज्यों में पैसे का बँटवारा

जीएसटी प्रणाली के तहत राज्य SGST लेते हैं, जबकि केंद्र CGST लेता है। दोनों ही कर योग्य वस्तु पर लागू जीएसटी का 50% है। इसका मतलब है कि राज्य पहले से ही ज्यादातर वस्तुओं और सेवाओं पर 50% टैक्स खुद ही वसूल कर लेते हैं। इसके अलावा, आयकर और कॉर्पोरेट टैक्स जैसे अन्य करों के साथ केंद्रीय जीएसटी का एक हिस्सा राज्यों को भी दिया जाता है। ऐसे में राज्यों को राजस्व में अपना हिस्सा माँगने के लिए केंद्र के पास जाने की जरूरत नहीं है। वह पहले से ही वित्त आयोग की सिफारिश के आधार पर केंद्र द्वारा आवंटित किया जाता है। केंद्रीय बजट 2022-23 में पंजाब को केंद्र सरकार द्वारा एकत्र किए गए विभिन्न करों से 14,756.86 रूपए  करोड़ आवंटित किए जा चुके हैं।
जब केंद्र सरकार अपनी आय का 23 प्रतिशत हिस्सा राज्यों के साथ साझा कर देती है, ऐसे में अपनी लोक-लुभावनों वादों को पूरा करने के लिए केंद्र को दोषी ठहराना अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान का राजनैतिक स्टंट से अधिक कुछ नहीं है। अरविंद केजरीवाल ने इस कदम से यह भी साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार को कम करके अपनी लोक-लुभावन योजनाओं के खर्चों का पोषण उनका महज खोखला दावा था। पहले से ही खस्ताहाल राज्य में अगर मुफ्त वाली घोषणाएँ लागू कर दी जाती हैं तो यह राज्य के लिए आत्मघाती साबित होगा।
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पंजाब के हिस्से की पूरी राशि माँग करके संघीय व्यवस्था को चुनौती देने का काम कर रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने हाल ही में भारत के विचार को चुनौती देते हुए कहा था कि भारत कोई राष्ट्र नहीं, बल्कि ‘राज्यों का संघ’ मात्र है। इस तरह की मानसिकता राज्य को स्वतंत्र इकाई के रूप में पेश कर देश को विभाजित करने का खेल खेलने जैसा है। पंजाब वैसे भी अलगाववाद जैसे खतरों से जूझ रहा है। ऐसे में इस तरह की अव्यवस्था केंद्र और राज्यों के बीच की दूरी को बढ़ाने का काम करेगा।

कृषि कानूनों की वापसी: BJP को उनकी ही वेबसाइट पर मौजूद ये पुस्तक पढ़नी चाहिए, जानिए क्यों

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (19 नवंबर, 2021) को राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए अचानक से तीनों कृषि कानूनों को वापस लिए जाने की घोषणा कर दी। इन कानूनों को कृषि सुधार के लिए लाया गया था। भारत में जिस तरह से कृषि उत्पादों को किसान उपजाते और फिर बेचते हैं, ये कानून उस प्रक्रिया के विविधीकरण और उसमें आने वाली बाधाओं को हटाने के लिए लाए गए थे। इस घोषणा से सभी को हैरानी हुई। सत्ताधारी दल के कई समर्थक भी बेचैन हो गए। कम से कम ऑनलाइन तो ऐसा ही देखने को मिला। अब जब लोगों का गुस्सा और चर्चाओं का बाजार थमता नजर आ रहा है, मैं पिछले एक वर्ष में हुई घटनाओं का विश्लेषण करने का खतरा मोल ले रहा हूँ।

 

सबसे पहले तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस घोषणा पर दो तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को सामने आईं। सत्ता और पार्टी के लोगों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ये फैसला लिया गया, क्योंकि खालिस्तानी ताकतों ने ‘किसान आंदोलन’ में घुसपैठ करने में कामयाबी पा ली थी। जबकि, विपक्ष और यहाँ तक कि मोदी समर्थकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ऐसा किया गया। बता दें कि अगले 4 महीनों में इन दोनों ही राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं।

पहले दूसरी वाली प्रतिक्रिया की बात करते हैं, जिसमें कहा गया है कि ये चुनाव जीतने के लिए लिया गया फैसला था। विपक्ष तो ऐसा कहेगा ही, लेकिन कुछ भाजपा समर्थक भी ऐसी ही राय रख रहे हैं। मुझे ऐसे लोगों की कोई गलती नजर नहीं आती, क्योंकि बाहर से देखने पर कई चीजें समझ में नहीं आ रही हैं।

1 वर्ष पहले जब किसान प्रदर्शनकारी दिल्ली के लिए निकले थे, तभी इस आंदोलन में खालिस्तानी तत्वों की उपस्थिति का स्पष्ट रूप से पता चल गया था। एक सिख व्यक्ति का अंग्रेजी में एक पुलिस अधिकारी से बहस करते हुए वीडियो भी सामने आया था। मीडिया के गिरोह विशेष ने तुरंत उसे ‘आधुनिक शिक्षित किसान’ बताते हुए अपने सिर पर बिठा लिया, लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही उसे ‘भाजपा एजेंट’ बताते हुए लिबरलों ने अजीबोगरीब ढंग से उससे नाता तोड़ लिया। उसने जनरैल सिंह भिंडरवाला की निंदा करने से इनकार कर दिया था। याद दिला दें कि भिंडरवाला वही व्यक्ति है, जिसने 80 के दशक में सिख अलगावाद और खालिस्तानी विचारधारा को पुनर्जीवित किया था। इसका परिणाम हमें पंजाब में हिन्दुओं के नरसंहार के रूप में देखने को मिला। फिर ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ हुआ।

वापस ‘किसान आंदोलन’ पर लौटें तो शुरू से ही इसमें भिंडरवाला की तस्वीरों वाले के पोस्टर-बैनर्स, ट्रैक्टर्स, टीशर्ट्स इसमें दिख रहे थे। कई बार आंदोलनकारियों ने अलगाववादी और हिन्दू विरोधी नारे लगाए, इस तरह की बातें की। कुछ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उसी तरह हत्या करने की धमकी दी, जिस तरह इंदिरा गाँधी की हुई थी। इसके बाद गणतंत्र दिवस (26 जनवरी, 2021) को लाल किला सहित दिल्ली में जो हिंसा हुई, वो हम सबने देखा। अगर खालिस्तानी खतरे के कारण कृषि कानूनों को वापस लिया गया है तो सरकार इतने दिनों से क्या कर रही थी? ये खतरा तो पिछले 10 महीने से यूँ ही दिख रहा है, फिर इस पर क्या किया गया?

इसीलिए, ये सारा का सारा टाइमिंग का खेल है और मैं इसे पूरी तरह समझ रहा हूँ। जब खालिस्तानी खतरा शुरू से ही किसानों के आंदोलन में मौजूद था, फिर अब कृषि कानूनों को चुनाव से पहले वापस लिए जाने की घोषणा क्यों हुई? क्या इससे इशारा नहीं मिलता कि चुनाव जीतने के लिए ऐसा किया गया है?

कृषि कानूनों की वापसी विधानसभा चुनावी जीत के लिए?

इस घोषणा का जो समय है, वही इस बात को बल देता है कि 2022 में पंजाब और उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में राजनीतिक फायदे के लिए तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया गया। लेकिन, घोषणा की टाइमिंग ही ऐसा भी इशारा करती है कि ये कारण नहीं भी हो सकता है। अगर पंजाब-यूपी विधानसभा चुनाव जीतने ही इस फैसले का कारण है, फिर तो काफी खराब समय पर घोषणा की गई।
4 महीना भारतीय लोकतंत्र में एक लंबा समय होता है और कोई मंझा हुआ राजनेता विपक्ष को फिर से रणनीति बनाने के लिए इतना लंबा समय नहीं दे सकता। ममता बनर्जी ने इसी चतुराई को अपना कर भाजपा को मात दी थी, जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से कुछ ही दिनों पहले खबर आई थी एक हमले में उनका पाँव टूट गया है। पैरों में प्लास्टर लगा कर वो अस्पताल में भर्ती हुईं और वहाँ से कई तस्वीरें मीडिया में सामने आईं। भाजपा समझ नहीं पाई कि इस ‘पीड़िता महिला कार्ड’ के जवाब में उनकी पोल खुले जाए, उनका मजाक उड़ाया जाए या फिर किसी अन्य महिला नेता को आगे कर के इसे ड्रामा साबित किया जाए। लेकिन, अगर आप कुछ हैरानी भरा लेकर सामने आना चाहते हैं तो इसके लिए उचित समय किसी चुनाव से कुछ ही दिन पूर्व तक होता है। ये वो समय होता है, जब विरोधी भी लड़खड़ा जाते हैं।
दूसरी बात ये है कि राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए टीवी पर ये घोषणा क्यों की जाएगी? ये आपके लिए खुद परेशानी भरा होगा, क्योंकि आप इससे और कमजोर नजर आएँगे। चुनाव के तारीखों की घोषणा होने के बाद किसी रैली में जनता के सामने भी तो ऐसा किया जा सकता है? लोहरी के दिन पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के साथ पंजाब की किसी रैली में भी तो ये घोषणा की जा सकती थी? लोहरी का त्योहार जब और कृषि से जुड़ा हुआ है। साथ ही ये ऐसे समय पर आ रहा है, जब पंजाब में विधानसभा चुनाव नजदीक होगा। भाजपा और अमरिंदर सिंह की नई पार्टी के गठबंधन के साथ ये घोषणा हो सकती थी। ऐसा कुछ कर के आप अपने विपक्ष को बड़ा झटका दे सकते हैं। विपक्ष और आपके समर्थक इस फैसले पर वैसे भी आपकी आलोचना करते, फिर कम से कम टाइमिंग तो सही होती?
भाजपा के रणनीतिकार, जिन पर अक्सर आरोप लगते रहते हैं कि वो चुनाव जीतने पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं, निश्चित रूप से इस घोषणा के फायदों और नुकसान पर विचार-विमर्श कर सकते हैं। अगर पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के असंतुष्ट किसानों को मनाना इस घोषणा का लक्ष्य है, फिर तो इसकी टाइमिंग बिलकुल भी सही नहीं है।
कुछ न कुछ तो ऐसा ज़रूर है, जिस कारण चुनाव से इतना पहले ही भाजपा ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की अचानक से घोषणा करने को मजबूर कर दिया। इस महीने की शुरुआत में हुए कुछ राज्यों के उपचुनाव में भाजपा का प्रदर्शन मिलाजुला रहा था। वहाँ से भी कुछ ऐसा इशारा नहीं मिलता कि उपचुनावों के परिणाम के कारण ऐसा हुआ होगा।
हालिया उपचुनाव के दौरान एकमात्र विधानसभा क्षेत्र जहाँ किसान प्रदर्शनकारियों का असर था, वो था हरियाणा का एलेनाबाद। यहाँ के विधायक INLD के अभय सिंह चौटाला ने कृषि कानूनों का विरोध करते हुए ही अपने पद से इस्तीफा दिया था। फिर से उनकी ही जीत हुई। लेकिन, भाजपा का प्रदर्शन उतना बुरा नहीं रहा जितना यहाँ 2019 के विधानसभा चुनाव में रहा था। उलटा उसे पहले से ज्यादा ही वोट मिले। इसके परिणाम उतने हैरान करने वाले नहीं थे कि आपात स्थिति में भाजपा इस तरह की कोई घोषणा कर दे। केवल पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश से भाजपा के लिए बुरी खबर आई। हिमाचल प्रदेश में भाजपा को एक भी सीट नसीब नहीं हुई। हालाँकि, इन दोनों ही राज्यों में ‘किसान आंदोलन’ का कोई असर नहीं था और हार का कारण कृषि कानून नहीं थे।

घोषणा की टाइमिंग पंजाब से ज्यादा सिखों को लेकर

अगर इरादा पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनावों को जीतने का है तो ये समय ठीक नहीं है। हालाँकि समय ये बताता है कि क्या प्राप्त करने की कोशिश हो रही है। प्रधानमंत्री ने इस घोषणा के लिए गुरु परब का अवसर चुना, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव के जन्मदिन वाला दिन। ये विचार सिख भावना से जुड़ने का या उन्हें खुश करने का है।
अब कोई ये भी तर्क दे सकता है कि अगर उद्देश्य पंजाब चुनाव नहीं जीतना है तो सिख भावना और जाट-सिख भावना को किस वजह से खुश किया जा रहा है? ये जरूरी नहीं। अगर ऐसा होगा तो ये बीजेपी के लिए बोनस होगा (मुझे नहीं लगता कि इससे पार्टी को लाभ होगा और ये हम आज से आने वाले 4-5 माह में देख लेंगे), लेकिन पहला उद्देश्य चुनाव जीतना नहीं है क्योंकि जैसे मैंने ऊपर समझाया कि ये समय उस लक्ष्य प्राप्ति का नहीं।
सरकार खालिस्तानी हैंडलर के बहकावे में आ गई है? या ये ख़ुफ़िया विफलता है? ख़ुफ़िया एजेंसियों को कैसे नहीं पता था कि खालिस्तानी इस किसान प्रदर्शन को अपना एजेंडा चलाने के लिए इस्तेमाल करेंगे? इसके मिश्रित जवाब हैं।
जाहिर तौर पर सरकार ने इसे होते नहीं देखा और वे इसे मानने की स्थिति में भी नहीं हैं। ये वो बदलाव थे जो हर पार्टी माँग रही थी और हर पार्टी ने इसके लिए वादा दिया। लेकिन बाद में ये लोग पलट गए। यहाँ तक कि तथाकथित बुद्धिजीवी भी सिर्फ ‘सरकार के बर्ताव’ में गलतियाँ निकाल पा रहा था न कि लाए गए कृषि कानूनों में। शिरोमणि अकाली दल ने भी यू टर्न लिया और एक मुद्दा पूरे पंजाब का मुद्दा बन गया और कुछ ही समय बाद इसे खालिस्तानियों द्वारा सिख मुद्दा बना दिया गया जो लंबे समय से ‘जनमत संग्रह 2020’ पर काम कर रहे थे। हमें लगा कि ये कुछ हास्यास्पद सी चीज है कि कुछ सिख लंदन और कनाडा में बैठकर इसके सपने देख रहे हैं। लेकिन हम गलत थे।
सरकारी एजेंसियों को निश्चित तौर पर खालिस्तानी खतरा महसूस हुआ, उन्होंने इसे गौर भी करवाया लेकिन जब उन्होंने ये सब किया तो उस समय उनपर किसानों को बदनाम करने का आरोप लग गया। हम लोग नहीं जानते कि शुक्रवार को गुरु परब के दिन किसानों के सामने हार मानने से पहले इतने महीनों में कितनी बार इस (खतरे) को निपटाने की कोशिश हुई। हम शायद कभी नहीं जान पाएँगे, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों और विशेष रूप से इसका मुकाबला करने की रणनीतियों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं की जाती है। वर्गीकृत सूचनाएँ और, इससे दूसरों को अपनी थ्योरी बुनने के अवसर मिलेंगे।
जो जानकारी पब्लिक डोमेन में है वो एक ऐसे परिदृश्य को चित्रित करती है जहाँ सरकार ने इस खतरे- पंजाब में खालिस्तानियों की वापसी, से निपटने के लिए पीछे हटने को सबसे अच्छा तरीका समझा। ये फैसला या तो बड़ी जीत की ओर जाना चाहिए या फिर युद्ध को जीतने के लिए एक लड़ाई हारने पर। और वह बड़ी जीत चुनावों में जीत नहीं हो सकती है या कोई ऐसा बैकडोर भी नहीं हो सकती जिसके जरिए दोबारा कानून को पेश किया जा सके। अगर ये पीछे हटना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हुआ है, तो बड़ी जीत भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए होनी चाहिए।
और यहीं पर असली चुनौती है। ये रणनीति खालिस्तानी तत्वों को प्रोत्साहित ही करेगी। अगर मुस्लिमों का तुष्टिकरण कभी काम नहीं आया तो जाट सिखों का तुष्टिकरण क्यों काम आएगा?

हिंदू-सिख संबंध

मुझे पता है कि ऐसी चिंताएँ हैं कि यह एक गलत मिसाल कायम कर सकता है। गलत मिसाल मसलन अन्य समूह भी अपनी माँगों को पूरा करने के लिए हिंसा और भीड़तंत्र वाली शक्ति का प्रदर्शन करना शुरू कर देंगे। दुर्भाग्य से हमारा देश हमेशा से ऐसा ही रहा है।
विभिन्न समूहों के लिए आरक्षण या किसी भी क्षेत्र की माँग हमेशा से व्यापक हिंसा के बाद लगभग पूरी हुई ही है। संविधान में किया गया पहला संशोधन ही एक तरह से हिंसा को वैध बना दिया। इसी के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘उचित प्रतिबंध’ लगाने की व्यवस्था की गई, क्योंकि कुछ लोग किसी अन्य की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के बाद पागल होकर बसों को जलाने निकल पड़ते थे। उसके बाद यह नियम तो नहीं बना लेकिन पैटर्न जरूर सेट हो गया।
मेरी चिंता इस बारे में नहीं है कि दूसरे समूह भी इसका अनुसरण करेंगे, वे पहले से ही कर चुके हैं। CAA को लेकर पहले दिन से ही हिंसा हो रही थी। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य जगहों पर हिंसक घटनाएँ हुईं और फिर 2020 के दिल्ली दंगे भी हुए। मैं कुछ ऐसा लिख जाऊँगा, जो प्रकाशित ही नहीं होगा लेकिन संक्षेप में कहूँ तो अगर कोई सरकार सोचती है कि कुछ लोगों पर गोलियाँ चलाई जा सकती हैं, तो चलती हैं (न केवल सरकारें, यहाँ तक कि पत्रकार भी सोचते हैं कि कुछ लोगों पर गोलियाँ चलाई जा सकती हैं)। जैसा होता आया है, मौजूदा सरकार सिखों के साथ वह जोखिम नहीं उठाना चाहती। और मेरी चिंता यही है – आगे क्या? हमने निश्चित रूप से रक्तपात होने के समय को कुछ देर के लिए टाल दिया है, लेकिन क्या हमने इस विकराल समस्या को हल करने की योजना भी बना ली है?
खालिस्तानी समस्या को हल करना मृत-समान है और पहले इसे हल करने की सोच से अब यह आगे जा चुका है… और हमारी आँखें खोलने के लिए हमें ‘किसान को धन्यवाद’ जरूर कहना चाहिए। फिर भी अगर कोई इसकी कोशिश कर रहा है तो निश्चित रूप से वो सिख वर्चस्ववादी मानसिकता के मुद्दे को हल करने की कोशिश कर रहा है, जो हिंदू-सिख संबंधों को लेकर विकृत दृष्टिकोण रखता है। मुझे नहीं पता कि इसके लिए सरकार या भाजपा की क्या योजना है, लेकिन मुझे आशा है कि वे राम स्वरूप की पुस्तक “हिंदू-सिख संबंध” पढ़ेंगे, जो संयोग से पार्टी की वेबसाइट पर उपलब्ध है।
यह पुस्तक पूरे इतिहास के उस हिस्से को विस्तार से बताती है कि कैसे सिख धर्म का एक प्रमुख हिस्सा हिंदू धर्म के एक संप्रदाय होने से दूर होता गया। इतना ही नहीं, हिंदू धर्म से दूर होते-होते यह ऐसा रूप ले लिया, जिसमें अब्राहमिक धर्म (एक खुदा, एक भगवान वाला) की छवि दिखने लगी। इतना ही नहीं, इस पुस्तक से आप जान पाएँगे कि कुछ सिखों, विशेषकर जाट सिखों के बीच यह वर्चस्ववादी मानसिकता क्यों मौजूद है।
यह पुस्तक उस समय प्रकाशित हुई थी, जब पंजाब में सिख उग्रवाद चरम पर था। संयोग से इसमें यह उल्लेख भी है कि कैसे कृषि मुद्दों ने तब पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी (और जैसा कि कहते हैं, इतिहास दोहराता है, अब हमारे सामने फिर से ‘कृषि कानून’ के माध्यम से वही एजेंडा बढ़ाया जा रहा है)। मैं इस पुस्तक के केवल तीन पैराग्राफ आपके सामने रख रहा हूँ, ये एक तरह से वर्तमान समस्या के साथ-साथ आने वाली चुनौती को भी दर्शाते हैं:
पिछले दो दशकों में, अलगाव करने वाला एक अन्य कारक भी चुपचाप काम कर रहा है। हरित क्रांति और कई अन्य कारकों की वजह से सिख अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध हो गए हैं। इसके बाद उन्होंने यह देखना-समझना शुरू कर दिया है कि हिंदुओं के साथ बंधन (मतलब हिंदू धर्म का ही संप्रदाय) उनके लिए पर्याप्त नहीं है। इसी सोच के साथ वे अपने नाम और प्रतीकों में आसानी से उपलब्ध नई पहचान की तलाश करने लगे। यह एक मानवीय कमजोरी है, अप्रत्याशित या अचंभित होने जैसा कुछ नहीं।
“आप हमारे रक्षक रहे हैं” – यह बात हिंदू सिखों को बताते रहे हैं। लेकिन वर्तमान समय में (या कह लें वर्तमान मनोविज्ञान काल में), प्रशंसा से केवल अवमानना मिलती है – और मेरा मानना गलत नहीं है। आत्म-निराशा किसी मित्र या भाई को खोने का पक्का तरीका है। यह हिंदुओं के साथ हुआ। दूसरी ओर सिखों को इससे अलग लेवल के आत्म-मूल्यांकन (अतिरेक वाला) का मौका मिला।
इस मनोविज्ञान के दबाव में – बनावटी शिकायते गढ़ी गईं; ऐसे चरमपंथी नारों को लाया गया, जिसके साथ नरमपंथी तबकों को भी चलना पड़ा। पिछले कुछ सालों में हत्या की राजनीति भी शुरू हो गई। कहीं कोई रोक नहीं, कहीं से कोई शिकंजा नहीं… अंततः इसे कहाँ रुकना है… नहीं पता था; यह अपने आप में एक कानून बन गया; यह हुक्म चलाने लगा, धमकाने लगा।                         -- राम स्वरूप की पुस्तक “हिंदू-सिख संबंध” से
और अब हम सब इसी समस्या के सामने खड़े हैं। इस खौफ पर कैसे काबू पाया जाए, यह अभी का सबसे बड़ा सवाल है। सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि हिंदू समुदाय को भी इस समस्या को समझने की जरूरत है। मुझे आशा है कि इसके लिए एक योजना तो है। और मुझे यह आशा भी है कि जिनके पास यह योजना है, उन्होंने राम स्वरूप को पढ़ा होगा। और हाँ, मेरे प्रिय पाठक, आप भी पढ़ सकते हैं।
(यह लेख OpIndia पर राहुल रौशन के अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है। )