तथाकथित किसानों के सामने सरकार ने रखा प्रस्ताव (तस्वीर साभार: ANI) केंद्र सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर प्रस्ताव लाने के बाद किसान प्रदर्शनकारी थोड़े शांत हुए हैं। उन्होंने सरकार से चौथे दौर की बातचीत के बाद अपना प्रदर्शन कुछ समय रोकने का ऐलान किया। ये प्रस्ताव सरकार रविवार (18 फरवरी 2024) को लेकर आई।
आखिर ये तथाकथित किसान देश को किस दिशा की ओर मोड़ रहे हैं? विदेशी भारत विरोधियों की कठपुतली बने लोग देश हितैषी हो ही नहीं सकते? जिस काम का वायदा पंजाब विधान सभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने किया था, उसे केंद्र पर क्यों थोपा जा रहा है? क्या केंद्र सरकार पंजाब में आम आदमी पार्टी के मकड़जाल में फंस गयी है? जो किसान खालिस्तान की मांग करे वो किसान नहीं हो सकता? अगर सरकार इन उपद्रवी किसानों के आगे झुकती है तो किसानों से इनकी आय पर टैक्स वसूला जाये। दोनों हाथों में लड्डू आखिर कब तक? पूछा जाये जो ऋण लिया था, वह कहाँ खर्च हुआ और तुम्हारे पास ये बंगले और आलीशान कारें कहाँ से आयीं?
इसमें कहा गया कि एमएसपी पर फसल खरीदने के लिए 5 साल का कॉन्ट्रैक्ट किया जाएगा। ये कॉन्ट्रैक्ट एनसीसीएफ, NAFED और CCI जैसी सहकारी समितियों के साथ होगा। इसमें खरीद की लिमिट नहीं होगी। जिन उपजों को लेकर यह प्रस्ताव दिया दया है उनमें उड़द दाल, मसूर दाल और मक्का-कपास आदि शामिल हैं।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने बातचीत को बताया सकारात्मक
केंद्र सरकार और किसानों के बीच रविवार को बातचीत हुई थी। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने इस बैठक को सकारात्मक बताया। उन्होंने कहा कि नए विचारों और सुझावों के साथ हमने भारतीय किसान मजदूर संघ और अन्य किसान नेताओं के साथ सकारात्मक चर्चा की। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने किसानों के सामने फसलों के विविधीकरण का प्रस्ताव रखा जिसके तहत अलग-अलग फसलें उगाने पर बिन किसी लिमिट के उन्हें एमएसपी पर खरीदा जाएगा।
Chandigarh | Union Minister Piyush Goyal says, "During the meeting, the farmers stressed the need for crop diversification amid the depleting water table." pic.twitter.com/GCOA6LbkKG
वह बोले– “नेशनल कोऑपरेटिव कंज़्यूमर्स फ़ेडरेशन (एनसीसीएफ़) और नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फे़डरेशन ऑफ़ इंडिया (नेफ़ेड) जैसी कोऑपरेटिव सोसाइटियाँ उन किसानों के साथ समझौता करेंगी, जो तूर, उड़द, मसूर दाल या मक्का उगाएँगे और फिर उनसे अगले पाँच साल तक एमएसपी पर फसलें खरीदी जाएँगी। वहीं कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया के माध्यम से किसानों से 5 साल तक एमएसपी पर कपास की खरीद की जाएगी। इन खरीद की कोई सीमा नहीं होगी और इन सबके लिए एक पोर्टल तैयार किया जाएगा।”
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार के इस प्रस्वताव से भूमिगत जलस्तर में सुधार होगा और पहले से खराब हो रही जमीन को बंजर होने से रोका जा सकेगा।
#WATCH | Chandigarh: On meeting farmer leaders in connection with the ongoing protest, Union Minister Piyush Goyal says, "With new ideas and thoughts, we had a positive discussion with Bhartiya Kisan Mazdoor Union and other farmer leaders...We had a detailed discussion on how to… pic.twitter.com/IagjCEYsED
Dear @PiyushGoyal ji, please resist yielding to the unreasonable demands of those opposed to our nation's interests. Succumbing only paves the way for anarchy. It's concerning that a handful of individuals with a few trucks can blockade roads to achieve their goals, while the…
इस बैठक में किसानों के 14 प्रतिनिधि और केंद्र सरकार के किसान कल्याण मंत्री अर्जुन मुंडा, वाणिज्य मंत्री पियूष गोयल और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय शामिल हुए थे। इनके अलावा इस बैठक पंजाब के मुख्य मंत्री भगवंत मान भी मौजूद थे। किसान नेताओं ने सरकार के इस प्रस्वात के ऊपर कहा कि वह इस प्रस्ताव पर विचार करेंगे। उनका यह भी कहना है कि अभी सिर्फ एमएसपी के मुद्दे पर चर्चा हुई है। बाकी माँगे नहीं मानी गई हई हैं।
किसान नेताओं का कहना है कि वो अपने मंचों पर सरकार के प्रस्ताव पर अगले दो दिन तक चर्चा करेंगे और उसके बाद भविष्य की रणनीति तय होगी। किसान नेता सरवन सिंह पंढेर ने कहा, “हम 19-20 फ़रवरी तक इस मामले पर अलग-अलग मंचों पर चर्चा करेंगे और विशेषज्ञों की राय लेंगे। उसके बाद ही इस मामले पर कोई फैसला लिया जाएगा।” किसानों का कहना है कि अगर इन दो दिनों में प्रस्ताव पर सहमति नहीं बनी तो 21 फरवरी दिल्ली कूच करेंगे।
पंजाब सीएम भी थे बैठक में शामिल
इस बैठक में पंजाब सीएम भगवंत सिंह मान ने भी किसानों के हितों की रक्षा के लिए फसलों के लिए एमएसपी को कानूनी रूप देने की वकालत की। उन्होंने बैठक के दौरान मोजाम्बिक और कोलंबिया से दालों के आयात का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा यह आयात 2 अरब डॉलर से अधिक है, मान ने कहा कि अगर इस फसल के लिए एमएसपी दिया जाता है तो पंजाब दालों के उत्पादन में देश का नेतृत्व कर सकता है और यह दूसरी हरित क्रांति होगी।
किसानों के इस आंदोलन में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करवाने की माँग, किसानों को पेंशन सुनिश्चित करने की माँग और उनकी कर्जमाफी और पिछले किसान आंदोलन के समय जो हिंसा में केस किसानों पर दर्ज हुए थे उन सबको रद्द करने की माँग थी। किसान नेताओं का कहना है कि सरकार अभी सिर्फ एमएसपी पर ही प्रस्ताव लाई है। वो विचार करके बताएँगे अब आगे क्या होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (फरवरी 8, 2021) को संसद के उच्च सदन राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के तहत हुई चर्चा का जवाब दिया। इस दौरान किसान आंदोलन की आड़ में हो रही राजनीति को लेकर उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधा।
उन्होंने सलाह दी कि जो मूलभूत बात है, अच्छा होता कि उस पर भी चर्चा होती। उन्होंने पूछा कि खेती की मूलभूत समस्या क्या है, उसकी जड़ कहाँ है? उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को याद करते हुए कहा कि वो छोटे किसानों की दयनीय स्थिति पर हमेशा चिंता करते थे। पीएम मोदी ने सवाल दागा कि पहले की सरकारों की सोच में छोटा किसान था क्या? जब हम चुनाव आते ही एक कार्यक्रम करते हैं कर्जमाफी, ये वोट का कार्यक्रम है या कर्जमाफी का… ये हिन्दुस्तान का नागरिक भलीभाँति जानता है।
उन्होंने ये भी ध्यान दिलाया कि जब कर्जमाफी की जाती है, तो छोटा किसान उससे वंचित रहता है, उसके नसीब में कुछ नहीं आता है। पहले की फसल बीमा योजना भी छोटे किसानों को नसीब ही नहीं होती थी। यूरिया के लिए भी छोटे किसानों को रात-रात भर लाइन में खड़े रहना पड़ता था, उस पर डंडे चलते थे। अपनी सरकार की उपलब्धि गिनाते हुए उन्होंने कहा कि पीएम किसान सम्मान निधि योजना से सीधे किसान के खाते में मदद पहुँच रही है। 10 करोड़ ऐसे किसान परिवार हैं, जिनको इसका लाभ मिल गया।
MSP है, था और रहेगा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी को मिल कर चलने की सलाह दी और निमंत्रण दिया कि हम देश को आगे बढ़ाने के लिए, कृषि क्षेत्र के विकास के लिए, आंदोलनकारियों को समझाते हुए, हमें देश को आगे ले जाना होगा। उन्होंने कहा कि हमें एक बार देखना चाहिए कि कृषि परिवर्तन से बदलाव होता है कि नहीं। कोई कमी हो तो उसे ठीक करेंगे, कोई ढिलाई हो तो उसे कसेंगे। साथ ही विश्वास दिलाया कि मंडियाँ और अधिक आधुनिक बनेंगी। उन्होंने कहा, “एमएसपी है, एसएसपी था और एमएसपी रहेगा।”
आन्दोलनजीवियों का आगाज
मोदी ने कहा कि हमने बुद्धिजीवी सुना था। लेकिन कुछ लोग आंदोलनजीवी बन गए हैं। देश में कुछ भी हो वे वहाँ पहुँच जाते हैं। कभी पर्दे के पीछे और कभी आगे, इनकी पूरी जमात है। ऐसे लोगों की पहचान कर हमें इनसे बचना होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पहले श्रमजीवी और बुद्धिजीवी हुआ करते थे। अब एक नया वर्ग जुड़ गया है- आंदोलनजीवी। ऐसे लोग खुद आंदोलन नहीं चला सकते हैं। लेकिन किसी का आंदोलन चल रहा है तो वहाँ पहुँच सकते हैं। ये आंदोलनकारी ही परजीवी हैं, जो हर जगह मिलते हैं।
इसमें दो राय नहीं कि तीन तलाक से लेकर किसान आंदोलन तक ये ही गिने-चुने ही नेता नज़र आते हैं। जेएनयू में टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ ये ही नेता और पार्टियां खड़ी नज़र आयी थी, सबसे शर्म की बात यह है कि एक तरफ इंदिरा गाँधी की हत्या पर वोट माँगा जाता है, लेकिन बेशर्मों की तरह किसान आंदोलन में लगे नारों "इंदिरा गाँधी को ठोका, मोदी तेरे को भी...." का किसी ने भी विरोध नहीं की किया, क्यों?
प्रधानमंत्री के ‘आंदोलनजीवी’ शब्द का इस्तेमाल करने के बाद सोशल मीडिया में मीम्स की बौछार हो गई है। यूजर्स कुछ लोगों की ‘विशेषता’ को ध्यान में रखते हुए बता रहे हैं कि वे कौन सा जीवी हैं।
एक सोशल मीडिया यूजर ने सीएए-एनआरसी के खिलाफ शाहीन बाग में हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल बिल्किस बानो (दादी) की तस्वीर शेयर करते हुए उन्हें ‘बिरयानीजीवी’ बताया है।
इसी कड़ी में राणा अयूब और आरफा खानम शेरवानी को ‘फोटोशॉपजीवी’ नाम दिया गया है।
इसके अलावा ट्वीटों पर लोगों की प्रक्रियाएं :-
😀 "Bade pariwaar me phoopaji naraaz toh hote hi hain" PM Modi in Lok Sabha when speaking about some politicians who actually agree with the farm laws but have to oppose it in some manner or the other because well they are in the opposition. pic.twitter.com/7QkMg1uoa4
2022 में होने वाले पंजाब विधान सभा चुनावों में अपनी-अपनी राजनीती चमकाने में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अकाली ने मिलकर जो तथाकथित किसान आंदोलन शुरू किया, उसकी परतें बहुत जल्दी खुलने के कारण इसे किसान आंदोलन की बजाए तथाकथित कहा जाने लगा। विचारणीय बात यह है कि जिस तरह चीन के वुहान से विश्व में कोरोना फैला, लेकिन शेष चीन कोरोना से अछूता है, उसी भांति पंजाब से शुरू हुआ आंदोलन दिल्लीवासियों के लिए नयी समस्याएं खड़ी कर, पंजाब प्रभावहीन हैं।
दूसरे, कहते हैं कि पंजाब के किसान MSP के विरोध में दिल्ली आए हैं, परन्तु पार्टियों और किसान यूनियन के मैनिफेस्टो का अवलोकन करने पर इसी मुद्दे को लागु कर बिचौलियों को हटाने की बात कही है, और आज जब सरकार ने उसी बात को लागु कर दिया है, फिर किस आधार पर ये प्रदर्शन हो रहा है? यह इस बात को प्रमाणित कर रहा है कि चाहे किसान यूनियन हो या राजनितिक पार्टियां इनका उद्देश्य केवल एक ही है, "जनता को पागल बनाओ और अपनी तिजोरियों को भरते रहो।" घोषणा पत्रों में झूठे वायदे करते रहो, बीच-बीच में मुद्दे उछाल जनता को पागल बनाते रहो, क्योंकि जनता है ही पागल बनने के लिए। जैसाकि पिछले लेखों में कहा है कि इस तरह के प्रदर्शन से कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अकाली दल ने थाली में सजाकर पंजाब की सत्ता भाजपा को सौंपने का काम कर दिया है।
प्रमाण देखिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिबल किस समस्या पर बोल रहे हैं और सड़क पर वही कांग्रेस विरोध कर रही है:-
इन्हीं दोगली नीतियों के कारण सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो आना स्वाभाविक है, हालाँकि मै इसका समर्थन नहीं करता, लेकिन इन दोगलापन कर पार्टियों का दोगलापन उजागर करना जरुरी भी है।
पंजाब में होने वाले चुनावों में तीनों पार्टियां-कांग्रेस, आप और अकाली दल- जनता को जवाब देने के लिए तैयार रहे। सोशल मीडिया के माध्यम से इन तीनो के मेनिफेस्टों में इन बातों का सार्वजनिक करना चाहिए। फिर जो कांग्रेस जिस इंदिरा गाँधी की हत्या को हर चुनाव में भुनाने का प्रयास करती है उसे यह भी बताना होगा कि किसान आंदोलन में इंदिरा की हत्या का गुणगान करने वालों के साथ खड़ी रही, क्यों नहीं इंदिरा की हत्या के गुणगान का विरोध किया गया? दूसरे, जो अरविन्द केजरीवाल कोरोना के चलते छठ पर घाटों पर पूजा पर प्रतिबन्ध लगते हैं, वही किस आधार पर दिल्ली में आंदोलनकारियों के लिए रसोई आदि की व्यवस्था कर समर्थन कर रहे हो, क्या यह दोगलापन नहीं? कहाँ गया अब कोरोना? फिर कहेंगे "जी, बाहर के लोग हॉस्पिटल में आ गए और मुफ्त में इलाज करवाकर भाग गए।" नए कृषि कानून वापस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी देने के लिए किसान आंदोलन कर रहे हैं। इसी बीच एमएसपी पर धान की खरीद जारी है। मोदी सरकार ने मंगलवार को कहा कि उसने चालू खरीफ विपणन सत्र के दौरान एमएसपी पर अब तक 60 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर 318 लाख टन धान की खरीद की है। यह पिछले साल की तुलना में 19 प्रतिशत अधिक है।
पंजाब से ही 63.76 प्रतिशत खरीद
सबसे दिलचस्प बात यह है कि किसान आंदोलन की अगुवाई पंजाब के किसान कर रहे हैं, जबकि एमएसपी के तहत सबसे अधिक खरीदारी पंजाब से हुई है। सरकार ने इस सत्र में 30 नवंबर तक 318 लाख टन धान की खरीद की है, जिसमें पंजाब ने अकेले 202.77 लाख टन का योगदान दिया है, जो कुल खरीद का 63.76 प्रतिशत है।
पंजाब में शुरुआती 13 दिनों में 9 गुना अधिक धान की खरीद
केंद्रीय खाद्य मंत्रालय के मुताबिक खरीफ मौसम की खरीद इस बार पंजाब और हरियाणा में 26 सितंबर से शुरू कर दी गई थी। मंडियों में फसल जल्दी आने के कारण यह जल्दी शुरू हो गई, जबकि अन्य राज्यों में यह खरीद एक अक्टूबर से शुरू हुई। खरीद के शुरुआती 13 दिनों के भीतर पंजाब में पिछले साल की तुलना में एमएसपी पर नौ गुना अधिक 15.99 टन की खरीद की गई। पिछले साल इसी अवधि में 1.76 लाख टन की खरीद हुई थी।
पिछले साल की तुलना में 18.58 प्रतिशत अधिक खरीद
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक यह पिछले साल की समान अवधि में 268.15 लाख टन की खरीदारी गई थी, जबकि इस साल 18.58 प्रतिशत अधिक खरीद की गई है। बयान में कहा गया कि लगभग 29.70 लाख किसानों को पहले से ही 60,038.68 करोड़ रुपये के एमएसपी मूल्य के साथ चल रहे खरीफ विपणन सत्र के खरीद कार्यों से लाभान्वित किया गया है।
सरकार का दावा एमएसपी पर जारी रहेगी खरीदारी
सरकार ने कहा कि चालू खरीफ विपणन सत्र में मौजूदा योजनाओं के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीफ फसलों की खरीद जारी रहेगी। एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, उत्तराखंड, तमिलनाडु, चंडीगढ़, जम्मू और कश्मीर, केरल, गुजरात, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र में धान की खरीद सुचारू रूप से जारी है।
मांगों पर अड़े आंदोलनकारी किसान
पिछले करीब एक हफ्ते से दिल्ली की सीमाओं पर हजारों की संख्या में किसान जुटे हुए हैं। केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच बीते दिन जो बातचीत हुई, उसमें कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। मंगलवार को दोपहर 3 बजे शुरू हुई ये बैठक करीब 7 बजे खत्म हुई। इस वजह से किसानों ने कहा है कि उनका आंदोलन तबतक जारी रहेगा, जबतक कि ये कानून वापस नहीं हो जाते हैं।
आंदोलनकारियों को समझाने के प्रयास जारी
केंद्र सरकार के मंत्री लगातार किसानों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन किसान अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। किसान नेता चंदा सिंह ने कहा कि कृषि कानूनों के खिलाफ हमारा आंदोलन जारी रहेगा। हम सरकार से कुछ तो जरूर वापस लेंगे, चाहे वो बुलेट हो या शांतिपूर्ण समाधान। अब सरकार और किसानों के बीच अगली बैठक 3 दिसंबर को होगी।
अवसरवादी राजनीति कांग्रेस की पहचान बन चुकी है। स्वामीनाथान आयोग की रिपोर्ट को लागू करना हो या एमएसपी को कानूनी रूप देना, कांग्रेस ने हमेशा किसानों के साथ छल किया। लेकिन सत्ता से बेदखल होते ही उसे स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट और एमएसपी की याद आने लगी है। किसान आंदोलन के बीच कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल भी सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। हालांकि कांग्रेस के इस अवसरवादी राजनीति पर उसके ही पूर्व प्रवक्ता संजय झा ने करारा हमला बोला है।
कांग्रेस में आंतरिक चुनाव और गैर गांधी अध्यक्ष की मांग को लेकर पार्टी से निष्कासित किए गए पूर्व प्रवक्ता संजय झा ने एक बार फिर कांग्रेस को घेरते हुए किसान बिल पर ‘अवसरवादी राजनीति’ से बचाने की सलाह दी है। उन्होंने बुधवार को ट्वीट करते हुए लिखा कि किसान बिल पर कांग्रेस ने अवसरवादी राजनीति के साथ एक भयानक गलती कर रही है। हमने 2019 के चुनाव घोषणापत्र में किए गए अपने वादे पर पानी फेर दिया है। यह अप्रत्याशित है और अगर हम डील-ब्रेकर हैं तो हमने खुद एमएसपी को लेकर कानून क्यों नहीं बनाया?
The Congress is making an awful mistake with opportunistic politics on Farm Bills.
We have reversed our promise made in the Election Manifesto of 2019. That is unprincipled.
And why didn’t we make MSP into a law ourselves earlier if that is a deal-breaker?
Folks, in our Congress Manifesto for 2019 Lok Sabha elections, we had ourselves proposed abolition of APMC Act and making agricultural produce free from restrictions. This is what Modi government has done in the farmers bills. BJP and Congress are on the same page here.
इससे पहले 18 सितंबर, 2020 को भी संजय झा ने ट्वीट कर कांग्रेस पर हमला बोला था। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा था, ‘साल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने भी अपने घोषणापत्र में एपीएमसी अधिनियम को खत्म करने और कृषि उत्पादों को प्रतिबंधों से मुक्त करने की बात कही थी।’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने जो वादा अपने घोषणापत्र में किया था, वही मोदी सरकार ने पूरा किया है।
कांग्रेस की कार्यशैली पर संजय झा पहले भी प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं:-
सही कह रहे हो झा जी, कांग्रेस जैसी घटिया, गिरी हुई पार्टी दुनियां में कहीं नहीं मिल सकती, इन्हें केवल विरोध करने के लिए विरोध करना है। जिस काम को करने का वादा इन्होंने अपने घोषणापत्र में किया था अब काम हो रहा है तो भी यह उसका विरोध कर रहे हैं। pic.twitter.com/h5UV8AH7O5
MSP is decided by CACP. That has not been scrapped. It is not even related to all the crops. Why should it be mentioned in the bills? It is a separate mechanism.
सही कह रहे हो झा जी, कांग्रेस जैसी घटिया, गिरी हुई पार्टी दुनियां में कहीं नहीं मिल सकती, इन्हें केवल विरोध करने के लिए विरोध करना है। जिस काम को करने का वादा इन्होंने अपने घोषणापत्र में किया था अब काम हो रहा है तो भी यह उसका विरोध कर रहे हैं।
कांग्रेस ने किसान संगठनों के साथ केंद्र की मोदी सरकार की बातचीत से पहले मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से आग्रह किया कि वह कृषि से संबंधित तीनों ‘काले कानूनों’ को निलंबित करने और प्रदर्शनकारी किसानों पर दर्ज मामले वापस लेने की घोषणा करें। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने यह भी कहा कि सरकार को सभी किसान संगठनों के साथ मन खोलकर बातचीत करना चाहिए और बिना किसी दिखावे और पूर्वाग्रह के मामले का समाधान निकालना चाहिए।
कांग्रेस राज में पुलिस फायरिंग से मरता किसान
अक्टूबर 1988 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में किसानों के आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में 5 किसानों की जान गई थी. तब कांग्रेस के एनडी तिवारी मुख्यमंत्री थे।
मध्य प्रदेश में 19 साल पहले दिग्विजय सिंह राज में पुलिस की गोलियों से मारे गए थे 24 किसान। 12 जनवरी 1998 को मुलताई तहसील के सामने किसानों पर गोली चलाई गई. जिसमें दो दर्जन के लगभग लोग मारे गए थे।
मार्च 2007 में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस फायरिंग हुई थी, जिसमें 14 किसानों की मौत हो गई थी। उस वक्त लेफ्ट के बुद्धदेब भट्टाचार्य सीएम थे।
अगस्त 2010 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के टप्पल में किसानों के प्रदर्शन पर फायरिंग हुई थी, जिसमें तीन किसानों की मौत हुई थी। इसके बाद मई 2011 में भी गौतमबुद्धनगर के भट्टा पारसौल गांव में किसानों के प्रदर्शन पर पुलिस फायरिंग हुई थी, जिसमें 2 किसानों की जान गई थी. दोनों ही घटनाओं के वक्त यूपी की मुख्यमंत्री मायावती थी।
2012 में महाराष्ट्र के सांगली में गन्ना किसानों के आंदोलन पर भी गोली चली थी, जिसमें एक किसान की मौत हुई थी। उस वक्त महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी और पृथ्वीराज चव्हाण सीएम थे।
प्रतीकात्मक कहते हैं 'हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या' यानि दिल्ली और पंजाब में जिन नए कृषि कानूनों को लेकर कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अकाली दल अराजकता फैला रहे हैं, वहीं गैर-भाजपाई राज्य महाराष्ट्र में किसान उन्हीं कानून की मदद से करोड़ों कमा रहे हैं। जो इस बात को प्रमाणित करता है कि मोदी विरोधियों के पास विरोध करने लायक कोई मुद्दा ही नहीं, इसलिए 'कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा' कर जनता को भ्रमित कर अराजकता का माहौल बना रहे हैं।
हैरानी प्रदर्शन में उठ रहे मुद्दों को लेकर हो रही है। जैसे: 'इंदिरा को ठोका, अब मोदी को भी ठोकेंगे', 'भिंडरावाला का फोटो', 'खालिस्तान का मुद्दा', 'जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को बहाल करने' आदि चीख-चीखकर प्रदर्शन को नौटंकी एवं मदारी का तमाशा बता रहे है कि "दर्द सिर में है, दवाई किसी अन्य बीमारी की मांगी जा रही है'। अब कोई इनसे पूछे कि इन मुद्दे का कृषि कानूनों से क्या मतलब? इस नौटंकी का एक और प्रमाण देखिए, ट्विटर पर संजय सिंह और राघव चड्डा जैसे आप के नेता बिल के विरोध में ट्वीट कर रहे हैं, विधायक अमानतुल्लाह प्रदर्शनकारी से मुलाकात कर रहे हैं, इतना ही नहीं मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल किसानों से बातचीत करने का ट्वीट कर रहे हैं, दूसरी ओर दिल्ली में कानून को लागु भी कर रहे हैं अब इन नौटंकीकारों से पूछो "दिल्ली में लागु किसने किया, मोदी ने या केजरीवाल ने"? यानि चोर अपने कदमों के निशान खुद ही छोड़ रहा है, दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि अराजक आंदोलनकारी आंदोलन के प्रायोजित होने के प्रमाण स्वयं ही दे रहे हैं। जबकि विरोध करने के लिए मुद्दे एक नहीं बहुत हैं, लेकिन दिमाग से काम लें, तभी तो उनको उजागर कर विरोध कर पाएंगे। परन्तु जब कोई स्वयं ही अर्थ का अनर्थ कर अपना नुकसान करने में व्यस्त हो, किसी दूसरे को क्यों दोष दिया जाए। यही कारण है कि लोग इस प्रदर्शन की मंशा पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं।
हकीकत में विपक्ष में इतना भी साहस नहीं कि उन ज्वलंत मुद्दों पर जनता का ध्यान दिला सकें। सरकार के विरुद्ध माहौल बनाएं। परन्तु ऐसा करने में असफल इसलिए हो रहे हैं कि ये लोग स्वयं उसमे लिप्त है। ऊपर से लेकर नीचे तक डूबे हुए हैं। उदाहरणार्थ : भ्रष्टाचार, निर्वाचित सदस्यों को मिलने वाली पेंशन, मुफ्त की सुविधाएं आदि अनेको मुद्दे हैं, यदि इनका समाधान होने से सरकार को हर महीने करोड़ों की बचत होने से केवल महंगाई ही कम नहीं होगी, बल्कि सरकारी खजाने भरे रहेंगे, कई टैक्स भी कम होने की सम्भावना हो सकती है। देश खुशहाल होगा, विकास देखने योग्य होगा। लेकिन लूट के ये धंधे भी इन्हीं मोदी विरोधियों के शुरू किये हुए हैं।
पंजाब और हरियाणा के ‘किसान’ दिल्ली और उसके आस-पास विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, मार्ग अवरुद्ध कर रहे हैं। इस बीच महाराष्ट्र के किसानों ने सितंबर 2020 में केंद्र सरकार द्वारा पारित किए गए कृषि बिल का लाभ लेना शुरू कर दिया है।
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सोयाबीन किसान कृषि बिलों के पारित होने के बाद एपीएमसी सौदों से अधिक प्राप्त करने में सफल रहे हैं। महाराष्ट्र में किसान उत्पादक कंपनियों (FPCs) की अम्ब्रेला संस्था MahaFPC के अनुसार, चार जिलों में FPCs ने तीन महीने पहले पारित हुए कानूनों के बाद मंडियों के बाहर व्यापार से लगभग 10 करोड़ रुपए कमाए हैं।
फार्म बिल APMCs के भयानक शक्तियों को रोकता है
कृषि कानूनों को पारित किए जाने से पहले, APMCs के विनियमित क्षेत्रों में किए गए व्यापार पर सहकारी समितियों ने APMCs को विनियमित किया था और इस तरह के लेनदेन पर मार्केट कर और अन्य करों को लगाया गया था। हालाँकि, किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020, ऐसे विनियमों को हटाने के लिए APMCs की शक्ति को खत्म कर देता है।
पिछले 3 महीनों में, एफपीसी ने अपने किसानों से सीधे खरीद के लिए खाद्य तेल विलायक, अर्क और पशु चारा निर्माताओं से व्यापार में वृद्धि को पंजीकृत किया है। इस प्रत्यक्ष लेन-देन ने परिवहन पर कम खर्च करके बढ़ी हुई बचत के मामले में किसानों की मदद की है। दूसरी ओर, कंपनियों ने मंडी कर का भुगतान नहीं करने का दावा किया है।
इस लेख के अनुसार, मराठवाड़ा के सबसे अधिक 19 एफपीसी में से 2693.58 टन कंपनियों के साथ मंडी व्यापार दर्ज किया गया है। इन 19 एफपीसी में से, लातूर से 13 ने 2165.863 टन की आपूर्ति की है। इसी तरह उस्मानाबाद के चार एफपीसी ने 412.327 टन की आपूर्ति की है। हिंगोली और नांदेड़ में एफपीसी ने क्रमश: 96.618 टन और 18.78 टन तिलहन की आपूर्ति निजी कंपनियों को की है।
नए कानून से कई लाभ, परिवहन लागत में बचत, वजन की कोई समस्या नहीं
नए कृषि कानून से लाभान्वित होने वाले किसानों में से एक ने कहा कि नए बिलों ने न केवल परिवहन लागत बचाने में किसानों की मदद की, बल्कि वजन का भी मुद्दा नहीं था। हालाँकि, उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित किए जाने के बाद बाजार की दर गिर जाने से कंपनियों ने खरीद बंद कर दी है।
किसानों ने दावा किया कि नए बिलों में कुछ भी विवादास्पद नहीं था, लेकिन उन्होंने सरकार को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी कि गैर-एमएसपी खरीद मंडी के बाहर न हो। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करना चाहिए।
महाएफपीसी के प्रबंध निदेशक, योगेश थोराट ने व्यवस्था को समाप्त करते हुए कहा कि वर्तमान संरचना किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए रास्ते खोलती है और उन्हें “बेचने के लिए विकल्प” प्रदान करती है। किसानों के विरोध प्रदर्शन से उत्पन्न होने वाली आशंकाओं को खारिज करते हुए, थोराट ने कहा कि उन्होंने किसानों और कॉर्पोरेटों को एक-दूसरे के लिए प्रतिबद्धताओं का सम्मान करते हुए देखा है।
पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा विरोध प्रदर्शन
इसके विपरीत, पंजाब और हरियाणा के हजारों किसानों ने मोदी सरकार द्वारा कथित-किसान विरोधी ’कानूनों को पारित करने के विरोध में राष्ट्रीय राजधानी की ओर कूच किया। राष्ट्रीय राजधानी को जाने वाली मुख्य मार्ग को किसानों ने अवरुद्ध कर दिया है। उन्होंने सरकार को बातचीत के लिए मजबूर करने के लिए राजमार्गों के किनारे विशाल शिविर लगाए हैं। किसान एमएसपी के मोर्चे पर गारंटी की माँग कर रहे हैं। उनमें से कई अपनी माँगों को लेकर काफी अधिक कट्टरपंथी दिख रहे हैं, जिन्होंने सरकार से तीनों कृषि बिलों को पूरी तरह से रद्द करने के लिए कहा है। इसमें खालिस्तानन समर्थक और कॉन्ग्रेस के लिंक भी सामने आ रहे हैं।
केंद्र की मोदी सरकार द्वारा पास किए गए कृषि कानूनों को लेकर तरह-तरह की अफवाह फैलाई जा रही हैं और इसी के सहारे हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है। पहले कॉन्ग्रेस सरीखी राजनीतिक पार्टियों ने किसानों को भड़का कर उन्हें सड़क पर उतारा और फिर इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों से लेकर खालिस्तानी तत्व तक इस प्रदर्शन में जुड़ गए। अब पंजाब के किसान हरियाणा होकर दिल्ली पहुँच रहे हैं, जहाँ जम कर अराजकता फैलाई जा रही है।
केंद्र की मोदी सरकार ने संसद के दोनों सदनों में ‘कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम 2020’ और ‘कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020’ को एक्ट का रूप दिया। पहला अधिनियम किसानों को अपने उत्पाद को बेचने के लिए अधिक विकल्प मुहैया कराता है। खरीददारों के बीच बढ़ी प्रतिस्पर्धा से अंतरराज्यीय व्यापार को बढ़ावा मिलता है।
जहाँ इस अधिनियम के बारे में तरह-तरह के अफवाह फैलाए जा रहे हैं, इसकी खूबियों के बारे में स्पष्ट करना ज़रूरी है। सबसे पहले तो बता दें कि इसके तहत किसानों और व्यापारियों के बीच एक बड़ा तंत्र तैयार होता है। इससे मंडी के बाहर बाधामुक्त तरीके से अपने उत्पाद बेचने की सहूलियत किसानों को मिलती है। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक व्यापार के लिए भी एक नेटवर्क तैयार होता है। फिर भी अफवाह फैलाए जा रहे हैं।
एक अफवाह ये है कि इससे राज्यों के APMC (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्किट कमिटी) की शक्ति कम हो जाएगी, या फिर वो निष्प्रभावी हो जाएँगे। जबकि, ऐसा नहीं है। इस बिल का उद्देश्य राज्यों की APMC को निष्प्रभावी करना है ही नहीं। ये किसानों को मौजूदा APMC का अतिरिक्त विपणन चैनल प्रदान करेगा। APMC अपने प्रचलन की दक्षता में और सुधार करें, इसके लिए ये क़ानून उन्हें प्रोत्साहित करेगा।
इसके अलावा एक अन्य अफवाह बार-बार फैलाई जा रही है कि इससे किसानों के उत्पाद पर मिलने वाला ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)’ ख़त्म हो जाएगा, जिसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बार-बार सफाई दे चुके हैं। असली बात तो ये है कि MSP पर खरीद सरकार की प्राथमिकता बनी रहेगी और इसकी नीति अथवा प्रक्रिया से इस कानून का कुछ भी लेना-देना है ही नहीं। राज्य एजेंसियों के माध्यम से MSP पर खरीद जारी रहेगी।
किसानों को इलेक्ट्रॉनिक व्यापार प्लेटफॉर्म पर किसी भी प्रकार की लेवी, उपकर या मंडी शुल्क नहीं लिया जाएगा। लेन-देन में पारदर्शिता आएगी। किसानों को भुगतान उसी दिन, अथवा 3 दिनों के भीतर हो जाएगा। ये अधिनियम व्यापार क्षेत्र में राज्य या केंद्र के किसी भी कानून से ऊपर नहीं होगा। किसानों के विवाद के निपटारे के लिए भी तंत्र बनाया गया है। उप मंडल अधिकारी ये उसके द्वारा गठित की गई समिति को ये अधिकार दिया गया है।
एक अन्य अफवाह ये है कि इससे व्यापारियों के हाथों में सब कुछ आ जाएगा, जबकि किसानों के पास कुछ भी नहीं रहेगा। ये गलत है, क्योंकि इस कानून में व्यापारियों द्वारा नियमों का उल्लंघन करने पर सज़ा का भी प्रावधान है। 25,000 रुपए से लेकर 5 लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। जिसके पास इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म का नियंत्रण है, उसके द्वारा गड़बड़ी की जाने पर इससे दोगुने जुर्माने का प्रावधान है।
नए कृषि कानूनों को लेकर सुनिए केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को (वीडियो साभार: DD News)
जहाँ भी उपज की मूल्य में उतार-चढ़ाव की संभावना है, वहाँ MSP तय किया जाएगा। एक बार उत्पाद बेच दिए जाने के बाद किसी भी प्रकार की जोखिम के लिए खरीददार ही जिम्मेदार होगा, किसान नहीं। फसल की कटाई से पहले बेचे जाने के बावजूद स्वामित्व किसानों के पास बना रहेगा, और उपज की सुपुर्दगी के बाद किसान भुगतान प्राप्त करेगा। अगर प्रायोजक किसी स्थायी संरचना का निर्माण करता है तो उसका स्वामित्व किसानों के पास आ जाएगा। कुछ सवालों के जवाब देखिए:
अगर MSP बना रहेगा तो सरकार ने कृषि कानूनों में इसकी चर्चा क्यों नहीं की है? ऐसा इसीलिए, क्योंकि MSP हमेशा से एक शासकीय तंत्र का हिस्सा रहा है, न कि विधायिका का। इससे फायदा ये होता है कि जब भी ज़रूरत पड़े, इसे बढ़ाया जा सकता है। इससे किसानों को फायदा मिलेगा।
अगर लेनदेन प्राइवेट हो रहा है, फिर ये कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि MSP मेंटेन रखा गया है? प्राइवेट ट्रेड MSP की दरों से ज्यादा ही होगा। कोई भी किसान प्राइवेट प्लेयरों के पास तभी जाएँगे, जब उन्हें MSP से ज्यादा रुपए मिलेंगे।
क्या मोदी सरकार ने MSP को कमजोर कर दिया है? आँकड़े तो ऐसा बिलकुल नहीं कहते। 2009-14 में यूपीए-II के काल में 1.52 LMT दाल MSP पर खरीदे गए। वहीं 2014-19 की पहली मोदी सरकार ने 76.85 LMT दालों की खरीद की। अब आप खुद ही अंतर का अंदाज़ा लगा लीजिए।
किसानों को एक बार कॉन्ट्रैक्ट करने के बाद फँसा लिया जाएगा? फिर वो बाहर नहीं निकल पाएँगे? ये एक बेहूदा तर्क है क्योंकि इन कृषि कानूनों में किसानों को ये छूट दी गई है कि वो जब चाहें, उन्हें करार रद्द करने का अधिकार है। अगर उन्होंने एडवांस नहीं लिया है, तो उन्हें किसी भी प्रकार की पेनल्टी नहीं देनी है। अगर एडवांस लिया भी है तो उसे लौटा कर कॉन्ट्रैक्ट रद्द किया जा सकता है। इस पर किसी भी प्रकार का ब्याज नहीं लिया जाएगा।
किसानों की जमीन सुरक्षित नहीं रहेगी? उन्हें हड़प लिया जाएगा? ऐसा नहीं है, क्योंकि किसानों की जमीन को लीज पर देने का किसी अन्य प्रकार से इस्तेमाल करने पर प्रायोजकों को दंड भरना पड़ेगा। किसानों द्वारा तय की गई अवधि और किसानों द्वारा तय किए गए अनाज के लिए ही इसका इस्तेमाल उसी काम के लिए होगा, जिस कृषि कार्य के लिए करार हुआ है।
फिर पंजाब में ही ज्यादा विरोध क्यों हो रहा है? विपक्षी दल इतना बेचैन क्यों हैं? पंजाब की राजनीतिक पार्टियों की बेचैनी इस बात को लेकर है कि वहाँ अब तक इस तरह क्रय-विक्रय के कार्य में दलालों की बड़ी भूमिका थी, जिनका नेटवर्क काफी तगड़ा है। अब उन दलालों की छुट्टी होगी, जिससे ये दल बेचैन हैं।
और हाँ, ऐसा कुछ बहुत नया भी नहीं है, जो विवादित हो। क्योंकि, APMC के तहत पहले से ही ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ का चलन है और ये कई राज्यों में चल रहा है, इसीलिए इसमें कुछ भी विवादित नहीं। पंजाब-बंगाल में पेप्सिको और हरियाणा में SAB Miller इसके उदाहरण हैं। यूपीए ने भी ऐसे नियम ड्राफ्ट किए थे। जब अच्छी फसल के लिए खरीददार ही सारे संसाधन मुहैया कराएगा और क्षति का निर्वहन भी वही करेगा, तो किसानों को फायदा ही है न?
इसके अलावा एक विधेयक में, किसानों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था का प्रावधान है। भुगतान सुनिश्चित करने हेतु प्रावधान है कि देय भुगतान राशि के उल्लेख सहित डिलीवरी रसीद उसी दिन किसानों को दी जाएँ। मूल्य के संबंध में व्यापारियों के साथ बातचीत करने के लिए किसानों को सशक्त बनाने हेतु प्रावधान है कि केंद्र सरकार, किसी भी केंद्रीय संगठन के माध्यम से, किसानों की उपज के लिए मूल्य जानकारी और मंडी आसूचना प्रणाली विकसित करेगी।
मोदी सरकार के कृषि कानूनों को लेकर बिचौलियों का साम्राज्य तहस-नहस होने के डर से वो और उनके आका नाराज हैं और अफवाह फैला कर जनता को भड़का रहे हैं। इन कृषि कानूनों को लेकर फैलाई जा रही है अफवाह का जवाब कई बार पीएम मोदी ने भी दिया है। लेकिन, असलियत ये है कि किसानों को अपनी फसल के मनपसंद दाम मिल रहे हैं, वो भी अपने शर्तों पर। लेकिन, कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन के नाम पर अफवाह फैलाई जा रही है, हिंसा की जा रही है और मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार चल रहा है।