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किसान आंदोलन : MSP पर अब तक 60 हजार करोड़ रुपये की खरीद में सबसे अधिक पंजाब से 63.76 प्रतिशत धान की खरीदारी

2022 में होने वाले पंजाब विधान सभा चुनावों में अपनी-अपनी राजनीती चमकाने में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अकाली ने मिलकर जो तथाकथित किसान आंदोलन शुरू किया, उसकी परतें बहुत जल्दी खुलने के कारण इसे किसान आंदोलन की बजाए तथाकथित कहा जाने लगा। विचारणीय बात यह है कि जिस तरह चीन के वुहान से विश्व में कोरोना फैला, लेकिन शेष चीन कोरोना से अछूता है, उसी भांति पंजाब से शुरू हुआ आंदोलन दिल्लीवासियों के लिए नयी समस्याएं खड़ी कर, पंजाब प्रभावहीन हैं। 

दूसरे, कहते हैं कि पंजाब के किसान MSP के विरोध में दिल्ली आए हैं, परन्तु पार्टियों और किसान यूनियन के मैनिफेस्टो का अवलोकन करने पर इसी मुद्दे को लागु कर बिचौलियों को हटाने की बात कही है, और आज जब सरकार ने उसी बात को लागु कर दिया है, फिर किस आधार पर ये प्रदर्शन हो रहा है? यह इस बात को प्रमाणित कर रहा है कि चाहे किसान यूनियन हो या राजनितिक पार्टियां इनका उद्देश्य केवल एक ही है, "जनता को पागल बनाओ और अपनी तिजोरियों को भरते रहो।" घोषणा पत्रों में झूठे वायदे करते रहो, बीच-बीच में मुद्दे उछाल जनता को पागल बनाते रहो, क्योंकि जनता है ही पागल बनने के लिए। जैसाकि पिछले लेखों में कहा है कि इस तरह के प्रदर्शन से कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अकाली दल ने थाली में सजाकर पंजाब की सत्ता भाजपा को सौंपने का काम कर दिया है। 

प्रमाण देखिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिबल किस समस्या पर बोल रहे हैं और सड़क पर वही कांग्रेस विरोध कर रही है:-

 इन्हीं दोगली नीतियों के कारण सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो आना स्वाभाविक है, हालाँकि मै इसका समर्थन नहीं करता, लेकिन इन दोगलापन कर पार्टियों का दोगलापन उजागर करना जरुरी भी है। 

पंजाब में होने वाले चुनावों में तीनों पार्टियां-कांग्रेस, आप और अकाली दल- जनता को जवाब देने के लिए तैयार रहे। सोशल मीडिया के माध्यम से इन तीनो के मेनिफेस्टों में इन बातों का सार्वजनिक करना चाहिए। फिर जो कांग्रेस जिस इंदिरा गाँधी की हत्या को हर चुनाव में भुनाने का प्रयास करती है उसे यह भी बताना होगा कि किसान आंदोलन में इंदिरा की हत्या का गुणगान करने वालों के साथ खड़ी रही, क्यों नहीं इंदिरा की हत्या के गुणगान का विरोध किया गया? दूसरे, जो अरविन्द केजरीवाल कोरोना के चलते छठ पर घाटों पर पूजा पर प्रतिबन्ध लगते हैं, वही किस आधार पर दिल्ली में आंदोलनकारियों के लिए रसोई आदि की व्यवस्था कर समर्थन कर रहे हो, क्या यह दोगलापन नहीं? कहाँ गया अब कोरोना? फिर कहेंगे "जी, बाहर के लोग हॉस्पिटल में आ गए और मुफ्त में इलाज करवाकर भाग गए।"   
नए कृषि कानून वापस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी देने के लिए किसान आंदोलन कर रहे हैं। इसी बीच एमएसपी पर धान की खरीद जारी है। मोदी सरकार ने मंगलवार को कहा कि उसने चालू खरीफ विपणन सत्र के दौरान एमएसपी पर अब तक 60 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर 318 लाख टन धान की खरीद की है। यह पिछले साल की तुलना में 19 प्रतिशत अधिक है।

पंजाब से ही 63.76 प्रतिशत खरीद 

सबसे दिलचस्प बात यह है कि किसान आंदोलन की अगुवाई पंजाब के किसान कर रहे हैं, जबकि एमएसपी के तहत सबसे अधिक खरीदारी पंजाब से हुई है। सरकार ने इस सत्र में 30 नवंबर तक 318 लाख टन धान की खरीद की है, जिसमें पंजाब ने अकेले 202.77 लाख टन का योगदान दिया है, जो कुल खरीद का 63.76 प्रतिशत है।

पंजाब में शुरुआती 13 दिनों में 9 गुना अधिक धान की खरीद

केंद्रीय खाद्य मंत्रालय के मुताबिक खरीफ मौसम की खरीद इस बार पंजाब और हरियाणा में 26 सितंबर से शुरू कर दी गई थी। मंडियों में फसल जल्दी आने के कारण यह जल्दी शुरू हो गई, जबकि अन्य राज्यों में यह खरीद एक अक्टूबर से शुरू हुई। खरीद के शुरुआती 13 दिनों के भीतर पंजाब में पिछले साल की तुलना में एमएसपी पर नौ गुना अधिक 15.99 टन की खरीद की गई। पिछले साल इसी अवधि में 1.76 लाख टन की खरीद हुई थी।

पिछले साल की तुलना में 18.58 प्रतिशत अधिक खरीद

सरकार के आंकड़ों के मुताबिक यह पिछले साल की समान अवधि में 268.15 लाख टन की खरीदारी गई थी, जबकि इस साल 18.58 प्रतिशत अधिक खरीद की गई है। बयान में कहा गया कि लगभग 29.70 लाख किसानों को पहले से ही 60,038.68 करोड़ रुपये के एमएसपी मूल्य के साथ चल रहे खरीफ विपणन सत्र के खरीद कार्यों से लाभान्वित किया गया है।

सरकार का दावा एमएसपी पर जारी रहेगी खरीदारी

सरकार ने कहा कि चालू खरीफ विपणन सत्र में मौजूदा योजनाओं के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीफ फसलों की खरीद जारी रहेगी। एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, उत्तराखंड, तमिलनाडु, चंडीगढ़, जम्मू और कश्मीर, केरल, गुजरात, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र में धान की खरीद सुचारू रूप से जारी है।

मांगों पर अड़े आंदोलनकारी किसान

पिछले करीब एक हफ्ते से दिल्ली की सीमाओं पर हजारों की संख्या में किसान जुटे हुए हैं। केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच बीते दिन जो बातचीत हुई, उसमें कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। मंगलवार को दोपहर 3 बजे शुरू हुई ये बैठक करीब 7 बजे खत्म हुई। इस वजह से किसानों ने कहा है कि उनका आंदोलन तबतक जारी रहेगा, जबतक कि ये कानून वापस नहीं हो जाते हैं।

आंदोलनकारियों को समझाने के प्रयास जारी 

केंद्र सरकार के मंत्री लगातार किसानों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन किसान अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। किसान नेता चंदा सिंह ने कहा कि कृषि कानूनों के खिलाफ हमारा आंदोलन जारी रहेगा। हम सरकार से कुछ तो जरूर वापस लेंगे, चाहे वो बुलेट हो या शांतिपूर्ण समाधान। अब सरकार और किसानों के बीच अगली बैठक 3 दिसंबर को होगी।