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92 साल के जॉर्ज सोरोस को ‘बूढ़ा’ कहने पर संजय झा को क्यों लगी मिर्ची?

राष्ट्रवाद विरोधी अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस की आलोचना कांग्रेस  के पूर्व नेता संजय झा को रास नहीं आई। 92 साल के अरबपति को विदेश मंत्री एस जयशंकर द्वारा ‘बूढ़ा’ कहे जाने पर उन्होंने आपत्ति जताई। जयशंकर को टैग करते हुए ट्वीट कर कहा कि कहा कि किसी उम्रदराज व्यक्ति को बूढ़ा कहकर मजाक उड़ाने पर उनको शर्म आनी चाहिए। जवाब में नेटिजन्स ने झा के वे तमाम ट्वीट निकाल लिए जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘बूढ़ा’ कहा था।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जॉर्ज सोरोस की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई एक टिप्पणी के जवाब में यह बात कही थी। उन्होंने कहा था कि सोरोस बूढ़े, अमीर, जिद्दी, पूर्वाग्रही और खतरनाक हैं, जो कहानियाँ गढ़ने में माहिर हैं। वह न्यूयॉर्क में बैठकर अब भी यह सोचते हैं कि दुनिया उनके हिसाब से चले। दुनिया उनके विचारों के आधार पर काम करे।

इसको लेकर संजय झा ने ट्वीट करते हुए कहा है, “प्रिय श्री जयशंकर, किसी को ‘बूढ़ा’ कहकर मजाक उड़ाने के लिए आपको शर्म आनी चाहिए। यह उम्र का भेदभाव है। यह घृणित है। आपका प्रतिष्ठित कार्यालय कुछ शिष्टाचार और शालीनता के साथ चल सकता है। लेकिन एक ऐसे व्यक्ति से क्या उम्मीद की जा सकती है जो अपने बॉस के ‘अब की बार, ट्रम्प सरकार’ को सही ठहराता हो।”

संजय झा के इस ट्वीट को लेकर ‘द कश्मीर फाइल्स’ के निर्माता विवेक रंजन अग्निहोत्री ने ट्वीट कर कहा है, “संजय झा सुनिए, क्या बकवास करना आपकी फैक्ट्री डिफेक्ट है या राहुल जी ने आपको गिफ्ट किया है?” साथ ही उन्होंने संजय झा के तीन ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट ट्वीट किए हैं। इन ट्वीट में संजय झा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बूढ़ा कहते हुए उनका मजाक उड़ाया था।

इनमें से संजय झा ने एक ट्वीट में लिखा था, “मोदी बूढ़े, थके हुए दिख रहे हैं। बिलकुल बीजेपी की तरह। समय समाप्त हो चुका है।”

वहीं, एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा था, “मोदी जी… जासूसी, एह??? बुरी आदत, मिस्टर ओल्ड मैन बैचलर।”

एक अन्य ट्वीट में संजय झा ने कहा था, “17 सैनिक मारे गए, किसानों ने आत्महत्या की, दलितों/अल्पसंख्यकों के साथ बर्बरता हुई, अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई, लेकिन बूढ़ा अहंकारी बर्थडे बॉय फोटो खिंचवाने में बिजी है।”

संजय झा के इस ट्वीट को लेकर एक यूजर ने लिखा है, “शर्म करो संजय झा। जयशंकर आपके जैसे नहीं हैं। वह देशभक्त हैं।”

एक अन्य यूजर ने लिखा है, “संजय झा आपको शर्म आनी चाहिए। सब कुछ जानने के बाद भी आप इस प्रकार की भाषा बोल रहे हैं। आप बड़े हो गए हैं। लेकिन आपको अभी भी अपने तथाकथित नेता की तरह बड़े होने की जरूरत है।”

एक अन्य यूजर ने लिखा है, “संजय झा उम्रदराज और भ्रमित व्यक्ति हैं। उनकी याददाश्त बहुत कमजोर है। देखें कि उनकी बकबक कैसे रिकॉर्ड में है। उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया है फिर भी वह जोंक की तरह लटके हुए हैं।”

किसानों के साथ कांग्रेस ने हमेशा छल किया है -- संजय झा, कांग्रेस, पूर्व प्रवक्ता


अवसरवादी राजनीति कांग्रेस की पहचान बन चुकी है। स्वामीनाथान आयोग की रिपोर्ट को लागू करना हो या एमएसपी को कानूनी रूप देना, कांग्रेस ने हमेशा किसानों के साथ छल किया। लेकिन सत्ता से बेदखल होते ही उसे स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट और एमएसपी की याद आने लगी है। किसान आंदोलन के बीच कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल भी सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। हालांकि कांग्रेस के इस अवसरवादी राजनीति पर उसके ही पूर्व प्रवक्ता संजय झा ने करारा हमला बोला है।

कांग्रेस में आंतरिक चुनाव और गैर गांधी अध्यक्ष की मांग को लेकर पार्टी से निष्कासित किए गए पूर्व प्रवक्ता संजय झा ने एक बार फिर कांग्रेस को घेरते हुए किसान बिल पर ‘अवसरवादी राजनीति’ से बचाने की सलाह दी है। उन्होंने बुधवार को ट्वीट करते हुए लिखा कि किसान बिल पर कांग्रेस ने अवसरवादी राजनीति के साथ एक भयानक गलती कर रही है। हमने 2019 के चुनाव घोषणापत्र में किए गए अपने वादे पर पानी फेर दिया है। यह अप्रत्याशित है और अगर हम डील-ब्रेकर हैं तो हमने खुद एमएसपी को लेकर कानून क्यों नहीं बनाया?

इससे पहले 18 सितंबर, 2020 को भी संजय झा ने ट्वीट कर कांग्रेस पर हमला बोला था। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा था, ‘साल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने भी अपने घोषणापत्र में एपीएमसी अधिनियम को खत्म करने और कृषि उत्पादों को प्रतिबंधों से मुक्त करने की बात कही थी।’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने जो वादा अपने घोषणापत्र में किया था, वही मोदी सरकार ने पूरा किया है। 

कांग्रेस की कार्यशैली पर संजय झा पहले भी प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं:-

कांग्रेस ने किसान संगठनों के साथ केंद्र की मोदी सरकार की बातचीत से पहले मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से आग्रह किया कि वह कृषि से संबंधित तीनों ‘काले कानूनों’ को निलंबित करने और प्रदर्शनकारी किसानों पर दर्ज मामले वापस लेने की घोषणा करें। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने यह भी कहा कि सरकार को सभी किसान संगठनों के साथ मन खोलकर बातचीत करना चाहिए और बिना किसी दिखावे और पूर्वाग्रह के मामले का समाधान निकालना चाहिए।

कांग्रेस राज में पुलिस फायरिंग से मरता किसान

अक्टूबर 1988 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में किसानों के आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में 5 किसानों की जान गई थी. तब कांग्रेस के एनडी तिवारी मुख्यमंत्री थे। 

मध्य प्रदेश में 19 साल पहले दिग्विजय सिंह राज में पुलिस की गोलियों से मारे गए थे 24 किसान। 12 जनवरी 1998 को मुलताई तहसील के सामने किसानों पर गोली चलाई गई. जिसमें दो दर्जन के लगभग लोग मारे गए थे। 

मार्च 2007 में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस फायरिंग हुई थी, जिसमें 14 किसानों की मौत हो गई थी। उस वक्त लेफ्ट के बुद्धदेब भट्टाचार्य सीएम थे। 

अगस्त 2010 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के टप्पल में किसानों के प्रदर्शन पर फायरिंग हुई थी, जिसमें तीन किसानों की मौत हुई थी। इसके बाद मई 2011 में भी गौतमबुद्धनगर के भट्टा पारसौल गांव में किसानों के प्रदर्शन पर पुलिस फायरिंग हुई थी, जिसमें 2 किसानों की जान गई थी. दोनों ही घटनाओं के वक्त यूपी की मुख्यमंत्री मायावती थी। 

2012 में महाराष्ट्र के सांगली में गन्ना किसानों के आंदोलन पर भी गोली चली थी, जिसमें एक किसान की मौत हुई थी। उस वक्त महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी और पृथ्वीराज चव्हाण सीएम थे। 


‘100 नेताओं ने सोनिया गाँधी को लिखी चिट्ठी, नेतृत्व बदलने की माँग’: संजय झा

संजय झा और रणदीप सुरजेवाला
आर.बी.एल. निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कहते हैं, "साझे की हांड़ी चौराहे पर ही फूटती है", लेकिन परिवार समर्पित बन चुकी कांग्रेस की हांड़ी को चौराहा भी नसीब नहीं होने वाला। जिस कार्यकर्ता से लेकर वरिष्ठ नेता तक एक ही परिवार की गुलामी के आगे नत-मस्तक है, लगता है ये सभी वर्तमान समय के गुलाम हैं। इनके झूठ का पुलंदा तो 1971 इंडो-पाक युद्ध के दौरान देशभक्ति का खुल गया था। जैसाकि सर्वविदित है कि युद्ध के समय हर एयरलाइन को अपने-अपने पायलट को 24 घंटे ड्यूटी पर रहने का नियम है, लेकिन राजीव गाँधी इकलौता ऐसा पायलट था, जो विवाहित आनंद का सुख भोगने इटली गया हुआ था, परन्तु तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का बेटा होने के कोई कार्यवाही नहीं हुई। क्यों? क्या इसका नाम देशभक्ति है?
दूसरे, संजय झा "कहाँ चील के घोंसले में गोस्त" ढूंढने निकले हैं। पार्टी में परिवार गुलामी तो उस समय मुखर हो चुकी थी, जब पार्टी अध्यक्ष दलित सीताराम केसरी को दूध में से मक्खी की तरह बाहर फेंक दिया। बात यहीं नहीं ख़त्म होती, भूतपूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के निधन होने पर उनके शव तक को आखिरी दर्शन के लिए रखने के लिए पार्टी ऑफिस के दरवाजे तक नहीं खोले। फिर परिवार के अतिरिक्त किसी बाहरी व्यक्ति को अध्यक्ष न बनाये जाने से सिद्ध होता है कि कांग्रेस में लोकतंत्र के नाम पर बेवकूफ बनाया जा रहा है। 
पार्टी में परिवार के अतिरिक्त एक से बढ़कर एक प्रभावशाली नेता हुआ, परन्तु किसी को महत्व देने की बजाए कदम-कदम पर उनका अनादर ही होता रहा। परिवार गुलाम भलीभांति जानते हैं कि अब परिवार का कोई सदस्य भारतीय संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री तो क्या मंत्री भी नहीं बन सकता। और यह यूपीए के 10 वर्ष के कार्यकाल में सिद्ध भी हो गया। सोनिया गाँधी परदे के पीछे बैठ मनमोहन सिंह के नाम से राज करती रहीं, राहुल को किसी भी मंत्रालय का मंत्री तक नहीं बनाया गया। लेकिन जनता को मुंगेरी लाल के सपने दिखाने से कोई नहीं चूक रहा।   
लेकिन संजय झा ने एक बार कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति गरमा दी है। उन्होंने अगस्त 17, 2020 को ट्वीट कर दावा किया कि लगभग 100 कांग्रेस नेता (सांसद सहित) पार्टी के आंतरिक मामलों से परेशान हैं और इसे लेकर उन्होंने पार्टी हाईकमान को पत्र लिखा है।
झा को पार्टी ने पिछले दिनों निलंबित कर दिया था। अब इस ट्वीट के बाद पार्टी ने उनसे पूरी तरह पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हुए कहा है कि वे बीजेपी के इशारे पर ऐसा कर रहे हैं।
संजय झा ने अपने ट्वीट में दावा किया कि सोनिया गाँधी को लिखे पत्र में इन नेताओं ने राजनीतिक नेतृत्व बदलने की माँग की है। साथ ही कांग्रेस कार्यसमिति में पारदर्शी चुनावों की भी माँग की है।



इस ट्वीट के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। कांग्रेस ने उनके दावे को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी कोई चिट्ठी ने लिखी गई और न उन्हें मिली है।
कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, “गलत सूचना फैलाने वाले टीवी चैनलों को आज वॉट्सऐप पर निर्देश आ चुका है कि क्या करना है। आज उनको कांग्रेस नेताओं के ऐसे पत्र पर स्टोरी चलाने को कहा गया है, जो कभी लिखा ही नहीं गया है। ये फेसबुक से भाजपा के लिंक की खबरों से ध्यान हटाने की एक कोशिश है।”



पिछले दिनों संजय झा को कांग्रेस ने प्रवक्ता पद से हटा दिया था। गहलोत-पायलट के विवाद के बीच ट्वीट को लेकर उन्हें बाद में पार्टी से निलंबित कर दिया गया। महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने पार्टी के खिलाफ काम करने और अनुशासन तोड़ने को लेकर संजय झा के खिलाफ ये कार्रवाई की थी।
इससे पहले जून में एक लेख लिखने पर उन्हें प्रवक्ता पद से हटा दिया गया था। संजय झा ने कोरोना के दौरान कांग्रेस नेतृत्व की आलोचना करते हुए एक प्रमुख अखबार में एक लेख लिखा था और पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी की बात कही थी।

कार्यशैली पर सवाल खड़ा करने पर कांग्रेस ने संजय झा को प्रवक्ता पद से हटाया

In an interview to ThePrint, Congress national spokesperson Sanjay Jha hits out at his party for its ‘high command culture’ and for operating ‘only out of Delhi’. 
पार्टी की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करने पर संजय झा को कांग्रेस ने राष्ट्रीय प्रवक्ता पद से हटा दिया है। पार्टी की ओर से जारी बयान के अनुसार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने संजय झा को तत्काल प्रभाव से कांग्रेस प्रवक्ता पद से हटा दिया है। संजय झा ने हाल ही में एक न्यूज वेबसाइट को दिए इंटरव्यू और लेख के जरिए कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल खड़ा किया था। टाइम्स ऑफ इंडिया के अपने लेख और द प्रिंट को दिए इंटरव्यू में उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है। संजय झा ने दावा किया कि पार्टी के पास एक आंतरिक मजबूत तंत्र नहीं है। उन्होंने लिखा है कि पार्टी के अंदर सदस्यों की बात नहीं सुनी जाती है। अपने लेख में झा ने यह भी कहा कि पार्टी सरकार के विफल होने पर लोगों को शासन का कोई वैकल्पिक विवरण प्रस्तुत नहीं कर सकती।
इस लेख और इंटरव्यू के बाद संजय ने जून 17 को एक ट्वीट किया, जिससे पार्टी को तगड़ी चोट पहुंची।

प्रवक्ता पद से हटाए जाने के बाद पार्टी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि ‘निरंकुश बनने के खिलाफ चेतावनी के तौर पर पंडित नेहरू ने एक बार एक समाचार पत्र में एक खुद की आलचोना करते हुए लेख लिखा था। यही लोकतांत्रिक, उदारवादी, सहिष्णु, समावेशी सच्ची कांग्रेस है। हम उन मूल्यों से बहुत दूर चले गए हैं। क्यों? मैं कांग्रेस का एक निर्भय वैचारिक सिपाही बना रहूंगा।’