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राँची के RSS के दफ्तर पर देर रात पेट्रोल बम से अटैक, बम फेंकने का CCTV फुटेज आया सामने

                                  देर रात RSS के दफ्तर पर बम फेंकते दिखे लोग (फोटो साभार: X/@ANI)
पेट्रोल के दाम बढ़ने पर शोर मचाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यालय पर पेट्रोल बम फेंकने वालों से पूछो 'क्या पेट्रोल 50 रूपए सस्ता हो गया है?' जो पेट्रोल बम फेंके जा रहे हैं।  
झारखंड की राजधानी राँची में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कार्यालय पर पेट्रोल बम से हमला किया गया है। निवारणपुर स्थित संघ कार्यालय पर मंगलवार (16 जून 2026) देर रात दो अज्ञात युवकों ने पेट्रोल बम फेंका। हालाँकि, दोनों बोतलें कार्यालय परिसर के अंदर नहीं पहुँच सकीं जिससे बड़ा हादसा टल गया। यह घटना रात करीब 12:36 बजे की बताई जा रही है।

घटना की जानकारी बुधवार सुबह उस समय हुई जब स्वयंसेवक कार्यालय परिसर में पहुँचे। परिसर के बाहर संदिग्ध बोतलें मिलने पर CCTV फुटेज की जाँच की गई और उसमें दो युवक पेट्रोल बम फेंकते हुए दिखाई दिए। इसके बाद मामले की सूचना पुलिस को दी गई।

पुलिस की प्रारंभिक जाँच में सामने आया है कि हमलावरों ने चिली सॉस की काँच की बोतलों में पेट्रोल भरकर उन्हें पेट्रोल बम की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की। पहला बम फेंके जाने के दौरान उसमें लगी जलती हुई सुतली जमीन पर ही गिर गई, जिससे वह प्रभावी नहीं हो सका। दूसरा बम भी कार्यालय की बाउंड्री पार नहीं कर पाया और बाहर ही गिर गया। इस कारण कार्यालय को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुँचा है।

घटना के समय कार्यालय परिसर में प्रांत प्रचारक गोपाल शर्मा, प्रांत सह व्यवस्था प्रमुख आनंद तुलस्यान, प्रांत कार्यालय प्रमुख नरसिंह सिंह समेत कई स्वयंसेवक, विद्यार्थी और कर्मचारी मौजूद थे। घटना की जानकारी मिलते ही केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी तथा भाजपा के कई नेता और कार्यकर्ता कार्यालय पहुँचे।

बाबूलाल मरांडी ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कहा कि प्रारंभिक जानकारी के अनुसार हमलावर किसी वाहन से आए थे और घटना की गहन जाँच की जानी चाहिए। वहीं रांची पुलिस ने कहा है कि मामले की जाँच के लिए एफएसएल समेत कई टीमों को लगाया गया है। CCTV फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर आरोपितों की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है। पुलिस का कहना है कि जल्द ही घटना में शामिल लोगों को पकड़ लिया जाएगा।

‘भारत हमारा अच्छा दोस्त’: प्रधानमंत्री मोदी से फोन पर बात करने के बाद ईरानी राष्ट्रपति का बयान

                                  मोदी ने की ईरान के राष्ट्रपति से फोन पर बातचीत (साभार : NDTV)
पश्चिम एशिया में मचे भारी घमासान के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से फोन पर बातचीत की है। 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमलों और सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत के बाद दोनों नेताओं के बीच यह पहली बातचीत है।

मोदी ने इस तनाव पर गहरी चिंता जताते हुए स्पष्ट किया कि फारस की खाड़ी (Persian Gulf) से माल और ऊर्जा की आवाजाही बिना किसी रोक-टोक के होनी चाहिए, क्योंकि यह भारत की बड़ी प्राथमिकता है।

तनाव कम करने और भारतीयों की सुरक्षा पर जोर

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस बातचीत की जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा कि भारत शांति और स्थिरता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है। पीएम ने जोर देकर कहा कि किसी भी विवाद का हल युद्ध नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति से ही निकल सकता है। भारत ने ईरान और इजरायल दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है ताकि एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध को टाला जा सके।

भारतीयों की सुरक्षा और व्यापारिक चिंताएँ

हाल ही में फारस की खाड़ी में व्यापारिक जहाजों पर हुए हमलों में कम से कम तीन भारतीय नाविकों की जान जा चुकी है। पीएम मोदी ने राष्ट्रपति पेजेश्कियान से बातचीत में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर अपनी चिंता जताई। इसके अलावा, भारत के लिए यह क्षेत्र व्यापारिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए पीएम ने सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने की बात दोहराई।

ईरान ने की भारत की जमकर तारीफ

ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने बातचीत के दौरान भारत के स्टैंड को सराहा। उन्होंने कहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक ‘संतुलित और रचनात्मक’ भूमिका निभाई है। ईरान ने स्पष्ट किया कि वह भारत को अपना एक सच्चा दोस्त मानता है। पेजेश्कियान ने पीएम मोदी को बताया कि ईरान युद्ध नहीं चाहता था और कूटनीति से मसले हल कर रहा था, लेकिन अमेरिका और इजरायल के हमलों ने स्थिति बिगाड़ दी। ईरान ने माना कि भारत की कोशिशें जंग खत्म करने की दिशा में बहुत प्रभावी रही हैं।

सबकी बात सुनने वाला इकलौता नेता

आज के दौर में पीएम मोदी दुनिया के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं जो संघर्ष के दोनों पक्षों से सीधे बात कर सकते हैं। उन्होंने हाल के दिनों में इजरायली पीएम नेतन्याहू के साथ-साथ कतर, सऊदी अरब, यूएई और जॉर्डन जैसे देशों के नेताओं से भी संपर्क साधा है। भारत किसी एक गुट या गठबंधन का हिस्सा बनकर नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और जिम्मेदार शक्ति के रूप में अपनी बात रख रहा है।

मध्यस्थ के रूप में भारत की साख

पश्चिम एशिया में भारत की आर्थिक और रणनीतिक ताकत लगातार बढ़ रही है। क्षेत्र के देश भारत को एक ‘स्थिरता लाने वाली शक्ति’ के रूप में देखते हैं। चूंकि भारत का रिश्ता ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों, तीनों के साथ गहरा है, इसलिए शांति और संयम बरतने की भारत की अपील को पूरी दुनिया में गंभीरता से सुना जा रहा है। भारत का एकमात्र उद्देश्य एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध को रोकना और मानवीय हितों की रक्षा करना है।

AI समिट में नंगों ने देश को किया बदनाम : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (22 फरवरी 2025) को मेरठ में विकास की नई मिसाल पेश की। उन्होंने दिल्ली-मेरठ नमो भारत रैपिड रेल के पूरे 82 किलोमीटर लंबे फुल स्ट्रेच का भव्य उद्घाटन किया और मेरठ मेट्रो को भी हरी झंडी दिखाई। प्रधानमंत्री खुद ट्रेन में सवार होकर शताब्दी नगर से मेरठ साउथ स्टेशन तक सफर किया और वहाँ स्कूली बच्चों तथा दिव्यांग बच्चों से गर्मजोशी से बातचीत की। इस पूरे कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनके साथ पूरी तरह मौजूद रहे।

उद्घाटन के बाद मेरठ साउथ स्टेशन पर विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्य फोकस कांग्रेस पर रखते हुए तीखे हमले किए। उन्होंने कहा कि विकसित भारत की कनेक्टिविटी कैसे होगी इसका शानदार उदाहरण मेरठ मेट्रो और नमो भारत का एक साथ संचालन है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस को घेरते हुए कहा कि कांग्रेस की कार्यशैली और भाजपा की कार्यशैली में जमीन-आसमान का अंतर है।

प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा, “नमो भारत और मेरठ मेट्रो के एक साथ लोकार्पण में भाजपा की कार्यशैली की झलक है। हमारी कार्यसंस्कृति है कि जिस काम को शुरू किया जाए उसे पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर दिया जाए। इसीलिए अब की परियोजनाएँ पहले की तरह लटकती-भटकती नहीं हैं।” उन्होंने स्पष्ट रूप से कांग्रेस पर आरोप लगाया कि कांग्रेस के राज में परियोजनाएँ फाइलों में गुम हो जाती थीं।

मोदी ने कांग्रेस पर हमला जारी रखते हुए कहा कि आज भारत मेट्रो नेटवर्क के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन चुका है। यूपी में मेरठ समेत कई शहरों में मेट्रो का काम तेजी से चल रहा है। लेकिन कांग्रेस-सपा के राज में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट फाइलों में ही गुम जाते थे। मशीनें विदेश से लाई जाती थीं और घोटालों का सिलसिला चलता रहता था। हमने न सिर्फ घोटाले बंद किए बल्कि देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम किया।

इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को सबसे ज्यादा घेरा। उन्होंने हाल के दिल्ली एआई समिट का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया भर के नेता और तकनीकी कंपनियाँ दिल्ली के एआई सम्मेलन में जुटीं। यह भारत का गौरव का पल था लेकिन कॉन्ग्रेस ने इस राष्ट्रीय कार्यक्रम को अपनी गंदी और नंगी राजनीति का अखाड़ा बना दिया। समारोह स्थल पर विदेशी अतिथियों के सामने कॉन्ग्रेस के नेता कपड़े उतार कर पहुंच गए।

मोदी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए पूछा, “मैं कांग्रेस वालों से पूछता हूँ कि सारा देश जानता है कि आप नंगे हो फिर कपड़े उतारने की जरूरत क्या पड़ी? यह दर्शाता है कि कांग्रेस पूरी तरह वैचारिक रूप से दिवालिया हो चुकी है।” उन्होंने कहा कि कांग्रेस को भारत की सफलता पच नहीं रही है। कांग्रेस ने देश के एक वैश्विक आयोजन को अपनी राजनीति का मैदान बना दिया जिससे पूरी दुनिया में भारत की छवि खराब हुई।

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि कांग्रेस के नेताओं को मोदी से नफरत है। ये लोग मेरी कब्र खोदना चाहते हैं। मेरी माँ को गाली देने से उन्हें परहेज नहीं। उन्हें भाजपा से विरोध है एनडीए से विरोध है। अगर आपकी राजनीति यही है तो हम इसको भी सहन कर लेंगे लेकिन कांग्रेस को याद रखना चाहिए था कि एआई सम्मेलन भाजपा का कार्यक्रम नहीं था। यह देश का कार्यक्रम था फिर भी कांग्रेस ने सारी मर्यादाएँ तोड़ दीं। अब पूरे देश में लोग कांग्रेस पर थू-थू कर रहे हैं।

मोदी ने कांग्रेस पर हमले को और तेज करते हुए कहा कि कांग्रेस के लोग देश की बेईज्जती करने वालों का जयकारा कर रहे हैं। राहुल गाँधी पर सीधा निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि अगर आपको प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना है तो पहले जनता के दिल जीतने पड़ेंगे। महिला सांसदों को आगे करके सीट पर कब्जा करने से प्रधानमंत्री नहीं बन जाते। कांग्रेस अब देश के लिए बोझ बन गई है।

उन्होंने कांग्रेस के सहयोगी दलों का भी जिक्र करते हुए कहा कि दिल्ली की घटना में कांग्रेस के सभी सहयोगी दलों ने भी कांग्रेस की आलोचना करने की हिम्मत की। मैं उन सभी दलों का सार्वजनिक रूप से आभार व्यक्त करता हूँ। यह साफ दिखाता है कि कांग्रेस की राजनीति अब उसके अपने सहयोगियों को भी पसंद नहीं आ रही। कांग्रेस पूरी तरह अलग-थलग पड़ चुकी है।

इस पूरे भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कांग्रेस की विफलताओं और नकारात्मक राजनीति को उजागर किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस देश की प्रगति नहीं देखना चाहती। जहाँ भाजपा विकास के काम कर रही है वहीं कांग्रेस नंगी राजनीति और बेईज्जती कर रही है।

उत्तर प्रदेश के विकास का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि पहले मेरठ और यूपी अपराध के लिए जाना जाता था। आज यूपी विकास और ब्रह्मोस मिसाइल के लिए जाना जाता है। सपा राज में अपराधी बेखौफ घूमते थे आज योगी सरकार में वे जेल में हैं। कानून व्यवस्था सुधरने से व्यापार बढ़ा है। कल ही सेमीकंडक्टर फैक्ट्री का उद्घाटन हुआ। डबल इंजन सरकार यूपी को मैन्युफैक्चरिंग हब बना रही है।

उद्घाटन के बाद अब सराय काले खाँ से मोदीपुरम तक की यात्रा सिर्फ 55 मिनट में पूरी हो सकेगी। यह भारत की सबसे तेज सेमी हाई-स्पीड रीजनल रैपिड ट्रेन है जो 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकती है। इस परियोजना में महिला सशक्तिकरण को विशेष जगह दी गई है। करीब 80 प्रतिशत ड्राइवर महिलाएँ होंगी।

अभी कुछ ही दिन पहले IndiaTV पर पूर्व कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णन ने भी राहुल गाँधी की जमकर धुलाई करते हुए कहा कि "राहुल एक समस्या नहीं बल्कि पूरे देश के लिए समस्या बन चुके हैं . .."

उस पंजाब केसरी को धमका रही AAP सरकार, जिसके 51+ पत्रकारों को मार डाला था खालिस्तानी आतंकियों ने, फिर भी लिखता रहा उनके खिलाफ

         खालिस्तानी आतंकियों के निशाने पर रहा है पंजाब केसरी ग्रुप, प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI ChatGPT)
पंजाब केसरी ग्रुप को पंजाब सरकार द्वारा निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आ रही हैं। पंजाब केसरी समूह ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि अक्टूबर 2025 में प्रकाशित एक संतुलित खबर (जिसमें विपक्ष ने AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाए थे) के बाद से बदले की 
भावना से कार्रवाई हो रही है। इसमें नवंबर 2025 से सरकारी विज्ञापन बंद करना, जनवरी 2026 में FSSAI, GST, Excise, Pollution Control Board और Factories Department की एक साथ छापेमारी शामिल है।

यह घटना पंजाब केसरी के उस ऐतिहासिक संघर्ष को याद दिलाती है, जब 1980 के दशक में खालिस्तानी आतंकियों ने इस समूह को बार-बार निशाना बनाया था। आज भी यह समूह अपनी मजबूत रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है।

स्वतंत्रता सेनानी लाला जगत नारायण ने की थी पंजाब केसरी ग्रुप की शुरुआत

पंजाब केसरी की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानी और प्रमुख पत्रकार लाला जगत नारायण ने की थी। उन्होंने 1940-50 के दशक में हिंदी भाषा में समाचार पत्र शुरू किए, जो पंजाब में लोकप्रिय हुए। लाला जगत नारायण ने ‘हिंद समाचार’ और ‘पंजाब केसरी’ जैसे अखबारों के जरिए समाज में जागरूकता फैलाई। वे आर्य समाज से जुड़े थे और पंजाब की राजनीति में सक्रिय रहे, यहाँ तक कि विधायक और सांसद भी बने। लेकिन 1980 के दशक में खालिस्तान आंदोलन के उभार के साथ उनकी मुश्किलें शुरू हुईं।

खालिस्तान आंदोलन के विरोध में खड़ा रहा पंजाब केसरी ग्रुप

खालिस्तानी आतंकियों ने पंजाब केसरी को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि लाला जगत नारायण और उनके अखबार खालिस्तान आंदोलन के कड़े आलोचक थे। सिख युवाओं में अलगाववाद फैला रहे खालिस्तानी आतंकी जर्नैल सिंह भिंडराँवाले के उभार के समय पंजाब केसरी ने उसकी हरकतों की खुलकर आलोचना की। अखबार ने निरंकारी संप्रदाय पर हमलों के लिए खालिस्तानी तत्वों को दोषी ठहराया और खालिस्तान को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताया।

लाला जगत नारायण ने पंजाबी हिंदुओं से अपील की कि वे जनगणना में हिंदी को अपनी मातृभाषा बताएँ, जिससे सिखों में नाराजगी बढ़ी। अखबार ने सिख आतंकियों और भिंडराँवाले की हिंसा को बिना किसी भेदभाव के उजागर किया। इससे खालिस्तानी उन्हें सिख-विरोधी मानने लगे। उनका मकसद था कि ऐसे मुखर आलोचकों को चुप कराकर डर फैलाया जाए, ताकि कोई भी खालिस्तान के खिलाफ बोले नहीं।

खालिस्तानी आतंकी ने की लाला जगत नारायण की हत्या

लुधियाना के पास 9 सितंबर 1981 को लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई। वे कार में जा रहे थे जब अज्ञात हमलावरों ने गोलीबारी की। यह हत्या भिंडराँवाले के चेले नछत्तर सिंह ने की, जिसने बाद में कबूल किया कि भिंडराँवाले के प्रभाव में यह किया। इस हत्या के बाद भिंडराँवाले को गिरफ्तार किया गया, लेकिन सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया। उनकी हत्या ने पंजाब में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया और हिंदुओं में डर पैदा किया।
सितंबर 1981 में उनकी हत्या ने पंजाब में बढ़ते उग्रवाद को ‘नई धार’ दे दी। HRW की रिपोर्ट में घटना का संदर्भ आते हुए बताया गया है कि 9 सितंबर 1981 को उनकी हत्या के बाद भिंडराँवाले के अनुयायियों पर संदेह गया, गिरफ्तारी हुई और उसके बाद हिंसा और तनाव का दौर बढ़ा।
बता दें कि भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने लाल जगत नारायण की स्मृति में सन् 2013 में डाक टिकट जारी करके सम्मानित किया था। यहाँ ये बताना भी जरूरी है कि इमरजेंसी के समय लाला जगत नारायण ने इंदिरा सरकार का भी जमकर विरोध किया था। यहाँ तक कि इस बार जो काम भगवंत मान की आम आदमी पार्टी की सरकार कर रही है, वही काम कॉन्ग्रेसी सरकार ने भी किया था।
कॉन्ग्रेसी सरकार ने पंजाब केसरी ग्रुप के अखबारों का प्रकाशन रोकने के लिए बिजली सप्लाई काट दी थी, तब पंजाब केसरी ग्रुप ने ट्रैक्टरों की सहायता से प्रिंटिंग का काम किया था और 10 दिनों तक ये व्यवस्था कायम रखी थी, जबकि हाई कोर्ट के आदेश के बाद पंजाब केसरी ग्रुप के प्रिंटिंग प्रेस की बिजली बहाल नहीं हो गई।

रमेश चंदर ने भी पंजाब केसरी के तेवरों को नहीं होने दिया कम

इसके बाद भी पंजाब केसरी चुप नहीं हुआ। लाला जगत नारायण के बेटे रमेश चंदर ने अखबार की कमान संभाली और आलोचना जारी रखी। वे भी खालिस्तान आंदोलन के खिलाफ मजबूती से खड़े रहे। 12 मई 1984 को जालंधर में रमेश चंदर की हत्या कर दी गई। वे चंडीगढ़ से लौट रहे थे जब आतंकियों ने उनकी कार पर हमला किया और गोलीबारी की। दशमेश रेजिमेंट ने जिम्मेदारी ली। यह हत्या खालिस्तानी कमांडो फोर्स के सदस्यों से जुड़ी बताई जाती है। रमेश चंदर की हत्या के समय वे भारी सुरक्षा में थे, लेकिन हमलावरों ने उन्हें घेर लिया।
पमेश चंदर के शरीर को 64 गोलियाँ मारकर छलनी कर दिया और वह भी अपने पिता की भांति देश की एकता के लिए बलिदान हो गए। दुनिया में पत्रकारिता के इतिहास में शायद ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहाँ पिता और पुत्र दोनों को देश और जनता की आवाज उठाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी हो। वास्तव में पिता-पुत्र का बलिदान पत्रकारिता के इतिहास के साथ-साथ भारत के आधुनिक इतिहास का भी गौरवशाली अध्याय है।

पंजाब केसरी ग्रुप के 50+ लोगों की हत्या

पंजाब केसरी ग्रुप के पिता-पुत्र मालिकों की हत्याओं के बाद पंजाब केसरी ग्रुप पर लगातार हमले होते रहे। अखबार के कई कर्मचारी, हॉकर और वेंडर मारे गए। रिपोर्ट्स के अनुसार, लाला जगत नारायण की हत्या के बाद हिंद समाचार ग्रुप से जुड़े 51 से ज्यादा लोग मारे गए। अखबार को बंद करने की कोशिशें हुईं, लेकिन पंजाब केसरी परिवार ने हिम्मत नहीं हारी।
भारत सरकार और पंजाब सरकार ने सुरक्षा देने की कोशिश की, लेकिन 1980 के दशक में स्थिति बहुत खराब थी। इंदिरा गांधी सरकार ने ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984) किया, जिसमें भिंडराँवाले को खत्म किया गया, लेकिन इससे हिंसा और बढ़ गई।
पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा और पुलिस-सेना को व्यापक अधिकार दिए गए। पंजाब केसरी के संपादकों को CRPF और पुलिस की सुरक्षा दी गई। बाद में संपादक बने अशविनी कुमार चोपड़ाको भी भारी सुरक्षा मिली। लेकिन शुरुआती दौर में सुरक्षा पर्याप्त नहीं थी, जिससे हमले जारी रहे। 1990 के दशक में कच्छ-ऑपरेशन के बाद आतंकवाद कम हुआ और सुरक्षा बेहतर हुई।

आज भी खालिस्तानी आंदोलन को आड़े हाथों लेता है पंजाब केसरी ग्रुप

आज भी पंजाब केसरी खालिस्तानी आतंकियों के खिलाफ वैसे ही तेवर रखता है। यह समूह राष्ट्रवादी और मजबूत रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है। आज का पंजाब 1980-90 के पंजाब जैसा नहीं है, लेकिन खालिस्तान-समर्थक उग्र नैरेटिव, विदेशों से चलने वाला प्रचार, और कुछ प्रतिबंधित संगठनों की गतिविधियाँ समय-समय पर चर्चा में रहती हैं।
जहाँ तक आज के समय में पंजाब केसरी की बात है, उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खालिस्तान आंदोलन की आलोचना/विरोध वाले लेख और रिपोर्टिंग दिखती रही है। वो खालिस्तानी गतिविधियों को उजागर करता रहा है। ऐसे में देखा जाए तो यह अखबार आज भी पंजाब अलगाववाद के विरोध और ‘राष्ट्रीय एकता’ के पक्ष में पूरी तरह से डटा हुआ है।

बेडरूम से घुसकर मादुरो को पकड़ने वाला अमेरिका, किम जोंग उन से क्यों नहीं टकराता?

                               US द्वारा वेनेज़ुएला के प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो को पकड़ कर ले जाया गया
दुनिया ने हमेशा ताकत को सलाम किया है, लेकिन आज की दुनिया में कमजोरों को सजा भी दी जाती है। ऐसे समय में जब संसाधनों को हड़पने की होड़ और बड़ी ताकतों के बीच दुश्मनी जगजाहिर है, यूएन चार्टर और नैतिकता की बात करना बेमानी है।

जो बचा है वह एक लेन-देन वाली सच्चाई है। ताकतवर देश, छोटे देशों को बर्बाद कर सकते हैं। लेकिन जो मजबूत देश हैं, उनका कुछ खास नहीं बिगाड़ सकते। उन पर हमला नहीं कर सकते। उन्हें झुकने के लिए मजबूर भी नहीं किया जा सकता। यहाँ तक कि यूएन भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता। इस क्रम में सबसे ऊपर न्यूक्लियर पावर वाले देश हैं।

वेनेजुएला में US मिलिट्री एक्शन

वेनेजुएला में US का ऑपरेशन, जिसका परिणाम प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो की किडनैपिंग के रूप में सामने आया, लैटिन अमेरिकन जियोपॉलिटिक्स में सिर्फ़ एक घटना नहीं है। यह एक केस स्टडी है कि आज की दुनिया में ताकत का इस्तेमाल कैसे किया जाता है? कैसे न्यूक्लियर पावर नहीं होना देश की संप्रभुता के लिए नुकसानदायक है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 3 जनवरी को ऐलान किया कि यूनाइटेड स्टेट्स की सेना ने मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ लिया है और उन्हें देश से बाहर ले जाया गया है। यह ऑपरेशन बिना किसी शर्मिंदगी के एकतरफ़ा किया गया।

लोकल टाइम के हिसाब से सुबह करीब 2 बजे काराकास जोरदार धमाकों से दहल उठा। आसमान में काफी नीचे उड़ रहे फाइटर प्लेन की आवाज से लोग दहशत में थे। बिजली चली गई थी। चारों तरफ मची अफरा-तफरी के बीच नेशनल इमरजेंसी घोषित कर दिया गया, लेकिन इतनी देर में ही आजाद देश वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रभुत्व स्थापित हो चुका था।

वॉशिंगटन ने इस कार्रवाई को कैरिबियन और पूर्वी प्रशांत महासागर के रास्ते कथित तौर पर नशीली दवाओं की तस्करी का हवाला देते हुए, एक बड़े ‘ड्रग्स के खिलाफ युद्ध’ का हिस्सा बताया। न तो अमेरिकी कॉन्ग्रेस से सलाह ली गई और न ही यूनाइटेड नेशंस से पूछा गया। लॉजिक आसान था- यूनाइटेड स्टेट्स मादुरो को सजा देना चाहता था, उसने ऐसा किया भी। नशीली दवाएँ और ड्रग्स शायद राष्ट्रपति मादुरो और वेनेजुएला के खिलाफ गैर-कानूनी सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने के सिर्फ बहाने हैं।

वेनेज़ुएला को जिस चीज ने खास तौर पर कमजोर बनाया, वह सिर्फ आर्थिक, अंदरूनी नाराज़गी या डिप्लोमैटिक अकेलापन नहीं था। वह था न्यूक्लियर छतरी का न होना। अगर वेनेजुएला के पास न्यूक्लियर छतरी होती, तो अमेरिका किसी भी हाल में अपने पड़ोसी देश के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करता।

वेनेज़ुएला की तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो ये और भी साफ हो जाता है। सालों से नॉर्थ कोरिया को एक ऐसा दुष्ट देश कहा जाता रहा है जिसे सुधारा नहीं जा सकता। इसके नेता किम जोंग पर कई आरोप हैं। बिना किसी कानूनी कार्रवाई के हत्याएँ करने, टॉर्चर करने और दमनकारी नीति अपनाने के आरोप हैं।

न्यूक्लियर पॉवर होना शांति लाता है या तबाही

नॉर्थ कोरिया ने बार-बार अमेरिका और उसके साथी देशों, मसलन साउथ कोरिया और जापान को धमकी दी है। इनदोनों ही देशों में अमेरिका के बड़े मिलिट्री बेस हैं। इसके जवाब में नॉर्थ कोरिया ने जापानी इलाके के ऊपर मिसाइलों का टेस्ट किया है और दावा किया है कि उसके पास अमेरिका के वेस्ट कोस्ट पर हमला करने की काबिलियत है। नॉर्थ कोरिया ने रेगुलर ICBM का टेस्ट किया है। इस दौरान उसने जापान के ऊपर से ले जाकर प्रशांत महासागर में क्रैश कर दिया। इसके बाद अमेरिका को चुनौती देते हुए कहा कि वह अमेरिका की सिलिकॉन वैली के दिल, सैन फ्रांसिस्को पर हमला करने की क्षमता रखता है।

ट्रंप और अमेरिका लंबे समय से नॉर्थ कोरिया के राष्ट्राध्यक्ष किम जोंग उन को एक क्रूर तानाशाह कहता आ रहा है, जो सिर्फ सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अपने ही लोगों पर ज़ुल्म करता है।

फिर भी उकसावे के बावजूद, नॉर्थ कोरिया पर अमेरिका ने कोई हमला नहीं किया। प्योंगयांग पर आधी रात को कोई रेड नहीं हुई। किम जोंग उन को पकड़कर किसी इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने की कोई कोशिश नहीं हुई। इसका कारण नॉर्थ कोरिया पर अमेरिकी मेहरबानी नहीं है, बल्कि बदले की कार्रवाई का डर है।

वेनेजुएला पर आक्रमण, न्यूक्लियर हथियारों से लैस नॉर्थ कोरिया पर नहीं

नॉर्थ कोरिया के पास न्यूक्लियर हथियार हैं। एक छोटा जवाबी हमला भी सियोल पर हमलों की बौछार कर सकता है, पैसिफिक में US सेना को कमजोर कर सकता है, और किसी के भी कंट्रोल से बाहर तनाव बढ़ा सकता है। यह अकेली बात वाशिंगटन को नॉर्थ कोरिया की सरकार बदलने के सपने छोड़ने के लिए मजबूर करती है। वह सिर्फ पाबंदियाँ ही लगा सकता है।

यही लॉजिक चीन पर भी लागू होता है, जिसके पास दुनिया में न्यूक्लियर हथियारों का तीसरा सबसे बड़ा स्टॉक है। चीन में अक्सर मानवाधिकार का उल्लंघन, मिलिट्री दबाव और आक्रामक विस्तार का रवैया अपनाता रहा है। साउथ चाइना सी में, चीन ने अपने हर पड़ोसी देश के साथ टकराव की स्थिति में है।

उसने आर्टिफिशियल आइलैंड बनाना शुरू कर दिया है, दुनिया के सबसे बिज़ी समुद्री कॉरिडोर में से एक को सैनिक छावनी में तब्दील कर दिया है। इंटरनेशनल पानी में चलने वाले मछली पकड़ने वाले जहाजों को परेशान करता रहा है। ताइवान के साथ उसका हमेशा से झगड़ा रहा है और उसने गलत तरीके से भारतीय इलाकों पर अपना दावा किया है।

ट्रेड वॉर, डिप्लोमैटिक दबाव, ताइवान पर कब्ज़ा करने की धमकियों और नौसेना की खतरनाक चालों के बावजूद, US ने अभी तक सीधी मिलिट्री कार्रवाई नहीं की है। चीन ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हाउस भी है, जो इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ बनाने में इस्तेमाल होने वाले रेयर-अर्थ मिनरल से लेकर हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स सामान तक, हर प्रोडक्ट के लिए ग्लोबल सप्लाई चेन को लगभग कंट्रोल करता है।

न्यूक्लियर पावर होना देश के लिए जरूरी

जून 2025 में ईरान पर US और इजराइली हमलों को देखें तो अंतर और भी साफ हो जाता है। 21 जून को ट्रंप ने घोषणा की कि यूनाइटेड स्टेट्स ने ईरान की तीन न्यूक्लियर ठिकानों, फोर्डो, नतांज और एस्फाहान पर हमला किया है। इस दौरान पहाड़ों के अंदर बने ठिकानों को निशाना बनाया गया। GBU-57 मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर्स, 30,000 पाउंड के बंकर-बस्टर बमों से लैस B-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स पहाड़ों के नीचे जाकर उन जगहों को नष्ट किया।

ट्रंप का मैसेज साफ था, “दुनिया में कोई दूसरी मिलिट्री नहीं है जो ऐसा कर सकती थी। अब शांति का समय है।” यह डिप्लोमेसी नहीं थी। यह ज़बरदस्ती थी जिसे अमेरिका ने अंजाम दिया। इससे साफ जाहिर होता है कि ताकत, ताकत का सम्मान करती है।

ईरान की फोर्डो संवर्धन सुविधा (Fordo enrichment facility) जमीन के नीचे 80-90 मीटर की गहराई पर स्थित है। तेहरान के दक्षिण में एक पहाड़ी के अंदर स्थित यह ईरान की सबसे सुरक्षित परमाणु ठिकानों में एक है।

ईरान ने लगातार कहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि पश्चिमी देशों ने चिंता व्यक्त की है कि इसका उपयोग हथियार विकसित करने के लिए किया जा सकता है। इस आशंका के मद्देजनर यूनाइटेड स्टेट्स ने एयर अटैक किया। यह एक युद्ध जैसा काम था, जिसे पश्चिमी देशों ने सही ठहराया, क्योंकि ईरान वेपन-ग्रेड यूरेनियम के करीब पहुँच रहा था।

न्यूक्लियर युग की यही उलझन है: कब्ज़ा करने से संयम आता है; पीछा करने से मिलिट्री हमले होते हैं।

इज़राइल ने पहले ही ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ शुरू कर दी थी। ईरान ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3’ से इसका जवाब दे रहा था। इस दौरान ड्रोन और मिसाइल से इजरायली एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया, लेकिन ईरान के पास मिडिल ईस्ट में US बेस पर हमला करने और होर्मुज स्ट्रेट को बाधित करने की क्षमता नहीं थी, जिससे दुनिया भर की तेल सप्लाई का लगभग 30% गुजरता है।

ऐसे में अमेरिका को बढ़त मिली हुई थी। वॉशिंगटन ने ध्यान से हिसाब लगाया। ईरान के पास अभी न्यूक्लियर हथियार नहीं हैं। इसलिए अमेरिका ने सीधे तौर पर ईरान के ठिकानों को निशाना बनाया।

इसकी तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो साफ होता है कि न्यूक्लियर छतरी जरूरी है, साथ ही अमेरिका को नुकसान पहुँचाने की क्षमता। इकॉनमी टूटी हुई है, डिप्लोमेसी पसंद नहीं है, ये मायने नहीं रखता।

यूनाइटेड नेशंस, जिसपर सभी देशों की रक्षा करने की जिम्मेदारी है, उसके सेक्रेटरी-जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने ईरान पर US के हमलों पर ‘गंभीर चिंता’ जताई। खतरनाक नतीजों की चेतावनी दी और डिप्लोमेसी की अपील की। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। UN नैतिकता की बात करता है, लेकिन नतीजा ताकत के बल पर मिलती है।

वेनेजुएला के बाद कोलंबिया को ट्रंप की धमकियाँ

वेनेजुएला और मादुरो को जबरन उठा ले जाने के ऑपरेशन के बाद लैटिन अमेरिका अस्थिर हो चुका है। ट्रंप ने खुलेआम अब कोलंबिया को धमकी दी है। उसके प्रेसिडेंट गुस्तावो पेट्रो को ‘सुधरने’ को कहा वरना वेनेजुएला वाला हश्र होने की बात कही। यहाँ एक बार फिर कोलंबिया की संप्रुभता को चुनौती दी गई।

खास बात यह है कि वेनेजुएला पर हुए अमेरिकी हमले की कोलंबिया ने निंदा की और इसे लैटिन अमेरिका की संप्रभुता पर हमला करार दिया। इससे अमेरिका बिदक गया और ट्रंप ने ‘अपने पीछे देखने’ के लिए कहा।

वेनेजुएला और राष्ट्रपति मादुरो के साथ हुए बदसलूकी ने दुनिया को परेशान कर दिया है। न्यूक्लियर हथियार अब सिर्फ़ स्ट्रेटेजिक एसेट नहीं रहे, बल्कि देश की ढाल हैं। ये दुनिया के सबसे ताकतवर देश को भी रुकने, हिसाब लगाने और फिर से सोचने पर मजबूर करते हैं। इसके बिना देश की संप्रभुता की कीमत नहीं रह जाती। ताकतवर देश अपने फायदा-नुकसान के हिसाब से ट्रीट करते हैं।

यह सच्चाई यह भी बताती है कि देशों में न्यूक्लियर पावर बनने का दबाव क्यों बढ़ रहा है, कम क्यों नहीं हो रहा है। दुनिया के छोटे-छोटे देश देख रहे हैं कि लीबिया के साथ क्या हुआ, जब उसने अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम छोड़ दिया। वे देखते हैं कि इराक के साथ क्या हुआ, जिसके पास कभी न्यूक्लियर प्रोग्राम नहीं था। वे देखते हैं कि वेनेज़ुएला के साथ क्या हुआ। और वे देखते हैं कि नॉर्थ कोरिया के साथ क्या नहीं हुआ।

नतीजा लॉजिकल होता है, आइडियोलॉजिकल नहीं।

ऐसी दुनिया में जहाँ मानवाधिकार की बात सेलेक्टिव होता है, जहाँ ‘रूल्स-बेस्ड ऑर्डर’ सिर्फ कमजोर लोगों पर लागू होता है और जहाँ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ मूकदर्शक बन जाती है, उनकी सोच कोई मायने नहीं रखता, वहाँ न्यूक्लियर पॉवर होना संप्रभुता की आखिरी गारंटी बन जाती है।

यह न्यूक्लियर वॉर का सपोर्ट नहीं है। बल्कि शांति और संतुलन के लिए ‘न्यूक्लियर’ का होना जरूरी है। ये तबाही मचा सकता है, लेकिन शांति भी यही लाता है।

अजीब बात है कि आज शांति अच्छी नीयत या ग्लोबल नियमों से नहीं, न्यूक्लियर ताकत की मोहताज बन गई है। क्योंकि बदले की कार्रवाई का डर इतना खतरनाक है कि ताकतवर देश भी खौफ खाते हैं।

उस डर ने नॉर्थ कोरिया को बचाया। इसने चीन को बचाया। इसने अमेरिका को ईरान में ‘हिसाब लगाने’ पर मजबूर किया और इसकी गैरमौजूदगी ने काराकास को बर्बाद कर दिया।

हरामफरमोश सलमान रुश्दी को उसके ही toolkit ‘दोस्त’ कर रहे गुमराह, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारत में कम नहीं हुई है : इतिहास के ‘सच’ को सामने लाना छेड़छाड़ नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सलमान रुश्दी ( फोटो साभार-toi)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘कट्टरपंथियों में भी कट्टरपंथी’ और मोदी समर्थकों को टोडीज करने वाले सलमान रुश्दी एक बार फिर भारत सरकार पर ‘आजादी’ के नाम पर अमेरिका में बैठ कर आलोचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके ‘दोस्तों’ से भारत में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को लेकर बात होती है, तो पता चलता है कि उनके बोलने की आजादी सीमित है।

रुश्दी मियां जब 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' नहीं होने पर इतना बहुत कुछ मोदी के खिलाफ इतनी बकवासें की जा रही है। फिर भी बकवास करते हो 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' नहीं शर्म करो। किसी भी विदेशी मेहमान के भारत पर toolkit मैदान में आकर उपद्रव करता है। अगर यही काम तुम्हारे किसी मुस्लिम मुल्क होता हंगामा करने वालों का पता भी नहीं चलता। 

लेकिन उनके दोस्त ये नहीं बताते हैं कि भारत में ‘प्रेस की आजादी’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ ही है कि मोदी सरकार के हर काम पर संसद के अंदर और बाहर बहस होती है। टीवी डिबेट होते हैं और हर किसी को बोलने की आजादी होती है। सोशल मीडिया मोदी विरोधियों के पोस्ट से भरा रहता है। देश में हर बुरे काम के लिए मोदी को जिम्मेदार बताया जाता है। 

यही वजह है कि बिहार चुनाव से पहले जब दिल्ली ब्लास्ट हुआ तो लोगों ने इसे आतंकी घटना मानने में मुँह सिल लिए। कई दिनों तक मुस्लिम आतंकी मॉड्यूल को लेकर खुलासे हुए। एनआईए ने कई सबूत रखे और 3000 किलो अमोनियम नाइट्रेट जमा करने के सबूत दिये, एके-47 जैसे हथियार बरामद किए। लेकिन कांग्रेस और आरजेडी ने तो इसे चुनाव में वोट पाने के लिए ध्रुवीकरण कह कर गला फाड़ते ही रहे, बाकी विपक्षी पार्टियों ने भी उनका साथ दिया। इस मामले का पूरा खुलासा होने के बावजूद किसी भी पार्टी ने माफी नहीं माँगी।

पीएम मोदी ने खुद कहा है कि उनके हर काम को सांप्रदायिकता के नजरिए से देखा जाता है और आलोचना की जाती है। प्रधानमंत्री मोदी की हर सामाजिक कल्याण की योजनाएँ सभी धर्मों और जातियों के लिए है। ऐसा नहीं है कि किसी को नाम, जाति, धर्म के आधार पर रोका जाता है। लेकिन देश से घुसपैठियों को हटाने को लेकर अगर मोदी सरकार गंभीर है तो इसमें आपत्ति क्या है।

क्या देश से रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालना गलत है? देश में साजिश के तहत डेमोग्राफी बदलाव हो रहा है। हिमाचल, उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों से लेकर सीमावर्ती इलाकों में डेमोग्राफी बदलने की कोशिश हो रही है। इन पर एक्शन लेना क्या गलत है।

पीएम मोदी ने 2022 में हटवाई थी बैन

‘द सैटेनिक वर्सेज’ के बाद विवादों में आए लेखक सलमान रुश्दी की किताब 36 साल बाद पीएम मोदी ने ही बैन हटवाई थी। पूर्व पीएम राजीव गाँधी की सरकार ने साल 1988 में इस पर मौखिक तौर पर प्रतिबंध लगाया था। उस वक्त कांग्रेस सरकार प्रचंड बहुमत के बाद भी मुस्लिम वोट बैंक की खातिर मौखिक तौर पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन पीएम मोदी ने कुछ मुस्लिम संगठनों जैसे ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड के विरोध के बावजूद द सेटनिक वर्सेज से प्रतिबंध उठा लिया। इसके बाद इस किताब की भारत में जबरदस्त बिक्री हुई।

भारत में मौखिक तौर पर प्रतिबंध का ये कारनामा कांग्रेस सरकार ने किया था, जिसे कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सरकार कोर्ट में यह साबित नहीं कर पाई कि इस किताब पर कभी प्रतिबंध भी लगा था। इसके बावजूद रुश्दी जैसे बुद्धिजीवियों को कॉन्ग्रेस ‘लोकतांत्रिक’ नजर आती है।

क्या कहा सलमान रुश्दी ने

ताजा मामला सलमान रुश्दी के एक इंटरव्यू के बाद सामने आया है। इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर एक बार फिर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ पर प्रतिबंध लगाने का आरोप लगाया है। ये इंटरव्यू ब्लूमबर्ग में 5 दिसंबर 2025 को छपा है। ये इंटरव्यू मिशल हुसैन ने लिया है।

इंटरव्यू में पीएम मोदी को लेकर पूछे गए सवाल पर सलमान रुश्दी ने कहा है कि पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, प्रोफेसर जैसे लोग भारत में परेशान हैं क्योंकि उन्हें पूरी ‘आजादी’ नहीं है।

ये पहला मौका नहीं है जब सलमान रुश्दी ने पीएम मोदी की आलोचना की हो। 2014 से पीएम बनने के बाद से उन्होंने कई मौकों पर पीएम मोदी की आलोचना की है। यहाँ तक प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर चिंता जताई थी और कहा था कि बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में जनता की अभिव्यक्ति औ साहित्यिक गतिविधियों की आजादी खतरे में पड़ जा सकती है।

रुश्दी के मुताबिक उनके कई दोस्त, जो भारत में ही रहते हैं, उनसे बात होती है और ये जानकारी उन्होंने दी है। इस दौरान उन्होंने नायपॉल का जिक्र किया और कहा कि मोदी सरकार इतिहास से छेड़छाड़ कर रही है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वालों का कहना है कि उनकी सरकार ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया है और प्रेस, सिविल सोसाइटी ग्रुप्स और राजनीतिक विरोधियों पर कार्रवाई की है। फिर भी, चुनाव होते हैं, भारतीय मीडिया आउटलेट्स को पब्लिश करने के लिए परमिशन की जरूरत नहीं होती है और बुनियादी अधिकारों की संवैधानिक गारंटी लागू रहती है।

रुश्दी के मुताबिक, ऐसा लगता है कि देश का इतिहास फिर से लिखने की इच्छा है, असल में हिंदुओं को अच्छा, मुसलमानों को बुरा कहना गलत है। यह विचार कि भारत एक हिंदू सभ्यता है जो मुसलमानों के आने से घायल हो गई है। इसे साबित करने के लिए बहुत एनर्जी लगी है। वी.एस. नायपॉल ने एक बार इसे ‘घायल सभ्यता’ कहा था।

सलमान रुश्दी उन पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने ‘डिवाइन इन चीफ ‘ लिखने वाले पत्रकार आतिश तासीर की OCI रद्द करने पर मोदी सरकार को पत्र लिखा था।

दादरी हत्याकांड और पाकिस्तानी गायक गुलाम अली के भारत में विरोध जैसी घटनाओं पर नाराज होकर अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल समेत 40 साहित्यकारों ने अपना सम्मान लौटाया, तो सलमान रुश्दी ने भी उनका साथ दिया और सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराया।

मोदी सरकार के खिलाफ जब भी मौका मिला, रुश्दी ने अपनी आवाज बुलंद की। मोदी विरोधी हर प्रोपेगेंडा का उन्होंने समर्थन किया। फिर भी ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की कमी उन्हें भारत में नजर आती है। मोदी सरकार में भारत में बोलने की आजादी इतनी है कि हर कोई अपनी बात बेखौफ कह सकता है, चाहे वह मोदी समर्थक हो या मोदी विरोधी।

दिल्ली ब्लास्ट : ‘प्रियंका’ नाम सुन मुँह सिलकर बैठी लिबरल गैंग में लगी आग; सनातन पर फूटे: फैला रहे ‘मुस्लिम विक्टिम’ वाला प्रोपेगेंडा, आतंकियों का नाम लिखने में परहेज

                                         जिहादी डॉक्टर आदिल ( फोटो साभार- chatgpt)
दिल्ली कार ब्लास्ट और आतंकी डॉक्टरों के मॉड्यूल की लगातार गिरफ्तारी के बीच एक हिन्दू डॉक्टर प्रियंका शर्मा से पूछताछ के बाद सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा फैलाने का दौर शुरू हो गया है। हालाँकि प्रियंका शर्मा को अब छोड़ भी दिया गया है। डॉक्टर प्रियंका के परिजनों के मुताबिक, ये पूछताछ जम्मू कश्मीर पुलिस ने सहारनपुर से गिरफ्तार जिहादी डॉक्टर आदिल अहमद के बारे में जानने के लिए की थी।

लालकिला ब्लास्ट और 2900 किलो विस्फोटक जमा करने के मामले में अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉक्टरों के नाम आए। अब तक गिरफ्तार सभी डॉक्टरों के बारे में जो पता चला है, उसके अनुसार ये सभी इस्लामी कट्टरपंथी हैं। ये देश के सरकारी कॉलेजों में पढ़कर, करीब 90 फीसदी सब्सिडी के पैसों से एमबीबीएस और पीजी की डिग्री ली। मानवता की सेवा का प्रण लिया और निकल गए जिहादी बनकर देश को बर्बाद करने के लिए।

इन डॉक्टरों के खिलाफ देशभर में गुस्सा का माहौल है। एक के बाद एक मिल रहे सबूत इन डॉक्टरों के जिहादी होने की कहानी कह रहे हैं। ऐसे में एक हिन्दू डॉक्टर प्रियंका को हिरासत में लेकर की गई पूछताछ के बाद प्रतिक्रिया की बाढ़ आ गई है। दिल्ली ब्लास्ट के बाद आतंकियों से जुड़े इस मामले में पुलिस ने हजारों लोगों को पूछताछ के लिए बुलाया है। जहाँ इन आतंकियों ने काम किया, जहाँ से पढ़ाई की, उन जगहों पर काम करने वाले लोगों से रूटीन पूछताछ की जा रही है। हालाँकि, वे सभी संदिग्ध नहीं माने जा रहे हैं।

वहीं, जब प्रियंका का नाम इसमें आया तो प्रियंका का नाम लेकर सनातन को आतंकवाद से जोड़ कर दिखाने की कोशिश की जा रही है। ये कहा जा रहा है कि सिर्फ मुस्लिम ही आतंकी नहीं होते, हिन्दू भी हो सकते हैं।

एक यूजर ने कहा कि दिल्ली ब्लास्ट में जैसे ही प्रियंका का नाम आया, चैनलों में सन्नाटा पसर गया, हाय रे मुस्लिम एंगल…वही एक दूसरे यूजर ने लिखा कि मुसलमानों से सवाल करते थे,अब क्या करेंगे।

एक यूजर ने लिखा, “शर्मा जी की बेटी प्रियंका शर्मा दिल्ली ब्लास्ट केस में गिरफ्तार”

दरअसल प्रियंका शर्मा से पूछताछ होते ही उसे दोषी साबित करने की कोशिश होने लगी।

डॉक्टर प्रियंका से क्यों हुई पूछताछ?

दरअसल प्रियंका जनरल मेडिसीन में एमडी की पढ़ाई अनंतनाग के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से कर रही हैं। जिहादी डॉक्टर आदिल इसी कॉलेज में उसका सीनियर था और उसने जॉब भी ज्वाइन किया था। इसको लेकर ही पुलिस की टीम ने उससे पूछताछ की। फिलहाल प्रियंका का मोबाइल पुलिस के पास है।

 प्रियंका के भाई भारत के मुताबिक, रात करीब 9 बजे प्रियंका के साथ वीडियो कॉल पर बात हो रही थी। 5 मिनट बाद प्रियंका के हॉस्टल में पुलिस की टीम पहुँची और गेट खटखटाया। इसके बाद प्रियंका का फोन कट गया। रात करीब 11 बजे प्रियंका के पति डॉक्टर अनिरुद्ध का फोन आया। उन्होंने बताया कि पुलिस ने प्रियंका को हिरासत में ले लिया है। इसके 1 घंटे बाद प्रियंका का फोन आया कि पूछताछ के बाद उसे छोड़ दिया गया है। उसका फोन पुलिस जाँच के लिए लैब भेज रही है।

डॉक्टर प्रियंका हरियाणा के रोहतक की रहने वाली हैं। उनके पति भिवानी में सरकारी डॉक्टर हैं। प्रियंका ने एमबीबीएस सोनीपत के खानपुर मेडिकल कॉलेज से किया था। भाई भारत सोनीपत में रोडवेज में क्लर्क है। पिता सतीश शर्मा शुगर मिल की सिक्योरिटी टीम में हैं और माँ हाउस वाइफ हैं।

देवेन्द्र का नाम आने पर भी किए गए थे कमेंट

लालकिला कार विस्फोट में इस्तेमाल की गई i20 कार के मालिक की खोज के दौरान देवेन्द्र सिंह का नाम आया था। दरअसल गुरुग्राम के नंबर HR26 को लेकर जब पुलिस कार मालिक की तलाश कर रही थी और मोहम्मद सलमान से पूछताछ कर रही थी तो उसने कहा था कि डेढ़ साल पहले उसने कार देवेन्द्र सिंह से ली थी। इसके बाद भी सोशल मीडिया पर कोहराम मचा। लेकिन जल्द ही पुलिस ने कार के मालिक अमीर राशिद अली को गिरफ्तार कर लिया।

डॉक्टर प्रियंका को छोड़ दिया गया है। इसको लेकर पुलिस का कोई बयान भी नहीं आया है। जब से इन जिहादी डॉक्टरों के मॉड्यूल का खुलासा हुआ है, यूपी से जम्मू कश्मीर तक धड़पकड़ शुरू हो गई। पूछताछ के बाद एक दूसरे से जुड़े तार का पता चला। लेकिन जैसे ही डॉक्टर प्रियंका से पूछताछ की बात सामने आई, प्रोपेगेंडा फैलाने वालों ने इस्लामी कट्टरपंथ की गंभीरता को कम करने के लिए प्रियंका का नाम लेना शुरू कर दिया। देवेन्द्र सिंह के केस में भी ऐसा ही हुआ था। जब पुलिस ने कार के असल मालिक आमिर अली को गिरफ्तार किया, तब प्रोपेगेंडा फैलाने वाले शांत हुए।

ये लोग तब तक चुप रहे, जब तक डॉक्टर प्रियंका शर्मा, देवेन्द्र सिंह जैसे नाम सामने नहीं आए। इन लोगों ने पहलगाम आतंकी हमले के वक्त भी यही किया था। जब टूरिस्ट आतंकियों के शिकार हुए, तब एक स्थानीय व्यक्ति की मौत होने की खबर भी आई। इसके बाद को प्रोपेगेंडा टीम इस बात को भी झुठलाने में लग गई की पर्यटकों का नाम पूछ-पूछ कर मारा गया। दरअसल सोशल मीडिया पर हो हल्ला मचाने वाले और प्रोपेगेंडा फैलाने वाले लोग अक्सर मरने वालों में एक मुस्लिम नाम ढूंढते हैं और साजिश करने वालों में कोई हिन्दू नाम। ताकि मुस्लिम कट्टरपंथ और आतंकवाद को जोड़ा न जा सके।

योगी आदित्यनाथ को ‘नकली बाबा’ कहने वाले तेजस्वी यादव माँ का दूध पिया है तो किसी मुस्लिम नेता को ‘नकली मौलवी’ कहकर दिखाओ

मुस्लिम वोट की खातिर आखिर विपक्ष कितना नीचे गिरेगा? नीचता की भी एक सीमा होती है। तेजस्वी अपने पिता लालू यादव से पूछो कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जब 7 नवंबर 1966 को पार्लियामेंट स्ट्रीट पर गोपाष्टमी के दिन गो-हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेल रही थी तब श्रद्धेय कृपालु जी महाराज ने हुंकार भरते हुए कहा था "इंदिरा जिस तरह निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेल रही है तेरी भी मौत गोपाष्टमी को होगी और तेरी पार्टी को समाप्त करने हिमालय से आधुनिक ड्रैस में एक तपस्वी आएगा।" 31 अक्टूबर 1984 को गोपाष्टमी ही थी। साधु का श्राप आज सच हो रहा है। दूसरे, जब राहुल गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की चर्चा चल ही रही थी तब योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि "जितनी जल्दी हो राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाइए" अंजाम सबके सामने है। जिस कांग्रेस की किसी समय तूती बोलती थी आज वही कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए क्षेत्रीय पार्टियों के आगे झुक रही है। साधु का पद विरासत में नहीं मिलता। साधना करनी पड़ती है, तपस्या करनी पड़ती है। योगी आदित्यनाथ को 'नकली बाबा' तो बक दिया लेकिन क्या किसी मुस्लिम को ‘नकली मौलवी’ कहने की हिम्मत है? चुनाव छोड़ बिल से बाहर नहीं निकल पाओगे।

  

बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए सरगर्मी तेज है और नेता अलग-अलग मंचों-टीवी चैनलों पर जाकर अपनी बातें रख रहे हैं। एक इंटरव्यू के दौरान बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने ‘रैपिड फायर राउंड’ में योगी आदित्यनाथ को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्हें ‘नकली बाबा' बता दिया।

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो है हीं, साथ ही वो हिंदुओं की पवित्र गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर भी हैं। तेजस्वी यादव को अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पर कोई राजनीतिक हमला करना था तो वो उनके काम को लेकर सवाल उठा सकते थे लेकिन उन्होंने योगी आदित्यनाथ पर हमले के लिए उनकी धार्मिक पहचान को चुना।

असल में तेजस्वी यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ‘नकली बाबा’ कहकर न सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला किया है बल्कि पूरे हिंदू समाज की धार्मिक पहचान पर प्रहार करने की कोशिश की है। यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, यह उस मानसिकता की झलक है जो दशकों से हिंदू प्रतीकों, संतों और सनातन परंपराओं का मजाक उड़ाने में आनंद महसूस करती आई है।

योगी आदित्यनाथ एक हजार साल पुरानी नाथ परंपरा के उत्तराधिकारी है। उनकी साधु या बाबा की पहचान कोई राजनीतिक मुखौटा नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक जीवन का प्रतीक है। लेकिन तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के लिए हिंदू साधु का सम्मान कोई मायने नहीं रखता क्योंकि उनकी राजनीति का ईंधन ही हिंदू विरोध है।

अब सवाल उठता है कि क्या तेजस्वी यादव किसी मुसलमान नेता को ‘नकली मौलाना’ कह सकते हैं? क्या वे किसी मौलवी या इमाम के वस्त्र पर व्यंग्य कर सकते हैं? क्या वे किसी मुस्लिम नेता से कह सकते हैं कि उसकी टोपी, दाढ़ी या नमाज दिखावा है? इसका जवाब आपको, हमें सभी को पता है कि वह ऐसा नहीं करेंगे। अगर उन्होंने ऐसा करने की हिम्मत भी दिखाई तो पूरा सेक्युलर कुनबा और मीडिया की तथाकथित प्रगतिशील जमात उन पर टूट पड़ेगी।

हिंदुओं के मामले में भावनाओं के आहत होने से जुड़ा कोई नियम लागू नहीं होता है। केवल तेजस्वी ही नहीं, उनकी जमात के दूसरे नेता भी हिंदुओं को निशाने पर रखते हैं। तेजस्वी और उन जैसे नेताओं को ये अच्छी तरह से पता है कि हिंदू अपने विवेक में विश्वास रखता और इसलिए बार-बार उसे अपमानित किया जा सकता है। वो जानते हैं कि हिंदू ऐसा कहने पर कभी सड़क पर नहीं उतरेगा, हिंसा नहीं करेगा। हिंदुओं की इसी सहिष्णुता को ये नेता अपनी ढाल बनाते हैं।

योगी आदित्यनाथ की धार्मिक पहचान पर हमला कोई नई बात नहीं है। तेजस्वी और उनकी पूरी कथित सेक्युलर ब्रिगेड के लोग योगी आदित्यनाथ को अजय सिंह बिष्ट कहकर बुलाते रहे हैं। संत बनने के बाद कोई शख्स अपनी पुरानी पहचान, अपना परिवार छोड़ देता है लेकिन राजनीतिक मर्यादा तो छोड़िए ये ब्रिगेड धार्मिक परंपराओं का सम्मान तक नहीं करती है।

इन्हीं तेजस्वी यादव को चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक को साधना है तो ये उनके पक्ष में वक्फ बिल तक को कूड़ेदान में फेंकने की बात कर रहे हैं। ये उस वोट बैंक के लिए टोपी भी लगाते हैं लेकिन हिंदुओं का सम्मान उनके लिए कोई मायने नहीं रखता है।

तेजस्वी यादव जैसे नेता शायद भूल जाते हैं कि योगी आदित्यनाथ जैसे संत न केवल राजनीतिक पद पर हैं बल्कि लाखों लोगों के लिए आस्था और प्रेरणा के प्रतीक हैं। योगी आदित्यनाथ ने जिस अनुशासन और तपस्या से खुद को इस परंपरा का उत्तराधिकारी बनाया है क्या वो कोई ‘नकली बाबा’ कर सकता है। मगर तेजस्वी यादव के लिए ये बातें मायने नहीं रखतीं क्योंकि उनके लिए सत्ता और वोट बैंक ही सर्वोपरि हैं। उन्हें इस देश की सनातन आत्मा से कोई लेना-देना नहीं है।

यह भी सच है कि ऐसे बयान हिंदू समाज को भावनात्मक रूप से चोट पहुँचाते हैं। दुर्भाग्य है कि हमारे यहाँ हिंदू अस्मिता की रक्षा को लेकर कोई सामाजिक या राजनीतिक एकजुटता नहीं बन पाती है। अब वक्त आ गया है कि हिंदू समाज इस तरह के दोहरेपन को पहचानें। लोकतंत्र में आलोचना और असहमति रहे, रहती भी है लेकिन हिंदुओं की धार्मिक पहचान पर प्रहार लंबे समय तक एजेंडा नहीं बन सकता है।

क्या नेपाल में Deep State/CIA ने खेला है खेल? पशुपतिनाथ मन्दिर का बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से क्या मतलब? पशुपतिनाथ मंदिर पर हमले की साजिश नाकाम; प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति के इस्तीफे के बाद सेना ने संभाली कमान, GenZ प्रदर्शनकारियों को दी चेतावनी

                            पशुपतिनाथ मंदिर पर प्रदर्शनकारियों का हमला (फोटो साभार : NDTV)
भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के विरोध में हुई सत्ता पलटने के हिंसा बहुत कुछ कह रही है जिस पर से पर्दा भी बहुत जल्दी उठने वाला है। आज नेपाल इन उपद्रवियों से पूछ रहा है कि इतनी आगजनी करके किस बेरोजगार को रोजगार मिला और क्या भ्रष्टाचार दूर हो गया? इसकी आड़ में अपने ही देश को कम से कम 25 साल पीछे धकेल दे दिया है। इस नुकसान की भरपाई में देश में महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार चार गुना बढ़ेगा। जिसे कोई रोक नहीं पाएगा। अगर बेरोजगारी और भ्रष्टाचार समस्या थी तो मंत्रियों से लेकर प्रधानमंत्री तक को इस्तफ़ा देने के लिए मजबूर कर नयी सरकार के गठन पर धरना/प्रदर्शन करना था। आगजनी से क्या मिला? मन्दिर पर हमला किसी ओर इशारा करता है। इस उपद्रव को कहते हैं गुंडागर्दी। उपद्रवियों ने नेपाल के नाम को कलंकित कर दिया।     
नेपाल में भड़की हिंसा के बीच प्रधानमंत्री केपी ओली ने इस्तीफा दिया, जिसके बाद देश की कमान वहाँ की नेपाली सेना ने संभाली है। सेना ने चेतावनी भी दी कि अगर हिंसा-लूटपात बंद नहीं हुई, तो कठोर कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा, पीएम नरेंद्र मोदी समेत UN के महासचिव ने शांति बनाए रखने की अपील की है। GenZ प्रदर्शनकारियों ने पशुपतिनाथ मंदिर पर भी हमला किया।

इन विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के विरोध में हुई थी। इस हिंसा में 22+ लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों की संख्या में लोग घायल हुए।

नेपाली सेना ने संभाली सुरक्षा की कमान

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रधानमंत्री ओली के इस्तीफे के बावजूद हिंसा जारी रहने पर, नेपाली सेना ने मंगलवार (9 सितंबर 2025) रात 10 बजे से देश की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाली। सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिगडेल ने देश के नाम अपने संबोधन में प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए आगे आने की अपील की।

सेना प्रमुख ने चेतावनी दी कि अगर हिंसा, लूटपाट और आगजनी बंद नहीं हुई, तो सेना सख्त कार्रवाई करेगी। सेना प्रमुख ने कहा कि कुछ समूह इस स्थिति का अनुचित लाभ उठा रहे हैं और आम नागरिकों तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, हिंसक प्रदर्शनों के दौरान असामाजिक तत्वों ने पशुपतिनाथ मंदिर जैसे ऐतिहासिक और राष्ट्रीय धरोहरों को भी निशाना बनाने की योजना बनाई। तस्वीर में आपको प्रदर्शनकारी मंदिर के गेट पर तोड़फोड़ करते हुए सफाई दिखाई दे रहे होंगे। हालाँकि, सेना की तैनाती से इसे रोका गया।

भारत और यूएन की प्रतिक्रिया

नेपाल की स्थिति पर भारत और संयुक्त राष्ट्र ने भी चिंता व्यक्त की है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा कि नेपाल में हुई हिंसा हृदयविदारक है और इसमें कई युवाओं की जान गई है, जिससे उन्हें बहुत पीड़ा हुई है। उन्होंने नेपाल की स्थिरता, शांति और समृद्धि को भारत के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए, सभी नेपाली भाई-बहनों से शांति बनाए रखने की विनम्र अपील की।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने भी इस स्थिति पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि वे नेपाल में हो रही घटनाओं पर करीब से नजर रख रहे हैं और हिंसा में जानमाल के नुकसान से वे बहुत दुखी हैं। उन्होंने अधिकारियों से मानवाधिकारों का पालन करने और हिंसा को रोकने के लिए संयम बरतने का आग्रह किया है। उन्होंने यह भी कहा कि विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से होने चाहिए, जिसमें जीवन और संपत्ति का सम्मान हो।

नेपाल में विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत ‘स्टूडेंट्स फॉर जस्टिस’ नामक एक छात्र संगठन ने की थी। प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन, राष्ट्रपति कार्यालय, प्रधानमंत्री आवास और कई राजनेताओं के घरों को आग लगा दी। इस हिंसा में 22 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों से अधिक लोग घायल हुए।

क्या भारत का LoP राहुल गाँधी ‘विदेशी एजेंट’(भारत विरोधियों) की तरह बोल रहे? ट्रंप को दी ‘अडानी कार्ड’ इस्तेमाल करने की सलाह: पहले मोसाद ने हिंडनबर्ग-सोरोस वाली हिटजॉब से निकाला था लिंक

राहुल गाँधी ने हाल ही में डोनाल्ड ट्रम्प को अडानी के खिलाफ चल रही जांच को हथियार बनाने और भारत के खिलाफ इसका इस्तेमाल करने के लिए उकसाया था (फोटो साभार - ऑपइंडिया इंग्लिश)
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक बार फिर भारत के खिलाफ वैश्विक शक्तियों को उकसाने का काम किया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाते हुए अमेरिका में चल रही अदानी समूह पर जाँच को रूस के तेल व्यापार से जोड़ दिया।
LoP राहुल गाँधी की हरकतों और बयानों को देख लगता है कि बिल्ली भागों छीका टूटा यानि सत्ता कांग्रेस के हाथ आ गयी तो निश्चितरूप से देश हरहाल में भारत विरोधी ताकतों के हाथ में चला जायेगा और राहुल प्रधानमंत्री बन गए तो जिस तरह मनमोहन सिंह का रिमोट गाँधी परिवार के हाथ था ठीक उसी तरह राहुल का रिमोट भारत विरोधियों के हाथ होगा।  

गौरतलब हो कि कुछ ही दिन पहले गाँधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत की ‘डेड इकोनॉमी’ वाली बात दोहराई थी। अब उन्होंने उससे भी आगे बढ़कर एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने ट्रंप को ‘अडानी कार्ड’ इस्तेमाल करने का सुझाव दे डाला है।

राहुल गाँधी ने अपनी पोस्ट में लिखा, “भारत, कृपया समझिए: प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति ट्रंप के बार-बार के धमकियों के बावजूद उनके सामने क्यों नहीं खड़े हो पा रहे हैं, इसका कारण अदानी पर चल रही अमेरिकी जाँच है। एक धमकी यह है कि मोदी, एए (अदानी) और रूसी तेल सौदों के बीच वित्तीय संबंधों को उजागर किया जाएगा। मोदी के हाथ बँधे हुए हैं।”

भारत के आंतरिक मामलों में राहुल का विदेशी ताकतों को खींचने का कोई नया कदम नहीं हैं, बल्कि ये उनकी आदत बन चुका है। लेकिन किसी जाँच का सहारा लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति को भारत पर दबाव बनाने का सुझाव देना उन पर सवाल खड़े कर रहा है। सवाल ये कि क्या राहुल गाँधी को सच में देश की परवाह है या सिर्फ राष्ट्र हित के नाम पर वह भारत विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

इजरायली खुफिया एजेंसी ने पहले ही किया था राहुल के अडानी पर आरोप का खुलासा

यह पहली बार नहीं है जब अडानी समूह की जाँच पर हो रहे हमलों के सिलसिले में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी का नाम सामने आया है। स्पुतनिक इंडिया की एक असत्यापित लेकिन चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद ने राहुल गाँधी, इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस के प्रमुख सैम पित्रोदा और अमेरिका की शॉर्ट-सेलर कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च के बीच एक छुपी हुई साजिश का खुलासा किया है।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मोसाद ने पित्रोदा का होम सर्वर हैक किया और उसमें से ऐसे संचार डिक्रिप्ट किए गए जिनसे पता चला कि अडानी समूह के खिलाफ हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को प्रधानमंत्री मोदी और भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के हथियार की तरह इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई थी।
हिंडनबर्ग ने 2023 में अडानी समूह पर कॉर्पोरेट इतिहास की सबसे बड़ी धोखाधड़ी का आरोप लगाया था, लेकिन भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था।
रिपोर्ट आने का समय भी संदेहास्पद माना गया, क्योंकि यह रिपोर्ट तब आई जब गौतम अडानी इजराइल के हाइफा बंदरगाह को 1.2 बिलियन डॉलर में खरीदने का सौदा लगभग पूरा करने वाले थे।
इजरायली सरकार ने इस रिपोर्ट को रणनीतिक हमला माना और इसके पीछे की ताकतों को खोजने के लिए ‘ऑपरेशन जेपेलिन’ नाम का एक खुफिया अभियान शुरू किया। इस ऑपरेशन में सामने आया कि इस अभियान के तार चीन, पश्चिमी लॉबी, कुछ एक्टिविस्ट वकील, हेज फंड्स और भारत की विपक्षी राजनीति के एक प्रमुख चेहरे से जुड़े हुए हैं।

सोरोस से जुड़ा एनजीओ नेटवर्क और राहुल गाँधी की गुप्त अमेरिका यात्रा

राहुल गाँधी के 2023 के विदेश दौरों ने अडानी मामले और भारत सरकार पर विदेशी हमलों से जुड़े विवादों को और गहरा कर दिया है। खासतौर पर उनके अमेरिका दौरे और वहाँ की गतिविधियों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका की 10 दिन की यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने व्हाइट हाउस के अधिकारियों से चुपचाप मुलाकात की। ये राजनयिक नियमों का गंभीर उल्लंघन था, क्योंकि इस यात्रा की जानकारी या समन्वय भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से नहीं किया गया था।
इसके अलावा हडसन इंस्टीट्यूट के एक कार्यक्रम में उन्हें ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ के पास बैठे देखा गया। यह संस्था जॉर्ज सोरोस द्वारा वित्त पोषित है और इसे हिंदू विरोधी गतिविधियों के लिए जाना जाता है।
जॉर्ज सोरोस ने खुद भारत में सत्ता परिवर्तन का सार्वजनिक आह्वान किया है। उनकी संस्था ओपन सोसाइटी फाउंडेशन ने OCCRP (ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट) को फंडिंग दी है, जिसने अडानी समूह के खिलाफ रिपोर्टें प्रकाशित की थीं।
राहुल गाँधी की उज़्बेकिस्तान यात्रा भी चर्चा में रही, क्योंकि वह यात्रा यूएसएआईडी की प्रशासक सामंथा पावर की यात्रा के साथ मेल खाती थी। सामंथा पावर भी सोरोस समर्थित नेटवर्क से जुड़ी मानी जाती हैं।
साथ ही सैम पित्रोदा के एनजीओ ‘ग्लोबल नॉलेज इनिशिएटिव’ को यूएसएआईडी, रॉकफेलर फाउंडेशन और अमेरिकी विदेश विभाग से फंडिंग मिलती रही है।
इन सभी बातों को मिलाकर यह संकेत मिलता है कि राहुल गाँधी और उनके सहयोगियों के विदेशी संगठनों और भारत-विरोधी तत्वों के साथ संबंध हो सकते हैं। ये गतिविधियाँ भारत की राजनीति में विदेशी हस्तक्षेप की आशंका को और मजबूत करती हैं।

राजनीतिक राजद्रोह या सिर्फ गलत निर्णय?

हालाँकि मोसाद के कथित खुलासे की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जो परिस्थितियाँ सामने आई हैं वे राहुल गाँधी की राजनीति की एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर पेश करती हैं।
राहुल गाँधी ने हाल के वर्षों में सोरोस से जुड़े एक्टिविस्टों से मिलने और विदेशी ताकतों को भारत के खिलाफ बोलने वालों को आगे बढ़ाने का काम किया है। ये वे सीमाएँ हैं जिन्हें एक जिम्मेदार विपक्षी नेता को कभी पार नहीं करना चाहिए, खासकर एक लोकतंत्र में।
उनका हालिया ट्वीट, जिसमें उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप से प्रधानमंत्री मोदी, अडानी और रूस के तेल व्यापार से जुड़ी कथित वित्तीय जानकारी ‘उजागर’ करने की अपील की, वह न सिर्फ बेबुनियाद है, बल्कि यह भारत की आंतरिक नीति में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने के खतरे के बहुत करीब माना जा रहा है।
इस तरह के बयान और गतिविधियाँ भारत की भू-राजनीतिक स्थिति, आर्थिक स्थिरता और वैश्विक सहयोगियों के साथ रिश्तों को नुकसान पहुँचा सकती हैं। इन प्रयासों को एक राजनीतिक वापसी की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर तब जब कांग्रेस को लगातार तीन लोकसभा चुनावों और कई राज्यों में हार का सामना करना पड़ा है।

भारत पर वाशिंगटन का बढ़ता दबाव और अडानी कार्ड

राहुल गाँधी की हालिया टिप्पणी को समझने के लिए उसका पूरा संदर्भ जानना जरूरी है। अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बना रहा है कि वह एक ऐसा व्यापार समझौता करे जो भारत के लिए असंतुलित है लेकिन अमेरिकी हितों के लिए काफी फायदेमंद है।
जब भारत ने इस तरह के समझौते पर आपत्ति जताई, तो अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 25% तक टैक्स लगाने की धमकी दी। इस बीच, अमेरिका ने भारत पर यह आरोप भी लगाया कि वह ‘रूस की युद्ध मशीन को फंड कर रहा है’, जबकि सच्चाई ये है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ खुद रूस से अरबों डॉलर की चीजें आज भी आयात कर रहे हैं। ऐसे में यह आरोप पाखंड भरा और दोहरा मापदंड दिखाता है।
ऐसे संवेदनशील समय में राहुल गाँधी अगर अडानी मामले की आड़ लेकर अमेरिका के आरोपों का समर्थन करते हैं, तो यह भारत पर अमेरिकी दबाव को और बढ़ाने जैसा है। इस तरह की राजनीति से एकतरफा और भारत विरोधी व्यापार समझौते का रास्ता खुल सकता है, जिससे भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और संप्रभुता को नुकसान पहुँच सकता है।

राहुल गाँधी किसके पक्ष में हैं?

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद अहम होती है। वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, गलतियों को उजागर करता है और जनता की आवाज को मंच देता है। लेकिन जब कोई नेता अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते विदेशी ताकतों से मेलजोल बढ़ाए तो वह शत्रुतापूर्ण और भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देता है।
इसके साथ ही वह राष्ट्रीय हितों से समझौता करने जैसा जोखिम उठाता है, तब असहमति और विश्वासघात के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है। राहुल गाँधी के पिछले बयानों और विदेश दौरों से जुड़ी गतिविधियाँ इसी ओर इशारा करती हैं।
उन पर विदेशी हस्तक्षेप को हवा देने, संदिग्ध अंतरराष्ट्रीय संगठनों और लॉबियों से जुड़ने और अब अडानी मुद्दे को आधार बनाकर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भारत के खिलाफ कार्रवाई की अपील करने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं।
यह सब मिलाकर एक बड़ा और चिंताजनक सवाल खड़ा करता है। क्या राहुल गाँधी आज भारत की विपक्षी राजनीति की आवाज हैं या फिर वे किसी विदेशी एजेंडे की पटकथा निभा रहे हैं?

‘ग्रेटर इजरायल’ की तरफ बढ़ रहा यहूदी राष्ट्र; घुटनों पर आया जिहादी अल-शुरा: कौन हैं ड्रूज? जिनकी हिफाजत के लिए सीरिया पर बम बरसा रहा इजरायल: क्या बदल जाएँगी यहूदी राष्ट्र की सीमाएँ?

                 इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू और सीरिया के राष्ट्रपति अल शारा (फोटो साभार: एकरेकेटर)
पश्चिम एशिया एक बार फिर संकट के मुहाने पर है। दक्षिणी सीरिया के सुवेदा में दो समुदायों ड्रूज (Druze) और बेडौइन के बीच स्थानीय संघर्ष के रूप में शुरू हुआ विवाद अब क्षेत्रीय तनाव का केंद्र बन गया है। इजरायली फाइटर प्लेन ने सीरियाई क्षेत्र में 160 से ज्यादा हवाई हमले किए हैं।

इस हमले का कारण सीरिया की नई सरकार द्वारा ड्रूज अल्पसंख्यकों के विरुद्ध की गई क्रूर कार्रवाई थी। इसके तहत कई ड्रूज नागरिकों की सामूहिक हत्या की गई। इसके वीडियो सोशल मीडिया पर भी हैं। ड्रूज समुदाय का इजरायल से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ता है।

इन्हीं घटनाओं के बाद इजरायली वायुसेना ने सीरिया पर 160 से ज्यादा हवाई हमले किए। इजरायल ने यह कार्रवाई सिर्फ आत्म-रक्षा के लिए नहीं, बल्कि मानवीय सहायता के तहत भी की ताकि ड्रूज समुदाय को बचाया जा सके। हालाँकि यह हमला केवल ड्रूज की सुरक्षा तक सीमित नहीं था। इजरायल ने इस मौके का इस्तेमाल सीरियाई सेना को नुकसान पहुँचाने और इजरायल व सीरिया के बीच एक बफर जोन बनाए रखने के लिए भी किया।

गौर करने वाली बात यह है कि इजरायल ने राजनीतिक कारणों से सीरिया में एक पूर्व जिहादी को राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार किया था। लेकिन इस हमले के जरिए इजरायल ने साफ कर दिया कि वह सीरियाई सरकार द्वारा धार्मिक और जातीय हिंसा को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगा।

दरअसल बेंजामिन नेतन्याहू आतंकियों पर कार्यवाही करने का साहस इसलिए कर पा रहे हैं क्योकि वहां भारत की तरह दोगला और देश-विरोधी विदेशियों के हाथ की कठपुतली वाला विपक्ष नहीं है। Operation Sindoor में विपक्ष पाकिस्तान की बोली बोल वहां की सुर्खियां बन अपने ही देश की सरकार और सेना को घेरने में लगा रहा। पाकिस्तान अपने डोसियर में भारत के इन दोगले नेताओं के बयानों का उल्लेख कर रहा था। Operation Sindoor से पाकिस्तान से ज्यादा चोट और चीखा-चिल्ली भारत के दोगले नेताओं की निकली है।     

कौन हैं ड्रूज और क्यों है इजरायल को उनकी परवाह ?

ड्रूज एक छोटा लेकिन एकजुट मजहबी समुदाय हैं। इनकी शुरुआत 10वीं सदी में इस्माइली शिया इस्लाम से हुई थी। हालाँकि समय के साथ यह समुदाय एक अलग मजहबी और जातीय पहचान बन गया है। ये लोग मुख्य रूप से सीरिया, लेबनान और इजरायल के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं।

वे इजरायली डिफेंस फोर्स (IDF) में सेवा करते हैं, समाज में सक्रिय भूमिका निभाते हैं और देश के प्रति वफादार नागरिक माने जाते हैं। उनकी पहचान इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी हुई है। दक्षिणी सीरिया में, खासकर स्वैदा (Suwayda) नामक इलाके में ड्रूज लोग रहते हैं।

यह इलाका इजरायल के गोलान हाइट्स के पास है और लंबे समय से इजरायल और सीरियाई जिहादी समूहों के बीच एक बफर जोन का काम करता रहा है। यहाँ अस्थिरता इजरायल के लिए सिर्फ एक मानवीय संकट नहीं, बल्कि एक रणनीतिक खतरा भी है। अगर इस इलाके से बेडुइन (Bedouin) जनजाति के लोगों के रुप एक और दुश्मन मोर्चा खुलता है तो यह इजरायल के लिए अस्वीकार्य है।

हाल ही में जब एक बेडुइन जनजाति ने स्वैदा में एक चेकपोस्ट बनाई और एक ड्रूज व्यक्ति पर हमला किया, तो जवाबी कार्रवाई शुरू हो गई। इसके बाद अपहरण, हत्या और बदले की कार्रवाइयों का सिलसिला चल पड़ा। सीरियाई सरकार ने इस मामले में हस्तक्षेप किया, लेकिन वो तटस्थ नहीं रही। स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, सीरियाई सेना ने बेडुइन पक्ष का साथ दिया, जिससे हिंसा और बढ़ गई। कुछ ही दिनों में 300 से अधिक लोगों की मौत हो गई, जिनमें 27 ड्रूज नागरिकों को बेरहमी से मारने की खबरें सामने आईं।

इजरायल ने कई बार दमिश्क (सीरियाई सरकार) को चेतावनी दी कि वे ड्रूज लोगों को निशाना बनाना बंद करें, लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई। जब ड्रूज लोगों की हत्याओं के वीडियो सामने आने लगे और इजरायल के अंदर से ड्रूज स्वयंसेवक अपने लोगों की मदद के लिए सीमा पार करने लगे, तब IDF ने हस्तक्षेप किया।

पूर्व जिहादी के हाथ से निकल रही सीरिया की व्यवस्था

सीरिया के वर्तमान राष्ट्रपति और पूर्व जिहादी अल-शरा के पास अपने देश के लिए एक सुनहरा मौका था। वे लंबे समय से प्रतिबंधों का सामना कर रहे सीरियाई समाज को शांति, समृद्धि और निवेश के साथ एक नई दिशा दे सकते थे।

सऊदी अरब, तुर्की, और कुछ हद तक इजरायल और अमेरिका जैसे देश किसी न किसी कारण से उनके प्रति सकारात्मक रुख रखते हैं। उन्हें यह परिस्थिति समझनी चाहिए और अपने लोगों की रक्षा करनी चाहिए थी, न कि समाज में हिंसा को बढ़ावा देना चाहिए था। लेकिन जो कुछ ड्रूज अल्पसंख्यकों पर हो रहा है, वह कुछ और ही कहानी बताता है।

इजरायल की कई चेतावनियों के बावजूद अल-शरा ने इन हमलों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उल्टा उनकी सेनाएँ इस हिंसा का समर्थन करती दिखीं। इसके बाद इजरायल ने जवाबी कार्रवाई की।

अमेरिका ने किया हस्तक्षेप लेकिन यह इतना भी आसान नहीं

अमेरिका ने अब हस्तक्षेप करते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। लेकिन उसकी स्थिति थोड़ी जटिल है। सीरिया अमेरिका के खेमे में नहीं आता। फिर भी हाल के वर्षों में तुर्की और सऊदी अरब के कहने पर अमेरिका ने सीरिया के राष्ट्रपति अल-शरा से बातचीत की थी।

उस समय ट्रंप पश्चिम एशिया के दौरे पर थे। तुर्की की चिंता थी कि शरणार्थियों की आमद कम हो, जबकि सऊदी अरब चाहता था कि सीरिया को एक बड़े सुन्नी गठबंधन में शामिल किया जाए। हालाँकि इसका मतलब यह नहीं है कि अब सीरिया अमेरिका का मित्र बन गया है। दरअसल  यहीं पर ‘ब्लॉक थ्योरी’ काम नहीं करती। आज की दुनिया में गठबंधन वैचारिक नहीं बल्कि लेन-देन के हिसाब से बनते हैं।

उदाहरण के तौर पर भारत अगर चीन से बातचीत कर रहा है, तो इसका ये मतलब नहीं कि वो चीन के साथ हो गया है। वैसे ही अमेरिका का सीरिया से संपर्क भी भरोसे पर नहीं बल्कि अस्थायी जरूरतों पर आधारित है।

‘ग्रेटर इजरायल’ की तरफ बढ़ रहा यहूदी राष्ट्र

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम इजरायल की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इसे कुछ लोग ‘ग्रेटर इजरायल’ की सोच कहते हैं। हालाँकि यह सिद्धांत अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।

हालाँकि मौजूदा हकीकत यह है कि इजरायल अपनी सीमाओं के आस-पास स्थिर और सुरक्षित बफर जोन बनाना चाहता है, खासकर उन इलाकों में जहाँ उसकी अपनी अल्पसंख्यक आबादी, जैसे कि ड्रूज समुदाय रहता है। ड्रूज समुदाय की रक्षा कर के इजरायल न सिर्फ नैतिक बढ़त हासिल करता है, बल्कि सीरिया के एक रणनीतिक क्षेत्र में अपना प्रभाव भी बढ़ाता है।

इजरायल का मकसद कोई क्षेत्र छीनना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उसके दुश्मन इन इलाकों पर प्रभावी न हों। फिलहाल अमेरिका के राजदूत टॉम बैरक ने जानकारी दी है कि इजरायल और सीरिया ने युद्ध विराम पर सहमति जताई है। लेकिन इजरायल ने साफ कहा है कि अगर ड्रूज समुदाय पर दोबारा हमला हुआ, चाहे वो हमला उसकी सीमाओं के बाहर ही क्यों न हो तो वह सैन्य कार्रवाई करेगा।