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बेडरूम से घुसकर मादुरो को पकड़ने वाला अमेरिका, किम जोंग उन से क्यों नहीं टकराता?

                               US द्वारा वेनेज़ुएला के प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो को पकड़ कर ले जाया गया
दुनिया ने हमेशा ताकत को सलाम किया है, लेकिन आज की दुनिया में कमजोरों को सजा भी दी जाती है। ऐसे समय में जब संसाधनों को हड़पने की होड़ और बड़ी ताकतों के बीच दुश्मनी जगजाहिर है, यूएन चार्टर और नैतिकता की बात करना बेमानी है।

जो बचा है वह एक लेन-देन वाली सच्चाई है। ताकतवर देश, छोटे देशों को बर्बाद कर सकते हैं। लेकिन जो मजबूत देश हैं, उनका कुछ खास नहीं बिगाड़ सकते। उन पर हमला नहीं कर सकते। उन्हें झुकने के लिए मजबूर भी नहीं किया जा सकता। यहाँ तक कि यूएन भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता। इस क्रम में सबसे ऊपर न्यूक्लियर पावर वाले देश हैं।

वेनेजुएला में US मिलिट्री एक्शन

वेनेजुएला में US का ऑपरेशन, जिसका परिणाम प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो की किडनैपिंग के रूप में सामने आया, लैटिन अमेरिकन जियोपॉलिटिक्स में सिर्फ़ एक घटना नहीं है। यह एक केस स्टडी है कि आज की दुनिया में ताकत का इस्तेमाल कैसे किया जाता है? कैसे न्यूक्लियर पावर नहीं होना देश की संप्रभुता के लिए नुकसानदायक है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 3 जनवरी को ऐलान किया कि यूनाइटेड स्टेट्स की सेना ने मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ लिया है और उन्हें देश से बाहर ले जाया गया है। यह ऑपरेशन बिना किसी शर्मिंदगी के एकतरफ़ा किया गया।

लोकल टाइम के हिसाब से सुबह करीब 2 बजे काराकास जोरदार धमाकों से दहल उठा। आसमान में काफी नीचे उड़ रहे फाइटर प्लेन की आवाज से लोग दहशत में थे। बिजली चली गई थी। चारों तरफ मची अफरा-तफरी के बीच नेशनल इमरजेंसी घोषित कर दिया गया, लेकिन इतनी देर में ही आजाद देश वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रभुत्व स्थापित हो चुका था।

वॉशिंगटन ने इस कार्रवाई को कैरिबियन और पूर्वी प्रशांत महासागर के रास्ते कथित तौर पर नशीली दवाओं की तस्करी का हवाला देते हुए, एक बड़े ‘ड्रग्स के खिलाफ युद्ध’ का हिस्सा बताया। न तो अमेरिकी कॉन्ग्रेस से सलाह ली गई और न ही यूनाइटेड नेशंस से पूछा गया। लॉजिक आसान था- यूनाइटेड स्टेट्स मादुरो को सजा देना चाहता था, उसने ऐसा किया भी। नशीली दवाएँ और ड्रग्स शायद राष्ट्रपति मादुरो और वेनेजुएला के खिलाफ गैर-कानूनी सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने के सिर्फ बहाने हैं।

वेनेज़ुएला को जिस चीज ने खास तौर पर कमजोर बनाया, वह सिर्फ आर्थिक, अंदरूनी नाराज़गी या डिप्लोमैटिक अकेलापन नहीं था। वह था न्यूक्लियर छतरी का न होना। अगर वेनेजुएला के पास न्यूक्लियर छतरी होती, तो अमेरिका किसी भी हाल में अपने पड़ोसी देश के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करता।

वेनेज़ुएला की तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो ये और भी साफ हो जाता है। सालों से नॉर्थ कोरिया को एक ऐसा दुष्ट देश कहा जाता रहा है जिसे सुधारा नहीं जा सकता। इसके नेता किम जोंग पर कई आरोप हैं। बिना किसी कानूनी कार्रवाई के हत्याएँ करने, टॉर्चर करने और दमनकारी नीति अपनाने के आरोप हैं।

न्यूक्लियर पॉवर होना शांति लाता है या तबाही

नॉर्थ कोरिया ने बार-बार अमेरिका और उसके साथी देशों, मसलन साउथ कोरिया और जापान को धमकी दी है। इनदोनों ही देशों में अमेरिका के बड़े मिलिट्री बेस हैं। इसके जवाब में नॉर्थ कोरिया ने जापानी इलाके के ऊपर मिसाइलों का टेस्ट किया है और दावा किया है कि उसके पास अमेरिका के वेस्ट कोस्ट पर हमला करने की काबिलियत है। नॉर्थ कोरिया ने रेगुलर ICBM का टेस्ट किया है। इस दौरान उसने जापान के ऊपर से ले जाकर प्रशांत महासागर में क्रैश कर दिया। इसके बाद अमेरिका को चुनौती देते हुए कहा कि वह अमेरिका की सिलिकॉन वैली के दिल, सैन फ्रांसिस्को पर हमला करने की क्षमता रखता है।

ट्रंप और अमेरिका लंबे समय से नॉर्थ कोरिया के राष्ट्राध्यक्ष किम जोंग उन को एक क्रूर तानाशाह कहता आ रहा है, जो सिर्फ सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अपने ही लोगों पर ज़ुल्म करता है।

फिर भी उकसावे के बावजूद, नॉर्थ कोरिया पर अमेरिका ने कोई हमला नहीं किया। प्योंगयांग पर आधी रात को कोई रेड नहीं हुई। किम जोंग उन को पकड़कर किसी इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने की कोई कोशिश नहीं हुई। इसका कारण नॉर्थ कोरिया पर अमेरिकी मेहरबानी नहीं है, बल्कि बदले की कार्रवाई का डर है।

वेनेजुएला पर आक्रमण, न्यूक्लियर हथियारों से लैस नॉर्थ कोरिया पर नहीं

नॉर्थ कोरिया के पास न्यूक्लियर हथियार हैं। एक छोटा जवाबी हमला भी सियोल पर हमलों की बौछार कर सकता है, पैसिफिक में US सेना को कमजोर कर सकता है, और किसी के भी कंट्रोल से बाहर तनाव बढ़ा सकता है। यह अकेली बात वाशिंगटन को नॉर्थ कोरिया की सरकार बदलने के सपने छोड़ने के लिए मजबूर करती है। वह सिर्फ पाबंदियाँ ही लगा सकता है।

यही लॉजिक चीन पर भी लागू होता है, जिसके पास दुनिया में न्यूक्लियर हथियारों का तीसरा सबसे बड़ा स्टॉक है। चीन में अक्सर मानवाधिकार का उल्लंघन, मिलिट्री दबाव और आक्रामक विस्तार का रवैया अपनाता रहा है। साउथ चाइना सी में, चीन ने अपने हर पड़ोसी देश के साथ टकराव की स्थिति में है।

उसने आर्टिफिशियल आइलैंड बनाना शुरू कर दिया है, दुनिया के सबसे बिज़ी समुद्री कॉरिडोर में से एक को सैनिक छावनी में तब्दील कर दिया है। इंटरनेशनल पानी में चलने वाले मछली पकड़ने वाले जहाजों को परेशान करता रहा है। ताइवान के साथ उसका हमेशा से झगड़ा रहा है और उसने गलत तरीके से भारतीय इलाकों पर अपना दावा किया है।

ट्रेड वॉर, डिप्लोमैटिक दबाव, ताइवान पर कब्ज़ा करने की धमकियों और नौसेना की खतरनाक चालों के बावजूद, US ने अभी तक सीधी मिलिट्री कार्रवाई नहीं की है। चीन ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हाउस भी है, जो इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ बनाने में इस्तेमाल होने वाले रेयर-अर्थ मिनरल से लेकर हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स सामान तक, हर प्रोडक्ट के लिए ग्लोबल सप्लाई चेन को लगभग कंट्रोल करता है।

न्यूक्लियर पावर होना देश के लिए जरूरी

जून 2025 में ईरान पर US और इजराइली हमलों को देखें तो अंतर और भी साफ हो जाता है। 21 जून को ट्रंप ने घोषणा की कि यूनाइटेड स्टेट्स ने ईरान की तीन न्यूक्लियर ठिकानों, फोर्डो, नतांज और एस्फाहान पर हमला किया है। इस दौरान पहाड़ों के अंदर बने ठिकानों को निशाना बनाया गया। GBU-57 मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर्स, 30,000 पाउंड के बंकर-बस्टर बमों से लैस B-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स पहाड़ों के नीचे जाकर उन जगहों को नष्ट किया।

ट्रंप का मैसेज साफ था, “दुनिया में कोई दूसरी मिलिट्री नहीं है जो ऐसा कर सकती थी। अब शांति का समय है।” यह डिप्लोमेसी नहीं थी। यह ज़बरदस्ती थी जिसे अमेरिका ने अंजाम दिया। इससे साफ जाहिर होता है कि ताकत, ताकत का सम्मान करती है।

ईरान की फोर्डो संवर्धन सुविधा (Fordo enrichment facility) जमीन के नीचे 80-90 मीटर की गहराई पर स्थित है। तेहरान के दक्षिण में एक पहाड़ी के अंदर स्थित यह ईरान की सबसे सुरक्षित परमाणु ठिकानों में एक है।

ईरान ने लगातार कहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि पश्चिमी देशों ने चिंता व्यक्त की है कि इसका उपयोग हथियार विकसित करने के लिए किया जा सकता है। इस आशंका के मद्देजनर यूनाइटेड स्टेट्स ने एयर अटैक किया। यह एक युद्ध जैसा काम था, जिसे पश्चिमी देशों ने सही ठहराया, क्योंकि ईरान वेपन-ग्रेड यूरेनियम के करीब पहुँच रहा था।

न्यूक्लियर युग की यही उलझन है: कब्ज़ा करने से संयम आता है; पीछा करने से मिलिट्री हमले होते हैं।

इज़राइल ने पहले ही ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ शुरू कर दी थी। ईरान ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3’ से इसका जवाब दे रहा था। इस दौरान ड्रोन और मिसाइल से इजरायली एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया, लेकिन ईरान के पास मिडिल ईस्ट में US बेस पर हमला करने और होर्मुज स्ट्रेट को बाधित करने की क्षमता नहीं थी, जिससे दुनिया भर की तेल सप्लाई का लगभग 30% गुजरता है।

ऐसे में अमेरिका को बढ़त मिली हुई थी। वॉशिंगटन ने ध्यान से हिसाब लगाया। ईरान के पास अभी न्यूक्लियर हथियार नहीं हैं। इसलिए अमेरिका ने सीधे तौर पर ईरान के ठिकानों को निशाना बनाया।

इसकी तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो साफ होता है कि न्यूक्लियर छतरी जरूरी है, साथ ही अमेरिका को नुकसान पहुँचाने की क्षमता। इकॉनमी टूटी हुई है, डिप्लोमेसी पसंद नहीं है, ये मायने नहीं रखता।

यूनाइटेड नेशंस, जिसपर सभी देशों की रक्षा करने की जिम्मेदारी है, उसके सेक्रेटरी-जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने ईरान पर US के हमलों पर ‘गंभीर चिंता’ जताई। खतरनाक नतीजों की चेतावनी दी और डिप्लोमेसी की अपील की। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। UN नैतिकता की बात करता है, लेकिन नतीजा ताकत के बल पर मिलती है।

वेनेजुएला के बाद कोलंबिया को ट्रंप की धमकियाँ

वेनेजुएला और मादुरो को जबरन उठा ले जाने के ऑपरेशन के बाद लैटिन अमेरिका अस्थिर हो चुका है। ट्रंप ने खुलेआम अब कोलंबिया को धमकी दी है। उसके प्रेसिडेंट गुस्तावो पेट्रो को ‘सुधरने’ को कहा वरना वेनेजुएला वाला हश्र होने की बात कही। यहाँ एक बार फिर कोलंबिया की संप्रुभता को चुनौती दी गई।

खास बात यह है कि वेनेजुएला पर हुए अमेरिकी हमले की कोलंबिया ने निंदा की और इसे लैटिन अमेरिका की संप्रभुता पर हमला करार दिया। इससे अमेरिका बिदक गया और ट्रंप ने ‘अपने पीछे देखने’ के लिए कहा।

वेनेजुएला और राष्ट्रपति मादुरो के साथ हुए बदसलूकी ने दुनिया को परेशान कर दिया है। न्यूक्लियर हथियार अब सिर्फ़ स्ट्रेटेजिक एसेट नहीं रहे, बल्कि देश की ढाल हैं। ये दुनिया के सबसे ताकतवर देश को भी रुकने, हिसाब लगाने और फिर से सोचने पर मजबूर करते हैं। इसके बिना देश की संप्रभुता की कीमत नहीं रह जाती। ताकतवर देश अपने फायदा-नुकसान के हिसाब से ट्रीट करते हैं।

यह सच्चाई यह भी बताती है कि देशों में न्यूक्लियर पावर बनने का दबाव क्यों बढ़ रहा है, कम क्यों नहीं हो रहा है। दुनिया के छोटे-छोटे देश देख रहे हैं कि लीबिया के साथ क्या हुआ, जब उसने अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम छोड़ दिया। वे देखते हैं कि इराक के साथ क्या हुआ, जिसके पास कभी न्यूक्लियर प्रोग्राम नहीं था। वे देखते हैं कि वेनेज़ुएला के साथ क्या हुआ। और वे देखते हैं कि नॉर्थ कोरिया के साथ क्या नहीं हुआ।

नतीजा लॉजिकल होता है, आइडियोलॉजिकल नहीं।

ऐसी दुनिया में जहाँ मानवाधिकार की बात सेलेक्टिव होता है, जहाँ ‘रूल्स-बेस्ड ऑर्डर’ सिर्फ कमजोर लोगों पर लागू होता है और जहाँ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ मूकदर्शक बन जाती है, उनकी सोच कोई मायने नहीं रखता, वहाँ न्यूक्लियर पॉवर होना संप्रभुता की आखिरी गारंटी बन जाती है।

यह न्यूक्लियर वॉर का सपोर्ट नहीं है। बल्कि शांति और संतुलन के लिए ‘न्यूक्लियर’ का होना जरूरी है। ये तबाही मचा सकता है, लेकिन शांति भी यही लाता है।

अजीब बात है कि आज शांति अच्छी नीयत या ग्लोबल नियमों से नहीं, न्यूक्लियर ताकत की मोहताज बन गई है। क्योंकि बदले की कार्रवाई का डर इतना खतरनाक है कि ताकतवर देश भी खौफ खाते हैं।

उस डर ने नॉर्थ कोरिया को बचाया। इसने चीन को बचाया। इसने अमेरिका को ईरान में ‘हिसाब लगाने’ पर मजबूर किया और इसकी गैरमौजूदगी ने काराकास को बर्बाद कर दिया।