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क्या इसी रमीज के कारण पिता लालू यादव को किडनी देने वाली बेटी रोहिणी आचार्य ने छोड़ा परिवार?

        पिता लालू यादव के साथ रोहिणी आचार्य (बाएँ) और तेजस्वी यादव के साथ रमीज बताया जा रहा शख्स (दाएँ)
बिहार चुनाव से दो पार्टियों-RJD और कांग्रेस- में बगावत हो गयी। सत्ता के गलियारों में यह भी चर्चा है कि INDI गठबंधन से भी कांग्रेस को अलग करने की मंत्रणा चल रही है। लोगों का कहना है कि जिस कांग्रेस के सहारे हम जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे थे वही हमारे कंधे पर अपने आपको बचा रही है और पुरानी पार्टी मान गले लगाते रहे। आज की सियासत में कम्युनिस्ट, कांग्रेस और केजरीवाल पार्टी तीनों डूबते जहाज है। कई पोलिंग स्टेशन पर केजरीवाल पार्टी NOTA से भी कम वोट ले पायी। खैर जमानत तो सभी की जब्त होना इस पार्टी के लिए कोई नयी बात नहीं। जमानत जब्त तो केजरीवाल पार्टी के लिए दाल-रोटी बन चुकी है। 
                                                                                                      साभार The NewsIn
                                                                                                     साभार 
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बिहार में राजद की हार के करारी हार के बाद लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने परिवार से रिश्ता तोड़कर राजनीति को अलविदा कह दिया है। लालू यादव को किडनी देने वाली रोहिणी ने X पर पोस्ट कर अपने फैसले जानकारी दी है और इसके लिए संजय यादव और रमीज को जिम्मेदार बताया है।

हरियाणा से आने वाले संजय यादव RJD के राज्यसभा सांसद हैं और तेजस्वी यादव के मित्र हैं। वह अक्सर तेजस्वी यादव के साथ नजर आते हैं और उन्हें तेजस्वी का राजनीतिक सलाहकार माना जाता है। हालाँकि, रमीज का नाम अभी लोगों के लिए अनजान है और वो सुर्खियों में कम ही रहा है।

कौन है रमीज?

‘द ललनटॉप’ के पॉलिटिकल एडिटर पंकज झा ने X पर एक पोस्ट में बताया है कि रमीज नेमत खान उत्तर प्रदेश के बलरामपुर के रहने वाले हैं। उन्होंने लिखा है, “लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने जिन रमीज का जिक्र किया है। वे यूपी के बलरामपुर के रहने वाले हैं। जेल में बंद पूर्व सांसद रिजवान जहीर के दामाद हैं। इन पर हत्या समेत कई मुकदमें हैं। ये RJD का सोशल मीडिया और चुनाव प्रबंधन देखते हैं। इनकी पत्नी भी विधानसभा का चुनाव लड़ चुकी हैं।”

                                                               पंकज झा का X पोस्ट

पंकज झा ने एक अन्य फोटो भी X पर शेयर की है जिसमें रमीज नेमत खान और संजय यादव, तेजस्वी यादव व राहुल गाँधी के साछ नजर आ रहे हैं।

रमीज पर फिरोज पप्पू की हत्या का आरोप

रमीज नेमत और उनके ससुर व पूर्व सपा सांसद रिजवान जहीर पर बलरामपुर में नगर पंचायत तुलसीपुर के पूर्व चेयरमैन फिरोज पप्पू की हत्या का आरोप है। 4 जनवरी 2022 की रात पूर्व चेयरमैन फिरोज अहमद उर्फ पप्पू उनके घर से कुछ दूरी पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जाँच में नेमत समेत 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था। आरोप था कि सपा के टिकट की दावेदारी के विवाद में इस हत्या की गई थी।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, रमीज नेमत फिलहाल जमानत पर बाहर है। फिरोज पप्पू हत्याकांड से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में आगामी 18 और 20 नवंबर को सुनवाई निर्धारित की गई है।

संजय ने कराई रमीज की RJD में एंट्री

सूत्रों के मुताबिक, संजय यादव ने ही रमीज नेमत की RJD में एंट्री कराई थी। बताया जाता है कि संजय यादव की रमीज के ससुर रिजवान जहीर से अच्छी तरह से जान पहचान थी और वहीं से उनकी पहचान रमीज नेमत से भी हुई थी। इसके कुछ समय बाद संजय ने रमीज की RJD में एंट्री करा दी।

TV9 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि रमीज 2016 में आरजेडी से जुड़े थे। वो पहले पहले डिप्टी सीएम ऑफिस में बैकडोर का काम देखते थे और उसके बाद तेजस्वी के दफ्तर से जुड़ गए। बकौल रिपोर्ट, रमीज तेजस्वी के डेली रूटीन और कैंपेनिंग का काम देखते हैं।

तेजस्वी के साथ क्रिकेट भी खेला है रमीज

तेजस्वी और रमीज की दोस्ती सियासत से इतर क्रिकेट की भी है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि रमीज तेजस्वी यादव के साथ क्रिकेट खेलता था। IANS के पत्रकार सौरव राज ने X पर एक पोस्ट में लिखा है, “जिस रमीज का जिक्र रोहिणी आचार्य ने किया है वो तेजस्वी यादव का दोस्त है, UP का रहने वाला है, साथ में क्रिकेट खेलता था।”

रोहिणी के परिवार और राजनीति छोड़ने के बाद अब RJD में कलह और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। संजय यादव के कारण पहले से ही परिवार में कलह चल रही है। तेज प्रताप यादव आए दिन उन पर बिना नाम लिए हमला करते हैं। मीसा भारती ने उन पर परोक्ष रूप से हमला बोला है और अब रमीज नेमत का नाम भी इस कड़ी में जुड़ गया है।

योगी आदित्यनाथ को ‘नकली बाबा’ कहने वाले तेजस्वी यादव माँ का दूध पिया है तो किसी मुस्लिम नेता को ‘नकली मौलवी’ कहकर दिखाओ

मुस्लिम वोट की खातिर आखिर विपक्ष कितना नीचे गिरेगा? नीचता की भी एक सीमा होती है। तेजस्वी अपने पिता लालू यादव से पूछो कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जब 7 नवंबर 1966 को पार्लियामेंट स्ट्रीट पर गोपाष्टमी के दिन गो-हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेल रही थी तब श्रद्धेय कृपालु जी महाराज ने हुंकार भरते हुए कहा था "इंदिरा जिस तरह निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेल रही है तेरी भी मौत गोपाष्टमी को होगी और तेरी पार्टी को समाप्त करने हिमालय से आधुनिक ड्रैस में एक तपस्वी आएगा।" 31 अक्टूबर 1984 को गोपाष्टमी ही थी। साधु का श्राप आज सच हो रहा है। दूसरे, जब राहुल गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की चर्चा चल ही रही थी तब योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि "जितनी जल्दी हो राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाइए" अंजाम सबके सामने है। जिस कांग्रेस की किसी समय तूती बोलती थी आज वही कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए क्षेत्रीय पार्टियों के आगे झुक रही है। साधु का पद विरासत में नहीं मिलता। साधना करनी पड़ती है, तपस्या करनी पड़ती है। योगी आदित्यनाथ को 'नकली बाबा' तो बक दिया लेकिन क्या किसी मुस्लिम को ‘नकली मौलवी’ कहने की हिम्मत है? चुनाव छोड़ बिल से बाहर नहीं निकल पाओगे।

  

बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए सरगर्मी तेज है और नेता अलग-अलग मंचों-टीवी चैनलों पर जाकर अपनी बातें रख रहे हैं। एक इंटरव्यू के दौरान बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने ‘रैपिड फायर राउंड’ में योगी आदित्यनाथ को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्हें ‘नकली बाबा' बता दिया।

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो है हीं, साथ ही वो हिंदुओं की पवित्र गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर भी हैं। तेजस्वी यादव को अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पर कोई राजनीतिक हमला करना था तो वो उनके काम को लेकर सवाल उठा सकते थे लेकिन उन्होंने योगी आदित्यनाथ पर हमले के लिए उनकी धार्मिक पहचान को चुना।

असल में तेजस्वी यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ‘नकली बाबा’ कहकर न सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला किया है बल्कि पूरे हिंदू समाज की धार्मिक पहचान पर प्रहार करने की कोशिश की है। यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, यह उस मानसिकता की झलक है जो दशकों से हिंदू प्रतीकों, संतों और सनातन परंपराओं का मजाक उड़ाने में आनंद महसूस करती आई है।

योगी आदित्यनाथ एक हजार साल पुरानी नाथ परंपरा के उत्तराधिकारी है। उनकी साधु या बाबा की पहचान कोई राजनीतिक मुखौटा नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक जीवन का प्रतीक है। लेकिन तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के लिए हिंदू साधु का सम्मान कोई मायने नहीं रखता क्योंकि उनकी राजनीति का ईंधन ही हिंदू विरोध है।

अब सवाल उठता है कि क्या तेजस्वी यादव किसी मुसलमान नेता को ‘नकली मौलाना’ कह सकते हैं? क्या वे किसी मौलवी या इमाम के वस्त्र पर व्यंग्य कर सकते हैं? क्या वे किसी मुस्लिम नेता से कह सकते हैं कि उसकी टोपी, दाढ़ी या नमाज दिखावा है? इसका जवाब आपको, हमें सभी को पता है कि वह ऐसा नहीं करेंगे। अगर उन्होंने ऐसा करने की हिम्मत भी दिखाई तो पूरा सेक्युलर कुनबा और मीडिया की तथाकथित प्रगतिशील जमात उन पर टूट पड़ेगी।

हिंदुओं के मामले में भावनाओं के आहत होने से जुड़ा कोई नियम लागू नहीं होता है। केवल तेजस्वी ही नहीं, उनकी जमात के दूसरे नेता भी हिंदुओं को निशाने पर रखते हैं। तेजस्वी और उन जैसे नेताओं को ये अच्छी तरह से पता है कि हिंदू अपने विवेक में विश्वास रखता और इसलिए बार-बार उसे अपमानित किया जा सकता है। वो जानते हैं कि हिंदू ऐसा कहने पर कभी सड़क पर नहीं उतरेगा, हिंसा नहीं करेगा। हिंदुओं की इसी सहिष्णुता को ये नेता अपनी ढाल बनाते हैं।

योगी आदित्यनाथ की धार्मिक पहचान पर हमला कोई नई बात नहीं है। तेजस्वी और उनकी पूरी कथित सेक्युलर ब्रिगेड के लोग योगी आदित्यनाथ को अजय सिंह बिष्ट कहकर बुलाते रहे हैं। संत बनने के बाद कोई शख्स अपनी पुरानी पहचान, अपना परिवार छोड़ देता है लेकिन राजनीतिक मर्यादा तो छोड़िए ये ब्रिगेड धार्मिक परंपराओं का सम्मान तक नहीं करती है।

इन्हीं तेजस्वी यादव को चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक को साधना है तो ये उनके पक्ष में वक्फ बिल तक को कूड़ेदान में फेंकने की बात कर रहे हैं। ये उस वोट बैंक के लिए टोपी भी लगाते हैं लेकिन हिंदुओं का सम्मान उनके लिए कोई मायने नहीं रखता है।

तेजस्वी यादव जैसे नेता शायद भूल जाते हैं कि योगी आदित्यनाथ जैसे संत न केवल राजनीतिक पद पर हैं बल्कि लाखों लोगों के लिए आस्था और प्रेरणा के प्रतीक हैं। योगी आदित्यनाथ ने जिस अनुशासन और तपस्या से खुद को इस परंपरा का उत्तराधिकारी बनाया है क्या वो कोई ‘नकली बाबा’ कर सकता है। मगर तेजस्वी यादव के लिए ये बातें मायने नहीं रखतीं क्योंकि उनके लिए सत्ता और वोट बैंक ही सर्वोपरि हैं। उन्हें इस देश की सनातन आत्मा से कोई लेना-देना नहीं है।

यह भी सच है कि ऐसे बयान हिंदू समाज को भावनात्मक रूप से चोट पहुँचाते हैं। दुर्भाग्य है कि हमारे यहाँ हिंदू अस्मिता की रक्षा को लेकर कोई सामाजिक या राजनीतिक एकजुटता नहीं बन पाती है। अब वक्त आ गया है कि हिंदू समाज इस तरह के दोहरेपन को पहचानें। लोकतंत्र में आलोचना और असहमति रहे, रहती भी है लेकिन हिंदुओं की धार्मिक पहचान पर प्रहार लंबे समय तक एजेंडा नहीं बन सकता है।

तलवार की धार पर बिहार: महागठबंधन की अग्निपरीक्षा, तेजस्वी यादव राह में सियासी रोड़े


बिहार की राजनीति का रंगमंच 2025 के विधानसभा चुनावों के लिए तैयार है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) टिकटों की घोषणा करने के मामले में बाजी मार ले गया है। पीएम मोदी के दिशा-निर्देशन में राज्य की सारी सीटों पर सहमति हो गई है। पहले चरण का मतदान 6 नवंबर को होगा और इसके लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 17 नवंबर यानी एक दिन बाद ही है। इसके बावजूद महागठबंधन अभी सीटों का विवाद ही नहीं सुलझा पाया है। उसके सहयोगी दल अपनी ढपली, अपना राग अलाप रहे हैं। हालात यह हैं कि महागठबंधन में सीट शेयरिंग अभी तक नहीं हो पाई है। लेकिन सहयोगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने इससे पहले ही अपने कुछ प्रत्याशियों का एलान करके कांग्रेस को भड़का दिया है। उधर 65 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए हाथ-पैर मार रही कांग्रेस में अभी टिकट बंटवारा हुआ नहीं और टिकटार्थियों की नाराजगी दिखने लगी है। दिल्ली में केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के बाद टिकट दावेदारों ने जमकर नारेबाजी भी की। कांग्रेस को यह डर भी सता रहा है कि टिकटों की घोषणा के बाद सबसे ज्यादा बगावत उसी की पार्टी में होने वाली है। हालांकि यह भी सच है कि कांग्रेस से ज्यादा रोड़े तेजस्वी यादव की सियासी राहों में बिछ गए हैं। उनकी चुनौतियों पर नजर डालें तो यह उनके लिए सबसे ज्यादा जटिलताओं वाला चुनाव है।

बिहार में महागठबंधन में सीट शेयरिंग में महा-घमासान
बिहार में महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर स्थिति जटिल है। खबरों के अनुसार, महागठबंधन के अंदर अभी तक सीट शेयरिंग फॉर्मूला को लेकर पूरी सहमति नहीं बन पाई है। आरजेडी और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर कड़ा टकराव चल रहा है, जहां कांग्रेस 65 से ज्यादा सीटों की मांग पर अड़ी हुई है, जबकि आरजेडी कांग्रेस के लिए 55 सीटों की सीमा तय करना चाहती है। इस वजह से सीट बंटवारे पर अभी अंतिम फैसला नहीं हो पाया है और गठबंधन के दल तितर-बितर नजर आ रहे हैं। हालांकि बैठकों के बाद कुछ फॉर्मूला तय होने की खबरें भी आई हैं, लेकिन औपचारिक घोषणा अभी बाकी है। इस असमंजस के कारण चुनाव प्रक्रिया में भी कुछ अस्थिरता बनी हुई है, खासकर नामांकन की अंतिम तिथि एक दिन बाद ही है।

कत्ल की रात में भी सहमति ना बनी तो बंटाधार तय
इस टकराव के पीछे कांग्रेस की ओर से दलित-मुस्लिम समीकरण वाली सीटों की मांग और सीमांचल क्षेत्र की अधिक सीटें अपेक्षित होना है, जबकि आरजेडी इसे लेकर रजामंद नहीं है। इसके अलावा मुकेश सहनी के वीआईपी पार्टी की सीटों की मांग भी मुद्दा बनी है। इस तरह सीट बंटवारे का मामला महागठबंधन में अभी भी सुलझा नहीं है और यह चुनाव के समय तक एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। संक्षेप में, बिहार में महागठबंधन में सीट बंटवारा हुआ नहीं है, बल्कि अभी तक उस पर विवाद और असमंजस बना हुआ है। आज कत्ल की रात है, यदि सीट शेयरिंग पर सहमति नहीं बनी तो महागठबंधन ऐन मौके पर टूट सकता है। मुकेश सहनी तो अलग चुनाव लड़ने के संकेत भी दे चुके हैं।

पीके का चुनावी समर में आना तेजस्वी के लिए बुरे सपने जैसा
जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर का चुनावी समर में उतरना तेजस्वी के लिए बुरे सपने जैसा है। तेजस्वी यादव राघोपुर से दो बार (2015 और 2020) जीत चुके हैं। भाजपा के सतीश कुमार (जो एक यादव उम्मीदवार भी हैं और जिन्होंने पहले तेजस्वी की मां राबड़ी देवी को हराया था) पर उनकी जीत का अंतर 38,174 वोटों का था। अब किशोर का आना एक अचानक आए तूफान जैसा है, जो एक समुद्र की शांति को भंग करने की धमकी दे रहा है। रणनीतिक कौशल के लिए प्रसिद्ध पीके भले ही खुद की पार्टी को जिता ना पाएं, लेकिन तेजस्वी का खेल तो बिगाड़ ही सकते हैं। इसका उत्तर मतदाताओं की बदलती निष्ठाओं में निहित हो सकता है, जो बदलाव के आकर्षण से प्रभावित हो सकते हैं।

कांग्रेस ने 4000 आवेदन मांगे, अब भारी विरोध से मुश्किल
टिकट बंटवारा हुआ नहीं और टिकटार्थियों की नाराजगी दिखने लगी है। कांग्रेस को भी यह डर सता रहा है। दिल्ली में केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के बाद टिकट दावेदारों ने जमकर नारेबाजी भी की। इस कारण सदाकत आश्रम में हमेशा दिखने वाले नेताजी अब गायब रहने लगे हैं। दरअसल, इस बार पार्टी ने सभी विधानसभा क्षेत्रों से आवेदन मंगाए थे। इस कारण दावेदारों की संख्या चार हजार से ज्यादा हो गई। चुनावी साल में संगठन के अभाव में इन दावेदारों के सहारे ही पार्टी ने कार्यक्रमों और अभियान को सफल बनाया। कांग्रेस इन्हें आश्वस्त करती रही कि कार्यक्रमों में मेहनत के अनुसार ही टिकट मिलेगा। इन्हें रोज नए-नए टास्क सौंपे गए। रोजाना इन दावेदारों से फीडबैक भी लिया गया। माई बहिन मान योजना, हर घर झंडा कार्यक्रम सहित अन्य कार्यक्रमों के फार्म भरवाने में इनका सहयोग लिया। राहुल की वोटर अधिकार यात्रा में बढ़चढ़कर हिस्सेदारी की। टिकट की आस में दिन-रात एक कर मेहनत करने वाले कई नेता अब पार्टी से सिंबल चाह रहे हैं। नई दिल्ली में दावेदारों ने वहां डेरा जमा लिया है। केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के दौरान कांग्रेस मुख्यालय के बाहर कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी भी की। कार्यकर्ता हाल ही में पार्टी में शामिल हुए नेताओं को तवज्जो देने से भी नाराज हैं।

ओवैसी की एमआईएम मुस्लिम वोट बैंक में सैंध लगाएगी
इसके बाद, असदुद्दीन ओवैसी की मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (MIM) द्वारा बिहार में कई उम्मीदवार उतारने की तैयारी में लगे अशांत जल पर नजर डालते हैं। हालांकि एमआईएम की चुनावी सफलता संदिग्ध हो सकती है (2020 में एमआईएम ने मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र में 5 सीटें जीती थीं), मगर मुस्लिम वोटों को हथियाने की उसकी क्षमता महागठबंधन के लिए एक बड़ा खतरा है। दरअसल, तेजस्वी का आधार मुस्लिम-यादव (एम-वाई) गठबंधन से मजबूत है, फिर भी इस समर्थन की नींव प्रतिस्पर्धी उम्मीदवारों के भार तले टूटने का ख़तरा है। यह एक नाज़ुक दौर है, जो सांप्रदायिक राजनीति की भट्टी में बने गठबंधनों का भाग्य तय कर सकता है।

तेजप्रताप से लेकर रोहिणी आचार्य तक पारिवारिक प्रतिद्वंद्विता
तेजस्वी यादव के अपने परिवार में ही कई दरारें सामने दिखाई दे रही हैं। उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव और बहन रोहिणी आचार्य संभावित विध्वंसक के रूप में उभरकर सामने आ गए हैं। उनकी महत्वाकांक्षाएं और आक्रोश सतह के नीचे ही उबल रहे हैं। पारिवारिक बंधन, जो अक्सर ताकत का स्रोत होता है, यहां एक संभावित दरार में बदल गया है। ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में जहां धारणाएं वास्तविकता जितनी ही महत्वपूर्ण हैं, यादव परिवार के भीतर असंतोष आरजेडी के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। इससे तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर भी सवालिया निशान लगते हैं। तेजस्वी की बड़ी बहन, डॉ. मीसा भारती (जिनके पास पेशेवर चिकित्सा की डिग्री है), पाटलिपुत्र से सांसद हैं और उन्होंने आखिरी बार 2024 में जीत हासिल की थी। वह बहुत महत्वाकांक्षी भी हैं और भविष्य में अपने छोटे भाई तेजस्वी यादव के लिए चुनौती बन सकती हैं।

सीएम फेस ना बनाकर कांग्रेस ने तेजस्वी को डुबोया
महागठबंधन के मामले को और भी जटिल बनाने में राहुल गांधी और कांग्रेस अहम भूमिका निभार रहे हैं। कांग्रेस पार्टी का रुख, जो एक सहयोगी दल होते हुए भी तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में समर्थन देने में साफ हिचकिचा रही है। यह अनिर्णय महागठबंधन के भीतर भी गूंज रहा है और समर्थकों के बीच अनिश्चितता के बीज बो रहा है। एकता पर निर्भर गठबंधन में, सीएम कैंडिडेट का अभाव तेजस्वी की सफल अभियान के लिए आवश्यक विविध मतदाता आधार को एकजुट करने की क्षमता को जरूर बाधित करेगा। कांग्रेस की इस चुप्पी को न केवल एक रणनीतिक विकल्प के रूप में, बल्कि विश्वास की कमी के रूप में भी देखा जा सकता है, जो तेजस्वी की विश्वसनीयता को कम कर सकता है।

चौतरफा घिरे तेजस्वी की राहें मुश्किल: कोर्ट की मार, सीट शेयरिंग में बंटाधार, परिवार में तकरार और कांग्रेस का वार


बिहार विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद महागठबंधन की आपसी खींचतान और दलों के बीच घमासान के चलते आरजेडी नेता तेजस्वी यादव चौतरफा घिर गए हैं। एक ओर कांग्रेस और वीआईपी के साथ सीट शेयरिंग का विवाद अभी तक नहीं सुलझा है, दूसरी ओर चुनाव से ऐन पहले कोर्ट ने लालू-तेजस्वी को करारा झटका दे दिया है। इधर कांग्रेस ज्यादा सीटें लेने पर अड़ी है, तो उधर तेजस्वी के भाई तेजप्रताप ने जिन सीटों पर प्रत्याशी की घोषणा की है, उनमें से आधी सीटें आरजेडी के सिटिंग विधायक की हैं। यानी तेजप्रताप ने अपने पिता लालू प्रसाद और छोटे भाई तेजस्वी यादव की पार्टी आरजेडी को डैमेज करने की तैयारी कर ली है। इसके चलते महागठबंधन पीछे छूटता जा रहा है, जबकि एनडीए की स्थिति लगातार मजबूत हो रही है। दरअसल, बिहार में आगामी चुनावों के बीच, आईआरसीटीसी होटल भ्रष्टाचार मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने लालू यादव पर आरोप तय किए। लालू के अलावा राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव के खिलाफ भी धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र का आरोप तय किए गए हैं। अदालत का यह निर्णय विधानसभा चुनाव पर बड़ा असर डाल सकता है।

महागठबंधन में सीट शेयरिंग पर घमासान, एनडीए में सहमति

दरअसल, विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद महागठबंधन सीट शेयरिंग में पेंच फंसता नजर आ रहा है। बाहर से सभी नेता एकजुटता का दिखा रहे हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि अंदरखाते सीट बंटवारे को लेकर जबरदस्त खींचतान मची हुई है। जहां कांग्रेस तेजस्वी को सीएम प्रोजेक्ट करने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं, वहीं सीटों के बंटवारे पर भी महागठबंधन में सहमति नहीं बन पा रही है। दूसरी ओर एनडीए में सीटों के बंटवारे पर ना सिर्फ सहमति बन चुकी है, बल्कि बीजेपी और जेडीयू ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान भी कर दिया है। इसके अलावा एनडीए को पीएम मोदी, विकास और वर्क परफार्मेंस के चलते वोट पोल में बढ़त मिल रही है। ऐसे में चेहरा, नैरेटिव, संगठन और सहयोगी दलों की सीमाओं के चलते बिहार में तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले गठबंधन का पिछड़ना लाजिमी नजर आ रहा है।

IRCTC होटल भ्रष्टाचार मामले में लालू-तेजस्वी के खिलाफ आरोप तय

आगामी बिहार चुनाव के बीच आइआरसीटीसी होटल भ्रष्टाचार मामले में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ आरोप तय हो गए। राउज एवेन्यू स्थित विशेष न्यायाधीश की अदालत ने आइआरसीटीसी होटल भ्रष्टाचार मामले में पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, धारा 120 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसी एक्ट) के तहत आरोप तय कर दिए हैं। कोर्ट ने राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव के खिलाफ भी धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र के आरोप तय किए। अदालत ने तीनों आरोपितों से पूछा कि क्या खुद को दोषी मानते हैं या मुकदमे का सामना करेंगे? तीनों आरोपितों ने कहा कि वे मुकदमे का सामना करेंगे और इसे चुनौती देंगे। विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह निर्णय अहम माना जा रहा है और चुनाव में फैसले का बड़ा असर देखने को मिल सकता है। 24 सितंबर को विशेष अदालत ने पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी व बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, उनके बेटे व पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव सहित अन्य आरोपितों को उक्त तिथि पर पेश होने का निर्देश दिया था। अदालत ने मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 29 मई को अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था।

लालू ने होटल आवंटन के बदले में परिवार को पहुंचाया लाभ

यह मामला रांची और पुरी स्थित दो आइआरसीटीसी होटलों के टेंडर आवंटन में भ्रष्टाचार से जुड़ा है, जब लालू यादव रेल मंत्री थे। आरोप है कि होटल आवंटन के बदले में परिवार को लाभ पहुंचाने के लिए जमीन सौदे किए गए थे। बताया गया कि लालू प्रसाद यादव व्हीलचेयर में कोर्ट पहुंचे। तेजस्वी यादव और राबड़ी भी लालू यादव के साथ कोर्ट पहुंचे थे। वहीं, नौकरी के बदले जमीन घोटाला मामले में भी अदालत जल्द लालू प्रसाद यादव के खिलाफ आरोप तय हो सकती है। कोर्ट के आदेश से ही यह तय होगा कि इस मामले में लालू परिवार के सदस्यों के खिलाफ मुकदमा चलेगा या नहीं। लालू यादव, तेजस्‍वी यादव और राबड़ी देवी कोर्ट में मौजूद रहे। लालू यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, प्रेम गुप्ता समेत IRCTC घोटाले में 14 आरोपी हैं।

 चारा घोटाला समेत लालू और परिवार पर कई स्कैम के आरोप

वैसे आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने का यह पहला मामला नहीं है। उनका सबसे चर्चित मामला 1990 के दशक का ‘चारा घोटाला’ है। इसमें बिहार के पशुपालन विभाग से फर्जी बिलों के जरिए 950 करोड़ रुपये से अधिक की निकासी हुई थी। इस मामले में लालू यादव कई बार दोषी ठहराए गए और वे जेल भी जा चुके हैं। इसके अलावा, ‘जमीन के बदले नौकरी घोटाले’ में भी लालू परिवार के खिलाफ गंभीर आरोप लगे हैं। इस मामले में कहा गया है कि रेल मंत्रालय में ग्रुप डी की नौकरियां दिलाने के बदले में उम्मीदवारों से जमीनें ली गईं, जो राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव और अन्य परिजनों के नाम पर ट्रांसफर करवाई गईं। इस मामले की जांच सीबीआई और ईडी दोनों कर रही हैं।
आरजेडी-कांग्रेस-VIP में सीट शेयरिंग पर नहीं बन रही सहमति
महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर फंसा पेच अभी सुलझता नहीं दिख रहा है। कुछ सीटों पर आरजेडी और कांग्रेस के बीच अधिकार को लेकर अभी भी विवाद बना हुआ है। इसके चलते सहमति नहीं बन पाई है। तेजस्वी यादव के दिल्ली से लौटने के बाद यह तस्वीर साफ हुई है, लेकिन कुछ सीटों पर कौन लड़ेगा, यह अभी तक तय नहीं हो पाया है। दूसरी ओर वीआईपी पार्टी के चीफ मुकेश सहनी ने भी तेजस्वी की धड़कनें बढ़ाई हुई हैं। सूत्रों के मुताबिक मुकेश सहनी को कुल 16 सीटें देने पर बात हुई है और इसमें से भी कुछ सीटों पर कांग्रेस और आरजेडी के उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे, लेकिन चुनाव चिह्न वीआईपी का होगा। तेजस्वी यादव की सारी कोशिशों के बाद भी उपमुख्यमंत्री के नाम पर भी सहमति नहीं बन पाई है और यह फैसला अब चुनाव के बाद लिया जाएगा।

राहुल गाँधी के हाथ स्टेयरिंग देकर तेजस्वी यादव ने मार ली पैर पर कुल्हाड़ी, CM Face के लिए कांग्रेस ने दिखाई आंखें, जनता तय करेगी मुख्यमंत्री

पिता लालू यादव के रहते तेजस्वी ने राहुल के हाथ स्टेयरिंग क्यों थमा दिया? जमीन तुम्हारी, कार्यकर्ता तुम्हारे और मेहनत तुम्हारी होने पर भी हालाँकि राहुल ने अपने यानि कांग्रेस की जड़ें मजबूत करने की कोशिश जरूर की, लेकिन नरेंद्र मोदी की माँ को मंच से गाली दिलवाकर कांग्रेस अपनी ही नहीं राष्ट्रीय जनता दल को भी इतना नुकसान पहुंचाने से तेजस्वी के हाथ से सत्ता भी चली गयी। अगर तेजस्वी बिना राहुल के प्रचार करते सत्ता नहीं तो सत्ता के पास पहुँच सकते थे। अभी भी समय है कांग्रेस से पलड़ा झाड़ खुद प्रचार करें। INDI गठबंधन के टूटने की परवाह नहीं करनी चाहिए। 
 
  
बिहार में कथित ‘वोट चोरी’ के खिलाफ राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा में कंधे से कंधा मिलाकर चलते राजद तेजस्वी यादव आधी बाजी तो हार गए हैं। दरअसल, यात्रा के बाद से कांग्रेस को लगता है कि बिहार की जनता उसके साथ है, इसलिए वह अब राजद से अपनी शर्तों पर ही गठबंधन करेगी। यानी कम से कम मनमाफिक 70 सीटें और NO सीएम फेस। बिहार के कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरू ने सीएम फेस को लेकर पूछे गए सवाल पर दो टूक जवाब दे दिया कि चुनाव से पहले यह तय नहीं होगा और मुख्यमंत्री बिहार की जनता ही तय करेगी। इसके बाद कांग्रेस की सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के पास अब कोई विकल्प नही रह गया है। कांग्रेस के तेजस्वी यादव को इस झटके के साथ ही बीजेपी ने भी तंज करते हुए कहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव के लिए महागठबंधन की ड्राइविंग सीट अब तेजस्वी के हाथ से छूट गई है। चुनाव से पहले सीएम फेस बनने के तेजस्वी यादव के सपने हवा-हवाई हो गए हैं। उधर तेजस्वी पर लालू के दूसरे लाल ने भी हमले तेज कर दिए हैं।

कांग्रेस-राजद में मतभेद शुरू, दोनों दल अलग यात्रा निकालेंगे
कांग्रेस ने बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकालकर तेजस्वी को झटका दे दिया है। इसके चलते अब कांग्रेस और राजद के बीच मतभेदों की शुरुआत हो गई है। वोटर अधिकार यात्रा में जहां दोनों दलों के नेता एकसाथ दिखे, वहीं अब दोनों ही दलों ने अलग-अलग यात्रा निकालने का फैसला ले लिया है। बिहार विधानसभा चुनावों को लेकर दिल्ली में हुए कांग्रेस के मंथन के बाद बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरू ने कहा कि अब राज्य में हर घर अधिकार यात्रा निकाली जाएगी। हम फिर से जनता के बीच हर घर अधिकार यात्रा लेकर जाएंगे। दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव बिहार अधिकार यात्रा निकालने का घोषणा की है। तेजस्वी की यात्रा 16 सितंबर से जहानाबाद से शुरू होगी और 20 सितंबर को वैशाली में खत्म होगी। यात्रा के दौरान तेजस्वी यादव लोगों से संवाद करेंगे।

तेजस्वी यादव के सीएम फेस बनने के सपने को चकनाचूर किया
इधर दिल्ली में तेजस्वी यादव के सीएम फेस बनने के सपने को चकनाचूर करते हुए बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरू ने साफ-साफ कहा कि जनता ही तय करेगी कि कौन बनेगा बिहार के मुख्यमंत्री। चुनाव से पहले किसी को सीएम फेस बनाने पर कोई फैसला नहीं हुआ है। बता दें कि कुछ दिनों पहले राहुल गांधी भी महागठबंधन में सीएम फेस बनाने के सवाल को टाल गए थे। जबकि इससे पहले तेजस्वी यादव चापलूसी की सारी हदें पार करते हुए अभी से राहुल गांधी के अगले लोकसभा चुनाव का पीएम फेस बता रहे थे।

कम से कम मनमाफिक 70 सीटें और NO सीएम फेस- कांग्रेस
वहीं सीट शेयरिंग के सवाल पर अल्लावरू ने कहा कि, हम मानते हैं कि गठबंधन में नए साथी आएंगे तो सभी को कंप्रोमाइज करना होगा, तभी नए साथी को मौका मिलेगा। हर प्रदेश में अच्छी और खराब सीटें होती हैं। उन्होंने मीडिया को बताया कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में बिहार के नेताओं के साथ 2 घंटे तक सीट शेयरिंग पर मंथन हुआ। जिसमें सूत्र के जरिए पता चला कि कांग्रेस बिहार में कम से कम 70 सीटों पर लड़ेगी। यह सीटें भी कांग्रेस की मनमाफिक होंगी। इसके साथ ही कांग्रेस ने अलग से कोई मेनिफेस्टो नहीं करने का निर्णय लिया है। भाजपा नेताओं ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस चूंकि जीतने के बाद भी मेनिफेस्टों में किए गए वादों को पूरा नहीं कर पाती, इसलिए यहां घोषणा पत्र ही जारी नहीं करने जा रही है। कांग्रेस के कर्नाटक और हिमाचल के घोषणा पत्र इसके उदाहरण हैं।

तेजस्वी नहीं बनेंगे सीएम, कांग्रेस क्वालिटी सीटों पर ही लड़ेगी- पप्पू
बिहार के पूर्णिया सांसद और जन अधिकार पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने भी तेजस्वी यादव के खिलाफ मोर्चा खोला है। पप्पू यादव ने बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस की सीटों और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) नेता तेजस्वी यादव की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी पर बड़ा बयान दे दिया है। पप्पू यादव ने कहा कि तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री के उम्मीदवार नहीं है। तेजस्वी यादव के सीएम फेस के दावे पर उन्होंने कहा, “तेजस्वी यादव सिर्फ महागठबंधन के संयोजक हैं। महागठबंधन का सीएम फेस जनता तय करेगी कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा। विधायक अपने-अपने दल का नेता चुनेंगे, और फिर गठबंधन मिलकर अपने दल के नेता को तय करेगा। पिछले विधानसभा चुनाव का जिक्र करते हुए कहा, “पिछली बार कांग्रेस को क्वालिटी वाली सीटें नहीं मिली थीं। इस बार कांग्रेस किसी भी सूरत में क्वालिटी सीटों पर समझौता नहीं करेगी।

तेजस्वी यादव के हाथ से बिहार चुनाव की स्टेयरिंग छिनी- गिरिराज
इस बीच बिहार चुनाव से पहले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने तेजस्वी यादव पर तगड़ा प्रहार किया है। गिरिराज सिंह ने कहा है कि तेजस्वी यादव के हाथ से स्टेयरिंग छिन गई है। इतना ही नहीं अब तेजस्वी यादव को उसके बड़े भाई तेज प्रताप यादव भी आंखें दिखाने लगे हैं। उन्होंन राजद-कांग्रेस के बारे में कहा कि महा-अंतर्कलह का शिकार महागठबंधन में अब सिर फुटौव्वल अपने चरम पर पहुंच गया है। तेजस्वी यादव मानें न मानें पर कांग्रेस ने इशारों में साफ कह दिया है कि उसकी नजर में तेजस्वी और राजद की क्या हैसियत है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि बिहार की राजनीति में एक बार फिर महागठबंधन की अंतर्कलह खुलकर सामने आ गई है। कांग्रेस ने साफ संकेत दे दिया है कि वह कम से कम 70 सीटें अपने हिस्से में चाहती है।

महागठबंधन ऐसी ट्रेन है, जिसकी हर बोगी इंजन बनना चाहती है
कांग्रेस ने राजद के खिलाफ अपना दांव चल दिया है। कांग्रेस इन सीटों का चयन खुद करेगी और केवल “जिताऊ सीटें” ही लेगी। उधर, सहनी की VIP पार्टी 60, माले 40 और जेएमएम व रालोजपा (पारस गुट) जैसी पार्टियां भी कम से कम 10-15 सीटों की मांग कर रही हैं। ऐसे हालात में राजद के हिस्से मुश्किल से 50-55 सीटें ही बचेंगी। केंद्रीय मंत्री सिंह ने कहा कि महागठबंधन दरअसल वह ट्रेन है जिसकी हर बोगी इंजन बनने की कोशिश में है। यही वजह है कि इस गठबंधन में एकजुटता कम और गड़बड़झाला ज्यादा है। सिंह ने कहा कि यह वही राजद है जो बाहर से खुद को विपक्ष का अगुआ दिखाने की कोशिश कर रही है, लेकिन भीतर से उसके सहयोगी ही उसके पैरों तले ज़मीन खींच रहे हैं। इसलिए तेजस्वी का कद लगातार बौना होता जा रहा है।

बिहार : राहुल का साथ देना RJD को पड़ गया भारी; तेजस्वी के चलते ये विधायक RJD को पहुंचाएंगे नुकसान, तेजप्रताप फैमिली इमेज डैमेज कर रहे, यादव बेल्ट में राजबल्लभ की चुनौती

Deep State की कठपुतली राहुल गाँधी का साथ देना RJD को बहुत भारी पड़ गया। कांग्रेस समेत जितनी भी बिहार की पार्टियां है सभी जानते है कि कांग्रेस किसी भी स्तर पर नहीं है इतना सबकुछ जानते हुए लालू यादव के रहते तेजस्वी यादव ने इतनी बड़ी गलती की है जिस वजह से वह खुद बीजेपी को टक्कर देने में बहुत पीछे चले गए हैं। या यह भी कह सकते हैं कि जिस तरह टनों दूध में एक चम्मच दही गिर जाने से सारा दूध बेकार हो जाता है बिलकुल वही हालत तेजस्वी ने कर ली है। जबकि तेज प्रताप यादव बार-बार इस कांग्रेस मेल से सचेत कर रहे थे, लेकिन उसका अनसुना करना पार्टी को बहुत नुकसान कर रहा है। सभी इस बात को जानते हैं कि राहुल एक सुलझे हुए नेता की बजाए एक सफेदपोशी उपद्रवी के नाम से जाने जाते हैं।      

कहावत है कि जब जहाज डूबने वाला होता है तो सबसे पहले उसमें से चूहे भाग खड़े होते हैं। बिहार में कई बरसों तक राज करने वाले राष्ट्रीय जनता दल का भी पार्टी रूपी जहाज डूबने के कगार पर है। इसीलिए विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के 8 विधायक पार्टी से साफ-साफ किनारा करते नजर आ रहे हैं। इनमें बाहुबली आनंद मोहन के बेटे, अनंत सिंह की पत्नी से लेकर एक बार जीते भरत बिंद तक शामिल हैं। तेज प्रताप यादव परिवार की इमेज को डैमेज कर हैं तो बाहुबली अनंत सिंह, राजबल्लभ यादव, आनंद मोहन, रामा सिंह अपने-अपने एरिया में चुनौती दे रहे हैं। इन विधायकों की बगावत से RJD को विधानसभा चुनाव में बहुत नुकसान होने वाला है। क्योंकि इनमें कुछ ऐसे कद्दावर नेता भी हैं, जिनका प्रभाव सिर्फ अपनी सीट पर ही नहीं, बल्कि अन्य सीटों पर भी है। ऐसे में तेजस्वी यादव अभी तक तो सिर्फ भाई तेजप्रताप के बागी तेवरों को कोस रहे थे, लेकिन आने वाले समय में यह तय है कि उन्हें अपनी ही पार्टी के और नेताओं की बगावत से भी जूझना पड़ सकता है।

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विधानसभा चुनाव से पहले ही तेजस्वी यादव पर दोहरी मार

दरअसल, तेजस्वी यादव अगले चुनाव में मुंगेरी लाल की तरह सीएम बनने का सपना देखने में लगे हुए हैं। हालांकि उनका यह ख्याली पुलाव पकने वाला नहीं है। तेजस्वी यादव ने इसीलिए पिछले माह वोटर अधिकार यात्रा के तहत नवादा रैली में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का ऐलान कर एक बड़ा दांव खेला। अपने संबोधन में उन्होंने कहा, ”आने वाले चुनाव में हम सब मिलकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाएंगे।” दिलचस्प बात यह रही कि तेजस्वी ने राहुल के लिए जो खुला समर्थन जताया, वैसा ही समर्थन देने से राहुल गांधी साफ-साफ मुकर गए। यानी तेजस्वी की सारी कोशिशों के बावजूद उनको महागठबंधन का सीएम फेस बनाने का ऐलान नहीं हुआ। दरअसल, कांग्रेस अभी बिहार की सत्ता की राजनीति में खुलकर दांव लगाने से बचना चाहती है? बिहार में जब चंद महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं तो राहुल गांधी का यह मौन कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। क्योंकि राजनीति में कई बार मौन शब्दों से ज्यादा असर छोड़ जाता है। तेजस्वी यादव दोहरी मुश्किल में हैं। एक तरफ राहुल का मौन आड़े आ रहा है तो दूसरी ओर विधायक उन्हें बीच मैदान में छोड़े जा रहे हैं।

तेज प्रताप यादव: तेजस्वी और परिवार को इमेज को डैमेज कर रहे

इस लिस्ट में सबसे ऊपर RJD सुप्रीमो लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव हैं। मई में उनको पार्टी और परिवार से बाहर निकाल दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट कर अपनी नई रिलेशनशिप का ऐलान किया था। तेज प्रताप फिलहाल हसनपुर से RJD के विधायक हैं। वह महुआ से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। जब पार्टी से निकला दिया गया है तो जाहिर है टिकट RJD नहीं देगी। महुआ से RJD के मुकेश रौशन विधायक हैं। चुनाव नजदीक आते-आते तेज प्रताप के तेवर तेजस्वी और परिवार के प्रति कड़े होते जा रहे हैं। वे जहानाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान तेजस्वी के समर्थन में नारे लगाने पर भड़क गए। इतना सुनते ही तेज प्रताप ने कहा- ‘यहां फालतू बात मत करो। किसी व्यक्ति विशेष की सरकार नहीं आती है, जो घमंड करेगा, वो जल्दी गिरेगा और अगर नौटंकी करोगे तो रोजगार नहीं मिलेगा।’

विधायकों के पार्टी छोड़ने से RJD पर पड़ेगा बहुत असर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘7 सिटिंग विधायकों ने RJD से दूरी बना ली है। इसमें से लगभग 5 सीटों में ऐसे हालात बच चुके हैं कि अब RJD को विधानसभा चुनाव में टिके रहने के नाकौं चने चबाने पड़ेंगे। राजनीतिक और जातिगत समीकरण आरजेडी के खिलाफ है। इसके अलावा लालू यादव ने ऐन चुनाव से पहले तेज प्रताप यादव को पार्टी से बाहर किया है। इसमें से नवादा और रजौली राज बल्लभ के प्रभाव वाली सीट है। राज बल्लभ जिसे चाहेंगे वही जीतेगा। शिवहर में मिलाजुला खेल हो सकता है। मोकामा में अनंत सिंह जिधर रहेंगे जीत होगी। कुल मिलाकर तेजस्वी यादव ने अपनी ही पार्टी के विधायकों से तकरार मोल लेकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।

विभा देवी: पीएम के मंच पर दिखीं लालू के खास रहे राजबल्लभ की पत्नी
गयाजी में 22 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी के मंच पर नवादा से RJD विधायक विभा देवी दिखीं। इसके बाद चर्चा है कि वह 2025 का विधानसभा चुनाव RJD के टिकट पर नहीं लड़ेंगी। वैसे आधिकारिक तौर पर उन्होंने अब तक पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया है। लेकिन पीएम के मंच पर दिखने के बाद अब उनका पार्टी में रहना मुश्किल हो रहा है। 2020 विधानसभा चुनाव में लालू यादव के खास रहे बाहुब ली राजबल्लभ यादव की पत्नी विभा देवी ने निर्दलीय श्रवण कुमार को हराया था। तीसरे स्थान पर JDU के कौशल यादव थे। हाल में कौशल यादव RJD में शामिल हुए हैं। इसके बाद से कयास लगाए जा रहे हैं कि विभा का रास्ता अलग हो सकता है। दरअसल, नवादा की राजनीति में कौशल यादव और राज बल्लभ यादव एक-दूसरे के विरोधी हैं। बता दें कि राजबल्लभ यादव परिवार 1990 से ही नवादा में एक शक्ति का केंद्र रहा है। उनके बड़े भाई कृष्णा यादव भी विधायक रहे। इस परिवार का नवादा के आसपास के विधानसभा सीटों पर भी असर है। राज बल्लभ 2000 में RJD के टिकट पर चुनाव जीते तो श्रम मंत्री बनाए गए थे। इस सीट पर 2019 के उपचुनाव में JDU के कौशल यादव जीते। 2020 के चुनाव में राज बल्लभ की पत्नी विभा लड़ीं और जीत गई।

तेजस्वी से तकरार क्यों- 2022 में विधान परिषद का चुनाव था। राजबल्लभ अपने भतीजे को चुनाव लड़वाना चाहते थे। तेजस्वी ने राजबल्लभ की मर्जी से अलग श्रवण कुशवाहा को कैंडिडेट बना दिया। राजबल्लभ ने भतीजे और कृष्णा यादव के बेटे अशोक यादव को निर्दलीय उतार दिया। अशोक यादव चुनाव जीत गए। इसके बाद राजबल्लभ 2024 के लोकसभा चुनाव में छोटे भाई विनोद यादव को चुनाव लड़वाना चाहते थे। तेजस्वी ने फिर उनकी बात नहीं मानी और MLC चुनाव में हारे श्रवण कुशवाहा को कैंडिडेट बना दिया। राजबल्लभ यादव ने अपने भाई विनोद यादव को निर्दलीय मैदान में उतार दिया। इसका सीधा नुकसान RJD के कैंडिडेट को हुआ। RJD का यादव वोट बिखर गया। विनोद यादव को करीब 39 हजार वोट मिले। श्रवण कुशवाहा 67 हजार वोट से ये चुनाव हार गए। यहां से BJP के विवेक ठाकुर चुनाव जीते।

चेतन आनंद: फ्लोर टेस्ट के समय आनंद ने बदला था पाला
शिवहर से RJD विधायक चेतन आनंद ने फरवरी 2024 में नीतीश सरकार के फ्लोर टेस्ट के दौरान ही पाला बदल लिया था। वह RJD की जगह JDU के साथ हो गए थे। हालांकि, चेतन आनंद ने अब तक आधिकारिक तौर पर RJD से इस्तीफा नहीं दिया है। अभी उनकी मां लवली आनंद शिवहर से JDU की सांसद हैं। चेतन आनंद बाहुबली पूर्व सांसद आनंद मोहन के बड़े बेटे हैं। वह भी शिवहर से सांसद रह चुके हैं। यहां राजपूत, ब्राह्मण, मुस्लिम और पटेल समाज जीत-हार तय करने में अहम भूमिका निभाता है। इस इलाके के सवर्ण समाज में आनंद मोहन की पकड़ शुरू से मजबूत रही है। सकती है

तेजस्वी से तकरार क्यों- DM जी. कृष्णैया की हत्या में उम्रकैद की सजा काट रहे आनंद मोहन को नीतीश सरकार ने 2023 में जेल मैनुअल में संशोधन कर रिहा कर दिया। जेल से बाहर आते ही आनंद मोहन नीतीश कुमार के साथ घूमने लगे। वैसे उनकी राजनीति की शुरुआत लालू शासन के विरोध से ही हुई थी। पिता को जेल से बाहर निकालने और लोकसभा चुनाव में मां को टिकट देने के वादे ने चेतन आनंद को तेजस्वी यादव से दूर कर दिया।

नीलम देवी: बाहुबली अनंत सिंह के चलते पत्नी की राह भी अलग
बाहुबली पूर्व विधायक अनंत सिंह की राह RJD से अलग हो गई है। उनकी पत्नी और विधायक नीलम देवी JDU की तरफ हो गई हैं। AK-47 केस में सजा होने के बाद अनंत सिंह की सदस्यता रद्द हो गई थी। उसके बाद 2022 में हुए उपचुनाव में नीलम देवी RJD के टिकट पर चुनाव लड़ी और जीत गईं। फरवरी 2024 में नीतीश सरकार की फ्लोर टेस्ट के दौरान नीलम देवी JDU की तरफ हो गईं। इसके बाद अनंत सिंह को लोकसभा चुनाव से पहले पेरोल मिली और उन्होंने ललन सिंह के लिए जमकर प्रचार किया। ललन सिंह चुनाव जीत गए। AK-47 केस में अनंत सिंह हाईकोर्ट से बरी हो गए हैं और चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। मोकामा की राजनीतिक जमीन पर अनंत सिंह की मजबूत पकड़ है। उनको चुनाव हराना टफ है। बीते 20 साल से उनको कोई हरा नहीं पाया है। 2005 से लगातार उनका कब्जा है। वह JDU-RJD, यहां तक की वह निर्दलीय भी चुनाव जीत चुके हैं।

तेजस्वी से तकरार क्यों- तेजस्वी यादव और अनंत सिंह के बीच राजनीतिक पटरी नहीं बैठ रही है। उनका जेल से बाहर आना एक कारण माना जाता है। चूंकि, नीतीश सरकार में ही वह जेल गए और उसी सरकार में बरी भी हुए। यहां भूमिहारों का वोट बैंक काफी प्रभाव रखता है। इसके अलावा कुर्मी, यादव, धानुक, पासवान और मुस्लिम भी अच्छी संख्या में हैं। RJD की तरफ से 2025 में यहां कौन उम्मीदवार होगा, अभी तय नहीं है।

प्रकाशवीर चौधरी: तेजस्वी ने यात्रा में ही टिकट काटने का किया ऐलान
रजौली से प्रकाश वीर RJD के टिकट पर लगातार दो बार से जीत रहे हैं। प्रकाश वीर चौधरी (पासी) कम्युनिटी से आते हैं। विभा देवी के साथ वे भी PM मोदी के साथ मंच पर थे। प्रकाश वीर ने इस पर सफाई दी थी, ‘मुझे तीन दिन पहले आमंत्रण आया था। इसलिए हम लोग गए। प्रधानमंत्री हम सबके हैं। हम लोग देखने और सुनने गए थे कि PM देश के गरीबों के लिए क्या-क्या काम कर रहे हैं। राजबल्लभ जी का आदेश मिल जाएगा, तो अभी रिजाइन कर देंगे।’ प्रकाश वीर, राज बल्लभ यादव के करीबी माने जाते हैं। बताया जाता है कि वह ही उन्हें टिकट दिलवाते हैं और जिताते हैं। अब जब राज बल्लभ परिवार RJD से दूर जा रहा है तो प्रकाश वीर का रहना मुश्किल होगा। रजौली विधानसभा में SC-ST कम्युनिटी के करीब 97 हजार वोट हैं। इनके अलावा यहां अति पिछड़ा और यादव के लगभग 1 लाख वोट हैं।

तेजस्वी से तकरार क्यों- दरअसल, लोकसभा चुनाव में ही तेजस्वी यादव ने साफ कर दिया था कि प्रकाश वीर को विधानसभा का टिकट नहीं देंगे। तेजस्वी यादव वोटर अधिकार यात्रा के दौरान नवादा पहुंचे थे। वहां कुछ लोगों ने प्रकाश वीर को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं देने की मांग की, इस पर तेजस्वी यादव ने अपनी सहमति दे दी।

प्रह्लाद यादव: दबंग छवि के विधायक ने RJD को दिया झटका
लखीसराय के सूर्यगढ़ा से विधायक प्रह्लाद यादव RJD के संस्थापक सदस्य कहे जाते हैं। 1995 से लगातार चुनाव जीत रहे हैं। दबंग और बाहुबली छवि के प्रह्लाद यादव ने फरवरी 2024 में नीतीश सरकार के फ्लोर टेस्ट के दौरान RJD से अलग लाइन लिया और सरकार के पाले में चले गए। हाल में उनके टिकट को लेकर NDA के अंदर ही बयानबाजी सुनने को मिली थी। एक कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने कहा था, ‘सूर्यगढ़ा JDU की सीट है तो JDU ही उम्मीदवार तय करेगी। हम अपने सामाजिक समीकरण को देखते हुए निर्णय लेंगे। प्रह्लाद यादव डिप्टी CM विजय सिन्हा के करीबी माने जाते हैं। वह कह चुके हैं कि मेरी कुर्बानी को तवज्जो दी जानी चाहिए। विजय सिन्हा के कहने पर ही मैं NDA के साथ आया था।

तेजस्वी से तकरार क्यों- प्रह्लाद यादव का बालू का बड़ा कारोबार है। या यूं कहें बालू के पैसे से ही उनकी पूरी राजनीति चलती है। ऐसे में सरकार के आसपास रहने से उनको फायदा दिखा और तेजस्वी के खिलाफ पाला बदला। वैसे प्रह्लाद यादव हमेशा लालू परिवार के साथ रहे। लंबे समय तक लखीसराय के पार्टी के जिलाध्यक्ष भी थे। इलाके में काफी प्रभावशाली माने जाने वाले प्रह्लाद यादव पहली बार 1995 में निर्दलीय विधायक चुने गए थे। इसके बाद वह 2000, 2005, 2015 और 2020 में RJD के टिकट पर जीतते रहे हैं। 2025 विधानसभा चुनाव लड़ने का भी उन्होंने ऐलान किया है।

संगीता कुमारी: दलितों के सम्मान की बात कह संगीता ने छोड़ा साथ
फरवरी 2024 में नीतीश सरकार के फ्लोर टेस्ट के दौरान RJD से किनारा करने वाली चौथी विधायक संगीता कुमारी थीं। तब उन्होंने कहा था, ‘मुझे लगा कि कहीं न कहीं पार्टी (RJD) में दलितों का सम्मान नहीं हो रहा। इसलिए हमने यह निर्णय लिया।’ संगीता दलितों का सम्मान करने वाली BJP की तरफ चली गई थी। कहा जाता है कि RJD के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह की करीबी होने की वजह से संगीता कुमार को मोहनिया से टिकट दिया गया था। वह मूल रूप से कैमूर की रहने वाली हैं।

तेजस्वी से तकरार क्यों- 2020 विधानसभा चुनाव में संगीता ने बीजेपी के निरंजन राम को हराया था। निरंजन राम के अब तेजस्वी यादव के चक्कर काटने की चर्चाएं आम हैं। दूसरी संगीता को आरजेडी अब टिकट देने वाली नहीं है।

भरत बिंद: लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा में हुए थे शामिल
भभुआ से RJD विधायक भरत बिंद भाजपा के संपर्क में हैं। उन्होंने 2020 विधानसभा चुनाव में भाजपा की रिंकी रानी पांडेय को हराया था। कैमूर जिले की भभुआ विधानसभा सीट में कोयरी और कुर्मी वोटर अधिक हैं। सवर्णेों में ब्राह्मण और कायस्थ अधिक हैं। भरत बिंद ने राजनीति की शुरुआत जिला परिषद से की है। वह 2015 में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। हार गए। 2020 में RJD के टिकट पर लड़े और जीत गए।

तेजस्वी से तकरार क्यों- भाजपा में शामिल होने की वजह से तेजस्वी यादव से 36 का आंकड़ा है। इसके अलावा चर्चा है कि 2025 विधानसभा चुनाव में भभुआ सीट कांग्रेस के खाते में जा सकती है। कांग्रेस के मुन्ना पांडेय विधानसभा चुनाव की तैयारी भी कर रहे हैं।

वीणा सिंह: आरजेडी छोड़ सकती हैं बाहुबली रामा सिंह की पत्नी
विधानसभा चुनाव से पहले महनार की राजनीति भी बदलती दिख रही है। महनार से बाहुबली नेता रामा सिंह की पत्नी वीणा सिंह RJD से विधायक हैं। 2020 में रामा सिंह की एंट्री जब RJD में हुई थी तो रघुवंश प्रसाद सिंह ने विरोध किया था। रघुवंश बाबू ने तब पार्टी से इस्तीफा तक दे दिया था। रघुवंश बाबू का परवाह किए बिना वीणा सिंह को टिकट दिया गया था। उनके पति पूर्व सांसद रामा सिंह 2024 में RJD का साथ छोड़ चिराग पासवान वाली LJP(R) में चले गए। महनार सीट पर LJP(R) के टिकट पर रामा सिंह के खुद चुनाव लड़ने की चर्चा है। वैशाली एरिया में रामा सिंह की मजबूत पकड़ है। वह एरिया में राजपूतों के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं। राजपूत वोट बैंक चुनावी दृष्टिकोण से अहम है।

तेजस्वी से तकरार क्यों- माना जाता है कि रामा सिंह की पकड़ तेजस्वी यादव के राघोपुर विधानसभा सीट पर भी है। रामा सिंह 2024 लोकसभा चुनाव में वैशाली से टिकट चाहते थे। लेकिन तेजस्वी ने नहीं दिया। वहां से पार्टी ने बाहुबली मुन्ना शुक्ला को टिकट दे दिया। इसके बाद रामा सिंह का पार्टी से मोह भंग हो गया। 

बिहार में तेजस्वी-राहुल की यात्रा से ममता बनर्जी की दूरी से गठबंधन पर खतरे के संकेत, टीएमसी सांसद महुआ के खिलाफ FIR

                                                                                                                                          साभार 
बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले सियासत अपने चरम पर है। प्रदेश में इंडिया ब्‍लॉक के पक्ष में माहौल बनाने के लिए राहुल गांधी और तेजस्‍वी यादव वोटर अधिकार यात्रा का आज समापन हो गया। वोट चोरी के अनर्गल मुद्दे के अलावा यात्रा से बिहार की जनता को कुछ हासिल नहीं हुआ। इस यात्रा में कुछ राज्‍यों के मुख्‍यमंत्री और उपमुख्‍यमंत्री शामिल हुए। यह अलग बात है कि यात्रा में शामिल हुए बाहरी नेताओं पर बिहार का अपमान करने के भी आरोप लगे। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इंडिया ब्‍लॉक की धाकड़ नेता और बड़े राज्य पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ने यात्रा से दूरी बनाकर रखी। कांग्रेस और राजद से यह दूरी इंडिया ब्लॉक पर खतरे के संकेत हैं। क्योंकि अगले साल पश्चिम बंगाल में भी चुनाव है। यदि टीएमसी ममता यहां उनके साथ खड़ी नहीं होंगी, तो राहुल-तेजस्वी किस मुंह से पश्चिम बंगाल में इंडी गठबंधन का झंडा बुलंद करेंगे। दूसरी ओर टीएमसी की महिला सांसद महुआ मोइत्रा एक बार फिर सुर्खियों में हैं। हाल ही में महुआ ने गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ ‘सिर काट लेने’ जैसा आपत्तिजनक बयान दिया था और अब भाजपा को लेकर विवादित बात कही है। अपने बयान को मुहावरा बताते हुए महुआ मोइत्रा ने कहा है कि ‘इडियट’ मुहावरे नहीं समझ पाते।

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी यात्रा से दूरी बनाए रखी
बिहार में वोटर लिस्‍ट को संशोध‍ित करने के लिए चुनाव आयोग ने SIR (Special Intensive Revision) अभियान चलाया। चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों के बैतुके तर्कों पर सख्‍त आ‍पत्ति जताते हुए सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच चुका है। ये सब घटनाक्रम ऐसे वक्‍त में हुआ, जब बिहार में विधानसभा चुनाव होना है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, आरजेडी लीडर तेजस्‍वी यादव समेत विपक्ष के तमाम नेता बिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ में शामिल हुए। इस यात्रा में तमिलनाडु के मुख्‍यमंत्री एमके स्‍टालिन और तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी जैसे नेताओं ने शिरकत की। उत्‍तर प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव भी राहुल-तेजस्‍वी की वोटर अधिकार यात्रा का हिस्‍सा बने। लेकिन विपक्षी गुट की धाकड़ नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी इस यात्रा के समापन तक इससे दूरी बनाए रखी।

लालू ने ममता का समर्थन किया, उनके बेटे के साथ नहीं आई ममता
बंगाल की सीएम ममता बनर्जी विपक्ष की बड़ी नेता हैं। वह राहुल गांधी की जगह इंडी गठबंधन की अगुवाई करने तक की बात कर चुकी हैं। तब लालू यादव ने ममता बनर्जी का समर्थन किया था। लेकिन उनके बेटे तेजस्वी यादव के साथ वोटर अधिकार यात्रा में उनका शिरकत न करना कई तरह के सवाल खड़े करता है। तेजस्‍वी यादव और राहुल गांधी की इस यात्रा का आज समापन हो गया, लेकिन तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी ने इसमें अपनी उपस्‍थ‍िति दर्ज नहीं कराई है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब अगले साल पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होंगे, तब इंडी गठबंधन के पार्टनर ऐसे ही ममता की मदद नहीं करने का मन बना सकते हैं, जैसे अब खुद ममता बनर्जी अलग-थलग हो रही हैं।

समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव बिहार यात्रा में हुए शामिल
बिहार में राहुल गांधी और तेजस्‍वी यादव की वोटर अधिकार यात्रा में इंडिया ब्‍लॉक के एक और दिग्‍गज नेता ने हिस्‍सा लिया। उत्‍तर प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री और समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव 30 अगस्‍त को बिहार वोटर अधिकार यात्रा में शरीक हुए। इस तरह अब अखिलेश यादव की भी इस यात्रा में एंट्री हो चुकी है। चुनाव आयोग की ओर से कथित तौर पर 65 लाख मतदाताओं के नाम काटे जाने के विरोध में शुरू हुई वोटर अधिकार यात्रा का आज समापन हो गया। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में यह यात्रा सारण से शुरू हुई थी। सपा प्रमुख अखिलेश यादव पटना से सीवान पहुंचे। यहां से वह राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, रोहिणी आचार्य समेत इंडिया गठबंधन के सीनियर लीडर्स और कार्यकर्ताओं के साथ वोटर अधिकार यात्रा में शामिल हुए।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले लिस्ट होगी अपडेट
दिलचस्‍प बात यह है कि पश्चिम बंगाल में भी वोटर लिस्‍ट को अपडेट करने का प्रयास चल रहा है। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने कोलकाता की रैली में चुनाव आयोग और वामपंथी दलों पर निशाना साधा था। ममता बनर्जी ने कहा था कि चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल सरकार के अधिकारियों को धमका रहा है, जबकि उसका अधिकार क्षेत्र केवल चुनाव के दौरान तीन महीने का है। ममता ने बंगाल की जनता तो धमकाते हुए कहा कि मैं कहती हूं कि अगर कोई सर्वे करने आए तो कोई जानकारी न दें। अपना आधार कार्ड तैयार रखें। दरअसल, पश्चिम बंगाल में भी अगले साल (2026) विधानसभा चुनाव होने हैं। प्रदेश में टीएमसी का भाजपा से सीधा मुकाबला है। बंगाल की सीएम की कुर्सी इस बार खतरे में पड़ सकती है।

टीएमसी सांसद ने गृहमंत्री के बारे में अपमानजनक टिप्पणी
दूसरी ओर ममता बनर्जी की पार्टी की सांसद महुआ मोइत्रा के बोल एक बार फिर बिगड़े हैं। महुआ ने राजनीति गरिमा और नैतिकता की सारी सीमाएं लांघते हुए गृहमंत्री अमित शाह के बारे में बयान दे डाला कि उनका सिर काटकर टेबल पर रख देना चाहिए। महुआ के इस बयान के बाद छत्तीसगढ़ में उनके खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया। जब उनसे FIR को लेकर प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने फिर बदतमीजी के साथ जवाब देते हुए कहा कि इडियट को मुहावरे समझ नहीं आते। दरअसल, पिछले दिनों तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ एक बयान दिया था, जिसकी बीजेपी ने जमकर आलोचना की थी। अब उस बयान की वजह से महुआ मोइत्रा एक नए विवाद में फंस गई हैं। अमित शाह के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा के खिलाफ FIR दर्ज की गई है।

दिल्ली से छत्तीसगढ़ तक भारी आक्रोश, मोइत्रा की मुश्किलें बढ़ीं

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ विवादित बयान देने के मामले में टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इस मामले में उनके खिलाफ रायपुर पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है। अपने खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद भड़की महुआ ने भी सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया है। अमित शाह के खिलाफ विवादित बयान देना टीएमसी की सांसद महुआ पर भारी पड़ता जा रहा है। दिल्ली से लेकर छत्तीसगढ़ तक सियासत गरमाई हुई है। दरअसल मोइत्रा पर आरोप है कि उन्होंने अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ को रोकने में अमित शाह की कथित विफलता को लेकर कहा था कि “अमित शाह का सिर काट कर टेबल पर दिया जाना चाहिए।” इस बयान के सामने आने के बाद राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। विवादित टिप्पणी के खिलाफ रायपुर के स्थानीय निवासी गोपाल सामंत ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई। इसके बाद रायपुर पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।