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बिहार : राहुल का साथ देना RJD को पड़ गया भारी; तेजस्वी के चलते ये विधायक RJD को पहुंचाएंगे नुकसान, तेजप्रताप फैमिली इमेज डैमेज कर रहे, यादव बेल्ट में राजबल्लभ की चुनौती

Deep State की कठपुतली राहुल गाँधी का साथ देना RJD को बहुत भारी पड़ गया। कांग्रेस समेत जितनी भी बिहार की पार्टियां है सभी जानते है कि कांग्रेस किसी भी स्तर पर नहीं है इतना सबकुछ जानते हुए लालू यादव के रहते तेजस्वी यादव ने इतनी बड़ी गलती की है जिस वजह से वह खुद बीजेपी को टक्कर देने में बहुत पीछे चले गए हैं। या यह भी कह सकते हैं कि जिस तरह टनों दूध में एक चम्मच दही गिर जाने से सारा दूध बेकार हो जाता है बिलकुल वही हालत तेजस्वी ने कर ली है। जबकि तेज प्रताप यादव बार-बार इस कांग्रेस मेल से सचेत कर रहे थे, लेकिन उसका अनसुना करना पार्टी को बहुत नुकसान कर रहा है। सभी इस बात को जानते हैं कि राहुल एक सुलझे हुए नेता की बजाए एक सफेदपोशी उपद्रवी के नाम से जाने जाते हैं।      

कहावत है कि जब जहाज डूबने वाला होता है तो सबसे पहले उसमें से चूहे भाग खड़े होते हैं। बिहार में कई बरसों तक राज करने वाले राष्ट्रीय जनता दल का भी पार्टी रूपी जहाज डूबने के कगार पर है। इसीलिए विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के 8 विधायक पार्टी से साफ-साफ किनारा करते नजर आ रहे हैं। इनमें बाहुबली आनंद मोहन के बेटे, अनंत सिंह की पत्नी से लेकर एक बार जीते भरत बिंद तक शामिल हैं। तेज प्रताप यादव परिवार की इमेज को डैमेज कर हैं तो बाहुबली अनंत सिंह, राजबल्लभ यादव, आनंद मोहन, रामा सिंह अपने-अपने एरिया में चुनौती दे रहे हैं। इन विधायकों की बगावत से RJD को विधानसभा चुनाव में बहुत नुकसान होने वाला है। क्योंकि इनमें कुछ ऐसे कद्दावर नेता भी हैं, जिनका प्रभाव सिर्फ अपनी सीट पर ही नहीं, बल्कि अन्य सीटों पर भी है। ऐसे में तेजस्वी यादव अभी तक तो सिर्फ भाई तेजप्रताप के बागी तेवरों को कोस रहे थे, लेकिन आने वाले समय में यह तय है कि उन्हें अपनी ही पार्टी के और नेताओं की बगावत से भी जूझना पड़ सकता है।

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विधानसभा चुनाव से पहले ही तेजस्वी यादव पर दोहरी मार

दरअसल, तेजस्वी यादव अगले चुनाव में मुंगेरी लाल की तरह सीएम बनने का सपना देखने में लगे हुए हैं। हालांकि उनका यह ख्याली पुलाव पकने वाला नहीं है। तेजस्वी यादव ने इसीलिए पिछले माह वोटर अधिकार यात्रा के तहत नवादा रैली में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का ऐलान कर एक बड़ा दांव खेला। अपने संबोधन में उन्होंने कहा, ”आने वाले चुनाव में हम सब मिलकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाएंगे।” दिलचस्प बात यह रही कि तेजस्वी ने राहुल के लिए जो खुला समर्थन जताया, वैसा ही समर्थन देने से राहुल गांधी साफ-साफ मुकर गए। यानी तेजस्वी की सारी कोशिशों के बावजूद उनको महागठबंधन का सीएम फेस बनाने का ऐलान नहीं हुआ। दरअसल, कांग्रेस अभी बिहार की सत्ता की राजनीति में खुलकर दांव लगाने से बचना चाहती है? बिहार में जब चंद महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं तो राहुल गांधी का यह मौन कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। क्योंकि राजनीति में कई बार मौन शब्दों से ज्यादा असर छोड़ जाता है। तेजस्वी यादव दोहरी मुश्किल में हैं। एक तरफ राहुल का मौन आड़े आ रहा है तो दूसरी ओर विधायक उन्हें बीच मैदान में छोड़े जा रहे हैं।

तेज प्रताप यादव: तेजस्वी और परिवार को इमेज को डैमेज कर रहे

इस लिस्ट में सबसे ऊपर RJD सुप्रीमो लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव हैं। मई में उनको पार्टी और परिवार से बाहर निकाल दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट कर अपनी नई रिलेशनशिप का ऐलान किया था। तेज प्रताप फिलहाल हसनपुर से RJD के विधायक हैं। वह महुआ से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। जब पार्टी से निकला दिया गया है तो जाहिर है टिकट RJD नहीं देगी। महुआ से RJD के मुकेश रौशन विधायक हैं। चुनाव नजदीक आते-आते तेज प्रताप के तेवर तेजस्वी और परिवार के प्रति कड़े होते जा रहे हैं। वे जहानाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान तेजस्वी के समर्थन में नारे लगाने पर भड़क गए। इतना सुनते ही तेज प्रताप ने कहा- ‘यहां फालतू बात मत करो। किसी व्यक्ति विशेष की सरकार नहीं आती है, जो घमंड करेगा, वो जल्दी गिरेगा और अगर नौटंकी करोगे तो रोजगार नहीं मिलेगा।’

विधायकों के पार्टी छोड़ने से RJD पर पड़ेगा बहुत असर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘7 सिटिंग विधायकों ने RJD से दूरी बना ली है। इसमें से लगभग 5 सीटों में ऐसे हालात बच चुके हैं कि अब RJD को विधानसभा चुनाव में टिके रहने के नाकौं चने चबाने पड़ेंगे। राजनीतिक और जातिगत समीकरण आरजेडी के खिलाफ है। इसके अलावा लालू यादव ने ऐन चुनाव से पहले तेज प्रताप यादव को पार्टी से बाहर किया है। इसमें से नवादा और रजौली राज बल्लभ के प्रभाव वाली सीट है। राज बल्लभ जिसे चाहेंगे वही जीतेगा। शिवहर में मिलाजुला खेल हो सकता है। मोकामा में अनंत सिंह जिधर रहेंगे जीत होगी। कुल मिलाकर तेजस्वी यादव ने अपनी ही पार्टी के विधायकों से तकरार मोल लेकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।

विभा देवी: पीएम के मंच पर दिखीं लालू के खास रहे राजबल्लभ की पत्नी
गयाजी में 22 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी के मंच पर नवादा से RJD विधायक विभा देवी दिखीं। इसके बाद चर्चा है कि वह 2025 का विधानसभा चुनाव RJD के टिकट पर नहीं लड़ेंगी। वैसे आधिकारिक तौर पर उन्होंने अब तक पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया है। लेकिन पीएम के मंच पर दिखने के बाद अब उनका पार्टी में रहना मुश्किल हो रहा है। 2020 विधानसभा चुनाव में लालू यादव के खास रहे बाहुब ली राजबल्लभ यादव की पत्नी विभा देवी ने निर्दलीय श्रवण कुमार को हराया था। तीसरे स्थान पर JDU के कौशल यादव थे। हाल में कौशल यादव RJD में शामिल हुए हैं। इसके बाद से कयास लगाए जा रहे हैं कि विभा का रास्ता अलग हो सकता है। दरअसल, नवादा की राजनीति में कौशल यादव और राज बल्लभ यादव एक-दूसरे के विरोधी हैं। बता दें कि राजबल्लभ यादव परिवार 1990 से ही नवादा में एक शक्ति का केंद्र रहा है। उनके बड़े भाई कृष्णा यादव भी विधायक रहे। इस परिवार का नवादा के आसपास के विधानसभा सीटों पर भी असर है। राज बल्लभ 2000 में RJD के टिकट पर चुनाव जीते तो श्रम मंत्री बनाए गए थे। इस सीट पर 2019 के उपचुनाव में JDU के कौशल यादव जीते। 2020 के चुनाव में राज बल्लभ की पत्नी विभा लड़ीं और जीत गई।

तेजस्वी से तकरार क्यों- 2022 में विधान परिषद का चुनाव था। राजबल्लभ अपने भतीजे को चुनाव लड़वाना चाहते थे। तेजस्वी ने राजबल्लभ की मर्जी से अलग श्रवण कुशवाहा को कैंडिडेट बना दिया। राजबल्लभ ने भतीजे और कृष्णा यादव के बेटे अशोक यादव को निर्दलीय उतार दिया। अशोक यादव चुनाव जीत गए। इसके बाद राजबल्लभ 2024 के लोकसभा चुनाव में छोटे भाई विनोद यादव को चुनाव लड़वाना चाहते थे। तेजस्वी ने फिर उनकी बात नहीं मानी और MLC चुनाव में हारे श्रवण कुशवाहा को कैंडिडेट बना दिया। राजबल्लभ यादव ने अपने भाई विनोद यादव को निर्दलीय मैदान में उतार दिया। इसका सीधा नुकसान RJD के कैंडिडेट को हुआ। RJD का यादव वोट बिखर गया। विनोद यादव को करीब 39 हजार वोट मिले। श्रवण कुशवाहा 67 हजार वोट से ये चुनाव हार गए। यहां से BJP के विवेक ठाकुर चुनाव जीते।

चेतन आनंद: फ्लोर टेस्ट के समय आनंद ने बदला था पाला
शिवहर से RJD विधायक चेतन आनंद ने फरवरी 2024 में नीतीश सरकार के फ्लोर टेस्ट के दौरान ही पाला बदल लिया था। वह RJD की जगह JDU के साथ हो गए थे। हालांकि, चेतन आनंद ने अब तक आधिकारिक तौर पर RJD से इस्तीफा नहीं दिया है। अभी उनकी मां लवली आनंद शिवहर से JDU की सांसद हैं। चेतन आनंद बाहुबली पूर्व सांसद आनंद मोहन के बड़े बेटे हैं। वह भी शिवहर से सांसद रह चुके हैं। यहां राजपूत, ब्राह्मण, मुस्लिम और पटेल समाज जीत-हार तय करने में अहम भूमिका निभाता है। इस इलाके के सवर्ण समाज में आनंद मोहन की पकड़ शुरू से मजबूत रही है। सकती है

तेजस्वी से तकरार क्यों- DM जी. कृष्णैया की हत्या में उम्रकैद की सजा काट रहे आनंद मोहन को नीतीश सरकार ने 2023 में जेल मैनुअल में संशोधन कर रिहा कर दिया। जेल से बाहर आते ही आनंद मोहन नीतीश कुमार के साथ घूमने लगे। वैसे उनकी राजनीति की शुरुआत लालू शासन के विरोध से ही हुई थी। पिता को जेल से बाहर निकालने और लोकसभा चुनाव में मां को टिकट देने के वादे ने चेतन आनंद को तेजस्वी यादव से दूर कर दिया।

नीलम देवी: बाहुबली अनंत सिंह के चलते पत्नी की राह भी अलग
बाहुबली पूर्व विधायक अनंत सिंह की राह RJD से अलग हो गई है। उनकी पत्नी और विधायक नीलम देवी JDU की तरफ हो गई हैं। AK-47 केस में सजा होने के बाद अनंत सिंह की सदस्यता रद्द हो गई थी। उसके बाद 2022 में हुए उपचुनाव में नीलम देवी RJD के टिकट पर चुनाव लड़ी और जीत गईं। फरवरी 2024 में नीतीश सरकार की फ्लोर टेस्ट के दौरान नीलम देवी JDU की तरफ हो गईं। इसके बाद अनंत सिंह को लोकसभा चुनाव से पहले पेरोल मिली और उन्होंने ललन सिंह के लिए जमकर प्रचार किया। ललन सिंह चुनाव जीत गए। AK-47 केस में अनंत सिंह हाईकोर्ट से बरी हो गए हैं और चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। मोकामा की राजनीतिक जमीन पर अनंत सिंह की मजबूत पकड़ है। उनको चुनाव हराना टफ है। बीते 20 साल से उनको कोई हरा नहीं पाया है। 2005 से लगातार उनका कब्जा है। वह JDU-RJD, यहां तक की वह निर्दलीय भी चुनाव जीत चुके हैं।

तेजस्वी से तकरार क्यों- तेजस्वी यादव और अनंत सिंह के बीच राजनीतिक पटरी नहीं बैठ रही है। उनका जेल से बाहर आना एक कारण माना जाता है। चूंकि, नीतीश सरकार में ही वह जेल गए और उसी सरकार में बरी भी हुए। यहां भूमिहारों का वोट बैंक काफी प्रभाव रखता है। इसके अलावा कुर्मी, यादव, धानुक, पासवान और मुस्लिम भी अच्छी संख्या में हैं। RJD की तरफ से 2025 में यहां कौन उम्मीदवार होगा, अभी तय नहीं है।

प्रकाशवीर चौधरी: तेजस्वी ने यात्रा में ही टिकट काटने का किया ऐलान
रजौली से प्रकाश वीर RJD के टिकट पर लगातार दो बार से जीत रहे हैं। प्रकाश वीर चौधरी (पासी) कम्युनिटी से आते हैं। विभा देवी के साथ वे भी PM मोदी के साथ मंच पर थे। प्रकाश वीर ने इस पर सफाई दी थी, ‘मुझे तीन दिन पहले आमंत्रण आया था। इसलिए हम लोग गए। प्रधानमंत्री हम सबके हैं। हम लोग देखने और सुनने गए थे कि PM देश के गरीबों के लिए क्या-क्या काम कर रहे हैं। राजबल्लभ जी का आदेश मिल जाएगा, तो अभी रिजाइन कर देंगे।’ प्रकाश वीर, राज बल्लभ यादव के करीबी माने जाते हैं। बताया जाता है कि वह ही उन्हें टिकट दिलवाते हैं और जिताते हैं। अब जब राज बल्लभ परिवार RJD से दूर जा रहा है तो प्रकाश वीर का रहना मुश्किल होगा। रजौली विधानसभा में SC-ST कम्युनिटी के करीब 97 हजार वोट हैं। इनके अलावा यहां अति पिछड़ा और यादव के लगभग 1 लाख वोट हैं।

तेजस्वी से तकरार क्यों- दरअसल, लोकसभा चुनाव में ही तेजस्वी यादव ने साफ कर दिया था कि प्रकाश वीर को विधानसभा का टिकट नहीं देंगे। तेजस्वी यादव वोटर अधिकार यात्रा के दौरान नवादा पहुंचे थे। वहां कुछ लोगों ने प्रकाश वीर को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं देने की मांग की, इस पर तेजस्वी यादव ने अपनी सहमति दे दी।

प्रह्लाद यादव: दबंग छवि के विधायक ने RJD को दिया झटका
लखीसराय के सूर्यगढ़ा से विधायक प्रह्लाद यादव RJD के संस्थापक सदस्य कहे जाते हैं। 1995 से लगातार चुनाव जीत रहे हैं। दबंग और बाहुबली छवि के प्रह्लाद यादव ने फरवरी 2024 में नीतीश सरकार के फ्लोर टेस्ट के दौरान RJD से अलग लाइन लिया और सरकार के पाले में चले गए। हाल में उनके टिकट को लेकर NDA के अंदर ही बयानबाजी सुनने को मिली थी। एक कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने कहा था, ‘सूर्यगढ़ा JDU की सीट है तो JDU ही उम्मीदवार तय करेगी। हम अपने सामाजिक समीकरण को देखते हुए निर्णय लेंगे। प्रह्लाद यादव डिप्टी CM विजय सिन्हा के करीबी माने जाते हैं। वह कह चुके हैं कि मेरी कुर्बानी को तवज्जो दी जानी चाहिए। विजय सिन्हा के कहने पर ही मैं NDA के साथ आया था।

तेजस्वी से तकरार क्यों- प्रह्लाद यादव का बालू का बड़ा कारोबार है। या यूं कहें बालू के पैसे से ही उनकी पूरी राजनीति चलती है। ऐसे में सरकार के आसपास रहने से उनको फायदा दिखा और तेजस्वी के खिलाफ पाला बदला। वैसे प्रह्लाद यादव हमेशा लालू परिवार के साथ रहे। लंबे समय तक लखीसराय के पार्टी के जिलाध्यक्ष भी थे। इलाके में काफी प्रभावशाली माने जाने वाले प्रह्लाद यादव पहली बार 1995 में निर्दलीय विधायक चुने गए थे। इसके बाद वह 2000, 2005, 2015 और 2020 में RJD के टिकट पर जीतते रहे हैं। 2025 विधानसभा चुनाव लड़ने का भी उन्होंने ऐलान किया है।

संगीता कुमारी: दलितों के सम्मान की बात कह संगीता ने छोड़ा साथ
फरवरी 2024 में नीतीश सरकार के फ्लोर टेस्ट के दौरान RJD से किनारा करने वाली चौथी विधायक संगीता कुमारी थीं। तब उन्होंने कहा था, ‘मुझे लगा कि कहीं न कहीं पार्टी (RJD) में दलितों का सम्मान नहीं हो रहा। इसलिए हमने यह निर्णय लिया।’ संगीता दलितों का सम्मान करने वाली BJP की तरफ चली गई थी। कहा जाता है कि RJD के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह की करीबी होने की वजह से संगीता कुमार को मोहनिया से टिकट दिया गया था। वह मूल रूप से कैमूर की रहने वाली हैं।

तेजस्वी से तकरार क्यों- 2020 विधानसभा चुनाव में संगीता ने बीजेपी के निरंजन राम को हराया था। निरंजन राम के अब तेजस्वी यादव के चक्कर काटने की चर्चाएं आम हैं। दूसरी संगीता को आरजेडी अब टिकट देने वाली नहीं है।

भरत बिंद: लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा में हुए थे शामिल
भभुआ से RJD विधायक भरत बिंद भाजपा के संपर्क में हैं। उन्होंने 2020 विधानसभा चुनाव में भाजपा की रिंकी रानी पांडेय को हराया था। कैमूर जिले की भभुआ विधानसभा सीट में कोयरी और कुर्मी वोटर अधिक हैं। सवर्णेों में ब्राह्मण और कायस्थ अधिक हैं। भरत बिंद ने राजनीति की शुरुआत जिला परिषद से की है। वह 2015 में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। हार गए। 2020 में RJD के टिकट पर लड़े और जीत गए।

तेजस्वी से तकरार क्यों- भाजपा में शामिल होने की वजह से तेजस्वी यादव से 36 का आंकड़ा है। इसके अलावा चर्चा है कि 2025 विधानसभा चुनाव में भभुआ सीट कांग्रेस के खाते में जा सकती है। कांग्रेस के मुन्ना पांडेय विधानसभा चुनाव की तैयारी भी कर रहे हैं।

वीणा सिंह: आरजेडी छोड़ सकती हैं बाहुबली रामा सिंह की पत्नी
विधानसभा चुनाव से पहले महनार की राजनीति भी बदलती दिख रही है। महनार से बाहुबली नेता रामा सिंह की पत्नी वीणा सिंह RJD से विधायक हैं। 2020 में रामा सिंह की एंट्री जब RJD में हुई थी तो रघुवंश प्रसाद सिंह ने विरोध किया था। रघुवंश बाबू ने तब पार्टी से इस्तीफा तक दे दिया था। रघुवंश बाबू का परवाह किए बिना वीणा सिंह को टिकट दिया गया था। उनके पति पूर्व सांसद रामा सिंह 2024 में RJD का साथ छोड़ चिराग पासवान वाली LJP(R) में चले गए। महनार सीट पर LJP(R) के टिकट पर रामा सिंह के खुद चुनाव लड़ने की चर्चा है। वैशाली एरिया में रामा सिंह की मजबूत पकड़ है। वह एरिया में राजपूतों के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं। राजपूत वोट बैंक चुनावी दृष्टिकोण से अहम है।

तेजस्वी से तकरार क्यों- माना जाता है कि रामा सिंह की पकड़ तेजस्वी यादव के राघोपुर विधानसभा सीट पर भी है। रामा सिंह 2024 लोकसभा चुनाव में वैशाली से टिकट चाहते थे। लेकिन तेजस्वी ने नहीं दिया। वहां से पार्टी ने बाहुबली मुन्ना शुक्ला को टिकट दे दिया। इसके बाद रामा सिंह का पार्टी से मोह भंग हो गया। 

कनाडा : मोदी से ‘लड़कर’ मजाक बने पीएम ट्रूडो, घर में ही विरोध के चलते देना पड़ा पद से इस्तीफा, अब कनाडा में भारत विरोध और खालिस्तानी आंदोलन कमजोर होगा

जैसे-जैसे जनवरी 20 पास आ रही, यानि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यभार संभालने की तारीख, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विरोधियों-चाहे वह भारत में है या विदेशों में- की नींद हराम होनी शुरू हो गयी है।   
अमेरिका और कनाडा में दो बड़े राजनीतिक घटनाक्रम हुए हैं। जहां अमेरिकी संसद में इलेक्टोरल वोट्स की गिनती के बाद डोनाल्ड ट्रम्प की जीत पर मुहर लग गई। उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने ट्रम्प को आधिकारिक तौर पर विजेता घोषित किया। वहीं,दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बेवजह पंगा लेने वाले खालिस्तानी समर्थक कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो को आखिरकार पद से इस्तीफा देना पड़ा। ट्रूडो की भारत विरोधी नीतियों के चलते उनकी लिबरल पार्टी के सांसदों की तरफ से भी कई महीनों से पद छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा था। अपने ही घर में अलग-थलग पड़ते जा रहे ट्रूडो ने कदम पीछे खींचना ही सही समझा। इस बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनने का ऑफर दिया। ट्रम्प ने यह ऑफर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के इस्तीफे के कुछ घंटों बाद ही सोशल मीडिया के जरिए दिया। ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका अब कनाडा से और व्यापार घाटा नहीं सहन कर सकता और न ही उसे और ज्यादा सब्सिडी दे सकता है। कनाडा को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए इसकी बहुत ज्यादा जरूरत है। ट्रूडो ये बात जानते थे इसलिए उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

भारत को बदनाम करने वाले ट्रूडो को अब और बर्दाश्त नहीं कर सकते
जस्टिन ट्रूडो की अगुवाई वाली कनाडा की सरकार ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप भारत पर मढ़ा था। पीएम की कुर्सी बचाने और चुनाव जीतने की कोशिश में भारत को बदनाम करने वाले ट्रूडो की पोल खुल गई है। इस पूरे विवाद को लेकर जस्टिन ट्रूडो की काफी आलोचना हो रही है। कनाडा में अब लोग उनसे ऊब चुके हैं। कनाडा में चुनाव से पहले ही उनके इस्तीफे की मांग बहुत जोर पकड़ने लगी है। भारत और कनाडा में जारी कूटनीतिक विवाद के बीच कनाडा के एक लिबरल सांसद ने प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो से अगले चुनाव से पहले पार्टी नेता के पद से इस्तीफा देने को कहा है। कनाडा के सांसद सीन केसी का कहना है कि देश के लोग जस्टिन ट्रूडो को अब और बर्दाश्त नहीं कर सकते।

आधे से ज्यादा सांसद जस्टिन ट्रूडो के इस्तीफे की मांग कर रहे
कनाडा की संसद में लिबरल पार्टी के पास 153 सांसद हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि 2025 के चुनाव में हार का अंदेशे के चलते आधे से ज्यादा सांसद जस्टिन ट्रूडो के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। 31 दिसंबर 2024 को जारी नैनोस रिसर्च की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रूडो की लिबरल पार्टी, विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी से 26 पॉइंट से पीछे चल रही है। कंजर्वेटिव पार्टी को 46.6% सपोर्ट मिला है। अगर ये बरकरार रहता है तो कंजर्वेटिव पार्टी को 2025 के चुनाव में प्रचंड बहुमत मिल सकता है। 3 जनवरी को आई एंगस रीड इंस्टीट्यूट की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक अगर लिबरल पार्टी पूर्व डिप्टी पीएम क्रिस्टिया फ्रीलैंड को लीडर बनाती है तो कंजर्वेटिव्स को थोड़ी टक्कर दी जा सकती है।

तीखी आलोचनाओं के बीच अपने ही घर में घिर गए थे ट्रूडो
ट्रूडो ने इस्तीफे का ऐलान करते हुए कहा कि अगर मुझे घर में लड़ाई लड़नी पड़ेगी, तो आने वाले चुनाव में सबसे बेहतर विकल्प नहीं बन पाऊंगा। कनाडा में इस साल संसदीय चुनाव होने हैं। विरोध के चलते अब कनाडा में ही जस्टिन ट्रूडो की खटिया खड़ी हो गई है। इससे पहले अपनी तीखी आलोचनाओं के बीच उनको यहां तक खुद कबूलना पड़ा है कि निज्जर हत्याकांड को लेकर उनकी सरकार ने भारत को कोई ठोस सबूत नहीं दिया है। अब इस मामले को लेकर वह अपने घर यानी कनाडा में भी घिरते नजर आ रहे हैं। वहीं विशेषज्ञ मानते हैं कि निज्जर मसले पर ट्रूडो का रवैया उनकी अपरिपक्वता को दिखाता है। बता दें कि यह कोई पहला मामला नहीं है, जबकि ट्रूडो के रवैये के चलते कनाडा को शर्मसार होना पड़ा है। इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जब ट्रूडो विवादों में रहे और कई बार तो उन्हें सार्वजनिक तौर पर माफी भी मांगते हुए देखा गया।

भारत के बाद अमेरिका के साथ बिगड़ते रिश्तों का असर
ट्रूडो ने खालिस्तानी वोट बैंक के पॉलिटिकल सपोर्ट के लिए भारत के खिलाफ झूठे आरोप लगाकर फायदा उठाना चाहा था। ट्रूडो ने ऐसा इंटरनल पॉलिटिकल क्राइसिस और करप्शन के आरोपों से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए किया था। लेकिन वे इसमें बुरी तरह असफल रहे। इसके अलावा बेवजह बयानबाजी से ट्रूडो के भारत से रिश्ते और ज्यादा खराब हुए। अब ट्रम्प के बयानों और भारत के साथ बिगड़ते रिश्तों से कनाडा में ट्रूडो के खिलाफ माहौल बन गया। अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कनाडा पर 25% टैरिफ लगाने की बात कही है। इसके बाद नवंबर 2024 में फ्लोरिडा में ट्रूडो ने ट्रम्प से मुलाकात की। इस दौरान ट्रम्प ने कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने का मजाक किया। ट्रम्प ने ऐसी बात सोशल मीडिया पर भी लिखी और ट्रूडो को ‘कनाडा का गवर्नर’ बताया।

गठबंधन टूटने से कनाडाई संसद में कमजोर हुए ट्रूडो
कनाडा की संसद में सीनेट और हाउस ऑफ कॉमन्स दो सदन हैं। हाउस ऑफ कॉमन्स में 338 सीटें हैं और बहुमत का आंकड़ा 170 है। लिबरल पार्टी के पास 153 सांसद हैं। ट्रूडो इस सदन में खालिस्तान समर्थक कनाडाई सिख जगमीत सिंह की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (NDP) के 25 सांसदों के समर्थन के कारण बहुमत में थे। NDP ने सितंबर 2024 में समर्थन वापस ले लिया। गठबंधन टूटने से ट्रूडो सरकार अल्पमत में आ गई थी। 1 अक्टूबर को जब संसद में विश्वास मत साबित करना था तो अलगाववादी ब्लॉक क्यूबेकॉइस के 33 सांसदों ने ट्रूडो को समर्थन दिया और सरकार बच गई थी। कनाडा के सरकारी फाउंडेशन सस्टेनेबल डेवलपमेंट टेक्नोलॉजी कनाडा (SDTC) से जुड़े एक घोटाले में जस्टिन ट्रूडो का भी नाम आ रहा है। हालांकि SDTC अब बंद हो चुका है। पिछले साल ऑडिटर जनरल ने इससे जुड़े अरबों डॉलर के ‘ग्रीन स्लश फंड’ को बंद कर दिया था। आरोप लगा कि इससे जुड़े लाखों डॉलर ऐसे लोगों और प्रोजेक्ट्स को दिए गए जो अयोग्य थे।

ट्रूडो के बाद कनाडा में भारत विरोध और खालिस्तानी आंदोलन कमजोर होगा
विदेश मामलों के जानकार मानते हैं कि ट्रूडो के इस्तीफे के बाद कनाडा में अगली सरकार कंजर्वेटिव्स की बनने जा रही है। इससे कनाडा में भारत विरोधी राजनीति और खालिस्तानी आंदोलन में कमी आएगी। दरअसल, ट्रूडो खुलेआम खालिस्तानियों के समर्थन में खड़े थे। उनके इस्तीफे के बाद आने वाली सरकार ज्यादा सख्ती से खालिस्तान समर्थकों पर काबू पा सकती है। खालिस्तानी ट्रूडो के लिए बड़ा मुद्दा रहे हैं, जिस पर वे कनाडा की स्वतंत्रता और सुरक्षा की दुहाई देकर अपने लिए एक गुट का सपोर्ट हासिल करते थे। अब उनके विपक्षी कंजर्वेटिव्स की चुनाव में जीत लगभग तय मानी जा रही है, निश्चित ही नई सरकार खालिस्तान समर्थकों को अपनी ऑप्टिक्स से दूर रखना चाहेगी और भारत से अपने संबंधों को सुधारना चाहेगी।’

खालिस्तानियों को खुश करने के चक्कर में ट्रूडो ने अपने लिए खाई खोदी

प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो अपने निजी राजनीतिक स्वार्थ और खालिस्तानियों को खुश करने के चक्कर में भारत-कनाडा के रिश्तों में खाई खोदने का काम लगातार कर रहे हैं। जस्टिन ने पीएम मोदी से पंगा लेने की कोशिश की, लेकिन उनकी अब दाल गलती नहीं दिख रही है। अब कनाडा में ही जस्टिन ट्रूडो की खटिया खड़ी हो गई है। अपनी तीखी आलोचनाओं के बीच उनको यहां तक खुद कबूलना पड़ा है कि निज्जर हत्याकांड को लेकर उनकी सरकार ने भारत को कोई ठोस सबूत नहीं दिया है। अब इस मामले को लेकर वह अपने घर यानी कनाडा में भी घिरते नजर आ रहे हैं। कनाडा की मीडिया ने दोनों देशों के बीच के तनाव को ‘राजनयिक युद्ध’ बताया है तो वहीं विशेषज्ञ मानते हैं कि निज्जर मसले पर ट्रूडो का रवैया उनकी अपरिपक्वता को दिखाता है। बता दें कि यह कोई पहला मामला नहीं है, जबकि ट्रूडो के रवैये के चलते कनाडा को शर्मसार होना पड़ा है। इससे पहले भी कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जब ट्रूडो विवादों में रहे और कई बार तो उन्हें सार्वजनिक तौर पर माफी भी मांगते हुए देखा गया।

कनाडा में कई सांसद कर रहे थे जस्टिन ट्रूडो के इस्तीफे की मांग
लिबरल सांसद सीन केसी का बयान इसलिए और ज्यादा गंभीर हो गया, क्योंकि ट्रूडो से इस्तीफा मांगने वाले इकलौते सांसद नहीं हैं। इससे पहले जून की शुरुआत में न्‍यू ब्रंसविक के सांसद वेन लॉन्‍ग ने भी जस्टिन ट्रूडो से इस्‍तीफा देने को कहा था। साथ ही न्‍यूफाउंडलैंड और लैब्राडोर के सांसद केन मैकडोनाल्‍ड ने प्रधानमंत्री जस्टिन के नेतृत्‍व समीक्षा की मांग की। यहां तक की मीडियो रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रूडो के नेतृत्‍व में कैबिनेट मंत्री रहीं ओटावा-क्षेत्र की पूर्व सांसद कैथरीन मैककेना ने भी कहा है कि पार्टी को एक नए नेता की जरूरत है। कनाडा के पीएम जस्टिन पर उनके अपने भी सवाल उठा रहे हैं। जस्टिन ट्रूडो खालिस्तानियों का वोट पाने के लिए भारत के खिलाफ प्रोपगैंडा रचते रहे हैं। वह खालिस्तानियों को खुश करके उनका वोट पाना चाहते हैं और चुनाव जीतना ही उनका असल और एकमात्र मकसद है। यही वजह है कि वह पिछले एक साल से ही भारत के खिलाफ बार-बार जहर उगल रहे हैं। जस्टिन ट्रूडो ने आरोप लगाया है कि खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत का हाथ है। हालांकि भारत ने कनाडा के आरोपों को बेतुका बताया है और सिरे से खारिज किया है। इसके बाद भारत ने अपने राजनयिकों को कनाडा से बुला लिया और कनाडा के राजनयिकों को निकाल दिया। अब यह शीशे की तरह साफ हो गया है कि भारत के खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगाकर ट्रूडो अपनी सरकार की विफलताओं से लोगों का ध्यान हटाना चाह रहे हैं।

  • कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो से जुड़े 5 विवादित किस्से
    1. साल 2016 में जस्टिन ट्रूडो अपने अरबपति दोस्त के प्राइवेट आइलैंड पर छुट्टियां मनाने की वजह से विवादों में फंस गए थे। कनाडा में नैतिक मामलों की निगरानी करने वाली संस्था ने पहली बार दिसंबर 2017 में इस मामले में ट्रूडो की निंदा करते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री ने नियमों का उल्लंघन किया है। तब रॉयटर्स की रिपोर्ट में बताया गया था कि आगा खान के फाउंडेशन को ट्रूडो और उनके अधिकारियों की लॉबिंग के लिए आधिकारिक तौर पर रजिस्टर्ड किया गया था। इसके बाद ट्रूडो ने कहा कि वह भविष्य में अपनी छुट्टियों के लिए वॉचडॉग की मंजूरी लेंगे।
  • 2. इसके अलावा मई 2016 में ट्रूडो की एक गलती के कारण उन्हें बेहद शर्मिंदा होना पड़ा। कनाडा के हाउस ऑफ कॉमन्स में हुई एक घटना को ‘एल्बोगेट’ के नाम से जाना जाता है। दरअसल विपक्ष के रवैये से परेशान होकर ट्रूडो एक शख्स को पकड़ने के लिए भागे इस दौरान उनकी कोहनी एक महिला के सीने पर लग गई। इस घटना के लिए ट्रूडो ने कई बार माफी मांगी। उन्होंने कहा ‘मैं भी एक इंसान हूं जो एक बेहद दबाव वाली नौकरी कर रहा है।’ उन्होंने वादा किया वह कभी ऐसा दोबारा नहीं करेंगे।
  • 3. जस्टिन ट्रूडो साल 2018 में पहली बार भारत राजकीय दौरे पर आए थे, इस दौरान खालिस्तानी अलगाववादी जसपाल अटवाल के साथ ट्रूडो की तस्वीर को लेकर जमकर विवाद हुआ। अटवाल को पंजाब के मंत्री मलकीत सिंह सिंधु की हत्या की कोशिश के मामले में दोषी पाया गया था और उसे 20 साल की सजा सुनाई गई थी। मंत्री सिंधु 1986 में वैंकुअर गए थे जहां उनकी हत्या की कोशिश की गई थी। जसपाल अटवाल एक सिख अलगाववादी था, जो इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन से जुड़ा हुआ था।
  • 4. एक और विवाद साल 2022 का है, जब ट्रूडो को ब्रिटेन की क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय के अंतिम संस्कार से दो दिन पहले उन्हें होटल की लॉबी में रैप सॉन्ग गाते हुए रिकॉर्ड किया गया था। वीडियो में ट्रूडो मरून टी-शर्ट और डार्क जींस पहने पियानो के ठीक बगल में खड़े होकर फ्रेडी मर्करी का हिट सॉन्ग गा रहे थे। सोशल मीडिया पर यह वीडियो काफी वायरल हुआ था, वीडियो में क्वीन एलिजाबेथ के अंतिम संस्कार में शामिल होने पहुंचे कनाडाई डेलिगेशन के अन्य लोग भी मौजूद थे। ट्रूडो की इस शर्मनाक हरकत की सोशल मीडिया पर लोगों ने काफी आलोचना की थी।
  • 5. ताजा विवाद पिछले साल का ही है। जब उन्होंने स्पीकर फर्गस को आंख मारी थी। इसके जस्टिन ट्रूडो को काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था। दरअसल हाउस ऑफ कॉमन्स में स्पीकर फर्गस ने ट्रूडो को ‘सम्मानीय प्रधान मंत्री’ के तौर पर संबोधित किया तो वहीं ट्रूडो ने तुरंत उन्हें टोकते हुए ‘बहुत सम्मानीय’ जोड़ा। इस दौरान उन्होंने स्पीकर फर्गस को आंख मारी और अपनी जीभ भी बाहर निकाली। उनकी यह हरकत कैमरे में कैद हो गई, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी काफी आलोचना हुई।

कौन हैं इजरायली सेना के बदू मुस्लिम, जो हमास से लड़ रहे जंग?

                                   इजरायल के बदू सैनिक ( साभार: Times Of Israel)
आतंकी हमास से हो रही इजराइल की जिस लड़ाई को कुछ जिहादी मुस्लिम विरोधी बता वातावरण दूषित करने का दुस्साहस कर रहे हैं, इन लोगों को मालूम होना चाहिए कि यह लड़ाई आतंकवाद के विरुद्ध है, फिलिस्तीन देश के विरुद्ध नहीं। आम नागरिकों के मारे का मुख्य कारण है हमास द्वारा स्कूलों, हॉस्पिटल और मस्जिदों को अपना अड्डा बनाना और इजराइल आतंकवादियों और उनके अड्डों को निशाना बना रहा है।  

हाल ही में एक खबर आई है कि फिलिस्तीन का इस्लामी आतंकी संगठन हमास (Palestine’s Islamic Terrorist Organisation Hamas) के हमले में इजरायल के 4 बदू मुस्लिम (Bedouin Muslims) सैनिक मारे गए हैं। हमास ने बड़ी संख्या में बदू मुस्लिम सैनिकों और नागरिकों को बंधक बनाया है और उन्हें अपने साथ गाजा ले गए हैं। बदू मुस्लिमों को बदुईन या बदावी भी कहा जाता है।

अब प्रश्न उठा है कि आखिर मुस्लिम होने के बाद भी हमास इन्हें निशाना क्यों बना रहा है। सवाल ये भी पूछा जा सकता है कि बदू मुस्लिम इजरायल की सेना में क्यों शामिल हैं और उसकी तरफ से क्यों लड़ रहे हैं? यह बदू समुदाय कौन है और आखिर इसकी वर्तमान में स्थिति क्या है?

बदू असल में इजरायल के दक्षिणी हिस्से में फैले नेगेव रेगिस्तान का एक घुमंतू समुदाय है। अरबी भाषा में बदू का मतलब घुमंतू होता है। यह मुख्यतः फिलिस्तीनी अरबी समाज है, जिसका खेती और पशुपालन मुख्य पेशा रहा है। ये काफी मजबूत और ईमानदार माने जाते हैं। अरबी मुस्लिम समाज से इनका खास वास्ता नहीं होता।

इनके बारे में कहा जाता है कि ये रहस्यमयी प्रकृति के होते हैं और अपने बारे में बात करना या जानकारी साझा करना पसंद नहीं करते हैं। यही कारण है कि इजरायल के निर्माण के शुरुआत से ही ये वहाँ की सेना के लिए खुफिया जानकारियाँ देते आ रहे हैं। इन्हें शारीरिक ही नहीं, दिमागी तौर पर भी बेहद मजबूत माना जाता है।

बदू मुस्लिमों के बारे में कहा जाता है कि रेगिस्तान में रहने के कारण वे रेत पर पाँव के निशान देखकर बता सकते हैं कि गुजरने वाला शख्स पुरुष था या महिला। इतना ही नहीं, तेज आँधी में भी ये लोग सटीक निशाना लगा सकते हैं। ये समुदाय बाज पालता है और उसका कई तरह से इस्तेमाल करता है।

16वीं सदी में तुर्की के सुल्तान ने इजरायल पर कब्जा कर लिया तो वहाँ के लोगों को अपनी सुरक्षा की चिंता होने लगी। इसके बाद यहूदियों ने उन्हें अपनी सुरक्षा में तैनात करना शुरू कर दिया। इजरायल के निर्माण के समय भी बदू मुस्लिमों ने इस्लामी देशों के रवैये के खिलाफ जाकर इजरायल का समर्थन किया था और उसकी मदद की थी।

बदू मुस्लिम इजरायल में इसके निर्माण के समय से ही रहते आ रहे हैं। जानकारी के अनुसार, वर्तमान में इजरायल में लगभग 2 लाख बदू मुस्लिम रहते हैं। इनमें से बड़ी संख्या में बदू दक्षिणी इजरायल में रहते हैं, जहाँ इस्लामी आतंकी संगठन हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को बर्बर हमला किया था।

हमास के आतंकी हमले में अब तक 19 बदू मुस्लिम मारे जा चुके हैं। बदू इजरायल की सेना के साथ भी जुड़े हैं। ध्यान देने वाली बात ये है कि इजरायल अन्य फिलिस्तीनियों को अपनी सेना में भर्ती नहीं करता है। वहीं, बदू समुदाय को सेना में शामिल किया जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, बदू समुदाय ने इजरायल के निर्माण के समय इजरायली सुरक्षा बलों को महत्वपूर्ण ख़ुफ़िया जानकारी जुटा कर दी थी। इनको चरवाहा होने के कारण इलाके की अच्छी भौगोलिक जानकारी थी। यह रेगिस्तान में रहने वाली जनजाति होने के कारण इजरायल के नेगेव और सिनाई जैसे इलाकों की अच्छी जानकारी रखते हैं।

बदू समुदाय को रेगिस्तान की जिन्दगी से निकाल कर इजरायल ने साल 1965 में उन्हें शहरों की कॉलोनियों में बसाया था। इस तरह वे मॉडर्न जिन्दगी को जान सके। बदू मात्र इजरायल में ही नहीं, बल्कि अन्य अरब देशों में भी रहते हैं। सऊदी अरब, इराक, जॉर्डन, अल्जीरिया, सूडान, सीरिया जैसे देशों में इनकी बड़ी आबादी है।

इजरायल के भीतर बदू समुदाय की सेवाओं का काफी सम्मान किया जाता है। इजरायल में 154 बदू सैनिकों की याद में एक स्मारक भी बनाया गया है। यहाँ इनके परिवार वाले इन्हें श्रृद्धांजलि देने के लिए पहुँचते हैं। इसे मेमोरियल ऑफ़ ब्रोकन हर्ट्स कहा जाता है।

एक रिपोर्ट बताती है कि हर वर्ष लगभग 450 बदू इजरायली सेना में अपनी सेवाएँ देने के लिए आते हैं। हालाँकि, इन्हें इजरायल के अन्य यहूदियों की तरह अनिवार्य मिलिट्री ट्रेंनिंग से छूट है। यह स्वयं की इच्छा पर सेना में आते हैं। पूरी दुनिया में बदू मुस्लिमों की संख्या लगभग 40 लाख है और इनमें से अधिकांश इस्लाम के सुन्नी तबके से ताल्लुक रखते हैं।