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‘पुलिस की वर्दी पहनकर जंतर-मंतर पर करो हंगामा’: CJP के प्रदर्शन में ‘पाकिस्तानी साजिश’ पर बड़ा खुलासा, जैश के आतंकी हमीम ने खोले राज

                       ISI से जुड़ा हमीम मंडल (बाएँ) और उसकी गर्लफ्रेंड(दाएँ) गिरफ्तार (फोटो साभार: TOI)
पश्चिम बंगाल की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने एक बड़ी आतंकी साजिश का खुलासा किया है। शुक्रवार (31 जुलाई 2026) को पूर्वी बर्धमान जिले से 24 वर्षीय मोहम्मद हमीम मंडल को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के अनुसार वह आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के लिए काम कर रहा था और पाकिस्तानी आतंकी शहजाद भट्टी के हैंडलरों के इशारे पर सक्रिय था। पुलिस ने यह भी बताया कि उसके पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से भी संपर्क थे।

शनिवार (01 अगस्त 2026) को कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान STF के आईजी गौरव शर्मा ने बताया कि हमीम मंडल के मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और एनक्रिप्टेड सोशल मीडिया चैट से जाँच एजेंसियों को अहम डिजिटल सबूत मिले हैं।

जाँच में सामने आया कि हमीम मंडल की योजना दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन में घुसने की योजना थी। पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों ने हमीम को प्रदर्शन में पुलिस की वर्दी में घुसकर तोड़फोड़ करने के आदेश दिए थे।

ऐसे में सवाल यह भी है कि पुलिस वर्दी कहां से और किसकी मदद से हासिल की जानी थी? इसकी भी जाँच बहुत जरुरी है। 

आईजी गौरव शर्मा ने बताया, “हमीम, पाकिस्तानी हैंडल और फोन नंबर इस्तेमाल करने वाले लोगों से सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप के जरिए मिले निर्देशों पर काम कर रहा था। उसे पुलिस की वर्दी खरीदकर, एक ग्रुप के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर जाकर वहाँ हंगामा करने का निर्देश दिया गया था।” उन्होंने कहा कि इसकी जाँच चल रही है कि क्या वह इस ग्रुप को बना पाया और दिल्ली गया था या नहीं।

जाँच में यह भी सामने आया कि हमीम को बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की रेकी करने को कहा गया था। गौरव शर्मा ने बताया कि शुभेंदु अधिकारी को पाकिस्तान से निशाना बनाया गया था, इसके लिए हमीम को निर्देश थे कि वह मुख्यमंत्री की उन जगहों के बारे में जानकारी जुटाए जहाँ वे बिना सुरक्षा के जाते हैं। शुरुआती जाँच के बाद पुलिस ने हमीम मंडल को कोर्ट मे पेश किया, जहाँ से उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

हमीम मंडल के पाकिस्तानी-समर्थित आतंकी मॉड्यूल की जाँच के दौरान STF को अर्पिता सरकार के साथ उसकी चैट मिली, जिसके बाद झारखंड से उसे भी गिरफ्तार किया गया। वह हमीम मंडल की गर्लफ्रेंड है, लेकिन इकलौती नहीं। हमीम उसे हनी-ट्रैप नेटवर्क की तरह इस्तेमाल करता था। उसे निशाने पर बड़े-बड़े नेता थे, हाल ही में अर्पिता झारखंड के मंत्री के संपर्क में थी।

STF ने हमीम मंडल और अर्पिता सरकार के मोबाइल फोन, सोशल मीडिया अकाउंट, चैट रिकॉर्ड, कॉल डिटेल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जब्त कर लिया है। एजेंसी यह भी जांच रही है कि क्या दोनों ने किसी अन्य व्यक्ति को भी इस साजिश में शामिल करने की कोशिश की थी। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही पूरे नेटवर्क और साजिश की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी।

तलवार की धार पर बिहार: महागठबंधन की अग्निपरीक्षा, तेजस्वी यादव राह में सियासी रोड़े


बिहार की राजनीति का रंगमंच 2025 के विधानसभा चुनावों के लिए तैयार है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) टिकटों की घोषणा करने के मामले में बाजी मार ले गया है। पीएम मोदी के दिशा-निर्देशन में राज्य की सारी सीटों पर सहमति हो गई है। पहले चरण का मतदान 6 नवंबर को होगा और इसके लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 17 नवंबर यानी एक दिन बाद ही है। इसके बावजूद महागठबंधन अभी सीटों का विवाद ही नहीं सुलझा पाया है। उसके सहयोगी दल अपनी ढपली, अपना राग अलाप रहे हैं। हालात यह हैं कि महागठबंधन में सीट शेयरिंग अभी तक नहीं हो पाई है। लेकिन सहयोगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने इससे पहले ही अपने कुछ प्रत्याशियों का एलान करके कांग्रेस को भड़का दिया है। उधर 65 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए हाथ-पैर मार रही कांग्रेस में अभी टिकट बंटवारा हुआ नहीं और टिकटार्थियों की नाराजगी दिखने लगी है। दिल्ली में केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के बाद टिकट दावेदारों ने जमकर नारेबाजी भी की। कांग्रेस को यह डर भी सता रहा है कि टिकटों की घोषणा के बाद सबसे ज्यादा बगावत उसी की पार्टी में होने वाली है। हालांकि यह भी सच है कि कांग्रेस से ज्यादा रोड़े तेजस्वी यादव की सियासी राहों में बिछ गए हैं। उनकी चुनौतियों पर नजर डालें तो यह उनके लिए सबसे ज्यादा जटिलताओं वाला चुनाव है।

बिहार में महागठबंधन में सीट शेयरिंग में महा-घमासान
बिहार में महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर स्थिति जटिल है। खबरों के अनुसार, महागठबंधन के अंदर अभी तक सीट शेयरिंग फॉर्मूला को लेकर पूरी सहमति नहीं बन पाई है। आरजेडी और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर कड़ा टकराव चल रहा है, जहां कांग्रेस 65 से ज्यादा सीटों की मांग पर अड़ी हुई है, जबकि आरजेडी कांग्रेस के लिए 55 सीटों की सीमा तय करना चाहती है। इस वजह से सीट बंटवारे पर अभी अंतिम फैसला नहीं हो पाया है और गठबंधन के दल तितर-बितर नजर आ रहे हैं। हालांकि बैठकों के बाद कुछ फॉर्मूला तय होने की खबरें भी आई हैं, लेकिन औपचारिक घोषणा अभी बाकी है। इस असमंजस के कारण चुनाव प्रक्रिया में भी कुछ अस्थिरता बनी हुई है, खासकर नामांकन की अंतिम तिथि एक दिन बाद ही है।

कत्ल की रात में भी सहमति ना बनी तो बंटाधार तय
इस टकराव के पीछे कांग्रेस की ओर से दलित-मुस्लिम समीकरण वाली सीटों की मांग और सीमांचल क्षेत्र की अधिक सीटें अपेक्षित होना है, जबकि आरजेडी इसे लेकर रजामंद नहीं है। इसके अलावा मुकेश सहनी के वीआईपी पार्टी की सीटों की मांग भी मुद्दा बनी है। इस तरह सीट बंटवारे का मामला महागठबंधन में अभी भी सुलझा नहीं है और यह चुनाव के समय तक एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। संक्षेप में, बिहार में महागठबंधन में सीट बंटवारा हुआ नहीं है, बल्कि अभी तक उस पर विवाद और असमंजस बना हुआ है। आज कत्ल की रात है, यदि सीट शेयरिंग पर सहमति नहीं बनी तो महागठबंधन ऐन मौके पर टूट सकता है। मुकेश सहनी तो अलग चुनाव लड़ने के संकेत भी दे चुके हैं।

पीके का चुनावी समर में आना तेजस्वी के लिए बुरे सपने जैसा
जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर का चुनावी समर में उतरना तेजस्वी के लिए बुरे सपने जैसा है। तेजस्वी यादव राघोपुर से दो बार (2015 और 2020) जीत चुके हैं। भाजपा के सतीश कुमार (जो एक यादव उम्मीदवार भी हैं और जिन्होंने पहले तेजस्वी की मां राबड़ी देवी को हराया था) पर उनकी जीत का अंतर 38,174 वोटों का था। अब किशोर का आना एक अचानक आए तूफान जैसा है, जो एक समुद्र की शांति को भंग करने की धमकी दे रहा है। रणनीतिक कौशल के लिए प्रसिद्ध पीके भले ही खुद की पार्टी को जिता ना पाएं, लेकिन तेजस्वी का खेल तो बिगाड़ ही सकते हैं। इसका उत्तर मतदाताओं की बदलती निष्ठाओं में निहित हो सकता है, जो बदलाव के आकर्षण से प्रभावित हो सकते हैं।

कांग्रेस ने 4000 आवेदन मांगे, अब भारी विरोध से मुश्किल
टिकट बंटवारा हुआ नहीं और टिकटार्थियों की नाराजगी दिखने लगी है। कांग्रेस को भी यह डर सता रहा है। दिल्ली में केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के बाद टिकट दावेदारों ने जमकर नारेबाजी भी की। इस कारण सदाकत आश्रम में हमेशा दिखने वाले नेताजी अब गायब रहने लगे हैं। दरअसल, इस बार पार्टी ने सभी विधानसभा क्षेत्रों से आवेदन मंगाए थे। इस कारण दावेदारों की संख्या चार हजार से ज्यादा हो गई। चुनावी साल में संगठन के अभाव में इन दावेदारों के सहारे ही पार्टी ने कार्यक्रमों और अभियान को सफल बनाया। कांग्रेस इन्हें आश्वस्त करती रही कि कार्यक्रमों में मेहनत के अनुसार ही टिकट मिलेगा। इन्हें रोज नए-नए टास्क सौंपे गए। रोजाना इन दावेदारों से फीडबैक भी लिया गया। माई बहिन मान योजना, हर घर झंडा कार्यक्रम सहित अन्य कार्यक्रमों के फार्म भरवाने में इनका सहयोग लिया। राहुल की वोटर अधिकार यात्रा में बढ़चढ़कर हिस्सेदारी की। टिकट की आस में दिन-रात एक कर मेहनत करने वाले कई नेता अब पार्टी से सिंबल चाह रहे हैं। नई दिल्ली में दावेदारों ने वहां डेरा जमा लिया है। केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक के दौरान कांग्रेस मुख्यालय के बाहर कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी भी की। कार्यकर्ता हाल ही में पार्टी में शामिल हुए नेताओं को तवज्जो देने से भी नाराज हैं।

ओवैसी की एमआईएम मुस्लिम वोट बैंक में सैंध लगाएगी
इसके बाद, असदुद्दीन ओवैसी की मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (MIM) द्वारा बिहार में कई उम्मीदवार उतारने की तैयारी में लगे अशांत जल पर नजर डालते हैं। हालांकि एमआईएम की चुनावी सफलता संदिग्ध हो सकती है (2020 में एमआईएम ने मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र में 5 सीटें जीती थीं), मगर मुस्लिम वोटों को हथियाने की उसकी क्षमता महागठबंधन के लिए एक बड़ा खतरा है। दरअसल, तेजस्वी का आधार मुस्लिम-यादव (एम-वाई) गठबंधन से मजबूत है, फिर भी इस समर्थन की नींव प्रतिस्पर्धी उम्मीदवारों के भार तले टूटने का ख़तरा है। यह एक नाज़ुक दौर है, जो सांप्रदायिक राजनीति की भट्टी में बने गठबंधनों का भाग्य तय कर सकता है।

तेजप्रताप से लेकर रोहिणी आचार्य तक पारिवारिक प्रतिद्वंद्विता
तेजस्वी यादव के अपने परिवार में ही कई दरारें सामने दिखाई दे रही हैं। उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव और बहन रोहिणी आचार्य संभावित विध्वंसक के रूप में उभरकर सामने आ गए हैं। उनकी महत्वाकांक्षाएं और आक्रोश सतह के नीचे ही उबल रहे हैं। पारिवारिक बंधन, जो अक्सर ताकत का स्रोत होता है, यहां एक संभावित दरार में बदल गया है। ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में जहां धारणाएं वास्तविकता जितनी ही महत्वपूर्ण हैं, यादव परिवार के भीतर असंतोष आरजेडी के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। इससे तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर भी सवालिया निशान लगते हैं। तेजस्वी की बड़ी बहन, डॉ. मीसा भारती (जिनके पास पेशेवर चिकित्सा की डिग्री है), पाटलिपुत्र से सांसद हैं और उन्होंने आखिरी बार 2024 में जीत हासिल की थी। वह बहुत महत्वाकांक्षी भी हैं और भविष्य में अपने छोटे भाई तेजस्वी यादव के लिए चुनौती बन सकती हैं।

सीएम फेस ना बनाकर कांग्रेस ने तेजस्वी को डुबोया
महागठबंधन के मामले को और भी जटिल बनाने में राहुल गांधी और कांग्रेस अहम भूमिका निभार रहे हैं। कांग्रेस पार्टी का रुख, जो एक सहयोगी दल होते हुए भी तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में समर्थन देने में साफ हिचकिचा रही है। यह अनिर्णय महागठबंधन के भीतर भी गूंज रहा है और समर्थकों के बीच अनिश्चितता के बीज बो रहा है। एकता पर निर्भर गठबंधन में, सीएम कैंडिडेट का अभाव तेजस्वी की सफल अभियान के लिए आवश्यक विविध मतदाता आधार को एकजुट करने की क्षमता को जरूर बाधित करेगा। कांग्रेस की इस चुप्पी को न केवल एक रणनीतिक विकल्प के रूप में, बल्कि विश्वास की कमी के रूप में भी देखा जा सकता है, जो तेजस्वी की विश्वसनीयता को कम कर सकता है।

अयोध्या : आप उनकी मस्जिद के लिए पैसा दें, और वे 15 लाख रुपए लेकर भी राम मंदिर में डालेंगे अड़ंगा

              इसी मस्जिद को स्थानांतरित किए जाने को लेकर कादरी ने की है शिकायत (फोटो साभार: आज तक)
एक तरफ अयोध्या के धन्नीपुर में अरबी स्टाइल में बनने वाली मस्जिद के लिए हिंदू पैसा दे रहे हैं। दूसरी ओर कुछ मुस्लिम संगठन बद्र मस्जिद का अड़ंगा डालकर राम मंदिर को विवादों में लाना चाहते हैं। इन सबके बीच अयोध्या के मुस्लिमों की ख्वाहिश यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब जनवरी 2024 में राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के लिए आएँ तो धन्नीपुर की मस्जिद की बुनियाद भी रख दें।

कुल मिलाकर यह उसी गंगा-जमुनी तहजीब का नमूना है जिसमें वर्षों से भारत का हिंदू पिसता रहा है। जिसके कारण उसे अपने अराध्य श्रीराम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने के लिए करीब 500 साल की प्रतीक्षा करनी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।

प्राण-प्रतिष्ठा से ठीक पहले राम मंदिर को लेकर विवाद खड़े करने की कोशिश वाला संगठन अंजुमन मुहाफिज मसाजिद व मकाबिर कमेटी है। इस समूह ने राम परिपथ में आने वाली उस मस्जिद को ले कर शिकायत दर्ज करवाई है, जिसको शिफ्ट करने का एग्रीमेंट सबकी सहमति से पहले ही लिखित तौर पर हो चुका है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह मामला अयोध्या के पांजी टोला स्थित मस्जिद बद्र से जुड़ा हुआ है। यह मस्जिद अयोध्या से लखनऊ-गोरखपुर नेशनल हाईवे को जोड़ने वाले 13 किलोमीटर रामपथ के मार्ग पर मौजूद है। मुस्लिमों का दावा है कि यहाँ रोज इबादत होती है। गुरुवार (5 अक्टूबर 2023) को अंजुमन मुहाफिज मसाजिद व मकाबिर कमेटी के पदाधिकारी अध्यक्ष आजम कादरी के साथ अयोध्या के SDM राम कुमार शुक्ला के पास पहुँचे। एक ज्ञापन देते हुए इस मस्जिद को अवैध तरीके से राम जन्मभूमि ट्रस्ट को बेचे जाने का आरोप लगाया।

उपजिलाधिकारी को दी गई शिकायत में कमेटी के सदस्यों ने मस्जिद के मुतवल्ली रईस अहमद और गवाह नूर आलम पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया। शिकायतकर्ताओं ने बताया कि रईस अहमद और नूर आलम ने वक्फ की जमीन में बनी बद्र मस्जिद का 30 लाख रुपए में धोखाधड़ी व गुमराह करके समझौता किया है। इस समझौते के तहत इन दोनों को 15 लाख रुपए एडवांस भी मिलने का दावा कया गया है। शिकायत में तर्क दिया गया है कि वक्फ की जमीन बेचने का अधिकार रईस और नूर आलम को नहीं है।

अंजुमन मुहाफिज मसाजिद व मकाबिर कमेटी ने प्रशासन से रईस और नूर आलम पर FIR दर्ज कर कार्रवाई की माँग की है। कमेटी के ज्ञापन में मस्जिद की जमीन को खरीदने-बेचने पर भी रोक लगाने की अपील की गई है। कमेटी के अध्यक्ष आजम कादरी अयोध्या में सभी मस्जिद, कब्रिस्तान, दरगाह और मज़ार आदि की देखरेख का जिम्मा अपने ऊपर बताते हैं। उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के वरिष्ठ अधिवक्ता आफताब अहमद ने भी मस्जिद की जमीन को बेचने या दान में देने का प्रयास अपराध बताया है। आफ़ताब ने भी रईस और नूर पर कार्रवाई की माँग उठाई है।

इस मामले पर अयोध्या के DM (जिलाधिकारी) नीतीश कुमार ने मीडिया से बातचीत में अंजुमन मुहाफिज मसाजिद व मकाबिर कमेटी द्वारा शिकायत मिलने की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि मामले की जाँच SDM प्रवर्तन अमित सिंह को सौंपी गई है। रिपोर्ट आने पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। वहीं थाना प्रभारी रामजन्मभूमि ने भी मामले में जाँच जारी होने की बात कही है।

 क्या है समझौते में

1 सितंबर 2023 को हुए इस फैसले में रईस अहमद द्वारा मस्जिद को 100 साल पुरानी बताया गया है। कागजातों में यह मस्जिद पैसे के अभाव में जर्जर होने की जानकारी दी गई है। मस्जिद को स्थानांतरित करने के लिए 6 माह की समय सीमा तय की गई थी। इसी के एवज में 15 लाख रुपए एडवांस के तौर पर रईस को दिए गए थे।

बहकावे में लगाए जा रहे आरोप

इस मामले में आरोपित किए जा रहे मस्जिद के मुतवल्ली रईस अहमद की भी प्रतिक्रिया सामने आई है। दैनिक भास्कर से बात करते हुए उन्होंने खुद पर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताया है। रईस का दावा है कि उनका एग्रीमेंट मस्जिद को हटाने का नहीं बल्कि उसे शिफ्ट करने के लिए हुआ था। रईस ने बताया कि मस्जिद का आधा हिस्सा पहले ही सड़क को चौड़ा करने में जा चुका है और सिर्फ बद्र मस्जिद ही नहीं बल्कि पूरा मोहल्ला ही रामजन्मभूमि ट्रस्ट अधिग्रहित करने वाला है।
बद्र मस्जिद के मुतवल्ली रईस के अनुसार 1 सितंबर 2023 को रामजन्मभूमि ट्रस्ट के साथ मस्जिद शिफ्ट करने का करार अकेले उनका नहीं, बल्कि सबकी सहमति से था। इस करार के दौरान मस्जिद में आने वाले नमाजी भी मौजूद बताए गए। रईस का दावा है कि जनवरी माह में वक्फ बोर्ड से जुड़े लोग भी आए थे, जब मस्जिद का आधा हिस्सा सड़क में जाने वाला था। दावा है कि तब वक्फ के अधिकारियों ने रईस अहमद से सरकार से जुड़े मैटर में मस्जिद की भलाई को देखते हुए फैसला करने को कहा था। रईस का दावा है कि कुछ लोग अब बहकावे में आ कर उन पर फर्जी आरोप लगा रहे हैं।