खालिस्तानी आतंकियों के निशाने पर रहा है पंजाब केसरी ग्रुप, प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI ChatGPT)
पंजाब केसरी ग्रुप को पंजाब सरकार द्वारा निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आ रही हैं। पंजाब केसरी समूह ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि अक्टूबर 2025 में प्रकाशित एक संतुलित खबर (जिसमें विपक्ष ने AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाए थे) के बाद से बदले की भावना से कार्रवाई हो रही है। इसमें नवंबर 2025 से सरकारी विज्ञापन बंद करना, जनवरी 2026 में FSSAI, GST, Excise, Pollution Control Board और Factories Department की एक साथ छापेमारी शामिल है।यह घटना पंजाब केसरी के उस ऐतिहासिक संघर्ष को याद दिलाती है, जब 1980 के दशक में खालिस्तानी आतंकियों ने इस समूह को बार-बार निशाना बनाया था। आज भी यह समूह अपनी मजबूत रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है।
स्वतंत्रता सेनानी लाला जगत नारायण ने की थी पंजाब केसरी ग्रुप की शुरुआत
पंजाब केसरी की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानी और प्रमुख पत्रकार लाला जगत नारायण ने की थी। उन्होंने 1940-50 के दशक में हिंदी भाषा में समाचार पत्र शुरू किए, जो पंजाब में लोकप्रिय हुए। लाला जगत नारायण ने ‘हिंद समाचार’ और ‘पंजाब केसरी’ जैसे अखबारों के जरिए समाज में जागरूकता फैलाई। वे आर्य समाज से जुड़े थे और पंजाब की राजनीति में सक्रिय रहे, यहाँ तक कि विधायक और सांसद भी बने। लेकिन 1980 के दशक में खालिस्तान आंदोलन के उभार के साथ उनकी मुश्किलें शुरू हुईं।
खालिस्तान आंदोलन के विरोध में खड़ा रहा पंजाब केसरी ग्रुप
खालिस्तानी आतंकियों ने पंजाब केसरी को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि लाला जगत नारायण और उनके अखबार खालिस्तान आंदोलन के कड़े आलोचक थे। सिख युवाओं में अलगाववाद फैला रहे खालिस्तानी आतंकी जर्नैल सिंह भिंडराँवाले के उभार के समय पंजाब केसरी ने उसकी हरकतों की खुलकर आलोचना की। अखबार ने निरंकारी संप्रदाय पर हमलों के लिए खालिस्तानी तत्वों को दोषी ठहराया और खालिस्तान को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताया।
लाला जगत नारायण ने पंजाबी हिंदुओं से अपील की कि वे जनगणना में हिंदी को अपनी मातृभाषा बताएँ, जिससे सिखों में नाराजगी बढ़ी। अखबार ने सिख आतंकियों और भिंडराँवाले की हिंसा को बिना किसी भेदभाव के उजागर किया। इससे खालिस्तानी उन्हें सिख-विरोधी मानने लगे। उनका मकसद था कि ऐसे मुखर आलोचकों को चुप कराकर डर फैलाया जाए, ताकि कोई भी खालिस्तान के खिलाफ बोले नहीं।
खालिस्तानी आतंकी ने की लाला जगत नारायण की हत्या
लुधियाना के पास 9 सितंबर 1981 को लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई। वे कार में जा रहे थे जब अज्ञात हमलावरों ने गोलीबारी की। यह हत्या भिंडराँवाले के चेले नछत्तर सिंह ने की, जिसने बाद में कबूल किया कि भिंडराँवाले के प्रभाव में यह किया। इस हत्या के बाद भिंडराँवाले को गिरफ्तार किया गया, लेकिन सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया। उनकी हत्या ने पंजाब में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया और हिंदुओं में डर पैदा किया।
सितंबर 1981 में उनकी हत्या ने पंजाब में बढ़ते उग्रवाद को ‘नई धार’ दे दी। HRW की रिपोर्ट में घटना का संदर्भ आते हुए बताया गया है कि 9 सितंबर 1981 को उनकी हत्या के बाद भिंडराँवाले के अनुयायियों पर संदेह गया, गिरफ्तारी हुई और उसके बाद हिंसा और तनाव का दौर बढ़ा।
बता दें कि भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने लाल जगत नारायण की स्मृति में सन् 2013 में डाक टिकट जारी करके सम्मानित किया था। यहाँ ये बताना भी जरूरी है कि इमरजेंसी के समय लाला जगत नारायण ने इंदिरा सरकार का भी जमकर विरोध किया था। यहाँ तक कि इस बार जो काम भगवंत मान की आम आदमी पार्टी की सरकार कर रही है, वही काम कॉन्ग्रेसी सरकार ने भी किया था।
कॉन्ग्रेसी सरकार ने पंजाब केसरी ग्रुप के अखबारों का प्रकाशन रोकने के लिए बिजली सप्लाई काट दी थी, तब पंजाब केसरी ग्रुप ने ट्रैक्टरों की सहायता से प्रिंटिंग का काम किया था और 10 दिनों तक ये व्यवस्था कायम रखी थी, जबकि हाई कोर्ट के आदेश के बाद पंजाब केसरी ग्रुप के प्रिंटिंग प्रेस की बिजली बहाल नहीं हो गई।
रमेश चंदर ने भी पंजाब केसरी के तेवरों को नहीं होने दिया कम
इसके बाद भी पंजाब केसरी चुप नहीं हुआ। लाला जगत नारायण के बेटे रमेश चंदर ने अखबार की कमान संभाली और आलोचना जारी रखी। वे भी खालिस्तान आंदोलन के खिलाफ मजबूती से खड़े रहे। 12 मई 1984 को जालंधर में रमेश चंदर की हत्या कर दी गई। वे चंडीगढ़ से लौट रहे थे जब आतंकियों ने उनकी कार पर हमला किया और गोलीबारी की। दशमेश रेजिमेंट ने जिम्मेदारी ली। यह हत्या खालिस्तानी कमांडो फोर्स के सदस्यों से जुड़ी बताई जाती है। रमेश चंदर की हत्या के समय वे भारी सुरक्षा में थे, लेकिन हमलावरों ने उन्हें घेर लिया।
पमेश चंदर के शरीर को 64 गोलियाँ मारकर छलनी कर दिया और वह भी अपने पिता की भांति देश की एकता के लिए बलिदान हो गए। दुनिया में पत्रकारिता के इतिहास में शायद ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहाँ पिता और पुत्र दोनों को देश और जनता की आवाज उठाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी हो। वास्तव में पिता-पुत्र का बलिदान पत्रकारिता के इतिहास के साथ-साथ भारत के आधुनिक इतिहास का भी गौरवशाली अध्याय है।
पंजाब केसरी ग्रुप के 50+ लोगों की हत्या
पंजाब केसरी ग्रुप के पिता-पुत्र मालिकों की हत्याओं के बाद पंजाब केसरी ग्रुप पर लगातार हमले होते रहे। अखबार के कई कर्मचारी, हॉकर और वेंडर मारे गए। रिपोर्ट्स के अनुसार, लाला जगत नारायण की हत्या के बाद हिंद समाचार ग्रुप से जुड़े 51 से ज्यादा लोग मारे गए। अखबार को बंद करने की कोशिशें हुईं, लेकिन पंजाब केसरी परिवार ने हिम्मत नहीं हारी।
भारत सरकार और पंजाब सरकार ने सुरक्षा देने की कोशिश की, लेकिन 1980 के दशक में स्थिति बहुत खराब थी। इंदिरा गांधी सरकार ने ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984) किया, जिसमें भिंडराँवाले को खत्म किया गया, लेकिन इससे हिंसा और बढ़ गई।
पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा और पुलिस-सेना को व्यापक अधिकार दिए गए। पंजाब केसरी के संपादकों को CRPF और पुलिस की सुरक्षा दी गई। बाद में संपादक बने अशविनी कुमार चोपड़ाको भी भारी सुरक्षा मिली। लेकिन शुरुआती दौर में सुरक्षा पर्याप्त नहीं थी, जिससे हमले जारी रहे। 1990 के दशक में कच्छ-ऑपरेशन के बाद आतंकवाद कम हुआ और सुरक्षा बेहतर हुई।
आज भी खालिस्तानी आंदोलन को आड़े हाथों लेता है पंजाब केसरी ग्रुप
आज भी पंजाब केसरी खालिस्तानी आतंकियों के खिलाफ वैसे ही तेवर रखता है। यह समूह राष्ट्रवादी और मजबूत रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है। आज का पंजाब 1980-90 के पंजाब जैसा नहीं है, लेकिन खालिस्तान-समर्थक उग्र नैरेटिव, विदेशों से चलने वाला प्रचार, और कुछ प्रतिबंधित संगठनों की गतिविधियाँ समय-समय पर चर्चा में रहती हैं।
जहाँ तक आज के समय में पंजाब केसरी की बात है, उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खालिस्तान आंदोलन की आलोचना/विरोध वाले लेख और रिपोर्टिंग दिखती रही है। वो खालिस्तानी गतिविधियों को उजागर करता रहा है। ऐसे में देखा जाए तो यह अखबार आज भी पंजाब अलगाववाद के विरोध और ‘राष्ट्रीय एकता’ के पक्ष में पूरी तरह से डटा हुआ है।
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