1979 की इस्लामी क्रांति से पहले कैसा था आज के कठमुल्लों का ईरान, 46 साल में कितना बदला

 ईरान में 1979 से पहले मुस्लिम महिलाएँ और इससे चिढ़े मौलवियों का 'इस्लामी क्रांति' के नाम पर प्रदर्शन (साभार: BBC)
ईरान के लोग एक बार फिर सड़कों पर हैं। इस बार विरोध इस्लामी हुकूमत के खिलाफ है। अयातुल्ला अली खामेनेई को सत्ता से हटाने की माँग को जारी इन प्रदर्शन में 2500 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। मुस्लिम महिलाएँ हिजाब उतारकर इस्लामी सत्ता का विरोध कर रही हैं। उधर, खामेनेई सरकार दमन, गिरफ्तारियों और फाँसी का रास्ता चुन रही है।

इन प्रदर्शनों की अगुवाई मुस्लिम महिलाएँ कर रही हैं, जो कभी हिजाब उतारकर, कभी खामेनेई की फोटो से सिगरेट सुलगाकर, तो कभी पुलिस के सामने डटकर खड़ी हो रही हैं। सड़कों पर ‘तानाशाह मुर्दाबाद’, ‘मुल्लाओं को ईरान छोड़ना होगा’ जैसे नारे सुनाई दे रहे हैं। यह नारे पूरी व्यवस्था के खिलाफ हैं, जो इस्लाम के नाम पर जीवन, कपड़े, सोच और बोलने की आजादी तय करती है।

ईरान के लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या ‘इस्लामी क्रांति‘ ने वाकई आजादी दी थी या सिर्फ सत्ता का चेहरा बदला था। यही सवाल 1979 में भी उठा था, जब ईरान की जनता राजा मोहम्मद रजा शाह पहलवी के खिलाफ सड़कों पर उतरी थी। तब भी तानाशाही, दमन और सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ नारे लगे थे। फर्क बस इतना है कि तब जनता ने राजशाही से छुटकारा पाने के लिए मजहबी नेतृत्व पर भरोसा किया था। आज चार दशक बाद वही जनता उसी इस्लामी सत्ता को हटाने के लिए संघर्ष कर रही है, मानो किरदार बदलकर इतिहास ईरान में खुद को दोहरा रहा हो।

1979 से पहले ईरान में राजशाही

जिस ईरान ने 1979 में राजा के खिलाफ बगावत की, वह अचानक गुस्से में नहीं फूटा था। यह गुस्सा सालों से भीतर जमा हो रहा था। उस वक्त देश पर मोहम्मद रजा शाह पहलवी का शासन था। राजा पहलवी खुद को ईरान को पिछड़ेपन से निकालकर आधुनिक दुनिया में ले जाने वाला नेता मानता था। उस वक्त तेहरान जैसे शहरों में ऊँची इमारतें, वेस्टर्न लाइफस्टाइल, फैशन और विश्वविद्यालय दिखते थे। बाहर से ईरान एक प्रगतिशील देश लगता था, खासकर पश्चिमी दुनिया की नजरों में।
                                             मोहम्मद रजा शाह पहलवी (साभार: AajTak)
लेकिन यह तस्वीर अधूरी थी। सत्ता पूरी तरह राजा के हाथ में थी और जनता की भागीदारी लगभग शून्य थी। चुनाव औपचारिक थे, विपक्ष का नाम नहीं था। जो भी सरकार से सवाल करता, उसे SAVAK (साजमान-ए-इत्तिलाआत वा अम्नियत-ए-किश्वर) नाम की खुफिया एजेंसी का सामना करना पड़ता था। बोलने की आजादी, लिखने की आजादी और राजनीतिक असहमति तीनों पर कड़ा नियंत्रण था।

शाह के दौर में मुस्लिम महिलाओं की पहचान

1960 और 1970 के दशक में शाह के शासन में ईरान की मुस्लिम महिलाओं को आजादी थी। शहरों में महिलाएँ बिना हिजाब पढ़ाई करती थीं, नौकरी करती थीं और सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनती थीं। शाह के शासन में महिलाओं को वोट का अधिकार मिला, पारिवारिक कानूनों में कुछ सुधार हुए और शिक्षा के दरवाजे भी खोले गए।  
लेकिन ग्रामीण इलाकों और मजहबी क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका अभी भी काफी सीमित थी। कई जगह अब भी महिलाओं को पढ़ाई और नौकरी करने की अनुमति नहीं थी। जहाँ एक तरफ शाह ने पश्चिमी संस्कृति और आधुनिकता को आगे बढ़ाया, यही मजहबी और सामाजिक मूल्यों के टकराव का कारण बना।
शाह की सत्ता में महिलाओं की आजादी को समाज और मजहबी समूहों के मानदंडों के खिलाफ मानी जाती थी। यही वजह थी कि मजहबी उलेमा और शिया मौलवी शाह की सत्ता के विरोध में थे। यही विरोधाभास अंत में 1979 की क्रांति में महिलाओं की भूमिका और उनके अधिकारों के सवाल का आधार बना।

शाह के खिलाफ विरोध को मौलवियों और उलेमाओं ने दी मजहबी पहचान

शाह की सत्ता में प्रगति को देख सबसे ज्यादा असंतुष्ट शिया मुस्लिम और उलेमा थे। ईरान में सदियों से शिया उलेमा केवल मजहबी नेता नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक और कानूनी जीवन में भी दखल करते थे। मोहम्मद रजा शाह पहलवी की आधुनिकता की परियोजना में इन मजहबी नेताओं के लिए जगह नहीं बची थी।
शाह की नीतियों से शिया उलेमा खफा थे। मजहबी अदालतों को कमजोर होते, शरिया कानूनों की जगह देश के अपने कानून लागू होते और वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण होते देख मौलवी और उलेमा नाखुश थे। उस दौर में मस्जिदों और मदरसों का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ बयानबाजी में होने लगा। कई मौलवियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया और कुछ को देश से बाहर निकाल दिया गया।
इस बीच सबसे प्रमुख चेहरा सामने आया अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी। 1963 में जब शाह ने ‘व्हाइट रेवोल्यूशन’ के नाम से भूमि सुधार, महिला अधिकार और पश्चिमीकरण से जुड़ी नीतियाँ लागू कीं, तो खुमैनी ने इन्हें इस्लाम विरोधी बताया। खुमैनी ने मस्जिदों से लोगों को शाह के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि 1964 में खुमैनी को पहले तुर्की और फिर इराक के नजफ शहर में डिपोर्ट कर दिया गया।
डिपोर्ट होने के बावजूद खुमैनी की आवाज ईरान के लोगों तक पहुँच रही थी। तब खुमैनी के भाषण को कैसेट टेप्स के जरिए ईरान में फैलने लगीं। शिया तौर-तरीकों में शहादत और अत्याचार के नाम पर खुमैनी ने ईरानी जनता का समर्थन हासिल किया। मस्जिदें, मदरसे और मजहबी जुलूसों से शाह सरकार के विरोध का केंद्र बनाया गया।
धीरे-धीरे शाह के खिलाफ गुस्सा सिर्फ राजनीतिक नहीं रहा, बल्कि मजहबी संघर्ष के रूप में देखा जाने लगा। शिया उलेमाओं ने ईरान में मजहबी पहचान को बचाने की लड़ाई शुरू की। यही भावना आगे चलकर 1979 की इस्लामी क्रांति की रीढ़ बनी।

1978-79 के आंदोलन से शाह के ईरान छोड़ने तक

मोहम्मद रजा शाह पहलवी के विरोध 1978 तक तेजी से फैलने लगा। महँगाई से शुरू हुए इस विरोध ने सरकार की आर्थिक नीतियों से लेकर शहरों में पश्चिमीकरण पर आवाज ऊँची की। अब सिर्फ तेहरान नहीं, बल्कि छोटे-छोटे शहरों और कस्बों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। जिस तेहरान विश्वविद्यालय ने विरोध को दिशा दी थी, ये अब सभाओं और नारेबाजियों का अड्डा बन गया। इसी दौरान अजरबादेगान यूनिवर्सिटी में भी बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए।
                                                 1979 में विरोध प्रदर्शन (फोटो साभार: AFP)
अब शाह सरकार ने भी प्रदर्शनकारियों को हटाने का मन बना लिया था। 08 सितंबर 1978 को तेहरान के जालेह चौक पर चल रहे विरोध प्रदर्शन में सरकार मार्शल लॉ (सेना का नियंत्रण) लगा दिया था। सेना ने बिना चेतावनी के प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं। इस गोलीबारी में 64 लोग मारे गए और 200 से अधिक घायल हुए थे। इस घटना ने विरोध प्रदर्शन को क्रांति का रूप दिया।
इसके बाद से विरोध प्रदर्शनों में सुरक्षाबलों और लोगों की झड़पें आम हो गईं। कभी गोलीबारी, तो कभी लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस 1978-79 इस्लामी क्रांति में लगभग 2 से 3 हजार लोगों की मौत हुई थी। इन प्रदर्शनों के चलते शाह पर अंतरराष्ट्रीय दबाव तेज होने लगा।
अब मोहम्मद शाह रजा को समझ आ गया कि ईरान में सत्ता बनाए रखना मुश्किल हो गया है। 16 जनवरी 1979 को शाह ने ईरान छोड़ने का फैसला किया। शाह पहले मिस्र गए, फिर अमेरिका और बाद में बहरीन में कुछ समय बिताया। शाह के देश छोड़ने के बाद सरकार पूरी तरह खाली हो गई और देश में अस्थिरता चरम पर थी।

खुमैनी और इस्लामी क्रांति का उदय

शाह के देश छोड़ने के बाद ईरान सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन कर रहा था। शाह के विरोध में इस आंदोलन में शामिल छात्र, मजदूर, महिलाओं, वामपंथी और मजहबी नेताओं ने इसे इस्लामी क्रांति का नाम दिया। अब अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी को वापस बुलाने की माँग हर तरफ गूँज रही थी।
तभी 01 फरवरी 1979 को खुमैनी फ्रांस से ईरान वापस लौटे। खुमैनी की वतन वापसी में करोड़ो लोग सड़कों पर स्वागत करने उतरे। ईरान को खुमैनी से काफी उम्मीदें थीं। खुमैनी ने ईरान में सत्ता को मजहबी तौर-तरीकों से चलाने का संदेश दिया। इसके बाद खुमैनी और उनके शिया मुस्लिम उलेमा और मौलवियों ने सत्ता संभाली। संसद और अदालतें बनाई गईं, लेकिन उनका काम केवल प्रशासनिक फैसले लेना था, असली शक्ति अब ‘सुप्रीम लीडर’ और मजहबी नेतृत्व के हाथ में थी।
                                             खुमैनी की ईरान में वापसी (फोटो साभार: BBC)
महिलाओं के लिए स्थिति तेजी से बदल गई। जो महिलाएँ शाह के दौर में शिक्षा और नौकरी करने को स्वतंत्र थीं, अब उन पर कड़ी पाबंदी लागू कर दी गई। सार्वजनिक जीवन में हिजाब को अनिवार्य कर दिया गया। पारिवारिक कानूनों में बदलाव कर महिलाओं के तलाक, गवाही औऱ अभिभावक अधिकार सीमित कर दिए गए। सरकार इसे ‘इस्लामी व्यवस्था’ के लिए जरूरी बताने लगी।
बदलाव सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं रहा। 1979 के बाद मजहबी संगठन जैसे मस्जिदें, मदरसे और इस्लामी संस्थान अब प्रशासन और कानून के प्रमुख केंद्र बन गए। हर नीति, हर कानून और हर सामाजिक गतिविधि मौलवियों और खुमैनी के निर्णयों के अनुसार नियंत्रित होने लगे।

1979 से 2026 तक, क्या ईरान में कुछ बदला?

1979 में ईरान की जनता ने राजा के खिलाफ बगावत की थी। लोगों को लगा था कि राजा के जाने के बाद उन्हें आजादी मिलेगी, अपनी बात कहने का हक मिलेगा और देश जनता की मर्जी से चलेगा। शाह चला गया, लेकिन उसी जगह एक ऐसी व्यवस्था आ गई, जिमें सत्ता फिर कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में चली गई। फर्क बस इतना था कि पहले ताज पहनने वाला राजा था, अब सत्ता पर मजहबी नेता बैठ गए।
                               1979 की इस्लामी क्रांति के बाद महिलाएँ (फोटो साभार: BBC)
खुमैनी के बाद ईरान में मजहब के नाम पर कानून बनने लगे। महिलाओं की आजादी सीमित हो गई, पहनावे से लेकर जिंदगी के फैसलों तक पर नियम लगाए गए। बोलने, लिखने और विरोध करने पर रोक लगती गई। जिन लोगों ने 1979 में बदलाव के सपने देखे थे, उन्होंने कुछ ही सालों में महसूस किया कि डर और दबाव खत्म नहीं हुआ, बस उसका चेहरा बदल गया।
आज 2026 में जब लोग फिर सड़कों पर हैं, तो उनके वही ‘तानाशाह मुर्दाबाद’ वाले पुराने नारे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब ये नारे राजा के खिलाफ नहीं, बल्कि खामेनेई और इस्लामी सत्ता के खिलाफ हैं। यह दिखाता है कि ईरान में 47 साल में सरकार बदली, चेहरे बदले, लेकिन आम लोगों की परेशानी वही रही। आज का विरोध सवाल खड़े करता है कि क्या 1979 की ‘इस्लामी क्रांति’ ने सच में लोगों को आजादी दी या बस एक तानाशाही से दूसरी तानाशाही तक का सफर तय हुआ।
यही वजह है कि ईरान का आज और उसका इतिहास एक-दूसरे से अगल नहीं हैं। 1979 में जो सवाल उठे थे, वही सवाल आज भी जिंदा हैं और शायद यही इस कहानी का सबसे कड़वा सच है।

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