जब उद्धव जड़ों से कट गए तो बर्बादी का जश्न मनाने के सिवा कुछ नहीं बचा; BMC चुनाव ने ठाकरे भाइयों का दंभ तोड़ दिया

सुभाष चन्द्र

ये तो सत्य है कि भाजपा/ शिवसेना(शिंदे) की ठाकरे बंधुओं पर महाराष्ट्र निगमों और खासकर BMC में अभूतपूर्व जीत हुई है लेकिन एक सत्य और भी मानना पड़ेगा कि दोनों को हराने वाली केवल भाजपा/शिंदे सेना नहीं है बल्कि उन्होंने खुद अपने आप को हराया है क्योंकि हार के लिए वे ही जिम्मेदार है। 

पहले उद्धव 2014 में भाजपा के साथ सरकार में रोज खटपट करते हुए दूर होते गए और फिर 2019 में कांग्रेस और एनसीपी से मिलकर मुख्यमंत्री बन गए। भाजपा से अलग होना एक बात थी लेकिन बाला साहेब के कांग्रेस से कभी न मिलने के सिद्धांतों से दूर होकर कांग्रेस की गोद में बैठ कर “सेकुलर” भूत का आवरण पहनना, अपने हिंदुत्व की जड़ों से दूर होना था

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हिंदुत्व से भी दूर हो सकते थे लेकिन उद्धव ने मुस्लिम वोटों के लिए हिंदुओं को अपना शत्रु बना लिया जो अयोध्या के विवादित ढांचे को गिराना भी शिवसेना की गलती मान ली जिसके लिए बाला साहेब गर्व करते थे। यह तो बिल्कुल अपने पिता की नीतियों को ठोकर मार कर अपने पूर्वजों से मुंह मोड़ लेने वाली बात थी

सच यह है कि जैसे बाला साहब ठाकरे से मिलने अटल जी और आडवाणी जी मातोश्री जाते थे, उद्धव भी चाहते थे कि मोदी और अमित शाह उससे मिलने वहां आया करें जो उन दोनों को मंजूर नहीं था

मुख्यमंत्री बनकर क्या नहीं किया हिंदुओं और उत्तर भारतीयों के विरुद्ध। पालघर में साधुओं की निर्मम हत्या में सत्य तक पहुंच कर अपराधियों को दंड देने की बजाय उनके पक्ष में ही हो गए। सुशांत सिंह और दिशा सालियान की हत्या पर सरकार की कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई और अर्नब को प्रताड़ित करने के लिए सचिन वाजे से गिरफ्तार कराया और जिस BMC से आज विदाई हुई है, उसी से कंगना रनौत का घर तुड़वाया और उसे संजय राउत ने “हरामखोर” कहा। 100 करोड़ की व्यापारियों से उगाही होने दी जो कम बड़ा पाप नहीं था

कोरोना काल में चुन चुन कर बिहार और यूपी के लोगों को मुंबई और महाराष्ट्र से खदेड़ा और अब राज ठाकरे के साथ आने पर हिंदी बोलने को खदेड़ने के लिए उनपर हमले करने शुरू कर दिए

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे थे लेकिन रिमोट शरद पवार के हाथ में था। पवार ने बाला साहेब का बदला उद्धव से निकाल कर उसे बर्बाद कर दिया और उद्धव को पता भी नहीं चला

आज वह शरद पवार जो ‘चाणक्य” कहलाते थे अपने गढ़ को भी नहीं बचा सके। कभी मुक्यमंत्री बनने के लिए शरद पवार और कांग्रेस का दामन पकड़ा तो आज दोनों को छोड़ कर राज ठाकरे को गले लगा लिया और मुसलमानों के लिए हिंदुओं को दुश्मन बना लिया। 

राज ठाकरे चेन्नई के पूर्व IPS अफसर अन्नामलाई के लिए घिनौने शब्द बोलते है। ”तमिलनाडु से एक रसमलाई आई है। इसका मुंबई से क्या रिश्ता है? ‘हटाओ लुंगी बजाओ पुंगी” - इस भाषा से क्या समझा लोग खुश होंगे? सबसे बड़ा दोष तो उद्धव का संजय राउत पर लगाम न लगाना है। आज भी वो एकनाथ शिंदे को “जयचंद” कह रहा है और कभी उसके साथ गए 40 विधायकों के लिए कहा था कि गुवाहाटी से 40 लाशें मुंबई आएंगी। आज वो और उद्धव का पुत्र आदित्य ठाकरे राहुल गांधी को भी प्रधानमंत्री बनाना चाहते है जबकि बाला साहेब कहते थे कि कांग्रेस से मिलने से बेहतर होगा वो शिवसेना की दुकान बंद कर दें

मजे की बात है जिन मुस्लिम वोटो के लिए हिंदुत्व की जड़ों से दूर हुए, उन्होंने भी उद्धव का कोई साथ नहीं दिया। इसकी विवेचना आगे करूंगा

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