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क्या कांग्रेस में बगावत का शंखनाद? अब बहाने देना बंद करे कांग्रेस और पहले अपने भीतर झाँके: बिहार में पार्टी के प्रदर्शन को देख कांग्रेसी ही हुए शर्मसार, थरूर से लेकर मणिशंकर अय्यर के बयान के समझें क्या है मायने

बिहार में मिली हार ने कांग्रेस के अंदरूनी संकट को किया बेनकाब (साभार: इंडिया टूडे, एबीपी न्यूज, न्यूज 18, टाइम्स ऑफ इंडिया)
देर आए दुरुस्त आए यानि जो काम कांग्रेस को बहुत पहले करना था बिहार में अच्छी धुलाई होने के बाद कमियों को तलाशने पर आवाज़ उठी है। जिस तरह से आवाज़ उठी है उम्मीद की जा रही है कि चुनाव प्रचार में परिवार को दूर रखने के साथ-साथ संसद में 
बेफिजूल में हंगामा कर या करवाकर संसद को बाधित नहीं करने पर भी चर्चा हो सकती है। क्योकि संसद बाधित होने का भी जनता में कोई अच्छा सन्देश पार्टी नहीं दे रही, बल्कि नकारात्मक छवि उभर कर आयी है।  

अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा निमंत्रण को अस्वीकार करने से हिन्दुओं में तो खिलाफ की आवाज़ उठी ही, जिन मुसलमानों की वोटों के लिए हिन्दुओं को नाराज करने का मुसलमानों में भी उल्टा ही सन्देश गया कि जो हिन्दू अपने धर्म का नहीं हुआ इस्लाम का क्या होगा? गोधरा दंगे की सच्चाई छुपाकर नरेंद्र मोदी को दोषी बताकर "मौत का सौदागर" से लेकर "वोट चोर" आदि जितनी भी गालियां दी गयीं पब्लिक में गलत ही सन्देश गया। राहुल द्वारा चिंगारी छोड़कर विदेश भाग जाना भी पार्टी के लिए नुकसानदेह हो रहा है। विदेशों में ऐसे घूम रहे हैं जैसे विदेश मंत्री हो। इतना ही नहीं भारत विरोधियों के इशारे पर पाकिस्तान की बोली बोल वहां की मीडिया में छाना भी पार्टी को गर्त में पहुंचा रहा है। कांग्रेस को अपनी खोई जमीन हासिल करने के लिए संकट के समय देश के साथ खड़े होने की जरुरत है ना कि पाकिस्तान पर होने वाली कार्यवाही का सबूत मांगना।   
   
 

बिहार में अपनी खोई सियासी जमीन तलाशने में जुटी कांग्रेस को इस बार के विधानसभा चुनाव में और भी बड़ा झटका लगा है। बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी को बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी लेकिन नतीजों ने बता दिया कि बिहार में कांग्रेस कितने पानी में है। पार्टी दहाई का आँकड़ा भी नहीं छू पाई और 6 सीटों पर ही सिमट गई।

इस नतीजे के बाद जहाँ एक ओर कांग्रेस पार्टी के कई नेता चुनाव आयोग पर दोष मढ़ने पर तुले हैं तो वहीं कई नेताओं ने पार्टी के को लेकर रणनीतिक चूकों की ओर इशारा किया है। नेताओं ने संगठन की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं।

चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस के कई नेताओं ने कहा कि स्थिति बेहद गंभीर है और पार्टी को कथित आत्मनिरीक्षण से आगे बढ़कर कुछ कड़े कदम उठाने होंगे। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि सिर्फ आत्मनिरीक्षण नहीं, अब सच स्वीकार करने और वास्तविकता का सामना करने का समय आ गया है।

वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने तो स्पष्ट शब्दों में कहा कि पार्टी ने उन्हें लंबे समय से दरकिनार कर दिया है। दूसरी ओर, कई पूर्व नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी संगठन की कमजोरियों को उजागर किया है। उनका कहना है कि पार्टी की हार के पीछे बूथ-स्तर पर पार्टी की ढीली पकड़, गलत टिकट वितरण, स्थानीय नेतृत्व की कमी और शीर्ष नेतृत्व से दूरी जैसे गंभीर कारण जिम्मेदार हैं।

कांग्रेस के बड़े नेताओं जैसे शशि थरूर, मणिशंकर अय्यर, कृपानाथ पाठक, मुमताज पटेल और कई नेताओं के हालिया बयानों से साफ समझा जा सकता है कि वे अपनी ही पार्टी की नीतियों से खुद खुश नहीं है।

बिहार के जिम्मेदार लोगों ने सही जानकारी नहीं दी: कांग्रेस नेता कृपानाथ पाठक

कांग्रेस नेता कृपानाथ पाठक ने मीडिया से बातचीत में कहा, “हमारा मानना ​​है कि राज्य में जिम्मेदार लोगों ने सही जानकारी नहीं दी। उन्होंने सही लोगों के बारे में सही जानकारी नहीं जुटाई। चाहे यह गलती से हुआ हो या चूक से, इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई? लोग हमसे लगातार शिकायत कर रहे हैं लेकिन हमें लगता है कि जो बातें उच्च अधिकारियों तक पहुँचनी चाहिए थीं, वे ठीक से नहीं पहुँचीं। अब उन्हें इस पर ध्यान देना होगा, वरना यह एक गंभीर संकट का कारण बन सकता है।”

विश्लेषण करना चाहिए कि कहाँ गलतियाँ हुईं: कांग्रेस सांसद शशि थरूर

वहीं कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने बिहार चुनाव के परिणाम जानने के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा, “यह बिल्कुल साफ है कि एनडीए की बढ़त जबरदस्त है। यह स्पष्ट रूप से बेहद निराशाजनक है और अगर यही अंतिम परिणाम निकलता है, तो मुझे लगता है कि बहुत गंभीर आत्मनिरीक्षण की जरूरत होगी और मेरा मतलब सिर्फ आत्मनिरीक्षण, बैठकर सोचना नहीं है बल्कि यह भी अध्ययन करना है कि क्या गलतियाँ हुईं, क्या रणनीतिक, संदेशात्मक या संगठनात्मक गलतियाँ रहीं।”

थरूर ने आगे कहा, “मैं बिहार में प्रचार करने वाला व्यक्ति नहीं हूँ। मुझे बिहार में प्रचार के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था, इसलिए मैं आपको कोई प्रत्यक्ष जानकारी नहीं दे सकता। लेकिन मैं लोगों से बात कर रहा हूँ…हमारी पार्टी के नेताओं को इस बात का गंभीर विश्लेषण करना चाहिए कि कहाँ गलतियाँ हुईं।”

मणिशंकर अय्यर: मेरी ही पार्टी ने मुझको निकाल दिया है

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने तो सीधे कहा, “एक जमाने में मैं बहुत सीनियर था लेकिन हाल में मुझको एकतरफा किया गया है। मैंने शुरू में ही मैंने स्पष्टीकरण दिया था कि मैं कांग्रेस के जानिब से यहाँ नहीं आया हूँ, व्यक्तिगत रुप से यहाँ पहुँचा हूँ।” उन्होंने आगे कहा, “मैं बहुत छोटा आदमी हूँ, मेरी ही पार्टी ने मुझको निकाल दिया है। मोदी जी मेरे बारे में गलत-गलत बातों करते हैं और मेरी ही पार्टी उसे स्वीकार करती है।

यह हमारे संगठन की कमजोरी को दर्शाता है: कांग्रेस नेता और पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार

कांग्रेस नेता और पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार ने स्पष्ट रुप से पार्टी की गलती निकाली और कहा, “यह हमारे संगठन की कमजोरी को दर्शाता है। किसी भी चुनाव में, एक राजनीतिक दल अपनी संगठनात्मक शक्ति पर निर्भर करता है। अगर संगठन कमजोर है और प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकता, तो कुल मिलाकर परिणाम प्रभावित होते हैं।”
उन्होंने कहा, “हमारे सभी उम्मीदवार बहुत सक्षम हैं लेकिन और भी बेहतर उम्मीदवार चुने जा सकते थे। संगठन को रणनीतिक और समझदारी से काम करना चाहिए था और सभी निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखनी चाहिए थी।”
कांग्रेस नेता निखिल कुमार ने कहा, “हमारे उम्मीदवारों के चयन में कुछ मतभेद थे और शायद हमने सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवारों का चयन नहीं किया लेकिन हाँ, यह एक संभावना है। संभावना यह थी कि चुने गए कुछ उम्मीदवार सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले नहीं रहे होंगे। और शायद इसी वजह से यह परिणाम हुआ।”

आत्ममंथन करेंगे कि कॉन्ग्रेस कहाँ पिछड़ी: कांग्रेस सांसद अखिलेश प्रसाद

चुनाव नतीजों पर कांग्रेस सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा, “हम आत्ममंथन करेंगे कि कांग्रेस कहाँ पिछड़ गई। हालाँकि, मैं नीतीश कुमार और NDA को बधाई देता हूँ। दोस्ताना मुकाबला नहीं होना चाहिए था- राजद के संजय यादव और हमारी पार्टी के कृष्णा अलावरु बेहतर बताएँगे कि चुनावों में हमारा प्रदर्शन इतना खराब क्यों रहा।”

कब तक सफलता का इंतजार करेंगे?: मुमताज पटेल

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे अहमद पटेल की बेटी मुमताज पटेल ने भयंकर नाराजगी जताते हुए कहा, “कोई बहाना नहीं, कोई दोषारोपण नहीं, कोई आत्मनिरीक्षण नहीं, अब समय है अपने भीतर झाँककर सच्चाई को स्वीकार करने का।”
उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, “अनगिनत वफादार जमीनी कार्यकर्ता, जो हर मुश्किल हालात में पार्टी के साथ रहे हैं…कब तक सफलता का इंतजार करेंगे…बल्कि सत्ता कुछ ऐसे लोगों के हाथों में केंद्रित होने के कारण, जो जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटे हुए हैं और बार-बार इस महान पुरानी पार्टी की दुर्गति और पराजय के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें लगातार असफलता ही हाथ लगेगी। और मेरी बात याद रखना, इन्हीं लोगों को बार-बार पुरस्कृत किया जाएगा क्योंकि उन्होंने अपने नियंत्रण और शक्ति से खुद को अपरिहार्य बना लिया है।”

कॉन्ग्रेस नेता शकील अहमद: मैं कांग्रेस में नहीं, मुझे बोलने का कोई अधिकार नहीं

बिहार के पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता शकील अहमद ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “मैं कांग्रेस में नहीं हूँ। मुझे बोलने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन टिकट वितरण के तुरंत बाद कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि फलां व्यक्ति ने गलत कारणों से टिकट बाँटे हैं, वित्तीय अनियमितताओं और अन्य मुद्दों का आरोप लगाया है… हमें उम्मीद है कि जाँच होगी  और अगर आरोप सही हैं और टिकट किसी और कारण से दिए गए हैं, तो जाहिर है उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।”

करारी हार ने कांग्रेस के भीतर गहरे संकट और आत्ममंथन की माँगों को किया तेज

कांग्रेस के नेताओं के प्रतिक्रियाओं को देखकर साफ लगता है कि पार्टी के भीतर गहरी बेचैनी, असंतोष और आत्मविश्वास की कमी है। बयान भले अलग-अलग नेताओं के हों लेकिन इन सबके पीछे एक ही भावना दिखाई देती है कि हार का असली कारण संगठन के भीतर की कमजोरी, गलत आकलन, गलत उम्मीदवार चयन और शीर्ष नेतृत्व का जमीनी सच्चाइयों से दूर रहना।
नेताओं के मन में यह भी चल रहा है कि इतने वर्षों से लगातार मिल रही नाकामियों पर भी पार्टी की ऊपरी परत में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता। जो लोग हार के लिए जिम्मेदार हैं, वही आगे भी फैसले ले रहे हैं और जमीनी स्तर पर मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं की आवाज लगातार अनसुनी हो रही है।
कई नेताओं के वक्तव्यों से यह भी साफ है कि पार्टी की आंतरिक लोकतांत्रिक संरचना कमजोर पड़ चुकी है। नेताओं को लगता है कि शीर्ष नेतृत्व अपने चार-पाँच सलाहकारों पर ही निर्भर रहता है और ये लोग जमीनी जानकारी तक नहीं पहुँचते या जानबूझकर असल हालत को दबा देते हैं।
हालात इतने खराब हैं कि कुछ वरिष्ठ नेता खुद स्वीकार कर रहे हैं कि उन्हें पार्टी से दूर कर दिया गया है, उनकी सलाह या अनुभव की कोई अहमियत नहीं बची है। इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी में संवादहीनता और अविश्वास का माहौल बढ़ रहा है।
गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राज्य की सत्ता में एक बार फिर NDA की जोरदार वापसी हुई है। गठबंधन ने 200 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज कर प्रचंड बहुमत हासिल किया है।
इन चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जिसे 89 सीटों का जनादेश मिला। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) 85 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। खास बात यह है कि 243 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी और JDU दोनों ने 101–101 सीटों पर मुकाबला किया था।
विपक्ष में आरजेडी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी है और उसे 26 सीटों पर सफलता मिली। वहीं चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) ने 28 सीटों पर किस्मत आजमाई और 19 सीटों पर जीत हासिल की।
वहीं चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। 60 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी केवल 6 सीटें ही जीत पाई और दहाई का आँकड़ा भी पार नहीं कर सकी। इसे लेकर अब कांग्रेस पार्टी के नेताओं में भी अपनी ही पार्टी के प्रदर्शन को लेकर गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है।
बिहार की करारी हार ने कांग्रेस के भीतर गहरे संकट और आत्ममंथन की माँगों को और तेज कर दिया है और संकेत साफ हैं कि पार्टी में निकट भविष्य में बड़ा आंतरिक मंथन देखने को मिल सकता है।

देश के साथ खड़े हुए शशि थरूर तो केरल कांग्रेस ने बंद किया दरवाजा, क्यों? : क्या आज़ादी की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाली कांग्रेस देश विरोधी हो गयी है? क्या कांग्रेस की दुकान पाकिस्तान और आतंकियों को समर्थन देने से चलती है?

                                         के मुरलीधरन, शशि थरूर (फोटो साभार: HT)
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के. मुरलीधरन ने रविवार को तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर को लेकर बड़ा बयान दिया, जिसने पार्टी के भीतर हलचल मचा दी। मुरलीधरन ने साफ कहा कि जब तक थरूर राष्ट्रीय सुरक्षा पर अपना रुख नहीं बदलते, उन्हें तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस के किसी भी कार्यक्रम में नहीं बुलाया जाएगा।

अब सवाल यह होता है कि कांग्रेस राष्ट्रीय सुरक्षा की बजाए देश विरोधी ताकतों के साथ है? अगर नहीं तो आखिर किस वजह से शशि थरूर के लिए केरल कांग्रेस ने शशि थरूर के खिलाफ ऐसा कदम क्यों उठाया? क्या कांग्रेस की दुकान पाकिस्तान और आतंकियों को समर्थन देने से चलती है? शायद यही वजह है कि कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए के कार्यकाल में आतंकी अपना खून खेल खेल रहे थे? क्या बेगुनाहों का खून यूपीए के इशारे पर हो रहा था?        

के मुरलीधरन ने शशि थरूर को चेतावनी देते हुए कहा कि कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के सदस्य होने के बावजूद अब उन्हें ‘हम में से एक’ नहीं माना जाता। मुरलीधरन ने यह भी कहा कि थरूर के खिलाफ आगे की कार्रवाई का फैसला पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व करेगा।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब थरूर ने कोच्चि में एक कार्यक्रम में कहा कि देश और उसकी सीमाओं की सुरक्षा पहले आती है और पार्टियाँ सिर्फ देश को बेहतर बनाने का माध्यम हैं। उन्होंने हाल के घटनाक्रमों में सशस्त्र बलों और केंद्र सरकार के रुख का समर्थन किया था, जिसकी वजह से उनकी अपनी पार्टी में आलोचना हो रही है।

शशि थरूर ने कहा, “मैं अपने रुख पर कायम हूँ, क्योंकि यह देशहित में है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए दूसरी पार्टियों से सहयोग की बात करने पर उनकी अपनी पार्टी को यह विश्वासघात लगता है, जो एक बड़ी समस्या है।

मुरलीधरन ने पहले भी थरूर की आलोचना की थी। हाल ही में एक सर्वेक्षण में थरूर को यूडीएफ की ओर से केरल के मुख्यमंत्री पद का पसंदीदा चेहरा बताया गया था, जिस पर मुरलीधरन ने तंज कसते हुए कहा था कि थरूर को पहले अपनी पार्टी की पहचान तय करनी चाहिए। इसके अलावा थरूर के एक लेख में इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गाँधी की भूमिका पर टिप्पणी को लेकर भी मुरलीधरन ने उनसे स्पष्ट राजनीतिक रास्ता चुनने को कहा था।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद थरूर के बयानों ने पार्टी को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर किया, जिससे उनके और कॉन्ग्रेस नेतृत्व के बीच तनाव बढ़ गया। यह घटनाक्रम कांग्रेस के भीतर विचारधारा और नेतृत्व को लेकर गहरी खींचतान को दर्शाता है। पार्टी के कई नेता मानते हैं कि थरूर का रुख पार्टी लाइन से हटकर है, जिससे आंतरिक एकता पर सवाल उठ रहे हैं।

कांग्रेस को रिमोट से चलने वाले खड़के नहीं, अपनी बुद्धि से चलने वाले शशि थरूर जैसे अध्यक्ष की जरुरत है; राहुल गांधी के चाचा संजय गाँधी पर शशि थरूर का सीधा निशाना, इमरजेंसी के ‘सच का सामना’ कराने पर क्या राहुल एक्शन लेंगे?

काफी समय से कांग्रेस में परिवार से बाहर अध्यक्ष की मांग उठती रही है, गाँधी परिवार के रिमोट से चलने वाले अध्यक्ष की जरुरत नहीं। राजेश पायलट, माधवराव सिंधिया आदि प्रतिभा धनी नेताओं को पार्टी अध्यक्ष बनाने वालों की अगर कमी नहीं तो परिवारभक्तों की भी कमी नहीं। सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के चक्कर तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी को उठाकर बाहर फेंकना जो भारी पड़ा है उस चोट से कांग्रेस आज तक उभर नहीं पायी। 

कांग्रेस की हो रही दुर्गति के लिए परिवारभक्त गुलाम जिम्मेदार हैं। और इसकी सबसे बड़ी मिसाल अभी कुछ दिन पहले कर्नाटक में देखने को मिला। जब वहां चल रहे मुख्यमंत्री पर चल रहे विवाद पर अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़के का यह कहना कि फैसला हाई कमांड करेगा। अब इस गुलाम खड़के से पूछो कि पार्टी अध्यक्ष से बड़ा हाई कमांड कौन होता है? अगर हर फैसला हाई कमांड यानि गाँधी परिवार को ही करना है तो फिर क्यों अध्यक्ष बने घूमकर सबको पागल बना रहे हो। इसे कहते हैं गुलामी मानसिकता।  
तिरुवनंतरपुरम से सांसद और वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर अब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी हाईकमान को खुलकर ‘सच का सामना’ कराने में लगे हैं। थरूर ने पहले पीएम मोदी और उनकी सरकार के कामों की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। फिर ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का गुणगान वैश्विक स्तर पर किया। और अब थरूर ने इंदिरा गांधी द्वारा लगाए आपातकाल की खुलकर निंदा की है और इसे भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताया है। इतना ही नहीं थरूर ने राहुल गांधी के चाचा संजय सिंह पर भी निशाना साधा है। मलयालम भाषा के अखबार ‘दीपिका’ में प्रकाशित अपने एक लेख में शशि थरूर ने कहा कि अनुशासन और व्यवस्था के लिए उठाए गए कदम जब आपातकाल जैसी क्रूरता में बदल जाते हैं, उन्हें किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने अपने लेख में इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी द्वारा चलाए गए जबरन नसबंदी अभियान को ‘क्रूरता का सर्वोच्च उदाहरण’ बताया। उन्होंने लिखा, “गरीब ग्रामीण इलाकों में लक्ष्य पूरा करने के लिए हिंसा और दबाव का सहारा लिया गया, जो क्रूरता की पराकाष्ठा थी।

पहले भी द हिंदू के लेख और एक्स पर पोस्ट कर दिखाया आईना
सांसद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने पिछले दिनों से ‘सत्य का मार्ग’ पकड़ लिया है, जो झूठ के आडंबर पर बैठे कांग्रेस के आला नेताओं को सुहा नहीं रहा है। दरअसल, कांग्रेस में वैसे ही काबिल लोगों की बहुत कमी है। एक-दो बचे हैं, उनकी काबिलियत की कद्र कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को नहीं है। यही वजह है कि उनकी पटरी खरी-खरी और सही बात कहने वाले अपनी ही पार्टी के सांसद शशि थरूर के नहीं बैठ रही है। कांग्रेस सांसद ने पहले द हिंदू में लेख लिखकर कांग्रेस हाईकमान को आईना दिखाया था, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की समझ में नहीं आया। खरगे ने तब थरूर पर तंज करते हुए कहा, “मैं अंग्रेजी पढ़ नहीं सकता, लेकिन थरूर की लैंग्वेज बहुत अच्छी है। हमारे लिए देश पहले है, लेकिन कुछ लोगों के लिए मोदी फर्स्ट हैं।” इसके जवाब में शशि थरूर शानदार तरीके से गेंद कांग्रेस के पाले में ही डाल दी है। खरगे के राजनीतिक बयान पर शशि थरूर की साहित्यिक प्रतिक्रिया दी। दार्शनिक भाव के साथ एक्स पर यह टिप्पणी राजनीतिक रूप से भी एकदम दुरुस्त है। इसमें खरगे ही नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के लिए भी साफ-साफ, मगर सख्त संदेश दे दिया था।

अब राहुल गांधी के साथ उनकी दादी और चाचा संजय को बनाया निशाना
कांग्रेस सांसद ने एक बार फिर मलयालम भाषा के अखबार ‘दीपिका’ में लेख लिखा है। इस बार निशाना मल्लिकार्जुन नहीं, बल्कि राहुल गांधी के साथ उनकी दादी और चाचा बने हैं। उन्होंने साफ-साफ आपातकाल की निंदा करते हुए कहा है कि आज का भारत 1975 का भारत नहीं है। थरूर ने आपातकाल की निंदा की है और इसे भारत के इतिहास का एक काला अध्याय बताया है। शशि थरूर ने कहा कि कैसे आजादी खत्‍म की जाती है, ये 1975 में सभी ने देखा। लेकिन आज का भारत 1975 का भारत नहीं है। कांग्रेस नेता शशि थरूर का यह लेख उनकी पार्टी के नेताओं को फिर असहज कर सकता है। यह पहली बार नहीं है, इससे पहले भी शशि थरूर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों की तारीफ कर चुके हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद अन्‍य देशों में भारत का पक्ष रखने के लिए जो सांसदों की टीम बनाई गई थी, उसमें कांग्रेस सांसद शशि थरूर भी शामिल थे। शशि थरूर ने विदेशी धरती पर मोदी सरकार का जमकर समर्थन किया था।

आपातकाल को भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताया
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा है कि आपातकाल को भारत के इतिहास के एक काले अध्याय के रूप में ही याद नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसके सबक को पूरी तरह से समझा जाना चाहिए। मलयालम दैनिक दीपिका में आपातकाल पर प्रकाशित एक लेख में थरूर ने 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल के काले दौर को याद किया और कहा कि अनुशासन और व्यवस्था के लिए किए गए प्रयास अक्सर क्रूरता के ऐसे कृत्यों में बदल जाते थे, जिन्हें किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने चेतावनी दी कि सत्ता को केंद्रित करने, असहमति को दबाने और संविधान को दरकिनार करने का असंतोष आपातकाल के दौरान कई रूपों में फिर सामने आया था।

संजय गांधी का जबरन नसबंदी अभियान क्रूरता की पराकाष्ठा
तिरुवनंतपुरम के सांसद ने राहुल गांधी के चाचा संजय गांधी पर भी सीधा निशाना साधते हुए लिखा, “इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने जबरन नसबंदी अभियान चलाया, जो इसका एक कुख्यात उदाहरण बन गया। थरूर के अनुसार, यह अभियान मनमाना और क्रूर फैसला था, जिसने लोगों के जीवन पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाला। गरीब ग्रामीण इलाकों में, मनमाने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए हिंसा और ज़बरदस्ती का इस्तेमाल किया गया. नई दिल्ली जैसे शहरों में, झुग्गियों को बेरहमी से ध्वस्त और साफ़ किया गया। हज़ारों लोग बेघर हो गए। उनके कल्याण पर ध्यान नहीं दिया गया।” शशि थरूर ने कहा कि लोकतंत्र को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। यह एक अनमोल विरासत है, जिसे निरंतर पोषित और संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्‍होंने कहा, ‘इसे हर जगह के लोगों के लिए एक स्थायी प्रेरणा स्रोत के रूप में काम करने दें।”

आज का भारत आत्मविश्वासी, विकसित और अधिक मज़बूत
उन्‍होंने कहा कि आज का भारत 1975 का भारत नहीं है। आज हम अधिक आत्मविश्वासी, अधिक विकसित और कई मायनों में अधिक मज़बूत लोकतंत्र हैं। फिर भी आपातकाल के सबक चिंताजनक तरीकों से प्रासंगिक बने हुए हैं। थरूर ने चेतावनी दी कि सत्ता को केंद्रीकृत करने असहमति को दबाने और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने का लालच कई रूपों में सामने आया था। उन्होंने कहा, “अक्सर ऐसी प्रवृत्तियों को राष्ट्रीय हित या स्थिरता के नाम पर उचित ठहराया जाता है। इस लिहाज से आपातकाल एक कड़ी चेतावनी है। लोकतंत्र के रक्षकों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए।” थरूर ने कहा कि अक्सर ऐसे कार्यों को देशहित या स्थिरता के नाम पर उचित ठहराया जाता है। इस अर्थ में, इमरजेंसी एक चेतावनी के रूप में खड़ी है। उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि लोकतंत्र के संरक्षकों को हमेशा सतर्क रहना होगा।

जिसको जो लिखना है लिखे, हम उसमें दिमाग नहीं लगाना चाहते-खरगे
अब कांग्रेस सासद शशि थरूर का क्या होगा? यह सवाल कांग्रेस में कई लोग पूछ रहे हैं। अभी तक कांग्रेस के कुछ प्रवक्ता थरूर पर सवाल उठा रहे थे। कोई उन्हें बीजेपी का प्रवक्ता तो कोई विदेश मंत्री बनाने की बात कह रहा था। तो कोई उन्हें अपने तथ्य ठीक करने की सलाह दे रहा था। मगर, बात अब कांग्रेस अध्यक्ष तक आ चुकी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जब थरूर के बारे में बार-बार सवाल पूछा गया तो उन्हें थरूर पर अपनी चुप्पी तोड़नी पड़ी। जब खरगे से पूछा गया कि थरूर सरकार की तारीफ कर रहे हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष का जवाब था, “हमने तो पहले ही कहा कि देश का मामला है, हम सेना और सरकार के साथ हैं।” जब खरगे से पूछा गया कि थरूर सरकार की तारीफ में लिख रहे हैं तो जबाब मिला कि जिसको जो लिखना आता है, वो लिखेगा। हम उसमें अपना दिमाग नहीं लगाना चाहते… हम क्यों डरेंगे, वो क्या कह रहे हैं..वो अपनी इच्छा के अनुसार बोल रहे हैं। मेरे लिए देश का हित सबसे ऊपर है और हम उसी के अनुसार काम कर रहे हैं।

पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और थरूर के तनावपूर्ण रिश्ते 
कांग्रेस के साथ मल्लिकार्जुन खरगे तनावपूर्ण रिश्ता वैसे ही बना हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ ताजा तकरार भी वैसा ही नमूना है। नीलांबुर उपचुनाव को लेकर शशि थरूर और कांग्रेस की नोक-झोंक देखी जा चुकी है, केरल विधानसभा चुनाव तक तस्वीर और भी साफ हो जाएगी। मल्लिकार्जुन ने एक सवाल के जवाब में बोल दिया कि कुछ लोगों के लिए प्रधानमंत्री मोदी पहले हैं, और देश बाद में आता है। जैसे मल्लिकार्जुन ने अपनी टिप्पणी में थरूर का नाम नहीं लिया। वैसे ही शशि थरूर ने भी एक्स पर की अपनी प्रतिक्रिया में किसी का नाम नहीं लिया। लेकिन खरगे, कांग्रेस और राहुल गांधी को तगड़ा जवाब जरूर दे दिया।

An excellent and remarkably candid discussion with Konstantin Iosifovich Kosachev, Deputy Chairman of the Federation Council (the Upper House). Ranged from #OperationSindoor to regional geopolitics and relations between our Parliaments. A first-rate exchange of views pic.twitter.com/MVESSWERPB

ऑपरेशन सिंदूर पर थरूर की नाराजगी के बाद कोलंबिया ने बदले सुर
ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंक के चेहरे को बेनकाब करने के लिए शशि थरूर के नेतृत्व में जो डेलिगेशन कोलंबिया सहित की देशों में गया था। उसके काफी सकारात्मक परिणाम देखने को मिले। भारत की ओर से पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर के जरिए किए गए हमलों के बाद से कोलंबिया ने पाकिस्तान के प्रति संवेदना जताई थी, लेकिन जब शशि थरूर डेलिगेशन ने इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी जताई तो कोलंबिया को सुर बदलने पड़े। कोलंबिया की ओर से आधिकारिक तौर पर अपना बयान वापस ले लिया है। पहले इस मामले पर बात करते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा था कि हम कोलंबिया सरकार की प्रतिक्रिया से निराश हैं। वहीं, डेलीगेशन से मुलाकात के बाद कोलंबिया की उप विदेश मंत्री योलांडा विलाविसेनियो ने कहा कि हमें सही स्पष्टीकरण मिला है। कश्मीर में जो कुछ हुआ उसके बारे में अब हमारे पास जो जानकारी है, उसके बेस पर हम बातचीत जारी रखेंगे। साथ ही हम अपना पिछला बयान वापस लेते हैं। इस दौरान शशि थरूर ने आगे कहा कि हमें अभी भी महात्मा गांधी की जमीन पर गर्व है। कोलंबिया के बयान वापस लेने के बाद ये संदेश गया है कि ये भारत की यह बड़ी कूटनीतिक जीत है। विदेशी दोरों से वापस आए डेलीगेशन्स ने पीएम मोदी से भी मुलाकात की थी।

आतंकवाद पर रूसी सम्मेलन में पाकिस्तान को बुलाने पर कड़ी आपत्ति
कांग्रेस सांसद थरुरू विदेश दौरे के लिए बने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल वाली मुहिम को अब भी रशिया में भी जारी रखे हुए हैं। मास्को में शशि थरूर की रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात हुई है। विदेश मामलों पर संसद की स्थायी समिति के प्रमुख शशि थरूर ने रूसी संघ परिषद की अंतरराष्ट्रीय मामलों की समिति के फर्स्ट चेयर आंद्रेई डेनिसोव से भी मुलाकात की है, जो संयुक्त राष्ट्र में रूस के राजदूत रह चुके हैं। बताने वाली बात ये है कि थरूर वहां पाकिस्तान का ही पर्दाफाश कर रहे हैं। लेकिन, हिंदी या अंग्रेजी में नहीं बल्कि फ्रेंच भाषा में। थरूर ने रूसी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष लियोनिद स्लटस्की के साथ मॉस्को में हुई एक मीटिंग में पाकिस्तान को लेकर कही। रूस में अगले साल आतंकवाद पर एक सम्मेलन करने वाला है। जिसमें भारत और पाकिस्तान सहित कई देशों को बुलाया गया है। शशि थरूर ने ऐसे सम्मेलन में पाकिस्तान को शामिल किये जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है। दरअसल, थरूर भले ही निजी दौरे पर रूस गये हैं, लेकिन विदेश दौरे के लिए बने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल वाली मुहिम वो अब भी जारी रखे हैं। पाकिस्तान को आतंकवाद पर सम्मेलन में शामिल किये जाने पर उनकी आपत्ति तो यही बताती है।

Operation Sindoor और Article 370 पर कांग्रेस के कद्दावर नेताओं के रुख से अलग-थलग पड़े राहुल गाँधी; क्या कांग्रेस टूटने के कगार पर जा रही है? तुम्हे मोदी से नफरत है या देश से?

जब कोई मंदबुद्धि दूसरों के हाथ कठपुतली बन नाचता है वह खुद भी डूबता और अपने साथियों को भी डुबो देता है। ठीक यही हालत कांग्रेस की है। जिसका राहुल गाँधी और परिवार Deep State का गुलाम बन पागलों की हरकत करे तो आखिर पार्टी में आत्मसम्मानित नेता कब तक बर्दाश्त करेंगे। कांग्रेस को नहीं मालूम कि लोग राहुल LoP का किन अपमानित शब्दों में चर्चा कर रहे हैं, जिनका उल्लेख करना मुश्किल है। बीजेपी ने तो Leader of Pakistani Propaganda बता दिया है। राहुल जो कुछ भी बकवास कर रहा है वह पाकिस्तान मीडिया की सुर्खियां ही नहीं डोसियर में उल्लेख किया जा रहा है, जो LoP राहुल और सारी कांग्रेस के लिए बहुत ही शर्म की बात है। तुम्हे मोदी से नफरत है या देश से? जबकि INDI गठबंधन के वरिष्ठ नेता शरद पवार चीख-चीखकर कह रहे हैं कि ये संसद का विशेष अधिवेशन बुलाने का नहीं और ना ही भारत को हुए हुए नुकसान के बारे में पूछने का समय। लेकिन Deep State के हाथों बिकाऊ विशेष अधिवेशन और नुकसान की जिद्द लगाए हुए हैं।         

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की अजब-गजब करतूतों के चलते पहले ही कांग्रेस के कई बड़े नेता पार्टी से किनारा कर चुके हैं। इसके चलते कांग्रेस देश के हर राज्य में लगातार कमजोर होती चली जा रही है। लेकिन इसके बावजूद राहुल गांधी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। एक ओर ऑपरेशन सिंदूर की ऐतिहासिक और शानदार सफलता की दुंदभि देशवासियों में ही नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भी जोर-शोर से बज रही है। दूसरी ओर राहुल गांधी अपने एक एजेंडा और झूठे नैरेटिव के साथ भारत को बदनाम करने के मिशन पर चल रहे हैं। हालात ये हैं कि राहुल गांधी अपनी इस सोच के चलते अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। पार्टी के कई कद्दावर नेताओं सांसद शशि थरूर, पूर्व मंत्री सलमान खुर्शीद और मनीष तिवारी ने खुलकर विरोध का झंडा उठा लिया है। ये नेता राहुल गांधी की मनगढ़ंत पार्टी लाइन से अलग हटकर ना सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं, बल्कि उन्होंने यह कहकर राहुल गांधी को बौना साबित कर दिया है कि देशहित सबसे बड़ा है।

ऑपरेशन सिंदूर पर राहुल गांधी की रणनीति पर उठ रहे सवाल
ऑपरेशन सिंदूर के बाद कांग्रेस नेता शशि थरूर, मनीष तिवारी और सलमान खुर्शीद ने कांग्रेस लाइन से अलग रुख अपनाया हुआ है। इसलिए राहुल गांधी की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं और पार्टी में असहमति बढ़ रही है। दरअसल, पहलगाम हमले के बाद दुनिया के सामने पाकिस्तान को बेनकाब करने के लिए भारत ने अलग-अलग देशों में अपने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजे हैं। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं। क्योंकि वे राहुल गांधी की खींची लकीर पर आंखें मूंदकर चलने के बजाए देशहित में कदम बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद भी डेलीगेशन में शामिल हैं। उन्होंने कश्मीर में अनुच्छेद 370 को रद्द करने का समर्थन किया है। उनके इस बयान से कांग्रेस मुश्किल में आ गई है। वरिष्ठ नेताओं ने खुर्शीद की टिप्पणी पर कोई जवाब नहीं दिया है। लेकिन जब से सरकार ने 51 सदस्यों वाले सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों को भेजा है, तब से पार्टी के भीतर बेचैनी बढ़ रही है।

पार्टी लाइन से अलग जाकर थरूर ने बढाया राहुल का ब्लड प्रेशर
सबसे पहले विवाद तो कांग्रेस सांसद शशि थरूर पर उठा। राहुल गांधी की असहमति के चलते इतने वरिष्ठ और बुद्धिजीवी सांसद का नाम कांग्रेस ने डेलीगेशन के लिए नहीं भेजा। लेकिन मोदी सरकार ने उनकी खासियतों को नवाजते हुए उन्हें एक डेलीगेशन का नेतृत्व ही सौंप दिया। इसके बाद शशि थरूर ने बयान दिया था कि भारत ने मोदी सरकार के दौरान पहली बार LoC पार करके सर्जिकल स्ट्राइक की गई थी। थरूर ने एकदम सच बात कही, जो उनकी पार्टी के नेताओं को कड़वी लग गई। खुर्शीद के हालिया बयान और थरूर की पहले की टिप्पणी ने कांग्रेस पार्टी के भीतर खलबली मचा दी है। बता दें कि कांग्रेस ने पहले अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध किया था। बाद में पार्टी ने अपना रुख बदला और अब इस मुद्दे पर चुप है। कांग्रेस में शशि थरूर की तरह पार्टी लाइन से अलग मत रखने वालों की फेहरिस्त बढ़ती जा रही है।

राहुल के नेतृत्व पर एक खेमे का अविश्वास खुलकर सामने आया
ऑपरेशन सिंदूर को लेकर कांग्रेस के स्टैंड से उसकी ही पार्टी के कई नेता इत्तेफाक नहीं रखते। कांग्रेस, सरकार पर हमलावर है। राहुल गांधी बार-बार सरकार से अनावश्यक सवाल पूछ रहे हैं कि हमारे कितने फाइटर जेट को नुकसान हुआ। दरअसल, वे पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं। उन्हें पूछना तो यह चाहिए कि हमारी वायुसेना ने पाकिस्तान को किस तरह तहस-नहस कर दिया? लेकिन राहुल गांधी द्वारा अनाप-शनाप तरीके से ऑपरेशन सिंदूर की आलोचना किसी के भी गले नहीं उतर रही है। जी हां, कांग्रेस के कई नेता ऑपरेशन सिंदूर से गदगद हैं। वे इसके लिए खुलकर मोदी सरकार की तारीफ कर रहे हैं। ऐसे में शशि थरूर के बाद अब मनीष तिवारी और सलमान खुर्शीद के स्टैंड राहुल गांधी को की टेंशन बढ़ाने वाले हैं। दरअसल, कांग्रेस पार्टी के भीतर एक बार फिर हलचल मची है। ऑपरेशन सिंदूर पर कांग्रेस दो खेमों में बंट चुकी है। एक खेमा सरकार से सवाल कर रहा है या चुप्पी साधे हुए है। दूसरी ओर कांग्रेस के कई नेता हैं जो सरकार के एक्शन से खुश नजर आ रहे हैं। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर पर जिस तरह से कांग्रेस नेता शशि थरूर, सलमान खुर्शीद और मनीष तिवारी ने पार्टी लाइन से अलग बयान दिए हैं, उससे साफ होता जा रहा है कि राहुल गांधी के नेतृत्व पर एक खेमे का अविश्वास या असहमति अब खुलकर सामने आ रही है।

मनीष तिवारी ने डेलिगेशन में शामिल होने के फैसले को जस्टिफाई किया
ऑपरेशन सिंदूर पर राहुल गांधी की रणनीति पूरी तरह से सवालों के घेरे में है। विपक्षी गठबंधन में जहां अन्य दल चुप्पी साधे हुए हैं, वहीं कांग्रेस ने हमलावर रुख अपनाया है। इसे लेकर कांग्रेस की आलोचना भी हो रही है। ऐसे में शशि थरूर, सलमान खुर्शीद और मनीष तिवारी जैसे सीनियर नेता पार्टी की पार्टी लाइन से अलग नजर आए। शशि थरूर विरोध के बाद भी ऑपरेशन सिंदूर डेलिगेशन का हिस्सा बने। उन्होंने इसे राष्ट्रीय हित का मसला बताया। ठीक उनकी राह पर मनीष तिवारी ने भी ऑल पार्टी डेलिगेशन में खुद को शामिल करने के फैसले को जस्टिफाई किया है। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी पाकिस्तान स्पॉन्सर्ड आतंकवाद के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर वाले डेलिगेशन शामिल होने के अपने फैसले को राष्ट्र की पुकार बताया। यहां बताना जरूरी है कि कांग्रेस नेतृत्व ने दोनों सांसदों को डेलिगेशन में शामिल होने से रोकने की कोशिश की थी। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चार वैकल्पिक नाम सुझाए थे, जिनमें शशि थरूर और मनीष तिवारी का नाम नहीं था। शशि थरूर और मनीष तिवारी की तरह सलमान खुर्शीद भी डिलेगेशन में शामिल हैं।

आर्टिकल 370 को खत्म करने के कदम कश्मीर में खुशहाली आई-खुर्शीद
सलमान खुर्शीद उन 7 सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों में से एक का हिस्सा हैं जो अभी अलग-अलग देशों का दौरा कर रहे हैं। डेलीगेशन में इंडोनेशिया गए सलमान खुर्शीद ने थिंक टैंक और शिक्षाविदों को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में आई समृद्धि को खत्म करना चाहता है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा, ‘कश्मीर में लंबे समय से एक बड़ी समस्या थी। इसका ज्यादातर असर संविधान के अनुच्छेद 370 में दिखता था। इससे ऐसा लगता था कि यह देश के बाकी हिस्सों से अलग है। आखिरकार मोदी सरकार ने इसे खत्म कर दिया गया, क्योंकि बहुत समय बीत चुका था।’ खुर्शीद ने आगे कहा, ‘इसके बाद, 65 प्रतिशत भागीदारी के साथ चुनाव हुआ। आज कश्मीर में एक निर्वाचित सरकार है।’ कांग्रेस ने अनुच्छेद 370 को खत्म करने का विरोध किया था। आतंकवाद पर पाकिस्तान को बेनकाब करने के लिए विदेश भेजे गए डेलिगेशन में सलमान खुर्शीद ने भी पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाया। अगस्त 2019 में मोदी सरकार की ओर से जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के आर्टिकल 370 को खत्म करने के ऐतिहासिक कदम की सराहना करते हुए खुर्शीद ने कहा कि इस कदम के बाद कश्मीर में खुशहाली आई है।

राहुल गांधी के रवैये और अस्पष्ट रणनीति से कांग्रेस नेता असहज
राहुल गांधी के रवैये, अस्पष्ट रणनीति और विवादास्पद बयानबाजी के चलते कांग्रेस में नेता ही असहज महसूस करने लगे हैं। जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस उमर अब्दुल्ला सरकार के साथ है। उमर अब्दुल्ला आर्टिकल 370 के खात्मे के खिलाफ हैं। राहुल गांधी को समझ में नहीं आ रहा है कि वे उमर अब्दुल्ला का समर्थन करें या राष्ट्रहित में आर्टिकल 370 का समर्थन करें? जैसा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद कर रहे हैं। इसी तरह राहुल गांधी ने पाकिस्तान के आतंकी चेहरे को बेनकाब करने वाले सर्वदलीय डेलीगेशन में अपनी पार्टी के नेता तो भेजे हैं। लेकिन जिस ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान को दुनियाभर के सामने बेनकाब कर दिया है, उसके बारे में वे खुद ऊल-जुलूल बयानबाजी करने में लगे हैं। इस तरह शशि थरूर, मनीष तिवारी और सलमान खुर्शीद के स्टैंड से कांग्रेस के कई नेता असहज हो रहे हैं। फिलहाल ऑपरेशन सिंदूर पर राहुल गांधी अपने बयानों और स्टैंड को लेकर आलोचना पर ट्रोल हो रहे हैं। वह शशि थरूर को पाक को बेनकाब करने वाले डेलिगेशन में नहीं जाने देना चाहते थे। इसे लेकर भी उनकी आलोचना हुई। भाजपा ने भी उन्हें घेरा। अब तो पार्टी के भीतर से भी आवाजें उठने लगी हैं। कांग्रेस में जिस तरह से खुलकर कई नेता बारी-बारी से ऑपरेशन सिंदूर और सरकार के कुछ फैसलों की तारीफ कर रहे हैं, इससे कांग्रेस और राहुल गांधी बैकफुट पर हैं।

मिली कूटनीतिक जीत, थरूर की नाराजगी के बाद कोलंबिया ने बदले सुर
ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंक के चेहरे को बेनकाब करने के लिए शशि थरूर के नेतृत्व में जो डेलिगेशन कोलंबिया गया। उसका सकारात्मक परिणाम देखने को मिला है। बता दें भारत की ओर से पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर के जरिए किए गए हमलों के बाद से कोलंबिया ने पाकिस्तान के प्रति संवेदना जताई थी, लेकिन जब डेलिगेशन ने इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी जताई तो इसके सुर बदले हुए नजर आए और आधिकारिक तौर पर अपना बयान वापस ले लिया है। इस मामले पर बात करते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा था कि हम कोलंबिया सरकार की प्रतिक्रिया से निराश हैं। वहीं, डेलीगेशन से मुलाकात के बाद कोलंबिया की उप विदेश मंत्री योलांडा विलाविसेनियो ने कहा कि हमें पूरा विश्वास है कि आज हमें जो स्पष्टीकरण मिला है। कश्मीर में जो कुछ हुआ उसके बारे में अब हमारे पास जो जानकारी है, उसके बेस पर हम बातचीत जारी रखेंगे। इस दौरान शशि थरूर ने आगे कहा कि हमें अभी भी महात्मा गांधी की जमीन पर गर्व है। कोलंबिया के बयान वापस लेने के बाद ये संदेश गया है कि ये भारत की यह बड़ी कूटनीतिक जीत है।

पाकिस्तान की जेल में रहकर आतंकी बन जाता है अब्बा… शशि थरूर के बाद अब ओवैसी वाले डेलिगेशन ने विदेश में आतंकी मुल्क का सच दुनिया को बताया, FATF से कहा- इन्हें ग्रे लिस्ट में डालो

पाकिस्तान के विरुद्ध आतंकवाद को लेकर चल रहे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस के शशि थरूर, आनंद शर्मा और मनीष तिवारी की है। ओवैसी का विरोधी होने के बावजूद इस प्रकरण में उनकी प्रशंसा करता हूँ। उनका कहना कि लड़ाई मोदी से हो या बीजेपी सरकार से ये तो चलती रहेगी, लेकिन जब बात देश की हो सबको एकजुट होना चाहिए। लेकिन राहुल और इसके पिछलग्गू विपक्ष को इन लोगों से सीखना चाहिए, परन्तु ये वही बोली बोल रहे है जो दुश्मन मुल्क पाकिस्तान चाहता है।   
हैदराबाद के सांसद और AIMIM प्रमुख AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अल्जीरिया में पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को बेनकाब किया। असदुद्दीन ओवैसी ने शनिवार (31 मई 2025) को आतंकवादी जकीउर रहमान लखवी का उदाहरण दिया, जो पाकिस्तान की जेल में रहते हुए बेटे का अब्बू बना।

ओवैसी के इस बयान को हलके में लेना महामूर्खता होगी। जेल में रहते आतंकवादी का अब्बा बनना बहुत कुछ जाहिर कर रहा है। ओवैसी के इस बयान से जाहिर है कि पाकिस्तान सरकार और फ़ौज के संरक्षण में पल रहे आतंकियों की औरतें तक सुरक्षित नहीं। जो चाहे किसी भी आतंकवादी के घर की किसी भी औरत का जब चाहे कुछ भी कर सकता है। 

ओवैसी ने कहा कि दुनिया का कोई देश आतंकवादियों को ऐसी छूट नहीं देता, लेकिन पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देता है। उन्होंने भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ की सफलता का जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तान को फिर से FATF की ग्रे लिस्ट में डालना जरूरी है, ताकि आतंकवादी घटनाएँ कम हों।

ओवैसी सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल के साथ अल्जीरिया में हैं, जो दुनिया भर में पाकिस्तान की आतंकवाद-समर्थक नीतियों को उजागर कर रहा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की रणनीति दक्षिण एशिया में अस्थिरता पैदा करती है। ओवैसी ने पाकिस्तान को ‘भिखमंगा देश’ करार देते हुए उसके आतंकवाद में संलिप्तता पर सवाल उठाए।

भारत की कूटनीति से कैसे बदला कोलंबिया ने अपना पलड़ा, पहले पाकिस्तान के प्रति संवेदना, अब भारत का समर्थन

                           शशि थरूर और रोजा योलांडा विलाविसेनियो (फोटो साभार - ऑपइंडिया इंग्लिश)
कोलंबिया ने शुक्रवार (30 मई 2025) को भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तानी जनहानि पर अपनी संवेदना वाले विवादास्पद बयान को वापस लिया। यह फैसला कांग्रेस सांसद शशि थरूर के वरिष्ठ कोलंबियाई अधिकारियों से आतंकवाद और आत्मरक्षा पर भारत की स्थिति स्पष्ट करने के बाद हुआ। इसके बाद कोलंबिया ने भारत के प्रति समर्थन का संदेश जारी किया।

कोलंबिया के पहले का बयान निराशाजनक

कांग्रेस सांसद शशि थरूर के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल बहु-राष्ट्रीय यात्रा के तहत पनामा और गुयाना होते हुए कोलंबिया पहुँचा। गौरतलब है कि कोलंबिया ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए 22 अप्रैल 2025 को आतंकियों द्वारा किए गए हिंदूओं के नरसंहार पर चुप्पी साधे रखी थी जबकि इसके जवाबी एक्शन में ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में हुए नुकसान पर संवेदना जताई थी। इसे लेकर थरूर ने बोगोटा पहुँचकर कोलंबिया की इस प्रतिक्रिया पर निराशा जताई।

भारत के मजबूत खंडन और तथ्यों से सामने आया अंतर

इस भारतीय प्रतिनिधिमंडल में भाजपा और कॉन्ग्रेस के सांसद शामिल थे। उन्होंने कोलंबियाई अधिकारियों को बताया कि ऑपरेशन सिंदूर पहलगाम में 26 हिंदुओं की हत्या वाले आतंकी हमले के जवाब में किया गया था। प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों की मौजूदगी वाली वे फोटोज भी दिखाई, जो मारे गए आतंकवादियों के अंतिम संस्कार में शामिल थे। सांसद शशि थरूर ने कहा, “हम आत्मरक्षा के अधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। आतंकवादियों और उनका विरोध करने वालों की तुलना नहीं की जा सकती।”

कोलंबिया की उप-विदेश मंत्री रोसा योलांडा विलाविसेनियो से बैठक के बाद सांसद शशि थरूर ने कहा कि कोलंबिया ने भारत पर दिया गया विवादास्पद बयान वापस ले लिया है। थरूर ने कहा, “यह अच्छी खबर है, उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया है और हमारे रुख के समर्थन में एक सकारात्मक बयान जारी किया है।” एएनआई से बात करते हुए कोलंबिया की मंत्री ने कहा कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल के विस्तृत स्पष्टीकरण के बाद कोलंबिया को अब साफ तौर पर स्थिति का अंदाजा हो रहा है। इस पर आगे भी संवाद जारी रहेगा।

कोलंबिया के रुख में आए बदलाव ने दोनों देशों की कूटनीति को प्रभावी ढंग से दिखाया रखा है। भाजपा नेता और पूर्व राजदूत तरनजीत सिंह संधू ने कहा कि कोलंबिया ने भारत-विरोधी बयान वापस लेकर आतंकवाद पर भारत के रुख को स्वीकार किया है। भाजपा सांसद शशांक मणि ने कोलंबिया को उसके आतंकवाद प्रभावित इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि वह भारत की स्थिति को बेहतर समझ सकता है। उन्होंने कहा, “हम शांति का संदेश लेकर आए हैं, लेकिन हर आतंकी हमले का ठोस जवाब देंगे।”

कोलंबिया, जो जल्द ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य बनेगा, अब पाकिस्तान की बजाय भारत के साथ खड़ा है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल अपना अगला दौरा ब्राजील और अमेरिका में करेगा। यह भारत की कूटनीतिक सफलता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ उसके कड़े रुख को स्पष्ट करता है।

‘एक ही धर्म (हिंदुओं को) के लोगों को चुन-चुन कर मारा’: मोदी सरकार के आल पार्टी मिशन पर गए शशि थरूर ने खोली पाकिस्तान की पोल

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                          अमेरिका में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल (फोटो साभार: X_IndiainNewYork)
हलगाम आतंकी हमले में हिंदुओं के नरसंहार को कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने दुनिया के सामने बयाँ किया। थरूर उस सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हैं, जिसे मोदी सरकार ने अलग-अलग देशों में भेजा है ताकि इस हमले और ऑपरेशन सिंदूर के रूप में भारत की प्रतिक्रिया के बारे में दुनिया को बताया जाए।

न्यूयॉर्क में भारतीय दूतावास में बोलते हुए थरूर ने आतंकियों के इरादों को पूरी दुनिया को बताया। शशि थरूर ने आतंकियों के इरादों को साफ करते हुए बताया कि आतंकियों ने पहले लोगों की धर्म की पहचान की और फिर सिर्फ उसी आधार पर उनकी हत्या की। जो हिंदू थे-वो मार दिए गए, जो मुस्लिम थे – उन्हें छोड़ दिया गया।

कश्मीर की तरक्की को रोकने की साजिश

शशि थरूर ने बताया कि इस हमले का समय और क्रूरता सोची-समझी थी, ताकि कश्मीर की बढ़ती साख को नुकसान पहुँचे। कश्मीर अब एक सुरक्षित और समृद्ध पर्यटन स्थल बन रहा है। उन्होंने कहा, “पिछले साल कश्मीर में अमेरिका के ऐस्पन, कोलोराडो से ज्यादा पर्यटक आए। यह सिर्फ सामान्य स्थिति नहीं, बल्कि समृद्धि का प्रतीक है।” अनुच्छेद 370 हटने के बाद मोदी सरकार के विकास कार्यों से कश्मीर में शांति और प्रगति दिख रही थी, जिसे आतंकी रोकना चाहते थे।
थरूर ने जोर देकर कहा कि यह हमला कोई सामान्य आतंकी घटना नहीं थी। यह सांप्रदायिक सौहार्द को तोड़ने की सुनियोजित कोशिश थी। उन्होंने कहा, “यह ऐसा नहीं था कि कोई बम धमाके में अंधाधुंध लोगों को मार रहा था। आतंकियों ने धर्म के आधार पर लोगों को चुना और उनकी हत्या की।”

सिर्फ हिंदुओं को निशाना बनाया गया

इस आतंकी हमले में मारे गए 26 लोगों में 25 भारतीय और एक नेपाली नागरिक थे। शशि थरूर ने बताया कि सभी मृतक हिंदू थे और उन्हें उनके धर्म के कारण मारा गया। उन्होंने एक घटना का जिक्र किया जिसमें एक हिंदू प्रोफेसर ने इस्लामी कलमा पढ़कर अपनी जान बचाई, क्योंकि आतंकियों ने उन्हें मुस्लिम समझ लिया।
थरूर ने कहा, “कुछ मामलों में पति को गोली मारी गई और पत्नी को कहा गया कि वह जाकर दुनिया को बताए कि उसे उसके धर्म के कारण मारा गया।” फिर भी उन्होंने भारत की जनता की तारीफ की कि इस उकसावे के बावजूद देश में कोई जवाबी हिंसा नहीं हुई। उन्होंने कहा, “मुझे गर्व है कि भारत में कोई जवाबी हिंसा नहीं हुई।” भारतीय समाज ने एकजुट होकर दुख और दृढ़ता दिखाई।

आतंकी संगठन ने ली जिम्मेदारी

आतंकी संगठन द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने हमले के एक घंटे के भीतर इसकी जिम्मेदारी ले ली। थरूर ने कहा, “भारत को इस बात पर कोई शक नहीं था कि यह हमला कहाँ से हुआ।” हालाँकि उन्होंने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया।
मोदी सरकार ने तुरंत एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल बनाकर दुनिया के सामने भारत का पक्ष रखने का फैसला किया। थरूर इस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हैं। हालांकि कुछ विपक्षी नेताओं को इस प्रतिनिधिमंडल और थरूर जैसे नेताओं के चयन पर आपत्ति थी, लेकिन सरकार ने सभी विचारधाराओं को शामिल करके भारत की बात को और विश्वसनीय बनाया। ऑपरेशन सिंदूर के विवरण को वैश्विक मंचों पर प्रभावी ढंग से रखा गया।

भारत ने UNSC में आतंकी पाकिस्तान को धो दिया ; US जाने से पहले थरूर बोले- अब नहीं बैठेंगे शांत, Pak को करेंगे बेनकाब

UNSC के स्थाई प्रतिनिधि हरीश पुरी और शशि थरूर के साथ पाँच देशों की यात्रा करने वाला प्रतिनिधि मंडल (फोटो साभार- thenewsen.co.in/shashitharoor x)
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम की बैसारन घाटी में 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमलों के बाद भारत पाकिस्तान को चौतरफा झटके दे रहा है। भारत ने अब इस आंतकी मुल्क के लिए किसी भी तरह से नरमी न लाने मन बना लिया है। इसी के चलते संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की बैठक में भारतीय राजदूत हरीश पुरी ने पाकिस्तान को खूब खरी-खोटी सुनाई।

इसी के साथ कांग्रेस नेता शशि थरूर को भी मोदी सरकार अमेरिका, पनामा, गुयाना, ब्राजील और कोलंबिया के दौरे पर भेज रही है ताकि भारत के पक्ष को वे अधिक मजबूती से रख सकें और आतंकवाद के खिलाफ भारत की स्थिति साफ कर सकें।

UNSC की बैठक में ‘सशस्त्र संघर्ष में नागरिकों की सुरक्षा’ विषय पर खुली बहस हुई। इसमें भारत ने पाकिस्तान को जमकर लताड़ लगाई। भारत के स्थाई प्रतिनिधि और राजदूत हरीश पुरी ने कहा कि नागरिकों की सुरक्षा पर चर्चा में पाकिस्तान का भाग लेना अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ही अपमान है। असल में भारत से पहले पाकिस्तान ने आतंकवाद पर अपना उपदेश दिया था।

पाकिस्तान के उपदेश पर उसकी पोल खोलते हुए हरीश ने कहा, “पाकिस्तान के प्रतिनिधि ने कई मुद्दों पर हम पर निराधार आरोप लगाए जिसका जवाब देने के लिए मुझे मजबूर होने पड़ा है। भारत ने दशकों से पाकिस्तान में पोषित आतंकवादी हमलों का सामना किया है, चाहे वो 26/11 के मुंबई हमले हों या फिर 2025 का पहलगाम हमला।'”

जिस देश की सेना और पुलिस आतंकियों के जनाजा-ए-नमाज में शामिल हो उस आतंकी मुल्क से शांति के लिए सोंचना भी मूर्खता होगी। यानि इस मुल्क की अवाम भी किसी आतंकी से कम नहीं। क्योकि पुलिस और आर्मी में भर्ती अवाम में से ही होती है। यह वह मुद्दा है जिस पर पाकिस्तान का समर्थन करने वाले देश को भी गंभीरता से विचार करना होगा। इतना सबकुछ होने के बाद भी अगर समर्थक देश इस सच्चाई को अनदेखा करते है तो उन्हें भी आतंकी देश मानना चाहिए। फिर चाहे जितना भी शक्तिशाली देश ही क्यों न हो।     

हरीश पुरी ने कहा कि पाकिस्तान अपना नागरिकों और आतंकवादियों के बीच कोई भेदभाव नहीं रखता। ऐसे में उसका नागरिकों की सुरक्षा वाली बहस में भाग लेने या बोलने का कोई औचित्य ही नहीं बनता। ये मुल्क नागरिकों की आड़ लेकर आतंकवाद को बढ़ावा देता है।

हरीश ने कहा कि इस महीने की शुरुआत में पाकिस्तान ने भारत के सीमा से लगे क्षेत्रों को अपना निशाना बनाया। मंदिर, कॉन्वेंट्स और गुरुद्वारों के साथ अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों तक को अपना निशाना बनाया। ऐसे में यहाँ पर ज्ञान की बात करके पाकिस्तान को अपना पाखंड बंद करना चाहिए।

इसके अलावा आतंकवाद पर भारत की स्थिति दुनिया के सामने मजबूती से रखने और पाकिस्तान की सच्चाई सबके सामने लाने के लिए भारत की ओर से सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विदेश दौरे पर जा रहा है। इसकी अध्यक्षता कांग्रेस सांसद शशि थरूर कर रहे हैं। पाँच देशों की यात्रा पर जाने से पहले थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो साझा किया है।

वीडियो में थरूर ने कहा, “मैं प्रतिनिधिमंडल की अध्यक्षता करते हुए पाँच देशों की यात्रा पर जा रहा हूँ। इनमें गुयाना, पनामा, कोलंबिया, ब्राजील और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं। हम वहाँ इसलिए जा रहे हैं ताकि देश की बात सबके सामने रख सकें। देश पर आए इस संकट पर बोल सकें, जिसमें हमारे देश पर आतंकवादियों ने क्रूरता के साथ हमला किया। अब हम आतंकवाद पर चुप नहीं रहेंगे। न ही हम चाहेंगे कि विश्व इस विषय पर हमें अनदेखा करे।”

अपनी बात बढ़ाते हुए थरूर ने कहा, “हमारा लक्ष्य उन मूल्यों को सामने लाना है जिसे भारत हमेशा से ही समर्थन करता आया है और जिन्हें आज के युग में सहेजे जाने की जरूरत है। ये एक मिशन है जो दुनिया को याद दिलाता रहेगा कि भारत शांति, लोकतंत्र, स्वतंत्रता जैसे मूल्यों के लिए खड़ा है, न कि नफरत, आतंक या लोगों की हत्या करने के लिए। जय हिंद।”

कांग्रेस पार्टी द्वारा नाम न दिए जाने के बाद भी सरकार ने उन पर भरोसा जताते हुए उनको इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया है। इस दौरे पर अमेरिका में 9/11 वाले हमले कराने वाले अलकायदा आतंकी संगठन के साथ पाकिस्तान के संबंधो पर भी बात की जा सकती है।

क्या गाँधी परिवार का ‘गरूर’ बचाने को शशि थरूर की कुर्बानी देगी कांग्रेस? थरूर कांग्रेस में अटल बिहारी वाजपेयी से कम नहीं ; क्या कांग्रेस में परिवारभक्ति ही देशभक्ति की निशानी है?

                                       सांसद थरूर से कांग्रेस नाराज (साभार- नवभारत टाइम्स)
ऐसा सिर्फ कांग्रेस पार्टी में ही हो सकता है जहाँ राष्ट्रवाद के लिए दंडित किया जाता है। यहाँ नेताओं को उनकी साख, रिकॉर्ड, ‘नेशन फर्स्ट’ रखने पर दरकिनार कर दिया जाता है। कांग्रेस हाईकमान यानी गाँधी परिवार को खुश करने के लिए अपमानित भी किया जाता है।
दरअसल कांग्रेस को इस बात से खुश होना चाहिए कि जिस तरह इंदिरा गाँधी नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी से सलाह करती थी उसी तर्ज पर पार्टी में थरूर चल रहे हैं। अगर मल्लिकार्जुन खड़के की बजाए थरूर अध्यक्ष बन गए होते कांग्रेस की दिशा और दशा बदल गयी होती। परन्तु परिवार को चाहिए था परिवारभक्त। लेकिन विरोध कर कांग्रेस खुद जाल में फंस रही है। राहुल और खड़के के बयान तो कांग्रेस को पाताललोक में धकेल रहे हैं। जो भविष्य में कांग्रेस को ही जरुरत से ज्यादा नुकसान दे सकता है। कांग्रेस में बुद्धिजीवी वर्ग को परिवारवाद से अलग हट पार्टी को समझाना चाहिए। यही समय की मांग भी है। मोदी का विरोध करने के लिए बहुत समय है। कटु सच्चाई यह है कि मोदी विरोध में देश का विरोध करना कांग्रेस को कहीं का नहीं छोड़ेगा। 
दूसरे, प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के 60 साल बाद वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार देश में छिपे हुए गद्दारों को पकड़ रही है। अगर सरकार इसी तरह गद्दारों को पकड़ती रही देश देखेगा कि किस बारूद के ढेर पर बैठे हुए थे। अभी तो ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर भी नहीं पकडे गए हैं। जिस दिन चुटकी भर गद्दार पकड़ने पर कांग्रेस और पाकिस्तान दोनों की हालत ख़राब होनी शुरू हो जाएगी। इस कारण भी कांग्रेस में जरुरत से ज्यादा बौखलाहट या कहा जाए पाकिस्तान की तरह कांग्रेस में भी डर का माहौल बना हुआ है। पाकिस्तान और कांग्रेस सिक्के के एक ही पहलू हैं। जिस तरह पाकिस्तान अपने आतंकियों से हिन्दुओं पर हमले, युद्ध के दौरान मन्दिरों पर बमबारी उसी तरह कांग्रेस ने भी भारत में हिन्दू तीर्थों को विवादित बना रखा है।    
सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि थरूर तो एक बहाना है, हकीकत में पाकिस्तान और आतंकवाद पर होते हमलों ने मुस्लिमपरस्त कांग्रेस की नींद, रोटी और पानी हराम कर दिया है। इन्हीं मुद्दों पर सनातन को कलंकित कर अपने वोटबैंक को खुश किया जाता था। इसी चक्कर में मुसलमानों के सामने सच्चाई नहीं आने दी और मुसलमान को जनसंघ से लेकर वर्तमान बीजेपी को मुसलमानों का दुश्मन बनाकर डराकर उनका वोट लेते रहे।    

पूर्व राजनयिक और कांग्रेस सांसद शशि थरूर अब कांग्रेस में बेवजह गुस्से का शिकार हैं। उनका अपराध यह है कि थरूर ने वैश्विक स्तर पर भारत के आतंकवाद विरोधी रुख को स्पष्ट करने और ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बताने के लिए सांसदों के एक बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने के लिए मोदी सरकार के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया।

गाँधी परिवार के वफादार कांग्रेसी अब पार्टी के अंदर इस बात पर गुस्से का इजहार कर रहे हैं कि आखिर क्यों शशि थरूर को केन्द्र ने बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनाया? शशि थरूर को केन्द्र सरकार ने विदेश भेज गए डेलिगेशन का नेतृत्व करने के लिए चुना है। उनका ग्रुप अमेरिका, पनामा, गुयाना, ब्राजील और कोलंबिया जाएगा। दरअसल कांग्रेस के खफा होने की वजह ये है कि बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल के लिए कांग्रेस पार्टी द्वारा सुझाए गए नामों में थरूर शामिल नहीं थे। कांग्रेस ने आनंद शर्मा, गौरव गोगोई, नासिर हुसैन और राजा बरार के नाम भेजे थे।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने 17 मई 2025 को कहा कि कांग्रेस पाकिस्तान से आतंकवाद पर भारत के रुख को स्पष्ट करने के लिए विदेश जा रहे सांसदों के रूप में अपने दिये गए चार सांसदों के नाम “नहीं बदलने जा रही है”।

जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि औपचारिक रूप से चार नाम दिए जाने के बावजूद सरकार ने उनमें से अधिकांश को नजरअंदाज कर दिया, जिससे संसदीय परंपराओं, विपक्ष- सत्तारूढ़ दल के बीच विश्वास को ठेस पहुँचा।

16 मई 2025 को केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू ने केंद्र सरकार की ओर से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी से संपर्क किया और बहुदलीय संसदीय दल में शामिल होने के लिए पार्टी से चार नामों का अनुरोध किया। राहुल गाँधी ने उसी दिन दोपहर से पहले वरिष्ठ नेताओं आनंद शर्मा, गौरव गोगोई, नासिर हुसैन और राजा बरार का नाम भेजा। इस पर जयराम रमेश ने कहा, ” सरकार ने कांग्रेस द्वारा सुझाए गए नामों में से केवल आनंद शर्मा को चुना और मामले का राजनीतिकरण किया।”

हालाँकि, कांग्रेस पार्टी को पहले यह जवाब देना चाहिए कि विदेशी मामलों की विशेषज्ञता रखने और पूर्व राजनयिक शशि थरूर को क्यों नजरअंदाज किया गया?

पार्टी से पहले राष्ट्र को प्राथमिकता देना और स्वतंत्र राय रखना कांग्रेस पार्टी को नागवार गुजर रहा है। कांग्रेस पार्टी ने भले ही शशि थरूर पर सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर झुकाव रखने का आरोप नहीं लगाया है, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई ने उन्हें ‘बीजेपी स्लीपिंग सेल’ कहा है। रिपोर्ट्स बताती है कि कांग्रेस हाईकमान थरूर को पार्टी से निकालने पर विचार कर रहा है, हालाँकि कांग्रेस ने इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। अब सवाल यह उठता है कि कांग्रेस पार्टी अपने उन नेताओं को क्यों नजरअंदाज करती है? जो मूल रूप से ‘दरबारियों’ की तरह काम नहीं करते हैं और बौद्धिक स्वतंत्रता बनाए रखना पसंद करते हैं। क्या यह इस डर की वजह से है कि ऐसे मजबूत नेता गाँधी परिवार को पीछे छोड़ सकते हैं या पार्टी में समानांतर सत्ता बना सकते हैं?

शशि थरूर की जगह राहुल गाँधी के वफादार गौरव गोगोई को चुनना, क्या उचित है? गाँधी परिवार के करीबी न होने के बावजूद शशि थरूर न केवल विदेशी मामलों में विशेषज्ञता रखने वाले अहम सासंद हैं, बल्कि संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष भी हैं। कांग्रेस पार्टी द्वारा दरकिनार किए जाने और अपमानित किए जाने के बावजूद शशि थरूर ने हार नहीं मानी और कहा कि वे अपनी सौंपी गई जिम्मेदारियों को पूरी लगन से निभाएँगे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पार्टी नेतृत्व को अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन उनकी प्रतिबद्धता अटल है। कांग्रेस की अधीनता के बजाए थरूर ने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देने का फैसला किया और संदेश दिया कि वह ‘आसानी से अपमानित’ नहीं होंगे।

इस बीच, केरल कांग्रेस ने भी तिरुवनंतपुरम के सांसद के फैसले से खुद को अलग कर लिया है। केरल में विपक्ष के नेता वी डी सतीशन ने कहा कि थरूर कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) के सदस्य हैं और उनके जैसे नेता पार्टी में मध्यम पायदान पर आते हैं। सतीशन ने कहा, “सीडब्ल्यूसी का सदस्य होना महत्वपूर्ण है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को इस मामले पर अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए। उनका जो भी विचार होगा, हम उसे मानेंगे।” केरल कांग्रेस के नेता सतीशन और मुरलीधरन ने थरूर द्वारा बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने के लिए केंद्र के आह्वान को तुरंत स्वीकार करने को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा बताया और थरूर के कद को कम करके यह सुझाव दिया कि उन्हें एक सांसद के रूप में अपने कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। गौरतलब है कि थरूर पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस पार्टी की केरल इकाई द्वारा लगातार निशाने पर हैं। अप्रैल 2024 में कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने तिरुवनंतपुरम शहर के बलरामपुरम में एक चुनाव अभियान के दौरान अपने सांसद शशि थरूर को रोक दिया था। उन्होंने थरूर के खिलाफ ‘वापस जाओ’ और ‘तुम्हें वोट नहीं’ के नारे लगाए।

इससे पहले 2019 में वरिष्ठ कांग्रेस नेता के मुरलीधरन ने शशि थरूर का मजाक उड़ाया और कहा कि ” यह ‘ऑक्सफ़ोर्ड इंग्लिश’ नहीं बल्कि ‘मोदी विरोधी’ रुख है जिसने पार्टी के नेतृत्व वाले मोर्चे को तिरुवनंतपुरम सीट जीतने में मदद की।” मुरलीधरन की यह बयान थरूर के उस बयान के कुछ दिनों बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह हमेशा से ही सही नीतिगत निर्णयों के लिए पीएम मोदी की प्रशंसा करने के पक्षधर रहे हैं। थरूर ने कहा था कि सही निर्णयों के लिए पीएम मोदी की प्रशंसा करने से विपक्ष की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।

हालाँकि कांग्रेस ने थरूर का नाम नहीं भेजा, जबकि वे संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजनयिक हैं और इस कार्य में उनकी विशेषज्ञता है। यह स्पष्ट हो गया कि थरूर की बौद्धिकता, वाकपटुता और स्वतंत्रता सोच पार्टी आलाकमान, खासकर गाँधी परिवार को पसंद नहीं है। पार्टी आलाकमान के करीबियों को ही यहाँ प्राथमिकता दी जाती है। कांग्रेस का ये दृष्टिकोण कोई नया नहीं है। कांग्रेस पार्टी में गाँधी परिवार के प्रति वफादारी हमेशा योग्यता पर भारी रही है। कांग्रेस पार्टी के कई वरिष्ठ और मजबूत नेताओं को सिर्फ इसलिए हार का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्होंने गाँधी परिवार की अवहेलना करने की जुर्रत की और विभिन्न मुद्दों पर स्वतंत्र राय व्यक्त करने का साहस किया। हाल के वर्षों में शशि थरूर को लगातार अपनी ही पार्टी द्वारा निशाना बनाया गया, दरकिनार किया गया और अपमानित किया गया।

शशि थरूर ने गाँधी परिवार के वफादार खड़गे के खिलाफ लड़ा चुनाव

अक्टूबर 2022 में कांग्रेस सांसद शशि थरूर को गाँधी परिवार के वफादार मल्लिकार्जुन खड़गे के समर्थकों के साथ ‘टकराव’ से बचने के लिए उत्तर प्रदेश की अपनी यात्रा रद्द करने के लिए कहा गया था। थरूर को ‘वफादार’ खड़गे के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष का ‘चुनाव’ लड़ने पर पार्टी के भीतर विरोध का सामना करना पड़ा। दरअसल थरूर कांग्रेस पार्टी की “हाईकमान” संस्कृति को खत्म करना चाहते थे। इसका मतलब गाँधी परिवार के वर्चस्व का अंत था। हालांकि, वह गाँधी परिवार के वफादार को नहीं हरा सके।

नवंबर 2022 में, थरूर को गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए स्टार प्रचारकों की सूची में जगह नहीं दी गई थी। लगभग उसी समय, केरल कांग्रेस ने थरूर से खुद को दूर कर लिया था और कोझीकोड में एक आरएसएस विरोधी सेमिनार की मेजबानी करने से पीछे हट गई थी, जहाँ कांग्रेस सांसद को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। उस समय ऐसी खबरें आई थीं कि कांग्रेस नेतृत्व ने पार्टी की स्थानीय इकाइयों को शशि थरूर का कोई भी कार्यक्रम आयोजित न करने का अनाधिकारिक आदेश दिया था।

फरवरी 2025 में शशि थरूर ने पार्टी में अपनी भूमिका को लेकर असंतोष जताया था। उन्होंने पार्टी में दरकिनार किए जाने और संसद के अंदर प्रमुख बहसों में भाग लेने का अवसर न दिए जाने पर रोष व्यक्त करने के लिए राहुल गाँधी से मुलाकात की थी। हालाँकि, थरूर संतुष्ट नहीं हुए। थरूर का असंतोष ऑल इंडिया प्रोफेशनल कांग्रेस (AIPC) के प्रभार से हटाए जाने से भी पैदा हुआ। कांग्रेस पार्टी भी थरूर से तब से नाराज है, जब उन्होंने पार्टी के आधिकारिक रुख से हटकर प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा की प्रशंसा की थी। पीएम मोदी की ट्रंप से मुलाकात के बारे में थरूर ने कहा, “मुझे लगता है कि यह बहुत अच्छा नतीजा है, क्योंकि अन्यथा, डर था कि वाशिंगटन में जल्दबाजी में कुछ फैसले लिए जा सकते हैं, जिससे हमारे निर्यात पर असर पड़ता। इस तरह, चर्चा और बातचीत के लिए समय है।”

कैप्टन अमरिंदर सिंह का कॉन्ग्रेस से बाहर निकलना

2021 में तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने यह कहते हुए कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था कि वह अपने साथ हुए अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकते। सिंह ने कांग्रेस छोड़ने का फैसला तब किया जब पार्टी ने उन्हें सूचित किए बिना पंजाब में कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई। इससे पहले, पार्टी ने अमरिंदर सिंह की कड़ी आपत्तियों के बावजूद जुलाई 2021 में नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष चुनकर उन्हें नकार दिया था।

कांग्रेस आलाकमान ने हिमंत बिस्वा सरमा को पार्टी छोड़ने पर किया मजबूर

सितंबर 2015 में कांग्रेस पार्टी ने असम से एक बेहतरीन नेता खो दिया, जब हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा देते हुए कहा कि पार्टी में “निरंकुश परिवार-केंद्रित” राजनीति और “लोकतंत्र की कमी” है।
सरमा ने कांग्रेस से इस्तीफा देते हुए कहा, “2012 से मैं देख रहा हूँ कि स्थिति बिगड़ती जा रही थी और राज्य नेतृत्व के उदासीन रवैये के कारण पार्टी सम्मान खो रही थी। तीसरी बार जीत सिर पर चढ़ गई थी, और लोगों के लिए काम करने के प्रति करुणा और समर्पण की जगह अहंकार ने लेना शुरू कर दिया था। पार्टी नेतृत्व में आत्मसंतुष्टि और यथास्थितिवाद की भावना समा गई थी। चाटुकारों के एक समूह द्वारा लगातार प्रोत्साहित की जाने वाली निरंकुश परिवार-केंद्रित राजनीति ने कभी भी राज्य में कांग्रेस नेतृत्व तक तर्कसंगत और तटस्थ आवाज नहीं पहुँचने दी,”
हिमंत बिस्वा सरमा अब बीजेपी नेता और असम के लोकप्रिय सीएम हैं। पार्टी को लगातार दो चुनावी जीत दिलाने के बाद, हिमंत ने एक अपमानजनक घटना को याद किया। उन्होने कहा कि कांग्रेस के राजकुमार राहुल गाँधी ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने पालतू कुत्ते के साथ एक ही प्लेट में बिस्किट खाने को कहा था। राहुल के कुत्ते द्वारा अस्वीकार किए गए बिस्किट देने की घटना से वह काफी परेशान हो गए थे। एक एक्स पोस्ट का जवाब देते हुए, हिमंता ने कहा कि वह एक स्वाभिमानी असमिया और भारतीय हैं, उन्होंने कहा कि वह एकमात्र कांग्रेस नेता थे जिन्होंने कुत्ते के बिस्किट खाने से इनकार कर दिया और कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। यह घटना तब हुई जब सरमा ने असम की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए 2016 के चुनावों के दौरान राहुल गाँधी से मुलाकात की।
2022 में सरमा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने “कांग्रेस में अपने जीवन के 22 साल बर्बाद कर दिए हैं”। कांग्रेस और भाजपा के बीच अंतर के बारे में बोलते हुए सरमा ने कहा, ”कांग्रेस में हम एक परिवार की पूजा करते थे। भाजपा में हम देश की पूजा करते हैं।”

पार्टी आलाकमान से अलग राय रखने पर दरकिनार किए जाते हैं कांग्रेसी या उन्हें ‘संघी’ करार दिया जाता है

दिलचस्प बात यह है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, हालाँकि वे कांग्रेस पार्टी में बने हुए हैं, उन्होंने कई मौकों पर ऐसे फैसले लिए हैं जिससे पार्टी नेतृत्व को निराशा हुई है। चाहे वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “बड़े भाई” कहना हो या “गुजरात मॉडल” की प्रशंसा करना हो। जब राहुल गाँधी बार-बार पीएम मोदी पर व्यवसायी गौतम अडानी के कथित क्रोनी कैपिटलिज्म में मिलीभगत का आरोप लगाते हुए हमला कर रहे थे, उस वक्त रेवंत रेड्डी विकास परियोजनाओं के लिए अडानी समूह के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर रहे थे।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान केंद्र और सशस्त्र बलों का समर्थन करने वाले रेड्डी ने कई बार स्वतंत्र रूप से काम किया है। हालाँकि पार्टी नेता और समर्थकों ने उन्हें “संघी एजेंट” भी कहा। इसी तरह, कांग्रेस नेता सचिन पायलट को भी गाँधी परिवार के वफादार और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ मतभेदों के कारण कांग्रेस पार्टी ने दरकिनार कर दिया है। निकम्मा, गद्दार और न जाने क्या-क्या कहे जाने के बावजूद पायलट कांग्रेस में बने हुए हैं, हालाँकि उन्हें नजरअंदाज किया जाता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा से लेकर कपिल सिब्बल तक, कई कांग्रेस नेता जो पार्टी में बड़े नेता बनने की क्षमता रखते थे, उन्हें दरकिनार कर दिया गया और आखिरकार उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी। पार्टी में साफ तौर पर समझा जा सकता है कि जिस नेता के विचार पार्टी हाईकमान की लाइन से मेल नहीं खाता, वह दरकिनार रहेंगे । गुलाम नबी आज़ाद ने पार्टी में 50 से अधिक साल बिताने के बाद कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि हाईकमान फीडबैक और आलोचना के प्रति उदासीन हो गया था।

अगस्त 2022 में, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद ने 50 साल से ज़्यादा समय तक कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहने के बाद इस्तीफ़ा दे दिया। अपने विदाई नोट में, गुलाम नबी आज़ाद ने पार्टी के पतन के लिए कॉन्ग्रेस आलाकमान को जिम्मेदार ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कांग्रेस के वारिस राहुल गांधी पर पार्टी के भीतर परामर्श तंत्र को अकेले ही नष्ट करने का आरोप लगाया। आजाद का कांग्रेस के प्रति असंतोष तब स्पष्ट हो गया जब वे पिछले साल जम्मू में जी-23 असंतुष्ट समूह में शामिल हो गए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी प्रशंसा की थी। उन्होने अलग पार्टी बना ली।

कांग्रेस पार्टी के लिए राष्ट्र नहीं, गाँधी परिवार सबसे पहले आता है। इस अघोषित नियम का उल्लंघन करने वाले को या तो तिरस्कार, अपमान और ‘भाजपा एजेंट’अथवा संघी करार दिया जाता है या पार्टी से सीधे निष्कासित कर दिया जाता है। जाहिर है गाँधी परिवार अपने वरिष्ठ पार्टी नेताओं को अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता की आजादी देकर नियंत्रण खोने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।