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Operation Sindoor और Article 370 पर कांग्रेस के कद्दावर नेताओं के रुख से अलग-थलग पड़े राहुल गाँधी; क्या कांग्रेस टूटने के कगार पर जा रही है? तुम्हे मोदी से नफरत है या देश से?

जब कोई मंदबुद्धि दूसरों के हाथ कठपुतली बन नाचता है वह खुद भी डूबता और अपने साथियों को भी डुबो देता है। ठीक यही हालत कांग्रेस की है। जिसका राहुल गाँधी और परिवार Deep State का गुलाम बन पागलों की हरकत करे तो आखिर पार्टी में आत्मसम्मानित नेता कब तक बर्दाश्त करेंगे। कांग्रेस को नहीं मालूम कि लोग राहुल LoP का किन अपमानित शब्दों में चर्चा कर रहे हैं, जिनका उल्लेख करना मुश्किल है। बीजेपी ने तो Leader of Pakistani Propaganda बता दिया है। राहुल जो कुछ भी बकवास कर रहा है वह पाकिस्तान मीडिया की सुर्खियां ही नहीं डोसियर में उल्लेख किया जा रहा है, जो LoP राहुल और सारी कांग्रेस के लिए बहुत ही शर्म की बात है। तुम्हे मोदी से नफरत है या देश से? जबकि INDI गठबंधन के वरिष्ठ नेता शरद पवार चीख-चीखकर कह रहे हैं कि ये संसद का विशेष अधिवेशन बुलाने का नहीं और ना ही भारत को हुए हुए नुकसान के बारे में पूछने का समय। लेकिन Deep State के हाथों बिकाऊ विशेष अधिवेशन और नुकसान की जिद्द लगाए हुए हैं।         

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की अजब-गजब करतूतों के चलते पहले ही कांग्रेस के कई बड़े नेता पार्टी से किनारा कर चुके हैं। इसके चलते कांग्रेस देश के हर राज्य में लगातार कमजोर होती चली जा रही है। लेकिन इसके बावजूद राहुल गांधी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। एक ओर ऑपरेशन सिंदूर की ऐतिहासिक और शानदार सफलता की दुंदभि देशवासियों में ही नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भी जोर-शोर से बज रही है। दूसरी ओर राहुल गांधी अपने एक एजेंडा और झूठे नैरेटिव के साथ भारत को बदनाम करने के मिशन पर चल रहे हैं। हालात ये हैं कि राहुल गांधी अपनी इस सोच के चलते अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। पार्टी के कई कद्दावर नेताओं सांसद शशि थरूर, पूर्व मंत्री सलमान खुर्शीद और मनीष तिवारी ने खुलकर विरोध का झंडा उठा लिया है। ये नेता राहुल गांधी की मनगढ़ंत पार्टी लाइन से अलग हटकर ना सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं, बल्कि उन्होंने यह कहकर राहुल गांधी को बौना साबित कर दिया है कि देशहित सबसे बड़ा है।

ऑपरेशन सिंदूर पर राहुल गांधी की रणनीति पर उठ रहे सवाल
ऑपरेशन सिंदूर के बाद कांग्रेस नेता शशि थरूर, मनीष तिवारी और सलमान खुर्शीद ने कांग्रेस लाइन से अलग रुख अपनाया हुआ है। इसलिए राहुल गांधी की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं और पार्टी में असहमति बढ़ रही है। दरअसल, पहलगाम हमले के बाद दुनिया के सामने पाकिस्तान को बेनकाब करने के लिए भारत ने अलग-अलग देशों में अपने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजे हैं। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं। क्योंकि वे राहुल गांधी की खींची लकीर पर आंखें मूंदकर चलने के बजाए देशहित में कदम बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद भी डेलीगेशन में शामिल हैं। उन्होंने कश्मीर में अनुच्छेद 370 को रद्द करने का समर्थन किया है। उनके इस बयान से कांग्रेस मुश्किल में आ गई है। वरिष्ठ नेताओं ने खुर्शीद की टिप्पणी पर कोई जवाब नहीं दिया है। लेकिन जब से सरकार ने 51 सदस्यों वाले सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों को भेजा है, तब से पार्टी के भीतर बेचैनी बढ़ रही है।

पार्टी लाइन से अलग जाकर थरूर ने बढाया राहुल का ब्लड प्रेशर
सबसे पहले विवाद तो कांग्रेस सांसद शशि थरूर पर उठा। राहुल गांधी की असहमति के चलते इतने वरिष्ठ और बुद्धिजीवी सांसद का नाम कांग्रेस ने डेलीगेशन के लिए नहीं भेजा। लेकिन मोदी सरकार ने उनकी खासियतों को नवाजते हुए उन्हें एक डेलीगेशन का नेतृत्व ही सौंप दिया। इसके बाद शशि थरूर ने बयान दिया था कि भारत ने मोदी सरकार के दौरान पहली बार LoC पार करके सर्जिकल स्ट्राइक की गई थी। थरूर ने एकदम सच बात कही, जो उनकी पार्टी के नेताओं को कड़वी लग गई। खुर्शीद के हालिया बयान और थरूर की पहले की टिप्पणी ने कांग्रेस पार्टी के भीतर खलबली मचा दी है। बता दें कि कांग्रेस ने पहले अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध किया था। बाद में पार्टी ने अपना रुख बदला और अब इस मुद्दे पर चुप है। कांग्रेस में शशि थरूर की तरह पार्टी लाइन से अलग मत रखने वालों की फेहरिस्त बढ़ती जा रही है।

राहुल के नेतृत्व पर एक खेमे का अविश्वास खुलकर सामने आया
ऑपरेशन सिंदूर को लेकर कांग्रेस के स्टैंड से उसकी ही पार्टी के कई नेता इत्तेफाक नहीं रखते। कांग्रेस, सरकार पर हमलावर है। राहुल गांधी बार-बार सरकार से अनावश्यक सवाल पूछ रहे हैं कि हमारे कितने फाइटर जेट को नुकसान हुआ। दरअसल, वे पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं। उन्हें पूछना तो यह चाहिए कि हमारी वायुसेना ने पाकिस्तान को किस तरह तहस-नहस कर दिया? लेकिन राहुल गांधी द्वारा अनाप-शनाप तरीके से ऑपरेशन सिंदूर की आलोचना किसी के भी गले नहीं उतर रही है। जी हां, कांग्रेस के कई नेता ऑपरेशन सिंदूर से गदगद हैं। वे इसके लिए खुलकर मोदी सरकार की तारीफ कर रहे हैं। ऐसे में शशि थरूर के बाद अब मनीष तिवारी और सलमान खुर्शीद के स्टैंड राहुल गांधी को की टेंशन बढ़ाने वाले हैं। दरअसल, कांग्रेस पार्टी के भीतर एक बार फिर हलचल मची है। ऑपरेशन सिंदूर पर कांग्रेस दो खेमों में बंट चुकी है। एक खेमा सरकार से सवाल कर रहा है या चुप्पी साधे हुए है। दूसरी ओर कांग्रेस के कई नेता हैं जो सरकार के एक्शन से खुश नजर आ रहे हैं। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर पर जिस तरह से कांग्रेस नेता शशि थरूर, सलमान खुर्शीद और मनीष तिवारी ने पार्टी लाइन से अलग बयान दिए हैं, उससे साफ होता जा रहा है कि राहुल गांधी के नेतृत्व पर एक खेमे का अविश्वास या असहमति अब खुलकर सामने आ रही है।

मनीष तिवारी ने डेलिगेशन में शामिल होने के फैसले को जस्टिफाई किया
ऑपरेशन सिंदूर पर राहुल गांधी की रणनीति पूरी तरह से सवालों के घेरे में है। विपक्षी गठबंधन में जहां अन्य दल चुप्पी साधे हुए हैं, वहीं कांग्रेस ने हमलावर रुख अपनाया है। इसे लेकर कांग्रेस की आलोचना भी हो रही है। ऐसे में शशि थरूर, सलमान खुर्शीद और मनीष तिवारी जैसे सीनियर नेता पार्टी की पार्टी लाइन से अलग नजर आए। शशि थरूर विरोध के बाद भी ऑपरेशन सिंदूर डेलिगेशन का हिस्सा बने। उन्होंने इसे राष्ट्रीय हित का मसला बताया। ठीक उनकी राह पर मनीष तिवारी ने भी ऑल पार्टी डेलिगेशन में खुद को शामिल करने के फैसले को जस्टिफाई किया है। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी पाकिस्तान स्पॉन्सर्ड आतंकवाद के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर वाले डेलिगेशन शामिल होने के अपने फैसले को राष्ट्र की पुकार बताया। यहां बताना जरूरी है कि कांग्रेस नेतृत्व ने दोनों सांसदों को डेलिगेशन में शामिल होने से रोकने की कोशिश की थी। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चार वैकल्पिक नाम सुझाए थे, जिनमें शशि थरूर और मनीष तिवारी का नाम नहीं था। शशि थरूर और मनीष तिवारी की तरह सलमान खुर्शीद भी डिलेगेशन में शामिल हैं।

आर्टिकल 370 को खत्म करने के कदम कश्मीर में खुशहाली आई-खुर्शीद
सलमान खुर्शीद उन 7 सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों में से एक का हिस्सा हैं जो अभी अलग-अलग देशों का दौरा कर रहे हैं। डेलीगेशन में इंडोनेशिया गए सलमान खुर्शीद ने थिंक टैंक और शिक्षाविदों को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में आई समृद्धि को खत्म करना चाहता है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा, ‘कश्मीर में लंबे समय से एक बड़ी समस्या थी। इसका ज्यादातर असर संविधान के अनुच्छेद 370 में दिखता था। इससे ऐसा लगता था कि यह देश के बाकी हिस्सों से अलग है। आखिरकार मोदी सरकार ने इसे खत्म कर दिया गया, क्योंकि बहुत समय बीत चुका था।’ खुर्शीद ने आगे कहा, ‘इसके बाद, 65 प्रतिशत भागीदारी के साथ चुनाव हुआ। आज कश्मीर में एक निर्वाचित सरकार है।’ कांग्रेस ने अनुच्छेद 370 को खत्म करने का विरोध किया था। आतंकवाद पर पाकिस्तान को बेनकाब करने के लिए विदेश भेजे गए डेलिगेशन में सलमान खुर्शीद ने भी पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाया। अगस्त 2019 में मोदी सरकार की ओर से जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के आर्टिकल 370 को खत्म करने के ऐतिहासिक कदम की सराहना करते हुए खुर्शीद ने कहा कि इस कदम के बाद कश्मीर में खुशहाली आई है।

राहुल गांधी के रवैये और अस्पष्ट रणनीति से कांग्रेस नेता असहज
राहुल गांधी के रवैये, अस्पष्ट रणनीति और विवादास्पद बयानबाजी के चलते कांग्रेस में नेता ही असहज महसूस करने लगे हैं। जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस उमर अब्दुल्ला सरकार के साथ है। उमर अब्दुल्ला आर्टिकल 370 के खात्मे के खिलाफ हैं। राहुल गांधी को समझ में नहीं आ रहा है कि वे उमर अब्दुल्ला का समर्थन करें या राष्ट्रहित में आर्टिकल 370 का समर्थन करें? जैसा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद कर रहे हैं। इसी तरह राहुल गांधी ने पाकिस्तान के आतंकी चेहरे को बेनकाब करने वाले सर्वदलीय डेलीगेशन में अपनी पार्टी के नेता तो भेजे हैं। लेकिन जिस ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान को दुनियाभर के सामने बेनकाब कर दिया है, उसके बारे में वे खुद ऊल-जुलूल बयानबाजी करने में लगे हैं। इस तरह शशि थरूर, मनीष तिवारी और सलमान खुर्शीद के स्टैंड से कांग्रेस के कई नेता असहज हो रहे हैं। फिलहाल ऑपरेशन सिंदूर पर राहुल गांधी अपने बयानों और स्टैंड को लेकर आलोचना पर ट्रोल हो रहे हैं। वह शशि थरूर को पाक को बेनकाब करने वाले डेलिगेशन में नहीं जाने देना चाहते थे। इसे लेकर भी उनकी आलोचना हुई। भाजपा ने भी उन्हें घेरा। अब तो पार्टी के भीतर से भी आवाजें उठने लगी हैं। कांग्रेस में जिस तरह से खुलकर कई नेता बारी-बारी से ऑपरेशन सिंदूर और सरकार के कुछ फैसलों की तारीफ कर रहे हैं, इससे कांग्रेस और राहुल गांधी बैकफुट पर हैं।

मिली कूटनीतिक जीत, थरूर की नाराजगी के बाद कोलंबिया ने बदले सुर
ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंक के चेहरे को बेनकाब करने के लिए शशि थरूर के नेतृत्व में जो डेलिगेशन कोलंबिया गया। उसका सकारात्मक परिणाम देखने को मिला है। बता दें भारत की ओर से पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर के जरिए किए गए हमलों के बाद से कोलंबिया ने पाकिस्तान के प्रति संवेदना जताई थी, लेकिन जब डेलिगेशन ने इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी जताई तो इसके सुर बदले हुए नजर आए और आधिकारिक तौर पर अपना बयान वापस ले लिया है। इस मामले पर बात करते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा था कि हम कोलंबिया सरकार की प्रतिक्रिया से निराश हैं। वहीं, डेलीगेशन से मुलाकात के बाद कोलंबिया की उप विदेश मंत्री योलांडा विलाविसेनियो ने कहा कि हमें पूरा विश्वास है कि आज हमें जो स्पष्टीकरण मिला है। कश्मीर में जो कुछ हुआ उसके बारे में अब हमारे पास जो जानकारी है, उसके बेस पर हम बातचीत जारी रखेंगे। इस दौरान शशि थरूर ने आगे कहा कि हमें अभी भी महात्मा गांधी की जमीन पर गर्व है। कोलंबिया के बयान वापस लेने के बाद ये संदेश गया है कि ये भारत की यह बड़ी कूटनीतिक जीत है।

जम्मू-कश्मीर में फिर से 370 बहाल करने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, कहा- फैसला सही था: CJI की बेंच ने पुनर्विचार याचिकाओं को किया खारिज


सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (21 मई, 2024) को उसके अनुच्छेद 370 पर दिए गए निर्णय को लेकर दाखिल पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिका में दी गई दलील को मानने से इनकार करते हुए इन्हें खारिज किया।

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पाँच सदस्यीय बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। बेंच ने कहा कि याचिकाओं का परीक्षण करने के बाद उसे अपने पुराने निर्णय में कोई भी गलती नहीं दिखती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के नियमों के आधार पर याचिका को खारिज किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान जम्मू कश्मीर से लद्दाख को अलग किए जाने वाले एक्ट की संवैधानिकता पर भी सुनवाई करने से इनकार किया। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में भारत सरकार के पुराने स्टैंड का हवाला दिया कि वह जल्द ही जम्मू कश्मीर को केन्द्रशासित प्रदेश से पूर्ण राज्य का दर्जा देगी।

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने लगाई थी। कॉन्फ्रेंस का कहना था कि दिसम्बर 2023 में सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 370 को हटाने को सही ठहराने वाले निर्णय में कुछ गलतियाँ थीं, ऐसे में कोर्ट इस फैसले पर दोबारा से विचार करे। हालाँकि, कोर्ट ने यह दलील नहीं मानी और दोबारा सुनवाई से इनकार किया।

5 अगस्त, 2019 को मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A को हटा दिया था। इसके साथ जम्मू कश्मीर को दो हिस्सों में बाँट कर दो केन्द्रशासित प्रदेश बनाए गए थे। लद्दाख को अलग केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया था।

सरकार के इस निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ डाली गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पर सुनवाई करते हुए दिसम्बर 2023 में सरकार के फैसले को सही ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिए थे कि केंद्र सरकार सितम्बर 2024 तक जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव करवाए।

जम्मू-कश्मीर में अब नहीं लौटेंगे 370 के दिन: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अस्थायी था प्रावधान, मोदी सरकार का फैसला सही

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर आज (11 दिसंबर 2023) सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। 5 जजों की संविधान पीठ की अध्यक्षता करने वाले मुख्य न्यायाधीश चंद्रजूड़ ने बताया कि 5 जजों की बेंच ने तीन अलग-अलग फैसले लिए हैं, लेकिन उनका निष्कर्ष एक ही है।

फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को हटाने को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की दलीलें खारिज कर दीं। कहा गया कि जम्मू-कश्मी भारत का अभिन्न अंग है। ऐसे में नियम है कि केंद्र राष्ट्रपति शासन के तहत राज्य सरकार की शक्ति का प्रयोग कर सकता है और संसद/राष्ट्रपति उद्घोषणा के तहत राज्य की विधायी शक्तियों का प्रयोग कर सकता है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आर्टिकल 370 सिर्फ शुरुआती व्यवस्था थी जो युद्ध स्थिति में शुरू की गई थी। लिखित सामग्री भी बताती हैं कि ये अस्थायी व्यवस्था थी। ऐसे में इसे हटाना गलत नहीं।

2019 से चल रही थी सुनवाई

इस मामले पर सुनवाई 2019 से चल रही थी लेकिन 2020 में इसपर कोई फैसला नहीं आया। 3 जुलाई 2023 को फिर नई संविधान पीठ का गठन करके इसपर सुनवाई शुरू हुई। इस बार अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने की। पीठ में जस्टिस एसके कौल, जस्टिस बीआर गवई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस संजीव खन्ना भी रहे। 2 अगस्त 2023 से 5 सितंबर 2023 तक चली सुनवाई में सु्प्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया और आज इसे सार्वजनिक किया गया
इन याचिकाओं को डालने वालों में वकील शोएब कुरैशी, मुजफ्फर इकबाल खान, रिफत आरा बट, शाकिर शब्बीर, नेशनल कान्फ्रेंस के सांसद मोहम्मद अकबर लोन, हसनैन मसूदी, सीपीआई नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी, इंद्रजीत टिक्कू, पत्रकार सतीश जैकब, पूर्व एयर वाइस मार्शल कपिल काक, पूर्व आईएएस हिंडाल हैदर तैयबजी, रिटायर्ड मेजर जनरल अशोक मेहता, अमिताभ पांडे, गोपाल पिल्लई के साथ ही पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, जम्मू कश्मीर बार एसोसिएशन, जम्मू कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस जैसे राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठन भी शामिल हैं।

‘लाइव टेलीकास्ट हो रहा…’: जब सुप्रीम कोर्ट में पढ़ा जाने लगा अकबर लोन का ‘माफीनामा’ तो क्यों बेचैन हो गए कपिल सिब्बल, सपा सांसद

‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ के सांसद अकबर लोन ने विधायक रहते जम्मू कश्मीर की विधानसभा में ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा लगाया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें हलफनामा दायर कर माफ़ी माँगने को कहा।अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान ये मामला उठा था। इस दौरान भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि कैसे अकबर लोन ने एक सार्वजनिक रैली के दौरान भी आतंकियों के प्रति हमदर्दी जताई थी। इसमें भारत को विदेशी देश बताया गया था।
SG ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में अकबर लोन ने जो एफिडेविट दायर की है, उसमें उन्हें ये ज़रूर कहना चाहिए कि वो अपनी कही गई उन बातों का समर्थन नहीं करते हैं। उन्होंने ये भी लिख कर दिए जाने की माँग की कि वो न तो किसी आतंकवादी का समर्थन करते हैं न देश के किसी अलगाववादी का। हालाँकि, इस दौरान कपिल सिब्बल फँस गए। जब सॉलिसिटर जनरल ने सांसद के बयान का जिक्र किया तो वो कहने लगे कि सुनवाई का लाइव टेलीकास्ट हो रहा है, इसे न पढ़ा जाए।
हालाँकि, मुख्य न्यायाधीश ने भी एसजी से कहा कि वो इसे न पढ़ें, इसीलिए एसजी ने पूरा न पढ़ते हुए सिर्फ बताया कि कैसे उस रैली में आतंकियों के प्रति अकबर लोन ने हमदर्दी जताई थी। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में पेश गोपाल शंकरनारायणन ने इस पर आपत्ति जताई कि अनुच्छेद-370 के पक्ष में याचिका दायर करने पर उनलोगों को अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया जा रहा है।
हालाँकि, इस दौरान CJI डीवाई चन्द्रचूड़ ने उन्हें आश्वस्त किया कि सुप्रीम कोर्ट में किसी शिकायत के संबंध में याचिका लेकर आना संवैधानिक अधिकार है, इसमें अलगाववादी एजेंडे वाली कोई बात नहीं है। SG ने भी कहा कि याचिका दायर करना अलगाववादी नहीं है। इस दौरान कपिल सिब्बल ने बतौर अधिवक्ता पेश होते हुए दावा किया कि उनलोगों ने केवल कानून और संविधान के हिसाब से ही बातें रखी हैं। इस दौरान उन्होंने उन रियासतों की सूची दी, जो भारतीय गणतंत्र में शामिल हुए और दलील दी कि जम्मू कश्मीर का मामला अलग था।
हालाँकि, CJI ने ध्यान दिलाया कि इस करार में ये भी कहा गया था कि आगे के सभी निर्णय भारत के संविधान के हिसाब से लिए जाएँगे और पिछले जो भी करार हुए थे वो सब निलंबित रहेंगे। उसमें लिखा था कि आने वाले संविधान के हिसाब से चीजें चलेंगी, क्योंकि तब संविधान बना नहीं था। कपिल सिब्बल ने अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने को संविधान की मूल संरचना से छेड़छाड़ करार दिया। उन्होंने पूछा कि कानून के किस प्रावधान के तहत किसी राज्य को केंद्रशासित प्रदेश में बदल दिया गया?
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उन्होंने राज्य में विधानसभा चुनाव न कराए जाने को लेकर भी भारत सरकार पर निशाना साधा। बता दें कि CJI कह चुके हैं कि मंगलवार (5 सितंबर, 2023) को ही इस मामले की सुनवाई पूरी कर ली जाएगी। कपिल सिब्बल ने इस दौरान अनुच्छेद-356 के तहत संसद को शक्ति दिए जाने पर भी सवाल उठाया। सुनवाई के दौरान ही अकबर लोन द्वारा 2015 में दिए गए बयान का मुद्दा भी उठा था। सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला रिजर्व रखेगी और अगली तारीख़ पर फैसला सुनाएगी।

‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा लगाने वाले सांसद को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, कहा – ‘हलफनामा दायर कर माफ़ी माँगो’: लिख कर दो कश्मीर भारत का अभिन्न अंग

                              नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद मोहम्मद अकबर लोन (साभार- टेलीग्राफ)
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 सितम्बर, 2023) को नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद मोहम्मद अकबर लोन को माफी माँगने के लिए कहा है। दरअसल, अनुच्छेद 370 को निरस्त करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के 15वें दिन, केंद्र ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद मोहम्मद अकबर लोन से अपने बयानों के लिए माफी माँगते हुए एक हलफनामा माँगा, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए थे। लोन उन याचिकाकर्ताओं में से एक हैं जिन्होंने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा रद्द करने के केंद्र के फैसले को चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश केंद्र द्वारा 2018 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के पटल पर लोन द्वारा कथित तौर पर “पाकिस्तान जिंदाबाद” का नारा लगाने पर कड़ी आपत्ति जताने के बाद आया है। 

कोर्ट में केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ से कहा, “लोन को एक हलफनामा दायर करना होगा जिसमें कहा गया हो कि वह भारत के संविधान के प्रति निष्ठा रखते हैं और जम्मू-कश्मीर देश का अभिन्न अंग है। और अलगाववादी ताकतों और आतंकवाद का विरोध करते हैं।”

मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ से कहा, “लोन को सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर करना चाहिए जिसमें कहा गया हो कि वह भारत के संविधान के प्रति निष्ठा रखते हैं और अलगाववादी ताकतों और आतंकवाद का विरोध करते हैं।”

रिपोर्ट के अनुसार, मेहता का बयान तब आया जब कश्मीरी पंडितों के एक संगठन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील बिमल जाद ने पीठ से कहा, “इन याचिकाकर्ताओं को इस मामले का हिस्सा बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ के सामने कहा कि सदन के पटल पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ की लोन की टिप्पणी की अपनी गंभीरता है। यह मामला गैर सरकारी संगठन ‘रूट्स इन कश्मीर’ ने अदालत के समक्ष उठाया था।

मेहता ने कहा कि अदालत को इस नजरिए से देखना चाहिए कि अनुच्छेद 370 को जारी रखने की माँग कौन कर रहा है। मेहता ने कहा कि लोन कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं बल्कि वह संसद सदस्य हैं और यह पर्याप्त नहीं है कि वह पश्चाताप व्यक्त करें। उन्हें कहना होगा कि मैं जम्मू-कश्मीर या अन्य जगहों पर पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद और किसी भी अलगाववादी गतिविधि का विरोध और आपत्ति करता हूँ। इसे रिकॉर्ड पर आना चाहिए।

रूट्स इन कश्मीर की ओर से पेश हुए वकील ने पीठ को बताया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश के अलावा जस्टिस एसके कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत भी शामिल थे, उन्होंने विवरण देते हुए एक अतिरिक्त हलफनामा दायर किया था और कहा था कि लोन ने जो कहा था उसके लिए उन्हें कोई पछतावा नहीं जताया है। .

एक दूसरे वकील ने बताया कि सांसद लोन ने सदन के बाहर कहा था कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जो कुछ भी कहा, उस पर कायम हैं। वहीं अनुच्छेद 370 में किए गए बदलावों को चुनौती देने वाली याचिकाओं का विरोध करने वाले अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने भी कहा कि लोन को माफी माँगनी चाहिए। 

‘भारत माता की जय’ नारे के साथ गुलाम नबी ने बनाई ‘डेमोक्रेटिक आज़ाद पार्टी’

कांग्रेस से अलग होकर अपना रास्ता तय वाले जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद (J&K Ex-CM Ghulam Nabi Azad) ने 26 सितंबर 2022 को अपनी नई राजनीतिक पार्टी के नाम और झंडे का ऐलान कर दिया। गुलाम नबी के नए राजनीतिक दल का नाम ‘डेमोक्रेटिक आजाद पार्टी’ (DAP) है।

आज़ाद के नयी पार्टी बनाने से जम्मू-कश्मीर से भी कांग्रेस का सफाया होना तय हो चूका है, क्योकि चुनावों में कांग्रेस को मिलने वाला वोट आज़ाद की पार्टी को चला जाएगा।  

जम्मू में ‘भारत माता की जय’ के नारों के साथ नई पार्टी की घोषणा करते हुए आजाद ने कहा कि उनकी पार्टी की विचारधारा उनके नाम की तरह होगी और इसमें सभी धर्मनिरपेक्ष लोग शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि नई पार्टी के एजेंडे में जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा और भूमि व नौकरियों के अधिकार स्थानीय लोगों के लिए सुरक्षित करने का संघर्ष शामिल है।

पार्टी के नाम को लेकर पत्रकारों से बात करते हुए गुलाम नबी आजाद ने कहा कि पार्टी के नाम के लिए उन्हें जम्मू-कश्मीर से 1500 से अधिक सुझाव भेजे गए थे। इनमें उर्दू से लेकर संस्कृत तक के नाम शामिल थे। उन्होंने कहा कि सब यही चाहते थे कि पार्टी का नाम लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण और स्वतंत्र हो। इसीलिए इसका नाम ‘डेमोक्रेटिक आजाद पार्टी’ रखा गया।

पार्टी में आजाद शब्द के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि यह उनके नाम से नहीं जुड़ा है। इसका मतलब स्वतंत्रता से है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी स्वतंत्र लोकतांत्रिक पार्टी होगी, जो आम लोगों से जुड़ी होगी। उन्होंने कहा कि राजनीति में कोई दुश्मन नहीं होता, बल्कि नीतियों पर मतभेद होते हैं।

गुलाम नबी आजाद जम्मू-कश्मीर से हटाए गए अनुच्छेद 370 पर अपनी राय पहले ही दे चुके हैं। वे कह चुके हैं कि यह अनुच्छेद फिर से वापस नहीं आ सकता, क्योंकि इसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत चाहिए। वे कश्मीरी विस्थापितों के पुनर्वास की बात भी कह चुके हैं।

इसी साल 26 अगस्त को वे पार्टी के साथ अपने पाँच दशक पुराने रिश्ते को तोड़ लिया था। पार्टी से इस्तीफा देते हुए उन्होंने कांग्रेस की दुर्दशा के लिए राहुल गाँधी को जिम्मेदार बताया था। गुलाम नबी आजाद को इसी साल मार्च में पद्मभूषण सम्मान से भी सम्मानित किया गया था।

साल 1973 में डोडा जिले के भलेसा ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के सचिव के रूप में राजनीति की शुरुआत करने वाले गुलाम नबी आजाद आगे चलकर युवा कांग्रेस अध्यक्ष बने और साल 1980 में पहली बार संसदीय चुनाव महाराष्ट्र से लड़कर जीते। साल 1982 में वे केंद्रीय मंत्री बने और फिर 2005 में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री भी बने।

Jammu-Kashmir: भाजपा के खिलाफ बने गुपकार गठबंधन में फूट पड़ी, चुनाव अकेले लड़ेगी अब्दुल्लाह की पार्टी

ग़ुलाम नबी आज़ाद द्वारा कांग्रेस छोड़ते ही जम्मू-कश्मीर में सियासत के सारे आंकड़े ही बदल गए। जिस जोश के साथ भाजपा विरोधियों ने गुपकार गठबंधन बनाया था, आज़ाद ने उस गुब्बारे की हवा निकाल दी। अब देखना यह है कि गठबंधन के टूटने से भाजपा कितना फायदा होगा, भविष्य के गर्भ में छिपा है।  
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद इसे दोबारा से सक्रिय कराने के लिए बने गुपकार गठबंधन में ही फूट पड़ गई है। गुपकार के लिए जिन नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारुख अब्दुल्ला के घर पर पहली रणनीति बनी थी, उन्होंने ही गुपकार से नाता तोड़कर जम्मू-कश्मीर में जब विधानसभा चुनाव होंगे, तो सभी 90 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। इसको बीजेपी की रणनीतिक जीत माना जा रहा है, क्योंकि गुपकार के माध्यम से अनुच्छेद 370 दोबारा सक्रिय कराने के दावे जम्मू-कश्मीर के विभिन्न संगठनों द्वारा किये जा रहे थे। इसके साथ ही कश्मीर में इस अनुच्छेद के खत्म होने से आतंकी घटनाओं पर नियंत्रण और कश्मीर में फिर से पर्यटकों की वापसी के लिए शांति प्रयासों में तेजी आई है। दूसरी ओर गुलाम नबी आजाद के बाद छह और नेताओं के कांग्रेस से इस्तीफा देने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में उथल-पुथल और तेज हो गई है।

मोदी सरकार ने चाक-चौबंद तरीके से तीन साल पहले किया था अनुच्छेद 370 का खात्मा
बीजेपी ने अपने सबसे बड़े मुद्दों में से एक जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म कर जता दिया कि वो अन्य दलों के तरह सिर्फ खोखले वादे नहीं करती, बल्कि मुश्किल से मुश्किल काम को देश हित में पूरा करके ही दम लेती है। इसी के तहत पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय किया गया। इस बड़े निर्णय के बाद लगा था कि कश्मीर में असमाजिक और आतंकी तत्व माहौल खराब कर सकते हैं। लेकिन केन्द्र सरकार की सुनियोजित प्लानिंग, कश्मीर के बड़े नेताओं की नजरबंदी, इंटेलिजेंस और सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता और इंटरनेट पर पाबंदी के चलते कोई बड़ी अनहोनी घटना नहीं हुई। बल्कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के तीन साल बाद की अवधि के दौरान घाटी में अमन-चैन में तेजी और पर्यटकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है।

क्या है गुपकार गठबंधन…जिन अब्दुल्ला के घर गुपकार की नींव रखी, अब वही हुए अलग
एक ओर मोदी सरकार अनुच्छेद 370 को खत्म करने जा रहे थे, दूसरी ओर कश्मीर के कुछ दल अलग ही खिचड़ी पका रहे थे। नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला का आवास श्रीनगर में 01, गुपकार रोड पर है। यहीं पर 4 अगस्त 2019 को कश्मीर के 8 दलों ने एक साथ बैठक रखी गई। इसमें इन दलों ने केंद्र सरकार के खिलाफ नया गठबंधन बनाने का फैसला लिया। इसी को गुपकार ग्रुप या गुपकार गठबंधन कहा गया। हालांकि तब तक केंद्र सरकार ने राज्य से अनुच्छेद 370 और आर्टिकल 35ए की वापसी पर कदम एक दिन बाद उठाया था, लेकिन राज्य में सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ा दी गई। सभी पर्यटकों को तुरंत राज्य छोड़ने के लिए कहा गया। एक साल बाद ये दल फिर फारूक अब्दुल्ला के निवास पर मिले और विधिवत गुपकार गठबंधन बनाने की घोषणा की।

कश्मीर में अनुच्छेद 370 को फिर से सक्रिय करने की कोशिशों को बड़ा झटका
जिन फारुख अब्दुल्ला के घर गुपकार गठबंधन की नींव रखी गई थी, अब वही इससे अलग हो गए हैं। इससे जम्मू- कश्मीर में अनुच्छेद को फिर से सक्रिय करने की कोशिशों को बहुत बड़ा झटका लगा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने घोषणा करके गुपकार समूह से खुद के अलग होने का स्पष्ट संकेत दे दिया। गौरतलब है कि इस गुपकार समूह ने जिला विकास परिषद के चुनाव एक साथ लड़े थे, जिसमें शुरुआत में सज्जाद गनी लोन की अध्यक्षता वाले पीपुल्स कॉन्फ्रेंस भी एक घटक थी। लेकिन गुपकार गठबंधन को ज्यादा सफलता नहीं मिल पाई थी।

नेशनल कांफ्रेंस का जम्मू-कश्मीर की सभी 90 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान
जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC) ने एक साथ कई ट्वीट कर पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन (PAGD) के कुछ घटकों द्वारा पार्टी के खिलाफ दिए भाषणों पर निराशा जताई। पार्टी के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने भी कहा कि PAGD के कुछ सदस्यों द्वारा बयानबाजी, ऑडियो और भाषण से उन्हें ठेस पहुंची है। नेशनल कांफ्रेंस के एक अन्य ट्वीट के अनुसार, ”प्रोविंसियल कमेटी के सदस्यों ने सर्वसम्मति से पारित किया कि JKNC को तैयारी करनी चाहिए और सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए। इसके सीधे से मायने हैं कि जम्मू-कश्मीर में जब भी विधानसभा चुनाव होंगे, नेशनल कांफ्रेंस गुपकार ग्रुप के साथ नहीं, बल्कि सारी सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ेगी।

उधर आजाद के इस्तीफे से कांग्रेस में भूचाल, कश्मीर के छह और नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी
इस बीच जम्मू-कश्मीर के राजनीति में कांग्रेस के कद्दावर नेता गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे से भी बड़ा भूचाल आया है। आजाद ने अपने इस्तीफे में राहुल गांधी को खूब खरी-खोटी सुनाई है। आजाद के इस्तीफे के चलते प्रदेश कांग्रेस से अब तक छह बड़े नेताओं ने इस्तीफा दे दिया है। ऐसे में आजाद के इस्तीफे को कांग्रेस के लिए बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है। जम्मू-कश्मीर कांग्रेस कमेटी से पूर्व विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री जीएम सरूरी, पूर्व विधायक हाजिद अब्दुल राशिद, पूर्व विधायक मोहम्मद अमीन भट, पूर्व विधायक गुलजार अहमद वानी, पूर्व विधायक चौधरी मोहम्मद अकरम और पूर्व कैबिनेट मंत्री आरएस चिब ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।

पूर्व कैबिनेट मंत्री जुगल किशोर शर्मा भी सोनिया गांधी को देंगे इस्तीफा
इसके अलावा रियासी विधानसभा के पूर्व विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री जुगल किशोर शर्मा ने भी इस्तीफा देने की घोषणा की है। वर्ष 2002 से 2008 के दौरान कांग्रेस-पीडीपी गठबंधन सरकार में मंत्री रहे जुगल किशोर शर्मा ने कहा कि वह शनिवार को कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को अपना इस्तीफा देंगे। जुगल किशोर शर्मा पीडीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार में जल शक्ति, लोक निर्माण विभाग, पर्यटन विभाग के कैबिनेट मंत्री रहे हैं। बताया जाता है कि रियासी को जिला का दर्जा दिलवाने में जुगल किशोर शर्मा की अहम भूमिका रही है।

आजाद के चिट्ठी बम से कांग्रेस में ही सियासत, गहलोत ने गुलाम को संजय का चापलूस बताया
इधर गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस छोड़ने के लेटर में राहुल गांधी पर चापलूसों से घिरे रहने के आरोप के बाद कांग्रेस में ही सियासत तेज हो गई है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गुलाम नबी आजाद को ही राजीव गांधी के भाई संजय गांधी का चापलूस बता दिया है। गहलोत ने शुक्रवार को जयपुर में मीडिया से कहा-संजय गांधी के वक्त में ये सब चापलूस ही माने जाते थे। गुलाम नबी आजाद समेत जो लोग भी संजय गांधी के साथ थे। वे चापलूस ही माने जाते थे। साइकोफेंट माने जाते थे। संजय गांधी ने परवाह नहीं की। उस वक्त संजय गांधी अगर दबाव में आकर हटा देते तो आज गुलाम नबी आजाद का नाम देश के लोग नहीं जानते।