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क्या शरिया लागू होने पर मॉडर्न फलक को इंस्टाग्राम पर आने की आज़ादी होगी? ‘योगी बंदर, चायवाला मोदी, तड़ीपार शाह’: ‘गलीचपने’ में सईदा फलक निकली ओवैसी की उस्ताद

AIMIM नेता सैयदा फलक(जो पब्लिक मीटिंग में हिजाब और इंस्टाग्राम पर मॉडर्न) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री अमित शाह और सीएम योगी आदित्यनाथ पर अपमानजनक टिप्पणी की (Instagram: syedafalakk)
असदुद्दीन ओवैसी की मजहबी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता आए दिन विवादित बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। कभी मुंब्रा की पार्षद सहर शेख खुलेमंच से पूरे इलाके को ‘हरा रंग‘ में रंगने का ख्वाब बुनती हैं, तो कभी असदु्द्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ‘15 मिनट के लिए पुलिस हटाने‘ की धमकी देती हैं। तो अब ताजा उदाहरण हैं सईदा फलक। ये देश के उच्च पदों पर बैठे नेताओं के लिए ‘गंदी भाषा’ का इस्तेमाल करती हैं।

सईदा फलक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अपमानजनक टिप्पणी की है। मुस्लिम भीड़ को संबोधित करते हुए सईदा फलक अपमानजनक टिप्पणी करते यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। लोग सईदा फलक की इन अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

सईदा फलक ने पीएम मोदी से लेकर सीएम योगी पर की अपमानजनक टिप्पणी

सामने आए वीडियो में AIMIM नेता सईदा फलक सीएम योगी आदित्यनाथ को ‘बंदर’ कहती है। सईदा ने कहा, “ये ‘बंदर’ योगी बंगाल में कहता है कि बंगाल को काबा नहीं बनने देंगे। ये क्या आपके बाप की जागीर है।” वे चेतावनी देते हुए कहती है, “इंशाल्लाह, कयामत तक हम दाढ़ी करेंगे, हिजाब पहनेंगे, टोपी पहनेंगे, अजान पढ़ेंगे, नमाज पढ़ेंगे, शरियत पर चलेंगे।”

असदुद्दीन ओवैसी की हिजाब पहनने वाली महिला को भारत का प्रधानमंत्री बनने वाले बयान का जिक्र करते हुए सईदा फलक ने आगे कहा, “जब ओवैसी ऐसा कहते हैं, तो सब कहते हैं कि ये गजवा-ए-हिंद की बात कर रहे हैं… क्यों नहीं बन सकते? जब कल का तड़ीपार आज होम मिनिस्टर बनकर बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है, जो कल का चायवाला था वो प्राइम मिनिस्टर बनकर देश को बेच रहा है।” सईदा की इस अपमानजनक टिप्पणी पर मुस्लिम भीड़ जोर-जोर से हँस रही है और नारेबाजी कर रही है।

सईदा फलक के खिलाफ लोगों ने कार्रवाई की माँग की

AIMIM नेता सईदा फलक की पीएम मोदी, केंद्रीय मंत्री अमित शाह और सीएम योगी आदित्यनाथ पर की गई अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ लोगों ने कार्रवाई की माँग की है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर लोग यूपी पुलिस, गृह मंत्रालय और योगी कार्यालय को टैग करते हुए कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

अमिताभ चौधरी नाम के ‘एक्स’ यूजर लिखते हैं, “AIMIM नेता सईदा फलक सीएम योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अमित शाह के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी कर रही है।
@Uppolice @myogioffice @AmitShahOffice मामले में दखल दें।”

‘फाइटर 3.0’ नाम से यूजर कहते हैं, “आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन मर्यादा की सीमा लांघकर की गई टिप्पणी बिल्कुल स्वीकार्य नहीं हो सकती। सईदा फलक द्वारा योगी आदित्यनाथ और अमित शाह पर की गई कथित अपमानजनक टिप्पणियाँ सीधे-सीधे राजनीतिक शालीनता पर सवाल उठाती हैं। सीधा संदेश: असहमति हो सकती है, लेकिन अभद्रता नहीं।”

वे आगे कहते हैं, “राजनीति में स्तर गिराकर नहीं, तर्क और काम के दम पर जवाब दिया जाता है। जरूरत है कि ऐसी भाषा पर कड़ा संज्ञान लिया जाए, ताकि सार्वजनिक विमर्श की गरिमा बनी रहे और कोई भी नेता सीमाएँ पार करने की हिम्मत न करे। @Uppolice @myogioffice @AmitShahOffice“

दीपक शर्मा नाम के यूजर लिखते हैं, “हैलो @Uppolice सईदा फलक हमारे CM योगीजी के लिए बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रही है। इस खुदीली खातून के खिलाफ कार्यवाही करें।”

कौन हैं सईदा फलक?

हैदराबाद की रहने वाली 31 साल की सईदा फलक कराटे की खिलाड़ी रह चुकी हैं। सईदा ने 20 राष्ट्रीय और 22 अंतरराष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप जीते हैं। वे तेलंगाना की पहली खिलाड़ी हैं जिन्होंने वर्ल्ड कराटे चैंपियनशिप और एशियाई कराटे चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई किया। खिलाड़ी के तौर पर सईदा की सबसे बड़ी उपलब्धि 2016 में यूएस ओपन कराटे चैंपियनिशिप और 2022 में दुबई के शोरिन काई कराटे कप में स्वर्ण पदक जीतकर हासिल की। इसके अलावा सईदा फलक पेशेवर तौर पर एक एडवोकेट भी हैं।

खेल में करियर बनाने के बाद सईदा ने राजनीति ज्वाइन की। साल 2020 में सईदा ने ओवैसी की पार्टी AIMIM का दामन थाम लिया। तभी से वह AIMIM की विचारधारा का प्रचार करते नजर आती हैं। AIMIM ज्वाइन करने के बाद सईदा फलक की एक अलग पहचान बनी। सईदा को बुर्के में भड़काऊ भाषण देते देखा गया, जो सीधे नेताओं को टारगेट कर बोलती हैं, इसीलिए उन्हें ‘लेडी ओवैसी’ भी कहा जाने लगा।

सईदा फलक का हिजाब पर समर्थन और हिंदू देवी-देवताओं का अपमान को लेकर

सईदा फलक एक तरफ हिजाब पहनने का समर्थन करती हैं और दूसरी तरफ महिलाओं की आवाज बुलंद करने के लंबे-लंबे भाषण देती हैं। यही वजह है कि सईदा को उनके ही भाषणों के लिए कई बार घेरा जा चुका है। 4 साल पहले न्यूज 18 की डिबेट में सईदा फलक ने कहा कि ‘मदरसों में लड़कियों को हिजाब की अहमियत समझाई जाएगी’, तब होस्ट अमन चोपड़ा ने उनसे सवाल किया, “आप भी हिजाब नहीं पहनती थी।” तो सईदा ने इसे विकल्प बताया, लेकिन अगली ही लाइन में इसे इस्लाम में जरूरी बताया, जिसके बाद वे टीवी डिबेट में घिरती नजर आईं।

और जब अकबरुद्दीन ओवैसी ने हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करते हुए कहा था, “कई इन लोगों के खुदा हैं। वो क्या-क्यो जो पूजा करते हैं। कितने राम-लक्ष्मण-दुर्गा क्या क्या है? हर 8 दिन में एक नया पैदा हो जाता है। अब हनुमान जयंती आ गई, लक्ष्मू मालूम थी और अब भाग्य लक्ष्मी आ गई।” तब सईदा फलक ने न्यूज 18 के साथ डिबेट में अकबरुद्दीन ओवैसी का बचाव किया था।

पहले भी सीएम योगी पर की अभद्र टिप्पणी, जानिए पुराने विवादित बयान

सईदा फलक को यूँ ही AIMIM में ‘लेडी ओवैसी’ नहीं कहा जाता है बल्कि उनके बयान भी ओवैसी से मिलते जुलते हैं। सईदा फलक कभी-भी मंच से किसी भी नेता को धमकी दे देती हैं, कभी किसी के लिए अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करती हैं।

वे पहले भी सीएम योगी के खिलाफ अभद्र टिप्पणी कर चुकी हैं, “उनका (सीएम योगी) खुद का नाम पहले अजय बिष्ट था, नाम बदलकर योगी आदित्यनाथ रख लिया। तो बेहतर यह होगा कि एक बार फिर से वो अपना नाम बदलकर नाम बदलने वाला बंदर रख लें।”

हाल ही में बिहार चुनाव और मुंबई के BMC चुनावों में भी सईदा फलक के कई विवादित बयान सामने आए थे। किशनगंज में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए सईदा शेख ने पीएम मोदी और सीएम योगी को ‘छोटा शैतान‘ कहा था। वहीं BMC चुनावों में महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस को चुनौती देते हुए सईदा ने कहा था, “सुन लो फडणवीस, अगर अल्लाह ने चाहा तो एक दिन इसी नकाब और हिजाब को पहनकर एक मुस्लिम औरत हिंदुस्तान की प्राइम मिनिस्टर बनेगी।”

AIMIM नेताओं की ‘गलीचपने’ की रही पृष्ठभूमि

अब सईदा शेख की इन अपमानजनक टिप्पणियों को सुनने के बाद ज्यादा हैरानी भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ये उसी पार्टी की नेता हैं, जिसमें सहर शेख और अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे नेता शामिल हैं। और यही AIMIM की पहचान है, कि देश के प्रधानमंत्री और प्रशासन को सीधी ‘गाली’ या ‘धमकी’ देकर चर्चा में आओ और फिर खुद को बड़ा नेता बनाओ। इन सभी नेताओं से ऐसे बयान करने की उम्मीद भी है, क्योंकि इनके मुखिया असदु्द्दीन ओवैसी ही आए दिन हिंदू-विरोधी और कट्टर बयान देते नजर आते हैं और मंच के सामने बैठी कौम इसपर ठहाके मारकर हँसती है।

ये हरा-हरा देखने की तलब है या गजवा-ए-हिंद की चाह… सहर के ‘जहर’ के मायने समझते हैं क्या आप?

बिना हिजाब वाली सहर शेख का मुंब्रा को 'ग्रीन' कलर में रंगने वाले बयान में क्या मायने? (साभार: Instagram- saharyunusshaikh)
महाराष्ट्र में ठाणे जिले के मुंब्रा वार्ड में ‘हिजाब वाली’ सहर यूनुस शेख ने नगर निगम चुनाव जीता है। AIMIM के टिकट से नई पार्षद बनीं। 22 साल की सहर शेख ने जीत के बाद विक्टरी स्पीच दी, जो कोई आम भाषण तो बिल्कुल भी नहीं था। मंच से सहर शेख ने कहा कि पूरे मुंब्रा को ‘ग्रीन’ (हरा) रंग से रंगना है। सहर की इस स्पीच का वीडियो वायरल हो रहा है।
सहर की हरा-हरा देखने की तलब से मुस्लिम तुष्टिकरण और सनातन को अपमानित करने वाले विपक्ष की नींद हराम हो गयी है। जिस AIMIM को विपक्ष बीजेपी की B टीम कहता था आज गठबंधन के लिए गुहार लगा रहे हैं। लेकिन मुसलमानों द्वारा हर चुनाव की तरह एकजुट होकर वोट देने से हिन्दुओं में भी एकजुटता की लहर तेज हो गयी है।  

इतना ही नहीं, असुदुद्दीन ओवैसी द्वारा बुर्के वाली को प्रधानमंत्री बनते देखने की लालसा पर टीवी पर परिचर्चाओं में बहुत बड़ा खुलासा हो गया कि परिचचाओं में शामिल किसी भी मौलाना के घरों की महिलाएं बुर्का/हिजाब या नकाब तक नहीं पहनती और अपनी दुकान चलाए रखने के लिए मुसलमान औरतों को बुर्का, हिजाब और नकाब के लिए उकसाते हैं।     

सोशल मीडिया में चर्चा पर बने हुए इस वायरल वीडियो में सहर शेख कहती है, “आने वाले 5 साल बाद भी जब चुनाव होंगे, तो उस चुनाव में भी विरोधियों को मुँहतोड़ जवाब देना है। पूरे मुंब्रा को ग्रीन कलर से ऐसे रंगना है कि इन लोगों को यहाँ से बुरी तरह से पछाड़कर भेजना है। हर एक उम्मीदवार सिर्फ AIMIM का आएगा।”

AIMIM पार्षद सहर शेख के इस बयान को लेकर जहाँ एक तरफ बहस छिड़ी हुई है। वहीं इस बयान के कई मायने भी निकाले जा रहे हैं। खासकर यहाँ ‘ग्रीन’ शब्द को किस संदर्भ में इस्तेमाल किया गया है, यह अब भी सवालों के घेरे में ही है। इस ग्रीन का मतलब क्या लोगों को इस्लाम से जोड़ना है, क्या यहाँ धर्म परिवर्तन की बात हो रही है? क्या मुंब्रा की नई पार्षद सिर्फ हरा-हरा देखना चाहती हैं? जवाब जानने के लिए लोग इसके क्या मायने निकाल रहे हैं, यह जानना जरूरी है।

सोशल मीडिया पर सहर शेख के ‘ग्रीन’ बयान पर प्रतिक्रिया

सहर शेख के इस बयान को सोशल मीडिया पर कुछ लोग हिंदुओं का नामोनिशान हटाने की चेतावनी बता रहे हैं, कोई मुंब्रा को मुस्लिम बहुल इलाका बनने पर चिंता व्यक्त कर रहा है, तो कोई यहाँ ‘ग्रीन’ का मतलब इस्लाम के ‘हरे’ रंग से जोड़कर देख रहा है।

इस बयान पर शिवसेना नेता शाइना एनसी ने कहा है, “सहर शेख युवा नेत्री हैं, वे मुंब्रा में कहती हैं कि वह मुंब्रा को हरा कर देंगी। आपको यह साफ करना चाहिए कि आप पर्यावरण की बात कर रही हैं, जहाँ आप हरा-भरा, साफ-सुथरा माहौल चाहती हैं। अगर ऐसा है, तो आपका बयान स्वीकार्य है। लेकिन अगर आप धर्म, जाति और संस्कृति के आधार पर लोगों को बांट रही हैं, तो यह बहुत दुख की बात है।”

एक्स यूजर हार्दिक कहते हैं, “डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। इनका एजेंडा बिल्कुल साफ है।” वे हिंदुओं को एकजुट होने के लिए कहते हैं, “असली खतरा हमे किससे है वे कोई नहीं देख पा रहा। हिंदुओं अपने धर्म, संस्कृति, धरोहर और विचारधारा का संरक्षण करना है तो समय रहते एक हो जाइए।”

एक और यूजर अभय प्रताप लिखते हैं, “मैडम साहिबा का एजेंडा एकदम से क्लियर है। नगरसेवक का चुनाव जीता है और पूरे क्षेत्र को हरा बना देना है। और ओवैसी के अनुसार एक हिजाबी PM बनेगी तो क्या करेगी?”

बाला नाम के एक्स यूजर ने कहा, “मिलिए 22 साल की AIMIM पार्षद सहर शेख से। ये वो ‘भटके हुए युवा’ नहीं है, इन्हें इस्लाम की अच्छी समझ है। दुख की बात है कि हिंदू अभी तक इस्लाम को नहीं जानते।”

एक और एक्स यूजर दीपा मुखर्जी कहती हैं, “अगर आपको हर चीज को हरा ही करना है, तो जाकर अपने बुजुर्गों की छोड़ी हुई विरासत- पाकिस्तान और बांग्लादेश को ही हरा कर दीजिए। वहाँ पहले से ही हर तरफ हरियाली फैली है, उसे और डुबो दीजिए। भारत को केसरिया ही रहने दीजिए। हमें आप लोगों की यहाँ जरा भी दखलअंदाजी नहीं चाहिए।”

All About Indian नाम से एक्स यूजर कहते हैं, “मिस्टर ओवैसी एक हिजाब पहनने वाली प्रधानमंत्री चाहते थे। लेकिन हम पहले ही देख चुके हैं कि हिजाब पहनने वाली नेता स्थानीय पार्षद बनने पर कैसा व्यवहार करती हैं।”

लोगों की प्रतिक्रियाओं से साफ होता है कि सहर शेख के ‘ग्रीन’ के मायने कुछ भी हों, लेकिन लोग इसे कुछ सकारात्मक तरीके से तो देख नहीं ही रहे हैं। बल्कि यहाँ सहर शेख का मुंब्रा को ‘ग्रीन’ करने का मकसद जरूर जाहिर हो रहा है। सहर शेख ने यह बयान देकर AIMIM में तो अपनी जगह पक्की कर ली है, लेकिन इससे गैर-हिंदू लोग जरूर चिंता में पढ़ गए हैं। ऐसे में पार्टी के ‘नवाब’ असदुद्दीन ओवैसी देश में ‘हिजाब पहनने वाली’ प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं।

सोशल मीडिया पर ‘ग्रीन’ कलर के मायने

सोशल मीडिया पर सहर शेख के ‘ग्रीन’ शब्द के जो मायने निकाले जा रहे हैं, वे अचानक से नहीं हैं। तमाम खबरें ऐसी आती रही हैं जब इस तरह के बयान देकर नफरत फैलाने के काम सरेआम हुए हैं और जब सवाल उठे तो कह दिया गया- कहने का मतलब कुछ और था।

आपको याद होगा असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने खुलेआम 15 मिनट पुलिस हटाने की बात कही थी और तब उसने साफ कहा था, “हिंदुस्तान में हम 25 करोड़ हैं, तुम 100 करोड़ है ना, ठीक है तुम तो हमसे इतने ज्यादा हो, 15 मिनट पुलिस को हटा लो हम बता देंगे कि किसमें कितना दम है।”

आज ओवैसी ये बोल दें कि उनके भाई के इस बयान में 25 करोड़ का मतलब मुस्लिमों से नहीं था, तो क्या ये बातें बदल जाएँगी? क्या नहीं माना जाएगा कि ये सीधे तौर पर देश में रहने वाले 100 करोड़ हिंदुओं को धमकाने के लिए कहा गया था?

सहर शेख ने आज ओवैसी वाला जहर ही उगला है। बस बात ये है कि वो शब्द नहीं बदल पा रहीं, तो उसके मायने को तोड़-मरोड़ रही हैं। खुद को सेकुलर भी इसीलिए बताया जा रहै है क्योंकि लोग उस बयान का असल मतलब समझकर उनसे सवाल कर रहे हैं। वरना ‘ग्रीन’ रंग से उनकी मंशा क्या थी ये साफ उनके हाव-भाव में पता चल रहा है। अब वो इस हाव-भाव को छिपाने के लिए कुछ भी गढ़ें इससे जनता को क्या… उन्हें जरूरत है उस बयान को याद रखने की जो उन्होंने जीत के नशे में चूर होकर मंच से दिया है।

देखा जाए तो सहर मात्र 22 साल की युवती हैं, लेकिन उनके मुँह से निकला ये जहर हैरान करने वाला नहीं है। इसी सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो आपको वायरल होते हुए दिखेंगे, जहाँ छोटे-छोटे मुस्लिम बच्चों के मन में गजवा-ए-हिंद का मकसद भर दिया जाता है, वे सरेआम हिंदुस्तान को गाली देते हैं, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं और इसी देश के बहुसंख्यकों को काफिर कहकर जहर उगलते हैं।

सहर शेख के ‘ग्रीन’ कलर के असल मायने

अब सहर शेख के विक्टरी स्पीच पर सवाल उठ रहे हैं तो उन्होंने सफाई दी है कि उन्होंने तो सिर्फ ‘ग्रीन’ शब्द का इस्तेमाल रंग के तौर पर किया था, लेकिन यहीं अगर कोई इस्लामी पैरोकार बैठा होगा तो ये निश्चित है कि उनके सामने ये मायने बदल जाएँगे। उसकी मजहबी सोच के अनुसार, इसके मायने मजहबी सोच का खुला ऐलान है।

भले ही सहर शेख समझा रही हैं कि वो सेकुलर है लेकिन ये इस्लामी पैरोकार लोग ग्रीन को इस्लामी पहचान से जोड़कर देख रहे हैं, और देख रहे हैं उस मुस्लिम पार्टी AIMIM की सोच से, जो आए दिन भड़काऊ बयान देकर कट्टरवादी पैदा करने में लगी रहती है। यहाँ ये लोग सहर शेख को सिर्फ अपना पार्षद मान रहे है, न कि पूरे मुंब्रा क्षेत्र का।

उधर, सहर शेख के इस बयान पर चिंता जाहिर करने वाले वह मुंब्रा के वह लोग हैं, जिन्होंने विकास के मुद्दे पर पार्षद चुना था। वे इस उम्मीद से वोट देने पहुँचे थे कि उनका पार्षद खराब सड़कें ठीक करवाएगा, पानी की समस्या सुलझाएगा, नगर में विकास होगा, लेकिन जीत के बाद स्पीच में उन्हें जरूर अपने नए पार्षद की स्पीच सुनकर मायूसी हाथ लगी होगी। जो मुंब्रा को विकास से नहीं, बल्कि ‘ग्रीन’ कलर की मजहबी सोच से रंगना चाहती हैं।

यह वही मानसिकता है, जो AIMIM की राजनीति की पहचान है। जहाँ असदुद्दीन ओवैसी मंच से भड़काऊ भाषण देने से नहीं चूकते, वहीं अब उनकी पार्टी में नए एडमिशन लेने वाले युवा भी उसी राह पर चल पड़े हैं। इससे साफ जाहिर है कि असदुद्दीन के लोकतंत्र और संविधान की बड़ी-बड़ी बातें करने का मतलब सिर्फ मजहब और एक ही सोच को आगे बढ़ाना है। और यही नतीजा है कि उनकी ‘हिजाब पहनने वाली’ सहर शेख पूरे शहर को ‘ग्रीन’ कलर में रंगना चाहती हैं।

बिहार : बीजेपी सरकार की सुविधाओं के लाभ उठाने वाले हरामफरमोश मुस्लिमों को विकास का एजेंडा नहीं कबूल, मजहब और BJP विरोध ही अब भी मतदान का पैटर्न


बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी महागठबंधन की बुरी हार हुई है। 243 सीटों वाली विधानसभा में जहाँ NDA को 200 से अधिक सीटें मिलीं तो वहीं महागठबंधन 35 सीटों पर सिमट गया है। हालाँकि, 28 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने भी इस चुनाव में 5 सीटें जीती हैं। ओवैसी की सारी सीटें मुस्लिम बहुल सीमांचल इलाके में आई हैं।

इस चुनाव में AIMIM की सफलता दिखाती है कि बिहार के एक बड़े मुस्लिम वर्ग के लिए अब मजहबी पहचान पर आधारित राजनीति ही निर्णायक बनती जा रही है। मुसलमान अब ऐसे नेतृत्व की तलाश में हैं जो उनकी मजहबी पहचान के साथ और अधिक खुलकर खड़ा हो। AIMIM की राजनीति की जड़ें मजहबी पहचान में ही हैं। पार्टी खुद को एक ‘मुस्लिम प्लेटफॉर्म’ की तरह पेश करती है।

ओवैसी की इस जीत से एक बात और साफ होती है कि उन्होंने सीमांचल में दमदार ‘घुसपैठ’ कर ली है। RJD की रीढ़ माने जाने वाले MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को उन्होंने तोड़ दिया है। AIMIM के प्रदर्शन से साफ है कि ओवैसी ने RJD के मुस्लिम वोटों को अपने पाले में कर लिया है। उन्होंने अब सीमांचल में अपना एक जनाधार खड़ा कर लिया है।

हालाँकि, ये वोटर भी कब तक ओवैसी के साथ हैं, यह भी अपने आप में एक सवाल होगा क्योंकि यही वोटर बीजेपी विरोध में लंबे वक्त तक RJD के साथ खड़ा था। इन्हीं वोटरों ने अपने प्रतिनिधित्व के लिए उप-मुख्यमंत्री का पद माँगने के लिए आवाज उठानी शुरू की और RJD-कॉन्ग्रेस की तरफ से सब उन्हें यह गारंटी नहीं मिली तो वो ओवैसी की तरफ शिफ्ट हो गए। क्योंकि इन्हें जब प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो कम-से-कम एक कट्टर मजहबी पार्टी को मिल ही गई है।

आम तौर पर मुस्लिम वोटों को पैर्टन यही रहता है कि वो ऐसे दल को वोट करते हैं जिसका अपना एक तय जनाधार हो और जो उनकी नजरों में ‘सांप्रदायिक’ BJP को हरा सकता हो। जैसे उत्तर प्रदेश इसका एक उदाहरण है, यहाँ सपा के पास एक तय जातिगत वोट बैंक है तो आम तौर पर मुस्लिम उससे मिलकर BJP को हराने के लिए वोटिंग करते हैं।

बिहार में अभी ऐसे जनाधार वाला कोई दल उनको नजर नहीं है क्योंकि RJD का फिक्स माना जाने वाला यादव वोट बैंक भी उनसे छिटका-छिटका है। अगर भविष्य में कोई दल बिहार में ऐसा उभकर सामने आता है जिसका पास अपना एक जनाधार हो और जो BJP के विरोध में सरकार बनाने के लिए तैयार हो तो मुस्लिम उसके साथ भविष्य में नहीं जाएँगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। मगर अभी ओवैसी ने MY समीकरण का गणित ध्वस्त कर दिया है, यह भी पूरी तरह से सही है।

ओवैसी ने तोड़ दिया RJD का भ्रम?

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी ने कई बार कोशिश की थी कि वह किसी भी तरह महागठबंधन का हिस्सा बन जाएँ। ओवैसी ने RJD से 6 सीटों की माँग की थी और लालू यादव को दो बार खत लिखा था। लालू यादव ने इन खतों का कोई जवाब नहीं दिया।

 खुद ओवैसी ने एक रैली में इससे जुड़ी जानकारी दी है। उन्होंने कहा था, “हमने RJD से कभी भी मंत्री पद की माँग नहीं की। अगर यह दरियादिली नहीं है तो और क्या है? हमने गठबंधन के लिए हर संभव प्रयास किए। अब फैसला RJD के हाथ में है।” तब ओवैसी को कुछ हाथ नहीं लगा लेकिन अब उन्होंने तेजस्वी को हाथ मलने को मजबूर कर दिया है।

औवेसी ने जो पाँच सीटें जीतीं हैं वो सभी मुस्लिम बहुल इलाकों में हैं और उन सभी पर मुस्लिम उम्मीदवारों ने ही जीत दर्ज की है। AIMIM ने जोकीहाट, बहादुरगंज, कोचाधामन, अमौर और बायसी सीट से क्रमश मोहम्मद मुर्शिद आलम, मौहम्मद तौसीफ आलम, मौहम्मद सरवर आलम, अखतरुल ईमान, गुलाम सरवर ने जीत दर्ज की है।

एक खास बात ये भी है कि AIMIM ने ये सीटें नजदीकी मुकाबले में नहीं जीती हैं बल्कि इन पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की है। उनका सबसे कम जीत का अंतर ही 23,000 से ऊपर का है। इन सीटों पर मुस्लिम वोटों की भरमार है। इन सभी पाँचों सीटों पर मुस्लिमों की संख्या 64% से अधिक है। कोचाधामन में तो मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 72.4% है।

                              AIMIM द्वारा जीती गई सीटें और हार-जीत का अंतर (फोटो: ECI)

ओवैसी ने खुद को 5 सीटें जीतीं हैं इसके अलावा कम-से-कम 8 ऐसी सीटें भी हैं जहाँ उन्होंने महागठबंधन के उम्मीदवार को हराने में भूमिका निभाई है। यानी उन सीटों पर AIMIM के उम्मीदवार को मिले वोटों की संख्या हार-जीत के अंतर से अधिक रही है।

केवटी, शेरघाटी, प्राणपुर, कसबा, गोपालगंज और महुआ जैसी कम-से-कम 8 सीटें हैं, जहाँ AIMIM महागठबंधन की हार की वजह बनी है। RJD को जो यह भ्रम था कि मुस्लिम वोटों पर उसका एकमुश्त अधिकार है और मुस्लिम केवल उसके साथ ही जाएँगे यह भ्रम ओवैसी ने तोड़ दिया है।

मुस्लिमों वोटरों की प्राथमिकता- मजहबी पहचान और BJP विरोध

बिहार के इस चुनाव में एक बार फिर दिखा है कि मुस्लिम मतदाताओं की प्राथमिकताएँ दो मुख्य स्तंभों पर टिकती हैं। पहला है मजहबी पहचान और दूसरा है ऐसा राजनीतिक विकल्प चुनना जो BJP को प्रभावी रूप से चुनौती दे सके और उसे हराने की स्थिति में हो।

मुस्लिम समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि किसने कितनी सड़क बनाई या किसने कितनी योजनाएँ लागू कीं बल्कि यह कि कौन-सी राजनीतिक शक्ति उनकी मुस्लिम पहचान को मजबूत करने का काम करेगी। AIMIM को चुनकर एक बार फिर वही प्राथमिकता मुस्लिम वोटरों ने दिखाई है।

यही वजह है कि उनकी राजनीति में मजहबी पहचान, प्रतिनिधित्व और उनके विचार की प्रमुखता सबसे ऊपर रहती हैं। जब उन्हें लगता है कि कोई दल उनकी पहचान को सीधे तौर पर संबोधित कर रहा है या उन्हें एक मजहबी पहचान दे रहा है तो वे उसके साथ खड़े होते हैं।

दूसरा पहलू रणनीतिक वोटिंग है। मुस्लिम मतदाता अक्सर यह देखते हैं कि चुनावी मुकाबले में BJP के खिलाफ सबसे मजबूत दावेदार कौन है। यदि कोई गठबंधन या पार्टी BJP को हराने में सक्षम दिखती है, तो मुस्लिम वोट बड़ी संख्या में उसके पक्ष में एकजुट हो जाते हैं।

मुस्लिमों का यह वोटिंग पैटर्न पूरे भारत में नजर आता है। गैर-बीजेपी दलों के सत्ता में आने के बाद उन्हें मिलने वाली खुली छूट के चलते मुस्लिम BJP के खिलाफ लामबंद रहते हैं। अधिकतर गैर बीजेपी सरकारें मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति कर किसी भी तरह उन्हें अपने पाले में रखना चाहती है। इसलिए उन्हें हर काम करने की खुली छूट मिलती है।

हर चुनाव से पहले बड़ी पार्टियाँ विकास योजनाएँ, रोजगार और शिक्षा के मुद्दे गिनाती हैं लेकिन मुस्लिम मतदाता उसी विकल्प की ओर झुकते हैं जो उन्हें अपनी मजहबी पहचान की ‘सुरक्षा’ का आश्वासन देता हो। यह पैटर्न प्रदेश भर में साफ दिखाई दिया है।

जहाँ RJD या कांग्रेस मुस्लिम वोट को ‘तुष्टीकरण’ का जरिया मान रहे थे लेकिन AIMIM ने उससे आगे जाकर ‘प्रत्यक्ष नेतृत्व’ का वादा किया। इसी वजह से मुस्लिम मतदाता AIMIM को एक ऐसे विकल्प के रूप में देखने लगे हैं जो उनकी पहचान को बिना किसी समझौते के राजनीतिक रूप देता है। ओवैसी की यही ‘घुसपैठ’ कई सीटों पर इतनी गहरी हुई कि मुख्यधारा की पार्टियाँ उसका मुकाबला नहीं कर पाईं।

बिहार के मौजूदा नतीजों से यही संकेत मिलता है कि मुस्लिम वोटों में पहचान आधारित राजनीति आने वाले समय में मजबूत ही होती जाएगी। युवा मुस्लिम मतदाता सोशल मीडिया और भाषणों के जरिए ऐसे मुस्लिम नेतृत्व की ओर झुक रहे हैं जो उनकी मजहबी पहचान को खुले तौर पर प्रस्तुत करे।

चुनाव बिहार का, पर बजा रहे वक्फ-शरिया की डफली: विकास-संविधान से नहीं सरोकार, मुस्लिम वोटों का ‘ध्रुवीकरण’ ही RJD-कांग्रेस-ओवैसी का एजेंडा

    कालनेमि हिन्दू तेजस्वी मुस्लिम वोट के लिए नमाज पढ़ रहे हो क्या किसी मुस्लिम को मंदिर में पूजा करते देखा? जो अपने धर्म का नहीं हुआ किसी मजहब का नहीं हो सकता। ऐसे पाखंडियों से सतर्क रहने की जरुरत है। 
पटना के गाँधी मैदान में रविवार (29 जून 2025) को ‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ नाम से एक बड़ी रैली हुई। इस रैली का आयोजन इमारत-ए-शरिया नाम के एक मजहबी संगठन ने किया था। इसका मकसद था वक्फ संशोधन बिल 2025 का विरोध करना। इस रैली में बिहार की विपक्षी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता शामिल हुए जैसे तेजस्वी यादव, पप्पू यादव और AIMIM के अख्तरुल ईमान।

दरअसल, पटना के गाँधी मैदान में आयोजित ‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ रैली सिर्फ वक्फ बिल के खिलाफ नहीं थी, बल्कि इसके पीछे 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव की सियासत है। ये रैली थी क्या और क्यों, इसका असली मकसद क्या था और इसने बिहार की सियासत को कैसे गर्म कर दिया। चुनाव चाहे किसी राज्य का हो या आम चुनाव, विपक्ष मुस्लिम वोटों में ही सत्ता का रास्ता खोजने लगते हैं। खुद वोटों का ध्रुवीकरण बीजेपी पर साम्प्रदायिकता का आरोप लगाते हैं। विपक्ष नमाज तक पढ़ने को तैयार हो जाते हैं। अक्ल से पैदल और हरामखोरी की आदत वाले मुसलमानों को सोंचना चाहिए कि जो अपने धर्म का नहीं किसी मजहब का नहीं हो सकता। जबकि मुस्लिम वोट के पीछे अंधे होकर भागने वालों को इतिहास का ज्ञान नहीं। जयचन्द ने हिन्दू सम्राटों से गद्दारी करने पर क्या मिला? आज जयचन्द और मीर ज़फर तो क्या इनके परिवार का कोई नामलेवा तक नहीं।    

गाँधी मैदान की रैली में क्या – क्या कहा गया

रविवार को पटना के ऐतिहासिक गाँधी मैदान में हजारों लोग जमा हुए, खासकर मुस्लिम समुदाय के लोग। रैली में नेताओं ने केंद्र की बीजेपी सरकार पर जमकर हमला बोला। तेजस्वी यादव ने कहा, “ये देश किसी के बाप का नहीं है। ये हम सबका हिंदुस्तान है।” उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वो न सिर्फ वक्फ की संपत्तियों पर कब्जा करना चाहती है, बल्कि मुस्लिमों, पिछड़ों और दलितों के वोट देने के अधिकार को भी छीनने की साजिश रच रही है। तेजस्वी ने ऐलान किया कि अगर बिहार में उनकी सरकार बनी, तो वो इस वक्फ संशोधन कानून को लागू नहीं होने देंगे।

AIMIM के नेता अख्तरुल ईमान ने इस बिल को अल्पसंख्यकों के खिलाफ साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि ये कानून वक्फ बोर्ड की आजादी छीनता है और जिलाधिकारियों को ज्यादा ताकत देता है।

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान खान प्रतापगढ़ी ने शेरो-शायरी के साथ अपनी बात रखी और कहा, “ये बिल मुसलमानों को मंजूर नहीं है। ये हमारी बर्बादी का कारण बनेगा।” वहीं, निर्दलीय सांसद मगर कॉन्ग्रेस नेता पप्पू यादव ने मंच से खूब माहौल बनाने की कोशिश की।

वीआइपी पार्टी के नेता मुकेश सहनी ने कहा कि जैसे मछली को पानी चाहिए, वैसे ही मुसलमानों को वक्फ बोर्ड चाहिए। उन्होंने बीजेपी पर मुस्लिमों की विरासत लूटने का इल्जाम लगाया।

सीपीआई माले के दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि ये बिल पूरे हिंदुस्तान पर हमला है और इसे रोकने के लिए नफरत फैलाने वालों को सत्ता से हटाना होगा। राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी ने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट में इस बिल के खिलाफ फैसला उनके पक्ष में आएगा। कुल मिलाकर रैली में काफी भड़काऊ बयानबाजी हुई, जिसमें शरिया, वक्फ और मुस्लिम अधिकारों की बातें जोर-शोर से उठीं।

वक्फ बिल क्या है और विवाद क्यों?

वक्फ का मतलब है वो संपत्ति जो मुस्लिम समुदाय के मजहबी, सामाजिक या शैक्षिक कामों के लिए दी जाती है – जैसे मस्जिद, कब्रिस्तान या स्कूल। वक्फ बोर्ड इन संपत्तियों को संभालता है। केंद्र सरकार ने 2025 में वक्फ कानून में कुछ बदलाव किए, जिसे वक्फ संशोधन बिल कहा जा रहा है। सरकार का कहना है कि ये बदलाव पारदर्शिता लाने, महिलाओं को ज्यादा हिस्सेदारी देने और वक्फ संपत्तियों के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए हैं। इस बिल को बनाने से पहले संसदीय समिति, मुस्लिम संगठनों और कई लोगों से सलाह ली गई थी। सरकार कहती है कि कोई कानून थोपा नहीं गया।

लेकिन विपक्ष का कहना है कि ये बिल वक्फ बोर्ड की आजादी छीनता है और मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर हमला है। उनका इल्जाम है कि बीजेपी इस बिल के जरिए मुस्लिमों की संपत्ति पर कब्जा करना चाहती है और उनके वोट देने के हक को भी कमजोर कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में इस बिल की वैधता पर सुनवाई चल रही है और फैसला अभी तक नहीं आया है।

बिहार में इस्लामी सियासत का POWER GAME

बिहार में 2025 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से करीब 48 सीटों पर मुस्लिम वोटरों का दबदबा है। इन सीटों पर 20 से 40 फीसदी या उससे ज्यादा मुस्लिम आबादी है। बिहार में कुल 18 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो किसी भी पार्टी का खेल बना या बिगाड़ सकती है। यही वजह है कि विपक्षी पार्टियाँ जैसे आरजेडी, कॉन्ग्रेस और AIMIM इस रैली के जरिए मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने में जुट गईं।

विपक्ष बीजेपी पर सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण की सियासत करने का इल्जाम लगाता है। लेकिन इस रैली को देखकर लगता है कि खुद विपक्ष ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहा है। वक्फ जैसे मुद्दों को उठाकर ये पार्टियाँ मुस्लिम समुदाय को भड़काने और अपने पक्ष में करने की कोशिश में हैं। तेजस्वी यादव ने रैली में कहा, “हम मुस्लिम समाज के साथ हैं और उनकी लड़ाई अंतिम साँस तक लड़ेंगे।” ये बयान साफ दिखाता है कि उनका मकसद मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ खींचना है।

वक्फ के बहाने सक्रिय हुई AIMIM

पिछले यानी साल 2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने बिहार में 5 सीटें जीती थीं, खासकर सीमांचल इलाके में। सीमांचल के चार जिलों किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया में 24 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 12 पर मुस्लिम वोटर निर्णायक हैं। AIMIM की जीत ने विपक्षी गठबंधन (महागठबंधन) का खेल बिगाड़ा था, क्योंकि उनके वोट बँट गए। इस बार भी AIMIM वक्फ जैसे मुद्दों को उठाकर मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है।

इमारत-ए-शरिया और मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी

इस रैली के पीछे इमारत-ए-शरिया और इसके प्रमुख मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी का बड़ा रोल रहा। मौलाना ने वक्फ संपत्तियों की रक्षा के लिए देशभर में जागरूकता अभियान चलाया। उन्होंने 5 करोड़ ईमेल के जरिए अपनी बात सरकार तक पहुँचाई। हालाँकि वो ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) से निकाले जा चुके हैं और उनकी इस रैली को भी AIMPLB ने समर्थन नहीं दिया। AIMPLB ने साफ कहा कि वो इस मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं चाहता, इसके बावजूद इस मजहबी संगठन के मंच पर सभी विपक्षी राजनीतिक पार्टियाँ न सिर्फ मौजूद रही, बल्कि अपने-अपने अंदाज में मुस्लिमों से समर्थन भी माँग लिया।

बिहार में असली मुद्दा क्या होना चाहिए?

बिहार के चुनाव में स्थानीय मुद्दों जैसे रोजगार, उद्योग और विकास की बात होनी चाहिए। लेकिन इस रैली में सिर्फ वक्फ और मजहबी मुद्दों पर जोर रहा। विपक्षी पार्टियाँ मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए तुष्टिकरण की सियासत कर रही हैं। बीजेपी पर ध्रुवीकरण का इल्जाम लगाने वाले ये लोग खुद मजहबी आधार पर वोट माँग रहे हैं। ये रैली इसका सबूत है।
मुस्लिम समुदाय में भी कई सवाल हैं। जैसे, वक्फ बोर्ड की अरबों की संपत्ति का फायदा आम मुसलमान को क्यों नहीं मिलता? शिया और सुन्नी बोर्ड अलग-अलग क्यों हैं? गाँधी संग्रहालय के संयुक्त सचिव और मुस्लिम स्कॉलर आसिफ वासी कहते हैं, “वक्फ बिल का ज्यादा असर नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिम वोट 18 पार्टियों में बँटा हुआ है। 18 फीसदी मुस्लिम वोट हैं, तो 78 फीसदी गैर-मुस्लिम वोट भी हैं।” उनका कहना है कि वक्फ बोर्ड की संपत्ति से आम मुसलमान को आज तक कोई खास फायदा नहीं हुआ।

वक्फ रैली पर बीजेपी और जेडीयू की प्रतिक्रिया रही तीखी

पटना की इस रैली पर बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने इसे तुष्टिकरण की पराकाष्ठा और लोकतांत्रिक परंपराओं को चुनौती देने वाला कदम बताया। सिन्हा ने कहा कि वक्फ संशोधन बिल संसद की माँग और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर पारित हुआ है। इसका मकसद वक्फ संपत्तियों में पारदर्शिता लाना और उनके गलत इस्तेमाल को रोकना है। उन्होंने साफ किया कि इस कानून में मजहबी स्वतंत्रता पर कोई आँच नहीं आती। गैर-मुस्लिम सदस्यों की भूमिका सिर्फ प्रशासनिक होगी, न कि मजहबी।
सिन्हा ने राजद-कॉन्ग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि ये पार्टियाँ वोटबैंक की सियासत के लिए भ्रम और अराजकता फैलाना चाहती हैं। उन्होंने 2013 के वक्फ कानून का जिक्र किया, जब रातोंरात दिल्ली की 120 से ज्यादा वीवीआईपी संपत्तियाँ वक्फ को सौंप दी गई थीं। सिन्हा ने कहा कि अब ऐसी मिलीभगत की संस्कृति नहीं चलेगी।
बिहार बीजेपी ने इस रैली में तेजस्वी यादव के बयान पर सीधा निशाना साधा। बिहार बीजेपी ने लिखा, “तेजस्वी यादव की गाँधी मैदान रैली का असली एजेंडा अब सामने आ गया है। मंच से अब बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान की नहीं, बल्कि शरीया और शरीयत की बातें हो रही हैं। क्या तेजस्वी और राहुल गाँधी बिहार को संविधान नहीं, शरीयत से चलाना चाहते हैं? देश को बाँटने वाली इस खतरनाक राजनीति का जवाब जनता 2025 में देगी। बिहार बाबा साहब के संविधान से चलेगा, शरीयत से नहीं।”
बिहार के मंत्री जमा खान ने विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि तेजस्वी मुख्यमंत्री बनने की जल्दबाजी में कुछ भी बोल रहे हैं, बिना ये सोचे कि उनकी बातें समाज में सौहार्द बिगाड़ सकती हैं। खान ने कहा कि विपक्ष खासकर राजद और कॉन्ग्रेस मुस्लिम समुदाय को बहकाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बिहार की जनता नीतीश कुमार पर भरोसा करती है। जमा खान ने रैली को सियासी मंच बताते हुए कहा कि ये सिर्फ भावनाओं को भड़काने की कोशिश थी, लेकिन 2025 में एनडीए फिर से सरकार बनाएगी, क्योंकि जनता सच्चाई जानती है।

लालू और नीतीश में मुस्लिम वोटर किसके साथ?

बिहार में वक्फ बिल का मुद्दा इसलिए भी गर्म है, क्योंकि यहाँ 18 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो चुनाव में बड़ा रोल अदा करती है। इस मुद्दे पर दो बड़े नेता लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की साख दाँव पर है। लालू की पार्टी राजद हमेशा से मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण के सहारे सियासत करती रही है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार अपनी ‘सेकुलर’ छवि और सभी समाज के लिए काम करने के लिए जाने जाते हैं, इसलिए बिहार में मुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग हमेशा उनके समर्थन में रहा है।
90 के दशक में लालू और नीतीश एक साथ थे और दोनों को सेकुलर माना जाता था। लेकिन 2005 में नीतीश ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई और अपनी अलग पहचान बनाई। उस वक्त मुस्लिम वोटरों ने उनका साथ दिया। 2005 में जेडीयू के 4 मुस्लिम विधायक जीते, 2010 में 7, और 2015 में 5। लेकिन 2020 के चुनाव में नीतीश का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीता, जो दिखाता है कि मुस्लिम वोटरों में उनकी लोकप्रियता घटी है। वक्फ बिल पर जेडीयू के समर्थन ने इस नाराजगी को और बढ़ाया है।

सीमांचल का सियासी समीकरण

सीमांचल के चार जिले किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया मुस्लिम बहुल हैं। यहाँ की 24 विधानसभा सीटों में से 12 पर मुस्लिम वोटर हार-जीत तय करते हैं। 2020 में एनडीए ने 11 सीटें जीतीं, महागठबंधन को 8 मिलीं और AIMIM ने 5 सीटें हासिल कीं। अब वक्फ संसोधन कानून के बहाने इस बार राजद और AIMIM इसी वोटबैंक पर नजर जमाए बैठे हुए हैं।
‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ रैली ने बिहार की सियासत में हलचल मचा दी। ये रैली दिखाती है कि राजद, कॉन्ग्रेस और AIMIM जैसी विपक्षी पार्टियां मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए तुष्टिकरण की सियासत कर रही हैं। ऐसे में सवाल ये है कि क्या ये पार्टियाँ वाकई मुस्लिम समुदाय की भलाई चाहती हैं या सिर्फ वोटबैंक की सियासत कर रही हैं? बिहार के 18 फीसदी मुस्लिम वोटर इस चुनाव में किसके साथ जाएँगे, ये वक्त बताएगा। लेकिन इतना साफ है कि इस रैली ने बिहार के चुनाव को मजहबी रंग दे दिया है। रोजगार, विकास और शिक्षा जैसे मुद्दों की जगह वक्फ जैसे मुद्दों ने सियासत को गर्म कर दिया है और ये देखना बाकी है कि इसका असर चुनाव में कैसे दिखेगा।

पाकिस्तान की जेल में रहकर आतंकी बन जाता है अब्बा… शशि थरूर के बाद अब ओवैसी वाले डेलिगेशन ने विदेश में आतंकी मुल्क का सच दुनिया को बताया, FATF से कहा- इन्हें ग्रे लिस्ट में डालो

पाकिस्तान के विरुद्ध आतंकवाद को लेकर चल रहे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस के शशि थरूर, आनंद शर्मा और मनीष तिवारी की है। ओवैसी का विरोधी होने के बावजूद इस प्रकरण में उनकी प्रशंसा करता हूँ। उनका कहना कि लड़ाई मोदी से हो या बीजेपी सरकार से ये तो चलती रहेगी, लेकिन जब बात देश की हो सबको एकजुट होना चाहिए। लेकिन राहुल और इसके पिछलग्गू विपक्ष को इन लोगों से सीखना चाहिए, परन्तु ये वही बोली बोल रहे है जो दुश्मन मुल्क पाकिस्तान चाहता है।   
हैदराबाद के सांसद और AIMIM प्रमुख AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अल्जीरिया में पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को बेनकाब किया। असदुद्दीन ओवैसी ने शनिवार (31 मई 2025) को आतंकवादी जकीउर रहमान लखवी का उदाहरण दिया, जो पाकिस्तान की जेल में रहते हुए बेटे का अब्बू बना।

ओवैसी के इस बयान को हलके में लेना महामूर्खता होगी। जेल में रहते आतंकवादी का अब्बा बनना बहुत कुछ जाहिर कर रहा है। ओवैसी के इस बयान से जाहिर है कि पाकिस्तान सरकार और फ़ौज के संरक्षण में पल रहे आतंकियों की औरतें तक सुरक्षित नहीं। जो चाहे किसी भी आतंकवादी के घर की किसी भी औरत का जब चाहे कुछ भी कर सकता है। 

ओवैसी ने कहा कि दुनिया का कोई देश आतंकवादियों को ऐसी छूट नहीं देता, लेकिन पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देता है। उन्होंने भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ की सफलता का जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तान को फिर से FATF की ग्रे लिस्ट में डालना जरूरी है, ताकि आतंकवादी घटनाएँ कम हों।

ओवैसी सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल के साथ अल्जीरिया में हैं, जो दुनिया भर में पाकिस्तान की आतंकवाद-समर्थक नीतियों को उजागर कर रहा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की रणनीति दक्षिण एशिया में अस्थिरता पैदा करती है। ओवैसी ने पाकिस्तान को ‘भिखमंगा देश’ करार देते हुए उसके आतंकवाद में संलिप्तता पर सवाल उठाए।

ताहिर को जमानत देने का मतलब होगा कोर्ट द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से अपराधों को संरक्षण ; ताहिर ने हिंदू विरोधी दंगों के लिए दिया था पैसा: दिल्ली पुलिस ने हाई कोर्ट में बताया ‘मास्टरमाइंड’, विधानसभा चुनावों के लिए जमानत माँग रहा है AIMIM का प्रत्याशी


दिल्ली दंगों के सरगना ताहिर हुसैन ने विधानसभा चुनावों में AIMIM के उम्मीदवार के रूप में नामांकन करने के लिए हाई कोर्ट से अंतरिम जमानत की माँग की है। दिल्ली पुलिस ने मंगलवार (14 मंगलवार) को ताहिर हुसैन की इस माँग का दिल्ली हाई कोर्ट में विरोध किया। इसके बाद जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने फैसले को सुरक्षित रख लिया। वह अपने चैंबर में फैसला सुनाएँगी।
अगर कोर्ट इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या के आरोपी को जमानत देती है तो उससे पहले निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पर ताला लगा देना चाहिए। क्योकि अदालत इंसाफ के लिए नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से दंगाई और कातिलों को संरक्षण देने का सबूत दे देगी। जो दंगाई पार्षद रहते हिन्दू विरोधी दंगा करवा सकता है विधायक बनने के बाद क्या करेगा, इस पर कोर्ट को सोंचना चाहिए? अगर कोर्ट इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या के आरोपी को विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए जमानत देती है और इस आरोपी को मिलने वाला एक-एक वोट जेहादी का होगा, किसी देशप्रेमी का नहीं।    

ताहिर हुसैन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रिबेका जॉन पेश हुईं और उन्होंने नामांकन दाखिल करने से लेकर चुनाव प्रचार तक के लिए 16 जनवरी से 9 फरवरी तक अंतरिम जमानत की माँग की। वहीं, दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश हुए एडीशनल सॉलीसिटर ऑफ इंडिया (ASG) चेतन शर्मा और SPP रजत नायर ने इस बेल का विरोध किया। नायर ने कहा कि ताहिर हुसैन समाज के लिए खतरा हैं।

शर्मा ने कहा कि नामांकन, स्क्रूटनी और बैंक अकाउंट खोलने के लिए हिरासती परोल दी जा सकती है। हालाँकि, उन्होंने चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत देने का सख्त विरोध किया। ASG ने कहा कि ताहिर हुसैन ने वीभत्स काम किया है। उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि नामांकन किया जा सकता है, लेकिन चुनाव प्रचार के लिए जमानत नहीं दी जानी चाहिए।

शर्मा ने तर्क दिया कि ट्रायल अपने अंतिम चरण है। चुनाव प्रचार के दौरान ताहिर हुसैन इस दौरान गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में चार गवाह पहले ही पलट चुके हैं। शर्मा ने आगे कहा कि ताहिर हुसैन दंगों का मुख्य साजिशकर्ता, सरगना और फंडिंग करना वाला है। वह UAPA और PMLA सहित तीन मामलों में जेल में हैं।

ASG शर्मा ने कहा, “यूएपीए और ईडी मामलों में जेल नियम है और जमानत अपवाद है। यहाँ हम इस तथ्य के बावजूद हिरासत पैरोल के लिए तैयार हैं कि चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं है। हम मान रहे हैं कि नामांकन दाखिल करने में उनकी सुविधा के लिए हिरासत पैरोल दी जानी चाहिए। दूसरों की तरह वह भी चुनाव लड़ सकते हैं। वे भी जीते हैं। लोग जेल में बैठकर जीते हैं।”

वहीं, ताहिर हुसैन की ओर से रिबेका जॉन ने कहा कि PMLA मामले में वह हिरासत की आधी से ज़्यादा अवधि काट चुके हैं और उन्हें अभी तक दोषी भी नहीं ठहराया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि ताहिर हुसैन को 11 एफ़आईआर में बरी किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव प्रचार करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

दरअसल, दिल्ली दंगों के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में हाईकोर्ट के समक्ष अंतरिम जमानत याचिका दायर की गई है। अंकित शर्मा की हत्या करने के बाद उनके शव को नाले में फेंक दिया गया था। बता दें कि इससे पहले 3 दिसंबर को ट्रायल कोर्ट ने ताहिर हुसैन को जमानत देने से इनकार कर दिया था।

दिल्ली दंगों में IB अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या का आरोपी ताहिर हुसैन AIMIM से टिकट पाकर पहुँचा हाईकोर्ट, ‘विधायकी का चुनाव लड़ना है, जमानत दे दो’

असदुद्दीन ओवैसी को दिल्ली में चुनाव लड़ने के लिए हिन्दू दंगों के आरोपी मिलने से स्पष्ट हो गया है कि AIMIM सिर्फ मुसलमानों के लिए है इसे न हिन्दुओं की चिंता और न ही संविधान की। अपने आपको बैरिस्टर कहने वाले को क्या कानून नहीं मालूम? पूछो इस बैरिस्टर से कि एक कातिल और हिन्दू विरोधी दंगे के आरोपी को टिकट क्यों दिया? जो भी, चाहे वह किसी भी धर्म या मजहब से ताल्लुक रखता हो, दिल्ली या दिल्ली से बाहर AIMIM को वोट देता है उसे दोगला कहने में कोई हिचक नहीं। तेलंगाना में भी केवल मुस्लिम इलाके या जहाँ मुसलमान आबादी हिन्दुओं से ज्यादा हो वहां से AIMIM अपना उम्मीदवार उतारती है। हिन्दुओं को बाटने के लिए दलित हितों की बात करता है। लेकिन मुसलमानों में हिन्दुओं से ज्यादा जातियां है और इतनी दुश्मनाई है कि एक दूसरे की मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सकते, दूसरे के कब्रिस्तान में मुर्दा दफ़न नहीं कर सकते।   

दिल्ली में फरवरी 2020 के हिंदू विरोधी दंगों के मामले में जेल में बंद आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन ने अंतरिम जमानत माँगी है। ताहिर हुसैन अब एआईएमआईएम में शामिल हो चुका है, उसे दिल्ली विधानसभा चुनाव में मुस्तफाबाद सीट से AIMIM ने टिकट दिया है। इसके बाद उसने चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में अंतरिम जमानत की याचिका दायर की है। ताहिर हुसैन ने याचिका में 14 जनवरी से 9 फरवरी 2024 तक का समय माँगा है, ताकि वो चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा ले सके।

याचिका पर सुनवाई पहले जस्टिस अमित शर्मा के सामने होनी थी, लेकिन उन्होंने खुद को मामले से अलग कर लिया। इसके बाद इसे जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की अदालत में भेजा गया, लेकिन सुनवाई नहीं हो सकी। अब यह मामला 13 जनवरी को सुना जाएगा।

अरविंद केजरीवाल के मामले का दिया हवाला

ताहिर हुसैन की दलील है कि वह चार साल नौ महीने से जेल में हैं और अब तक मुकदमे में अभियोजन पक्ष के केवल 20 गवाहों की गवाही हुई है, जबकि कुल गवाहों की संख्या 114 है। उनका तर्क है कि मुकदमे के लंबा खिंचने के कारण उन्हें अंतरिम जमानत दी जाए ताकि वह चुनाव प्रचार कर सकें। हुसैन ने याचिका में यह भी कहा कि चुनाव प्रचार प्रक्रिया का हिस्सा बनना उनके लिए जरूरी है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला दिया, जिसमें AAP नेता अरविंद केजरीवाल को 2024 के लोकसभा चुनाव में हिस्सा लेने के लिए जमानत दी गई थी।
हुसैन पर दिल्ली दंगों के समय खुफिया ब्यूरो (IB) अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या का आरोप है। 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान शर्मा का शव खजूरी खास नाले से बरामद हुआ था, जिनके शरीर पर 51 चोटों के निशान पाए गए थे। उनके पिता रविंदर कुमार ने पुलिस को बताया था कि उनका बेटा 25 फरवरी 2020 से लापता था। अगली सुबह उनका शव खजूरी खास नाले से बरामद हुआ। शर्मा के शरीर पर कई चोटों के निशान मिले, जो उनके साथ हुई क्रूरता को दर्शाते हैं। इस मामले के साथ ही हुसैन पर कई अन्य आरोप भी हैं।
जानकारि के मुताबिक, हुसैन ने अब तक अपने खिलाफ दर्ज 12 मामलों में से 8 में जमानत हासिल की है। हालाँकि, वह अभी भी 3 मामलों में हिरासत में हैं, जिनमें प्रवर्तन निदेशालय (ED) का एक मनी लॉन्ड्रिंग मामला और दिल्ली दंगों से संबंधित बड़ी साजिश का मामला शामिल है।

 

उत्तर प्रदेश : जिस सीट पर 64% मुस्लिम, वहाँ BJP के ‘रामवीर’ ने सबकी करवा दी जमानत जब्त; नोमानी की बीजेपी को वोट देने वालों का बहिष्कार करने की धमकी भी औंधे मुंह गिरी

                                                                    ठाकुर रामवीर सिंह 
महाराष्ट्र में भाजपा की अगुवाई वाली महायुति गठबंधन के प्रचंड जीत के बीच, अगर किसी विधानसभा सीट की सबसे अधिक चर्चा हो रही है तो वह है उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले की कुंदरकी सीट। उत्तर प्रदेश के जिन सात सीटों पर उपचुनाव थे, उनमें से एक सीट यह भी थी। इस सीट की खासियत ये है कि यह मुस्लिम बहुल इलाका है और यहाँ एक हिंदू क्षत्रिय ने चुनाव जीता है। इस सीट की एक और खासियत है। इस सीट पर या सहसपुर का क्षत्रिय राजपरिवार चुनाव जीता है या फिर मुस्लिमों की तुर्क जाति।

इस बार ठाकुर रामवीर सिंह ने यहाँ जीत का परचम लहराकर भाजपा की 31 साल के वनवास को दूर किया है। इस सीट की खास बात ये है कि यहाँ पर मुस्लिमों की आबादी लगभग 64 प्रतिशत है। वहीं, 36 प्रतिशत में अन्य लोग हैं। मुस्लिमों की इतनी अधिक आबादी होने के बाद ठाकुर रामवीर सिंह को कुल 1,70,371 वोट मिले। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद रिजवान को 1,44,791 वोटों से हराया है। रिजवान को सिर्फ 25,580 वोट ही मिले।

कुंदरकी सीट पर अगर कुल विरोधियों को मिले मत को भी जोड़ दिया जाए तो वो ठाकुर रामवीर सिंह की जीत वाले मत से आधे भी नहीं हैं। यहाँ कुल 11 मुस्लिम उम्मीदवार खड़े थे। इनके बीच अकेले ठाुकर रामवीर सिंह हिंदू उम्मीदवार थे। अगर इन सभी मुस्लिम उम्मीदवारों के वोट को जोड़ भी दिया जाए तो भी वे 50 हजार के आँकड़े को पूरा नहीं कर पाते। यहाँ तीसरे नंबर पर चंद्रशेखर आजाद की पार्टी आजाद समाज पार्टी के चाँद बाबू थे, जिन्हें 14,201 वोट मिले।

चौथे स्थान पर AIMIM के मोहम्मद वारिस को कुल 8,111 मत मिले। बाकी उम्मीदवार चार दहाई का अंक भी नहीं छू पाए। हाँ, बसपा के रहफतुल्लाह को जरूर 1,099 मत मिले। बाकी लोग तीन अंकों में ही सिमट कर रह गए। अब सवाल ये है कि मुस्लिम बहुल इस सीट पर एक हिंदू उम्मीदवार कैसे जीता, वह भी लगभग डेढ़ लाख वोटों के अंतर से। इसके पीछे ठाकुर रामवीर सिंह की हर समाज में स्वीकार्यता एवं विश्वसनीयता और जातीय समीकरण प्रमुख कारण रहा।

अगर कुंदरकी सीट के इतिहास पर नजर डाले तो यहाँ रहे 13 विधायकों (वर्तमान उपचुनाव को छोड़कर) में 9 तुर्क मुस्लिम विधायक चुने गए। बाकी के चार विधायक सहसपुर बिलारी राजघराने के क्षत्रिय रहे हैं। अगर ठाकुर रामवीर सिंह को छोड़ दें तो इन लोगों के अलावा कुंदरकी सीट से कोई विधायक नहीं बना है। इस सीट पर तुर्क मुस्लिमों का वर्चस्व है। जब भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व की बात आती है तो उसका प्रतिनिधित्व सिर्फ तुर्क मुस्लिम ही करते हैं, दूसरी मुस्लिम जातियों के नहीं।

साल 1974 में सहसपुर राजपरिवार की महारानी इंद्रमोहिनी सिंह यहाँ से चुनाव जीती थीं। साल 1985 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर महारानी इंद्रमोहिनी की बेटी राजकुमारी रीना कुमारी यहाँ से विधायक बनीं। साल 1989 में जनता दल के टिकट पर और साल 1993 में भाजपा के टिकट पर महारानी इंद्रमोहिनी के बेटे महाराजा चंद्रविजय सिंह यहाँ से विधायक बने। इन सभी चुनावों में राजपरिवार ने तुर्क मुस्लिमों को हराया था। बाकी के चुनावों तुर्क मुस्लिम के उम्मीदवार ही जीते।

इस सीट से हाजी अकबर हुसैन जनता पार्टी से साल 1977 में, राजनारायण की पार्टी से साल 1980 में, जनता दल से साल 1991 में और बसपा से साल 1996 एवं 2007 में विधायक बने। अकबर तुर्क जाति से ताल्लुक रखते थे। इसके बाद समाजवादी पार्टी के टिकट पर यहाँ से हाजी मोहम्मद रिजवान साल 2002, साल 2012 और साल 2017 में इस सीट से विधायक बने। ये भी मुस्लिमों की तुर्क जाति से हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में यहाँ से तुर्क नेता जियाउर्रहमान बर्क जीते।

अगर यहाँ के जातीय समीकरणों की बात करें तो कुंदरकी सीट पर मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 3.84 लाख है। इनमें मुस्लिम वोटरों की संख्या 2.45 लाख है। वहीं, हिंदू वोटरों की संख्या 1.39 लाख है। मुस्लिमों की 2.45 आबादी में 70 हजार तुर्क मुस्लिम हैं। बाकी 1.75 लाख वैसे मुस्लिम हैं, जो हिंदू से धर्मांतरित हुए हैं। इनमें सबसे अधिक 45 हजार राजपूत मुस्लिमों की संख्या है। ऐसे में यहाँ मसला तुर्क मुस्लिम बनाम राजपूत मुस्लिम का था। इसमें राजपूत मुस्लिमों को एक राजपूत नेता का साथ मिल गया और वह आसानी से जीत गया।

भाजपा ने इसी समीकरण को ध्यान में रखकर ठाकुर रामवीर सिंह को टिकट दिया था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ‘बँटेंगे तो कटेंगे’ का नारा पूरे देश में गूँज रहा था, तब भी यहाँ सर्वसमाज की बात हो रही थी। ठाकुर रामवीर सिंह राजपूत मुस्लिमों को अपने पालेे में मिलाने में दिन-रात एक कर दी। वे लोगों के साथ गली-गली मुहल्ले-मुहल्ले घूमे। उन्होंने विश्वास दिलाने के लिए नमाजी टोपी और अरबी गमछा तक लिया। इस तरह उन्होंने राजपूत मुस्लिमों में विश्वास दिलाया कि वे उनके लिए सदैव खड़े रहेंगे।

राजपूत मुस्लिम समाज से आने वाले उत्तर प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बासित अली गाँव-गाँव में बैठकें कीं। उन्होंने नारा दिया- ‘न दूरी है न खाई है, ठाकुर रामवीर सिंह हमारे भाई हैं’। इस नारे का असर भी दिखा और हिंदू समुदाय के साथ-साथ राजपूत मुस्लिमों ने भी ठाकुर रामवीर सिंह के पक्ष में एकतरफा वोटिंग की, जिसका सुखद परिणाम आज 31 साल बाद भाजपा को देखने को मिला।

जातीय समीकरण के अलावा, ठाकुर रामवीर सिंह की छवि ने भी उनकी जीत में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे लगातार दो बार से भाजपा उम्मीदवार के रूप में हार का मुँह देखा है। उन्होंने तीसरी बार में आखिरकार जीत दर्ज की है। जब वे विधायक निर्वाचित नहीं हुए थे, तब वे लोगों की समस्याओं का समाधान निकालने के लिए आगे रहते थे। लोगों के लिए सड़कें, गलियाँ आदि बनवाते थे। किसी तरह की मदद माँगने वाले कोई भी लोग उनके यहाँ से खाली हाथ नहीं जाते थे।

ठाकुर रामवीर सिंह की सहज उपलब्धता और तुर्क बनाम राजपूत मुस्लिम के समीकरण ने इस जीत में बड़ी भूमिका अता की है। यह समीकरण अब भाजपा के लिए बेहद सफल और महत्वपूर्ण हो गया है। बोहरा, पसमांदा और मुस्लिम महिलाओं के एक गुट को अपनी तरफ मिलाने के बाद भाजपा और आरएसएस हिंदू से धर्मांतरित हुए मुस्लिमों को अपनी तरफ मिलाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। देश में मुस्लिम आबादी का सर्वाधिक संख्या धर्मांतरित है। इनमें भी क्षत्रिय समाज की आबादी सबसे अधिक है।

राजपूत मुस्लिम वो लोग हैं, जिन्होंने मजबूरी वश इस्लाम अपना लिया। हालाँकि, अधिकांश लोग अपनी पुरानी पहचान से आज भी जुड़े हैं। वहीं, तुर्क मुस्लिम वो हैं, जिनके पूर्वज आक्रमणकारियों के साथ तुर्की, अरब आदि जगहों से उनके सेवक या सैनिक के रूप में यहाँ आए थे। देश में ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, दलित, पिछड़े, क्षत्रिय आदि लोगों के मुस्लिम मत में धर्मांतरण का बड़ा हिस्सा आज भी मौजूद है, जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक में दिख जाता है। तुर्क, शेख या सैयद मुस्लिमों की संख्या बेहद कम है।

अब भाजपा एवं संघ इस समीकरण को पूरे देश में लागू करेगी। संघ के वरिष्ठ नेता ने बताया कि इस समीकरण पर संघ का ध्यान तब गया, जब इस साल लोकसभा चुनावों के दौरान क्षत्रिय समाज अपने राजा-महाराजाओं के अपमान के विरोध में आंदोलन कर रहा था। उस दौरान धर्मांतरित हुए क्षत्रिय समाज के मुस्लिम उनका पूरा सहयोग कर रहे थे। इनमें राजस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार तक राजपूत मुस्लिम शामिल थे। वे इस विरोध में क्षत्रिय समाज के साथ कदम से कदम मिलाया। उस नेता का कहना था कि इस नए समीकरण ने भाजपा को रणनीतिक राह दिखाई।

इस सहयोग ने कॉन्ग्रेस के इमरान मसूद को सहारनपुर से लोकसभा सीट जीतने में मदद की थी। इसी समीकरण को ध्यान में रखते हुए सीसामऊ उपचुनाव में नसीम सोलंकी भी जीती हैं। वे पूरे चुनाव मंदिर गई हैं और लोगों को बार-बार याद दिलाया कि उनके पूर्वज हिंदू थे और क्षत्रिय मसाज से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने अपनी मुस्लिम पहचान के बावजूद राजपूत मुस्लिम पहचान को उजागर किया और आखिरकार जीतने में कामयाब रहीं। अब देखना है कि अब नया राजनीतिक समीकरण इस देश में किस तरह का बदलाव लाता है।

कर्नाटक : इस्लामी कट्टरपंथियों की जिस हिंसा में घायल हुए 12 पुलिसकर्मी, अस्पताल और मंदिर पर किया था हमला उस केस को वापस क्यों वापस ले रही कांग्रेस सरकार? क्या कांग्रेस वास्तव में हिन्दू विरोधी है?


कर्नाटक में 2022 में हुए हुबली हिंसा के मामले को कांग्रेस सरकार ने वापस लेने का निर्णय लिया है। इस मामले में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लीमीन के नेता समेत कई लोग आरोपित बनाए गए थे। उनके ऊपर इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ इकट्ठा करके हुबली पुलिस थाने पर धावा बोलने और पुलिसकर्मियों पर हमला करने का आरोप था। उस हिंसा के दौरान न केवल पुलिस स्टेशन और पुलिस वाहनों पर पथराव किया गया था, बल्कि पास के एक हनुमान मंदिर और अस्पताल को भी निशाना बनाया गया था, जिससे काफी नुकसान हुआ था। इसके अलावा इस हिंसा में 12 पुलिसकर्मी घायल हुए थे।

घटना 16 अप्रैल 2022 को हुई थी। भीड़ काबू होने के बाद पुलिस ने इस केस को दर्ज किया था। हालाँकि बाद में राज्य में कांग्रेस सरकार आई और इस केस को वापस लेने के लिए डिप्टी चीफ मिनिस्टर डीके शिवकुमार ने एक पत्र लिखा। ये पत्र अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक को 4 अक्टूबर 2023 को लिखा गया था। इसमें उप मुख्यमंत्री ने आग्रह किया था कि केस वापस ले लिया जाए रिपोर्ट्स बताती हैं कि उसी अनुरोध के बाद राज्य के गृह विभाग को वो पत्र भेजा गया और निर्णय को मंजूरी दी गई।

कर्नाटक में साल 2022 में हनुमान जयंती के बाद हुबली में एक सोशल मीडिया पर बवाल हुआ था। इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने सड़कों पर उतरकर पुलिस को निशाना बनाया था और सड़कों पर उपद्रव किया था। बाद में इस मामले में पुलिस ने 100+ से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया था। जाँच में सामने आया था कि भीड़ को उकसाने में एआईएमआईएम नेता मौलाना वसीम शामिल था। उसी ने दरगाह पर उन्मादी भाषण दिया था और पुलिस स्टेशन के बाहर भी भीड़ के साथ वही था। उसके अलावा इस केस में हुबली-धारवाड़ नगर निगम पार्षद नजीर अहमद को कर्नाटक पुलिस ने पकड़ा था। वह भी AIMIM पार्टी नेता था जिसके तार 16 अप्रैल 2022 को पुलिस थाने पर हुई पत्थरबाजी से जुड़े मिले थे।

भारत माता की जय बोलने से परहेज लेकिन संसद में ‘जय फिलिस्तीन’ बोलने से परहेज नहीं, वाह दोगले ओवैसी


असदुद्दीन ओवैसी द्वारा शपथ लेते समय ‘जय फिलिस्तीन’ बोलने पर अब तक कोई कार्यवाही न होना भारत के लचर कानून हैं, अगर यही काम किसी विदेश में हुआ होता उस सदस्य को शायद तुरंत निलंबित कर दिया होता। यहाँ 'पाकिस्तान जिंदाबाद' नारे लगाने, 'सिर तन से जुदा' और खुलेआम सनातन और रामायण का अपमान करने वालों पर ढुलमुल नीति अपनाने आदि,  लेकिन इस्लाम या ईसाई मजहब के खिलाफ जरा-सा भी बोलने पर कानून एकदम हरकत में आ जाता है, क्या ऐसे कानून को बदलने की जरुरत नहीं? अगर ऐसे कानूनों को बदलने में विपक्ष संसद में हंगामा करता है, उसकी परवाह किए बिना सख्त कानून बनाने चाहिए। 
भारत के जिन नेताओं और पार्टियों को देशभक्त और जनहितैषी बताया जाता है, सबसे बड़े नाकारा है। देश को बताएं कि विश्व में कौन-सा देश रोहिंग्या, घुसपैठियों और फिलिस्तीनों को अपने देश में रखने को तैयार है? लेकिन हमारे कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियां इनको अपना वोट बैंक मान संरक्षण देते हैं। क्या यह संविधान का खुलेआम मजाक नहीं? बात करते फिरते हैं संविधान की। क्या संविधान ऐसे लोगों को संरक्षण   
हैदराबाद से लोकसभा सांसद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने सांसद के रूप में शपथ लेने के दौरान फिलिस्तीन के समर्थन में नारा लगाया। संसद में ओवैसी के नारे के बाद हंगामा हो गया जिसके बाद इस मुद्दे पर विवाद बढ़ गया है। उनकी संसद सदस्यता रद्द किए जाने की मांग जोर पकड़ रही है। इस बीच वकील हरिशंकर जैन ने संसद सदस्यता खत्म करने को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से शिकायत की है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस ओवैसी ने कभी कहा था कि चाहे जो कर लो, भारत माता की जय नहीं बोलूंगा। उसी ओवैसी ने भारत की संसद में सांसद की शपथ लेते हुए “जय फिलिस्तीन” का नारा लगाया। भारत माता से परहेज, तो फिलिस्तीन की जय से क्या संदेश देना चाहते हैं ओवैसी? सवाल यह भी उठता है कि क्या ओवैसी गाजा से सांसद हैं? विवाद बढ़ने के बाद ओवैसी ने सफाई दी है। ओवैसी ने कहा कि उन्होंने सदन में कुछ भी गलत नहीं कहा। इससे इनकी मंशा समझी जा सकती है। 

एनडीए सांसदों ने जताया कड़ा विरोध
ओवैसी के नारा लगाते ही एनडीए सांसदों ने कड़ा विरोध जताया, इसके बाद चेयर पर बैठे राधा मोहन सिंह ने उसे रिकॉर्ड से निकालने का आदेश दे दिया। तब जाकर सदन में शांति हुई। बीजेपी ने ओवैसी के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मौजूदा नियमों के अनुसार उन्हें संसद से अयोग्य ठहराए जाने का आधार है। बीजेपी ने अनुच्छेद 102 का हवाला देते हुए कहा कि ओवैसी को सदस्यता से अयोग्य ठहराया जा सकता है।

भारत माता की जय नहीं बोलेंगेः ओवैसी
ये वही ओवैसी हैं जिन्हें ‘जय फिलिस्तीन’ कहने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन ‘भारत माता की जय’ बोलने में आपत्ति है। असदुद्दीन ओवैसी इससे पहले भी अपने कई बयानों को लेकर विवादों में रहे हैं। कभी उन्होंने भारत माता की जय बोलने से इनकार किया तो कभी भाजपा-आरएसएस को लेकर विवादित बयान दिया। कुछ साल पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि नई पीढ़ी को भारत की शान में नारे लगाने का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। जिसके जवाब में असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि वो कभी ‘भारत माता की जय नहीं बोलेंगे भले भी उनकी गर्दन पर कोई छुरी क्यों न रख दे’। ओवैसी एक बार यह भी कह चुके हैं कि इस्लाम ही सभी लोगों का घर है। अगर दूसरे धर्म के लोग इस्लाम अपनाते हैं तो यह उनके लिए घर वापसी जैसा होगा। हर बच्चा मुस्लिम होकर ही जन्म लेता है।      

ओवैसी जैसे लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं
ओवैसी ने देश की संसद में फिलिस्तीन का जयकारा लगाकर अपनी वफादारी स्पष्ट कर दी है। ओवैसी, जिस देश का नमक खा रहे हैं, जिस देश की संसद में खड़े हैं, उसके लिए मुंह से एक जयकारा तक नहीं निकल सकता। ये वही लोग हैं जो जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। ओवैसी जैसे लोग अपने समाज और देश के नाम पर कलंक समान हैं।

क्या ओवैसी गाजा से सांसद हैं?
क्या ओवैसी गाजा से सांसद हैं? जो “जय हिंद” कहने की बजाय “जय फिलिस्तीन” कहा। राहुल गांधी और अखिलेश यादव क्यों चुप हैं। हमेशा संविधान बचाने का नारा लगाने वाला विपक्ष अब चुप क्यों है। विपक्ष को भी इस पर स्पष्टीकरण देना चाहिए। हमेशा संविधान की किताब लेकर चलने वाले राहुल गांधी को बताना चाहिए कि जय फिलिस्तीन कहना क्या संविधान का अपमान नहीं है।

विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करने पर अयोग्य ठहाराया जा सकता है
संसद के मौजूदा नियमों के अनुसार, किसी भी सदन के सदस्य को किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करने पर, उसकी लोकसभा या किसी भी सदन की सदस्यता से अयोग्य ठहराया जा सकता है। एक्‍सपर्ट के मुताबिक या तो उन्‍हें फ‍िर शपथ लेने को कहा जा सकता है, या फ‍िर वे अयोग्‍य ठहराए जाएंगे।

संसद में दूसरे देश की तारीफ करना किस मानसिकता का परिचायक
केंद्रीय मंत्री अजय टम्टा ने कहा, ”संवैधानिक प्रक्रिया के मुताबिक, एक सांसद उतना ही पढ़ेगा, जितना उसे कहा जाएगा। हमने इसका विरोध किया है। अध्यक्ष ने आश्वासन दिया कि केवल शपथ की अवधि को ही रिकॉर्ड में लिया जाएगा, उसके पहले और बाद में कुछ नहीं। अपने देश की संसद में दूसरे देश की तारीफ करना आपकी मानसिकता के बारे में भी बहुत कुछ बताता है।”

ओवैसी के खिलाफ राष्ट्रपति से शिकायत
सुप्रीम कोर्ट के वकील विष्णु शंकर जैन ने ट्वीट कर कहा, ‘हरि शंकर जैन ने भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सामने असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 102 और 103 के तहत शिकायत दायर की है, जिसमें उन्हें संसद सदस्य के रूप में अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है।’

ओवैसी ने सफाई में कहा- सदन में कुछ भी गलत नहीं कहा 
विवाद बढ़ने के बाद हैदराबाद से AIMIM के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने शपथ ग्रहण के बाद संसद के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए अपनी टिप्पणी का बचाव किया। उन्होंने कहा, “अन्य सदस्य भी अलग-अलग बातें कह रहे हैं। मैंने कहा ‘जय भीम, जय मीम, जय तेलंगाना, जय फिलिस्तीन’। यह कैसे गलत है? मुझे संविधान में इसे लेकर कोई प्रावधान हो तो बताएं। आपको यह भी सुनना चाहिए कि दूसरों ने क्या कहा। मुझे जो कहना था मैंने कहा। आप यह भी देखें कि महात्मा गांधी ने फिलिस्तीन के बारे में क्या कहा था।” जब ओवैसी से फ़िलिस्तीन का ज़िक्र करने का कारण पूछा गया, तो उन्होंने बताया, “वे उत्पीड़ित लोग हैं।” ओवैसी ने उर्दू में शपथ ली थी।

भाजपा सांसद बोले- ‘जय फिलिस्तीन’ का नारा बिल्कुल गलत
केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा, “AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने आज संसद में जो ‘जय फिलिस्तीन’ का नारा दिया, वह बिल्कुल गलत है। यह सदन के नियमों के खिलाफ है। वह भारत में रहकर ‘भारत माता की जय’ नहीं कहते…लोगों को समझना चाहिए कि वह देश में रहकर असंवैधानिक काम करते हैं।”
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा, “फिलिस्तीन या किसी अन्य देश से हमारी कोई दुश्मनी नहीं है। शपथ लेते समय क्या किसी सदस्य के लिए दूसरे देश की प्रशंसा में नारा लगाना उचित है? हमें नियमों की जांच करनी होगी कि क्या यह सही है।”
भाजपा सांसद बिप्लब कुमार देब ने कहा, “फिलिस्तीन हो या कोई और देश, सबके भारत से अच्छे संबंध हैं। सवाल यह है कि शपथ लेते समय वह फिलिस्तीन जिंदाबाद कह सकते हैं या नहीं, भारत माता जिंदाबाद कहने की बजाय वह दूसरे देश का जिंदाबाद कह रहे हैं। इस पर विपक्ष चुप था, जब मैंने शपथ लेने से पहले नमस्ते कहा तो ओवैसी ने विरोध करना शुरू कर दिया कि यह संविधान विरोधी शब्द है।”

इन कारणों से छिन जाती है संसद सदस्‍यता
♦ अगर कोई संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा के लिए चुन लिया जाए तो उसे एक तय समय में किसी एक सदन की सदस्यता छोड़नी होती है। लेकिन अगर वह ऐसा नहीं करता, तो संविधान के अनुच्‍छेद 101 में संसद को अध‍िकार है क‍ि उससे एक सदन या दोनों सदनों की सदस्‍यता छीन ले।
♦ कोई भी संसद और विधानसभा का सदस्‍य एक साथ नहीं रह सकता। उसे एक पद से इस्‍तीफा देना ही होता है। अगर वह एक निश्च‍ित समय के अंदर दोनों में से एक सदस्‍यता नहीं त्‍यागता, तो उसकी संसद सदस्‍यता छीनी जा सकती है।
♦ संसद के क‍िसी भी सदन का सदस्‍य बिना इजाजत अगर संसद की बैठकों-कार्यवाही से 60 द‍िनों तक गैर हाज‍िर रहता है, तो उसकी सीट को खाली घोषित क‍िया जा सकता है। यानी उसकी सदस्‍यता खत्‍म मान ली जाती है। इन 60 दिनों में उन दिनों को नहीं गिना जाएगा, जिस दौरान सत्र चार से अधिक दिनों तक स्थगित हो या सत्रावसन हो गया हो।
♦ संव‍िधान के अनुच्‍छेद 102 के मुताबिक, अगर कोई सदस्‍य सरकार में लाभ के पद पर है, तो उसकी संसद सदस्‍यता चली जाती है। सिर्फ उस पद पर बने रहने पर वह अयोग्‍य घोषित नहीं होगा, जिस पद पर सांसदों का बना रहना क‍िसी कानून के तहत उसे अयोग्‍य नहीं ठहराता। वहां से वेतन, भत्‍ते और दूसरे सरकारी लाभ लेने पर मनाही है।
♦ अगर कोई सांसद किसी अदालत द्वारा मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कर दिया जाए तो उसकी सदस्यता चली जाएगी। अगर कोई दीवाल‍िया घोषि‍त है, तो उसकी भी संसद सदस्‍यता छीनी जा सकती है।
♦ अगर कोई व्यक्ति भारत का नागरिक न हो, या फिर वह किसी और देश की नागरिकता ग्रहण कर ले तो उसकी सदस्यता रद्द कर दी जाएगी। संव‍िधान के अनुच्छेद 102 के मुताबिक, अगर वह किसी और देश के प्रति निष्ठा जताता है, तो भी उसकी सदस्‍यता जा सकती है। ओवैसी के मामले में यही दावा किया जा रहा है। चूंक‍ि उन्‍होंने फिलिस्तीन के प्रत‍ि निष्‍ठा प्रदर्शित की, इसल‍िए संसदीय कानूनों के मुताबिक, उनकी सदस्‍यता जा सकती है।
♦ इसके अलावा, दल बदलने पर, पार्टी के आदेशों का उल्लंघन करने पर और दो या इससे अधिक साल की सजा होने पर भी संसद की सदस्‍यता चली जाती है। किसी सांसद ने अपने चुनावी हलफनामे में कोई गलत जानकारी दी है या फिर वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन करता है तो उसकी सदस्यता चली जाती है।