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ये हरा-हरा देखने की तलब है या गजवा-ए-हिंद की चाह… सहर के ‘जहर’ के मायने समझते हैं क्या आप?

बिना हिजाब वाली सहर शेख का मुंब्रा को 'ग्रीन' कलर में रंगने वाले बयान में क्या मायने? (साभार: Instagram- saharyunusshaikh)
महाराष्ट्र में ठाणे जिले के मुंब्रा वार्ड में ‘हिजाब वाली’ सहर यूनुस शेख ने नगर निगम चुनाव जीता है। AIMIM के टिकट से नई पार्षद बनीं। 22 साल की सहर शेख ने जीत के बाद विक्टरी स्पीच दी, जो कोई आम भाषण तो बिल्कुल भी नहीं था। मंच से सहर शेख ने कहा कि पूरे मुंब्रा को ‘ग्रीन’ (हरा) रंग से रंगना है। सहर की इस स्पीच का वीडियो वायरल हो रहा है।
सहर की हरा-हरा देखने की तलब से मुस्लिम तुष्टिकरण और सनातन को अपमानित करने वाले विपक्ष की नींद हराम हो गयी है। जिस AIMIM को विपक्ष बीजेपी की B टीम कहता था आज गठबंधन के लिए गुहार लगा रहे हैं। लेकिन मुसलमानों द्वारा हर चुनाव की तरह एकजुट होकर वोट देने से हिन्दुओं में भी एकजुटता की लहर तेज हो गयी है।  

इतना ही नहीं, असुदुद्दीन ओवैसी द्वारा बुर्के वाली को प्रधानमंत्री बनते देखने की लालसा पर टीवी पर परिचर्चाओं में बहुत बड़ा खुलासा हो गया कि परिचचाओं में शामिल किसी भी मौलाना के घरों की महिलाएं बुर्का/हिजाब या नकाब तक नहीं पहनती और अपनी दुकान चलाए रखने के लिए मुसलमान औरतों को बुर्का, हिजाब और नकाब के लिए उकसाते हैं।     

सोशल मीडिया में चर्चा पर बने हुए इस वायरल वीडियो में सहर शेख कहती है, “आने वाले 5 साल बाद भी जब चुनाव होंगे, तो उस चुनाव में भी विरोधियों को मुँहतोड़ जवाब देना है। पूरे मुंब्रा को ग्रीन कलर से ऐसे रंगना है कि इन लोगों को यहाँ से बुरी तरह से पछाड़कर भेजना है। हर एक उम्मीदवार सिर्फ AIMIM का आएगा।”

AIMIM पार्षद सहर शेख के इस बयान को लेकर जहाँ एक तरफ बहस छिड़ी हुई है। वहीं इस बयान के कई मायने भी निकाले जा रहे हैं। खासकर यहाँ ‘ग्रीन’ शब्द को किस संदर्भ में इस्तेमाल किया गया है, यह अब भी सवालों के घेरे में ही है। इस ग्रीन का मतलब क्या लोगों को इस्लाम से जोड़ना है, क्या यहाँ धर्म परिवर्तन की बात हो रही है? क्या मुंब्रा की नई पार्षद सिर्फ हरा-हरा देखना चाहती हैं? जवाब जानने के लिए लोग इसके क्या मायने निकाल रहे हैं, यह जानना जरूरी है।

सोशल मीडिया पर सहर शेख के ‘ग्रीन’ बयान पर प्रतिक्रिया

सहर शेख के इस बयान को सोशल मीडिया पर कुछ लोग हिंदुओं का नामोनिशान हटाने की चेतावनी बता रहे हैं, कोई मुंब्रा को मुस्लिम बहुल इलाका बनने पर चिंता व्यक्त कर रहा है, तो कोई यहाँ ‘ग्रीन’ का मतलब इस्लाम के ‘हरे’ रंग से जोड़कर देख रहा है।

इस बयान पर शिवसेना नेता शाइना एनसी ने कहा है, “सहर शेख युवा नेत्री हैं, वे मुंब्रा में कहती हैं कि वह मुंब्रा को हरा कर देंगी। आपको यह साफ करना चाहिए कि आप पर्यावरण की बात कर रही हैं, जहाँ आप हरा-भरा, साफ-सुथरा माहौल चाहती हैं। अगर ऐसा है, तो आपका बयान स्वीकार्य है। लेकिन अगर आप धर्म, जाति और संस्कृति के आधार पर लोगों को बांट रही हैं, तो यह बहुत दुख की बात है।”

एक्स यूजर हार्दिक कहते हैं, “डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। इनका एजेंडा बिल्कुल साफ है।” वे हिंदुओं को एकजुट होने के लिए कहते हैं, “असली खतरा हमे किससे है वे कोई नहीं देख पा रहा। हिंदुओं अपने धर्म, संस्कृति, धरोहर और विचारधारा का संरक्षण करना है तो समय रहते एक हो जाइए।”

एक और यूजर अभय प्रताप लिखते हैं, “मैडम साहिबा का एजेंडा एकदम से क्लियर है। नगरसेवक का चुनाव जीता है और पूरे क्षेत्र को हरा बना देना है। और ओवैसी के अनुसार एक हिजाबी PM बनेगी तो क्या करेगी?”

बाला नाम के एक्स यूजर ने कहा, “मिलिए 22 साल की AIMIM पार्षद सहर शेख से। ये वो ‘भटके हुए युवा’ नहीं है, इन्हें इस्लाम की अच्छी समझ है। दुख की बात है कि हिंदू अभी तक इस्लाम को नहीं जानते।”

एक और एक्स यूजर दीपा मुखर्जी कहती हैं, “अगर आपको हर चीज को हरा ही करना है, तो जाकर अपने बुजुर्गों की छोड़ी हुई विरासत- पाकिस्तान और बांग्लादेश को ही हरा कर दीजिए। वहाँ पहले से ही हर तरफ हरियाली फैली है, उसे और डुबो दीजिए। भारत को केसरिया ही रहने दीजिए। हमें आप लोगों की यहाँ जरा भी दखलअंदाजी नहीं चाहिए।”

All About Indian नाम से एक्स यूजर कहते हैं, “मिस्टर ओवैसी एक हिजाब पहनने वाली प्रधानमंत्री चाहते थे। लेकिन हम पहले ही देख चुके हैं कि हिजाब पहनने वाली नेता स्थानीय पार्षद बनने पर कैसा व्यवहार करती हैं।”

लोगों की प्रतिक्रियाओं से साफ होता है कि सहर शेख के ‘ग्रीन’ के मायने कुछ भी हों, लेकिन लोग इसे कुछ सकारात्मक तरीके से तो देख नहीं ही रहे हैं। बल्कि यहाँ सहर शेख का मुंब्रा को ‘ग्रीन’ करने का मकसद जरूर जाहिर हो रहा है। सहर शेख ने यह बयान देकर AIMIM में तो अपनी जगह पक्की कर ली है, लेकिन इससे गैर-हिंदू लोग जरूर चिंता में पढ़ गए हैं। ऐसे में पार्टी के ‘नवाब’ असदुद्दीन ओवैसी देश में ‘हिजाब पहनने वाली’ प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं।

सोशल मीडिया पर ‘ग्रीन’ कलर के मायने

सोशल मीडिया पर सहर शेख के ‘ग्रीन’ शब्द के जो मायने निकाले जा रहे हैं, वे अचानक से नहीं हैं। तमाम खबरें ऐसी आती रही हैं जब इस तरह के बयान देकर नफरत फैलाने के काम सरेआम हुए हैं और जब सवाल उठे तो कह दिया गया- कहने का मतलब कुछ और था।

आपको याद होगा असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने खुलेआम 15 मिनट पुलिस हटाने की बात कही थी और तब उसने साफ कहा था, “हिंदुस्तान में हम 25 करोड़ हैं, तुम 100 करोड़ है ना, ठीक है तुम तो हमसे इतने ज्यादा हो, 15 मिनट पुलिस को हटा लो हम बता देंगे कि किसमें कितना दम है।”

आज ओवैसी ये बोल दें कि उनके भाई के इस बयान में 25 करोड़ का मतलब मुस्लिमों से नहीं था, तो क्या ये बातें बदल जाएँगी? क्या नहीं माना जाएगा कि ये सीधे तौर पर देश में रहने वाले 100 करोड़ हिंदुओं को धमकाने के लिए कहा गया था?

सहर शेख ने आज ओवैसी वाला जहर ही उगला है। बस बात ये है कि वो शब्द नहीं बदल पा रहीं, तो उसके मायने को तोड़-मरोड़ रही हैं। खुद को सेकुलर भी इसीलिए बताया जा रहै है क्योंकि लोग उस बयान का असल मतलब समझकर उनसे सवाल कर रहे हैं। वरना ‘ग्रीन’ रंग से उनकी मंशा क्या थी ये साफ उनके हाव-भाव में पता चल रहा है। अब वो इस हाव-भाव को छिपाने के लिए कुछ भी गढ़ें इससे जनता को क्या… उन्हें जरूरत है उस बयान को याद रखने की जो उन्होंने जीत के नशे में चूर होकर मंच से दिया है।

देखा जाए तो सहर मात्र 22 साल की युवती हैं, लेकिन उनके मुँह से निकला ये जहर हैरान करने वाला नहीं है। इसी सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो आपको वायरल होते हुए दिखेंगे, जहाँ छोटे-छोटे मुस्लिम बच्चों के मन में गजवा-ए-हिंद का मकसद भर दिया जाता है, वे सरेआम हिंदुस्तान को गाली देते हैं, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं और इसी देश के बहुसंख्यकों को काफिर कहकर जहर उगलते हैं।

सहर शेख के ‘ग्रीन’ कलर के असल मायने

अब सहर शेख के विक्टरी स्पीच पर सवाल उठ रहे हैं तो उन्होंने सफाई दी है कि उन्होंने तो सिर्फ ‘ग्रीन’ शब्द का इस्तेमाल रंग के तौर पर किया था, लेकिन यहीं अगर कोई इस्लामी पैरोकार बैठा होगा तो ये निश्चित है कि उनके सामने ये मायने बदल जाएँगे। उसकी मजहबी सोच के अनुसार, इसके मायने मजहबी सोच का खुला ऐलान है।

भले ही सहर शेख समझा रही हैं कि वो सेकुलर है लेकिन ये इस्लामी पैरोकार लोग ग्रीन को इस्लामी पहचान से जोड़कर देख रहे हैं, और देख रहे हैं उस मुस्लिम पार्टी AIMIM की सोच से, जो आए दिन भड़काऊ बयान देकर कट्टरवादी पैदा करने में लगी रहती है। यहाँ ये लोग सहर शेख को सिर्फ अपना पार्षद मान रहे है, न कि पूरे मुंब्रा क्षेत्र का।

उधर, सहर शेख के इस बयान पर चिंता जाहिर करने वाले वह मुंब्रा के वह लोग हैं, जिन्होंने विकास के मुद्दे पर पार्षद चुना था। वे इस उम्मीद से वोट देने पहुँचे थे कि उनका पार्षद खराब सड़कें ठीक करवाएगा, पानी की समस्या सुलझाएगा, नगर में विकास होगा, लेकिन जीत के बाद स्पीच में उन्हें जरूर अपने नए पार्षद की स्पीच सुनकर मायूसी हाथ लगी होगी। जो मुंब्रा को विकास से नहीं, बल्कि ‘ग्रीन’ कलर की मजहबी सोच से रंगना चाहती हैं।

यह वही मानसिकता है, जो AIMIM की राजनीति की पहचान है। जहाँ असदुद्दीन ओवैसी मंच से भड़काऊ भाषण देने से नहीं चूकते, वहीं अब उनकी पार्टी में नए एडमिशन लेने वाले युवा भी उसी राह पर चल पड़े हैं। इससे साफ जाहिर है कि असदुद्दीन के लोकतंत्र और संविधान की बड़ी-बड़ी बातें करने का मतलब सिर्फ मजहब और एक ही सोच को आगे बढ़ाना है। और यही नतीजा है कि उनकी ‘हिजाब पहनने वाली’ सहर शेख पूरे शहर को ‘ग्रीन’ कलर में रंगना चाहती हैं।

नकाबपोश उपद्रवियों पर blind firing से क्यों डरती है सरकार? 1000+ की भीड़, हाथों में हथियार, चेहरे ढके हुए… केवल हिंदुओं के दुकान-घरों को बनाया निशाना: MLA ने बताया- पहले सारे कैमरे तोड़े, फिर हिंसा की

                                     नागपुर में क्रेन को भी लगाई आग (फोटो साभार: X_ANI)
नागपुर में 17 मार्च 2025 की शाम को हुई हिंसा सुनियोजित थी। यह बात बीजेपी विधायक प्रवीण दटके और हिंसा के पीड़ितों ने बताई है। इनके मुताबिक करीब 1000 कट्टरपंथियों की भीड़ इसमें शामिल थे। चेहरे ढक रखे थे। इनके हाथों में हथियार थे।

पत्थरबाजी करने वाली भीड़ ने चुन-चुनकर हिंदुओं की संपत्तियों को निशाना बनाया। तलवारों से दरवाजों को काटने की कोशिश की। गाड़ियों को फूँक दिया। आगजनी-पत्थरबाजी के बाद भीड़ पूरी तरह गायब हो गई। दावा किया जा रहा है कि भीड़ में शामिल लोग बाहर से लाए गए थे।

नागपुर (मध्य) के बीजेपी विधायक प्रवीण दटके ने कहा, “मैं आज सुबह यहाँ पहुँचा। ये सब पहले से तय था। कल सुबह एक आंदोलन के बाद गणेश पेठ पुलिस स्टेशन में कुछ हुआ, फिर सब ठीक था। लेकिन बाद में भीड़ सिर्फ हिंदुओं के घरों और दुकानों में घुसी। हमलावरों ने मुस्लिमों के घरों, दुकानों, गाड़ियों को छुआ तक नहीं। उन्होंने पहले सारे कैमरे तोड़े गए, फिर हथियारों के साथ प्लानिंग से हिंसा की गई। हमलावरों की तस्वीरें डीवीआर में हैं, हम पुलिस को देंगे।”

प्रवीण दटके ने साफ कहा कि हमलावर आसपास के इलाकों से थे और वो स्थानीय नहीं थे। उन्होंने स्थानीय पुलिस पर हिंदुओं की रक्षा न कर पाने का आरोप लगाया, साथ ही कहा कि घटना के समय स्थानीय पुलिस थाने के इंस्पेक्टर का फोन तक बंद था। उन्होंने बताया कि किस तरह से पहले सीसीटीवी कैमरों को तोड़ा गया और फिर हिंसा की गई। उन्होंने टूटे और जले हुए सीसीटीवी भी मीडिया को दिखाए। उन्होंने कहा कि हंसापुरी में हिंदू-मुस्लिमों की गाड़ियाँ साथ में खड़ी होती हैं, लेकिन हिंसा वाले दिन एक भी मुस्लिम की गाड़ी वहाँ खड़ी नहीं थी, न ही उन्हें कोई नुकसान पहुँचा। ये सब प्लानिंग नहीं तो और क्या है?

एक पीड़ित महिला ने अपने घर के दरवाजे को दिखाते हुए कहा कि हमलावरों ने तलवारों से हमले किए। उसने दरवाजों के काटे जाने की भी जानकारी दी।

एक पीड़ित व्यक्ति ने बतााया, “करीब 1000 लोगों की भीड़ रात 8.30 के आसपास आई। उसने पत्थरबाजी शुरू कर दी। तीसरी मंजिल पर बच्चे थे, वहाँ तक पत्थर फेंके गए। करीब 25-30 गाड़ियों को तोड़फोड़ करके आग के हवाले कर दिया गया।”

 एक स्थानीय महिला ने कहा, “भीड़ अचानक आई। चेहरे ढके थे, हाथों में हथियार थे। वो चिल्ला रहे थे, पत्थर फेंक रहे थे। दुकानें तोड़ीं, गाड़ियाँ जलाईं। हमारे घर की खिड़कियाँ टूट गईं। सब बाहरी लोग थे, प्लानिंग साफ थी।”

हिंसा प्रभावित हंसापुर के स्थानीय दुकानदार ने भयावह आपबीती साझा की। दुकानदार ने कहा, “मैं 10.30 बजे रात में घर पहुँचा। तभी बहुत सारे लोग आए। उन्होंने घर में आग लगाने की कोशिश की। पत्थर मारे, मैं घायल हो गया। गाड़ियों को उन्होंने तोड़ा और फिर आग के हवाले कर दिया।”

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार की सुबह महाल इलाके में शिव जयंती का कार्यक्रम आयोजित हुआ। इसके बाद दोपहर 12 बजे विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने औरंगजेब की कब्र हटाने की माँग को लेकर प्रदर्शन किया। उन्होंने औरंगजेब का पुतला जलाया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। फिर अफवाह फैली कि कुरान जला दी गई। पुलिस ने इसे झूठ बताया, पर मुस्लिम भीड़ ने इसे बहाना बनाकर शाम 5 बजे से हिंसा शुरू कर दी। महाल, कोतवाली, गणेशपेठ और चितनवीस पार्क में नकाबपोश लोग सड़कों पर उतरे। उनके पास लाठियाँ, पत्थर, बोतलें और पेट्रोल बम थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शाम 7:30 बजे के बाद हिंसा ने जोर पकड़ा, जो आधी रात के बाद तक जारी रहा। चितनवीस पार्क से शुक्रवारी तालाब रोड तक 40 से ज्यादा गाड़ियाँ जला दी गईं। कारें, बाइक, यहाँ तक कि एक क्रेन भी जल गई। दुकानों में तोड़फोड़ हुई, घरों पर पत्थर फेंके गए। पुलिस पर भी हमला हुआ। डीसीपी निकेतन कदम पर कुल्हाड़ी से वार किया गया, उनके हाथ में गहरी चोट लगी।

पुलिस ने लाठीचार्ज और आँसू गैस का इस्तेमाल किया, पर भीड़ नहीं रुकी। अब तक 50 से ज्यादा लोग गिरफ्तार हुए हैं। सीसीटीवी और वीडियो से पहचान चल रही है। साइबर पुलिस 100 से ज्यादा सोशल मीडिया अकाउंट्स की जाँच कर रही है, जहाँ से अफवाह फैली। शहर में कर्फ्यू लगा है, इंटरनेट कुछ घंटों के लिए बंद रहा, अब बहाल हो गया है।

अवलोकन करें:-

‘अब्दुल’ ने कहा कुरान जला दिया, सारे ‘अब्दुल’ नागपुर जलाने निकल पड़े: ‘अफवाह’ की आड़ में प्लानि

महाराष्ट्र सरकार के गृह राज्यमंत्री योगेश कदम का भी बयान आया है। उन्होंने कहा, “हिंसा के पीछे की वजह का अभी पता नहीं चल पाया है। अब तक 47 लोगों को हिरासत में लिया गया है। घटना में 12-14 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। 2-3 नागरिक भी घायल हुए हैं। हम घटना के पीछे की वजह का पता लगाएँगे। कानून हाथ में लेने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”

‘अब्दुल’ ने कहा कुरान जला दिया, सारे ‘अब्दुल’ नागपुर जलाने निकल पड़े: ‘अफवाह’ की आड़ में प्लानिंग के साथ फूँक दी 40+ गाड़ियाँ; उपद्रवियों को सरकारी सुविधाएं से ब्लैकलिस्ट किया जाए

                                                   नागपुर में हिंसा (फोटो साभार: X_ANI)
जब तक केंद्र और राज्य सरकारें इन उपद्रवियों को ब्लैकलिस्ट कर इन्हे और इनके परिवारों को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं से वंचित नहीं करती ये जेहादी किसी न किसी बहाने उपद्रव करते रहेंगे। अगर निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट संविधान की आड़ लेकर बहाल करने के लिए कहे उस स्थिति में सख्त लब्जों को अदालतों को सरकार को अदालत से पूछना होगा कि कुछ रूपए के लालच में आकर उपद्रव करना कौन से संविधान में लिखा है। अपने जिन आकाओं के कहने पर उपद्रव किया है इनकी देखभाल करना उनका काम है सरकार का काम है। किसी भी सूरत में इन्हे ब्लैकलिस्ट सूची से नहीं निकाला जाएगा। जब तक केंद्र और राज्य सरकारें इस तरह सख्त नहीं होंगी ये बिकाऊ उपद्रवी उपद्रव करते रहेंगे।   

नागपुर में 17 मार्च 2025 की शाम हुई हिंसा को ‘अफवाह’ का नतीजा बताया जा रहा है। लेकिन जिस तरीके से इसे अंजाम दिया गया उससे लगता है सब कुछ पूरी प्लानिंग के साथ हुआ। औरंगजेब की कब्र पर गरम माहौल में किसी ‘अब्दुल’ ने शोर मचाया कि कुरान जला दी गई है। फिर सारे अब्दुल एक साथ निकल पड़े शहर को जलाने।

गाड़ियाँ फूँकी गई। पत्थरबाजी हुई। पुलिस पर हमले हुए। हालात पर काबू पाने के लिए कर्फ्यू लगाना पड़ा है। ये मुस्लिम भीड़ की हिंसा का वही ‘मॉडल’ है जो आपको कभी भी किसी भी शहर में देखने को मिल सकता है। क्योंकि इस मॉडल में हिंसा ही सत्य है, कथित अफवाह की पुष्टि करने की फुर्सत किसी को नहीं है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार की सुबह 7 से 9 बजे के बीच नागपुर के महाल इलाके में छत्रपति शिवाजी महाराज की मूर्ति के पास शिव जयंती का कार्यक्रम चल रहा था। लोग आए, नारे लगे, सब शांत था। दोपहर 12 बजे के आसपास विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता औरंगजेब की कब्र को हटाने की माँग लेकर सड़क पर उतरे। उन्होंने औरंगजेब का पुतला बनाया, उस पर कपड़ा डालकर उसे जला दिया। ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। इसके बाद अफवाह उड़ाई गई कि चादर पर कुरान की आयतें लिखी थीं और उसे जलाया गया। पुलिस ने बताया कि ऐसा कुछ नहीं हुआ, फिर भी हिंसा को अंजाम दिया गया।

इस प्रदर्शन के बाद शाम 5 बजे तक माहौल गरमाने लगा। नागपुर के महाल, कोतवाली, गणेशपेठ और चितनवीस पार्क जैसे इलाकों में मुस्लिम युवकों की भीड़ जमा होने लगी। मुस्लिमों की भीड़ सड़कों पर निकल आई। शाम 7 बजने तक तक नारेबाजी शुरू हो गई और थोड़ी देर में सैकड़ों की संख्या में लोग सड़क पर थे।

भीड़ में ज्यादातर नकाबपोश थे, जिनके हाथों में लाठियाँ, पत्थर, बोतलें और कुछ के पास तो पेट्रोल बम भी थे। शाम 7:30 बजे के बाद इस हिंसा ने रफ्तार पकड़ ली। चितनवीस पार्क से लेकर शुक्रवारी तालाब रोड तक उपद्रवियों ने 40 से ज्यादा गाड़ियाँ जला दीं। कारें, बाइक यहाँ तक कि एक क्रेन को भी आग के हवाले कर दिया गया। इस दौरान मुस्लिमों की भीड़ ने दुकानों में तोड़फोड़ की और घरों पर पथराव किया।

डीसीपी निकेतन कदम पर कुल्हाड़ी से हमला, 15 पुलिस वाले घायल

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने हालात काबू करने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने उन पर भी पत्थर बरसाए। पहले लाठीचार्ज हुआ, फिर आँसू गैस के गोले छोड़े गए, लेकिन हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही थी। इस बीच डीसीपी निकेतन कदम पर भी हमला हुआ। भीड़ में से किसी ने उन पर कुल्हाड़ी से वार किया, जिससे उनके हाथ में गहरी चोट लगी। उन्हें फौरन अस्पताल ले जाया गया। कुल मिलाकर 15 से ज्यादा पुलिसवाले घायल हुए, जिनमें कुछ की हालत गंभीर थी। इसके अलावा 5-6 आम लोग भी चोटिल हुए।
एक स्थानीय महिला ने बताया, “अचानक भीड़ हमारे इलाके में घुस आई। उनके चेहरेढके थे, हाथों में पत्थर और हथियार थे। वो चिल्ला रहे थे, पत्थर फेंक रहे थे। दुकानों को तोड़ा, गाड़ियों में आग लगाई। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि समझ ही नहीं आया। हमारे घर की खिड़कियाँ टूट गईं। गाड़ियों को फोड़कर उनमें आग लगाई गई।” महिला का बयान साफ बताता है कि हिंसा में ज्यादातर बाहरी नकाबपोश शामिल थे, जिन्होंने प्लानिंग करके हमला किया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस तांडव में 40 से ज्यादा गाड़ियाँ जलकर खाक हो गईं। इसमें कारें, बाइक, दो जेसीबी मशीनें और कुछ अन्य वाहन शामिल थे। कई घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया। पत्थरबाजी में खिड़कियाँ टूटीं, संपत्ति को भारी नुकसान हुआ। अग्निशमन कर्मियों ने आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन उन पर भी हमला हुआ। एक फायरमैन घायल हो गया। कुल 4 लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए, जिनका इलाज चल रहा है।

अब तक 50 से ज्यादा गिरफ्तार, हिंसा करने वालों की हो रही पहचान

पुलिस ने हालात संभालने के लिए अतिरिक्त फोर्स बुलाई। रात तक हंसपुरी इलाके में भी उपद्रव की खबरें आईं, लेकिन धीरे-धीरे स्थिति काबू में आई। अब तक 50 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सीसीटीवी फुटेज और वीडियो क्लिप्स की मदद से पत्थरबाजों और आग लगाने वालों की पहचान की गई।
नागपुर और महाराष्ट्र की साइबर पुलिस टीम ने 100 से ज्यादा सोशल मीडिया अकाउंट्स की जाँच शुरू कर दी है, क्योंकि अफवाह इन्हीं के जरिए फैली थी। इस बीच, नागपुर शहर के 10 पुलिस थाना इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया है।
हिंसा बढ़ने के बाद इंटरनेट सेवा भी कुछ घंटों के लिए बंद कर दी गई, ताकि अफवाहें और न फैलें। देर रात हालात सामान्य होने पर इसे बहाल कर दिया गया। लेकिन शहर में अभी भी तनाव का माहौल है। लोग डरे हुए हैं, सड़कें सूनी हैं और पुलिस हर गली-नाके पर नजर रख रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ये हिंसा अचानक नहीं हुई। भीड़ में ज्यादातर बाहरी लोग थे, जो प्लानिंग के साथ आए। एक शख्स ने कहा, “हमारे इलाके में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। ये लोग बाहर से आए, उनके पास पेट्रोल बम थे। 8 गाड़ियाँ तोड़ीं, 2 में आग लगा दी।” सीएम देवेंद्र फडणवीस और नितिन गडकरी ने शांति की अपील की है। पुलिस कमिश्नर ने कहा कि स्थिति अब काबू में है, लेकिन सतर्कता बरती जा रही है।

 

मध्य प्रदेश : पहले से प्लान बना रखा था… FIR ने खोली महू की जामा मस्जिद के पास हुए हमले की साजिश: पहले से जमा कर रखे थे ईंट-पत्थर; इन जेहादियों के खरीदारों(आकाओं) को पकड़ो

                                                   महू में कई गाड़ियाँ भी तोड़ी-जलाई गईं
मध्य प्रदेश के महू में हिन्दुओं पर पथराव के मामले में दर्ज की गई FIR से मुस्लिमों की प्लानिंग का खुलासा हुआ है। चैंपियंस ट्रॉफी मैच के बाद जीत का जश्न मनाते लोगों पर पथराव की पहले से प्लानिंग की गई थी। इस मामले में 17 मुस्लिम नामजद आरोपित बनाए गए हैं।

महू में हुई हिंसा के बाद 10 मार्च, 2025 को महू थाने में FIR दर्ज करवाई गई है। FIR में मुस्लिमों पर दंगा, मारपीट, हमला समेत अन्य कई धाराएँ लगाई गई हैं। FIR में 17 नामजद आरोपितों के साथ ही कई अज्ञात लोगों को आरोपित बनाया गया है। FIR हमले के पीड़ित एक हिन्दू की तरफ से दर्ज करवाई गई है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

FIR में पीड़ित ने बताया है कि वह रविवार (9 मार्च) को चैंपियंस ट्रॉफी में न्यूजीलैंड के खिलाफ भारत की जीत के बाद अपने कई दोस्तों के साथ जश्न मनाने निकला था। पीड़ित ने बताया कि वह अपने साथियों के साथ शांतिपूर्वक जीत का जुलूस निकाल रहे थे।

पीड़ित ने बताया कि इसी दौरान मोती महल चौराहे पर बबलू, तैय्यब, गोलू, एहमद, पप्पू, अहमद, जमशेद, अब्दुल अनीस, शेरू, लल्लू, सैय्यद, इमरान, अफजल, सोहेल, रफीक और इमरान (2) समेत बाकी अज्ञात लोग आ गए। पीड़ित के अनुसार, इन मुस्लिमों ने पहले जीत का जश्न मना रहे हिन्दुओं को गालियाँ बकीं।

FIR के अनुसार मुस्लिमों ने कहा, “हमने तो पहले से प्लान बनाकर रखा था कि तुम सालों चिल्ला-चिल्लाकर जश्न मनाओगे तो आज तुम्हारा इलाज कर देंगे। हम सभी नें गालियाँ देने से मना किया तो सभी नें षडयंत्र पूर्वक इकट्ठा होकर ईंट-पत्थर जो पहले से इकट्ठा करके रखें थे, जिससे हम पर पथराव कर दिया।”

अब तक जितने भी दंगे हुए हैं सभी एक षड़यंत्र के तहत किये जाते हैं, कोई अचानक नहीं होते और victim card खेलते हुए जेहादी और इनके समर्थक सारा इल्जाम हिन्दुओं पर डाल अपने आपको बेगुनाह बताते फिरते हैं। सरकार को चाहिए अब तक जितने भी गिरफ्तार किये गए उनसे इनके आकाओं का नाम पूछ उन पर भी कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। पत्थरों और पेट्रोल बम कोई एकदम नहीं होते। इनके आका इनको इनकी कीमत देकर सारा इंतजाम कर सामने इन जेहादियों को ले आते हैं। ये जेहादी बिकाऊ हैं इनके खरीदारों का जब तक इलाज नहीं होगा दंगा-फसाद बंद नहीं होंगे।    

पीड़ित ने बताया कि इस पथराव के चलते वह और उनके साथी गंभीर रूप से घायल हो गए। पीड़ित ने यह भी बताया कि मुस्लिमों ने इसके बाद धमकी दी कि अगर हिन्दुओं ने दोबारा जुलूस निकाला तो उनकी हत्या कर दी जाएगी। पीड़ितों की बसों में तोड़फोड़ की गई

पुलिस अब इस मामले में जाँच करके गिरफ्तारियाँ कर रही है। इंदौर एसपी राजेश द्विवेदी ने बताया, “अभी एक FIR दर्ज हुई है, 17 लोग इसमें नामजद हैं। कुछ शिकायत और आई हैं। इन पर कार्रवाई हो रही हैं। 12 लोगों को पकड़ा गया है। बाकी को पकड़ने का प्रयास किया जा रहा है। FIR में बलवा जैसी धाराएँ लगाई जा रही हैं।”

वहीं इंदौर ग्रामीण एसपी हितिका वत्सल ने 2 FIR की जानकारी दी है। उन्होंने बताया है कि अब स्थिति सामान्य है। गौरतलब है कि रविवार को महू में भारतीय टीम की जीत का जश्न मनाते लोगों पर मुस्लिमों ने हमला कर दिया था, इसमें कई लोग घायल हुए थे।

दिल्ली : हिंदू क्यों लगा रहे ‘मकान बिकाऊ’ के पोस्टर; मस्जिद को बढ़ाना, शिव मंदिर के सामने उसका गेट खोलना… दिल्ली सीलमपुर (ब्रह्मपुरी) की इसी अल-मतीन मस्जिद से 2020 हिंदू-विरोधी दंगों में चली थी गोलियाँ

अल-मतीन मस्जिद से निकली भीड़ ने ही बोला था 2020 में हिंदुओं पर धावा (साभार: ऑपइंडिया हिंदी, विशेष प्रबंध द्वारा)
उत्तर-पूर्वी दिल्ली का ब्रह्मपुरी इलाका इन दिनों एक बार फिर सुर्खियों में है। यहाँ की अल-मतीन मस्जिद के विस्तार को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। मस्जिद के सामने हर साल होलिका दहन होता है, लेकिन इस बार होली का त्योहार जुमे की नमाज और रमजान के महीने के साथ टकरा रहा है। ऐसे में स्थानीय लोगों के बीच डर और आशंका का माहौल है।

हिंदू समुदाय का एक बड़ा हिस्सा इसे 2020 के दिल्ली दंगों से जोड़कर देख रहा है, जब इसी मस्जिद से गोलियाँ चलने और हजारों की भीड़ जुटने की बात सामने आई थी। क्या ब्रह्मपुरी सचमुच एक इस्लामी एपिसेंटर में तब्दील हो रही है, या यह सिर्फ़ एक बनाया गया विवाद है? इसकी जड़ में जाने के लिए हमने स्थानीय लोगों से बात की और बैकग्राउंड को खंगाला।

क्या दिल्ली और केंद्र सरकार सतर्कता बरतते दोबारा इलाके को दंगा होने से रोक षड्यंत्रकारियों को गिरफ्त में लेगी? अगर इलाके में दोबारा दंगा होता है तो यह दिल्ली और केंद्र सरकारों की बड़ी नाकामी होगी?   

मस्जिद विस्तार और ‘मकान बिकाऊ’ के नोटिस

अल-मतीन मस्जिद पहले से ही गली नंबर-13 में एक चार मंजिला मकान में चल रही थी। लेकिन हाल ही में इसके विस्तार की योजना बनी। अब इस मस्जिद को बगल के प्लॉट तक फैलाया जा रहा है। एक बेहद बारीक योजना बनाकर पहले तो मस्जिद के बगल की जमीन हिंदू परिवार से खरीदी गई और फिर उस एक मंजिला घर को तोड़कर वहाँ नई बिल्डिंग बनाई जा रही है, जो मूल-रूप से गली नंबर 13 की मस्जिद को विस्तार देने के लिए है।
इस पूरे वाकये को बहुत प्लानिंग के साथ अंजाम दिया गया। स्थानीय लोगों को डर है कि जैसे 25 फरवरी 2020 को हिंदुओं पर हमला बोला गया, इस अल-मतीन मस्जिद से निकली इस्लामी भीड़ द्वारा, अगर मस्जिद 2 गुनी बड़ी हो गई, तो सोचिए कि और कितने हमलावर एक साथ उनके ही दरवाजे पर जमा हो जाएगी। यही वजह है कि ब्रह्मपुरी की गली नंबर-12 के करीब 60 मकान हिंदू परिवारों में से 25-30 मकानों पर ‘मकान बिकाऊ है’ के नोटिस लग चुके हैं।
इस अल-मतीन मस्जिद के विस्तार का विरोध करने वाले शिकायतकर्ता पंडित शंकर लाल गौतम कहते हैं, “यह निर्माण अवैध है। MCD को गुमराह करके नक्शा पास कराया गया। मस्जिद के ठीक बगल में शिवालय है। अगर यहाँ मस्जिद का गेट खुला तो दोनों समुदाय आमने-सामने होंगे, और तनाव बढ़ेगा। हम 2020 जैसा कुछ नहीं चाहते।” शंकर लाल का आरोप है कि यह सिर्फ मस्जिद का विस्तार नहीं, बल्कि इलाके की डेमोग्राफी बदलने की साजिश है। उनके मुताबिक, दंगों के बाद से ज्यादातर मकान हिंदुओं ने बेचे और खरीदने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग हैं।

2020 का हिंदू विरोधी दंगा: एक जख्म जो अभी भरा नहीं

2020 के फरवरी महीने में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी हिस्से में हुए दंगे आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। सीलमपुर, जाफराबाद और ब्रह्मपुरी जैसे इलाकों में हिंसा ने 53 लोगों की जान ले ली थी और सैकड़ों घायल हुए थे। इस दौरान अल-मतीन मस्जिद का नाम भी चर्चा में आया था। स्थानीय लोगों का दावा है कि मस्जिद से गोलियाँ चली थीं और अचानक हजारों की भीड़ वहाँ जमा हो गई थी। ऑपइंडिया के पास मौजूद वीडियो और तस्वीरें उस वक्त की भयावह स्थिति को बयान करती हैं – जलते हुए घर, सड़कों पर बिखरा मलबा और डरे हुए लोग। वीडियो फुटेज, जो अभी हार्ड ड्राइव में सुरक्षित हैं और पुलिस-कोर्ट के रिकॉर्ड में भी मौजूद हैं, इस बात की तस्दीक करते हैं कि हिंसा के दौरान यह इलाका एक युद्धक्षेत्र में बदल गया था।
उस वक्त के बाद से ब्रह्मपुरी में डेमोग्राफी तेजी से बदली है। हिंदू समुदाय के कई परिवारों ने अपने मकान बेच दिए और इलाका छोड़ दिया। स्थानीय निवासी दिनेश शर्मा (बदला हुआ नाम) बताते हैं, “2020 के बाद यहाँ का माहौल बदल गया। दंगों में हमने अपने लोगों को खोया, घर जले और डर ऐसा बैठा कि कई लोग यहाँ से चले गए। अब मस्जिद का विस्तार देखकर लगता है कि फिर वही सब होगा।” रमेश की बात में एक गहरा डर झलकता है, जो सिर्फ उनके नहीं, बल्कि गली नंबर-12 के कई हिंदू परिवारों का है।

मुस्लिम पक्ष का आरोप – “विवाद जबरदस्ती पैदा किया जा रहा”

मस्जिद के सामने खड़े मिले अल-मतीन के नायब ईमाम सद्दाम हुसैन से हमारी बातचीत हुई। उनका कहना है, “हमारी आबादी बढ़ रही है, मौजूदा मस्जिद छोटी पड़ गई थी। दान में मिले प्लॉट पर विस्तार शुरू किया, इसमें गलत क्या है? कुछ लोग आपस में लड़वाना चाहते हैं, इसलिए इसे मुद्दा बना रहे।” सद्दाम हुसैन का दावा है कि मकान बेचना लोगों की अपनी मर्जी है। “यहाँ अच्छी कीमत मिल रही है, इसलिए लोग बेच रहे हैं। कोई जबरदस्ती नहीं कर रहा। हम शांति चाहते हैं।”
सद्दाम हुसैन ने कहा कि गली नंबर 12 में मस्जिद का नहीं, बल्कि कम्युनिटी सेंटर के लिए जमीन ली गई है। हालाँकि स्थानीय मुस्लिमों का दावा है कि वहाँ मस्जिद ही बन रही है। मुस्लिम समुदाय के लोग यह भी कहते हैं कि वे बड़े दिल वाले हैं। हर साल मस्जिद के सामने होलिका दहन होता है, और उन्हें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन हिंदू पक्ष इसे छिपी सच्चाई मानता है। एक महिला, जो अपना नाम नहीं बताना चाहतीं, कहती हैं, “ये लोग बाहर से शांति की बात करते हैं, लेकिन 2020 में क्या हुआ, सबको पता है। अब होली और रमजान साथ आए हैं, जुमे की नमाज होगी, और हमें डर है कि कोई बड़ा खेल न हो जाए।”
                   ब्रह्मपुरी की गली नंबर – 13 में स्थित मस्जिद चौक, यहीं पर होता है होलिका दहन

होली और रमजान का टकराव

इस बार होली का त्योहार 24 मार्च को है, जो जुमे की नमाज और रमजान के महीने के साथ पड़ रहा है। मस्जिद के सामने हर साल होलिका दहन होता है, लेकिन इस बार तनाव की वजह से लोग डरे हुए हैं। गली नंबर-12 के निवासी अजय कुमार कहते हैं, “पुलिस अभी शांति बनाए हुए है, लेकिन सिपाही चले गए तो क्या होगा? 2020 में भी पहले सब ठीक था, फिर अचानक हमला हुआ। हम अपने बच्चों को नहीं गँवाना चाहते।” अजय की बात में 2020 का डर साफ झलकता है, जब हिंसा ने पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया था।
खास बात ये है कि अल-मतीन मस्जिद एक निजी घर में चल रही थी। बात में इस जगह को मस्जिद में तब्दील कर दिया गया और सोसायटी के नाम पर ‘जकात’ यानी दान दे दिया गया। गली नंबर 13 में स्थित मस्जिद 10 से 12 साल पुरानी है, जो धीरे-धीरे खड़ी की गई। अब ये 4 मंजिला है। जबकि इस जगह पर होलिका दहन बहुत पहले से होता रहा है।
दरअसल, गली नंबर 13 में स्थित अल-मतीन मस्जिद के बगल वाली जमीन ही गली नंबर 12 की तरफ है। यहीं पर गली नंबर 12 और 13 को जोड़ने वाला एक छोटा कट भी है। जहाँ मस्जिद का गेट बन सकता था, लेकिन गली नंबर 12 में जहाँ मस्जिद का गेट खोलने की कोशिश की गई थी, उसी के सामने शिव मंदिर है। इसी बात का विरोध हिंदू कर रहे हैं। क्योंकि शिव मंदिर 1984 का बना हुआ है। ये आज का नहीं है, जबकि मस्जिद अभी पिछले दशक ही बनी है। लोग होलिका दहन के दिन भी मंदिर में पूजा करते हैं। सिर्फ होलिका ही नहीं, महाशिवरात्रि से लेकर हर सोमवार को लोग पूजा करते हैं। ये रिपोर्ट पढ़ने के बाद अपने आप चीजें साफ हो जाती हैं कि असलियत क्या है। कौन पहले से है और कौन बाद में आया।
    1984 में निर्मित मंदिर, मंदिर के सामने ही मस्जिद का गेट बनाने की कोशिश (दाईं तरफ- मंदिर निर्माण की जानकारी                                                                                                                                     देता शिलापट)

पुलिस और MCD की कार्रवाई

विवाद बढ़ता देख दिल्ली पुलिस ने इलाके में गश्त बढ़ा दी है। मौके पर सिपाही तैनात हैं और MCD ने निर्माण कार्य पर रोक लगा दी। अल-मतीन सोसाइटी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है, जिसमें आरोप है कि गलत जानकारी देकर नक्शा पास कराया गया। पुलिस का कहना है कि दोनों समुदाय शांति की बात कर रहे हैं, और अभी कोई बड़ी घटना नहीं हुई। लेकिन स्थानीय बीजेपी निगम पार्षद का कहना है, “यह माहौल बिगाड़ने की कोशिश है। हम हिंदुओं को पलायन नहीं करने देंगे।”

डेमोग्राफी बदलाव का आरोप

हिंदू समुदाय मस्जिद निर्माण को एक ‘मोडस ऑपरेंडी’ मानता है। उनका कहना है कि पहले मस्जिद बनती है, फिर माहौल बदलता है, और हिंदू पलायन को मजबूर हो जाते हैं। 2020 के बाद से ब्रह्मपुरी में यह ट्रेंड देखने को मिला है। एक बुजुर्ग निवासी कहते हैं, “पहले यहाँ हिंदू-मुस्लिम साथ रहते थे। दंगों के बाद सब बदल गया। अब मस्जिद का विस्तार देखकर लगता है कि हमें यहाँ से भगाने की तैयारी है।”
ब्रह्मपुरी की विवादित गली नंबर 12-13 मौजपुर-वार्ड नंबर 228 में आती है। यहाँ साल 2020 में 25 फरवरी 2025 को हिंदुओं पर हमले के बाद फायरिंग में 3 हिंदू युवक घायल हो गए थे। इसी गली नंबर 13 में अल-मतीन मस्जिद है, जिसका विस्तार किया जा रहा है।
साल 2020 के दंगों के बाद से हिंदुओं पर जबरदस्त दबाव है। वो अपने घर बेच रहे हैं। मुस्लिमों का कहना है कि वो अच्छे पैसे दे रहे हैं, इसलिए लोग घर बेच रहे हैं, जबकि हकीकत ये है कि लोगों का जीना मुहाल हो चुका है। वो डर के साए में जी रहे हैं, इसलिए पलायन को मजबूर हो रहे हैं। उनके दिलों में 2020 की खौफनाक यादें अब भी ताजा हैं।
ऐसे में ब्रह्मपुरी का यह विवाद सिर्फ मस्जिद निर्माण तक सीमित नहीं है। यह 2020 के दंगों का जख्म, डेमोग्राफी बदलाव का डर और धार्मिक त्योहारों के टकराव का नतीजा है। पुलिस और MCD की कार्रवाई से अभी शांति है, लेकिन लोगों के मन में आशंका बनी हुई है। हिंदू और मुस्लिम दोनों दिल्ली पुलिस की तारीफ कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह शांति टिकाऊ होगी? या फिर होली और रमजान का यह संयोग एक बार फिर ब्रह्मपुरी को 2020 की आग में झोंक देगा? जवाब समय के पास है, लेकिन फिलहाल यहाँ के लोग डर और उम्मीद के बीच जी रहे हैं। 

मस्जिद से उकसाने के दावे को ‘भ्रामक’ बताने का क्या आधार, नहीं बता पाई बहराइच पुलिस: जानिए चश्मदीदों के बयान और उसकी मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर क्या कहता है कानून

                                 बहराइच दंगे के घायल विनोद मिश्रा और वहाँ की मस्जिद (फोटो: राहुल पाण्डेय)
उत्तर प्रदेश के बहराइच में माँ दुर्गा की प्रतिमा की विसर्जन के दौरान 13 अक्टूबर 2024 को जुलूस पर हमले किए गए थे। इस हमले में कई लोग घायल हो गए थे। वहीं, राम गोपाल मिश्रा नाम के एक शख्स की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना में घटना अन्य हिंदू भी घायल हो हुए थे। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि हमले के लिए मुस्लिम भीड़ को मस्जिद से उकसाया गया था।

इस जुलूस में शामिल 70 वर्षीय बुजुर्ग विनोद मिश्रा उन पीड़ितों में हैं, जिन्हें इस हमले में गंभीर चोटें आई थीं। विनोद मिश्रा ने दावा किया था कि मस्जिद से उकसाए जाने के बाद मुस्लिम भीड़ ने हिंदू श्रद्धालुओं पर हमला किया था। उन्होंने कहा, “पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो हिंदू तितर-बितर हो गए। तब, मस्जिद से अल्लाह-हू-अकबर बोला गया और उसके बाद आवाज आई कि जो जहाँ मिले उसे मार दो काट दो।”

उन्होंने आगे कहा, “उधर से 200-300 की संख्या में भीड़ बाँस बल्लम, अवैध असलहे, तमंचे जैसे औजार लेके दौड़ी। सामने हमारी गाड़ी थी। उसे हम इस पार लेकर आने। हमने गाड़ी स्टार्ट की हुई थी ये सोचकर ये सब लोग हमें जानते-पहचानते हैं हमें कुछ नहीं करेंगे। लेकिन वो 5-7 की संख्या में आए और फरसा से वार कर दिया।”

घटना को याद करते हुए विनोद मिश्रा ने आगे कहा, “हमने हाथ उठाया तो वहाँ गहरा घाव हो गया और कुर्ता खून से सराबोर हो गया। हम लहूलुहान थे और उन्होंने तब तक गाड़ी का तार काट दिया। हम इतने में वहाँ से भागने लगे। जब भागे तो उन्होंने लाठी चला दी। हमारी पीठ पर काफी चोट के निशान हैं और हाथ भी टूट गया। बाद में पता चला कि गाड़ी में भी आग लगा दी गई है।”

बहराइच पुलिस ने सोशल मीडिया पर उनके दावे को ‘भ्रामक‘ करार दिया था। बहराइच पुलिस ने ऑपइंडिया की X पोस्ट पर जवाब देते हुए लिखा था, “ऐसे भ्रामक तथ्य जिनके सम्बन्ध में अभी कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं हुआ है, उन्हें बिना जानकारी के प्रसारित न करें । इससे जनपद की कानून व्यवस्था बिगड़ने की प्रबल सम्भावना है जिस पर विधिक कार्यवाही अमल पर लायी जाएगी।”

विनोद मिश्रा के बाद सामने आए दिव्यांग सत्यवान मिश्रा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा कि उस दिन मस्जिद से ऐलान हुआ था, “जो हिन्दू जहाँ मिले, उसको काट दो।” उन्होंने बताया है कि इसी ऐलान के बाद मुस्लिमों की भीड़ ने अब्दुल हमीद के घर के आगे मौजूद हिंदू श्रद्धालुओं पर हमला किया था। कट्टरपंथी भीड़ कह रही थी, “ऐ हिन्दुओं, यहाँ से भाग जाओ वरना गोलियों से भून दूँगा।”

इतना ही नहीं, पद्माकर दीक्षित नाम के एक व्यक्ति ने भी इसी तरह का दावा किया है। ऑपइंडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे लोग मूर्ति के साथ आगे बढ़ रहे थे, तभी एक पत्थर आकर लगा। इससे माँ दुर्गा की प्रतिमा का हाथ टूट गया। इस बीच मस्जिद से ऐलान हुआ, “अल्लाह हु अकबर। जो मिले उनको काट दो।” पद्माकर के अनुसार, मुस्लिम भीड़ कह रही थी कि जितना हिंदू मारेंगे, उतना सवाब मिलेगा।

जिस स्टोरी बहराइच पुलिस ने भ्रामक और तथ्यहीन बताया था, उसे कई मीडिया हाउस ने छापा था। ये स्टोरी हमले में घायल विनोद मिश्रा के बयान के आधार पर की गई थी। आजतक से लेकर दैनिक जागरण ने मस्जिद से ऐलान वाली बात पर अपनी खबरें लिखी थीं। दैनिक जागरण की खबर को भी बहराइच पुलिस ने भ्रामक बताते हुए कानूनी कार्रवाई की बात कही थी।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट पर बहराइच पुलिस ने जवाब देते हुए कहा था, “इस समाचार पत्र द्वारा प्रकाशित सूचना के संबंध में कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं होने के बावजूद इसके प्रसारण का संज्ञान लिया गया है तथा इन्हें विधिक कार्रवाई हेतु नोटिस निर्गत की जा रही है।”

ऑपइंडिया ने पूछे 3 सवाल, बहराइच पुलिस का गोलमोल जवाब

बहराइच में मस्जिद से भीड़ को उकसाने को लेकर ऑपइंडिया द्वारा की गई कवरेज पर पुलिस द्वारा सवाल उठाने के बाद कुछ ऐसे सवाल थे, जो एक मीडिया हाउस को जानना जरूरी था। इसको लेकर ऑपइंडिया ने बहराइच पुलिस से तीन सवाल पूछे थे, जिनका पुलिस ने जवाब भी दिया। इन सवाल और जवाबों को हम यहाँ रख रहे हैं।
प्रश्न 1. क्या विनोद मिश्रा हिंसा के पीड़ित, चश्मदीद हैं? क्या पुलिस ने उनका बयान दर्ज किया है?
उत्तर: बहराइच (महसी) के डिप्टी एसपी रवि खोखर ने बताया कि विनोद मिश्रा ने अभी तक पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई है। जब वो शिकायत दर्ज करवाएँगे, उसके बाद उस पर जाँच होगी।
प्रश्न 2. क्या मस्जिद से उकसाने को लेकर उन्होंने जो दावे किए हैं, उसकी पुलिस ने जाँच की है? यदि की है तो उसका निष्कर्ष क्या निकला है? नहीं की है तो क्या उनके दावों को जाँच में शामिल किया है?
उत्तर: बहराइच की एसपी वृंदा शुक्ला के आधिकारिक फोन नंबर पर ऑपइंडिया ने कॉल किया तो फोन उठाने वाले PRO ने कहा कि मस्जिद से हमले वाली बात गलत है। यह आरोप भ्रमित करने वाला है।
प्रश्न 3. मस्जिद से हमले वाली मीडिया रिपोर्ट्स को बहराइच पुलिस सोशल मीडिया पर भ्रामक बता रही है, इसका आधार क्या है?
उत्तर: बहराइच की एसपी वृंदा शुक्ला के आधिकारिक नंबर पर की गई कॉल को उठाने वाले PRO ने कहा कि इस मामले को लेकर उनका स्टैंड पहले जैसा है।

चश्मदीद के बयान को लेकर क्या कहता है कानून

किसी घटना के पीड़ित/चश्मदीद के बयान पर मीडिया रिपोर्टिंग की जा सकती है या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह का कहना है कि मीडिया किसी भी पीड़ित या चश्मदीद का बयान ले सकती है जब तक कि कानूनी या प्रशासनिक रूप से किसी आदेश के अंतर्गत ऐसे बयान या मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक ना लगी हो। उन्होंने कहा कि सभी बड़े घोटालों का भंडाफोड़ प्रेस द्वारा ही किया गया है।
चश्मदीद को लेकर भारत में कानून भी है। इसको लेकर हमारा कानून क्या कहता है, इस पर रीना सिंह कहती हैं कि मीडिया में दिए गए बयान की कानूनी अहमियत सीमित होती है और अदालत में दिए गए शपथ-पत्रीय बयान को ही मुख्य साक्ष्य माना जाता है। गवाहों की सुरक्षा के लिए गवाह संरक्षण योजना और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश भी गवाहों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।
रीना सिंह कहती हैं कि संविधान के अनुच्छेद 20(3) के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को साक्ष्य प्रदान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसका मतलब ये है कि किसी आरोपित के ख़िलाफ़ गवाह बनने के लिए किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उसे दोषी ठहरा सके। भारतीय कानूनों में चश्मदीद गवाह का बयान बहुत महत्वपूर्ण होता है, लेकिन उसकी वैधता और विश्वसनीयता अदालत में दी गई गवाही और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ी होती है।
इस अधिनियम के अनुसार, गवाह का बयान महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है। यदि गवाह का बयान सुसंगत और विश्वसनीय है तो उसे निर्णायक साक्ष्य माना जा सकता है। अदालत गवाह से उसकी गवाही लेने के लिए उसे समन भेज सकती है। गवाह के बयान को दोनों पक्षों द्वारा जाँचा और परखा जाता है। यह प्रक्रिया गवाह की विश्वसनीयता की पुष्टि करती है और यदि बयान में विरोधाभास है तो उसका खुलासा करती है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 186 (गवाहों के बयान) के अनुसार, पुलिस जाँच के दौरान गवाहों का बयान दर्ज कर सकती है। पुलिस गवाह को उसके निवास स्थान पर जाकर भी बयान दर्ज कर सकती है और ये जरूरी नहीं है कि गवाह थाने आकर ही बयान दे। दरअसल, BNSS (भारतीय न्याय संहिता) में गवाहों की सुरक्षा, गवाही देने की प्रक्रिया हैं।
वहीं, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 179 (गवाह को समन) में कहा गया है कि पुलिस गवाह को नोटिस या समन देकर थाने बुला सकती है। हालाँकि, महिला गवाहों के लिए विशेष प्रावधान है कि उन्हें उनके निवास स्थान पर ही बयान देने की अनुमति होती है और उन्हें थाने आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
इसी तरह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 183 (न्यायिक बयान) के अनुसार, मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयान को न्यायिक बयान के रूप में दर्ज किया जाता है। यह बयान बाद में जाँच के दौरान और अदालती कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह विशेषकर तब आवश्यक होता है जब बयान के बाद गवाह की जान को खतरा हो या गवाह पर दबाव हो।
रीना सिंह कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में गवाहों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया है। कोर्ट ने गवाहों को धमकाने या प्रभावित करने के मामलों में सख्त कार्रवाई का आदेश दिया है, ताकि गवाह बिना किसी डर के न्यायालय में बयान दे सकें। भारतीय कानून गवाहों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा पर जोर देता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम और बीएनएसएस जैसे कानूनों के तहत गवाहों के कुछ अधिकार हैं।
गोपनीयता का अधिकार: गवाह को धमकी मिलने पर उसकी पहचान को गुप्त रखा जा सकता है।
सुरक्षा का अधिकार: अगर गवाह को बयान देने के बाद खतरा हो तो उसे पुलिस या राज्य द्वारा सुरक्षा प्रदान की जा सकती है।
स्वतंत्र बयान देने का अधिकार: गवाह को स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से बयान देने का अधिकार है और उसे किसी भी प्रकार के दबाव या धमकी से बचाने का प्रावधान है।
अब जबकि, बहराइच पुलिस ने ऑपइंडिया की खबर को भ्रामक बता दिया तो हमने रीना सिंह से चश्मदीद के मीडिया में दिए गए बयान के बारे में भी उनसे जानना चाहा। उन्होंने कहा कि चश्मदीद का पुलिस के समक्ष दिया गया बयान जाँच का विषय है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 398 में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य सरकार गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दृष्टि से राज्य के लिए एक गवाह संरक्षण योजना/डब्ल्यूपीएस तैयार और अधिसूचित करेगी। कानून की नजर में चश्मदीद (Eyewitness) के मीडिया में दिए गए बयान की बहुत सीमित और अक्सर अप्रत्यक्ष अहमियत होती है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (बीएनएसएस) के अनुसार, मीडिया में दिया गया बयान कुछ स्थितियों में संदर्भ या संकेत के रूप में उपयोग किया जा सकता है, लेकिन यह न्यायालय के लिए स्वीकार्य साक्ष्य (admissible evidence) नहीं माना जाता। यह न्यायालय में मान्य साक्ष्य के रूप में तब तक स्वीकार्य नहीं होता, जब तक कि उसे पुलिस द्वारा या अदालत के समक्ष विधिवत दर्ज नहीं किया जाता।
रीना सिंह कहती हैं कि मीडिया में दिया गया बयान बाहरी प्रभाव में हो सकता है, इसलिए उसे न्यायालय की निष्पक्ष प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जाता। गवाह पर दबाव, डर या पक्षपात के चलते ऐसे बयान दिए जा सकते हैं। मीडिया में दिया गया बयान संकेतक (indicator) या प्राथमिक जानकारी के रूप में पुलिस या अदालत के ध्यान में लाया जा सकता है।
बकौल रीना सिंह, “अगर यह बयान मामले की जाँच या अदालत में महत्वपूर्ण हो सकता है तो पुलिस या अदालत उस गवाह को समन भेजकर उसका बयान दर्ज कर सकती है। अदालत में दिए गए बयान के दौरान गवाह के बयान को प्रतिपरीक्षण के माध्यम से सत्यापित किया जा सकता है। मीडिया में दिए गए बयानों को प्रतिपरीक्षण का मौका नहीं मिलता, इसलिए इसे पूर्ण रूप से सत्य नहीं माना जा सकता।”
मीडिया में दिए गए बयान को अक्सर गैर-स्वीकृत साक्ष्य (hearsay evidence) के रूप में माना जाता है, क्योंकि यह अदालत में दिए गए साक्ष्य से प्रमाणित नहीं होता है। न्यायालय में मान्य गवाही वही होती है जो अदालत के सामने, शपथ के तहत दी गई हो और जिसका प्रतिपरीक्षण (cross-examination) किया जा सके।
अगर कोई पीड़ित या चश्मदीद मीडिया में इस तरह का बयान देता है तो पुलिस को खुद उस तक पहुँचना चाहिए या फिर उसके थाने आने का इंतजार करना चाहिए? इस सवाल पर रीना सिंह कहती हैं, “भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 181 के तहत पुलिस गवाहों का बयान दर्ज कर सकती है। इस प्रक्रिया में पुलिस गवाह से मिलने उसके निवास स्थान पर जा सकती है और वहीं पर उसका बयान दर्ज कर सकती है।”
रीना सिंह कहती हैं कि गवाह को थाने आने की आवश्यकता नहीं होती है, जब तक कि पुलिस द्वारा उसे समन या नोटिस न भेजा गया हो। पुलिस गवाह को जाँच में सहयोग देने के लिए थाने आने का नोटिस या समन भेज सकती है। यह केवल तब किया जाता है जब पुलिस को उसकी मौजूदगी आवश्यक लगे। वर्तमान में भारतीय कानून के तहत पुलिस का यह उत्तरदायित्व है कि वह गवाह तक पहुँचे और उसका बयान ले, न कि थाने आने का इंतजार करे।

‘भारत माता की जय’ कहने से बढ़ती है दुश्मनी… हाई कोर्ट ने कर्नाटक पुलिस को रगड़ा: कहा- यह नफरती नारा नहीं, यह सद्भाव बढ़ाता है


कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा है कि ‘भारत माता की जय’ बोलना नफरत फैलाना नहीं है। ‘भारत माता की जय’ बोलने से सिर्फ सद्भाव बढ़ता है, वैमनस्य नहीं फैलता। इसके साथ ही कोर्ट ने दो समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने, अपमान और धमकी से संबंधित भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं में दर्ज FIR को रद्द कर दिया। कर्नाटक पुलिस ने पाँच हिंदुओं के खिलाफ दर्ज की थी।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में IPC की धारा 153A के तहत दर्ज प्राथमिकी को खारिज करते हुए कहा कि भारत माता की जय कहना किसी भी तरह से धर्मों के बीच वैमनस्यता या दुश्मनी को बढ़ावा देने के रूप में नहीं माना जा सकता है। एकल न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना ने पाँचों आरोपितों को राहत दी है।

एफआईआर को रद्द करते हुए न्यायाधीश नागप्रसन्ना ने कहा, “उपर्युक्त तथ्यों और ऊपर दिए गए निर्णयों के आलोक में इस मामले की जाँच की अनुमति देना भी प्रथम दृष्टया भारत माता की जय बोलने की जाँच की अनुमति देना होगा। यह किसी भी तरह से धर्मों के बीच वैमनस्य या दुश्मनी को बढ़ावा देने वाला नहीं हो सकता है।”

याचिकाकर्ताओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने भी कहा कि यह याचिकाकर्ताओं द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत का यह एफआईआर जवाबी हमला था। न्यायाधीश ने आगे कहा कि मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A का एक भी तत्व पूरा नहीं होता है। कोर्ट ने इस मामले को धारा का दुरुपयोग बताया।

हाईकोर्ट ने कहा “धारा 153A के अनुसार, यदि विभिन्न धर्मों के बीच शत्रुता को बढ़ावा दिया जाता है तो यह अपराध है। वर्तमान मामला आईपीसी की धारा 153ए के दुरुपयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह इन याचिकाकर्ताओं द्वारा दर्ज की गई शिकायत का जवाबी हमला है। बचाव पक्ष का कहना है कि याचिकाकर्ता भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे और देश के प्रधानमंत्री की प्रशंसा कर रहे थे।”

कोर्ट ने आगे कहा, “शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों में इनमें से किसी भी बात का उल्लेख नहीं है। शिकायतकर्ता और अन्य लोगों की सुरक्षा के लिए याचिकाकर्ताओं की खाल उधेड़ने की कोशिश की जा रही है। यह आईपीसी की धारा 153A के एक भी तत्व को पूरा नहीं करता है।”

न्यायाधीश नागप्रसन्ना ने कहा, “IPC की धारा 153A के तहत जवाबी हमले के एक शुद्ध मामले को अपराध के रूप में पेश करने की कोशिश की जा रही है। धारा 153A के तहत शिकायत को सही साबित करने के लिए जो तत्व आवश्यक हैं, उन्हें इस न्यायालय को लंबे समय तक रोके रखने या मामले की गहराई से जाँच करने की आवश्यकता नहीं है।”

क्या है मामला?

दरअसल, केस रद्द कराने की माँग लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट पहुँचे पाँच याचिकाकर्ताओं का कहना था कि 9 जून 2024 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ लेने के बाद वे रात 8.45 से 9.15 के बीच समारोह से लौट रहे थे। आरोप है कि जब वे दक्षिण कन्नड़ जिले की उल्लाल तालुका में बोलीयार ग्राम के समादान बार पहुँचे तो 25 लोगों ने उन पर हमला कर दिया।
हमलावरों ने उनसे कहा कि ‘तुम भारत माता की जय के नारे कैसे लगा सकते हो’। इसके बाद उन पर चाकू से भी वार किया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उसी रात 11 बजे 23 लोगों के विरुद्ध घटना की एफआईआर दर्ज कराई गई। चोटों के कारण वे लोग अस्पताल गए और पुलिस ने रात 12 बजे वहीं उनका बयान दर्ज किया।
अगले दिन सुबह मैंगलोर निवासी पीके अब्दुल्ला नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति ने याचिकाकर्ता हिंदुओं के खिलाफ एक काउंटर FIR दर्ज कराई। अब्दुल्ला ने अपनी FIR में आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता सुरेश, विनय कुमार, सुभाष, रंजन और धनंजय ने उसे धमकी दी और कहा कि वह तुरंत देश छोड़ दे। अब्दुल्ला ने खुद को स्थानीय मस्जिद का अध्यक्ष बताया था। 
अब्दुल्ला नाम के मुस्लिम व्यक्ति की शिकायत पर पुलिस ने पाँचों याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध IPC की धारा 143, 147, 148, 153A, 504, 506 और 149 में केस दर्ज कर लिया। IPC की धारा 153A धर्म, जाति और जन्म स्थान के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने को दंडित करती है।

भगवान राम पर की अपमानजनक टिप्पणी, हिंदू लड़के ने दिया जवाब तो भड़क गए कट्टरपंथी: नासिक में ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाते हुए भीड़ ने किया उपद्रव

                        नासिक में मुस्लिम भीड़ की हिंसा (ऑपइंडिया द्वारा हासिल की गईं तस्वीरें)
महाराष्ट्र में नासिक शहर के जय भवानी इलाके में गुरुवार (4 अप्रैल 2024) को हजारों मुस्लिमों की भीड़ ने सर तन से जुदा के नारे लगाए और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचा। मुस्लिमों ने सिटी लिंक बसों और हिंदुओं के निजी वाहनों पर भी हमले किए। भीड़ ने संकेत सौदागर नाम के एक लड़के पर इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा पर अपमानजनक टिप्पणी का आरोप लगाया है।

रमज़ान के महीने में शहर के मुस्लिम इकट्ठा होकर इस हिंदू व्यक्ति के लिए मौत की सज़ा की माँग की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट साझा करके कहा गया कि सौदागर ने फातिमा अल-ज़हरा के खिलाफ टिप्पणी करके गंभीर अपराध किया है और वह ‘सर तन से जुदा’ सजा का हकदार है। पोस्ट की तस्वीरें और वीडियो ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त किए गए हैं।

झगड़े की शुरुआत मुस्लिम समुदाय द्वारा बताई जा रही है। ऑपइंडिया को एक्सक्लूसिव तौर पर मिली जानकारी के मुताबिक, घटना पिछले हफ्ते की है। नासिक में हिंदू समुदाय आगामी रामनवमी उत्सव (17 अप्रैल) की तैयारी कर रहा है। इस दौरान सौदागर समेत हिंदू समुदाय के लोगों ने तैयारियों के बारे में इंस्टाग्राम पर पोस्ट करना शुरू कर दिया, लेकिन मुस्लिम समुदाय के लोगों को यह बर्दाश्त नहीं हुआ।

नाम नहीं छापने की शर्त पर एक स्थानीय हिंदू ने ऑपइंडिया को बताया कि मुस्लिमों हिंदुओं द्वारा पोस्ट की गई तैयारियों वाले पोस्ट पर भगवान राम के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी शुरू कर दी। इनमें ‘ख्वाजा’ नाम का एक लड़का भी शामिल था। उन्होंने अन्य मुस्लिमों के साथ मिलकर आगामी हिंदू त्योहार रामनवमी की तैयारियों का अपमान किया करना शुरू कर दिया।

                                                       संकेत सौदागर के खिलाफ प्रदर्शन

विपिन (बदला हुआ नाम) ने बताया, “शुरुआती लड़ाई केवल दो व्यक्तियों के बीच थी। सौदागर भगवान राम का अपमान सहन नहीं कर सके। फिर उन्होंने मुस्लिमों को उन्हीं के शब्दों में जवाब दिया। उन्होंने इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद की बेटी फातिमा अल-ज़हरा के बारे में कुछ टिप्पणी की। मुस्लिम यही चाहते थे।”

विपिन ने आगे कहा, “उन्होंने (मुस्लिमों ने) भगवान राम के बारे में गलत टिप्पणी करके लड़ाई शुरू कर दी और हिंदू लड़के को यह अनुचित कदम उठाने के लिए मजबूर किया। इस पोस्ट के स्क्रीनशॉट को मुस्लिमों ने अपने समूहों में साझा किया, जिसके कारण वे सौदागर की मौत की माँग करने के लिए इकट्ठा हो गए।”

                                                      मुस्लिम भीड़ द्वारा बस में तोड़फोड़

उन्होंने कहा कि हिंसा भड़कने के बाद मुस्लिमों ने भगवान राम के खिलाफ की गई सभी टिप्पणियों को हटा दिया। इसके साथ ही सौदागर द्वारा उन्हें और उनके समुदाय को निशाना बनाने के लिए उनके पोस्ट के स्क्रीनशॉट ले लिए। उत्पाद के दौरान मुस्लिमों की भीड़ ने ‘सर तन से जुदा’ के नारे भी लगाए और हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया।

विश्व हिंदू परिषद ने इस घटना का संज्ञान लिया और शहर के पुलिस को पत्र लिखकर मुस्लिम समुदाय के लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की। अपने पत्र में विश्व हिंदू परिषद ने लिखा, “कुछ व्यक्तियों ने सोशल मीडिया पर हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियाँ पोस्ट कीं। उसके बाद उन्होंने कामान को नष्ट कर दिया जो देवी तुलजाभवानी मंदिर समारोह के लिए स्थापित किया गया था।”

                                         विश्व हिंदू परिषद का पुलिस को लिखा गया पत्र

अपने पत्र में विश्व हिंदू परिषद ने आगे लिखा, “उन्होंने (मुस्लिमों ने) मंदिर के कमान पर पथराव किया और हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया। इसके अलावा, उन्होंने सड़कों को अवरुद्ध कर दिया, वाहनों और सार्वजनिक बसों में तोड़फोड़ की। नासिक शहर का मौजूदा माहौल चिंताजनक है। हम उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग करते हैं।”

नवीनतम अपडेट के अनुसार, पुलिस ने किसी के धर्म के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करने को लेकर सौदागर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है और उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, भगवान राम के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने वाला मुस्लिम शख्स फरार बताया जा रहा है।

(सिद्धि सोमानी की यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुई है। विस्तार से पढ़ने से इस लिंक पर क्लिक करें।)