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जिन मोर्चों से भागती रही कांग्रेस, उन पर डटे रहे मोदी: OROP से अग्निपथ तक सेना को दी ताकत, 2014 में गोला-बारूद का भी था टोटा

                                            पीएम मोदी एवं सैन्य सुधार (फोटो साभार: टाइम्स नाऊ/इंडिया अहेड)
आज सडकों पर उपद्रव, धरने और आगजनी आदि से विपक्ष भारत में अशांति फैलाकर क्या सिद्ध करना चाहता है? इन मुद्दों पर देश का माहौल ख़राब किया जा रहा है, क्या वह राष्ट्र एवं जनहित में है? क्या कभी चिंतन करने का साहस कर सकते हो? यह देश का दुर्भाग्य है कि आज विपक्ष पूर्णरूप से दिशाहीन हो चूका है। लोकतंत्र को शक्तिशाली बनाने के लिए विरोध बहुत जरुरी है और उसके लिए बुद्धि की जरुरी है, जिसका शायद विपक्ष के पास अकाल पड़ चूका है। मुद्दे एक नहीं हज़ारों हैं, जिन पर सरकार को घेरा जा सकता है, लेकिन उसके लिए हिम्मत चाहिए, तुष्टिकरण नहीं। लेकिन कुछ मुद्दों पर मोदी सरकार भी भीगी बिल्ली नज़र आयी। 

नूपुर शर्मा के विरुद्ध उपजा विवाद एक ही दिन में समाप्त हो सकता था, बशर्ते कट्टरपंथियों और इनके समर्थकों से यह पूछा जाता कि जो नूपुर ने जो कहा है वह हदीस में लिखा है या नहीं? जब वही बात ज़ाकिर नाइक बोले ठीक फिर नूपुर गलत क्यों? क्या यह दोगलापन नहीं? ज्ञानवापी का सर्वे करवाने वाले जज को धमकी, क्यों? क्यों नहीं तुरंत गिरफ्तार किया धमकी देने वाले को। दूसरे, श्रीराम से लेकर शिवलिंग और कृष्ण भगवानों तक के लिए अपशब्द बोलने वालों पर तुरंत कार्यवाही होनी थी। अगर कार्यवाही हुई होती, किसी तस्लीम रहमानी की नूपुर को उकसाने की हिम्मत नहीं होती। अधिकांश मुसलमानों को यह भी नहीं पता की असली मसला क्या है, नूपुर ने पैगम्बर की शान में कौन-सी गाली दी है, गाली दी है या हदीस में लिखी बात कही है। अपनी TRP बढ़ाने के चक्कर में मीडिया भी असली मुद्दा छुपा गया। अंजाम क्या हुआ, नूपुर विवाद में काशी और मथुरा पर कोई चर्चा ही नहीं होती। और कट्टरपंथी यही चाहते थे। 

दूसरे, अग्निवीर के विरुद्ध युवाओं को भड़काने की बजाए नेताओं और पार्टियों को विरोध करना चाहिए था कि जब अग्निवीरों को पेंशन नहीं फिर नेताओं को पेंशन क्यों? जिस दिन नेताओं को पेंशन बंद हो गयी, हर महीने सरकार को करोड़ों की बचत होगी। महंगाई पर फर्क पड़ेगा। परन्तु उस पर कोई नहीं बोलता, क्योकि उससे नेताओं को ही नुकसान है। तीसरे, सरकार चाहिए कि मुंह को ढककर पत्थरबाज़ी या उपद्रव करने वालों पर लाठीचार्ज नहीं रबर बुलेट चलानी चाहिए। 

भारतीय सेना में एक महत्वपूर्ण सुधार के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अग्निपथ योजना की शुरुआत की है। हालाँकि, कांग्रेस सहित विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे है। कांग्रेस का कहना है कि कृषि कानूनों की तरह ही इसे भी वापस लेना पड़ेगा है।

राहुल गाँधी ने कहा कि युवाओं को भाजपा कार्यालयों में चौकीदार नहीं बनाना है, कि वे अग्निवीर बनें। कांग्रेस इसे सेना को खत्म करने की साजिश बताया है। वहीं, भाजपा इसे सेना में सुधार की प्रक्रिया में उठाया गया एक क्रांतिकारी कदम कहा है।

आज कांग्रेस भाजपा पर सेना को कमजोर और खत्म करने का आरोप लगा रही है तो हमें देखना होगा कि कांग्रेस ने सेना को मजबूत और देश की सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए क्या किया है। इस देश में कांग्रेस ने लंबे समय, लगभग 40 सालों तक शासन किया है।

साल 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में पहली बार केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी, तब देश के हालात बहुत बढ़िया नहीं थे। हम खासतौर पर सुरक्षा हालातों की बात कर रहे हैं। उस समय देश के पास ना तो पर्याप्त गोला-बारूद थे और ना ही अत्याधुनिक हथियार। पुराने पड़ चुके लड़ाकू विमान अपनी अंतिम साँसें गिन रहे थे।

कांग्रेस शासन में सेना के पास गोला-बारूद तक नहीं थे

साल 2012 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार में रक्षा मामलों की संसदीय समिति ने एक रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट ने देश में सनसनी मचा दी थी। समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि सेना के पास गोला बारूद, सैन्य यंत्र, हेलीकॉप्टर, टैंकों के गोले आदि की भारी कमी है। सैनिकों के पास बुलेट प्रूफ जैकेट और साजो-सामान तक नहीं हैं।
इसको लेकर तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने प्रधानमंत्री मनमोहन को पत्र भी लिखा था और इस पर तुरंत संज्ञान लेने की बात कही थी। तब रक्षा मंत्री एके एंटनी ने इसे अफवाह बताते हुए इसे खारिज कर दिया था। संसदीय समिति की रिपोर्ट आने के बाद एंटनी के पास देने के लिए जवाब नहीं था।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि थल सेना के विमानन प्रभाग में 18 चीता, 1 चेतक, 76 एडवांस लाइट हेलिकॉप्टर (एएलएच) और 60 एडवांस लाइट हेलिकॉप्टर (हथियार प्रणाली युक्त) की कमी है। गोला बारूद से जुड़ी समस्याएँ और भी बढ़ गई हैं और इतने गोला-बारूद में सिर्फ कुछ दिन ही लड़ाई लड़ी जा सकती है।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में सैनिकों के लिए 1,86,138 बुलेटप्रूफ जैकेट की कमी बताई और कहा था कि सेना की ओर से इसे बार-बार उठाया गया, लेकिन सरकार ने कभी ध्यान नहीं दिया। समिति ने यह भी कहा था कि वायु सेना के पास 42 की जगह सिर्फ 31 फाइटर स्क्वैड्रन रह गए हैं। इनमें से अधिकांश लड़ाकू विमान 30 साल से अधिक पुराने हैं।

कंपनियों को कांग्रेस ने किया था ब्लैकलिस्ट

रिपोर्ट में कहा गया था कि सीबीआई ने छह कंपनियों के खिलाफ शिकायत दर्ज की थी, जिसके कारण इन्हें पिछले 10 सालों से काली सूची में डाल रखा गया था। इजराइल मिलिट्री इंडस्ट्री जैसी कंपनी को काली सूची में डाल देने से गोला-बारूद का संकट बढ़ गया है।
ये वो दौर था जब तुष्टिकरण के लिए सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा को ताक पर रखकर फिलीस्तीन और उसके समर्थकों की गोद में खेलती नजर आती थी। भारतीय वैज्ञानिकों की लगातार हत्याएँ हो रही थीं और नंबी नारायण जैसे वैज्ञानिक पर देशद्रोह के मुकदमे चल रहे थे, लेकिन सरकार को इन सब चीजों से कोई विशेष फर्क पड़ने वाला नहीं था।
कारगिल में पाकिस्तानी हमले के बाद कारगिल पर गठित समिति ने कई सिफारिशें की थीं, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया था। कॉन्ग्रेस का लक्ष्य सिर्फ वोट की राजनीति करना रह गया और देश की सुरक्षा उसकी प्राथमिकता में कभी रहा ही नहीं।

तख्ता पलट का आरोप लगाकर सेना को बदनाम करने की कोशिश

कश्मीर में लगातार सैनिक मारे जा रहे थे, देश भर में आतंकी हमले हो रहे थे, चीन अरुणाचल में घुसपैठ कर रहा था, फिर भी कांग्रेस सरकार राजनीति करने में व्यस्त थी। यहाँ तक कांग्रेस ने उसकी बात नहीं मानने वाले सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह पर तख्ता पलट करने का आरोप लगाकर सेना को बदनाम करने की कोशिश की थी।
विश्व को लोकतंत्र देने वाला भारत बीसवीं सदी के अंत में लोकतंत्र की अकर्मण्य सरकारों की त्रासदी का शिकार बन गया था। 21वीं सदी का पहला दशक बीतते-बीतते भारत तुष्टिकरण, लोक-लुभावन वादों और राजनीति के कारण हर क्षेत्र में पिछड़ता चला गया। दो तरफ से उत्पाती पड़ोसी मुल्कों से घिरे होकर भी वह दृष्टिहीन सरकारों के कारण सुरक्षा के लिए भगवान भरोसे रह गया था।

साल 2014 में पीएम मोदी के सामने चुनौतियाँ

साल 2014 में जब भाजपा की सरकार बनी तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीमा पर घात लगाए खड़े दुश्मनों से देश की सुरक्षा के लिए प्रयास करने शुरू कर दिए। मोदी सरकार ने सबसे पहले चीन सीमा और पाकिस्तान सीमा पर सड़क और अन्य आधारभूत संरचनाओं के विकास पर जोर देना शुरू कर दिया। इसके अलावा, हथियारों की पर्याप्त खरीद के लिए बजट का आवंटन किया।
मोदी सरकार ने चीन से लगी 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा पर सड़क से लेकर रेल, वायुमार्ग का तेज गति से विकास किया गया। दुर्गम रास्तों पर सेना को पहुँचाने के नदियों पर पुलिस और पर्वतों पर सुरंगें एवं सड़कें बनाई गईं। विमानों को लैंड कराने के लिए एयरपोर्ट डेवलप किए गए।

आत्मनिर्भरता के लिए मेक इन इंडिया प्रोग्राम

मोदी सरकार ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए भारत में मेक इन इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत की। सरकार ने रक्षा क्षेत्र को निजी उद्यमियों के लिए खोला। इसके साथ ही विदेशी कंपनियों के साथ तकनीकी साझेदारी को लेकर पार्टनरशिप पर फोकस किया। रक्षा क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकार ने FDI को 100 प्रतिशत कर दिया।
मोदी सरकार ने अग्नि सीरीज की कई मध्यम रेंज और ब्रह्मोस जैसी मध्यम एवं दूर रेंज की मिसाइलों का सफल परीक्षण कर इन्हें सेना में शामिल किया। इसके अलावा आकाश मिसाइल को सफलतापूर्वक शामिल किया गया है। भारत ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन को विकसित किया। इसके अलावा, स्वदेशी स्वदेशी लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर को वायुसेना में शामिल किया जा चुका है। 
भारत में निर्मित जंगी जहाजों और पनडुब्बियों के माध्यम से नौसेना की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाया गया। सेना के पास अब भारत में बने टैंक, मिसाइल और हैंड ग्रेनेड हैं। इसके साथ ही DRDO द्वारा विकसित मारीच सिस्टम का सफलतापूर्वक परीक्षण हो चुका है। यह भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड 850 करोड़ की लागत से नौसेना के लिए तैयार करेगा।
सरकार ने सेना के लिए 1.86 लाख बुलेट प्रुफ जैकेट्स स्वदेशी रक्षा निर्माताओं से खरीदे। इसके साथ ही यूपी के अमेठी में 5100 करोड़ का प्रोजेक्ट लगाया, जिसमें एके-203 राइफलें बनायीं जाएँगी। ये मेक इन इंडिया के लिए शानदार उपहार है। 
आईएनएस कलवारी एस-21 स्कोर्पीन क्लास पनडूब्बी, करंज और वेला पनडूब्बी नौसेना को देकर उसके हाथ मजबूत किए गए। इसके अलावा, रक्षा क्षेत्र में स्टार्टप्स को सरकार ने बढ़ावा दिया। परिणाम ये हुआ कि ड्रोन बनाने के क्षेत्र में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है।

अत्याधुनिक हथियारों की खरीद

पिछले आठ सालों में सेन को सबल बनाने में मोदी सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। पिछले साल मोदी सरकार ने 6,000 करोड़ रुपए की रक्षा खरीद और घरेलू क्षेत्र से खरीद के लिए 70,000 करोड़ रुपए की मंजूरी दी। सेना की वायु रक्षा बंदूकों के आधुनिकीकरण मंजूरी दी गई।
मोदी सरकार ने अमेरिका से चिनूक और रोमियो जैसे खतरनाक हथियार खरीदे। वहीं, फ्रांस से राफेल फाइवर जेट खरीदा गया। भारत ने वायु रक्षा प्रणाली S-400 खरीदने के लिए रूस के साथ समझौता किया। इसके अलावा, भारत ने रूस से ही 70,000 AK-203 असॉल्ट राइफलों की खरीद के लिए एक समझौता किया, जिन्हें अमेठी में बनाया जाएगा।
सेना में मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री के लिए 156 कॉम्बैट वाहन बीएमपी-2 का अधिग्रहण किया गया। नौसेना के जहाजों की एंटी-सबमरीन वारफेयर क्षमता बढ़ाने के लिए एडवांस्ड टॉरपीडो डेकॉय सिस्टम के अधिग्रहण की मंजूरी दी गई। ये तमाम ऐक्शन सेना के हथियारों को उन्नत बनाने और एक शक्तिशाली सेना बनाने की दिशा में किया गया काम था। 
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सेना आज के आधुनिक तकनीकों से लैस विश्व की बेहतर सैन्य व्यवस्था है। भारत के पास अमेरिका, रूस, फ़्रांस और इसराइल में बने अत्याधुनिक हथियार मौजूद हैं। इतना ही नहीं, भारत अब सैन्य साजो-सामान का प्रमुख निर्यातक देश के रूप में भी उभरा है।

सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए सैन्य ताकत का प्रदर्शन

उरी पर आतंकी हमले के ठीक मोदी सरकार ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तान सहित दुश्मनों को चेतावनी दी और साथ ही सेना के मनोबल को उठाया। साल 2016 में सितंबर 28-29 को इस स्ट्राइक में भारत ने आतंकियों के कई शिविरों को नष्ट कर दिया था।
इसके बाद लद्दाख में चीनी सैनिकों के साथ झड़प में काफी हानि उठाने के बाद भी चीन किसी तरह का दुस्साहस करने की कोशिश नहीं कर सका। हालाँकि, इस झड़प में भारत को भी नुकसान हुआ था, लेकिन ताकत का प्रदर्शन एक मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।

CDS की नियुक्ति और आपातकाल में रक्षा खरीद का अधिकार

मोदी सरकार ने तीनों सेना के बीच समन्वय के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) की नियुक्ति का एक बड़ा फैसला लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में स्‍वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले से इस पद के सृजन की घोषणा की थी। तब पीएम मोदी ने कहा था कि CDS सेना के तीनों अंगों- थल सेना, वायु सेना और नौसेना के अध्यक्षों से वरीयता क्रम में ऊपर होगा। 

जनवरी 2020 में थलसेना अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत के सेवानिवृत होने के बाद उन्हें पहला CDS नियुक्त किया गया था। दिसंबर 2021 में एक दुर्घटना में निधन होने तक वे इस पद पर बने रहे थे। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद हाईब्रिड वारफेयर की दुनिया में अहम माना जाता है। इस पद के सृजन की बात 1999 में कारिगल युद्ध के बाद दी गई थी।

ऑर्डिनेंस कंपनियों का एकीकरण

मोदी सरकार ने आपातकाल में कल-पुर्जे और गोला-बारूद की खरीद करने की ताकत भी सेना को दे दी। अब कोई भी सर्विस हेडक्वार्टर्स 300 करोड़ रुपए तक की खरीद खुद कर सकता है। वहीं, अब रक्षा मंत्रालय को भी 2,000 करोड़ रुपए तक की रक्षा खरीद के लिए कैबिनेट की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है।

अक्टूबर 2021 में 41 ऑर्डिनेस कंपनियों को एकीकृत कर 7 नयी कंपनियाँ बनायी गईं, जिनमें से 6 कंपनियों ने मुनाफा कमाना शुरू कर दिया है। इसके अलावा, मोदी सरकार ने 100 करोड़ रुपए का एक कॉर्प्स फंड बनाया है। इसका प्रयोग रक्षा उत्पादन में लगे भारतीय उद्योग, खासकर मध्यम और सूक्ष्म उद्योग रक्षा उत्पादों के भारतीयकरण पर काम कर सकें।

वन रैंक वन पेंशन को लागू करना

एक महत्वपूर्ण सुधार के तहत मोदी सरकार ने दशकों से लंबित वन रैंक वन पेंशन को लागू कर दिया। इसके तहत 20.6 लाख पेंशन धारकों या उनके परिवार वालों को बकाया राशि दी गयी। इस योजना पर सरकार सालाना लगभग 7,123 करोड़ रुपए खर्च कर रही है।

इसके साथ ही सरकार ने स्पर्श योजना शुरुआत की, जिसके तहत पेंशन धारकों को उनके बैंक खाते में सीधे पैसा मिलने लगा। इस स्पर्श प्लेटफॉर्म पर 5 लाख से ज्यादा पेंशन धारक है, जिन्हें 2021-22 में 11,600 करोड़ रुपए दिए गए।

अग्निपथ: सेना को जवान बनाए रखने की कोशिश

कारगिल समीक्षा समिति की रिपोर्ट के आधार पर सैन्य सुधारों को आगे बढ़ाते हुए मोदी सरकार ने अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीरों की नियुक्ति की मंजूरी दी है। यह सुधार तीन मायनों में प्रमुख है। पहली बात, सेना पर से खर्च का दबाव कम करना ताकि वह अपने आधुनिकीकरण पर ध्यान दे सके। दूसरे, सेना की औसत आयु को कम करना, ताकि सेना हमेशा जवान और फिट बनी रहे। तीसरा, आपातकालीन स्थिति में देश में प्रशिक्षित लोगों की तैयार करना, जो जरूरत पर देश के काम आए।

अग्निपथ योजना के तहत सरकार ने तीनों सेनाओं में अग्निवीरों की भर्ती का ऐलान किया है। यह भर्ती सिर्फ 4 वर्षों के लिए की जाएगी। इसके लिए 17.5 साल से 21 साल की उम्र निर्धारित की गई है। इन चार वर्षों में अग्निवीर सेवा से अलग नहीं हो सकते। अगर ऐसा करने की कोशिश करते हैं तो उन्हें शीर्ष अधिकारियों की स्वीकृति लेनी पड़ेगी।

सैन्य सुधार के लिए करगिल रिव्यू कमिटी की सिफारिशें

सैन्य सुधारों की दिशा में करगिल रिव्यू कमिटी की सिफारिशें महत्वपूर्ण थी। कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था, “सेना को हर समय जवान और फिट रहना चाहिए। इसलिए 17 साल की सेवा (जैसा कि 1976 से नीति रही है) की वर्तमान प्रथा के बजाय, यह सलाह दी जाएगी कि सेवा को सात से दस साल की अवधि तक कम कर दिया जाए। इसके बाद अधिकारियों और जवानों को देश के अर्धसैनिक बलों में सेवा के लिए मुक्त कर दिया जाए।”

समिति ने महसूस किया था कि 1999-2000 में सेना का ₹6,932 करोड़ का पेंशन बिल कुल वेतन बिल का लगभग दो-तिहाई था और यह हर साल तेजी से बढ़ रहा था। इस वर्ष के बजट में रक्षा के लिए ₹5.25 लाख करोड़ आवंटित किए गए हैं। इनमें से ₹1,19,696 करोड़ अकेले पेंशन के लिए आवंटित किए गए हैं। इसका अर्थ है कि रक्षा बजट का लगभग 25% केवल पेंशन के भुगतान के लिए खर्च किया जाता है। वन रैंक वन पेंशन (OROP) योजना के लागू होने के बाद सेना की पेंशन में तेजी से वृद्धि हुई है।

कारगिल समिति ही नहीं, भारतीय सेना ने भी जनशक्ति लागत को बचाने के लिए अग्निपथ योजना के समान एक भर्ती योजना का प्रस्ताव दिया था। सेना ने 2020 में युवाओं को 3 साल के लिए भर्ती करने के लिए ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ योजना का प्रस्ताव दिया था। मौजूदा योजना में इस प्रस्ताव के साथ कई समानताएँ हैं। हालाँकि, सेना द्वारा प्रस्तुत योजना में सेवा अवधि 4 साल के बजाय 3 साल तय की गई थी।

कर्नाटक बुर्का विवाद : ‘एक नया मुस्लिम राष्ट्र ‘उर्दिस्तान’ बनाओ’: खालिस्तानी आतंकी संगठन, पन्नू ने मुस्लिमों को देश तोड़ने के लिए भड़काया

                                                             पन्नू के वीडियो का स्क्रीनशॉट
कर्नाटक के उडुपी जिले में स्थित पीयू कॉलेज में हिजाब पहनने को लेकर मुस्लिम लड़कियों के द्वारा शुरू किए गए विवाद में तालिबान के बाद अब खालिस्तान की एंट्री हो गई है। खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) ने इस मामले में कूदते हुए मुस्लिमों को एक ‘नया मुस्लिम देश’ और ‘हिजाब’ के मुद्दे पर देश में जनमत संग्रह कराने के लिए भड़काया है।

हिजाब विवाद को हवा देते हुए खालिस्तानी एसएफजे प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नू ने झूठ फैलाया कि भारत सरकार देश में हिजाब को पूरी तरह से बैन करने जा रही है। उसने कहा कि आज हिजाब पर प्रतिबंध लगाने के बाद अजान और फिर नमाज व कुरान पर पूरी तरह से बैन लगा दिया जाएगा।

अपने वीडियो में पन्नू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बदनाम करने की कोशिश करते हुए कहा, “मोदी का भारत को हिंदू राष्ट्र बनना चाहता है। भारत के 20 करोड़ मुस्लिमों को क्या करना चाहिए? हिजाब जनमत संग्रह शुरू करो। जिससे भारत टूटेगा, कमजोर होगा। जिससे भारतीय संघ को तोड़कर एक नया मुस्लिम राष्ट्र ‘उर्दिस्तान’ बनाओ।”

अपने दुष्प्रचार को आगे बढ़ाते हुए पन्नू वीडियो में आगे कहता है, “1992 में उन्होंने बाबरी मस्जिद को तोड़ा, मुस्लिम चुप रहे, गुजरात में मुस्लिमों की निर्मम हत्या हुई फिर भी मुस्लिम चुप रहे। उन्होंने कश्मीर पर कब्जा कर लिया और मुस्लिम चुप रहे। जब कोई आपके धार्मिक प्रतीकों और विश्वासों पर हमला करे तो आपको चुप नहीं रहना चाहिए।”

खालिस्तानी चरमपंथी पन्नू कहता है कि हिजाब मुस्लिमों का मौलिक अधिकार है, उनका जन्म सिद्ध अधिकार है। पन्नू ने कहा कि पंजाब को भारत के कब्जे से मुक्त कराने के लिए सिख खालिस्तान जनमत संग्रह की तरफ जा रहे हैं। हम आपका (इस्लामवादियों) मार्गदर्शन करेंगे, आपको संगठित करेंगे और फंड भी देंगे। आप भारतीय संघ को तोड़कर एक ‘नया मुस्लिम देश’ बनाने के लिए जनमत संग्रह करो। नया उर्दिस्तान बनाओ। इसके साथ ही उसने भारत के मुस्लिमों को पाकिस्तान से सीखने की भी सलाह दी है।

                                                    हिजाब पर जनमत संग्रह वाली वेबसाइट का स्क्रीनशॉट

SFJ प्रमुख ने अपने चरमपंथी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए ‘हिजाब जनमत संग्रह’ के नाम से एक वेबसाइट भी बना ली है। उसने कट्टरपंथी इस्लामिस्टों से वेबसाइट पर अपना नाम, व्हाट्सएप नंबर और ईमेल आईडी साझा करने को कहा है। यहीं नहीं पन्नू ने ‘उर्दिस्तान’ का नक्शा भी बना लिया है। उसकी कोरी कल्पना से भरे देश में राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल को शामिल किया गया है। हालाँकि, हिजाब विवाद वाला राज्य कर्नाटक इसमें नहीं है।

इससे पहले तालिबान ने भी कर्नाटक में बुर्का पहनने वाली लड़कियों को भी समर्थन दिया था।

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कर्नाटक बुर्का विवाद पर स्टेटस लगाने से 300+ मुस्लिमों का उत्पात: क्यों घर से बाहर खींचकर हिंदू व्
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कर्नाटक हिजाब मामला

कर्नाटक के उडुपी जिले के पीयू कॉलेज में हिजाब का यह मामला सबसे पहले 2 जनवरी 2022 को सामने आया था, जब 6 मुस्लिम छात्राएँ क्लासरूम के भीतर हिजाब पहनने पर अड़ गई थीं। कॉलेज के प्रिंसिपल रूद्र गौड़ा ने कहा था कि छात्राएँ कॉलेज परिसर में हिजाब पहन सकती हैं, लेकिन क्लासरूम में इसकी इजाजत नहीं है। बाद में इसके विरोध में मुस्लिम महिलाओं ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर हिजाब को अपना मौलिक अधिकार बताते हुए कक्षाओं में इसे पहनने की छूट माँगी थी। हालाँकि, हिजाब पहनने पर अड़ी मुस्लिम छात्राओं के विरोध में हिंदू छात्र भी भगवा स्कॉर्फ लेकर कॉलेज जाने लगे।

इसरो वैज्ञानिक के खिलाफ साजिश, गल्फ में रॉ पर चोट… : पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की राष्ट्रवाद से खुन्नस पुरानी

भारत में मुस्लिम कट्टरपंथी को बढ़ावा देने वाले महात्मा गाँधी और गाँधी की विरासत(विस्तार से जानने के लिए नाथूराम गोडसे के कोर्ट में दर्ज 150 बयानों को पढ़ना पड़ेगा) को कांग्रेस बढ़ाती रही। जो व्यक्ति गुप्तचर एजेंसियों को दांव पर लगाता रहा, उसे ही देश का उप-राष्ट्रपति बना दिया।  
देश के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को एक बार फिर से देश मे असहिष्णुता (Intolerance) नजर आने लगी है। उन्हें देश में एक बार फिर से लोकतंत्र खतरे में दिखाई देने लगा है। उन्होंने 27 जनवरी 2022 को इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए हिंदू राष्ट्रवाद (Hindu Nationalism) पर चिंता व्यक्ति की। अंसारी ने कहा कि देश में धार्मिक आधार पर लोगों को बाँटा और धर्म विशेष के लोगों को उकसाने की कोशिश की जा रही है।

 गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) के मौके पर हामिद अंसारी ने देश के लोकतंत्र की आलोचना की और कहा कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है और ये अब संवैधानिक मूल्यों से हट गया है। हिंदू राष्ट्रवाद पर चिंता व्यक्त करते हुए अंसारी ने भारत के ‘बहुलतावादी संविधान के संरक्षण’ भाषण दिया। उन्होंने कहा था, ‘‘हाल के वर्षों में हमने उन प्रवृत्तियों और प्रथाओं के उद्भव का अनुभव किया है, जो नागरिक राष्ट्रवाद के सुस्थापित सिद्धांत को लेकर विवाद खड़ा करती हैं और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक नई एवं काल्पनिक प्रवृति को बढ़ावा देती हैं। वह नागरिकों को उनके धर्म के आधार पर अलग करना चाहती हैं, असहिष्णुता को हवा देती हैं और अशांति और असुरक्षा को बढ़ावा देती हैं।’’

इसके साथ ही अंसारी ने खुद से ही अपनी पीठ भी थपथपाई और बताया कि उपराष्ट्रपति के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान देश की संसदीय प्रणाली और कानून पूरी तरह से पारदर्शीा था। खास बात यह है कि जिस ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) के वर्चुअल कार्यक्रम में हामिद अंसारी ने हिस्सा लिया उस पर पहले से भी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े होने के आरोप हैं।

पहले भी देश विरोधी बयान देते रहे हैं हामिद अंसारी

हामिद अंसारी के जिस बयान को लेकर बवाल मचा हुआ है। ऐसी बातें वो पहले भी कर चुके हैं। मुस्लिमों को भारत में असुरक्षित बताने वाले हामिद अंसारी ने पिछले साल जनवरी 2021 में जी न्यूज के एंकर अमन चोपड़ा को एक इंटरव्यू दिया था। वो अपनी नई किताब ‘बाय मैनी ए हैप्पी एक्सीटेंड’ को प्रोमोट करने शो में गए थे। उस दौरान उन्होंने कहा था कि भारत में मुस्लिम असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। मॉब लिंचिंग के सवाल पर पूर्व उपराष्ट्रपति ने चीख-चीख कर कहा था कि लिंचिंग वास्तव में धार्मिक रूप से प्रेरित है। उन्होंने ये साबित करने की कोशिश की थी कि जब से हिंदू राष्ट्रवादी बीजेपी ने भारत में सत्ता हासिल की है, देश के अल्पसंख्यकों की लिंचिंग बढ़ गई।
यहीं नहीं हामिद अंसारी पर ये भी आरोप लग चुके हैं कि जब वो 1990-92 के दौरान ईरान के राजदूत थे तो उन्होंने गल्फ कंट्री में रॉ के सेटअप को उजागर कर रॉ के अधिकारियों की जिंदगी को खतरे में डाल दिया था। रॉ के पूर्व अधिकारी एनके सूद ने 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर हामिद अंसारी के रोल की जाँच करने की माँग की थी। सूद ने 1991 में भारतीय अधिकारी संदीप कपूर के अपहरण का भी जिक्र किया था। इस मामले में हामिद अंसारी पर लापरवाही का आरोप भी लगा था।
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ISI से जुड़ी संस्था के कार्यक्रम में हामिद अंसारी ने कहा- लोकतन्त्र खतरे में
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ISI से जुड़ी संस्था के कार्यक्रम में हामिद अंसारी ने कहा- लोकतन्त्र खतरे में
इसके साथ ही 2019 में एनके सूद ने इस बात का भी खुलासा किया था। सूद ने बताया था कि रतन सहगल नाम का व्यक्ति हामिद अंसारी का सहयोगी था। उस दौरान वो आईबी में था। रतन सहगल ने ही वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन (Nambi Naraynan) को साजिश में फँसाया था और उनका कैरियर तबाह कर दिया। सूद ने यह भी खुलासा किया था कि हामिद अंसारी का करीबी होने के कारण रतन सहगल अक्सर उन्हें डराया करता था।

26 जनवरी को मोदी और तिरंगा को ब्लॉक करें; ‘कश्मीर छोड़ो-दिल्ली पहुँचो’: आतंकियों से गुरुपतवंत सिंह पन्नू, सिख फॉर जस्टिस

खालिस्तानी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस (SFJ)’ के प्रमुख गुरुपतवंत सिंह पन्नू (Gurupwant Singh Pannu) ने 20 जनवरी 2022 को एक वीडियो जारी किया। इसमें उसने कथित ‘कश्मीरी स्वतंत्रता सेनानियों’ से गणतंत्र दिवस के मौके पर घाटी छोड़कर दिल्ली पहुँचने की अपील की। वीडियो में पन्नू ने देश को तोड़ने की कोशिश करने वाले अलगाववादियों और आतंकियों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ करार दिया है। उसका यह बयान खालिस्तान के लिए ‘अभी या कभी नहीं’ की तर्ज पर था।

यदि इस वर्ष भी पिछली 26 जनवरी 2021 की तरह की हरकत को अंजाम दिया जाए, उससे पूर्व ही सिख समुदाय और समस्त किसान संगठनों को राकेश टिकैत और आन्दोलनजीवियों और खालिस्तानियों के विरुद्ध खड़े होकर विरोध करना चाहिए। क्योकि इन्हीं लोगों के संरक्षण में खालिस्तानी अपना जाल बिछाने में सफल हुए थे। दोबारा गणतंत्र दिवस को कलंकित करने वालों के विरुद्ध अभी से संघर्ष का बिगुल बजाने के साथ-साथ कठोरतम कार्यवाही की मांग करनी चाहिए। क्या देश अपना तीसरा प्रधानमंत्री आतंकवाद की भेंट चढ़ाना चाहेगा?

जब प्रदर्शन में खालिस्तान के शामिल होने पर राकेश टिकैत ही बड़े-बड़े शब्दों में बोलता था कि आंदोलन करते किसानों को खालिस्तानी बताकर कर आंदोलन को बदनाम करने की सरकार द्वारा कोशिश हो रही है। अब धमकियाँ मिलने पर राकेश को खुलकर सामने आकर उनके नाम और ठिकानों का पर्दाफाश करना चाहिए। शायद यही कारण था कि मोदी सरकार ने किसान हितों में बने कानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया था। 

प्रोपेगैंडा वीडियो की शुरुआत में बुर्का पहने हुए एक महिला दिखती है। इसमें वो कहती है, “26 जनवरी को हम कश्मीर और खालिस्तान का झंडा उठाकर मोदी और तिरंगे का रास्ता रोक देंगे। 26 जनवरी को दिल्ली पहुँचें। कश्मीर और खालिस्तान को आजाद करें।”

                                                            SFJ के वीडियो का स्क्रीनशॉट

महिला के इस स्पीच के बाद पन्नू नजर आता है। वो कहता है, “यह संदेश इंडियन आर्मी का सामना कर रहे कश्मीरी लोगों और स्वतंत्रता सेनानियों (इस्लामी आतंकियों) के लिए है। ये संदेश कश्मीर के उन लोगों के लिए है, जिन्हें भारतीय संविधान और इंडियन आर्मी फेक एनकाउंटर के जरिए मार रही है। ये फ्रीडम फाइटर्स का वक्त है। ये वक्त है कश्मीर के लोगों का। आप सब 26 जनवरी को दिल्ली पहुँचकर मोदी और तिरंगा को ब्लॉक करें। जहाँ सिख समुदाय खालिस्तान के झंडे लहरा रहा है, वहाँ आपको कश्मीर का झंडा उठाना चाहिए।”

अपने प्रोपेगैंडा वीडियो में पन्नू कहता है, “दुनिया में किसी को कोई खबर नहीं है कि आप हर दिन बारामुला, अनंतनाग और शोपियाँ में फर्जी मुठभेड़ों में मारे जा रहे हैं। लेकिन 26 जनवरी को जब आप दिल्ली पहुँचोगे तो दुनिया ये देखेगी कि कश्मीर को आजादी चाहिए। 26 जनवरी को दिल्ली पहुँचना है। सिख आजादी चाहते हैं। अभी नहीं तो कभी नहीं।” उसकी स्पीच के दौरान वीडियो में इस्लामी आतंकियों को भी दिखाया गया है।

SFJ के पन्नू के बयान के बाद बुर्के वाली महिला एक बार फिर से वीडियो में दिखती है। वो कहती है, “मेरे कश्मीरी भाइयों और बहनों। सिख फॉर जस्टिस ने सही कहा है कि 26 जनवरी को कश्मीर और खालिस्तान का झंडा फहराकर हमें मोदी और तिरंगे को रोकना चाहिए। कश्मीर को आजाद कराने के लिए हमने अपना खून दिया है। अब समय आ गया है कि जब हम सिख भाई-बहनों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पंजाब और कश्मीर को आजाद कराने के लिए कश्मीर और खालिस्तान का झंडा उठा लें और तिरंगे को उखाड़ फेंकें। ये संदेश कश्मीर के मेरे भाइयों और बहनों के लिए है। 26 जनवरी को दिल्ली पहुँचें। मुक्त कश्मीर और खालिस्तान। मोदी और तिरंगा को रोको।”

पन्नू ने ये भी कहा कि पहले भारत के संविधान के तहत सिखों की हत्याएँ की जाती थीं, लेकिन उसी संविधान की आड़ लेकर अब कश्मीर के लोगों की हत्या की जा रही है। खास बात ये कि वीडियो में पन्नू के बाईं ओर के फ्रेम में आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का पूर्व कमांडर आतंकी बुरहान वानी भी दिखाई देता है। बता दें कि हिजबुल के पोस्टरब्वॉय को 8 जुलाई 2016 को इंडियन आर्मी ने ढेर कर दिया था।

पीएम मोदी और सेना को कोसा

खालिस्तानी आतंकी ने देश में अपराधों के लिए भारतीय सेना, संविधान और पीएम मोदी को कोसा। उसने कहा, “दिन-रात छोटे बच्चों और लड़कियों के साथ रेप किया जा रहा है। इसके लिए इंडियन आर्मी, भारतीय संविधान और मोदी जिम्मेदार हैं। अनुच्छेद 370 हटाकर आपको भारत का हिस्सा बना दिया गया। अभी आपके पास वक्त है, विश्व को संदेश देना चाहते हैं तो बारामूला, अनंतनाग और शोपियाँ में मुठभेड़ों में मत मरो। हथियार उठाकर अपनी जान मत दो। दिल्ली पहुँचो, ताकि दुनिया की हर ताकत, वर्ल्ड मीडिया और वर्ल्ड लीडर ये देखे कि कश्मीर आजादी चाहता है। अभी नहीं तो कभी नहीं। खालिस्तान के झंडे के साथ कश्मीर का झंडा उठाएँ।”

इसके साथ ही एसएफजे ने एक पत्र भी रिलीज किया है, जिसमें उसने आतंकियों और अलगाववादियों से दिल्ली पहुँचने की अपील की है। इसमें बुर्के में नजर आने वाली महिला को पीओके के मुजफ्फराबाद की एक महिला कार्यकर्ता बताया गया है। लेटर में लिखा गया है, “मुजफ्फराबाद स्थित एक महिला कार्यकर्ता के साथ अलगाववादी समूह सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) ने #खालिस्तान2कश्मीर स्वतंत्रता आंदोलन का अंतरराष्ट्रीयकरण करने के लिए कश्मीर के स्वतंत्रता सेनानियों को भारत के गणतंत्र दिवस पर 26 जनवरी को ‘घाटी छोड़ो, दिल्ली पहुँचो’ अभियान के तहत ‘मोदी-तिरंगा को ब्लॉक’ करने का आह्वान किया।”

                                                                      SFJ के द्वारा जारी पत्र

पत्र में एसएफजे के काउंसल जनरल पन्नू ने बुर्के वाली महिला के साथ मिलकर कश्मीर में स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने का आह्वान किया और कहा कि अनुच्छेद 370 को समाप्त करने और खालिस्तान जनमत संग्रह में मतदान के साथ #खालिस्तान2कश्मीर आंदोलन ‘अभी या कभी नहीं’ के चरण में प्रवेश कर गया है। इसके लिए उसने 26 जनवरी को इंडिया गेट और लाल किले पर कश्मीर-खालिस्तान के झंडे लगाने का आह्वान किया है।

‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ पाकिस्तान की ISI का खालिस्तान के लिए प्रोपेगैंडा

गौरतलब है कि पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर हाल ही में खुफिया विभाग ने चौकन्ना किया था कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) पंजाब में अशांति फैलाकर चुनाव प्रक्रिया को बाधित करना चाहती है। इसके लिए उसने अपने आतंकी संगठनों को सक्रिय कर दिया है। दरअसल, आईएसआई सोचती है कि मौजूदा पंजाब का विधानसभा चुनाव खालिस्तान चरमपंथ के उभार के लिए ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ के जैसा है। ISI ने न केवल पंजाब, बल्कि उत्तर प्रदेश में भी अपने आतंकी मॉड्यूल के जरिए पंजाब में खालिस्तानी फुटप्रिंट्स को आगे बढ़ा रहा है।

अवलोकन करें:-

‘नहीं करने देंगे PM मोदी सुरक्षा चूक की जाँच’: जस्टिस इंदु मल्होत्रा को SFJ की धमकी, वकीलों से कहा –
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‘नहीं करने देंगे PM मोदी सुरक्षा चूक की जाँच’: जस्टिस इंदु मल्होत्रा को SFJ की धमकी, वकीलों से कहा –

यहीं नहीं, 17 जनवरी 2022 को तो खालिस्तानी आतंकी संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में उसके खिलाफ मामला दर्ज कराने की कोशिश करने वाले वकीलों को भी परिणाम भुगतने की धमकी दी थी। टेरर ऑर्गनाइजेशन के धमकी दी थी कि वो गणतंत्र दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तिरंगा नहीं फहराने देगा। इससे पहले पंजाब में पीएम मोदी के काफिले को रोकने की जिम्मेदारी भी एसएफजे ने ही ली थी। इसी तरह से पिछले साल 13 जनवरी 2021 को एसएफजे ने लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराने वाले को 1.8 करोड़ रुपए का ईनाम देने का ऐलान किया था। इसके बाद 26 जनवरी 2021 को कथित किसान प्रदर्शनकारियों ने सिखों के पवित्र चिन्ह के साथ दो झंडे फहराए।

पाकिस्तानी रेंज में थे मोदी, पंजाब में सतलुज नदी से पाकिस्तानी नाव मिलने से गहराया : मनीष तिवारी, कांग्रेस नेता

पंजाब के फिरोजपुर जिले (Firozepur District) में पाकिस्तानी नाव की बरामदगी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में हुई चूक के मामले को और गंभीर बना दिया है। सीमा सुरक्षा बल (Border Security Force) ने सतलुज नदी (Sutlej River) से इस नाव को बरामद किया है। यह नदी पंजाब में भारत और पाकिस्तान की सीमा पर बहती है। कई स्थानों पर सतलुज दोनों देशों की सीमा में प्रवेश करती है।

सतलुज नदी में किनारे मिली यह नाव पूरी तरह से खाली थी। इसमें से कुछ बरामद भी नहीं हुआ। सुरक्षा एजेंसियाँ इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि इस नाव पर कौन लोग सवार थे और वे कहाँ गए। फिरोजपुर जिले के जिस इलाके में इस नाव को बरामद किया गया है, उसी के पास बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का काफिला फँसा था। यह जगह पाकिस्तान सीमा से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर है। इस क्षेत्र में कई बार टिफिन बम और विस्फोटक बरामद किए जा चुके हैं।

इधर, शुक्रवार (7 जनवरी 2022) को केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से गठित तीन सदस्यीय जाँच टीम मौके पर पहुँची है। केंद्र की इस टीम ने फिरोजपुर पहुँचकर अपनी जाँच शुरू कर दी है। ये टीम सबसे पहले फिरोजपुर-मोगा हाईवे पर बने उस फ्लाईओवर पर पहुँची, जहाँ पर पीएम मोदी के काफिले को रोका गया था। कमेटी ने पंजाब पुलिस प्रमुख (डीजीपी) सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय सहित 13 अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को तलब किया है।

पैनल का नेतृत्व कैबिनेट सचिवालय में सचिव (सुरक्षा) सुधीर कुमार सक्सेना कर रहे हैं। इसके अन्य सदस्य इंटेलिजेंस ब्यूरो के संयुक्त निदेशक बलबीर सिंह और विशेष सुरक्षा समूह आईजी एस सुरेश हैं। वहीं, केंद्र ने भठिंडा के SSP को नोटिस जारी कर एक दिन के भीतर जवाब माँगा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने आठ जनवरी की शाम 5 बजे तक जवाब देने के लिए कहा है कि पीएम की सुरक्षा में हुई चूक को लेकर उन पर क्यों नहीं कार्रवाई की जाए।

इसके अलावा, यह बात भी सामने आई है कि जिस जगह पर पीएम का काफिला फँसा था, वह पाकिस्तानी सेना की फायरिंग रेंज में था। यह बात कॉन्ग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कही है। उन्होंने कहा कि जहाँ पर उनका काफिला रुका था, वो भारत की सरहद से महज 10 किमी दूर है। वहाँ पर भारत और पाकिस्तानी के तोपखाने तैनात रहते हैं। ऐसे मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा की तुलना किसी आम नागरिक से करना सही नहीं है। यह स्वीकार करना चाहिए कि पीएम मोदी की जान को खतरा था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 जनवरी को रैली करने के लिए फिरोजपुर दौरे पर थे, लेकिन आंदोलनकारी किसानों ने उनके काफिले को बीच रास्ते में रोक दिया था। इसके बाद यह बात भी आरोप लग रहे हैं कि पंजाब सरकार ने द्वारा ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूट की जानकारी लीक की गई थी

मोदी की सुरक्षा में चूक: सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की समिति को जाँच से रोका, हाईकोर्ट से रिकॉर्ड कब्जे में लेने को कहा

पंजाब (Punjab) के फिरोजपुर () में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) की सुरक्षा में चूक को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने कड़ी कार्रवाई का संकेत दिया है। इससे संबंधित मामले की शुक्रवार (7 जनवरी 2022) को सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को पंजाब यात्रा के दौरान पीएम मोदी की मूवमेंट के रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और पंजाब सरकार को अपने मौखिक आदेश में पीएम की सुरक्षा चूक की जाँच कर रही संबंधित समितियों की कार्यवाही को अगले सोमवार(10 जनवरी) तक स्थगित करने के लिए कहा।

केस की सुनवाई के दौरान भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह मामला क्रॉस बॉर्डर टेररिज्म का है और इसे किसी पर छोड़ा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि NIA के अधिकारी इस केस की जाँच में सहयोग कर सकते हैं। उन्होंने कहा, “प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन, सिख फॉर जस्टिस के प्रमुख का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें सार्वजनिक रूप से लोगों को ‘xyz’ करने के लिए कहा गया है। यह सीमा पार आतंकवाद का विषय हो सकता है।”

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, “जब भी पीएम का काफिला आगे बढ़ता है तो संबंधित राज्य के डीजी से पहले सलाह लेनी होती है और जब वह कहते हैं तभी पीएम का काफिला आगे बढ़ता है। इस मामले में प्रभारी ने वह संकेत दिया था। उन्होंने यह नहीं कहा था कि आगे कोई रुकावट है। हालांँकि, वीडियो के अनुसार, स्थानीय पुलिस चाय का आनंद ले रही थी, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि नाकाबंदी है। ट्रक और ट्रैक्टर से अवरुद्ध फ्लाईओवर पर कोई बड़ा हादसा हो सकता था। यह अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी का विषय बन जाता।”

मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ कर रही थी। ‘लॉयर वॉयस’ नाम के एक एनजीओ ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में कोर्ट की निगरानी में पीएम की सुरक्षा में हुई चूक के मामले की जाँच करने का आग्रह किया था।

एनजीओ की तरफ से कोर्ट में उपस्थित सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह ने एसपीजी ऐक्ट का हवाला देते हुए कहा कि यह मामला राज्य सरकार के विधि-व्यवस्था के अंतर्गत नहीं आता। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। इसलिए मामले की जाँच राज्य सरकार नहीं कर सकती। इसे कोर्ट की निगरानी में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी द्वारा कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार द्वारा सेवानिवृत जज की अगुआई में समिति गठित की गई है, जो कि उपयुक्त नहीं है।

पंजाब : मोदी की सुरक्षा में बड़ी सेंध, प्रदर्शनकारियों के कारण वापस लौटे: चन्नी ने फोन तक नहीं उठाया

                                              पंजाब में कई मिनट तक अटका रहा पीएम मोदी का काफिला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पंजाब दौरे के दौरान सुरक्षा में सेंध का मामला सामने आया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने जारी किया बयान। MHA ने अपने बयान में कहा है कि बुधवार (5 जनवरी, 2022) को पीएम मोदी का विमान भठिंडा में लैंड हुआ, जहाँ से उन्हें हैलीकॉप्टर से हुसैनीवाला स्थित ‘नेशनल मार्टियर्स मेमोरियल’ जाना था। बारिश और विजिबिलिटी कम होने के कारण उन्हें मौसम के ठीक होने के लिए 20 मिनट तक इंतजार करना पड़ा। वहाँ उन्हें ‘राष्ट्रीय शहीदी स्मारक’ में बलिदानी क्रांतिकारियों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को श्रद्धांजलि अर्पित करनी थी।

जब मौसम ठीक नहीं हुआ तो निर्णय लिया गया कि सड़क मार्ग से ही प्रधानमंत्री हुसैनीवाला तक का सफर तय करेंगे। जब प्रधानमंत्री का काफिला एक फ्लाईओवर पर पहुँचा तो वहाँ पता चला कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने रास्ता जाम कर के रखा हुआ था। लगभग 15-20 मिनट तक पीएम मोदी वहाँ फँसे रहे। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में एक बड़ी सेंध बताया जा रहा है। बता दें कि सड़क मार्ग से ये यात्रा दो घंटे में तय होनी थी, जिसके लिए पंजाब के पुलिस महानिरीक्षक (DGP) को ज़रूरी प्रबंधन करने के निर्देश दे दिए गए थे।

हुसैनीवाला से 30 किलोमीटर दूर पीएम मोदी का काफिला फँसा रहा। पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार को पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे और उनके कार्यक्रमों के विवरण से अवगत करा दिया गया था। MHA ने भी इसकी पुष्टि की है। MHA के अनुसार, ये पंजाब के पुलिस-प्रशासन का काम था कि वो प्रबंधन के लिए ज़रूरी संसाधन की माँग करें और किसी आकस्मिक स्थिति के विषय में योजना तैयार करें। MHA ने बताया है कि सड़क मार्ग पर सुरक्षा के लिए पंजाब सरकार ने ज़रूरी प्रबंध नहीं किए, अतिरिक्त बल तैनात नहीं किया।

                                                       भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का बयान

MHA ने कहा, “सुरक्षा में इस चूक के बाद निर्णय लिया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का काफिला वापस भठिंडा एयरपोर्ट पर जाएगा। सुरक्षा में इस गंभीर चूक के बाद पंजाब की राज्य सरकार से भी डिटेल में रिपोर्ट तलब की गई है। साथ ही राज्य सरकार को कहा गया है कि वो इस मामले में जिम्मेदारी तय करते हुए कार्रवाई करे।” भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि हजारों करोड़ रुपयों की विकास परियोजनाओं की सौगात देने पंजाब पहुँचे पीएम मोदी के कार्यक्रम में बाधा पैदा किया जाना व्यथित करने वाला है।

जेपी नड्डा ने कहा कि इस तरह की ओछी मानसिकता को पंजाब के विकास के आड़े नहीं आने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि पार्टी पंजाब के विकास के लिए लगातार प्रयास करती रहेगी। उन्होंने कहा, “राज्य सरकार को पहले ही निर्देश दे दिया गया था कि वो लोगों को रैली में हिस्सा लेने से रोके। पुलिस के कारण बड़ी संख्या में बसें अटकी रहीं और प्रदर्शनकारियों के साथ वो मौन सहमति में थे। मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने फोन उठाने या फिर मामले का समाधान करने से इनकार कर दिया। पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार के इन हथकंडों से लोकतांत्रिक सिद्धांतों में विश्वास रखने वालों को ठेस पहुँचेगी।”

‘तमिलनाडु बन रहा नया कश्मीर …’: CDS रावत के हेलिकॉप्टर क्रैश को लेकर DMK पर सवाल उठाने वाले यूट्यूबर को पुलिस ने किया गिरफ्तार

                                       यूट्यूबर मरिधास (बाएँ) और शिवाभाई अहीर (साभार: इंडिया.कॉम/आजतक)
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत (Bipin Rawat) की हेलिकॉप्टर क्रैश में मौत को लेकर जहाँ पूरा देश शोक में डूबा हुआ है। इसको लेकर कुछ लोग आशंका जाहिर कर रहे हैं तो कुछ ऐसे लोग अपनी भड़ास निकालते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी कर हैं। ऐसी ही तमिलनाडु के एक ट्यूबर ने डीएमके पर सरकार पर सवाल खड़े किए तो उसे पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। वहीं, दिवंगत नायकों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने को लेकर गुजरात के एक सपा समर्थक को गिरफ्तार किया गया है।

पहली घटना तमिलनाडु के मदुरई के रहने वाले यूट्यूबर मरिधास की है। उसने सीडीएस जनरल बिपिन रावत के हेलिकॉप्टर क्रैश को लेकर राज्य की डीएमके सरकार पर सवाल उठाया तो प्रशासन को नागवार गुजरा। मरिधास ने ट्वीट किया कि डीएमके के शासन में तमिलनाडु देश का नया कश्मीर बन रहा है। इसके बाद कुछ लोगों ने उनकी शिकायत की और मदुरै पुलिस उनके सूर्य नगर स्थित घर पहुँची, लेकिन बीजेपी नेताओं के भारी विरोध की वजह से उनकी गिरफ्तारी नहीं हो पाई।

आरोपित मरिधास ने इस हादसे में साजिश की आशंका जताते हुए अलगाववादी ताकतों को रोकने के लिए देश के लोगों से साथ आने की अपील की थी। उन्होंने एक अलग ट्वीट में लिखा था कि सीडीएस रावत की मौत का डीएमके और डीके समर्थकों ने मजाक उड़ाया था। सूत्रों का कहना है कि हेलीकॉप्टर दुर्घटना पर संदेह जताते हुए उन्होंने दावा किया था कि डीएमके अलगाववादियों के लिए अब अच्छा विकल्प बन गई है।

पुलिस ने मरिधास पर आईपीसी की कई धाराओं के अंतर्गत उन पर मुकदमा दर्ज किया है और पूछताछ के लिए हिरासत में ले ली है। वहीं, भाजपा समर्थक पुलिस थाने पहुँचकर मरिधास को हिरासत में लेने का विरोध करते हुए प्रदर्शन किया।

वहीं, सीडीएस रावत की मौत को लेकर आपत्तिजनक बयान देने वाले गुजरात के शिवाभाई अहीर को गिरफ्तार कर लिया गया है। अहीर ने अपने आपत्तिजनक पोस्ट में कहा था, “पुलवामा द्रोही मनोहर पार्रिकर और सेना प्रमुख बिपिन रावत के बाद अब डोभाल की बारी है।” इस विवादित ट्वीट के मामले में हरियाणा बीजेपी के प्रवक्ता अरुण यादव ने आरोपित के खिलाफ शिकायत की थी।

इस मामले में कार्रवाई करते हुए अहमदाबाद पुलिस की साइबर क्राइम टीम ने आरोपित शिवाभाई अहीर को गिरफ्तार कर लिया है।

पार्लियामेंट पर खालिस्तानी झंडा फहराओ, 93+ लाख रूपए का ईनाम पाओ : गुरुपवंत सिंह पन्नू, सिख फॉर जस्टिस (SFJ)

गुरुपवंत सिंह पन्नू (फोटो साभार: इंडिया टीवी)
मोदी सरकार ने तीनों को कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला ले लिया है। बावजूद इसके प्रदर्शनकारी किसान आंदोलन को जारी रखने पर अड़े हुए हैं। इस बीच प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ एक बार फिर से इसका फायदा उठाने की फिराक में है और अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए वह लगातार युवाओं को भड़काने की कोशिश कर रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ सिख फॉर जस्टिस का चीफ गुरुपवंत सिंह पन्नू किसानों के संसद मार्च की खबर को ध्यान में रखते हुए रिकॉर्डेड ऑडियो संदेश भेजकर लाल किले की तरह ही 29 नवंबर को देश की संसद पर खालिस्तान के झंडे लगाने के लिए उकसा रहा है। इस ऑडियो में गुरुपवंत सिंह पन्नू को यह कहते सुना जा सकता है कि देश को आजाद कराने के लिए भगत सिंह ने पार्लियामेंट में बम फेंका था। ट्रैक्टर को हथियार बनाकर तुम 29 नवंबर को खालिस्तान के केसरी झंडे को भारत की संसद पर चढ़ा दो। सिख फॉर जस्टिस सवा लाख डॉलर (93,81,625 भारतीय रुपए) का ईनाम देगी। 29 नवंबर को खालिस्तान केसरी चढ़ा दो भारत की संसद पर। पंजाब, किसान, हल खालिस्तान।

इस बीच दिल्ली के पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना ने कानून व्यवस्था के मुद्दे पर प्रतिबद्धता जताते हुए कहा है कि किसी भी हाल में लॉ एन्ड ऑर्डर को खराब करने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने ये भी कहा है कि लोकतांत्रिक तरीके से विरोध पर कोई आपत्ति नहीं है। किसानों के साथ हमारा एक समझौता है और उसी के आधार पर काम किया जाएगा। अस्थाना ने ये भी कहा कि बीट पेट्रोलिंग को और अधिक मजूबत किया गया है।

29 नवंबर का ट्रैक्टर मार्च स्थगित

हालाँकि, किसानों ने 29 नवंबर को होने वाला ट्रैक्टर मार्च स्थगित कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली में शनिवार (27 नवंबर 2021) को संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) की बैठक में इस पर फैसला लिया गया। संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि वह 4 दिसंबर को अपनी अगली बैठक में सरकार के रुख की समीक्षा करके आगे की रणनीति बनाएँगे।
इससे पहले बीते दिनों संयुक्त किसान मोर्चा की 9 सदस्यीय कमिटी ने फैसला लिया गया था कि 29 नवंबर को गाजीपुर बॉर्डर और टीकरी बॉर्डर से 500-500 किसान ट्रैक्टर पर संसद भवन की ओर कूच करेंगे।

ख़ुफ़िया एजेंसियाँ : राष्ट्रीय सुरक्षा की खातिर कृषि कानून वापस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर, 2021 को सुबह 9 बजे ऐलान किया कि केंद्र सरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस लेगी। उन्होंने कहा कि इन्हें किसानों के फायदे के लिए लाया गया था, लेकिन एक समूह को ये समझाने में हम सफल नहीं रहे। सत्ता के गलियारों में रहे लोगों के लिए ये निर्णय चकित करने वाला रहा, क्योंकि इतनी जल्दी इस तरह के फैसले की किसी को उम्मीद नहीं थी। पिछले एक वर्षों से तीनों कृषि कानूनों के विरोध में ‘किसान आंदोलन’ चल रहा है। ये कई बार हिंसक हुआ। 26 जनवरी, 2021 को लाल किला सहित दिल्ली के कई इलाकों में हुई हिंसा को कौन भूल सकता है।

कई लोगों को ऐसा लगता है कि मोदी सरकार हिंसा और भीड़तंत्र के सहारे सत्ता को अपनी हनक दिखाने वालों के समक्ष झुक गई है। कई महीनों से तीनों कृषि कानूनों के इर्दगिर्द प्रोपेगंडा का झाल बुना जा रहा था। 

इसी तरह 26 जनवरी को किसान प्रदर्शनकारियों की भीड़ ट्रैक्टर लेकर दिल्ली में घुस गई। लाल किला पर उन्होंने सिख झंडा गाड़ दिया और सार्वजनिक संपत्तियों को जम कर नुकसान पहुँचाया गया। लगभग 300 पुलिसकर्मी घायल हुए। करोड़ों रुपयों का नुक़सान हुआ। हालाँकि, उस समय सरकारी प्रतिक्रियाहीन रही। हालाँकि, कुछ किसान नेता हिंसा के आरोप में गिरफ्तार ज़रूर हुए लेकिन शायद ही दंगाई भीड़ के खिलाफ बल प्रयोग किया गया। राकेश टिकैत और योगेंद्र यादव जैसे इस पूरे आंदोलन के मास्टरमाइंड्स तो खुला घूमते रहे।

किसान आंदोलन तो 26 जनवरी को ही समाप्त हो जाता, अगर राकेश टिकैत ने देश के दुश्मनों के आगे घुटने नहीं टेके होते। लाल किला हादसे के बाद अलग हुए किसानों को राकेश और आंदोलन को समर्थन देने वाली पार्टियों से पूछे कि "किस कारण राकेश रोते हुए मीडिया के सामने आये थे? आंदोलन किसानों का था, उसमें खालिस्तानी क्यों आये थे? आंदोलन में दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों के जेलों में बंद आरोपितों को रिहा करने की मांग क्यों हुई थी? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मरने की दुआ मांगने वाली नारियां किसके इशारे पर यह कर रही थीं?" आदि अनेकों ज्वलंत प्रश्न हैं।  

एक वर्ष तक चले ‘किसान आंदोलन और इस दौरान हुई ‘हिंसा में कई आम नागरिकों को भी शिकार बनाया गया। आंदोलन स्थल व उसके आपसास के गाँवों से कई महिलाएँ गायब हैं। लखबीर सिंह की हत्या कर दी गई। एक बंगाली महिला का बलात्कार हुआ। मुकेश नाम के एक व्यक्ति को ज़िंदा जला दिया गया। ऐसी कई घटनाएँ हुईं। तीनों कृषि कानून वापस ले लिए जाने के बावजूद राकेश टिकैत ये कह रहे हैं कि आंदोलन तत्काल वापस नहीं लिया जाएगा।

मोदी समर्थक भी मान रहे हैं कि केंद्र सरकार सड़क पर उतर कर भीड़ और हिंसा के सहारे अपनी बात मनवाने की कोशिश करने वालों के सामने झुक गई है। एक ऐसी भीड़, जिसका हिस्सा खालिस्तानी अलगाववादी भी थे। कानूनों को संसद में बनाया जाता है और उन्हें वापस लिए जाने का फैसला भी संसद में ही होना चाहिए। जनता को सम्बोधन में कानून को वापस लेना और इसके लिए प्रदर्शन को वजह बताना ज़रूर सड़क पर हिंसा करने वाले इन आंदोलनकारियों को और मजबूत ही करता है।

इसके बाद अब जो भी कानून पास किए जाएँगे, उसके विरुद्ध हंगामा खड़ा किया जाएगा। जो देश में किसी न किसी बहाने अराजकता का माहौल बनाए रखना चाहते हैं, वो उस कानूनके विरुद्ध दुष्प्रचार करेंगे और सरकार पर हिंसक भीड़ के जरिए दबाव बनाएँगे। हिंसक भीड़ को उकसाएँगे और अपनी बात मनवाएँगे। इससे सरकार का मुखिया जनता की नजर में कमजोर दिखेगा। सत्ता के गलियारों में मौजूद लोगों की तरफ से भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। उनके लिए भी ये शॉकिंग ही है।

सत्ता के गलियारों में मौजूद लोगों और नीति निर्धारण करने वालों में से कइयों से संपर्क किया और इस निर्णय के पीछे की वजह जानने की कोशिश की। कई नेताओं ने इस मामले पर टिप्पणी करने से ही इनकार कर दिया। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री ने ऐलान किया है और साथ ही कारण भी गिनाए हैं, ऐसे में हमें उसी पर ध्यान देना चाहिए। हालाँकि, कुछ लोग ऑफ द रिकॉर्ड बोलने पर तैयार हुए, लेकिन ज्यादा डिटेल में नहीं गए। उनमें से एक नेता ने बताया कि देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये निर्णय लिया है।

उक्त नेता ने बताया, “जब इस बिल को पास किया था तब और अब की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है। अगर आपने ध्यान दिया होगा तो पीएम मोदी ने स्पष्ट कहा है कि किसानों के फायदे के लिए इन कृषि कानूनों को लाया गया था, लेकिन देश की सुरक्षा के लिए इसे वापस लिया जा रहा है। ये कदम पीछे खींचना ही कहा जाएगा और कोई इससे इनकार नहीं कर सकता। मैं ये समझ सकता हूँ कि सरकार को लोग किस नजर से देख रहे हैं। ऐसा नजर आ रहा है कि हम हिंसक देशद्रोहियों के समक्ष झुक गए हैं। लेकिन, इन कानूनों को लेकर फैलाया गया प्रोपेगंडा कुछ ज्यादा ही मजबूत था और इससे देश की सुरक्षा को खतरा था। केंद्र सरकार ने इन्हें वापस लेकर देश की आंतरिक सुरक्षा को चुना है। शांति को चुना है। दो खराब स्थितियों के बीच निर्णय लेना था – कानून वापस लेकर खालिस्तानी ताकतों को कमजोर करना, या फिर कानूनों को वापस लेकर कमजोर दिखना। सरकार ने कदम वापस लेना उचित समझा, ताकि अलगाववादी ताकतें इसके सहारे खुद को पुनर्जीवित न कर सकें।”

चर्चा को एक रोचक मोड़ देते हुए उक्त नेता ने बताया, “एक तरफ सीमा पर चीन खड़ा है, जो कई बार स्थितियों को गंभीर बना देता है। तालिबान ने अफगानिस्तान पर शासन शुरू कर दिया है। पाकिस्तान में जिहादी हावी हो रहे हैं। एक अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य है, जिसे हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। ढाई मोर्चों पर युद्ध की स्थिति से निपटने से अच्छा है कमजोर दिखना।” एक अन्य नेता ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुधारवादी नीतियों पर आगे बढ़ते रहेंगे। उन्होंने राष्ट्रहित के लिए पार्टी से ऊपर रखने का फैसला लिया है। उक्त नेता ने कहा कि ये एक अनिवार्य निर्णय था, भले ही वांछित नहीं हो।

जहाँ सत्ता के गलियारों में इसे शांति बनाए रखने और राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में लिया गया फैसला बताया, वहीं पंजाब से भी कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आईं। 27 मार्च को अबोहर के भाजपा विधायक अरुण नारंग पर हमला कर के उनके साथ मारपीट की गई थी। उनके कपड़े फाड़ डाले गए थे। मुक्तसर के मलौत में हुई इस घटना का वीडियोज सोशल मीडिया पर भी वायरल हुए थे। वहाँ मौजूद पुलिसकर्मियों और भाजपा कार्यकर्ताओं ने उन्हें किसी तरह बचाया।

अरुण नारंग ने इस निर्णय का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इस कानून से सिख और हिन्दू समाज के बीच एक विभाजन हो गया था, जो अब ख़त्म हो जाएगा। उनका कहना है कि इससे राष्ट्र की सुरक्षा पर भी अच्छा असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि एक कमिटी बना कर आगे का निर्णय लिया जाएगा और हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विश्वास करना चाहिए। क्या इस निर्णय से हिंसक और अलगाववादी ताकतों को बल मिलेगा? इस सवाल के जवाब में अरुण नारंग ने कहा कि भाजपा सरकार इतनी दंभी नहीं है कि लोगों की आवाज़ न सुने। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता ही सब कुछ है और लोगों की माँग पर सरकार को विचार-विमर्श करते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने साबित कर दिया है कि ये जनता की आवाज़ पर चलने वाली सरकार है और आम लोगों की आवाज़ सुनती है। उन्होंने अराजकता फैलाने में कॉन्ग्रेस का हाथ बताते हुए उसके लिए इस निर्णय को झटका बताया।

 हालाँकि, भाजपा के राज्य सेक्रेटरी सुखबीर सिंह शरण ने इन कानूनों को वापस लिए जाने पर दुःख जताया। उन्होंने कहा कि अगर वापस ही लेना था तो इन कानूनों को पास ही नहीं किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि जल्दबाजी में इसे लाया गया और जल्दबाजी में ही वापस भी लिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मजबूत प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले एक मजबूत लोकतंत्र में इस तरह की चीजें नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ये उन भाजपा कार्यकर्ताओं का अपमान है, जिन्होंने इन हिंसक तत्वों का दंश झेला।

इस सवाल पर कि क्या मोदी सरकार इन कृषि कानूनों को वापस लाएगी, सुखबीर शरण ने कहा कि इसे लेकर वो आशान्वित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं है कि किसानों के हित में आगे कोई कदम उठाए जाएँगे। उन्होंने पूछा कि अगर नरेंद्र मोदी नहीं करेंगे तो कौन करेगा, क्योंकि किसी और के पाद इच्छाशक्ति ही नहीं है। उन्होंने कहा कि हमें नरेंद्र मोदी से ज्यादा ईमानदार प्रधानमंत्री नहीं मिलेगा, क्योंकि अगर वो नहीं कर सकते हैं तो कोई नहीं कर सकता।

उन्होंने अपने पूरे बयान को प्रकाशित करने की सलाह देते हुए कहा कि वो पार्टी नहीं, बल्कि देश के लिए चिंतित हैं। उन्होंने इसे कैप्टेन अमरिंदर सिंह की जीत और भाजपा के पंजाब यूनिट की हार बताया। उन्होंने कहा, “मैं पार्टी से ज्यादा इस पार्टी के कार्यकर्ताओं को लेकर चिंतित हूँ। आज पंजाब में स्थिति ये है कि भाजपा नेताओं की बेटियों तक को बहिष्कृत किया जा रहा है। कोई भाजपा नेताइन/कार्यकर्ताओं बेटियों के साथ शादी नहीं करना चाहता। कानून को लाने या हटाने से पहले पीएम मोदी को पहले कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श करना चाहिए था। अगर पार्टी के कार्यकर्ता उसके साथ हैं तो कोई चिंता की बात नहीं होती है। लेकिन, आज पार्टी के नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ नहीं हैं।”

ख़ुफ़िया एजेंसियाँ: खालिस्तान का पुनर्जीवित होना और सिख युवकों को कट्टरवादी बनाने की साजिश

जहाँ पंजाब के नेताओं ने इस फैसले पर अलग-अलग बयान दिए, ख़ुफ़िया एजेंसियों से जुड़े लोगों का मानना है कि ये सर्वश्रेष्ठ तो नहीं लेनी ज़रूरी निर्णय हो गया था। इनपुट्स थे कि खालिस्तानी तत्व फिर से सक्रिय हो गए हैं, इसीलिए इससे बचने के लिए ऐसा किया गया।
ख़ुफ़िया एजेंसी से जुड़े रहे एक अधिकारी ने बताया कि खालिस्तानी और ISI मिल कर इस मुद्दे को हवा दे रहे थे, ताकि भारत में आतंरिक अराजकता फैलाई जा सके। स्थिति हाथ से बाहर निकलती जा रही थी, क्योंकि पंजाब में युवकों को कट्टरवादी बनाया जा रहा था और उनके मन में इन कानूनों को लेकर दुष्प्रचार कर के गलत सूचनाएँ भरी जा रही थीं।
उक्त अधिकारी ने बताया, “खालिस्तानी भिंडरवाला का पिता भी एक किसान थे। उनका नाम जोगिन्दर सिंह बरार था, जो एक स्थानीय सिख नेता थे। खालिस्तानी आंदोलन और खुद भिंडरवाला भी तब किसान आंदोलन के सहारे ही आगे बढ़ा था। इसी तरह की चीजों का इस्तेमाल कर के सिख युवकों को बहकाया जा रहा था। SFJ का पन्नू और ISI खालिस्तानी आंदोलन को पुनर्जीवित करने में लगा हुआ था। ये एक कठिन निर्णय था, लेकिन इसका लिया जाना ज़रूरी था। हम पहले से ही स्थानीय जिहादी तत्वों और स्लीपर सेल्स से जूझ रहे हैं। अब हमें भटके हुए सिख युवक और खालिस्तानी ताकतें नहीं चाहिए।
प्रमुख सिख कार्यकर्ता रमणिक सिंह मान ने कहा कि किसान नेताओं को भले ही ये अपनी जीत लग रही हो लेकिन ये देश के किसानों का नुकसान हैं। ये बदलाव किसानों के लिए दशकों बाद आए थे। उन्होंने कहा, “हमने 1991 के बाद देश में औद्योगिक क्रांति देखी। सारा आभार पीवी नरसिम्हा राव को। हम कृषि सुधारों में 30 साल की देरी कर रहे हैं। हमारे पास उसे सुधारने का अच्छा मौका था। मेरा कहना है कि आखिर हमें, किसानों के तौर पर इससे क्या मिला? पूरा आंदोलन, दिल्ली की सीमाओं पर चलता ड्रामा, किसानों को इससे क्या मिला?
मान ने कहा कि कृषि कानून वापिस होने पर उनकी मिश्रित भावनाएँ हैं। एक ओर जहाँ उन्हें लग रहा है कि किसान हार गए हैं। उनका मानना है कि कई राष्ट्र विरोधी ताकतों ने उस प्रदर्शन में घुसपैठ की थी जो कि किसान आंदोलन था। इन्हें कम करने की जरूरत थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस मुद्दे को उठाया था और प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से मुलाकात की थी। इसके बाद NSA खुद वापस जाकर गृहमंत्री से मिले थे। बाद में बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाया गया। ये सारी चींजे उस दिशा की ओर इशारा कर रही थीं जहाँ इन किसान आंदलोनों में घुसपैठ करने वाले लोगों का मुख्य एजेंडा देश को अस्थिर करने का था। पन्नू और धालीवाल जैसे लोगों ने खालिस्तान और भारत को खंडित करने पर (BALkanisation) बात करना शुरू कर दिया था। ये सब लोगों को न केवल पीएम के विरुद्ध भड़का रहे थे बल्कि भारत को लेकर भी यही कर रहे थे। राकेश टिकैत ने कहा- ‘बिल वापिसी नहीं तो घर वापिसी नहीं।’ अब जब कानून वापिस हो गए हैं तो उन्हें घर जाना चाहिए।
मान ने आगे कहा कि हालाँकि उन्हें लगता है कि प्रदर्शनकारियों को अब लौटना चाहिए, लेकिन उन्हें ये भी लगता है कि टिकैत जरूर आंदोलन जारी रखने के लिए आगे कोई न कोई रास्ता खोजेगा। वह कहते हैं 7 दिसंबर वह तारीख है जब सुप्रीम कोर्ट इन किसानों द्वारा सीमाओं पर किए गए कब्जे मामले की सुनवाई करेगा। यह लगभग उसी समय होगी जब पंजाब में आदर्श आचार संहिता भी लागू होनी है। यह देखना बिलकुल दिलचस्प नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है। यही सुप्रीम कोर्ट है जिन्होंने किसान संगठनों की तरफदारी करते हुए उन्हें बॉर्डर पर बैठने की और दिल्ली को कब्जा लेने की इजाजत दी थी। अब देखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट क्या बोलेगा। मगर अब भी यदि किसानों ने अपना आंदोलन जारी रखा, वह लोग अपनी विश्वसनीयता खो देंगे।
जब उनसे पूछा गया कि उन्हें लगता है कि यह कदम सड़कों पर एकत्रित हुए लोगों (स्ट्रीट पॉवर) के सामने आत्मसमर्पण है तो मान ने कहा कि उनके मन में इस बात को लेकर संदेह नहीं था कि यह कदम वापस लिया ही जाएगा। वह बोले, “पीएम मोदी ने अपने संबोधन में उन कार्यों पर बात की जिसे उन्होंने कृषि सेक्टर के लिए अपने कार्यकाल में किया। उन्होंने कानूनों का एक नया सेट तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों, किसानों आदि के साथ एक समिति के गठन के बारे में भी स्पष्ट रूप से बात की। उन्होंने देश से माफी माँगी है कि वह इन कानूनों के फायदों के बारे में किसानों के एक निश्चित वर्ग को समझाने में सक्षम नहीं हो पाए। उन्होंने यह नहीं कहा कि कृषि कानूनों में कुछ भी गलत है। लेकिन मुझे लगता है कि सुधार जारी रहेगा जिसकी बहुत आवश्यकता है।”
कुल मिलाकर, कानूनों को निरस्त किए जाने पर एक निराशा जैसी है। लेकिन बोर्ड भर में प्रतिक्रिया मिश्रित है। जहाँ लोग ये जान रहे हैं कि आखिर कानून वापस क्यों लिए गए। वहीं ये भी पता चल रहा है कि ये सर्वश्रेष्ठ निर्णय नहीं था जो लिया गया। हालाँकि ये आवश्यक था। इस तथ्य की भी स्वीकृति है कि इसे हिंसक ताकतों के लिए एक कदम के रूप में देखा जा सकता है जो सरकार को घेरना चाहते थे। यह खालिस्तान और आईएसआई के सामने देश की आंतरिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक कदम था जो इस किसान आंदोलन और कृषि कानून पर फैलाए प्रोपगेंडा का प्रयोग करके खालिस्तानी मूवमेंट को पुनर्जीवित करना चाहते थे।
पिछले कई दशकों से कृषि क्षेत्र में किसानों के लिए अपने कृषि उत्पादों के लिए अच्छा बाजार और उचित मूल्य पाना सबसे बड़ी चुनौती रही है। इस समस्या के समाधान के लिए विभिन्न राज्य सरकारों ने समस्य-समय पर अपने राज्य में एग्रीकल्चरल प्रोडूस मार्केट रेगुलेशन एक्ट पास किया जिसने इन राज्य सरकारों को अपने राज्य में कृषि उत्पादों की थोक बिक्री के लिए नियम और कानून बनाने का अधिकार मिला। इन थोक मंडियों की स्थापना के पीछे यह सोच थी कि किसानों को उनके उत्पादों का समुचित मूल्य मिले परन्तु गुजरते समय के साथ ये थोक मंडियां भ्रष्टाचार और अयोग्यता की शिकार हो गईं। ऊपर से इन मंडियों का स्वरुप ऐसा था कि समय के साथ इनमें समूहों और दलालों का प्रभाव लगातार बढ़ता गया और ये मंडियां जिन उद्देश्य के लिए बनी थीं उससे भटकती रहीं जिसका परिणाम मंडियों में घोर अक्षमता और भ्रष्टाचार के रूप में सामने आया।
इस समय से निपटने के लिए मोदी सरकार ने कृषि उत्पादों के विपणन को सरल बनाने के लिए और किसानों को उनके उत्पादों का समुचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से संसद में तीन कानून प्रस्तुत किये। सरकार का उद्देश्य था कि ए पी एम सी एक्ट के तहत पहले से स्थापित थोक मंडियों के अलावा कृषि उत्पादों के विपणन के लिए एक ऐसा मूल ढांचा बनाया जाए जो किसानों के लिए न केवल उनके उत्पादों की बिक्री का उचित मूल्य दिलाये बल्कि इस उद्देश्य के लिए कृषि उत्पादों के व्यापार में एक तरह की नई प्रतिस्पर्धा विकसित कर सके। ये तीन कानून थे; द फार्मिंग प्रोडूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) बिल, 2020: कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम -2020
इस कानून का उद्देश्य राज्य द्वारा स्थापित और परिचालित एपीएमसी की थोक मंडियों के अलावा एक ऐसा बाजार बनाने का था जिसमें किसानों को उनके उत्पादों का न केवल उचित मूल्य मिले बल्कि उत्पादों के व्यापार में एक प्रतिस्पर्धा हो और साथ ही किसानों को अपने उत्पादों की बिक्री के लिए एक अतिरिक्त विकल्प भी मिले।
द फार्मर (एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस अश्योरेंस एंड फार्म सर्विस बिल, 2020: कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020
इस कानून के पीछे सरकार का उद्देश्य एक ऐसा ढांचा खड़ा करने का था जिसके तहत किसानों और उनके उत्पादों के खरीदार के बीच कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग सम्बंधित समझौते की शर्तें और उनका समुचित क्रियान्वन होता। द एसेंशियल कमोडिटीज (अमेंडमेंट) बिल, 2020 : आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम 2020. इस कानून के पीछे का उद्देश्य कुछ निश्चित कृषि उत्पादों की आपूर्ति और विशेष समय और परिस्थितियों में उनके व्यापार संबंधी नियंत्रण को तय करना था। ज्ञात को कि सरकार द्वारा लाये और संसद में पास किये गए ये तीन कृषि कानून थे जिनका उद्देश्य किसानों के कृषि उत्पादों के लिए पहले से चल रहे एपीएमसी मंडियों के अलावा एक बाजार स्थापित कर किसानों को विकल्प देने का था और साथ ही अपने उत्पादों के संभावित खरीदारों के साथ सीधे तौर पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग सम्बंधित समझौते करना था। इन कृषि कानूनों का उद्देश्य किसी भी तरह से पहले से चल रही थोक मंडियों को हटाना नहीं था। सरकार किसानों को केवल यह विकल्प देना चाहती थी कि यदि किसान किन्हीं कारणों से चाहें तो अपने उत्पाद पहले से स्थापित और चलाई जा रही थोक मंडियों के बाहर भी बेंच सकें।