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न NDA-न INDIA, अकेले लोकसभा चुनाव लड़ेगी BSP: मायावती- कांग्रेस के साथी भी उसके जैसे ही जातिवादी और पूँजीवादी

2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए से मुकाबले के लिए कांग्रेस विपक्षी दलों को एक साथ लाने के प्रयास कर रही है। इस क्रम में 18 जुलाई 2023 को बेंगलुरु में 26 दलों की बैठक हुई और गठबंधन का नाम INDIA रखा गया। इसी दिन 39 दलों वाले NDA की बैठक भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नई दिल्ली में हुई।

लेकिन जनता दल (सेक्युलर) JD(S), शिरोमणि अकाली दल (SAD), बहुजन समाज पार्टी (BSP), बीजू जनता दल (BJD), भारत राष्ट्र समिति (BRS), युवजन श्रमिक रायथु कांग्रेस पार्टी (YSRCP), इंडियन नेशनल लोक दल (INLD), ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) जैसे कुछ दल ऐसे भी हैं जो न तो विपक्ष की बैठक में दिखे और न एनडीए की। इनमें से बसपा ने अब अपना स्टैंड क्लियर कर दिया है। वह न तो एनडीए के साथ जाएगी और न विपक्षी गठबंधन के साथ। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती ने 19 जुलाई 2023 को बताया कि उनकी पार्टी अकेले लोकसभा चुनाव लड़ेगी।

मायावती ने विपक्षी गठबंधन और एनडीए दोनों के दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी पार्टी अकेले ही चुनाव लड़ेगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी अपने जैसी जातिवादी और पूँजीवादी सोच रखने वाली पार्टियों के साथ गठबंधन कर फिर से केंद्र की सत्ता में आने का सपना देख रही है। वहीं बीजेपी भी फिर से सत्ता में आने के लिए एनडीए को मजबूत बनाने में लगी है। साथ ही सत्ता में वापसी के दावे कर रही है। 300 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा कर रही है। लेकिन उनकी कथनी और करनी में भी विपक्षी गठबंधन की तरह ही अंतर है।

मायावती ने कहा, “हम अकेले चुनाव लड़ेंगे। हम राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना में अपने दम पर चुनाव लड़ेंगे। हरियाणा, पंजाब और अन्य राज्यों में वहाँ की क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं।” विपक्षी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनने को लेकर बसपा सुप्रीमो ने कहा, “ये पार्टियाँ लोगों के कल्याण के लिए काम नहीं करतीं। उन्होंने दलितों, मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के लिए कुछ नहीं किया है। सभी एक जैसे हैं। सत्ता में आते ही अपने वादे भूल जाते हैं। उन्होंने जनता से किया एक भी वादा पूरा नहीं किया। चाहे वह कांग्रेस हो या बीजेपी। यही सबसे बड़ा कारण है कि बीएसपी ने विपक्ष के साथ हाथ नहीं मिलाया है।”

जैसे 2024 से पहले बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन बनाने की कोशिश हो रही है, ऐसा ही प्रयोग 2019 के आम चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में हुआ था। सपा और बसपा ने पुराने मतभेद भूलाकर हाथ मिलाए थे। लेकिन ये चुनावों में बीजेपी को तगड़ी चुनौती देने में नाकाम रहे थे। इसके बाद दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए थे।

उत्तर प्रदेश : योगी आदित्यनाथ ने बनाया सबसे बड़ा रिकॉर्ड (राजनीतिक); कांग्रेस के डॉ. सम्पूर्णानंद को भी पीछे छोड़ा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम एक नया रिकॉर्ड दर्ज हो गया है। वह उत्तर प्रदेश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले व्यक्ति बन गए हैं। इससे पहले यह रिकॉर्ड कांग्रेस के डॉ. सम्पूर्णानंद के नाम पर था।

योगी आदित्यनाथ ने 19 मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाली थी। तब से वह लगातार सूबे के मुखिया बने हुए हैं। मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ का कार्यकाल 5 साल और 347 दिन का हो गया है। इससे पहले कांग्रेस के डॉ. संपूर्णानंद 5 साल और 345 दिन मुख्यमंत्री रहे। संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री थे। वह 28 दिसंबर 1954 से लेकर 7 दिसंबर 1960 तक मुख्यमंत्री रहे।

बड़ी बात यह है कि योगी आदित्यनाथ के इस बड़े रिकॉर्ड ने कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को पीछे छोड़ दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह, नारायण दत्त तिवारी और अखिलेश यादव जैसे नेताओं के कार्यकाल भी योगी आदित्यनाथ के आगे फीके दिखाई दे रहे हैं। यही नहीं, उत्तर प्रदेश में 4 बार मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती और 3 बार मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव भी इस रिकॉर्ड में बहुत पीछे हैं।

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के उन गिने चुने नेताओं में से एक हैं, जिनके नेतृत्व में लगातार दूसरी बार सरकार बनी है। इससे पहले एनडी तिवारी के नेतृत्व में साल 1985 में कांग्रेस  सरकार बनी थी। वहीं, उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड अलग होने के बाद से देखें तो योगी आदित्यनाथ ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं, जो लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं।

योगी ने तोड़ा नोएडा मिथक

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसा कहा जाता था कि जो भी मुख्यमंत्री नोएडा जाएगा, उसकी कुर्सी चली जाएगी। इसी मिथक के चलते मायावती से लेकर अखिलेश यादव तक मुख्यमंत्री रहते हुए कभी भी नोएडा नहीं गए। हालाँकि अपने 5 साल और 347 दिनों के कार्यकाल में योगी आदित्यनाथ करीब 25 बार नोएडा गए। कुर्सी जाने की बात तो दूर मिथकों को तोड़ते हुए योगी दोबारा मुख्यमंत्री बने हैं।

उत्तर प्रदेश में बसपा और पंजाब में आम आदमी पार्टी के विधायक ‘डूबती’ पार्टियों को छोड़ कर भाग रहे हैं, पंजाब में प्रमुख विपक्षी दल नहीं रही आप

दिल्ली में आम आदमी पार्टी भले ही अपनी योजनाओं का जाल बिछाकर अपनी जड़ें मजबूत कर रही है, लेकिन दिल्ली से बाहर इसकी स्थिति ठीक नहीं है, कल तक अपने बूते पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी को क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन करना पड़ रहा है। इस उम्मीद में शायद दो-चार सीट मिल जाएं। हालांकि दिल्ली की भांति मुफ्त सुविधाएं देने की घोषणाएं करने के बावजूद एकला चलो वाला समर्थ नहीं है।  

यह माना जाता है कि जहाज जब डूबने वाला होता है तो चूहे सबसे पहले उसे छोड़कर जाते हैं। चूहों को जाने कैसे अंदाजा हो जाता है और वे जान बचाने के लिए दूसरा ठिकाना तलाशने निकल लेते हैं। उत्तर प्रदेश और पंजाब में भी आजकल दो ‘जहाज’ डूबने के कगार पर हैं और इनके ‘चूहे’ दूसरी जगह तलाश रहे हैं। हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश में चार बार सत्तासीन हो चुकी मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी की…इसमें अब केवल चार ही विधायक रह गए हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बसपा के विधायक कूद-फांद में लगे हैं। नए ठिकाने तलाशे जा रहे हैं, ताकि किसी तरह राजनीतिक जीवन को कुछ ऑक्सीजन मिल जाए।

आजमगढ़ से दो बसपा विधायक टूटे, वंदना सिंह भाजपा में शामिल
विधानसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर 19 विधायक जीत कर आए थे। लेकिन अब 4 विधायक ही बचे हैं। इस तरह बहुजन समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और अपना दल से भी छोटी पार्टी हो गई है। उत्तर प्रदेश में दो दिन के अंदर बहुजन समाज पार्टी के दो और विधायक गुड्डू जमाली और वंदना सिंह ने पार्टी का साथ छोड़ दिया है। आजमगढ़ की मुबारकपुर सीट से शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली विधायक हैं। इसी जिले की सगड़ी सीट से बसपा विधायक वंदना सिंह ने भी पार्टी छोड़ी है। वंदना भाजपा में शामिल हो गई हैं। आलम ने अभी क्लीयर नहीं किया है कि वे किस पार्टी में जा रहे हैं।

पिछले माह भी छह विधायकों ने छोड़ा मायावती का साथ
इससे पहले 30 अक्टूबर को 6 बसपा विधायक सपा में गए थे। इनमें श्रावस्ती के भिनगा सीट से विधायक असलम राइनी, प्रयागराज की हंडिया सीट से विधायक हाकिम लाल बिंद, – प्रतापपुर आयात सीट से विधायक हाजी मोहम्मद मुजतबा सिद्दीकी, सीतापुर की सिधौली सीट से विधायक हरगोविंद भार्गव, गाजियाबाद की धौलाना सीट से विधायक असलम चौधरी, जौनपुर की बादशाहपुर सीट से विधायक डॉक्टर सुषमा पटेल सपा में शामिल हो गए। बहुजन समाज पार्टी के प्रवक्ता एमएच खान के मुताबिक बसपा पर किसी के जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि पार्टी का संगठन पहले से काफी मजबूत है। इन सभी विधायकों को बीएसपी से निष्कासित किया जा चुका है और ये बीएसपी को नुकसान पहुंचा रहे थे।

बसपा के टूटने का सिलसिला, अब मात्र 4 विधायक बचे
बसपा के टूटने का यह सिलसिला लगातार जारी है। दो विधानमंडल दल नेताओं ने ही पार्टी छोड़ दी। लालजी वर्मा और राम अचल राजभर को निष्कासित किया। पार्टी विरोधी गतिविधियों की बात कहकर बसपा ने 9 विधायकों को निलंबित किया। विधायक सुखदेव राजभर का निधन हो गया। अब बसपा में 4 विधायक विधायक ही बचे हैं। इनमें श्याम सुंदर शर्मा, उमाशंकर सिंह, विनय शंकर तिवारी और आजाद अरिमर्दन शामिल हैं। विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और ऐसे में पार्टी की ताकत बढ़ाने के प्रयास होने चाहिए, लेकिन पार्टी को चिंता बचे चार विधायकों की है कि चुनाव के बहाव में बहकर वे भी किसी और पार्टी के साथ न हो जाएं।

बसपा की नीतियों से खफा 8 विधायक बीजेपी में शामिल हुए थे
हालांकि यह बात भी सच है कि बसपा के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। बसपा सुप्रीमो की नीतियों और हिटलरशाही के आजिज आकर पहले भी बसपाई पार्टी छोड़ते रहे हैं। बसपा के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले 2017 में भी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 8 बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी। तब ज्यादातर विधायक भाजपा में शामिल हुए थे।

उत्तर प्रदेश जैसी ही आम आदमी पार्टी की पंजाब में कहानी
उत्तर प्रदेश जैसी ही कहानी आम आदमी पार्टी की पंजाब में हो रही है। पार्टी को झटके दे-देकर विधायक लगातार पार्टी का साथ छोड़ रहे हैं। राज्य में पार्टी के डूबने से पहले आए दिन आप विधायक दूसरे दलों में शामिल हो रहे हैं। हालात यह हैं कि साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के कुल बीस विधायक चुनाव जीते थे, लेकिन सात विधायकों ने पार्टी किनारा कर लिया है। इनमें सुखपाल सिंह खैहरा, नाजर सिंह मानशाहियां, कंवर संधू, एचएस फुल्का, पीरमल सिंह खालसा, रूपिंदर कौर रुबी और जगदेव सिंह कमालू के नाम शामिल हैं। पंजाब की आम आदमी पार्टी में अभी और बड़ी टूट के आसार बने हुए हैं।

आप से छिन सकता है प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा भी
मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का दावा है कि कुछ और आप विधायक उनके संपर्क में हैं। पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले ही आम आदमी पार्टी को झटके लगने शुरू हो गए हैं। आप के विधायकों के लगातार टूटने से मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने चुटकी ली है। चन्नी ने आम आदमी पार्टी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी के विधायकों की संख्या अब शिरोमणि अकाली दल (शिअद) से भी कम हो चुकी है। उसका राज्य में प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा भी छिन सकता है। 2017 के विधानसभा चुनाव में शिअद के 15 विधायक जीते थे। हालात यह हैं कि विधानसभा में आम आदमी पार्टी प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा खो सकती है। शिरोमणि अकाली दल के विधायक अब आप से ज्यादा हो गए हैं।

मुख्यमंत्री चेहरा न बनाने से भगवंत मान भी निराश
इधर, संगरूर से सांसद भगवंत मान भी आप के आलाकमान केजरीवाल के नाखुश हैं। भगवंत मान खुद भी पंजाब में आप द्वारा CM फेस न बनाए जाने से निराश हैं। आप छोड़ चुकी विधायक रूबी ने कहा कि वह कुछ महीने पहले भगवंत मान से मिली थीं। वह काफी निराश थे। वहां पर उनके परिवार के लोग भी मौजूद थे। उन्होंने वहीं कह दिया था कि अगर भगवंत मान सीएम चेहरा न हुए तो वह पार्टी से इस्तीफा दे देंगे। आप विधायक रूपिंदर कौर रूबी को कांग्रेस की सदस्यता दिलाने के बाद मुख्यमंत्री चन्नी ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी राजनीतिक करिश्मा नहीं, सिर्फ ड्रामेबाजी है। इसका पता अब सबको चल गया है, इसलिए अब लोग कांग्रेस के पास आ रहे हैं। अब पंजाब में आम आदमी का राज आ चुका है।

नया नेता आया तो टूट सकते हैं 3-4 और विधायक
कांग्रेस के चित्त-पट्ट की कुश्ती लड़ रहे नवजोत सिद्धू जब भी नाराज होते हैं, तो उनकी आम आदमी पार्टी में जाने की चर्चाएं जोर पकड़ने लगती हैं। आप छोड़ चुकी विधायक रूपिंदर रूबी ने इसका भी खुलासा किया कि मान की जगह पार्टी ने किसी और का सीएस फेस बनाया, उनकी जगह पर अगर कोई दूसरा नेता आया तो 3 से 4 और विधायक आप छोड़ सकते हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी के कुछ बड़े नेता और विधायक मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और कांग्रेस प्रधान नवजोत सिंह सिद्धू के संपर्क में हैं।

राजस्थान में परंपरा, टिकट बसपा से और मंत्री कांग्रेस सरकार के
राजस्थान के मंत्रिमंडल विस्तार में ग्रामीण विकास राज्य मंत्री बने राजेंद्र गुढ़ा का तो आलम ही यही है, वे बसपा से टिकट लाते हैं और जीतकर कांग्रेस सरकार में मंत्री बनते हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पिछले कार्यकाल में भी गुढ़ा और उनके पांच साथी बहुजन समाज पार्टी से टिकट लाए, जीते और फिर कांग्रेस में शामिल हो गए। तब इन्हीं की बदौलत गहलोत सरकार बची थी। अपने बयानों के लिए चर्चित रहने वाले गुढ़ा ने दो दिन पहले खुद स्वीकारा कि वे दो बार बसपा से टिकट लाकर चुनाव जीते और कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस में जब दरियां बिछाने के वक्त आता है तो वे फिर बसपा में जाकर टिकट ले आते हैं।

अब अपना दल से भी छोटी पार्टी, मायावती ने की उबरने की कोशिश
यूपी कांग्रेस के 7 विधायकों में एक बागी है और एक ने पार्टी छोड़ दी है। अब 6 विधायक बचे हैं। अपना दल के पास 9 विधायक हैं। सुभासपा के चार विधायक हैं। वहीं, अब बसपा के पास भी 4 ही विधायक बचे हैं। बसपा प्रमुख मायावती ने लालजी वर्मा के पार्टी छोड़ने के बाद शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को विधानमंडल दल का नेता बनाया था, लेकिन वह छह महीने भी नहीं टिके। इस तरह से छह महीने में बसपा विधायक दल के दो नेता छोड़ गए। अब जमाली की जगह मायावती ने उमाशंकर सिंह को विधानमंडल दल का नेता बनाया है। लेकिन हालात यह हैं कि कब, पार्टी से कौन नेता छोड़कर चला जाए कुछ कहा नहीं जा सकता।

क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वास्तव में "किसानों के खलनायक" हैं?

मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री", समाचार संपादक, उगता भारत 

एक राष्ट्रीय समाचार पत्र की ख़बर के अनुसार सुश्री मायावती के शासनकाल में गोरखपुर मंडल की नौ चीनी मिलों को औने-पौने दाम में बेचा गया था।

उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम लिमिटेड के अधीन प्रदेश की 21 चीनी मिलों को सुश्री मायावती सरकार के कार्यकाल में 2010-11 में बेचा गया था। इनमें से 10 मिलें उस समय चालू हालत में थीं, 11 मिलें बंद थीं।

सीएजी की रिपोर्ट में मिलों को गलत तरीके से औने-पौने दाम में बेचे जाने की पुष्टि भी हुई थी। हालांकि बसपा के बाद सत्ता में आई अखिलेश सरकार ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की थी।

मिलों की वर्तमान कीमत से 15 गुना कम कीमत पर इन्हें बेचा गया था। सर्किल रेट और स्टांप ड्यूटी की अनदेखी कर भी करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान कराया गया था। साथ ही मिलों की मशीनों, आवासों, गोदामों का भी मनमाना रेट निर्धारित किया गया था। 

इसमें अमरोहा, चांदपुर, जरवल रोड, सिसवा बाजार, सहारनपुर, बुलंदशहर, बिजनौर, सकौती टाडा, रोहाना कला, खड्डा की चीनी मिलें चालू हालत में थी।

जबकि बरेली, हरदोई, बाराबंकी, शाहगंज, बैतालपुर, देवरिया, भटनी, घुघली, छितौनी, लक्ष्मीगंज और रामकोला की चीनी मिलें बंद थी। इनमें सिसवा बाजार और घुघली महराजगंज में थीं। खड्डा, छितौनी, लक्ष्मीगंज और रामकोला कुशीनगर तथा बैतालपुर, देवरिया व भटनी मिलें देवरिया में थीं। खड्डा चीनी मिल चालू हालत में थी।

7 जुलाई 2021 को पत्रिका.डॉटकाम में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार श्री योगी सरकार ने 4 साल में 45.44 लाख से अधिक गन्ना किसानों को 1 लाख 40 हजार करोड़ रुपये का भुगतान किया है। यह बसपा सरकार से दोगुना और सपा सरकार के मुकाबले डेढ़ गुना अधिक बताया जाता है। इस खबर के अनुसार बसपा सरकार में गन्‍ना किसानों को 55,000 करोड़ का कुल भुगतान किया गया था, जबकि सपा सरकार के पांच साल में गन्‍ना किसानों को 95,000 करोड़ रुपये का कुल भुगतान किया गया था। अखिलेश सरकार के कार्यकाल में गन्‍ना किसानों के 10659.42 करोड़ रुपये के बकाये का भुगतान भी योगी सरकार ने किसानों को किया है।

2007 से 2017 तक जितना कुल भुगतान किसानों को हुआ था उतना योगी सरकार ने सिर्फ 4 साल में कर दिया।

इस खबर के एक भाग में लेखक लिखता है कि पूर्ववर्ती सरकारों में एक के बाद एक बंद होती चीनी मिलों को योगी सरकार ने न सिर्फ दोबारा शुरू कराया गया बल्कि यूपी को देश में चीनी उत्‍पादन में नंबर वन बना दिया । राज्‍य सरकार ने तीन पेराई सत्रों एवं वर्तमान पेराई सत्र 2020-21 समेत यूपी में कुल 3,868 लाख टन से अधिक गन्ने की पेराई कर 427.30 लाख टन चीनी का रिकॉर्ड उत्पादन किया है । वर्ष 2017-18 से 31 जनवरी, 2021 तक 54 डिस्टिलरीज के माध्यम से प्रदेश में कुल 261.72 करोड़ लीटर एथनॉल का उत्पादन हुआ है। जो कि एक रिकार्ड है।

प्रदेश में लॉकडाउन के दौरान एक भी चीनी मिल बंद नहीं हुई। सभी 119 चीनी मिलें चलीं । प्रदेश में 45.44 लाख से अधिक गन्ना आपूर्तिकर्ता किसान हैं और लगभग 67 लाख किसान गन्ने की खेती से जुड़े हैं। आज देश में 47% चीनी का उत्पादन यूपी में हो रहा है और गन्ना सेक्टर का प्रदेश की जीडीपी में 8.45 प्रतिशत एवं कृषि क्षेत्र की जीडीपी में 20.18 प्रतिशत का योगदान है। (पत्रिका.डॉटकाम)

25 सालों में पहली बार 243 नई खांडसारी इकाइयों की स्थापना के लिए लाइसेंस जारी किये गए। जिनमें से 133 इकाइयां संचालित हो चुकी हैं। 

इसके बावजूद भी श्रीमान राकेश टिकैत सहित तमाम विपक्षी दल श्री योगी सरकार को "किसानों का खलनायक" बनाने पर तुले हुए हैं। किसानों की आड़ में श्री टिकैत बन्धु और तमाम विपक्ष अपनी डूबती हुई राजनीतिक नैया को पार लगाने में लगा है। कोई भी सच्चाई को सामने नहीं लाना चाहता है। जानबूझकर सरकार के खिलाफ किसानों के मन में ज़हर घोला जा रहा है। उधर किसान श्री राकेश टिकैत को "अन्ना हजारे" समझ बैठे हैं, उन्हें लगता है कि वह सत्य, न्याय और धर्म की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, जबकि सच इससे बिल्कुल परे है। श्री टिकैत बंधुओं की सारी लड़ाई उनके निजी स्वार्थ, राजनीतिक हित और अपनी पहचान बनाने तक सीमित है। इस आंदोलन से पहले उनकी वास्तविक राजनीतिक स्थिति यह थी कि वह दो बार चुनाव लड़े औऱ दोनों ही बार अपनी ज़मानत ज़ब्त करा बैठे। विपक्ष टिकैत का सहारा लेकर किसानों के कंधों पर रखकर बंदूक चला रहा है। उसको भी अपना उल्लू सीधा करना है।

बर्तमान में किसानों के नाम पर हो रही सारी लड़ाइयां और आंदोलन केवल और केवल सत्ता के लिए हैं, किसान तो केवल मोहरा बने हुए हैं। यह बात किसानों को समझनी ही होगी। 

उत्तर प्रदेश चुनाव : राजनीति के कालनेमि जप रहे लक्ष्मी-दुर्गा का नाम, गले में रामनामी-माथे पर चंदन

                                                                                उत्तर प्रदेश चुनाव आते ही हिन्दू विरोधी सब हुए हिंदू हितैषी!
राजनीति के कालनेमि पिछले कुछ समय में जिस तरीके से अपने-अपने दड़बों से निकलकर हिंदुओं की धार्मिक स्थलों की यात्रा कर रहे हैं, जिस तरह से हर मामले में हिंदुओं के देवी-देवताओं को स्मरण कर रहे हैं, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीतिक तौर पर देश के सबसे प्रभावशाली प्रदेश, उत्तर प्रदेश में चुनाव का मौसम आ गया है।

कल तक हिन्दू और हिन्दुत्व का विरोध करने वाले आज मंदिरों पर माथा टेकने की होड़ लगाए हुए हैं। अयोध्या में राममंदिर बनने के घोर विरोधी भी आज अयोध्या जा रहे हैं, अब उनका मुस्लिम वोट नाराज नहीं होगा। क्योकि  नागरिक संशोधक कानून के विरोध में बने शाहीन बागों में एक बात स्पष्ट रूप से मुखरित होकर सामने आयी थी कि भारत को इस्लामिक राज्य बनाने के लिए  रणनीति में बदलाव करना होगा, हिन्दुओं के सामने सेकुलरिज्म और उनकी गैर-मोजुदगी में अपने इस्लामिक अजेंडे पर काम करने की पॉलिसी पर काम करना होगा। उस आंदोलन में जो हिन्दुत्व विरोधी नारे लगे, किसी से छुपा नहीं, और उस आंदोलन को हवा एवं समर्थन देने वाले भी ये ही लोग थे, जो आज गले में रामनामी डाले अयोध्या में पिकनिक मनाने जा रहे हैं। 

कल तक जिस अयोध्या को साम्प्रदयिक रंग दिया जा रहा था आज गंगा-जल की तरह पवित्र कैसे हो गयी। अब जनता इन नेताओं से पूछे कि क्या चुनाव में काशी विश्वनाथ और कृष्णजन्मभूमि से मुग़ल आक्रांताओं द्वारा बनाई मस्जिदों को हटाने का संकल्प लेंगे? 

राजनीतिक कालनेमि के करतूतों पर गौर करने से पहले असली वाले कालनेमि को याद कर लीजिए। रावण के एक मायावी राक्षस का नाम था कालनेमि। प्रसंग है कि राम-रावण युद्ध के दौरान मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण मूर्च्छित हो जाते हैं। सुषेन वैद्य उपचार के लिए संजीवनी बूटी की जरूरत बताते हैं। इसे लाने की जिम्मेदारी हनुमान जी को दी जाती है। जब रावण को यह खबर मिलती है तो वह हनुमान जी को झाँसा देने के लिए कालनेमि को भेजता है। कालनेमि साधु के वेश में राम नाम के जाप और अपनी माया से हनुमान जी को रोकने की कोशिश भी करता है।

रावण के कालनेमि से अब राजनीति की ओर लौटते हैं। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी बुधवार (15 सितंबर 2019) को ऑल इंडिया महिला कॉन्ग्रेस की स्थापना दिवस पर बोल रहे थे। इस दौरान बीजेपी को हिंदू विरोधी पार्टी बताते हुए उस पर देवी ‘लक्ष्मी’ और ‘दुर्गा’ की शक्ति को 10-15 लोगों की गिरवी बनाने का आरोप लगाया। हाल के दिनों में यह दूसरा मौका था जब राहुल की जुबान पर हिंदुओं की अराध्य देवियों का नाम था। इससे पहले जम्मू के त्रिकूटा नगर में कॉन्ग्रेसियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि बीजेपी के कारण दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती माँ की शक्तियाँ घटी हैं। अपने इस संबोधन की शुरुआत भी उन्होंने ‘जय माता दी’ से की थी। इस संबोधन से पहले वे माता वैष्णो देवी का दर्शन भी कर आए थे।

कुल मिलाकर राहुल गाँधी एक बार फिर अपनी उस राजनीति को आगे बढ़ाते दिख रहे हैं जो 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले देखने को मिली थी। तब वे न केवल मंदिर-मंदिर प्रदक्षिणा कर रहे थे, बल्कि उनके जनेऊधारी होने की बात भी सामने आई थी। बकायदा उनके गोत्र और ब्राह्मण होने का ऐलान हुआ था। उल्लेखनीय यह भी है कि गुजरात की तरह ही योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश बीजेपी के एक ऐसे गढ़ के तौर पर तब्दील होता दिख रहा है जो फिलहाल विपक्ष के लिए अभेद्य नजर आ रहा है।

लिहाजा विपक्षी दलों में खुद को हिंदू हितैषी साबित कर मतदाताओं को झाँसा देने की होड़ सी लगी है। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे हनुमान जी को झाँसा देने में कालनेमि लगा था। यहाँ यह याद करना जरूरी है कि राहुल गाँधी जिस नेह​रू के नाम पर राजनीति करते हैं वे अयोध्या से रामलला को बेदखल करवाना चाहते थे। वे जिस कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता हैं उसके पाले-पोसे इतिहासकारों ने राम के अस्तित्व को नकारा। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार सुप्रीम कोर्ट में राम के काल्पनिक होने का हवाला तक देकर आई। उसकी सरकार के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह ने इस देश के संसाधनों पर बहुसंख्यक हिंदुओं के अधिकार को खारिज करते हुए अल्पसंख्यकों का हक बताया था। कुछ महीने पहले जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए देश भर में निधि जुटाने का काम चल रहा था तब भी कॉन्ग्रेस नेता विष वमन से परहेज नहीं कर रहे थे। ऐसे में यह सवाल तो उठता है कि अचानक से कॉन्ग्रेस को हिंदू और उनकी आस्था इतनी प्रिय क्यों हो गई? क्या उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से इसका कोई रिश्ता है?

ऐसा नहीं है कि चोला केवल राहुल ने बदला है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया जो कभी रामजन्मभूमि स्थल पर यूनिवर्सिटी बनाने के पैरोकार थे, वे भी इस मौसम में अयोध्या हो आए हैं। उनके साथी राज्यसभा सांसद संजय सिंह कुछ समय पहले तक रामजन्मभूमि ट्रस्ट पर जमीन घोटाले का आरोप लगा रहे थे और अब गले में रामनामी तथा माथे पर चंदन लेप खुद को रामभक्त साबित करने में लगे हैं। अचानक से सुर तो उस सपा के भी बदले हैं जिसकी सरकार रहते अयोध्या को कार सेवकों के खून से रंग दिया गया था। जिसके नेता मुलायम सिंह यादव अपने इस कारनामे के लिए खुद को ‘मुल्ला मुलायम’ कहे जाने पर फूले नहीं समाते थे। जिस बसपा के कांशीराम अयोध्या में शौचालय बनवाने की बात करते थे, आज उस पार्टी की राजनीति के केंद्र में भी अयोध्या है। राम हैं।

पर राजनीति के कालनेमि शायद यह भूल गए हैं कि रावण का वह मायावी राक्षस भी तमाम छल-प्रपंच के बावजूद अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया था। चोले बदलने वाले तब राम के हनुमान को उनके ध्येय से भटका न सके थे। लोकतंत्र के हनुमान (वोटर) भी इन मौसमी चोलों को अब खूब पहचानते हैं।

केजरीवाल के मंत्री इमरान हुसैन पर ऑक्सीजन कालाबाज़ारी करने पर टॉप ट्रेंड कर रहा है #OxygenChorAAP

दिल्ली में कोरोना बेकाबू है। लोग ऑक्सीजन की कमी से परेशान हैं। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार को दिल्ली हाईकोर्ट फटकार भी लगा चुकी है। ऑक्सीजन की कमी से जहां कोरोना मरीज मर रहे हैं, श्मशान और कब्रिस्तानों में लाशों की लाइन लग रही है, वहीं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के करीबी नवनीत कालरा और मंत्री इमरान हुसैन पर ऑक्सीजन कालाबाज़ारी करने का आरोप लगा है। अब जिस तरह केजरीवाल के करीबी ऑक्सीजन की कालाबाज़ारी में सामने आने से लगता है, कि मोदी सरकार को बदनाम कर लाशों पर राजनीति की जा रही है। फिर जब ऑक्सीजन ऑडिट करने का केजरीवाल सरकार द्वारा विरोध करना ही केजरीवाल की घिनौनी सियासत को प्रमाणित कर दिया है। जब पुणे में ऑडिट होते ही रोज की 30 टन ऑक्सीजन की बचत हो रही है। 
दिल्ली पुलिस ने खान मार्केट के जिस खान चाचा रेस्टोरेंट में छापेमारी करके सैकड़ों ऑक्सीजन कंसंट्रेटर बरामद किए हैं, उसका मालिक नवनीत कालरा केजरीवाल का करीबी बताया जा रहा है। इसी कालरा को केजरीवाल ने दिल्ली निर्माता बताया था। स्पष्ट है, जिस धूर्त को केजरीवाल निर्माता बताए और उसके मंत्री कभी राशन कार्ड तो कभी ऑक्सीजन की कालाबाज़ारी में शामिल हों, उस स्थिति में यह भी स्पष्ट हो रहा है कि केजरीवाल कैसी मानसिकता से हैं, किसी को अब बताने की जरुरत नहीं। जो मुख्यमंत्री केजरीवाल पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनाव दिमाग में रख काम कर रहा हो, उस केजरीवाल से पंजाब और उत्तर प्रदेश की जनता को पूछना चाहिए कि "जब दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी थी, तब क्या पंजाब के लिए दिल्ली वालों की ज़िंदगियों से खिलवाड़ किया जा रहा था?" क्यों?" सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो:  

अभी तक फ्री का माल खाने वाले जिस अरविन्द केजरीवाल को क्रांतिकारी मुख्यमंत्री बताते थे, उन्हें भी अब ज्ञात इस क्रांतिकारी मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की मानसिकता और मिठ्ठा बनकर लूट-खसोट करने की आदत भी मालूम हो गयी होगी। कल तक जिसे आरोप बताया जाता था, उन्हें केजरीवाल देखिए स्वयं सिद्ध कर रहे हैं। अगर केजरीवाल वास्तव में क्रांतिकारी हैं, 'क्या कभी केजरीवाल ने निगम पार्षद से लेकर सांसद तक को हर महीने मिलने वाली करोड़ों की सुख-सुविधाओं और पेंशन बंद करने के लिए भूख हड़ताल की?'  

इतना ही नहीं केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के विधायक इमरान हुसैन पर भी ऑक्सीजन की कालाबाजारी करने का आरोप लगा है। केजरीवाल सरकार में मंत्री इमरान हुसैन दिल्ली दंगे के आरोपी ताहिर हुसैन का भाई है। कालाबाजारी में आप के करीबी नवनीत कालरा और विधायक इमरान हुसैन का नाम आने के बाद सोशल मीडिया पर #OxygenChorAAP टॉप ट्रेंड कर रहा है…

केजरीवाल को बसपा प्रमुख मायावती की भी फटकार 

देश में कोरोना महामारी की हालत सबसे ज्यादा दिल्ली में खराब है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कोरोना से पैदा स्थिति पर काबू पाने में विफल रहे हैं। केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर सिर्फ मोहल्ला क्लिनिक बना कर दुनिया भर में वाहवाही लूटने की कोशिश की लेकिन कोरोना संकट काल में यह वैक्सीन लगाने के भी काम नहीं आ रहा है। पिछली बार की तरह इस कार्यकाल में भी बेड और ऑक्सीजव प्लांट लगाने की दिशा में भी केजरीवाल सरकार ने कोई काम नहीं किया। ऐसे में केजरीवाल के हाथ जोड़ते ही पहले की तरह इस बार भी दिल्ली से लोगों का पलायन शुरू होने पर बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने आप प्रमुख को तगड़ी फटकार लगाई।

केजरीवाल की क्लास लेते हुए मायावती ने कहा कि आपके हाथ जोड़ते ही लोग दिल्ली से पलायन करने लगे। इस तरह का नाटक आपने पहले भी किया था। मायावती ने ट्वीट किया, ‘केवल हाथ जोड़कर दिल्ली के सीएम का यह कहना कि दिल्ली से लोग पलायन न करें, यही नाटक कोरोना के दौरान् पहले भी किया गया था। यह सब अब महाराष्ट्र, हरियाणा व पंजाब आदि राज्यों में भी देखने के लिए मिल रहा है। अब पंजाब में लुधियाना से भी लोग काफी पलायन कर रहे हैं, यह अति-दुःखद।’

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा,’यदि यहाँ कि राज्य सरकारें इनमें विश्वास पैदा करके इनकी जरूरतों को समय से पूरा कर देतीं तो फिर ये लोग पलायन नहीं करते और अब यहाँ कि राज्य सरकारें इस मामले में अपनी कमियों को छिपाने हेतु किस्म-किस्म की नाटकबाजी कर रही हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। ‘

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ऑक्सीजन पर केजरीवाल सरकार से सवाल पूछने पर 7 पत्रकारों को AAP ने वॉट्सऐप ग्रुप से बाहर निकाला

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ऑक्सीजन पर केजरीवाल सरकार से सवाल पूछने पर 7 पत्रकारों को AAP ने वॉट्सऐप ग्रुप से बाहर निकाला

बीएसपी सुप्रीमो ने अगले ट्वीट में कहा, ‘साथ ही, पूरे देश में सर्वसमाज में से खासकर गरीबों, दलितों व आदिवासी समाज के लोगों को ‘‘फ्री‘‘ में वैक्सीन दी जानी चाहिये। इसके साथ-साथ, ऐसे समय में इनकी आर्थिक मदद भी जरूर की जानी चाहिये। बी.एस.पी. की केन्द्र व सभी राज्य सरकारों से भी पुनः यह माँग।’


चीनी मिल घोटाले : बहुजन पार्टी के पूर्व MLC मो. इकबाल की 1097 करोड़ रूपए की संपत्ति अटैच

BSP के पूर्व MLC मोहम्मद इकबाल

कृषि कानूनों को लेकर हो रहे धरनों पर प्रारम्भ से एक बात प्रमुखता से कहीं जा रही है कि जिन मुद्दों को लेकर किसानों को धरना एवं प्रदर्शन करना चाहिए, उनमें से किसी एक भी मुद्दे पर कोई नहीं बोल रहा। किसानों को लूटने वाले कोई और नहीं सियासतखोर हैं।  

उत्तर प्रदेश में बीएसपी शासनकाल में हुए 1100 करोड़ के चीनी मिल घोटाला केस में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है। ईडी ने बसपा के पूर्व एमएलसी और सहारनपुर के खनन माफिया हाजी मोहम्मद इकबाल की 1097 करोड़ रुपए की संपत्तियों को अटैच किया। ईडी ने मोहम्मद इकबाल की कुल सात संपत्तियों को अटैच किया है। हाजी इकबाल पर कई और भी आरोप हैं, जिनमें अवैध खनन से नामी, बेनामी संपत्ति खरीदने जैसे मामले हैं। बताया जा रहा है कि 2500 करोड़ की संपत्तियाँ ईडी के निशाने पर हैं।

बीएसपी चीफ मायावती के शासनकाल में वर्ष 2010 से लेकर 2011 के दौरान करीब 11 चीनी मिलों को औने- पौने दाम पर बेचा गया था। पूरे प्रदेश में कुल 21 से ज्यादा चीनी मिल को बेहद कम दाम पर बेचने का आरोप है। इनमें से कई चीनी मिलों की बिक्री पर अब भी जाँच चल रही है। आरोप है कि इस फर्जीवाड़े से केंद्र और राज्य सरकार को करीब 1,179 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 12 अप्रैल, 2018 को चीनी मिल घोटाले की सीबीआई जाँच कराने की सिफारिश की थी। सीबीआई लखनऊ की एंटी करप्शन ब्रांच ने अप्रैल, 2019 में चीनी मिल घोटाले का केस दर्ज किया था। सीबीआई ने लखनऊ के गोमतीनगर थाने में सात नवंबर 2017 को दर्ज कराई गई एफआईआर को अपने केस का आधार बनाते हुए सात चीनी मिलों में हुई धांधली में रेगुलर केस दर्ज किया था, जबकि 14 चीनी मिलों में हुई धांधली को लेकर 6 प्रारंभिक जाँच दर्ज की गईं थीं। 

करोड़ों के भ्रष्टाचार के इस मामले में सीबीआई के साथ-साथ ईडी ने भी सक्रियता बढ़ा दी थी। घोटाले में सीबीआई के बाद प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत केस दर्ज किया था। लखनऊ स्थित ईडी के जोनल कार्यालय ने यह कार्रवाई की थी।

सीबीआई ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए देवरिया, बरेली, लक्ष्मीगंज, हरदोई, रामकोला, छितौनी व बाराबंकी स्थित सात चीनी मिल खरीदने के मामले में दिल्ली निवासी राकेश शर्मा, उनकी पत्नी सुमन शर्मा, गाजियाबाद निवासी धर्मेंद्र गुप्ता, सहारनपुर निवासी सौरभ मुकुंद, मोहम्मद जावेद, मोहम्मद वाजिद अली व मोहम्मद नसीम अहमद के खिलाफ नामजद केस दर्ज किया था। 

बिहार चुनाव : वो 40+ सीटें, जहाँ ओवैसी कर सकते हैं खेल

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जैसाकि पिछले लेख में बिहार में होने वाले चुनावों में असदउद्दीन ओवैसी दलित-मुस्लिम कार्ड खेलने की रणनीति बना चुके हैं, अब चुनाव घोषित होने पर उसे अमली जामा पहनाने मैदान में उतर रहे हैं। हिन्दू इतना मूर्ख है कि वो हिन्दू विरोधियों द्वारा हिन्दुओं को विभाजित करने के जाति चक्रव्यू में फंसा कर अपना खेल खेल रहे हैं, कोई यादव, कोई भूमिहर, दलित, आदिवासी, ब्राह्मण, कायस्थ, अनुसूचित जनजाति, पूर्वी, उत्तराखंडी, बंगाली और बिहारी आदि में फंसे रहते हैं, हमारी इन जातियों को विभाजित कर सियासत कर रहे हैं। जबकि हिन्दुओं को यह नहीं मालूम कि मुसलमानों में हिन्दुओं से अधिक जातियां हैं। इनमें इतनी कट्टरपंथी है कि एक दूसरे की मस्जिद में नमाज़ और एक दूसरे के कब्रिस्तान में मुर्दा तक दफ़न नहीं कर सकते 
लेकिन इस्लाम के नाम पर सब एक रहते हैं
। चुनावों में एकजुट होकर वोट देते हैं, जबकि हिन्दू अपनी जाति को महत्व देता है, यही कारण है कि सियासतखोर हिन्दुओं की इस कमजोरी का फायदा उठाकर इन्हें विभाजित करने का खेल खेलते रहते हैं। और इस विभाजित गंदे खेल में मुस्लिम पार्टियां ही नहीं सारी पार्टियां जिम्मेदार हैं। इस खतरनाक खेल को समाप्त करने के लिए समस्त हिन्दुओं को एकजुट होना पड़ेगा, जो एक असंभव काम है।     

राजनीति की प्रयोगशाला कहलाने वाले बिहार में चुनावों का दौर फिर से शुरू हो चुका है। ऐसे में चुनावी अटकलें लगेंगी, आंकलन होंगे, जातियों के आधार पर वोट बैंक के बनने और बिगड़ने की भी बातें होंगी। जो एक बात नहीं होगी, वो होगी मुहम्मडेन राजनीति की चर्चा!

ऐसा इसलिए है क्योंकि आमतौर पर मुसलमानों को एक संगठित वोट बैंक मानकर ही आंकलन किए जाते हैं। बदलते चुनावी परिदृश्य ने एक बार फिर से इस सिस्टम को चुनौती दे दी थी। अफ़सोस कि अभी भी तथाकथित चुनावी विश्लेषक इस एम-फैक्टर पर ध्यान नहीं देते।

जब पिछले लोकसभा चुनावों में असदउद्दीन ओवैसी की हैदराबाद के हिंसक, मजहबी कट्टरपंथी रजाकारों से जन्मी एआईएमआईएम ने बिहार चुनावों में पैर जमाने शुरू किए थे, तभी से इस बदलाव की आहट सुनाई देने लगी थी।

बंगाल और नेपाल की सीमाओं से सटे, बिहार के किशनगंज जिले की ख़ास बात यह है कि ये बिहार का इकलौता मुहम्मडेन बहुल (करीब 68 प्रतिशत) इलाका है। लोक सभा सीट के लिहाज से देखें तो यहाँ से कभी जनसंघ या भाजपा नहीं जीती है। 1952 से ही यहाँ तथाकथित “सेक्युलर” पार्टियों के उम्मीदवार जीतते रहे हैं। इस सीट से 8 बार कॉन्ग्रेस, 3 बार समाजवादी, एक बार जनता दल और 3 बार राजद के अलावा केवल एक बार एक निर्दलीय ने जीत दर्ज की थी।

पिछले उप-चुनावों में जब यहाँ से कॉन्ग्रेस के विधायक मोहम्मद जावेद के लोकसभा जाने की वजह से कॉन्ग्रेस ने जावेद की अम्मा सईदा बानू को उतारा तो उसे लग रहा था कि वही जीतेगी। इस बार उनका मुकाबला असदउद्दीन ओवैसी के उतारे कमरुल होदा से भी था। जब देश का ध्यान महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों पर था, तभी यहाँ से करीब 70000 वोट के साथ एआईएमआईएम के उम्मीदवार ने फतह पाई। कॉन्ग्रेस को केवल 25000 के लगभग वोट मिले थे।

अगर केवल आबादी के लिहाज से देखें तो ओवैसी की सांप्रदायिक पार्टी के लिए यहाँ उपजाऊ जमीन है। किशनगंज (करीब 68%), कटिहार (करीब 45%), अररिया (करीब 43%) और पुर्णिया (करीब 39%) में कम से कम 20 सीटें ऐसी हैं, जहाँ से ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार जीत सकते हैं।

ओवैसी की पार्टी अगर छोटी पार्टियों से गठबंधन करे और अपना दलित-मुस्लिम कार्ड हमेशा की तरह खेले तो उसके उम्मीदवार इन क्षेत्रों में कम से कम 40 सीटों पर स्थापित क्षेत्रीय/राष्ट्रीय पार्टियों को कड़ी टक्कर देंगे। भाजपा के गिरिराज सिंह जैसे नेताओं के बयानों पर खेल कर उसे और भी फायदा हो सकता है।

                                                       हिंदू-मुस्लिम आबादी और रफ्तार
अगर हम इसके साथ जोड़कर आबादियों के बढ़ने का तुलनात्मक अध्ययन करें तो एक चीज़ बहुत स्पष्ट हो जाती है। हिन्दुओं की आबादी बढ़ने की (दशक में) रफ़्तार जहाँ 2001 में 19.92% और 2011 में 16.76% थी, वहीं मुस्लिम आबादी के बढ़ने की रफ़्तार 2001 में 29.52% और 2011 में 24.6% रही।

आबादी के बढ़ने के क्रम में इस बदलाव से युवा वोटरों की संख्या में जो बदलाव हुए होंगे, संभवतः चुनावी विश्लेषक जमातों ने इसका कोई अंदाजा नहीं लगाया। ऐसा भी हो सकता है कि सेकुलरिज्म का झंडा उठाने के लिए इस तथ्य को दबा दिया गया हो। पक्का कहा नहीं जा सकता।

अंततः इन बदलावों का असर सामाजिक संरचना पर पड़ा, और फिर साथ ही साथ इसका असर स्थानीय राजनीति में भी नजर आने लगा। जो स्थानीय मुद्दे थे, वो धीरे-धीरे बदलने लगे। प्रतिनिधित्व का सवाल भी बदलने लगा।

बदलाव की शुरुआत देखें तो इसके लिए थोड़ा पीछे के भागलपुर दंगों (1989) का दौर देखना होगा। इन दंगों के वक्त बिहार में कॉन्ग्रेस की सत्येन्द्र नारायण सिन्हा की सरकार थी और भागलपुर से भी कॉन्ग्रेस जीतती थी। इन दंगों के बाद पच्चीस साल तक कॉन्ग्रेस यहाँ से जीत नहीं पाई। आज की तारीख में भी स्थिति बहुत बदली नहीं है। करीब एक पीढ़ी गुजर जाने के बाद भी लोगों को वो दंगे याद हैं।

दंगों के गुजर जाने के काफी वक्त बाद 2006 में नीतीश कुमार की सरकार ने भागलपुर दंगों की जाँच के लिए जस्टिस एनएन सिंह इन्क्वायरी कमीशन का गठन किया। करीब दस साल बाद जब इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट दी तो दंगों में नाकाम होने का पूरा दोष सत्येन्द्र नारायण सिन्हा की कॉन्ग्रेसी सरकार और स्थानीय प्रशासन की विफलता पर डाला गया। जाहिर है इससे आम लोगों में कोई संतोष की लहर तो नहीं ही दौड़ी।

पिछले चुनावों में बिहार की विधानसभा में कुल 23 मुहम्मडेन विधायक चुनकर पहुँचे थे। अगर आबादी के हिस्से के लिहाज से देखें तो ऐसे ही ये गिनती कम है। ऊपर से बिहार के करीब 56% मुहम्मडेन मतदाता ओबीसी समुदाय के हैं और जीतने वालों में एक बड़ी गिनती (9) शेख, और कुल्हैया (5) की थी।

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बिहार : ओवैसी की मुस्लिम-यादव चाल को RJD ने कहा – ‘वोट कटवा’
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बिहार : ओवैसी की मुस्लिम-यादव चाल को RJD ने कहा – ‘वोट कटवा’
जैसे-जैसे बिहा

जाहिर है ऐसे हाल में बिहार का मुहम्मडेन, प्रतिनिधित्व के लिए बाहर की तरफ देखना भी शुरू कर सकता है। ओवैसी का बिहार आना राजनीति की प्रयोगशाला के लिए एक नया प्रयोग होगा।

BSP विधायक शाह आलम ने संबंध बनाने के लिए युवती पर डाला दबाव

शाह आलम BSP विधायक शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली के खिलाफ गोमतीनगर थाने में मुकदमा दर्ज हुआ है। उन पर एक युवती के यौन उत्पीड़न और धमकी देने का आरोप है। शाह मुबारकपुर से विधायक हैं। वे बसपा सुप्रीमो मायावती के करीबी बताए जाते हैं। मायावती के भाई आनंद के वे बिजनेस पार्टनर भी हैं। पूर्वांचल प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के सीएमडी शाह पर आरोप उन्हीं की कंपनी में काम करने वाली एक महिला कर्मचारी ने लगाया है।
पीड़िता का आरोप है कि विधायक कंपनी में ऊँचे ओहदे और मोटी तनख्वाह का लालच देकर उस पर नाजायज संबंध बनाने का दबाव डाल रहे थे और फिर तरक्की देने का झाँसा देकर वीडियो कॉल करने लगे। एक दिन विधायक ने जरूरी काम का बहाना बनाकर उसे अपने घर पर बुलाया। जब वो पहुँची तो वो उसके साथ अश्लील हरकतें करने लगे और फिर उसके साथ दुष्कर्म करने का भी प्रयास किया, मगर पीड़िता ने उसे धक्का दे दिया। इसके बाद पीड़िता ने ऑफिस जाना बंद कर दिया और पुलिस से शिकायत करने की बात कही।
फिर विधायक ने फोन कर कहा कि दोबारा ऐसी हरकत नहीं करेंगे। पीड़िता का कहना है कि जब उन्होंने दोबारा ऑफिस जाना शुरू किया तो और भी लड़कियों का शारीरिक शोषण करने का पता चला। शाह आलम ने एक नाबालिग को भी अपना शिकार बनाया है। साथ ही कि पीड़िता ने इस बात का भी खुलासा किया कि कंपनी में जिन फ्लैटों की कीमत 1.40 करोड़ और डेढ़ करोड़ है, उसकी रजिस्ट्री महज 70 से 80 लाख में कराकर टैक्स की भी चोरी की गई है।

पीड़िता का कहना है कि शाह आलम उसे व्हाट्सएप पर आपत्तिजनक क्लिप्स भेजते थे। जनवरी 2020 में शाह आलम ने एक बार फिर उस पर शारीरिक संबंध बनाने का दबाव बनाना शुरू किया। आरोप है कि उसके मना करने पर शाह आलम ने एचआर मैनेजर को उसके पास भेजकर दबाव बनवाया। इस पर भी वह नहीं मानी तो शाह आलम ने कंपनी से निकालने की धमकी दी। इसके बाद पीड़िता ने 13 जनवरी 2020 को सीओ संतोष कुमार सिंह से लिखित शिकायत की। फिर शाह आलम ने इससे नाराज होकर 14 जनवरी को उसे नौकरी से निकाल दिया। पुलिस ने पीड़िता की शिकायत पर मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।

CAA मुद्दे पर बिखर गया कांग्रेस का कुनबा: ममता, मायावती, AAP, शिवसेना सबने किया इनकार

CAA, कांग्रेस
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे विरोध प्रदर्शन के बीच मोदी सरकार को घेरने के लिए विपक्ष पूरी तरह तैयार दिख रही थी… लेकिन सिर्फ दिख ही रही थी। उस दिख रही विपक्षी एकता को अब एक और झटका लग गया है, ममता बनर्जी तो खैर पहले दे ही चुकी हैं। अब आज बैठक से पहले ही विपक्ष में बिखराव देखने को मिल रहा है। दरअसल 13 जनवरी को दिल्ली में होने वाली विपक्ष की बैठक में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बाद अब मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (BSP), अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) और शिवसेना ने भी शामिल होने से इनकार कर दिया है।
यह बैठक कांग्रेस ने बुलाई है और इस बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी करने वाली हैं। विपक्षी दलों की यह बैठक आज दोपहर दो बजे होगी, जिसमें नागरिकता कानून और देश के राजनीतिक हालात पर चर्चा होगी। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस बैठक में जाने से इनकार करते हुए ट्वीटर इस फैसले के पीछे की वजह भी बताई है। मायावती ने सोमवार (जनवरी 13, 2019) को एक के बाद एक ट्वीट किए।


 
उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “जैसा कि विदित है कि राजस्थान कांग्रेस सरकार को बीएसपी का बाहर से समर्थन दिए जाने पर भी, इन्होंने दूसरी बार वहाँ बीएसपी के विधायकों को तोड़कर उन्हें अपनी पार्टी में शामिल करा लिया है जो यह पूर्णतयाः विश्वासघाती है। ऐसे में कांग्रेस के नेतृत्व में आज विपक्ष की बुलाई गई बैठक में बीएसपी का शामिल होना, यह राजस्थान में पार्टी के लोगों का मनोबल गिराने वाला होगा। इसलिए बीएसपी इनकी इस बैठक में शामिल नहीं होगी।”
वहीं, दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी ने भी विपक्षी दलों की बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया है। AAP के सांसद संजय सिंह ने कांग्रेस द्वारा बुलाई गई आज की विपक्षी बैठक में शामिल नहीं होने पर कहा, “ऐसी किसी भी बैठक के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इसलिए, ऐसी किसी बैठक में शामिल होने का कोई मतलब नहीं है जिसके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है।”
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार आज यूनिवर्सिटीओं में जिन दलों द्वारा अराजक तत्वों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, राज्.....
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जिस तरह कुछ वर्षों से दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में वामपंथी और कांग्रेस .....
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 13 जनवरी को दिल्ली में होने वाली विपक्षी पार्टियों की बैठक का बहिष्कार .....
इससे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कांग्रेस और लेफ्ट पर बंगाल में डर्टी पॉलिटिक्स खेलने का आरोप लगाया था और कहा था, “मैंने सोनिया गाँधी द्वारा 13 जनवरी को नई दिल्ली में बुलाई गई बैठक का बहिष्कार करने का फैसला किया है क्योंकि मैं पश्चिम बंगाल में वामपंथी और कांग्रेस की हिंसा का समर्थन नहीं करती।” बनर्जी का कहना था कि वाम मोर्चा और कांग्रेस के दोहरे रवैये को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। साथ ही उन्होंने अब नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ अकेले लड़ाई लड़ने की बात कही थी।
दूसरे यह कि नागरिकता संशोधक कानून का विरोध जिस तरह पूर्णरूप से हिन्दू-विरोधी होने के साथ-साथ, मोदी और योगी के जान लेने की बातें जोर पकड़ने से, सभी को डर है यदि विरोधियों ने इन दोनों में से किसी एक पर भी हमला कर दिया, विरोधियों के साथ-साथ विरोध का समर्थन कर रहे किसी भी दल को जनता बक्शने वाली। इससे पहले इस तरह की दुर्घटना होने से पूर्व ही अच्छा है, अलग हो जाओ।