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मौलाना साजिद रशीदी का ज़हर : ‘सोमनाथ मंदिर में होता था गलत काम, इसीलिए गजनवी ने तोड़ दिया’: राम मंदिर ध्वस्त करने की भी दी थी धमकी

फोटो क्रेडिट-(ABP/News on air)
अखिल भारतीय इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने 22 जनवरी 2023 को एक बार फिर हिंदू धर्म के खिलाफ जहर उगला है। रशीदी ने कहा है कि गुजरात के सोमनाथ मंदिर में गलत काम होता था और इसी वजह से मोहम्मद गजनवी ने मंदिर को तोड़ने का काम किया था। साथ ही उसने कहा कि मुगलों का धर्म से कोई लेना-देना नहीं था।

लेकिन मुग़लों की आतताई की पैरवी करना ये मौलाना कभी नहीं भूलता। इस तरह का जहर जब इसी मौलाना ने करवाचौथ(2022) के दिन News18 पर एंकर अमिश देवगन के शो 'आर पार' में हिन्दुओं की उस धार्मिक ग्रन्थ ऋग्वेद को आधार बनाकर सनातन धर्म पर प्रहार करने का प्रयास किया था, जिसकी इसने पन्नी तक नहीं उतारी, लेकिन इसे नहीं मालूम था कि एक शेरनी भी पैनल में बैठी है, शेरनी जब इस पर दहाड़ रही थी, मानो माँ जगदम्बा साक्षात धरती पर अवतरित हो गयीं हैं। "मैं तेरे को बोल रही हूँ श्लोक पढ़ ...पृष्ठ संख्या बता... ", संक्षेप में इतना ही कह सकता है कि उस शेरनी ने इसे जरुरत से ज्यादा बेइज्जत किया, उस पुरे कार्यकम को कई लेखो में डाल चूका हूँ। 

ये मौलाना झूठे इतिहास का महिमामंडन कर मुग़ल आक्रांताओं का बचाव कर सनातन धर्म पर प्रहार करता रहेगा, लेकिन क्या Quran Petition पर भी बोलने का साहस दिखाएगा? क्या 31 जुलाई 1986 को तीस हज़ारी कोर्ट के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट Z.S. Lohat द्वारा दिए विवादित आयतों पर दिए निर्णय पर भी बोलने का हिम्मत दिखाएगा? इन मुद्दों पर न ही रशीदी जैसा कोई मौलाना बोलेगा और न ही कोई साम्प्रदायिकता के खिलाफ बोलने वाला, ये गैंग तो सनातन के विरुद्ध बोल 'हिन्दू आतंकवाद' और 'भगवा आतंकवाद' चिल्ला-चिल्लाकर हिन्दुओं को भ्रमित करते रहेंगे। परन्तु समस्त हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं को एकजुट होकर पिछली सरकारों द्वारा मुस्लिम प्रेम को दर्शाते इन मुद्दों को दफ़न कर दिया था, ईंट का जवाब पत्थर से देने के लिए इन मुद्दों को जीवित कर जनमानस को जाग्रत करना होगा। हर मुसलमान जेहादी नहीं है, उन्हें रशीदी जैसे मौलानाओं ने बदनाम कर रखा है। 'सर तन से जुदा' करने और इस काम के लिए प्रेरित करने वालों के विरुद्ध गृह मंत्रालय को कठोरता से पेश आना होगा। 

Court Ruling: Some Ayats in the Quran cause Communal Riots | IndiaFacts
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Court Ruling: Some Ayats in the Quran cause Communal Riots | IndiaFacts

इस जैसे जेहादी मौलानों द्वारा जहर उगलने पर संविधान की बात करने वाले, गंगा-जमुना तहजीब की बात करने वाले, विदेशी चंदे पर सनातन धर्म को अपमानित करने वाले हिन्दुओं आंखे खोलो, होश में आओ, क्यों नहीं इस जैसे मौलानाओ के खिलाफ कब बोलोगे? क्या तुम्हारी अंतरआत्मा मर गयी है? कब तक सनातन धर्म सहन करते रहोगे?       

इसके साथ ही उसने इतिहास की उल्टी गंगा बहाते हुए मुगल आक्रांताओं पर ज्ञान दिया। उसने कहा, ”यह सच है कि मुगल एक काल था। मुगल जितने भी बादशाह हुए हैं, उनका एक दौर था, जमाना था। मुगलों का धर्म से कोई लेना-देना नहीं था। इन 800 सालों में जितने भी मुगल बादशाह हुए हैं या दूसरे और बादशाह रहे हों। आप अगर उनकी हिस्ट्री को पढ़ेंगे तो उनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं था।”

रशीदी ने आगे कहा, ”उन्होंने धर्म के नाम पर किसी भी तरह का काम किया भी नहीं। इस तरह के बहुत सारे उदाहरण हैं। जैसे गजनवी के बारे में लोग कहते हैं कि उसने सोमनाथ मंदिर तोड़ा है। जबकि हिस्ट्री ये है कि वहाँ के लोगों ने गजनवी को बताया कि वहाँ आस्था के नाम पर क्या हो रहा है। देवी-देवता के नाम पर क्या हो रहा है। कैसे वहाँ लड़कियों को लापता कर दिया जाता है।”

मौलाना यहीं नहीं रुका, उसने आगे कहा, ”इसके बाद गजनवी ने वहाँ बकायदा मुआयना करवाया। जब पता चला कि वहाँ ऐसा है, तब जाके उसने सोमनाथ के मंदिर पर चढ़ाई की। सोमनाथ मंदिर को उसने तोड़ने का काम नहीं किया, बल्कि वहाँ जो गलत हो रहा था, उसे रोकने का काम किया।”

ऐसा नहीं है कि मौलाना ने हिंदू धर्म के खिलाफ पहली बार जहर उगला है। इससे पहले वह राम मंदिर को तोड़ने की धमकी दे चुका है। उसने कहा था कि 50-100 साल बाद मुस्लिम शासक के आने पर अयोध्या के राम मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई जा सकती है। मुस्लिमों की आने वाली नस्लें इसको लेकर खामोश नहीं रहेंगी।

मौलाना रशीदी ने कहा था , ”आज मुसलमान खामोश है। मेरी आने वाली नस्ल… मेरा बेटा, उसका बेटा, उसका पोता…. 50-100 साल के बाद एक हिस्ट्री उनके सामने आएगी कि हमारी मस्जिद को तोड़कर मंदिर बना दिया गया। उस वक्त हो सकता है कि कोई मुस्लिम शासक हो, कोई मुस्लिम जज हो या मुस्लिम शासन आ जाए… कुछ नहीं कहा जा सकता है कि क्या फेरबदल हो जाए… तो क्या उस हिस्ट्री की बुनियाद पर इस मंदिर को तोड़कर मस्जिद नहीं बनाई जाएगी? बिल्कुल बनाई जाएगी।”

मुस्लिमों डरो मत, मूर्ति पूजा बंद करने को करो जिहाद ; राम मंदिर को तबाह कर वहीं बनाएँगे मस्जिद: अल-कायदा का ‘गजवा-ए-हिंद’ में ऐलान

                             अल-कायदा के जिहादी पत्रिका में दी राम मंदिर को तबाह करने की धमकी
इस्लामी आतंकी संगठन अल-कायदा (Al-Qaeda) ने फिर से भारत और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगला है। अयोध्या में बन रहे राम मंदिर को तबाह करने की बात कही है। कहा है कि मंदिर को तबाह कर उसी जगह मस्जिद बनाएगा। मूर्ति पूजा खत्म करने और भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने के लिए मुस्लिमों से जिहाद को कहा है।

अल-कायदा की ​जिहादी पत्रिका ‘गजवा-ए-हिंद’ के ताजा अंक में राम मंदिर को लेकर यह नफरत दिखाई गई है। रिपोर्टों के अनुसार 110 पन्नों के संपादकीय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ भी आतंकी संगठन ने भड़काऊ बातें की है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक पत्रिका के ताजा अंक में कहा गया है कि जिस तरह बाबरी मस्जिद के ढाँचे पर राम मंदिर बनाया जा रहा है, उसी तरह अल-कायदा राम मंदिर को तोड़कर उसकी जगह मस्जिद बनाएगा। इसी हफ्ते जारी इस ऑनलाइन मैगजीन में लिखा गया है कि मूर्तियों की जगह अल्लाह के नाम पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया जाएगा। लेकिन इन सब के लिए कुर्बानी देनी होगी।

इस लेख में अल-कायदा ने भारतीय मुस्लिमों से कहा है, “तुम्हें किसी तरह के नुकसान से डरने की जरूरत नहीं है। पहले ही बहुत नुकसान हो चुका है। यदि तुमने पहले ही जिहाद किया होता तो आज इतना नुकसान नही होता। तुम्हारे लिए धर्मनिरपेक्षता जहन्नुम की तरह है। हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की बात एक धोखा है।”

मैगजीन में कहा गया है, “यह सब सिर्फ कहने की बात नहीं है। बाबरी मस्जिद को 30 साल पहले नष्ट कर दिया गया था। गुजरात के अहमदाबाद में 20 साल पहले गर्भवती महिलाओं को उनके बच्चों के साथ जलाया गया और आज हर जगह बुलडोजर चलाए जा रहे हैं। जामिया मिलिया से लेकर अलीगढ़ तक और जामिया उस्मानिया (हैदराबाद) से देवबंद तक हिंदू लोग चाकू, भाले और तलवारें तेज कर रहे हैं।”

अल-कायदा ने कहा है, “सभी हिंदुओं को लाठी चलाने की शिक्षा दी जा रही है। हिंदू महिलाएँ सब्जी काटने वाले चाकुओं से मुसलमानों के चेहरे और सिर काटने की बात कर रही हैं। अल-कायदा एक ऐसा जिहाद चाहता है कि पूरा हिंदुस्तान इस्लामी दुनिया का हिस्सा बन जाए और मूर्ति पूजा बंद हो जाए। हमारा भारत के मुस्लिमों से ला इलाहा इल्लल्लाह का रिश्ता है जो खून और देश के रिश्ते से बढ़कर होता है। यही रिश्ता हमें आपके मोहब्बत में बार-बार आपकी ओर खींचता है।”

लेख में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक शासन को नकारने की बात की गई है। कहा गया है कि अमेरिका की सरकार मोदी का समर्थन करती है। लेख में जोर देकर कहा गया है कि जब तक पूरा भारत इस्लामिक शासन के अधीन नहीं हो जाता तब तक अन्य सभी उपाय व्यर्थ हैं। मुसलमानों के लिए मूर्ति पूजा करने वालों के शासन में रहना शर्मनाक है। जिहाद की लड़ाई में भारतीय मुसलमानों से समर्थन माँगा गया है। मैगजीन के आखिरी पन्ने पर टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन ने जिहाद को ही सारी समस्याओं का हल बताया है।

‘मथुरा-काशी बाकी है’: 1947 का वो यज्ञ जब 3 दोस्तों ने खींचा हिंदुओं के 3 पवित्र स्थल को वापस पाने का खाका

                जब अयोध्या के साथ ही पड़ी थी काशी विश्वनाथ मंदिर और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव
यह तो पहली झाँकी है, मथुरा-काशी बाकी है। ये नारा तो बहुत बाद में बुलंद हुआ। उससे बरसों पहले तीन दोस्तों ने अयोध्या के साथ-साथ इन दो हिन्दू पवित्र स्थलों को वापस पाने का एक विस्तृत खाका तैयार कर लिया था। हालाँकि राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए पहले से ही संघर्ष जारी था। पर इनकी योजना की वजह से आजाद भारत में यह सिरे चढ़ा।

5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर भूमिपूजन के बाद फिर से मथुरा-काशी को वापस पाने की बातें जोर-शोर से होने लगी है। मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के लिए तो बकायदा एक ट्रस्ट भी बनाया गया है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट से 14 राज्यों के 80 संत-महामंडलेश्वर जुड़े हैं। आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए हस्ताक्षर अभियान शुरू करने की योजना बनाई गई है।

वास्तव में विवाद को जन्म देने वाले कोई अन्य नहीं, वरन मुस्लिमों से अधिक हिन्दू ही हैं जो कुर्सी की खातिर इस्लामिक कट्टरपंथियों के हाथ कठपुतली बन अपने पूज्यनीय पुरुषोत्तम श्रीराम को ही दांव पर लगा बैठे। राम विरोधी हिन्दू ही रामजन्म स्थान पर लाइब्रेरी, अस्पताल और न जाने क्या-क्या बनाने के लिए बोलते थे, आज वही लोग राम के चौदह वर्ष वनवास उपरांत होने वाली दीपावली पर छोड़ी जाने वाली आतिशबाज़ी पर विवाद करने से बाज़ नहीं आ रहे। देखिए सोशल मीडिया पर वायरल होता वीडियो: 

दूसरे, जब रामजन्मभूमि आन्दोलन अपने चरम पर था, उस समय हिन्दू संगठनों की खुली मांग थी कि "सम्मान से हमारे तीन प्रमुख तीर्थ अयोध्या, काशी और मथुरा दे दो, नहीं तो पूरे 6000 अपने धार्मिक स्थल जिन्हे मस्जिद, दरगाह और कब्रिस्तानों में बदल दिया है लेकर रहेंगे।", लेकिन कुर्सी के भूखे नेता तब भी अपनी नींद से नहीं जागे, और मुसलमानों को भड़काकर अपनी गन्दी और ओछी सियासत खेलते रहे, निहत्ते रामभक्तों पर गोलियां चलवाकर तुष्टिकरण करते रहे।  

वैसे, तुलसी दास लिख गए हैं;

झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाई महा अहि हृदय कठोरा॥

यह भी कि; 
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेतॉं नाहिं।
द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलजुग माहिं॥

यानी, ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सतयुग और त्रेता में नहीं होते। द्वापर में थोड़े से होंगे और कलियुग में तो इनके झुंड-झुंड होंगे। 

असल में हिंदुओं के इन पवित्र स्थलों को वापस पाने की योजना एक खेल से भी जुड़ी हुई है। यह खेल है 12वीं सदी में उत्तरी फ्रांस से शुरू हुआ ‘जिउ दी पौमे’ (हथेली का खेल), जो 16वीं सदी में इंग्लैंड पहुँच टेनिस हो गया। 78 फीट लंबे और 27 फीट चौड़े कोर्ट में खेले जाने वाले लॉन टेनिस को अंग्रेज 1880 के दशक में हिंदुस्तान लेकर आ गए थे। 1920 आते-आते भारत ने डेविस कप में भाग लेना भी शुरू कर दिया था। हालाँकि भारतीय लॉन टेनिस का इतिहास भले 100 साल से भी पुराना हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाप छोड़ने वाले हम चुनिंदा खिलाड़ी ही पैदा कर पाए हैं।

लेकिन, इस खेल ने हिंदू जीवन दर्शन के तीन पैरोकारों को इतनी प्रगाढ़ता से जोड़ा कि इसने आजाद भारत में अयोध्या के राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव डाल दी। ये तीन दोस्त थे, बलरामपुर स्टेट के महाराजा पटेश्वरी प्रसाद सिंह, नाथपंथी कनफटा साधुओं की शीर्ष पीठ गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ और इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) के अधिकारी केकेके नायर। महाराजा घुड़सवारी और लॉन टेनिस में पारंगत थे। महंत लॉन टेनिस के माहिर और नायर का भी इस खेल से लगाव था।

महाराजा हिंदू जीवन दर्शन के प्रचार-प्रसार को समर्पित थे। महंत तो बकायदा हिंदू महासभा के अधिकारी ही थे। नायर भी हिंदू महासभा के संपर्क में थे। लेकिन, कहते हैं कि तीनों की दोस्ती का आधार लॉन टेनिस के प्रति इनका लगाव ही था।

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखा है कि 1947 के शुरुआती दिनों में महाराजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया। केरल के एलप्पी के रहने वाले नायर जो 1930 में सिविल सर्विस से जुड़े थे, उस समय सरयू के उस पार फैजाबाद से सटे गोंडा जिले में तैनात थे। यज्ञ में महाराजा के गुरु स्वामी करपात्री जी भी शामिल हुए।

अंजुल भर भिक्षा लेने के कारण करपात्री कहलाए स्वामी जी सिद्ध दंडी संन्यासी, उद्भट विद्वान और प्रखर वक्ता थे। ‘रामराज्य और मार्क्सवाद’ नामक बहुचर्चित किताब उनकी ही लिखी है। 1940 में बनारस में हिंदू परंपराओं की रक्षा के लिए उन्होंने ‘धर्मसंघ’ की स्थापना की और 1941 में बनारस से दैनिक अखबार ‘सन्मार्ग’ शुरू किया। राजनीति में धर्म को उचित स्थान दिलाने के लिए ‘रामराज्य परिषद’ बनाया। 1951 में इस परिषद के 24 सदस्य राजस्थान विधानसभा के लिए चुने गए थे। कई लोग इस राजनीतिक दल के बैनर तले संसद भी पहुॅंचे।

शर्मा के मुताबिक उन्हें खुद स्वामी करपात्री ने बताया था कि राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव उसी यज्ञ में पड़ी थी। नायर वहाँ पहले से थे और यज्ञ समाप्ति से एक दिन पहले महंत दिग्विजय नाथ भी पहुँच गए। उन हिंदू धर्म स्थलों की मुक्ति पर चर्चा हुई, जिन पर इस्लामी अक्रांताओं ने कब्जा किया था।

इसके बाद नायर एक विस्तृत योजना के साथ स्वामी करपात्री और महंत दिग्विजय नाथ से मिले। उन्होंने अयोध्या के साथ-साथ वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि को दोबारा हासिल करने का खाका पेश किया। नायर ने वादा किया कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वे अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार हैं। नौकरी भी।

संयोग से 1 जून 1949 को नायर फैजाबाद के कलेक्टर बने। वहाँ सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह और अभिराम दास पहले से ही राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए प्रयासरत थे। मैथिल ब्राह्मण अभिराम दास नागा वैरागी यानी रामानंद संप्रदाय के 15 साल पुराने खाड़कू थे। हिंदू महासभा से जुड़े होने के कारण महंत दिग्विजय नाथ के करीबी थे। उनकी ख्याति राम जन्मभूमि के ‘उद्धारक’ के तौर पर थी। कहते हैं कि 3 दिसंबर 1981 को जब अभिराम दास की अंतिम यात्रा निकली तो ‘राम नाम’ की जगह ‘राम जन्मभूमि के उद्धारक अमर रहे’ की गूँज हर ओर से आ रही थी।

नायर के फैजाबाद में तैनाती के कुछ महीने बाद ही 22-23 दिसंबर 1949 की दरम्यानी रात रामलला भाइयों के साथ विवादित गुंबद के भीतर प्रकट हुए। नायर ने उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दबाव के बावजूद मूर्तियों को हटाने से इनकार कर दिया था। 1952 में जब फैजाबाद से उनका तबादला कर दिया गया तो उन्होंने नौकरी ही छोड़ दी।

रामलला के वकील एससी वैद्यनाथन सुप्रीम कोर्ट को बता चुके हैं कि राम का जन्म बाबरी मस्जिद के गुंबद के नीचे हुआ था। भारतीय पुरातत्व विभाग की खुदाई से मिले सबूत भी बताते हैं कि बाबरी मस्जिद के नीचे जो स्ट्रक्चर था उसकी बनावट उसमें मिली भगवान की तस्वीरें, मूर्तियॉं सब पहले से मंदिर के होने की गवाही देते हैं। लेकिन, आपत्ति जताने वाले यह भी पूछते हैं कि एक ही कालखंड में होने के बावजूद तुलसीदास ने राम मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बनाए जाने का जिक्र क्यों नहीं किया?

आम आदमी पार्टी 24 घंटे में भूल गयी श्रीराम और अयोध्या, श्रीराम के प्रति AAP के पाखंड के सबूत

आम आदमी पार्टी धोखा देने में एक कदम आगे बढ़ गई है। पहले दिल्ली की जनता को धोखा दिया, अब भगवान राम और अयोध्यावासियों को धोखा दे रही है। 14 सितंबर, 2021 को दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के नेतृत्व में अयोध्या में तिरंगा संकल्प यात्रा निकाली गई थी। अयोध्या में मनीष सिसोदिया ने रामलला के दर्शन भी किए और कहा कि राम की प्रेरणा से ही अरविन्द केजरीवाल दिल्ली की सरकार चला रहे हैं। लेकिन 24 घंटे के भीतर ही आम आदमी पार्टी रामनगरी अयोध्या को भूल गई। सितम्बर 15 को जारी 100 संभावित उम्मीदवारों की लिस्ट में अयोध्या की जगह फ़ैजाबाद का जिक्र किया गया।

24 घंटे में भूल गयी श्रीराम और अयोध्या 

अयोध्या की जगह फैजाबाद के नाम पर सियासी तूफान उठ खड़ा हुआ है। आम आदमी पार्टी को पता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नवंबर 2018 में दीपावली से एक दिन पहले उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया था। ऐसे में अयोध्या को फैजाबाद बताना आम आदमी पार्टी की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। एक तरफ पार्टी के नेता भगवान राम का दर्शन कर हिन्दुओं को झांसा देने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं फैजाबाद का जिक्र कर मुस्लिम वोट बैंक को भी साधने का प्रयास कर रहे हैं। दरअसल अयोध्या को फैजाबाद बताकर आम आदमी पार्टी ने फिर साबित कर दिया है कि उनकी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। वे सिर्फ चुनाव को देखते हुए सियासी गिरगिट बने हुए।

देश की तरक्की मंदिर बनाने से नहीं होती--केजरीवाल 

14 सितंबर, 2021 को अयोध्या पहुंचे दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि पूरे देश में अरविंद केजरीवाल ही ऐसे एकमात्र मुख्यमंत्री हैं जो अयोध्या के राजा मयार्दा पुरूषोत्तम श्रीराम की प्रेरणा लेकर सरकार चला रहे हैं। लेकिन अरविंद केजरीवाल ने नवंबर 2018 में राममंदिर विवाद पर कहा था कि अगर जवाहरलाल नेहरू ने स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया के बजाय मंदिर बनाया होता, तो भारत आगे नहीं बढ़ता। केजरीवाल ने कहा कि मोदी सरकार ने देश को मंदिर और स्टेच्यू में उलझा दिया है। अगर ये मंदिर या मस्जिद बनाते रहे तो आपको अपने बेटे को मंदिर में पुजारी बनाना पड़ेगा। अब सवाल उठता है कि क्या केजरीवाल के इस बात पर अमल हुआ तो आज भगवान राम का मंदिर बन पाता?  

हवा में उड़ गए जय श्रीराम--संजय सिंह  

पूंछ रहे थे मंदिर बनने से पेट भरेगा? वही भंडारे की पहली पंक्ति में बैठ कर प्रसाद चाप रहे हैं, संजय सिंह, मनीष सिसोदिया

आम आमदी पार्टी के नेता भगवान श्रीराम के प्रति कितनी श्रद्धा रखते हैं, उसका अंदाजा उनके पूर्व के बयान से लगाया जा सकता है। ‘हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ कहने वाले संजय सिंह भगवा गमछा ओढ़ कर और राम मंदिर की जगह स्कूल-कॉलेज बनाने की बात करने वाले मनीष सिसोदिया रामनामी गमछा पहन कर अयोध्या में प्रविष्ट हुए।

मंदिर ट्रस्ट पर झूठे आरोप लगाए 

आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने राम मंदिर निर्माण के लिए खरीदी गई जमीन में घोटाले का आरोप लगाकर निर्माण कार्य में बाधा डालने की कोशिश की। ‘आप’ नेता रत्नेश मिश्र ने राज्यसभा सांसद संजय सिंह को झूठा करार देते हुए राम विरोधी होने तक के आरोप लगाए। आम आदमी पार्टी यूथ ब्रिगेड के प्रदेश प्रवक्ता रत्नेश मिश्र ने ट्रस्ट पर लगे आरोपों से मायूस होकर अयोध्या में प्रेस वार्ता कर संजय सिंह को झूठा और राम विरोधी बताया। उन्होंने कहा कि जमीन खरीदने के मामले में संजय सिंह राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को बदनाम कर रहे हैं।

भूमिपूजन पर आपत्तिजनक ट्वीट 

अगस्त 2020 में संजय सिंह ने अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन के संबंध में आपत्तिजनक ट्वीट कर हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई। इसके साथ ही संजय सिंह ने दलित समाज को अपमानित करके उनकी भी भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम किया और साफ झूठ बोला। संजय सिंह ने कहा था कि राम मंदिर भूमि पूजन से दलितों को दूर रखा गया है। आखिर ऐसा क्यों है कि भूमि पूजन में किसी दलित को नहीं बुलाया गया। उन्होंने ट्वीट किया, ‘आज मुझे एक दलित नेता ने फोन किया। बोले भाई साहब राष्ट्रपति दलित, उन्हें नहीं बुलाया गया, उप मुख्यमंत्री मौर्य, उन्हें नहीं बुलाया गया। ऐसा क्यों? भाजपा दलितों को मंदिरों से बाहर क्यों रखना चाहती है?’

केजरीवाल के मंत्री ने उठाया था श्रीराम के अस्तित्व पर प्रश्न 

नवंबर 2019 में केजरीवाल कैबिनेट के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने भगवान राम और भगवान कृष्ण के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया था। उन्होंने ट्वीट में उन्होंने लिखा था, “अगर यह बात प्रमाणित है कि भगवान राम और कृष्ण पूर्वज हैं तो इन्हें इतिहास में क्यों नहीं पढ़ाया जाता। पूर्वजों का इतिहास होता है जबकि इनका कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इस विषय पर पेरियार का दृष्टिकोण प्रमाणिकता और तार्किकता के आधार पर था।”

सिसोदिया ने दिया था मंदिर की जगह यूनिवर्सिटी बनाने का सुझाव

दिसंबर 2018 में मनीष सिसोदिया ने एक निजी न्यूज चैनल को इंटरव्यू दिया था। सवाल अयोध्या में राम मंदिर को लेकर था। मनीष सिसोदिया ने कहा, ‘राम मंदिर और मस्जिद दोनों वालों से पूछ लो और अगर दोनों की सहमति हो तो वहां एक अच्छी यूनिवर्सिटी बना दो। हिंदुओं के बच्चे भी पढ़ें, मुसलमानों के बच्चे भी पढ़ें, क्रिश्चियन के भी पढ़ें, भारतीयों के भी पढ़ें, विदेशियों के भी पढ़ें…सबके बच्चे पढ़ें। वहीं से राम के सिद्धांतों को निकालो। राम मंदिर बनाने से राम राज्य नहीं आएगा, पढ़ाने से राम राज्य आएगा।’

सिसोदिया की मंदिर की बजाए स्कूल दर्शन की सलाह 

2017 में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि काश नेताओं में चुनाव से पहले सरकारी स्कूलों के दर्शन करने की परंपरा होती। सिसोदिया ने ट्वीट करते हुए कहा था, ‘अगर चुनावों से ठीक पहले ‘मंदिर-दर्शन’ की जगह ‘सरकारी स्कूलों के दर्शन’ की राजनीतिक परम्परा होती तो देश के हर बच्चे को आज बेहतरीन शिक्षा मिल रही होती।’

उत्तर प्रदेश चुनाव : राजनीति के कालनेमि जप रहे लक्ष्मी-दुर्गा का नाम, गले में रामनामी-माथे पर चंदन

                                                                                उत्तर प्रदेश चुनाव आते ही हिन्दू विरोधी सब हुए हिंदू हितैषी!
राजनीति के कालनेमि पिछले कुछ समय में जिस तरीके से अपने-अपने दड़बों से निकलकर हिंदुओं की धार्मिक स्थलों की यात्रा कर रहे हैं, जिस तरह से हर मामले में हिंदुओं के देवी-देवताओं को स्मरण कर रहे हैं, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीतिक तौर पर देश के सबसे प्रभावशाली प्रदेश, उत्तर प्रदेश में चुनाव का मौसम आ गया है।

कल तक हिन्दू और हिन्दुत्व का विरोध करने वाले आज मंदिरों पर माथा टेकने की होड़ लगाए हुए हैं। अयोध्या में राममंदिर बनने के घोर विरोधी भी आज अयोध्या जा रहे हैं, अब उनका मुस्लिम वोट नाराज नहीं होगा। क्योकि  नागरिक संशोधक कानून के विरोध में बने शाहीन बागों में एक बात स्पष्ट रूप से मुखरित होकर सामने आयी थी कि भारत को इस्लामिक राज्य बनाने के लिए  रणनीति में बदलाव करना होगा, हिन्दुओं के सामने सेकुलरिज्म और उनकी गैर-मोजुदगी में अपने इस्लामिक अजेंडे पर काम करने की पॉलिसी पर काम करना होगा। उस आंदोलन में जो हिन्दुत्व विरोधी नारे लगे, किसी से छुपा नहीं, और उस आंदोलन को हवा एवं समर्थन देने वाले भी ये ही लोग थे, जो आज गले में रामनामी डाले अयोध्या में पिकनिक मनाने जा रहे हैं। 

कल तक जिस अयोध्या को साम्प्रदयिक रंग दिया जा रहा था आज गंगा-जल की तरह पवित्र कैसे हो गयी। अब जनता इन नेताओं से पूछे कि क्या चुनाव में काशी विश्वनाथ और कृष्णजन्मभूमि से मुग़ल आक्रांताओं द्वारा बनाई मस्जिदों को हटाने का संकल्प लेंगे? 

राजनीतिक कालनेमि के करतूतों पर गौर करने से पहले असली वाले कालनेमि को याद कर लीजिए। रावण के एक मायावी राक्षस का नाम था कालनेमि। प्रसंग है कि राम-रावण युद्ध के दौरान मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण मूर्च्छित हो जाते हैं। सुषेन वैद्य उपचार के लिए संजीवनी बूटी की जरूरत बताते हैं। इसे लाने की जिम्मेदारी हनुमान जी को दी जाती है। जब रावण को यह खबर मिलती है तो वह हनुमान जी को झाँसा देने के लिए कालनेमि को भेजता है। कालनेमि साधु के वेश में राम नाम के जाप और अपनी माया से हनुमान जी को रोकने की कोशिश भी करता है।

रावण के कालनेमि से अब राजनीति की ओर लौटते हैं। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी बुधवार (15 सितंबर 2019) को ऑल इंडिया महिला कॉन्ग्रेस की स्थापना दिवस पर बोल रहे थे। इस दौरान बीजेपी को हिंदू विरोधी पार्टी बताते हुए उस पर देवी ‘लक्ष्मी’ और ‘दुर्गा’ की शक्ति को 10-15 लोगों की गिरवी बनाने का आरोप लगाया। हाल के दिनों में यह दूसरा मौका था जब राहुल की जुबान पर हिंदुओं की अराध्य देवियों का नाम था। इससे पहले जम्मू के त्रिकूटा नगर में कॉन्ग्रेसियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि बीजेपी के कारण दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती माँ की शक्तियाँ घटी हैं। अपने इस संबोधन की शुरुआत भी उन्होंने ‘जय माता दी’ से की थी। इस संबोधन से पहले वे माता वैष्णो देवी का दर्शन भी कर आए थे।

कुल मिलाकर राहुल गाँधी एक बार फिर अपनी उस राजनीति को आगे बढ़ाते दिख रहे हैं जो 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले देखने को मिली थी। तब वे न केवल मंदिर-मंदिर प्रदक्षिणा कर रहे थे, बल्कि उनके जनेऊधारी होने की बात भी सामने आई थी। बकायदा उनके गोत्र और ब्राह्मण होने का ऐलान हुआ था। उल्लेखनीय यह भी है कि गुजरात की तरह ही योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश बीजेपी के एक ऐसे गढ़ के तौर पर तब्दील होता दिख रहा है जो फिलहाल विपक्ष के लिए अभेद्य नजर आ रहा है।

लिहाजा विपक्षी दलों में खुद को हिंदू हितैषी साबित कर मतदाताओं को झाँसा देने की होड़ सी लगी है। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे हनुमान जी को झाँसा देने में कालनेमि लगा था। यहाँ यह याद करना जरूरी है कि राहुल गाँधी जिस नेह​रू के नाम पर राजनीति करते हैं वे अयोध्या से रामलला को बेदखल करवाना चाहते थे। वे जिस कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता हैं उसके पाले-पोसे इतिहासकारों ने राम के अस्तित्व को नकारा। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार सुप्रीम कोर्ट में राम के काल्पनिक होने का हवाला तक देकर आई। उसकी सरकार के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह ने इस देश के संसाधनों पर बहुसंख्यक हिंदुओं के अधिकार को खारिज करते हुए अल्पसंख्यकों का हक बताया था। कुछ महीने पहले जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए देश भर में निधि जुटाने का काम चल रहा था तब भी कॉन्ग्रेस नेता विष वमन से परहेज नहीं कर रहे थे। ऐसे में यह सवाल तो उठता है कि अचानक से कॉन्ग्रेस को हिंदू और उनकी आस्था इतनी प्रिय क्यों हो गई? क्या उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से इसका कोई रिश्ता है?

ऐसा नहीं है कि चोला केवल राहुल ने बदला है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया जो कभी रामजन्मभूमि स्थल पर यूनिवर्सिटी बनाने के पैरोकार थे, वे भी इस मौसम में अयोध्या हो आए हैं। उनके साथी राज्यसभा सांसद संजय सिंह कुछ समय पहले तक रामजन्मभूमि ट्रस्ट पर जमीन घोटाले का आरोप लगा रहे थे और अब गले में रामनामी तथा माथे पर चंदन लेप खुद को रामभक्त साबित करने में लगे हैं। अचानक से सुर तो उस सपा के भी बदले हैं जिसकी सरकार रहते अयोध्या को कार सेवकों के खून से रंग दिया गया था। जिसके नेता मुलायम सिंह यादव अपने इस कारनामे के लिए खुद को ‘मुल्ला मुलायम’ कहे जाने पर फूले नहीं समाते थे। जिस बसपा के कांशीराम अयोध्या में शौचालय बनवाने की बात करते थे, आज उस पार्टी की राजनीति के केंद्र में भी अयोध्या है। राम हैं।

पर राजनीति के कालनेमि शायद यह भूल गए हैं कि रावण का वह मायावी राक्षस भी तमाम छल-प्रपंच के बावजूद अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया था। चोले बदलने वाले तब राम के हनुमान को उनके ध्येय से भटका न सके थे। लोकतंत्र के हनुमान (वोटर) भी इन मौसमी चोलों को अब खूब पहचानते हैं।

अयोध्या : राम जन्मभूमि पर यूनिवर्सिटी चाहने, भूमि घोटाले का ‘मनगढंत आरोप लगाने वाले अब वोट के लिए ‘राम भक्त’ बनें सिसोदिया-संजय

वोट के लिए 'राम भक्त' बनें सिसोदिया-संजय, पहुँचे अयोध्या
राजनीति नहीं बल्कि सियासत रंग बदलने में गिरगिट को बहुत पीछे छोड़ देती है। कल तक राममंदिर का घोर विरोध करने वाले आज वोट के लिए अयोध्या जाकर रामभक्त बन रहे हैं। ये पाखंड आम आदमी पार्टी ही नहीं सभी पार्टियां कर रही है। और जनता इनके पाखंड में फंस जाएगी। बीजेपी तो प्रारम्भ से ही अयोध्या के अलावा अन्य हिन्दू तीर्थों को मुक्त करने के कहती रही है, लेकिन तुष्टिकरण पुजारी बीजेपी को सांप्रदायिक पार्टी के नाम से बदनाम करते रहे और आज बीजेपी के शुभ काम के आगे माथा टेकना क्या सिद्ध करता है? सांप्रदायिक कौन : बीजेपी या बीजेपी विरोधी? फिर भी क्या अब बोलेंगे कि राममंदिर तोड़ बाबरी मस्जिद बनाई गयी थी? 

मनीष सिसोदिया रामलला के दर्शन करने अयोध्या पहुँच गए। महत्वपूर्ण घोषणा है, खासकर इसलिए क्योंकि यही सिसोदिया श्री राम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर नहीं बल्कि विश्वविद्यालय चाहते थे। अब जबकि राम मंदिर निर्माण का कार्य चल रहा है, “मंदिर वहीं बनाएँगे पर तारीख नहीं बताएँगे” जैसे व्यंग्यात्मक नारे अब नहीं सुने जाएँगे। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर संघर्ष और अदालती लड़ाई किसने लड़ी, यह जगजाहिर है। दशकों तक चले आंदोलन का विरोध किस-किस स्तर पर हुआ और किसने-किसने किया, ये तथ्य भी अब इतिहास के दस्तावेजों का हिस्सा बन चुके हैं।

सत्तासीन सेक्युलर राजनीतिक दलों ने कब और क्या-क्या किया, उसका जिक्र राजनीतिक तौर पर हमेशा होता रहेगा। कारसेवकों पर गोलियाँ बरसाने से लेकर चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करने तक, सारे तथ्य सरकारी दस्तावेज में समा चुके हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट को अदालती कार्रवाई में कैसे दरकिनार करने की कोशिशें हुईं, यह भी किसी से नहीं छिपा। सर्वोच्च न्यायालय में मुक़दमे की सुनवाई 2019 के लोकसभा चुनाव तक रोकने की सिफारिश किसने की, वह भी अब ऐतिहासिक दस्तावेजों का हिस्सा है। कौन श्री राम जन्मभूमि स्थल पर विश्वविद्यालय चाहता था, कौन अस्पताल और कौन स्मारक, यह आने वाले कई दशकों तक याद किया जाएगा। 

श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर जिन लोगों ने विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनवाने की इच्छा जाहिर की थी उनमें आम आदमी पार्टी के नेता प्रमुख थे। मनीष सिसोदिया का एक वीडियो आज भी जब तब चलने लगता है जिसमें वे मंदिर की जगह एक विश्वविद्यालय बनाने की इच्छा जाहिर करते हुए देखे जाते हैं। पार्टी के अन्य नेता भी समय-समय पर श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर न बनाए जाने की इच्छा जाहिर कर चुके थे। यह सब उस तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के नाम पर तब किया गया जब सेकुलरिज्म फैशन में था और सब फैशनेबल दिखना चाहते थे। यहाँ तक कि अंतिम प्रयास के रूप में श्री राम जन्मभूमि न्यास पर जमीन घोटाले का निराधार आरोप लगाने में भी नहीं हिचके।

अब फैशन बदल गया है और साथ-साथ सिसोदिया और केजरीवाल भी। श्री राम जन्मभूमि के मुक़दमे में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद जब दिल्ली विधानसभा के चुनाव आए तब अरविन्द केजरीवाल ने खुद को विधानसभा में दिल्ली के बुजुर्गों का श्रवण कुमार घोषित कर दिया और यह वादा किया कि उनकी सरकार अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद दिल्ली के हर बुजुर्ग को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ स्थल के दर्शन फ्री में करवाएगी। अब उत्तर प्रदेश में चुनाव आ रहे हैं तो मामला दिल्ली सरकार से आगे जाकर पार्टी और उसके नेताओं तक पहुँच गया है। यही चुनाव का मौसम है जो सिसोदिया को अचानक रामलला की याद आ गई है और वे अयोध्या जा तो रहे हैं पर उनके लिए जाने से अधिक महत्वपूर्ण जाते हुए दिखना है।  

अब आम आदमी पार्टी के नेताओं के लिए उत्तर प्रदेश में एंट्री मन ही मन “प्रविसि नगर कीजे सब काजा, हृदय राखि कोसलपुर राजा” के गायन से शुरू होती है। अभी तक मन में चल रहे इस गायन की आवाज़ जल्द ही मुँह से निकलेगी। चुनाव आ रहे हैं तो मन ही मन गायन करने वाले बाकायदा समूह बनाकर अयोध्या काण्ड का पाठ करेंगे। केजरीवाल श्रवण कुमार बनेंगे। सिसोदिया और संजय सिंह भी कुछ न कुछ बन लेंगे। इन्हें देखकर भारत भर को वीर सावरकर का वह वक्तव्य याद आयेगा कई; यदि जनेऊ पहनने से वोट मिलेंगे तो कॉन्ग्रेसी सूट के ऊपर जनेऊ धारण करने लगेंगे।


कल्याण सिंह एक प्रयोग हैं, प्रयोग मरते नहीं: वह फॉर्मूला जिसके दम पर BJP आज अपराजेय है, जिसने हिंदुओं को जोड़ा

राममंदिर के नाम पर सरकार की आहुति देने वाले कल्याण सिंह को अंतिम प्रणाम करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। 
कल्याण सिंह ने अगस्त 2020 में एक टीवी इंटरव्यू में यह बात कही थी। उसी कल्याण सिंह ने जो 21 अगस्त 2021 की रात राम में विलीन हो गए। उसी कल्याण सिंह ने जिसने कहा था कि राम मंदिर बनाने की खातिर एक क्या 10 बार सरकार कुर्बान करनी पड़ेगी तो हम तैयार हैं। उसी कल्याण सिंह ने जिसने कहा कि बाबरी विध्वंस को लेकर मन में न कोई पछतावा है, न कोई शोक है, न कोई खेद है और न ही कोई पश्चाताप का भाव है। जिसने बार-बार इसे गर्व का विषय कहा। जिसने बार-बार दोहराया कि कारसेवकों पर गोली नहीं चलवाऊँगा।

जब इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें 15 अगस्त, 26 जनवरी की तरह  5अगस्त 2020 की तारीख भी अमिट हो जाएगी। इस दिन राम मंदिर के लिए भूमिपूजन हुआ। उसी पन्ने में ये भी लिखा जाएगा कि 6 दिसंबर को ढाँचा चला गया था। ढाँचे के साथ सरकार भी चली गई थी। मेरे जीवन की आकांक्षा थी कि राम मंदिर बने। मंदिर बनते ही मैं बहुत चैन के साथ दुनिया से विदा हो जाऊँगा।

           राम मंदिर के नाम पर हिन्दुओं को जोड़ने वाले मरते नहीं, अमर हो जाते हैं 
ऐसे वक्त में जब राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रवादी विचारधारा का बोलबाला है और उसके पराभव के दूर-दूर तक निशान नहीं दिखते हैं। जब अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो रहा है और बात मथुरा-काशी के अपने मंदिरों को वापस लेने की हो रही है, तो संभव है कि कल्याण सिंह का ये अंदाज आपको हैरान न करे। पर याद रखिएगा कि कल्याण सिंह के पहले इसी उत्तर प्रदेश के एक मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने अयोध्या को कारसेवकों के खून से रंग दिया था। उसने सत्ता की सनक में दावा किया था कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। वह अपने नाम के आगे ‘मुल्ला’ जुटने से आह्लादित था। तब किसने 6 दिसंबर 1992 की कल्पना की होगी? तब किसने सोचा होगा एक दिन कारसेवक बाबर के बर्बर निशान को दफन कर देंगे? किसने सोचा होगा जब यह सब हो रहा होगा तो एक मुख्यमंत्री अपने सरकारी आवास में धूप सेंक रहा होगा और सूचना मिलने पर गोली चलाने का आदेश देने से स्पष्ट शब्दों में इनकार कर देगा? उसका आदेश होगा- बिना गोली चलवाए परिसर खाली करवाया जाए। किसने सोचा होगा कि कारसेवकों की सुरक्षा सुनिश्चित कर वह इस्तीफा ले मुख्यमंत्री की कुर्सी को लात मारने निकल जाएगा?

जिस देश में सियासी फायदे के लिए मजहब का इस्तेमाल होता हो। जिस देश में राजनीतिक रसूख हासिल करने के लिए नेता सार्वजनिक जीवन में धर्म को त्याज्य समझते हों। उस देश में धर्म के लिए सत्ता को ठुकराने की ऐसी बानगी शायद ही कोई और मिले। शायद यही कारण है कि हिंदू हृदय सम्राट की छवि कल्याण सिंह के साथ सदा-सदा के लिए अंकित हो गई और जब उन्होंने इस संसार से विदाई ली तो उन्हें लोग इन्हीं संस्मरणों के साथ नमन कर रहे हैं।

पर राम के काज आने वाले कल्याण सिंह एक ‘प्रयोग’ भी थे। ऐसा प्रयोग जो सफल नहीं होता तो शायद बीजेपी आज यहाँ नहीं होती। जो मोदी-शाह वाली भाजपा की ताकत देख रहे हैं और जिन्होंने अटल-आडवाणी वाली भाजपा के बारे में पढ़ा-सुना हो, उन्हें यह अतिशयोक्ति लग सकती है। पर राजनीति का अटल सत्य यही है कि वीपी सिंह ने जिस मंडल से हिंदुओं को खंड-खंड करने की राजनीति शुरू की थी, उसे बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले से ही रोका और हिंदुओं को जोड़ा। इसके केंद्र में हिंदुत्व की राजनीति के साथ-साथ ओबीसी चेहरे को आगे बढ़ाना था। इसी प्रयोग की उपज थे कल्याण सिंह। इस प्रयोग ने देश के सबसे बड़े प्रदेश में बीजेपी के लिए सत्ता का दरवाजा खोला। इसी प्रयोग ने बीजेपी को विस्तार दिया। वो मजबूती दी जिसकी वजह से वह आज अपराजेय दिखती है। सबका साथ-सबका विकास उसी प्रयोग से निकला है। वह फॉर्मूला आज भी हिट है और उसके ही सहारे बीजेपी लगातार आगे बढ़ती जा रही है।

कल्याण सिंह ने एक बार कहा था,

संघ और भारतीय जनता पार्टी के संस्कार मेरे रक्त के बूँद-बूँद में समाए हुए हैं। इसलिए मेरी इच्छा है कि जीवन भर भाजपा में रहूँ। जीवन का जब अंत होने को हो तो मेरा शव भी भारतीय जनता पार्टी के झंडे में लिपटकर जाए।

हालाँकि बीच में एक वक्त ऐसा भी आया था जब कल्याण सिंह को बीजेपी छोड़नी पड़ी थी। वे मंच पर मुलायम सिंह यादव तक के साथ भी दिखे। जिस अतरौली से वे 8 बार विधायक बने, वहाँ उनकी बहू की जमानत तक जब्त हो गई। लेकिन, राम मंदिर को लेकर गर्व का भाव उनके जीवन में हमेशा बना रहा। 6 दिसंबर को लेकर कभी कोई गम, कोई पाश्चाताप नहीं दिखा। बाद में वे उसी गर्व के साथ बीजेपी में लौटे भी और भारतीय जनता पार्टी के झंडे में लिपटकर जाने का उनका स्वप्न भी पूरा हुआ।

तो प्रयोग कभी मरते नहीं। वे केवल नई यात्रा पर निकलते हैं। राम काज की शपथ लेने वाले कल्याण सिंह अब राम में विलीन होने की यात्रा पर हैं। जब-जब कोई हिन्दुओं को बाँटने की सियासत करेगा, उसके जवाब में अपने दौर का कल्याण सिंह हिंदुओं को जोड़ने के लिए खड़ा होगा। जब-जब राम की बात होगी, राजनीति और धर्म की बात होगी, तब-तब धर्म के लिए, राम के लिए सत्ता को ठुकरा देने वाले कल्याण सिंह की बात होगी और हर दौर में उनकी प्रेरणा से कल्याण सिंह खड़ा होगा।

त्रेता में यदि हनुमान राम काज के लिए थे तो कलियुग में कल्याण थे। हनुमान ने रावण की लंका का दहन किया तो कल्याण सिंह ने लिबरलों/कट्टरपंथियों/वामपंथियों/तुष्टिकरण की राजनीति की लंका का। राम मनोहर लोहिया ने लिखा है- राम, कृष्ण और शिव भारत की पूर्णता के तीन महान स्वप्न हैं। कल्याण ने राम का स्वप्न पूरा किया। अब कृष्ण और शिव के स्वप्नों को पूरा करने की बारी हमारी और आपकी है।

नेहरू से राहुल तक कांग्रेस के निशाने पर हिन्दू

ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब दिल्ली के पहाड़गंज स्थित एक होटल में पुलिस ने दबिश देकर जान मोहम्मद डार उर्फ जहाँगीर को दबोचा था। इस इस्लामी आतंकी के पास से हथियार के अलावा भगवा वस्त्र, कलावा, कुमकुम मिले थे। बताया जाता है कि साधु के वेश में उसे गाजियाबाद के डासना स्थित शिव-शक्ति पीठ के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती की हत्या करनी थी।

यह इकलौता उदाहरण नहीं है जब हिन्दू प्रतीकों की आड़ में इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिन्दुओं को निशाना बनाने की कोशिश की। याद करिए लखनऊ में भगवा कुर्ता पहने जेहादियों द्वारा कमलेश तिवारी की हत्या। फिर याद करिए मुंबई में 2008 में हुए आतंकी हमले के दौरान हाथ में कलावा बाँध निदोर्षों पर ताबड़तोड़ फायरिंग करते हुए इस्लामिक जेहादी कसाब को। यह तो हिन्दुओं की किस्मत अच्छी थी कि कसाब जिन्दा पकड़ा गया था, अन्यथा कांग्रेस और इसके समर्थक पार्टियां द्वारा "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम से हिन्दुओं को बदनाम कर दिया होता। आप याद करते जाएँगे पर ऐसी घटनाओं की फेहरिस्त खत्म नहीं होगी।

किसी में कांग्रेस से यह पूछने का साहस नहीं कि फिरोज जहांगीर का पौत्र राहुल गाँधी का हिन्दू गोत्र कब और कैसे हो गया? कोट पर जनेऊ पहनना, चुनावों में मंदिरों में माथा टेकना और बाद में मंदिर जाने वालों आरोपित करना, यह सब क्या है? है क्या कांग्रेस के पास कोई जवाब? 

यह अजीब विडंबना है कि जब भी बात हिन्दुओं की, उनके अराध्य और आस्था की या फिर परंपराओं की आती है, देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल, देश पर सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली पार्टी, प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष तौर पर सबसे लंबे समय तक हुकूमत करने वाला परिवार, इस्लामिक कट्टरपंथियों की तरह ही अपना चरित्र दिखलाता है। नेहरू से राहुल गाँधी तक कांग्रेस ने सियासत के कई मोड़ देखे, लेकिन हिन्दू घृणा और मुस्लिम तुष्टिकरण की उसकी चाल वैसी ही रही है।

क्यों एक कांग्रेसी हिन्दू, कभी राम मंदिर निर्माण की बात नहीं करता?

क्यों एक कांग्रेसी हिन्दू, कश्मीरी पंडितों के उत्पीड़न पर अपना मुंह नहीं खोलता?

क्यों एक कांग्रेसी हिन्दू, केरल, कर्नाटक, बंगाल में मारे जा रहे हिन्दुओं पर अपना मुंह नही खोलता?

क्यों एक कांग्रेसी हिन्दू, सबरीमाला में हिन्दू आस्था के कुचले जाने पर चुप रहता है?

क्यों एक कांग्रेसी हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय द्वारा धर्मांतरण पर मुंह बंद रखता है?

क्यों एक कांग्रेसी हिन्दू, जातिवाद से ऊपर उठकर हिंदू समरसता की बात नहीं करता?

क्यों एक कांग्रेसी हिन्दू, सेना प्रमुख को गुंडा कहने पर भी चुप रहता है?

क्यों एक कांग्रेसी हिन्दू, खुद को हिन्दू आतंकवाद, भगवा आतंकवाद, हिन्दू तालिबान नाम गढ़े जाने पर भी खामोश रहता है?

क्यों एक कांग्रेसी हिन्दू, रोहिंग्या/बांग्लादेशी/पाकिस्तानी घुसपैठियों के मुद्दे पर चुप रहता है?

क्यों गौरवशाली हिन्दू सम्राटों के इतिहास को धूमिल कर आतताई मुगलों को महान बताने का महिमामंडन किया गया? 

सोमनाथ मंदिर के जीणोंद्वार पर जब महामहिम डॉ राजेंद्र प्रसाद को भी निमंत्रित करने पर जवाहर लाल नेहरू न स्वयं गए, बल्कि राजन बाबू को भी न जाने का भरसक प्रयत्न करते रहे। लेकिन राजन बाबू भी नेहरू के हर अवरोध को दरकिनार कर सोमनाथ मंदिर का प्रवेश करने गए। इतना ही नहीं, नेहरू राजन बाबू के अंतिम दर्शन तक को नहीं गए। क्या यह किसी प्रधानमंत्री को शोभा देता है कि देश के प्रथम राष्ट्रपति के अंतिम संस्कार में शामिल न हो? 

हिन्दुओं से कांग्रेस की घृणा का ताजा-ताजा उदाहरण उसका लीक टूलकिट है। इसमें कुंभ को कोरोना का सुपर स्प्रेडर बताकर प्रोपेगेंडा को हवा देने की रणनीति का खाका खींचा गया है। साथ ही निर्देश है कि यदि कोई इसके जवाब में ईद का जिक्र करे तो उसकी अनदेखी कर देनी है।

ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब इस तरह का चरित्र कांग्रेस ने अयोध्या राम मंदिर के लिए चलाए गए देशव्यापी धन संग्रह अभियान या उससे पहले अयोध्या में भूमिपूजन और उससे भी पहले राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर दिखाया था। इसी साल फरवरी में यूपीए की सरकार में मंत्री रहे कांग्रेसी पवन बंसल में कहा था कि उनसे भी राम मंदिर के लिए चंदा माँगा गया, लेकिन उन्होंने नहीं दिया। कांग्रेस  विधायक और पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया ने राम मंदिर के लिए धन संग्रह को दारूबाजी से ही जोड़ दिया था।

राहुल और प्रियंका की आज की कांग्रेस से एक पीढ़ी पीछे चलें तो राम सेतु पर यूपीए सरकार का सुप्रीम कोर्ट में दिया हलफनामा हमारे सामने है। इस हलफनामे के जरिए भगवान राम के अस्तित्व को कांग्रेस ने तब नकारा था, जब पर्दे के पीछे से राहुल की माँ सोनिया गाँधी हुकूमत को हाँक रही थी। कांग्रेस यदा-कदा हिन्दुओं का अनादर करने से नहीं चुकी। इसी दौर में कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के संसाधनों पर बहुसंख्यक हिन्दुओं के अधिकार को एक तरह से खारिज करते हुए अल्पसंख्यकों का पहला हक बताया था।

ऐसा भी नहीं है कि भाजपा और हिन्दुत्व के उभार ने कांग्रेस को हिन्दू घृणा में सनने को राजनीतिक तौर पर मजबूर किया है। आजादी के बाद से ही उसका यह चरित्र लगातार दिखता रहा। सबसे पहले तो देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसका प्रदर्शन किया था। ये नेहरू ही थे जो अयोध्या से रामलला को उनके भाइयों के साथ बेदखल करवाने पर अमादा थे।

आज राजनीतिक जमीन पर कांग्रेस भले नेहरू-इंदिरा के जमाने की तरह मजबूत नहीं रही। लेकिन, हिन्दुओं की आस्था पर उसका हमला उसी सुनियोजित तरीके से जारी है। यही कारण है कि जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज जैसों को आगे आकर इससे सचेत करना पड़ रहा है। जैसा कि उन्होंने कहा है, एक सुनियोजित तरीके से भारत की संस्कृति, भारत के संस्कार, परंपरा, मूल्यों, विशेषकर सांस्कृतिक निष्ठा पर प्रहार किया जा रहा है।

हिन्दू और हिन्दू साम्राज्य को दरकिनार कर आतताई मुग़लों को महान पढ़ा, गौरवमयी हिन्दू राष्ट्र को धूमिल कर, केवल हिन्दू ही नहीं मुसलमानों को भी भ्रमित किया गया। आज कल जिस तरह मोदी सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने का असफल प्रयास हो रहा है, ये भूल रहे हैं, कि ये लोग स्वयं अगले चुनाव में मोदी सरकार की राह में फूल बिछा रहे हैं। 

अब हर हिन्दू कांग्रेस और उसके शीर्ष परिवार से सवाल करे कि आखिर चरित्र में वह इस्लामी कट्टरपंथियों की तरह क्यों दिखती है? चूके तो नतीजे कश्मीर जैसे घातक हो सकते हैं।

अयोध्या : मस्जिद के लिए इकट्ठा हुए सिर्फ 20 लाख रूपए , राम मंदिर को मिली 5400 करोड़ रुपयों की राशि

                              अयोध्या में राम मंदिर और धनीपुर में बनने वाले मस्जिद का डिजाइन
बाबरी मस्जिद को पाक जमीन बनाये जाने को साबित करने वालों ने वकीलों पर पता नहीं कितने करोड़ रूपए पानी में बहा दिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद से नए स्थान पर मस्जिद बनाने के लिए धन जुटाने में समर्थ हैं। राममंदिर के लिए जमा हो रहे धन के दुरूपयोग का दुष्प्रचार करते रहते हैं, लेकिन खुद किस तरह मस्जिद के नाम पर दुनियां को पागल बनाकर अपनी तिजोरियां भरने में मस्त रहे। 
अयोध्या में विवादित भूमि का फैसला राम जन्मभूमि के पक्ष में आने के बाद वहाँ राम मंदिर का निर्माण शुरू हो गया है। लेकिन दूसरी ओर फैसले के समय दूसरे पक्ष को जो 5 एकड़ भूमि मस्जिद के लिए आवंटित की गई थी उस पर निर्माण कार्य शुरू होना तो दूर की बात है, अभी उसके लिए पर्याप्त धन भी एकत्रित नहीं हो सका है।

मस्जिद निर्माण के लिए धन न इकट्ठा हो पाने के कारण मस्जिद के पूर्व पक्षकार इकबाल अंसारी ने इस्लामिक कल्चर फाउंडेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं। इकबाल का कहना है कि IICF एक निजी ट्रस्ट है इसलिए लोग उन पर विश्वास नहीं कर रहे। अभी तक इस काम के लिए IICF सिर्फ 20 लाख रुपए ही जुटा पाई है। 

वह कहते हैं, अयोध्या धर्म की नगरी है, जहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी धर्म के लोग रहते हैं। अब 5 किलोमीटर की अयोध्या में सभी धर्मों के मंदिर-मस्जिद गुरुद्वारा बने हुए हैं और देश-विदेश के लोग अयोध्या आते हैं। आज अयोध्या में मंदिर का निर्माण हो रहा है। पूरी दुनिया में लोग राम का नाम लेते हैं, चाहे वह मुस्लिम हो या हिंदू। लेकिन, सवाल अयोध्या का है, जहाँ मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ की भूमि दी गई। अब इसके ट्रस्ट के लोग रह रहे हैं कि अभी तक 20 लाख रुपए ही आए हैं, जबकि राम मंदिर में करोड़ों रुपए आ चुके हैं। यह सब भगवान राम की देन है। उन्हें मानने वाले पूरी दुनिया में लोग मौजूद हैं।

इकबाल के मुताबिक जफर फारूकी द्वारा बनाया गया ट्रस्ट निजी ट्रस्ट है और उनका मानना है कि ट्रस्ट के लोग यदि सामाजिक होते तो मस्जिद निर्माण के लिए बहुत पैसा आता। लेकिन ये लोग सामाजिक नहीं है। इसलिए वे चाहते हैं कि ट्रस्ट में फेरबदल हो। जब तक मौजूदा ट्रस्टी नहीं बदले जाते वह इसमें हिस्सा नहीं लेंगे।

राम मंदिर को मिल चुके हैं करोड़ों 

अयोध्या मामले पर 9 नवंबर 2019 को हुए फैसले के बाद धनीपुर में मस्जिद के लिए 5 एकड़ भूमि आवंटित की गई थी। इसके बाद वक्फ बोर्ड ने फरवरी 2020 में IICF का गठन किया और सामाजिक सहयोग से मस्जिद निर्माण के लिए ट्रस्ट के नाम बैंक में खाता खुला। वर्तमान में इस पूरी प्रक्रिया को हुए एक साल से ज्यादा हो गया है, लेकिन खाते में सिर्फ़ 20 लाख रुपए आए हैं।

वहीं अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए लोगों ने बढ़ चढ़कर दान किया और 15 जनवरी से शुरू हुई राम मंदिर निधि समर्पण अभियान के तहत 27 फरवरी तक देश के कोने कोने से ट्रस्ट के पास करोड़ो रुपए आए। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने जानकारी देते हुए बताया कि पूरे अभियान में केवल 44 दिन में 2500 करोड़ रुपए से ज्यादा जमा हुए और अगर कुल मिलाकर बात की जाए तो अब तक 5457.94 करोड़ की धनराशि एकत्र हो चुकी है।

रिपोर्टस के मुताबिक, राम मंदिर के लिए कूपनों व रसीद के जरिए 2253.97 करोड़ की निधि एकत्र हुई। इसी तरह से डिजीटल माध्यमों से 2753.97 करोड़ व एसबीआई-पीएनबी व बीओबी के बचत खातों में करीब 450 करोड़ की धनराशि एकत्र हुई है।

काशी, मथुरा की लड़ाई : क्यों एक फैसला, फैसला न होकर बन गया तुष्टिकरण ?

अयोध्या एक झांकी थी, मथुरा और काशी अभी बाकी है 
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मामले का सुप्रीम कोर्ट का फैसला नवम्बर 2019 में ही आ चुका है, जिसके बाद न सिर्फ यहाँ राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ बल्कि अगस्त 2020 में भूमिपूजन भी हुआ। लेकिन क्या आपको याद है कि इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का क्या फैसला था? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरी जमीन को तीन हिस्सों में बाँटने का निर्देश दिया था। रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और बाबरी पक्ष को ज़मीन बाँट दी गई थी।

इस फैसले के बाद हिन्दुओं ने गजब का संयम दिखाया क्योंकि बाबरी विध्वंस के बाद पुलिस-प्रशासन को आशंका थी कि कोई सांप्रदायिक घटना हो सकती है। क़ानूनी रूप से शांतिपूर्ण तरीके से मुद्दे को सुलझाने के लिए रामलला विराजमान ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहाँ उन्हें जीत मिली। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तो काफी बात हो चुकी है, लेकिन हमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी याद करने की ज़रूरत है।

अयोध्या राम मंदिर मामला: क्या था इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का सार ये था कि हिन्दू और मुस्लिम, ये दोनों ही इस विवादित जमीन (तब) के बराबर के हकदार हैं। निर्मोही अखाड़े ने दलील दी थी कि वो अनंत काल से इस स्थल की देखभाल और प्रबंधन का काम करता आ रहा है। मुस्लिम पक्ष को पूरा एक तिहाई हिस्सा दिया गया था। हिन्दू पक्ष की दलील थी कि जहाँ बाबरी मस्जिद का गुम्बद स्थित था (जिसे दिसंबर 1992 में ध्वस्त किया गया), वहीं रामलला का जन्म हुआ था।

हाईकोर्ट ने कहा कि चूँकि सदियों से हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोग इसका प्रयोग करते आ रहे हैं, इसीलिए दोनों का ही इस पर अधिकार है। राम चबूतरा, सीता रसोई, भंडार और बाहर की खुली जगह निर्मोही अखाड़े को मिली। हालाँकि, कोर्ट ने ये भी कहा था कि 1993 के अयोध्या एक्ट के तहत जिस पक्ष को नुकसान हुआ हो, उसकी भरपाई के लिए कुछ एडजस्टमेंट्स किए जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहित की गई भूमि को भी हिन्दुओं और मुसलमानों, दोनों के लिए व्यवस्थित करते हुए प्रवेश और निकासी के लिए अलग-अलग प्रबंध करने के साथ-साथ ये भी कहा था कि दोनों से एक-दूसरे को कोई समस्या नहीं आनी चाहिए। साथ ही पूरी भूमि के आधिकारिक बँटवारे के लिए स्पेशल ड्यूटी ऑफिसर और रजिस्ट्रार के पास जाने को कहा गया था। वहाँ इसकी औपचारिकता पूरी होनी थी।

तीन जजों में से एक जस्टिस एसयू खान ने कहा था कि विवादित ढाँचा मस्जिद था और मस्जिद को बनाने के लिए किसी मंदिर को ध्वस्त नहीं किया गया। उनका कहना था कि मंदिर के अवशेषों का उपयोग मस्जिद बनाने के लिए हुआ। उनका मानना था कि स्वामित्व साबित करने में दोनों समुदाय विफल रहे। उनका कहना था कि 1949 के पहले से मस्जिद के गुम्बद को भगवान श्रीराम का सटीक जन्मस्थान माना जाने लगा।

जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने जस्टिस एसयू खान की इन बातों से सहमति जताई- मस्जिद के गुम्बद को भगवान श्रीराम का जन्मस्थान माना जाता है, विवादित ढाँचे को मुस्लिमों ने हमेशा से मस्जिद ही माना है और इसका कोई सबूत नहीं कि बाबर ने 1528 में इसे बनाया। लेकिन हाँ, उन्होंने जस्टिस एसयू खान की उस बात से सहमति नहीं जताई कि मंदिर को तोड़ कर मस्जिद नहीं बना था। उनका कहना था कि मंदिर को तोड़ा गया था।

वहीं जस्टिस डीवी शर्मा ने माना कि न तो ये विवादित ढाँचा मस्जिद था और न ही इसे बाबर ने बनवाया था। उन्होंने ASI के सर्वे के हवाले से माना कि विवादित ढाँचे के निर्माण के लिए मंदिर को तोड़ा गया था। उन्होंने स्तम्भों पर बने हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरों को देख कर कहा कि ये इस्लामी स्थापत्य का हिस्सा नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि यहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग 1528 से नमाज नहीं पढ़ते थे।

जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने कहा था कि 1996 में सिविल जजों के उस फैसला का भी समर्थन किया था, जिसमें कहा गया था कि ये वक़्फ़ की संपत्ति नहीं है। चूँकि अयोध्या के रामलला नाबालिग हैं, इसीलिए उन्होंने टाइटल डेक्लेरट्री के परिसीमन के लिमिटेशंस उनके लिए लागू न होने की बात कही। उन्होंने रामजन्मभूमि के खुद के अपने-आप में एक देवता होने की बात का भी समर्थन किया था। उन्होंने इस स्थान को ईश्वरीय आत्मा के प्रतीक के रूप में माना।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजमेंट और तीनों जजों के विचारों को देख कर ऐसा लगता है कि उन्हें सब कुछ पता था, लेकिन सभी पक्षों को खुश करने के लिए भूमि को तीनों पक्षों में बाँट दिया गया। जस्टिस शर्मा द्वारा कही गई कई बातें सुप्रीम कोर्ट में उठीं और हिन्दू पक्ष ने इसके माध्यम से दलीलें भी पेश कीं। तो इस तरह से ये फैसला न होकर तुष्टिकरण बन गया। इसके पीछे सांप्रदायिक तनाव का भय था या कुछ और, ये चर्चा का विषय है।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को क़ानूनी रूप से ‘Unsustainable’ बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि अगर ये सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए था, तो भी ये साध्य नहीं था। उसका कहना था कि 1500 स्क्वायर यार्ड्स की भूमि को तीन हिस्सों में बाँटना अंततः शांति बनाए रखने के लिए भी ठीक नहीं था। इसको बाँट देने से किसी भी पक्ष का भला नहीं होगा, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने कहा था।

कैसे अलग था अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अब जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को 10 साल बीत चुके हैं, ये कहा जा सकता है कि इस मामले को उस दौरान इस तरह से ट्रीट किया गया, जैसे ये दो पड़ोसियों के मामूली जमीन विवाद का झगड़ा हो और दोनों ठीक रह सकें, इसीलिए दोनों में जमीन बाँट दी गई। जबकि, सच्चाई ये है कि राम सहस्रों वर्षों से भारत में पूजे जाते रहे हैं और 100 करोड़ हिन्दुओं के देश में उनके ही आराध्य की जमीन का अतिक्रमण कर लिया गया, और उन्हें कहा जाए कि आधा-आधा बाँट लो?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पुराने जमाने के घुमंतुओं द्वारा लिखी गई बातों और गुरु नानक देव की अयोध्या यात्रा सहित कई साक्ष्यों का अध्ययन किया। जहाँ अयोध्या में ही मस्जिद के लिए अलग भूमि उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया, वहीं पूरी विवादित भूमि हिन्दुओं को दी गई। सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद ट्रस्ट का गठन हुआ। राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने का कार्य तो पहले से ही चालू था, अब इसका शिलान्यास भी हो गया।

सबसे बड़ी बात कि इस पर सुप्रीम कोर्ट को घेरने के लिए लिबरलों के पास केवल वही सब मुद्दे थे, जिनके आधार पर वो हर चीज का विरोध करते हैं। समरसता की बातें की गई। मुस्लिम समुदाय के लोगों में से कई ने इसे शरिया के खिलाफ बताया। कइयों ने बाबरी ध्वंस का मुद्दा उठाया। कुछ ने कहा कि जहाँ मस्जिद है, वहाँ आदिकाल तक मस्जिद ही रहती है। वही पुराने राग अलापने वालों ने कोई सटीक तर्क नहीं दिया। यहाँ बहस की एक घटना का जिक्र करना ज़रूरी है:

अधिवक्ता वैद्यनाथन ने ‘स्कन्द पुराण’ का उदाहरण देते बताया कि काफी पहले से सरयू में स्नान कर भगवान श्रीराम जन्मभूमि के दर्शन की परंपरा रही है। जब जस्टिस अशोक भूषण ने पूछा कि ‘स्कन्द पुराण’ कब लिखा गया था तो वैद्यनाथन ने बताया कि ये महाभारत काल में महर्षि वेद व्यास द्वारा लिखा गया। जब फिर सवाल हुआ कि इसमें देवता के दर्शन की बात क्यों नहीं है, तो वकील ने बताया कि पूरी जन्मभूमि ही देवता है।

जस्टिस भूषण ने पूछा कि इस मंदिर को बाबर ने तोड़ा था कि औरंगजेब ने, तो वैद्यनाथन ने बताया कि इस बारे में भ्रम है लेकिन ये सर्वविदित है कि अयोध्या के राजा श्रीराम थे। फ्रेंच ट्रेवलर विलियम फिंच ने अपनी भारत यात्रा (1608-11) में अयोध्या मंदिर का जिक्र किया है। जोसफ ताईफ़ेंटालर की पुस्तक का हवाला दिया गया, जिसमें भगवान श्रीराम के मंदिर के तोड़े जाने और उनमें लोगों की अटूट आस्था होने का जिक्र है।

सार ये कि सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट को ज़मीन का बँटवारा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये जमीन का झगड़ा नहीं था। ये अपनी आस्था के लिए, विदेशी अतिक्रमण से हुए नुकसान को ठीक करने के लिए और इतिहास में हुई गलतियों को ठीक करने के लिए लड़ी गई लड़ाई थी। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट में इस पर व्यापक बहस हुई। कोर्ट को बताया गया कि मथुरा और काशी की तरह ही साकेत भी हिन्दुओं की आस्था का केंद्र था।

काशी-मथुरा की मुक्ति के बिना अधूरा है राम मंदिर

जब आप संस्कृत के प्राचीनकाल में सबसे लोकप्रिय व्याकरणविद पाणिनि को पढ़ेंगे तो पाएँगे कि उनके समय में मथुरा का वैभव ऐसा था, जैसा 16वीं शताब्दी की शुरुआत में विजयनगर और रोम का रहा होगा। मथुरा का फैलाव काफी बड़ा था, वहाँ ब्राह्मणों की बड़ी-बड़ी बस्तियाँ थीं और व्यापार का वो उस समय का सबसे बड़ा केंद्र था। ‘अष्टाध्यायी’ में मथुरा की भव्य परंपरा का विस्तृत वर्णन किया गया है।

ठीक इसी तरह काशी के वैभव का जिक्र सभी शैव ग्रंथों में है। मथुरा और काशी के बारे में एक और अच्छी बात ये है कि इसके प्रमाण लगभग कई सारे हिन्दू धर्म-ग्रंथों में हैं और अयोध्या से कहीं ज्यादा इसके साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं। महाभारत में मथुरा का वर्णन है। मोक्षदायिनी काशी का वर्णन कई पुराणों में है। ऐसे में अब जब इन दोनों स्थलों की मुक्ति के प्रयासों का आगाज हो चुका है, इस राह में एक बहुत बड़ी बाधा भी है।

वो बाधा है – ‘‘उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 {Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991}, जिसके तहत किसी भी धार्मिक स्थल में परिवर्तन नहीं किया जा सकता, वो वैसा ही रहेगा, जैसा वो आज़ादी के समय था। वहाँ यथास्थिति बनी रहेगी। लेकिन, ये पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के अंतर्गत आने वाले स्थलों पर लागू नहीं होता। अयोध्या को इससे छूट दी गई थी, इसीलिए उसका केस लड़ा जा सका।

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने दिसंबर 2019 में इसमें संशोधन करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखते हुए कहा था कि ये उनके पूजा करने के मूल अधिकारों का उल्लंघन है और आपत्तिजनक है। उनका कहना था कि ‘फंडामेंटल राइट्स’ में संसद कोई बदलाव नहीं कर सकता है। उनका कहना था कि अनुच्छेद 25-26 ‘फ्रीडम ऑफ वरशिप’ प्रदान करता है, इसीलिए कोई इसे रद्द नहीं कर सकता है।

जहाँ काशी के शिवलिंग को स्वयंभू माना गया है और कहा गया है कि वो स्वयं प्रकट हुए हैं, वहाँ के ज्ञानवापी मस्जिद को देख कर ही पता चलता है कि उसका निचला हिस्सा मंदिर का है, जिसे तोड़ कर मस्जिद बनाया गया। दूसरी तरफ मथुरा के लिए अखाड़ा परिषद पक्षकार बनने के लिए विचार कर रहा है। वहाँ औरंगजेब ने मंदिर तोड़ कर शाही ईदगाह मस्जिद बनवाई थी। इसके लिए सिविल सूट भी दायर हो चुका है।

हम इसके लिए प्रार्थना कर सकते हैं कि राम मंदिर में जितने हिन्दुओं ने अपना खून बहाया, वैसा काशी-मथुरा के लिए न हो क्योंकि अब तक जिन्होंने बलिदान दिया है, उन्होंने सिर्फ अयोध्या के लिए ही नहीं दिया था। कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह हों या राम मंदिर के लिए अपनी सरकार कुर्बान कर देने वाले कल्याण सिंह – इतिहास में कुछ भी छिपा नहीं है। बाबरी ध्वंस के दौरान अपना खून बहाने वाले अशोक सिंघल से लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ने वाले 92 वर्षीय के पराशरण, इन वरिष्ठों का योगदान जाया न गया था और न जाएगा।

राम मंदिर के लिए संघर्ष करने वालों की गाथाओं से हम आपको समय-समय पर परिचित कराते रहे हैं, जिनमें किशोर कुणाल और केके मुहम्मद जैसे बुद्धिजीवियों से लेकर कोठरी भाइयों के बलिदान तक शामिल हैं। ये भगीरथ प्रयास, बलिदान और संघर्ष अयोध्या-काशी-मथुरा, इन तीनों के लिए था। इसीलिए, अयोध्या की लड़ाई तब तक अधूरी है, जब तक काशी और मथुरा का अतिक्रमण ख़त्म नहीं हो जाता।

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फ़िलहाल मथुरा को लेकर सक्रियता दिख रही है। तभी एक तरफ इकबाल अंसारी कह रहा है कि मंदिर-मस्जिद की बात करने वाले देश की तरक्की रोक रहे, तो असदुद्दीन ओवैसी 1991 के क़ानून और मथुरा में 50 के दशक में हुए समझौते का हवाला दे रहा। कांग्रेस नेता महेश पाठक खुद को पुरोहितों का प्रतिनिधि बता कर श्रीकृष्ण जन्मभूमि याचिका की निंदा कर रहे। जो भी हो, फ़िलहाल तो – ‘काशी-मथुरा बाकी है।