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गोरी, कुतुबुद्दीन, रजिया, लोदी, तुगलक, खिलजी… काशी को सबने लूटा-तोड़े मंदिर: हिंदू करते रहे पुनर्निर्माण

                                                                 ज्ञानवापी परिसर
ज्ञानवापी परिसर का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से सर्वेक्षण कराने को लेकर दायर याचिका पर वाराणसी कोर्ट 22 मई 2023 को सुनवाई करेगी। इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एएसआई को परिसर में मिले शिवलिंग की कार्बन डेटिंग के निर्देश दिए थे। इस्लामी आक्रांताओं ने ज्ञानवापी ही नहीं बल्कि काशी के कई हिस्सों में मंदिरों को तोड़कर उस पर मस्जिद बनवाई थी।

मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले नेता, उनकी पार्टियों और भारत के गौरवशाली इतिहास को धूमिल कर आतताई मुगलों के बलात्कारी एवं खुनी इतिहास पर चादर डाल महान बताने वालों ने शायद सोंचा भी नहीं होगा कि कभी ये चादर भी हटेगी और जनता अपने गौरवशाली इतिहास को जानेगी।  कोशिश तो कई वर्षों से हो रही है, लेकिन तुष्टिकरण करने वाले छद्दम सेक्युलरिस्ट्स कुर्सी पर विराजमान होने के कारण सच्चाई बताने वालों को सांप्रदायिक बताकर बदनाम किया जाता रहा। और जनता भी गुमराह होती रही। 

मुहम्मद गोरी ने 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में एक के बाद एक लूट और विध्वंस की घटनाओं को अंजाम दिया। सन् 1193 में कन्नौज के राजा जयचंद और कुतुबुद्दीन ऐबक के बीच यमुना नदी के किनारे चंदावर (अभी फिरोजाबाद) में एक भीषण युद्ध हुआ, जिसमें जयचंद की मृत्यु हो गई। पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के बीच हुए युद्ध में इस्लामी सेना की जबरदस्त हार हुई थी, लेकिन अगले एक वर्ष में ही वो दोबारा लौटा और पृथ्वीराज चौहान की हार के साथ ही दिल्ली में इस्लामी सत्ता की स्थापना हो गई।

जयचंद के खिलाफ युद्ध में खुद मुहम्मद गोरी और कुतुबुद्दीन ऐबक अपनी-अपनी फ़ौज के साथ था। जयचंद का कटा हुआ सिर इन दोनों इस्लामी शासकों के सामने लाया गया। इसके बाद, मुहम्मद गोरी वाराणसी की तरफ बढ़ा। पृथ्वीराज चौहान और जयचंद जैसे हिन्दू राजाओं की मृत्यु के बाद वाराणसी को बचाने वाला शायद ही कोई था। वाराणसी में लूटपाट का भयंकर मंजर देखने को मिला। मंदिर के मंदिर तोड़ डाले गए। वाराणसी न सिर्फ एक धार्मिक नगरी थी, बल्कि व्यापार और वित्त का भी बड़ा केंद्र था। ऐसे में मुहम्मद गोरी ने मनमाने ढंग से लूटपाट मचाई। कहते हैं, यहाँ से लूटे हुए माल को ले जाने के लिए उसे 1400 ऊँटों की ज़रूरत पड़ी थी।
काशी विश्वनाथ मंदिर को भी इसी दौरान ध्वस्त किया गया। इसके बाद स्थानीय लोगों ने काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी उठाई। कन्नौज के राजा जयचंद्र के पुत्र हरीशचंद्र और आम लोगों ने जब मंदिर का निर्माण पुनः शुरू कर दिया, तब कुतुबुद्दीन ऐबक ने 4 वर्षों बाद फिर से अपनी फ़ौज के साथ हमला किया और भारी तबाही मचाई। कुतुबुद्दीन ऐबक ने विश्वेश्वर, अविमुक्तेश्वर, कृतिवासेश्वर, काल भैरव, आदि महादेव, सिद्धेश्वर, बाणेश्वर, कपालेश्वर और बालीश्वर समेत सैकड़ों शिवालयों को तबाह कर दिया। इस तबाही के कारण अगले पाँच-छः दशकों तक ये मंदिर इसी अवस्था में रहे।
तुर्कों का शासन था और दिल्ली में उनकी स्थिति और मजबूत ही होती जा रही थी। ऐसे में कुछेक साधु-संतों के अलावा धर्म की मशाल को ज़िंदा रखने वाले लोग कम ही बचे थे। काशी वही है, जिसके बारे में 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेन सांग ने वर्णन किया है कि उसने यहाँ सैकड़ों शिव मंदिर देखे और हजारों साधु-श्रद्धालु भी अपने शरीर पर भस्म मल कर घूमते हुए उसे दिखे। उसने एक 30 मीटर ऊँची शिव प्रतिमा का भी जिक्र किया है।
हालाँकि, 13वीं शताब्दी के मध्य में ही मुहम्मद गोरी की मौत हो गई और कुतुबुद्दीन ऐबक भी इस दशक के अंत तक मर गया। लेकिन, दिल्ली सल्तनत का काशी पर कब्ज़ा जारी रहा। इसके बाद इल्तुतमिश और फिर उसकी बेटी रजिया सुल्तान का शासन हुआ। जिस रजिया सुल्तान को ‘बहादुर महिला’ बता कर वर्षों तक पढ़ाया जाता रहा उसने भी काशी में मंदिरों को ध्वस्त कर विश्वनाथ मंदिर परिसर में ही एक मस्जिद बनवाई थी। ज्ञानवापी विवादित ढाँचे से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘रजिया मस्जिद’ की जगह भी कभी मंदिर ही हुआ करता था।
इसके बाद सन् 1448 में मुहम्मद शाह तुगलक ने आसपास के छोटे-बड़े मंदिरों को भी ध्वस्त कर दिया और रजिया मस्जिद को और बड़ा बना दिया। काशी के प्राचीन इतिहास को पढ़ें तो पता चलता है कि यहाँ कई पुष्कर थे, जिन्हें व्यवस्थित ढंग से तबाह कर इस्लामी शासकों ने मस्जिद बनवाए। हालाँकि, उससे पहले 13वीं सदी में हिन्दुओं ने फिर से मंदिर को बना कर खड़ा कर दिया था। इसे हिन्दुओं की जिजीविषा कहें या फिर श्रद्धा, इतने अत्याचार और खून-खराबे के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। इस्लामवादी लगातार मंदिरों को तोड़ते रहे और हिंदू पुनर्निर्माण में लगे रहे।
इन्हीं मंदिरों में से एक था पद्मेश्वर मंदिर, जिसे काशी विश्वनाथ मंदिर के सामने ही बनवाया गया था। हालाँकि, 1296 ईस्वी में बने पद्मेश्वर मंदिर को भी 15वीं शताब्दी के मध्य में तोड़ डाला गया। पद्म नाम के एक साधु ने इसका निर्माण करवाया था। आप जानते हैं कि ये मंदिर अब कहाँ है? इसके ऊपर ही लाल दरवाजा मस्जिद बनवा दिया गया, जिसे आज भी शर्की सुल्तानों का भव्य आर्किटेक्चर बता कर प्रचारित किया जाता है। फिरोजशाह तुगलक से लेकर सिकंदर लोदी तक, कई इस्लामी सुल्तानों ने काशी में मंदिरों को बारम्बार ध्वस्त किया। सन् 1494 में सिकंदर लोदी ने काशी में कई ऐसे मंदिर तोड़े, जिनका पुनर्निर्माण हिंदुओं ने अपने खून-पसीने से किया था।
सन् 1514-1594 के कालखंड में ही जगद्गुरु नारायण भट्ट हुए, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘त्रिस्थली’ में काशी के विश्वनाथ मंदिर के बारे में लिखा है। इसमें उन्होंने कहा है कि अगर म्लेच्छों ने शिवलिंग को हटा दिया है तो वो खाली जगह ही हमारे लिए पवित्र है और उसकी पूजा की जानी चाहिए, अथवा कोई और शिवलिंग स्थापित किया जाना चाहिए। उनके शुरुआती जीवनकाल में मंदिर नहीं बना था, इससे ये पता चलता है। तुगलक और लोदी के विध्वंस से वाराणसी नहीं उबरी थी।
वो नारायण भट्ट ही थे, जिनकी प्रेरणा से राजा टोडरमल ने काशी में पुनः भव्य विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। आज जिस ज्ञानवापी विवादित ढाँचे को आप देख रहे हैं, उसे औरंगजेब ने इसी मंदिर को तोड़ कर इसके ऊपर बनवाया था। काशी की मुक्ति के प्रयास लगातार चलते रहे और यहाँ पूजा-पाठ भी नहीं रोका गया। बार-बार आक्रमण के बावजूद काशी में पुनर्निर्माण चलता रहा। अब यदि अयोध्या के बाबरी ढाँचे की ही तरह पूरे ज्ञानवापी परिसर का सर्वे हो जाए तो हिंदुओं को एक और बार मंदिर के पुनर्निर्माण का सौभाग्य प्राप्त होगा।

1000 साल बाद वही काशी, 352 साल बाद वह ज्ञानवापी कूप जिसमें शिवलिंग लेकर कूद गए थे पुजारी; 27 मंदिरों की मणिमाला भी

माँ गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित, वाराणसी दुनिया का सबसे पुराना जीवंत शहर और भारत की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक राजधानी है। वहीं महादेव की नगरी काशी की पूरी भव्यता काशी विश्वनाथ मंदिर में है, जिसमें शिव, विश्वेश्वर या विश्वनाथ का ज्योतिर्लिंग है। जो अब काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के रूप में विशाल आकार लेकर 1000 साल पुराने अपने उसी अखंड स्वरुप में है जो 11वीं सदी तक हुआ करती थी। यूँ तो काशी नित्य निरंतर रंग-उमंग से भरी रहती है, वही काशी जहाँ सप्त वार में नौ त्योहार मनाने की परंपरा रही है; आज वो काशी एक नव त्योहार के रंग में रंगी है और हो भी क्यों नहीं काशी पुराधिपती बाबा विश्वनाथ के भव्य दरबार के लोकार्पण की जो तैयारी है।

विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग का भारत के आध्यात्मिक इतिहास में बहुत ही अनूठा महत्व है। परंपरा यह है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में बिखरे हुए अन्य ज्योतिर्लिंगों के दर्शन से अर्जित गुण काशी विश्वनाथ मंदिर में एकल यात्रा द्वारा शिव भक्तों को प्राप्त होते हैं। ऐसे में अद्भुत, अद्वितीय, अलौकिक और भव्य श्री काशी विश्वनाथ धाम आज 13 दिसंबर, 2021 को अगहन मास की दशमी तिथि को रवियोग में पीएम नरेंद्र मोदी जनता को समर्पित करेंगे। पीएम मोदी आज जब काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन करेंगे तो उस समय 12 ज्योतिर्लिंगों और 51 सिद्धपीठों के पुजारी भी उपस्थित रहेंगे। इसके साथ ही ‘न भूतो न भविष्यति’ की तर्ज पर काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण समारोह को भव्य रूप देने के लिए सनातन धर्म के सभी संप्रदायों की आज प्रांगण में उपस्थिति होगी।

आज गौरव का दिन है। जिसका स्वागत होना चाहिए। वर्षो से यहाँ आते साधु-संतों, सन्यासियों, साधकों के साथ ही काशी और काशीवासियों के हृदय की आवाज को और उनके मन में दबे उस प्रतिकार को बिना विध्वंश के अपनी सृजनात्मक क्षमता द्वारा बदल देने का जो कार्य काशी के सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है। उसे मैं महीनों से यहाँ आने-जाने वाले सभी शिव भक्तों की आँखों में पढ़ रहा हूँ। सभी दिव्य और भव्य काशी के इस बदलते स्वरुप को देखकर गदगद हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो प्रधानमंत्री ने अंजुमन इंतजामिया जामा मस्जिद (ज्ञानवापी मस्जिद) के रूप में बाबा विश्वनाथ परिसर में खींची गई छोटी लकीर को एक कॉरिडोर के रूप में एक बड़ी लकीर खींच कर बेहद छोटा कर दिया है। ज्ञानवापी अर्थात ज्ञान का कुआँ की जो प्राचीन अवधारणा है उस आधारभूत संरचना को धरातल पर लाने का जो संकल्प प्रधानमंत्री ने लिया था वो अब आम जनमानस के सामने दृष्टिगोचर हो रहा है।

                                                        काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर

आनंद कानन की जो परिकल्पना रही है वो अब एक बार फिर काशी में आकर ले चुकी है जहाँ एक ओर माँ गंगा की अविरल धारा है तो दूसरी ओर स्वर्ग से उतरी पतित-पावनी गंगा को अपनी जटा में स्थान देने वाले काशी पुराधिपती बाबा विश्वनाथ अब एक सीध में बिना किसी अड़चन के एकाकार हो चुके है। अट्ठारवीं सदी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर के द्वारा जिस यज्ञ का अनुष्ठान किया गया था, अलौकिक काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के रूप में प्रधामंत्री मोदी ने 352 साल बाद उसे सिद्धि प्रदान की है।

बाबा विश्वनाथ जो काशी के सर्वमान्य राजा है और राजराजेश्वर के रूप में यहाँ विराजमान है। उनके मंदिर परिसर की जो स्वर्णमयी आभा होनी चाहिए उसे मूर्तरूप देने का काम प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता और सनातन धर्म और हिन्दुओं के प्रति अहोभाव को दर्शाता है। जिनके द्वारा कोरोना जैसी महामारी के बीच भी मात्र 33 माह में एक असंभव सा दिखने वाला कार्य संभव हुआ है। आज मंदिर परिसर में पहुँचने वाला हर शिव भक्त हर काशीवाशी अभिभूत है। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा की बाबा विश्वनाथ दरबार का जो स्वरूप उन्होंने जीवनपर्यंत देखा वो इस अद्भुत स्वरूप में कैसे परिलक्षित हुआ। मंदिर के मुख्य अर्चक महंत श्रीकांत मिश्र भी इस बात को स्वीकार करते हुए कहते हैं, “आज मंदिर का जो दिव्य और भव्य परिसर सबके सामने है वो बाबा काशी विश्वनाथ की इच्छा और प्रधानमंत्री मोदी के सार्थक और दृढ़ इच्छशक्ति के कारण ही संभव हुआ हैं।”

इससे पहले कि आगे इतिहास की बात करूँ आपकी जानकारी के लिए बता देता हूँ कि काशी विश्वनाथ धाम में 27 मंदिरों की एक खास मणिमाला भी तैयार की गई है। यह वे मंदिर हैं, जिनमें कुछ मंदिर तो काशी विश्वनाथ के साथ ही स्थापित किए गए थे और बाकी समय-समय पर काशीपुराधिपति के विग्रहों के रूप में यहाँ बसाए गए थे। जलासेन घाट से गंगा स्नान के बाद जल लेकर चलने वाले शिव भक्त इस मणिमाला को साक्षी मानकर ही गर्भगृह तक जाएँगे और यहाँ से दर्शन के बाद इन विग्रहों की परिक्रमा का जो प्राचीन विधान था वह पुनः स्थापित हुआ है। परियोजना के दूसरे चरण में 97 विग्रह व प्रतिमाओं की स्थापना और तीसरे चरण में 145 शिवलिंगों को भी स्थापित किया जाएगा।

पिछले एक महीने में कई बार इस मंदिर परिसर में गया और तब भी गया था जब इस परियोजना के लिए ड्रोन सर्वे के बाद 300 से ज़्यादा भवन खरीदे गए और उनके अंदर कैद किए गए काशी खंड के अनेक मंदिरों को मुक्त कराया गया। एक हजार साल से काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वंस का जो दंश भोग रहा था, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर ने उससे मुक्ति दिलाई है। आज जो कॉरिडोर हमारे सामने है ग्यारहवीं शताब्दी तक इस मंदिर परिसर की शक्ल कमोबेश ऐसी ही थी, जैसी आज आकार दी गई है।

काशी विश्वनाथ सिर्फ़ एक मंदिर नहीं बल्कि मंदिरों का संकुल था। मंदिर परिसर के चारों तरफ़ कॉरिडोर की शक्ल में कई कक्ष थे, जहाँ संस्कृत, ज्योतिष, तंत्र और आध्यात्म की शिक्षा दी जाती थी। गुरुकुल परंपरा के तहत विद्यार्थी यहीं अपने गुरु के सानिध्य में बैठकर वेद, पुराण, धर्म और दर्शन का ज्ञान अर्जित करते थे। कहा जाता है कि 1669 में औरंगजेब ने जब इस मंदिर संकुल को तोड़ने का आदेश दिया था तो उसकी एक वजह यह भी थी कि उसका सनातन धर्म के प्रति आकर्षित होता भाई दारा शिकोह यहाँ संस्कृत पढ़ता था।

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा इसका जिक्र करते हुए बताते है, “दारा शिकोह ने औरंगजेब और इस्लाम से बग़ावत की थी। इसलिए औरंगजेब ने 18 अप्रैल 1669 को मंदिर तोड़ने का फ़रमान जारी किया। फ़ारसी में लिखे इस फ़रमान में दर्ज था कि “वहाँ मूर्ख पंडित, रद्दी किताबों से दुष्ट विद्या पढ़ाते हैं।”

सोचिए हिन्दू धर्म और शास्त्रों के प्रति कैसी घृणा थी उन मुग़लों में जिन्होंने भारत की मूल संस्कृति, यहाँ की आध्यात्मिकता को मिटाने का दुस्साहस किया और हम सैकड़ों सालों से, यहाँ तक कि आजाद होने के बाद भी वर्षों तक उस विध्वंश का दंश झेलते रहे।

काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के बनने-उजड़ने का सिलसिला

कहा जाता है कि बाबा विश्वनाथ का यह मंदिर काशी में भगवान शिव और माता पार्वती का आदि स्थान भी है। 11वीं सदी तक यह अपने मूल रूप में बना रहा, सबसे पहले इस मंदिर के टूटने का उल्लेख 1034 में मिलता है। इसके बाद 1194 में मोहम्मद गोरी ने इसे लूटने के बाद तोड़ा। काशी वासियों ने इसे उस समय अपने हिसाब से बनाया लेकिन वर्ष 1447 में एक बार फिर इसे जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने तुड़वा दिया। फिर वर्ष 1585 में राजा टोडरमल की सहायता से पंडित नारायण भट्ट ने इसे बनवाया था लेकिन वर्ष 1632 में शाहजहाँ ने एक बार फिर काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाने के लिए मुग़ल सेना की एक टुकड़ी भेज दी। लेकिन हिन्दुओं के प्रतिरोध के कारण मुग़लों की सेना अपने मकसद में कामयाब न हो पाई। हालाँकि, इस संघर्ष में काशी के 63 मंदिर नष्ट हो गए।
इसके बाद सबसे बड़ा विध्वंश आततायी औरंगजेब ने करवाया जो काशी के माथे पर सबसे बड़े कलंक के रूप में आज भी विद्यमान है। साक़ी मुस्तइद खाँ की किताब ‘मासिर -ए-आलमगीरी’ के मुताबिक़ 16 जिलकदा हिजरी- 1079 यानी 18 अप्रैल 1669 को एक फ़रमान जारी कर औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने का आदेश दिया। साथ ही यहाँ के ब्राह्मणों-पुरोहितों, विद्वानों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया था।
मंदिर से औरंगजेब के ग़ुस्से की एक वजह यह थी यह परिसर संस्कृत शिक्षा बड़ा केन्द्र था और दाराशिकोह यहाँ संस्कृत पढ़ता था। और इस बार मंदिर की महज एक दीवार को छोड़कर जो आज भी मौजूद है और साफ दिखाई देती है, समूचा मंदिर संकुल ध्वस्त कर दिया गया। 15 रब- उल-आख़िर यानी 2 सितम्बर 1669 को बादशाह को खबर दी गई कि मंदिर न सिर्फ़ गिरा दिया है, बल्कि उसकी जगह मस्जिद की तामीर करा दी गई है। मंदिर के खंडहरों पर ही बना वह मस्जिद बाहर से ही स्पष्ट दीखता है जिसके लिए न किसी पुरातात्विक सर्वे की जरुरत है न किसी खुदाई की।
एक और घटना जो उस समय घटी वह यह है कि स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को कोई क्षति न हो इसके लिए मंदिर के महंत शिवलिंग को लेकर ज्ञानवापी कुंड में ही कूद गए थे। हमले के दौरान मुगल सेना ने मंदिर के बाहर स्थापित विशाल नंदी की प्रतिमा को भी तोड़ने का प्रयास किया था लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी वे नंदी की प्रतिमा को नहीं तोड़ सके। जो आज भी अपने महादेव के इंतजार में मंदिर के उसी पुराने परिसर जो अब ज्ञानवापी मस्जिद है, की तरफ एक टक देख रहे हैं।
हालाँकि, तब से आज तक विश्वनाथ मंदिर परिसर से दूर रहे ज्ञानवापी कूप और विशाल नंदी को एक बार फिर विश्वनाथ मंदिर परिसर में शामिल कर लिया गया है। और यह संभव हुआ है विश्वनाथ धाम के निर्माण के बाद। इस प्रकार 352 साल पहले अलग हुआ यह ज्ञानवापी कूप एक बार फिर विश्वनाथ धाम परिसर में आ गया है। लेकिन नंदी महराज की दिशा और दृष्टि से कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है। जो कहीं न कहीं बाबा विश्वनाथ की मुक्ति का आवाहन तब तक करते रहेंगे जब तक वो अपने महादेव को देख नहीं लेते।
एक बार फिर वापस लौटते हैं इतिहास के पन्नों में, औरंगजेब के आदेश पर उस समय मंदिर संकुल को तुड़वा कर बाबा विश्वनाथ मंदिर के ही ऊपर एक मस्जिद बना दी गई। जिसे बाद में औरंगजेब द्वारा दिया गया नाम था अंजुमन इंतजामिया जामा मस्जिद, जिसे बाद में ज्ञानवापी के नाम पर ज्ञानवापी मस्जिद कहा गया। ज्ञानवापी यानी ज्ञान का कुँआ। उसके बाद कई चरणों में काशीवासियों, होल्कर और सिन्धिया सरदारों की मदद से मंदिर परिसर का स्वरुप बनता-बिगड़ता रहा। लेकिन उसकी वह अलौकिक भव्यता नहीं लौटी जो काशी में कभी हुआ करती थी।
औरंगजेब के जाने बाद मंदिर के पुनर्निर्माण का संघर्ष जारी रहा। 1752 से लेकर 1780 तक मराठा सरदार दत्ता जी सिन्धिया और मल्हार राव होल्कर ने मंदिर की मुक्ति के प्रयास किए। पर 1777 और 80 के बीच इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर को सफलता मिली। महारानी अहिल्याबाई ने मंदिर तो बनवा दिया पर वह उसका वह पुराना वैभव और गौरव नहीं लौटा पाई। 1836 में महाराजा रणजीत सिंह ने इसके शिखर को स्वर्ण मंडित कराया। वहीं तभी से संकुल के दूसरे मंदिरों पर पुजारियों-पुरोहितों का क़ब्ज़ा हो गया और धीरे-धीरे मंदिर परिसर एक ऐसी गलियों की बस्ती में बदल गया जिसके घरों में प्राचीन मंदिर तक क़ैद हो गए।
आने वाले समय में काशी मंदिर पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया, जिस कारण मंदिर का निर्माण रोक दिया गया। फिर साल 1809 में काशी के हिन्दुओं द्वारा मंदिर तोड़कर बनाई गई ज्ञानवापी मस्जिद पर कब्जा कर लिया गया। इस प्रकार काशी मंदिर के निर्माण और विध्वंस की घटनाएँ 11वीं सदी से लेकर 15वीं सदी तक चलती रही। हालाँकि, 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने ‘वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल’ को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने के लिए कहा था, लेकिन यह कभी संभव ही नहीं हो पाया। तब से ही जारी यह विवाद आज तक चल रहा है।
28 जनवरी, 1983 को मंदिर को सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इसका प्रबंधन तब से डॉ विभूति नारायण सिंह को एक ट्रस्ट के रूप में सौंपा गया है। इसमें पूर्व काशी नरेश, अध्यक्ष के रूप में और मंडल के आयुक्त के चेयरमैन के साथ एक कार्यकारी समिति बनाई गई। अभी एक न्यास परिषद भी है जो मंदिर के पूजा सम्बन्धी प्रावधानों को भी देखता है।
एक और बात वर्तमान आकार में मुख्य मंदिर 1780 में इंदौर की स्वर्गीय महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा बनाया गया था। 1785 में गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के कहने पर तत्कालीन कलेक्टर मोहम्मद इब्राहीम खान द्वारा मंदिर के सामने एक नौबतखाना बनाया गया था। 1839 में, मंदिर के दो गुंबदों को पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह द्वारा दान किए गए सोने से कवर किया गया। तीसरा गुंबद अभी भी वैसे ही बिना स्वर्ण जड़ित है। जिस पर योगी सरकार ने ध्यान देते हुए संस्कृति धार्मिक मामले मंत्रालय के जरिए मंदिर के तीसरे शिखर को भी स्वर्णमंडित करने में गहरी दिलचस्पी ले रहा है।
कहते हैं इतिहास के अपने प्रस्थान बिन्दु होते है। काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के रूप में आज का यह स्वरूप निर्माण का तीसरा प्रस्थान बिन्दु है। जब भी इतिहास में काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के पुनर्निर्माण का ज़िक्र किया जाएगा, मंदिर का पुनरुद्धार करने वाली महारानी अहिल्या बाई होल्कर, इसके शिखर को स्वर्ण मंडित करने वाले महाराजा रणजीत सिंह और मंदिर को उसकी ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आभा लौटाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम सामने होगा।

107 वर्ष बाद काशी विश्वनाथ धाम में माँ अन्नपूर्णा की प्राण-प्रतिष्ठा, CM योगी ने उठाई पालकी

वाराणसी से 107 साल पहले चोरी हुई माँ अन्नपूर्णा की दुर्लभ प्रतिमा श्री काशी विश्वनाथ धाम पहुँची जहाँ विधि-विधान से माँ प्राचीन प्रतिमा की पुनर्स्थापना सोमवार (15 नवंबर, 2021) को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में मुख्य मंदिर के ईशान कोण पर कर दी गई है। CM योगी आदित्यनाथ ने वैदिक मंत्रोच्चार, माँ अन्नपूर्णा के जयकारे और हर-हर महादेव के उद्घोष के बीच मंदिर के मुख्य द्वार पर प्रतिमा यात्रा की अगवानी की। भव्य रूप से सजाए गए मंदिर परिसर में सीएम योगी की उपस्थिति में काशी विश्वनाथ मंदिर का अर्चक दल द्वारा काशी विद्वत परिषद की निगरानी में प्राण प्रतिष्ठा की संपूर्ण प्रक्रिया को पूर्ण कराया गया।

बाबा विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी के अनुसार, बाबा काशी विश्वनाथ की रंगभरी एकादशी की रजत पालकी और सिंहासन को माँ अन्नपूर्णा के स्वागत के लिए भेजा गया। माँ की प्रतिमा ज्ञानवापी के प्रवेश द्वार से इसी पालकी में सिंहासन पर विराजमान होकर काशी विश्वनाथ धाम में प्रवेश कीं। जहाँ मुख्यमंत्री योगी सहित तमाम गणमान्य लोगों ने पालकी को कन्धा देकर स्थापना स्थल तक ले गए। मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के बाद CM योगी आदित्यनाथ ने बाबा काशी विश्वनाथ के दरबार में जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक कर बाबा से विश्व के कल्याण के लिए आशीर्वाद माँगा।

माँ अन्नपूर्णा की शोभायात्रा उत्तर प्रदेश के 18 जिलों से होती हुई आज सुबह ही काशी पहुँची थी।

माँ अन्नपूर्णा की इस प्रतिमा के एक हाथ में खीर का कटोरा तो दूसरे हाथ में चम्‍मच है। माँ अन्नपूर्णा के इस स्वरूप पीछे काशी में मान्यता है कि यहाँ कभी कोई भूखा नहीं रहता। माँ स्वयं अपने हाथों के चम्मच से खीर का प्रसाद भक्तों के बीच बाँटकर उन्हें धन-धान्‍य से परिपूर्ण होने का आशीर्वाद दे रही हैं।

वाराणसी में काशी विश्वनाथ परिसर से ही 1913 के आसपास माँ अन्नपूर्णा की मूर्ति चोरी हुई थी। चोरी होने के बाद मूर्ति तस्करों द्वारा गुपचुप तरीके से यह मूर्ति कनाडा ले जाई गई और फिर मैकेंजी आर्ट गैलरी में सैलून तक रखी रही। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिमा का अध्ययन करने के बाद दिव्या मेहरा ने भारतीय दूतावास को इस प्राचीन मूर्ति बारे में सूचित किया। मूर्ति का इतिहास सामने आने के बाद PM मोदी के आग्रह पर कनाडा सरकार ने इसे भारत सरकार को शिष्‍टाचार भेंट के तौर पर लौटाने की पेशकश की। जिसके बाद ही यह मूर्ति एक लम्बी दूरी तय करके आज अपने मूल स्थान काशी पहुँची है। जहाँ आज विधिवत पुनः स्थापना की गई है।

चुनार के बलुआ पत्‍थर से बनी माँ अन्नपूर्णा की यह प्राचीन प्रतिमा कई मायनों में खास है। औरंगजेब द्वारा काशी के कई मंदिरों और मूर्तियों को नुकसान पहुँचाने और नष्ट करने के बाद जब पुनः काशी में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा हुई यह मूर्ति भी तब की है। वाराणसी में आज भी इसी काल की कई मूर्तियाँ हैं, जो काशी के प्रस्‍तर कला की पहचान हैं। वैसे मूर्ति विशेषज्ञों ने माँ अन्नपूर्णा की इस प्रतिमा को 18वीं सदी का बताया है।

काशी, मथुरा की लड़ाई : क्यों एक फैसला, फैसला न होकर बन गया तुष्टिकरण ?

अयोध्या एक झांकी थी, मथुरा और काशी अभी बाकी है 
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मामले का सुप्रीम कोर्ट का फैसला नवम्बर 2019 में ही आ चुका है, जिसके बाद न सिर्फ यहाँ राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ बल्कि अगस्त 2020 में भूमिपूजन भी हुआ। लेकिन क्या आपको याद है कि इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का क्या फैसला था? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरी जमीन को तीन हिस्सों में बाँटने का निर्देश दिया था। रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और बाबरी पक्ष को ज़मीन बाँट दी गई थी।

इस फैसले के बाद हिन्दुओं ने गजब का संयम दिखाया क्योंकि बाबरी विध्वंस के बाद पुलिस-प्रशासन को आशंका थी कि कोई सांप्रदायिक घटना हो सकती है। क़ानूनी रूप से शांतिपूर्ण तरीके से मुद्दे को सुलझाने के लिए रामलला विराजमान ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहाँ उन्हें जीत मिली। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तो काफी बात हो चुकी है, लेकिन हमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी याद करने की ज़रूरत है।

अयोध्या राम मंदिर मामला: क्या था इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का सार ये था कि हिन्दू और मुस्लिम, ये दोनों ही इस विवादित जमीन (तब) के बराबर के हकदार हैं। निर्मोही अखाड़े ने दलील दी थी कि वो अनंत काल से इस स्थल की देखभाल और प्रबंधन का काम करता आ रहा है। मुस्लिम पक्ष को पूरा एक तिहाई हिस्सा दिया गया था। हिन्दू पक्ष की दलील थी कि जहाँ बाबरी मस्जिद का गुम्बद स्थित था (जिसे दिसंबर 1992 में ध्वस्त किया गया), वहीं रामलला का जन्म हुआ था।

हाईकोर्ट ने कहा कि चूँकि सदियों से हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोग इसका प्रयोग करते आ रहे हैं, इसीलिए दोनों का ही इस पर अधिकार है। राम चबूतरा, सीता रसोई, भंडार और बाहर की खुली जगह निर्मोही अखाड़े को मिली। हालाँकि, कोर्ट ने ये भी कहा था कि 1993 के अयोध्या एक्ट के तहत जिस पक्ष को नुकसान हुआ हो, उसकी भरपाई के लिए कुछ एडजस्टमेंट्स किए जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहित की गई भूमि को भी हिन्दुओं और मुसलमानों, दोनों के लिए व्यवस्थित करते हुए प्रवेश और निकासी के लिए अलग-अलग प्रबंध करने के साथ-साथ ये भी कहा था कि दोनों से एक-दूसरे को कोई समस्या नहीं आनी चाहिए। साथ ही पूरी भूमि के आधिकारिक बँटवारे के लिए स्पेशल ड्यूटी ऑफिसर और रजिस्ट्रार के पास जाने को कहा गया था। वहाँ इसकी औपचारिकता पूरी होनी थी।

तीन जजों में से एक जस्टिस एसयू खान ने कहा था कि विवादित ढाँचा मस्जिद था और मस्जिद को बनाने के लिए किसी मंदिर को ध्वस्त नहीं किया गया। उनका कहना था कि मंदिर के अवशेषों का उपयोग मस्जिद बनाने के लिए हुआ। उनका मानना था कि स्वामित्व साबित करने में दोनों समुदाय विफल रहे। उनका कहना था कि 1949 के पहले से मस्जिद के गुम्बद को भगवान श्रीराम का सटीक जन्मस्थान माना जाने लगा।

जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने जस्टिस एसयू खान की इन बातों से सहमति जताई- मस्जिद के गुम्बद को भगवान श्रीराम का जन्मस्थान माना जाता है, विवादित ढाँचे को मुस्लिमों ने हमेशा से मस्जिद ही माना है और इसका कोई सबूत नहीं कि बाबर ने 1528 में इसे बनाया। लेकिन हाँ, उन्होंने जस्टिस एसयू खान की उस बात से सहमति नहीं जताई कि मंदिर को तोड़ कर मस्जिद नहीं बना था। उनका कहना था कि मंदिर को तोड़ा गया था।

वहीं जस्टिस डीवी शर्मा ने माना कि न तो ये विवादित ढाँचा मस्जिद था और न ही इसे बाबर ने बनवाया था। उन्होंने ASI के सर्वे के हवाले से माना कि विवादित ढाँचे के निर्माण के लिए मंदिर को तोड़ा गया था। उन्होंने स्तम्भों पर बने हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरों को देख कर कहा कि ये इस्लामी स्थापत्य का हिस्सा नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि यहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग 1528 से नमाज नहीं पढ़ते थे।

जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने कहा था कि 1996 में सिविल जजों के उस फैसला का भी समर्थन किया था, जिसमें कहा गया था कि ये वक़्फ़ की संपत्ति नहीं है। चूँकि अयोध्या के रामलला नाबालिग हैं, इसीलिए उन्होंने टाइटल डेक्लेरट्री के परिसीमन के लिमिटेशंस उनके लिए लागू न होने की बात कही। उन्होंने रामजन्मभूमि के खुद के अपने-आप में एक देवता होने की बात का भी समर्थन किया था। उन्होंने इस स्थान को ईश्वरीय आत्मा के प्रतीक के रूप में माना।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजमेंट और तीनों जजों के विचारों को देख कर ऐसा लगता है कि उन्हें सब कुछ पता था, लेकिन सभी पक्षों को खुश करने के लिए भूमि को तीनों पक्षों में बाँट दिया गया। जस्टिस शर्मा द्वारा कही गई कई बातें सुप्रीम कोर्ट में उठीं और हिन्दू पक्ष ने इसके माध्यम से दलीलें भी पेश कीं। तो इस तरह से ये फैसला न होकर तुष्टिकरण बन गया। इसके पीछे सांप्रदायिक तनाव का भय था या कुछ और, ये चर्चा का विषय है।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को क़ानूनी रूप से ‘Unsustainable’ बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि अगर ये सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए था, तो भी ये साध्य नहीं था। उसका कहना था कि 1500 स्क्वायर यार्ड्स की भूमि को तीन हिस्सों में बाँटना अंततः शांति बनाए रखने के लिए भी ठीक नहीं था। इसको बाँट देने से किसी भी पक्ष का भला नहीं होगा, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने कहा था।

कैसे अलग था अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अब जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को 10 साल बीत चुके हैं, ये कहा जा सकता है कि इस मामले को उस दौरान इस तरह से ट्रीट किया गया, जैसे ये दो पड़ोसियों के मामूली जमीन विवाद का झगड़ा हो और दोनों ठीक रह सकें, इसीलिए दोनों में जमीन बाँट दी गई। जबकि, सच्चाई ये है कि राम सहस्रों वर्षों से भारत में पूजे जाते रहे हैं और 100 करोड़ हिन्दुओं के देश में उनके ही आराध्य की जमीन का अतिक्रमण कर लिया गया, और उन्हें कहा जाए कि आधा-आधा बाँट लो?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पुराने जमाने के घुमंतुओं द्वारा लिखी गई बातों और गुरु नानक देव की अयोध्या यात्रा सहित कई साक्ष्यों का अध्ययन किया। जहाँ अयोध्या में ही मस्जिद के लिए अलग भूमि उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया, वहीं पूरी विवादित भूमि हिन्दुओं को दी गई। सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद ट्रस्ट का गठन हुआ। राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने का कार्य तो पहले से ही चालू था, अब इसका शिलान्यास भी हो गया।

सबसे बड़ी बात कि इस पर सुप्रीम कोर्ट को घेरने के लिए लिबरलों के पास केवल वही सब मुद्दे थे, जिनके आधार पर वो हर चीज का विरोध करते हैं। समरसता की बातें की गई। मुस्लिम समुदाय के लोगों में से कई ने इसे शरिया के खिलाफ बताया। कइयों ने बाबरी ध्वंस का मुद्दा उठाया। कुछ ने कहा कि जहाँ मस्जिद है, वहाँ आदिकाल तक मस्जिद ही रहती है। वही पुराने राग अलापने वालों ने कोई सटीक तर्क नहीं दिया। यहाँ बहस की एक घटना का जिक्र करना ज़रूरी है:

अधिवक्ता वैद्यनाथन ने ‘स्कन्द पुराण’ का उदाहरण देते बताया कि काफी पहले से सरयू में स्नान कर भगवान श्रीराम जन्मभूमि के दर्शन की परंपरा रही है। जब जस्टिस अशोक भूषण ने पूछा कि ‘स्कन्द पुराण’ कब लिखा गया था तो वैद्यनाथन ने बताया कि ये महाभारत काल में महर्षि वेद व्यास द्वारा लिखा गया। जब फिर सवाल हुआ कि इसमें देवता के दर्शन की बात क्यों नहीं है, तो वकील ने बताया कि पूरी जन्मभूमि ही देवता है।

जस्टिस भूषण ने पूछा कि इस मंदिर को बाबर ने तोड़ा था कि औरंगजेब ने, तो वैद्यनाथन ने बताया कि इस बारे में भ्रम है लेकिन ये सर्वविदित है कि अयोध्या के राजा श्रीराम थे। फ्रेंच ट्रेवलर विलियम फिंच ने अपनी भारत यात्रा (1608-11) में अयोध्या मंदिर का जिक्र किया है। जोसफ ताईफ़ेंटालर की पुस्तक का हवाला दिया गया, जिसमें भगवान श्रीराम के मंदिर के तोड़े जाने और उनमें लोगों की अटूट आस्था होने का जिक्र है।

सार ये कि सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट को ज़मीन का बँटवारा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये जमीन का झगड़ा नहीं था। ये अपनी आस्था के लिए, विदेशी अतिक्रमण से हुए नुकसान को ठीक करने के लिए और इतिहास में हुई गलतियों को ठीक करने के लिए लड़ी गई लड़ाई थी। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट में इस पर व्यापक बहस हुई। कोर्ट को बताया गया कि मथुरा और काशी की तरह ही साकेत भी हिन्दुओं की आस्था का केंद्र था।

काशी-मथुरा की मुक्ति के बिना अधूरा है राम मंदिर

जब आप संस्कृत के प्राचीनकाल में सबसे लोकप्रिय व्याकरणविद पाणिनि को पढ़ेंगे तो पाएँगे कि उनके समय में मथुरा का वैभव ऐसा था, जैसा 16वीं शताब्दी की शुरुआत में विजयनगर और रोम का रहा होगा। मथुरा का फैलाव काफी बड़ा था, वहाँ ब्राह्मणों की बड़ी-बड़ी बस्तियाँ थीं और व्यापार का वो उस समय का सबसे बड़ा केंद्र था। ‘अष्टाध्यायी’ में मथुरा की भव्य परंपरा का विस्तृत वर्णन किया गया है।

ठीक इसी तरह काशी के वैभव का जिक्र सभी शैव ग्रंथों में है। मथुरा और काशी के बारे में एक और अच्छी बात ये है कि इसके प्रमाण लगभग कई सारे हिन्दू धर्म-ग्रंथों में हैं और अयोध्या से कहीं ज्यादा इसके साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं। महाभारत में मथुरा का वर्णन है। मोक्षदायिनी काशी का वर्णन कई पुराणों में है। ऐसे में अब जब इन दोनों स्थलों की मुक्ति के प्रयासों का आगाज हो चुका है, इस राह में एक बहुत बड़ी बाधा भी है।

वो बाधा है – ‘‘उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 {Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991}, जिसके तहत किसी भी धार्मिक स्थल में परिवर्तन नहीं किया जा सकता, वो वैसा ही रहेगा, जैसा वो आज़ादी के समय था। वहाँ यथास्थिति बनी रहेगी। लेकिन, ये पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के अंतर्गत आने वाले स्थलों पर लागू नहीं होता। अयोध्या को इससे छूट दी गई थी, इसीलिए उसका केस लड़ा जा सका।

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने दिसंबर 2019 में इसमें संशोधन करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखते हुए कहा था कि ये उनके पूजा करने के मूल अधिकारों का उल्लंघन है और आपत्तिजनक है। उनका कहना था कि ‘फंडामेंटल राइट्स’ में संसद कोई बदलाव नहीं कर सकता है। उनका कहना था कि अनुच्छेद 25-26 ‘फ्रीडम ऑफ वरशिप’ प्रदान करता है, इसीलिए कोई इसे रद्द नहीं कर सकता है।

जहाँ काशी के शिवलिंग को स्वयंभू माना गया है और कहा गया है कि वो स्वयं प्रकट हुए हैं, वहाँ के ज्ञानवापी मस्जिद को देख कर ही पता चलता है कि उसका निचला हिस्सा मंदिर का है, जिसे तोड़ कर मस्जिद बनाया गया। दूसरी तरफ मथुरा के लिए अखाड़ा परिषद पक्षकार बनने के लिए विचार कर रहा है। वहाँ औरंगजेब ने मंदिर तोड़ कर शाही ईदगाह मस्जिद बनवाई थी। इसके लिए सिविल सूट भी दायर हो चुका है।

हम इसके लिए प्रार्थना कर सकते हैं कि राम मंदिर में जितने हिन्दुओं ने अपना खून बहाया, वैसा काशी-मथुरा के लिए न हो क्योंकि अब तक जिन्होंने बलिदान दिया है, उन्होंने सिर्फ अयोध्या के लिए ही नहीं दिया था। कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह हों या राम मंदिर के लिए अपनी सरकार कुर्बान कर देने वाले कल्याण सिंह – इतिहास में कुछ भी छिपा नहीं है। बाबरी ध्वंस के दौरान अपना खून बहाने वाले अशोक सिंघल से लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ने वाले 92 वर्षीय के पराशरण, इन वरिष्ठों का योगदान जाया न गया था और न जाएगा।

राम मंदिर के लिए संघर्ष करने वालों की गाथाओं से हम आपको समय-समय पर परिचित कराते रहे हैं, जिनमें किशोर कुणाल और केके मुहम्मद जैसे बुद्धिजीवियों से लेकर कोठरी भाइयों के बलिदान तक शामिल हैं। ये भगीरथ प्रयास, बलिदान और संघर्ष अयोध्या-काशी-मथुरा, इन तीनों के लिए था। इसीलिए, अयोध्या की लड़ाई तब तक अधूरी है, जब तक काशी और मथुरा का अतिक्रमण ख़त्म नहीं हो जाता।

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फ़िलहाल मथुरा को लेकर सक्रियता दिख रही है। तभी एक तरफ इकबाल अंसारी कह रहा है कि मंदिर-मस्जिद की बात करने वाले देश की तरक्की रोक रहे, तो असदुद्दीन ओवैसी 1991 के क़ानून और मथुरा में 50 के दशक में हुए समझौते का हवाला दे रहा। कांग्रेस नेता महेश पाठक खुद को पुरोहितों का प्रतिनिधि बता कर श्रीकृष्ण जन्मभूमि याचिका की निंदा कर रहे। जो भी हो, फ़िलहाल तो – ‘काशी-मथुरा बाकी है।

अबकी बार, हिन्दुओ की सरकार : प्रवीण तोगड़िया


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अंतरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद के संस्थापक प्रवीण भाई तोगड़िया ने अयोध्या में संकल्प सभा करते हुए नई पार्टी का अंतरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद के संस्थापक प्रवीण भाई तोगड़िया ने अयोध्या में संकल्प सभा करते हुए नई पार्टी का एलान कर दिया है। उन्होंने भाजपा पर हमला करते हुए कहा कि जिन लोगों ने राम के नाम पर चुनाव लड़ा वो सत्ता मिलते ही राम को भूल गए। उन्होंने अपने समर्थकों संग अबकी बार हिन्दुओं की सरकार का नारा दिया। नई पार्टी के एलान के साथ ही तोगड़िया ने लोकसभा चुनाव लड़ने की भी घोषणा कर दी। नई पार्टी के नाम की घोषणा दिल्ली में होगी।
तोगड़िया ने सत्ता में आने पर हर हिन्दू को भोजन, शिक्षा व रोजगार देने का वादा किया। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने समद्घ भारत, समृद्घ हिन्दू का नारा दिया था लेकिन सत्ता में बैठे लोग हिन्दू हितों की बात भूल गए हैं। मस्जिदों में जाते हैं। हम राम मंदिर नहीं तो वोट नही का नारा लेकर जागरुकता फैलाएंगे और केंद्र में हिन्दुओं की सरकार बनाने के लिए काम करेंगे। तोगड़िया ने मुस्लिमों की जनसंख्या पर भी नियंत्रण लगाने की बात कही।
वैसे जब कभी भी देश में परिवार नियोजन की बात होती है, मुस्लिमों से पहले कुर्सी के भूखे छद्दम धर्म-निरपेक्ष विधवा-विलाप कर आम जनमानस को भ्रमित करने सडकों पर उतर आते हैं। गम्भीरता से देखा जाए तो आम मुस्लिम भी आज तीसरे बच्चे के पक्षधर नहीं, लेकिन वोट के भूखे उनके दिमाग में इस्लाम के विरुद्ध जहर फैलाकर परिवार नियोजन योजना का विरोध करने लगते हैं। 2019 चुनाव उपरान्त मोदी सरकार इन छद्दमों के बैंक खातों की जाँच कर आमदनी से अधिक जमा पर सख्त कार्यवाही करे। जिस दिन केन्द्र सरकार ने इन छद्दमों को बेनकाब करना प्रारम्भ कर दिया, कोई आतंकवादी तो क्या पाकिस्तान और चीन को भी भारत की तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं होगी, और जाति-धर्म-मजहब के नाम पर खुले दुकानें यानि पार्टियाँ अपने आप लुप्त होनी शुरू हो जाएँगी। इन लोगों ने राजनीती को व्यापार बनाकर रख दिया है। देश में भ्रष्टाचार भी आधे से अधिक समाप्त हो जाएगा। प्रमाण जगजाहिर है, बाबरी मस्जिद के नाम पर किस तरह मुस्लिम समाज की भावनाओं से खेला जा रहा है। क्यों खुदाई में मिले राममन्दिर के अवशेषों को कोर्ट से छुपाया गया। दशहरे पर रामलीला मंचन स्थलों पर माल बटोरने तो पहुँच जाते हैं, लेकिन वही नेता कोर्ट में राम के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं। छद्दम धर्म-निरपेक्षों को इनकी औकात दिखाने का दायित्व केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि समस्त देशवासियों का भी है। चुनावों में इन छद्दमों को लोकतन्त्र के नाम पर वोट ही न देकर समझाएँ कोर्ट में राम, कृष्ण और शिव पर अवरोध करने का क्या अन्जाम होता है। इस तरह का कदम साम्प्रदायिक नहीं, वास्तविक लोकतन्त्र का उदाहरण होगा। 
 इस सन्दर्भ में अवलोकन करें:--
मुगलवाद को जिस तरह भारत में ज़िंदा रखा जा रहा है और वोट के भूखे नेता कट्टरपंथियों के आगे शीश झुकाते हैं, विश्व में भारत को एक मजाक बना दिया है, विश्व इन करतूतों की वजह से हम पर हँसता है। मक्का जिसे इस्लाम का तीर्थ कहा जाता है, भारत में मुगलों के हिमायती जवाब दें कि मक्का में बनी बिलाल मस्जिद कहाँ है? जहाँ सजदा किए बिना हज पूरा नहीं होता था। किसी माई के लाल में हिम्मत है, सऊदी सरकार के विरुद्ध एक लब्ज़ निकाल सकें। भारत में मुगलों के लिए विधवा-विलाप करने वाले सऊदी सरकार के विरुद्ध मुँह खोलने का अर्थ भलीभाँति जानते है कि कहीं हमारे हज के जाने पर वहाँ की सरकार प्रतिबन्ध न लगा दे। भारत में ही कह सकते हैं "हमारा सिर सिर्फ अल्लाह के आगे झुकता है, किसी और के आगे नहीं", अब कोई इनसे पूछे सऊदी सरकार के विरुद्ध क्यों नहीं ? सऊदी सरकार के आगे झुक गया न सिर, इससे बड़ा प्रमाण और क्या चाहिए?
इसके पहले अंतरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद के संस्थापक प्रवीण तोगड़िया के समर्थकों व पुलिस के बीच अयोध्या में रामकोट की परिक्रमा के दौरान भिड़ंत हो गई।  इस दौरान समर्थकों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हल्का लाठीचार्ज करना पड़ा।
दरअसल, अंतरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता परिक्रमा मार्ग बदलने पर नाराज हो गए और पुलिस से भिड़ गए ऐसे में कुछ देर के लिए अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। इस दौरान कार्यकर्ता जय श्री राम और मोदी विरोधी नारे लगाते रहे।
हालात को नियंत्रित करने के लिए भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। इस बीच प्रवीण तोगड़िया ने प्रशासन के मनाने पर उन्मादी भीड़ को समझाकर शांत करवाया। तोगड़िया अपने समर्थकों संग सरयू तट की ओर रवाना हो गए जहां उन्होंने नई पार्टी का ऐलान किया।