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ज्ञानवापी : तहखाने की चाबी देने से मुस्लिम पक्ष का इनकार, क्यों?

                                            ज्ञानवापी तहखाने की चाबी देने से मुस्लिम पक्ष का इनकार 
वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में स्थित ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में शनिवार को दूसरे दिन भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) टीम पहुँची। सुबह 9 बजे से ही सर्वेक्षण शुरू हो गया है। सर्वे का उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या यह एक हिंदू मंदिर विश्वेश्वर महादेव को तोड़कर बनाया गया है। वहीं दो दिन से अपनी जिद पर अड़ा मुस्लिम पक्ष भी सर्वे में शामिल होने को तैयार हो गया है लेकिन तहखाने की चाभी देने से इनकार कर रहा है।

ANI की रिपोर्ट के अनुसार, ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के मुस्लिम पक्ष के वकील एजाज अहमद ने कहा, “आज मस्जिद ताला खोल दिया गया है। एएसआई की टीम मस्जिद में प्रवेश गई है, वजूखाने को छोड़कर मस्जिद के अंदर भी सर्वे हो रहा है।” वहीं इस मामले में अब नया विवाद तब खड़ा हो गया जब मुस्लिम पक्ष ने अपने कब्जे का तहखाना खोलने के लिए से मना कर दिया। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि वो तहखाने की चाबी क्यों दें? उनको (एएसआई की टीम) जहाँ खोलना है, वह खोल लेंगे।

शुक्रवार (4 अगस्त, 2023) को जब मंदिर में तमाम हिन्दू प्रतीक दीवारों और छतों पर मिल रहे थे, तो भी तहखाने में सर्वे नहीं हो पाई थी, क्योंकि मुस्लिम पक्ष ने ताला नहीं खोला था और चाबी भी नहीं दी थी। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि आज ASI टीम तहखाने तक पहुँच सकती है और जल्द ही ASI की टीम तहखाने के रहस्यों से पर्दा हटाएगी। 

आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, लगातार सर्वे का विरोध कर रही अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी के ज्वाइंट सेक्रेट्री मोहम्मद यासीन ने कहा, “हम सर्वे में शामिल नहीं थे क्योंकि हम कानूनी प्रक्रिया का इंतजार कर रहे थे लेकिन अब जब कोर्ट ने सर्वे पर रोक लगाने से इनकार कर दिया तो हम एएसआई सर्वे में पूरा सहयोग करेंगे।”

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वहीं हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने बताया कि आज डिटेल मेथड के जरिए काम किया जाएगा, जो आगे के सर्वे का रूप तय करेगा। वहीं मुस्लिम पक्ष के सहयोग पर उन्होंने कहा कि मुस्लिम पक्ष सहयोग नहीं बल्कि कोर्ट के आदेश की वजह से मजबूर है। वाराणसी के जिला जज के न्यायालय ने ASI सर्वे की मियाद बढ़ाकर 4 हफ्ते कर दी है।  

वहीं शुक्रवार को जब ASI ने जब पहले दिन सर्वेक्षण शुरू किया तो शीर्ष पुरातत्व निकाय ने ज्ञानवापी परिसर की दीवारों और स्तंभों पर उकेरे गए त्रिशूल, स्वास्तिक, घंटी और फूल जैसे हिन्दू प्रतीकों की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी की। इस सर्वे में  ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) के माध्यम से सभी मूर्तियों और विवादित ढाँचे के तह तक जाँच की जा रही है। ज्ञानवापी परिसर के चारों कोनों पर डायल टेस्ट इंडिकेटर भी लगाए गए, जिससे परिसर के विभिन्न हिस्सों की गहराई और ऊँचाई मापी गई।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पहले दिन के सर्वे में विवादित ढाँचे की निर्माण शैली और अंदर मिले हिन्दू मंदिरों में पाए जाने वाले प्रत्येक डिज़ाइन की प्राचीनता को दर्ज किया गया और सर्वेक्षण में विवादित संरचना के गुंबदों और स्तंभों पर उकेरी गई संरचनाओं को भी शामिल किया गया। पहले दिन, सर्वेक्षण लगभग सात घंटे तक चला। 

गौरतलब है कि गुरुवार (3 अगस्त, 2023) को, उच्च न्यायालय ने मस्जिद समिति के अनुरोध को खारिज कर दिया। इसमें जिला अदालत के उस आदेश को रोकने की माँग की गई थी, जिसमें एएसआई को यह निर्धारित करने के लिए सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया गया था कि क्या मस्जिद पहले से मौजूद मंदिर पर बनाई गई है।

 ज्ञानवापी मस्जिद तब सुर्खियों में आई जब महिलाओं के एक समूह ने ज्ञानवापी विवादित परिसर में स्थित विश्वेश्वर महादेव की पूजा की अनुमति के लिए वाराणसी की निचली अदालत का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि यहाँ पहले एक मंदिर हुआ करता था।

जिला अदालत ने इस याचिका के आधार पर 2022 में परिसर के वीडियो सर्वेक्षण का आदेश दिया। सर्वेक्षण के दौरान, एक संरचना की खोज की गई जिसके बारे में याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वह एक ‘शिवलिंग’ है। लेकिन ज्ञानवापी प्रबंधन समिति ने कहा कि संरचना ‘वज़ुखाना’ में एक फव्वारे का हिस्सा थी, जो पानी से भरा क्षेत्र है जहाँ लोग प्रार्थना करने से पहले अपने हाथ-पैर धोते हैं।

107 वर्ष बाद काशी विश्वनाथ धाम में माँ अन्नपूर्णा की प्राण-प्रतिष्ठा, CM योगी ने उठाई पालकी

वाराणसी से 107 साल पहले चोरी हुई माँ अन्नपूर्णा की दुर्लभ प्रतिमा श्री काशी विश्वनाथ धाम पहुँची जहाँ विधि-विधान से माँ प्राचीन प्रतिमा की पुनर्स्थापना सोमवार (15 नवंबर, 2021) को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में मुख्य मंदिर के ईशान कोण पर कर दी गई है। CM योगी आदित्यनाथ ने वैदिक मंत्रोच्चार, माँ अन्नपूर्णा के जयकारे और हर-हर महादेव के उद्घोष के बीच मंदिर के मुख्य द्वार पर प्रतिमा यात्रा की अगवानी की। भव्य रूप से सजाए गए मंदिर परिसर में सीएम योगी की उपस्थिति में काशी विश्वनाथ मंदिर का अर्चक दल द्वारा काशी विद्वत परिषद की निगरानी में प्राण प्रतिष्ठा की संपूर्ण प्रक्रिया को पूर्ण कराया गया।

बाबा विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी के अनुसार, बाबा काशी विश्वनाथ की रंगभरी एकादशी की रजत पालकी और सिंहासन को माँ अन्नपूर्णा के स्वागत के लिए भेजा गया। माँ की प्रतिमा ज्ञानवापी के प्रवेश द्वार से इसी पालकी में सिंहासन पर विराजमान होकर काशी विश्वनाथ धाम में प्रवेश कीं। जहाँ मुख्यमंत्री योगी सहित तमाम गणमान्य लोगों ने पालकी को कन्धा देकर स्थापना स्थल तक ले गए। मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के बाद CM योगी आदित्यनाथ ने बाबा काशी विश्वनाथ के दरबार में जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक कर बाबा से विश्व के कल्याण के लिए आशीर्वाद माँगा।

माँ अन्नपूर्णा की शोभायात्रा उत्तर प्रदेश के 18 जिलों से होती हुई आज सुबह ही काशी पहुँची थी।

माँ अन्नपूर्णा की इस प्रतिमा के एक हाथ में खीर का कटोरा तो दूसरे हाथ में चम्‍मच है। माँ अन्नपूर्णा के इस स्वरूप पीछे काशी में मान्यता है कि यहाँ कभी कोई भूखा नहीं रहता। माँ स्वयं अपने हाथों के चम्मच से खीर का प्रसाद भक्तों के बीच बाँटकर उन्हें धन-धान्‍य से परिपूर्ण होने का आशीर्वाद दे रही हैं।

वाराणसी में काशी विश्वनाथ परिसर से ही 1913 के आसपास माँ अन्नपूर्णा की मूर्ति चोरी हुई थी। चोरी होने के बाद मूर्ति तस्करों द्वारा गुपचुप तरीके से यह मूर्ति कनाडा ले जाई गई और फिर मैकेंजी आर्ट गैलरी में सैलून तक रखी रही। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिमा का अध्ययन करने के बाद दिव्या मेहरा ने भारतीय दूतावास को इस प्राचीन मूर्ति बारे में सूचित किया। मूर्ति का इतिहास सामने आने के बाद PM मोदी के आग्रह पर कनाडा सरकार ने इसे भारत सरकार को शिष्‍टाचार भेंट के तौर पर लौटाने की पेशकश की। जिसके बाद ही यह मूर्ति एक लम्बी दूरी तय करके आज अपने मूल स्थान काशी पहुँची है। जहाँ आज विधिवत पुनः स्थापना की गई है।

चुनार के बलुआ पत्‍थर से बनी माँ अन्नपूर्णा की यह प्राचीन प्रतिमा कई मायनों में खास है। औरंगजेब द्वारा काशी के कई मंदिरों और मूर्तियों को नुकसान पहुँचाने और नष्ट करने के बाद जब पुनः काशी में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा हुई यह मूर्ति भी तब की है। वाराणसी में आज भी इसी काल की कई मूर्तियाँ हैं, जो काशी के प्रस्‍तर कला की पहचान हैं। वैसे मूर्ति विशेषज्ञों ने माँ अन्नपूर्णा की इस प्रतिमा को 18वीं सदी का बताया है।

‘मथुरा-काशी बाकी है’: 1947 का वो यज्ञ जब 3 दोस्तों ने खींचा हिंदुओं के 3 पवित्र स्थल को वापस पाने का खाका

                जब अयोध्या के साथ ही पड़ी थी काशी विश्वनाथ मंदिर और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव
यह तो पहली झाँकी है, मथुरा-काशी बाकी है। ये नारा तो बहुत बाद में बुलंद हुआ। उससे बरसों पहले तीन दोस्तों ने अयोध्या के साथ-साथ इन दो हिन्दू पवित्र स्थलों को वापस पाने का एक विस्तृत खाका तैयार कर लिया था। हालाँकि राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए पहले से ही संघर्ष जारी था। पर इनकी योजना की वजह से आजाद भारत में यह सिरे चढ़ा।

5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर भूमिपूजन के बाद फिर से मथुरा-काशी को वापस पाने की बातें जोर-शोर से होने लगी है। मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के लिए तो बकायदा एक ट्रस्ट भी बनाया गया है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट से 14 राज्यों के 80 संत-महामंडलेश्वर जुड़े हैं। आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए हस्ताक्षर अभियान शुरू करने की योजना बनाई गई है।

वास्तव में विवाद को जन्म देने वाले कोई अन्य नहीं, वरन मुस्लिमों से अधिक हिन्दू ही हैं जो कुर्सी की खातिर इस्लामिक कट्टरपंथियों के हाथ कठपुतली बन अपने पूज्यनीय पुरुषोत्तम श्रीराम को ही दांव पर लगा बैठे। राम विरोधी हिन्दू ही रामजन्म स्थान पर लाइब्रेरी, अस्पताल और न जाने क्या-क्या बनाने के लिए बोलते थे, आज वही लोग राम के चौदह वर्ष वनवास उपरांत होने वाली दीपावली पर छोड़ी जाने वाली आतिशबाज़ी पर विवाद करने से बाज़ नहीं आ रहे। देखिए सोशल मीडिया पर वायरल होता वीडियो: 

दूसरे, जब रामजन्मभूमि आन्दोलन अपने चरम पर था, उस समय हिन्दू संगठनों की खुली मांग थी कि "सम्मान से हमारे तीन प्रमुख तीर्थ अयोध्या, काशी और मथुरा दे दो, नहीं तो पूरे 6000 अपने धार्मिक स्थल जिन्हे मस्जिद, दरगाह और कब्रिस्तानों में बदल दिया है लेकर रहेंगे।", लेकिन कुर्सी के भूखे नेता तब भी अपनी नींद से नहीं जागे, और मुसलमानों को भड़काकर अपनी गन्दी और ओछी सियासत खेलते रहे, निहत्ते रामभक्तों पर गोलियां चलवाकर तुष्टिकरण करते रहे।  

वैसे, तुलसी दास लिख गए हैं;

झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाई महा अहि हृदय कठोरा॥

यह भी कि; 
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेतॉं नाहिं।
द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलजुग माहिं॥

यानी, ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सतयुग और त्रेता में नहीं होते। द्वापर में थोड़े से होंगे और कलियुग में तो इनके झुंड-झुंड होंगे। 

असल में हिंदुओं के इन पवित्र स्थलों को वापस पाने की योजना एक खेल से भी जुड़ी हुई है। यह खेल है 12वीं सदी में उत्तरी फ्रांस से शुरू हुआ ‘जिउ दी पौमे’ (हथेली का खेल), जो 16वीं सदी में इंग्लैंड पहुँच टेनिस हो गया। 78 फीट लंबे और 27 फीट चौड़े कोर्ट में खेले जाने वाले लॉन टेनिस को अंग्रेज 1880 के दशक में हिंदुस्तान लेकर आ गए थे। 1920 आते-आते भारत ने डेविस कप में भाग लेना भी शुरू कर दिया था। हालाँकि भारतीय लॉन टेनिस का इतिहास भले 100 साल से भी पुराना हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाप छोड़ने वाले हम चुनिंदा खिलाड़ी ही पैदा कर पाए हैं।

लेकिन, इस खेल ने हिंदू जीवन दर्शन के तीन पैरोकारों को इतनी प्रगाढ़ता से जोड़ा कि इसने आजाद भारत में अयोध्या के राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव डाल दी। ये तीन दोस्त थे, बलरामपुर स्टेट के महाराजा पटेश्वरी प्रसाद सिंह, नाथपंथी कनफटा साधुओं की शीर्ष पीठ गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ और इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) के अधिकारी केकेके नायर। महाराजा घुड़सवारी और लॉन टेनिस में पारंगत थे। महंत लॉन टेनिस के माहिर और नायर का भी इस खेल से लगाव था।

महाराजा हिंदू जीवन दर्शन के प्रचार-प्रसार को समर्पित थे। महंत तो बकायदा हिंदू महासभा के अधिकारी ही थे। नायर भी हिंदू महासभा के संपर्क में थे। लेकिन, कहते हैं कि तीनों की दोस्ती का आधार लॉन टेनिस के प्रति इनका लगाव ही था।

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखा है कि 1947 के शुरुआती दिनों में महाराजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया। केरल के एलप्पी के रहने वाले नायर जो 1930 में सिविल सर्विस से जुड़े थे, उस समय सरयू के उस पार फैजाबाद से सटे गोंडा जिले में तैनात थे। यज्ञ में महाराजा के गुरु स्वामी करपात्री जी भी शामिल हुए।

अंजुल भर भिक्षा लेने के कारण करपात्री कहलाए स्वामी जी सिद्ध दंडी संन्यासी, उद्भट विद्वान और प्रखर वक्ता थे। ‘रामराज्य और मार्क्सवाद’ नामक बहुचर्चित किताब उनकी ही लिखी है। 1940 में बनारस में हिंदू परंपराओं की रक्षा के लिए उन्होंने ‘धर्मसंघ’ की स्थापना की और 1941 में बनारस से दैनिक अखबार ‘सन्मार्ग’ शुरू किया। राजनीति में धर्म को उचित स्थान दिलाने के लिए ‘रामराज्य परिषद’ बनाया। 1951 में इस परिषद के 24 सदस्य राजस्थान विधानसभा के लिए चुने गए थे। कई लोग इस राजनीतिक दल के बैनर तले संसद भी पहुॅंचे।

शर्मा के मुताबिक उन्हें खुद स्वामी करपात्री ने बताया था कि राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव उसी यज्ञ में पड़ी थी। नायर वहाँ पहले से थे और यज्ञ समाप्ति से एक दिन पहले महंत दिग्विजय नाथ भी पहुँच गए। उन हिंदू धर्म स्थलों की मुक्ति पर चर्चा हुई, जिन पर इस्लामी अक्रांताओं ने कब्जा किया था।

इसके बाद नायर एक विस्तृत योजना के साथ स्वामी करपात्री और महंत दिग्विजय नाथ से मिले। उन्होंने अयोध्या के साथ-साथ वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि को दोबारा हासिल करने का खाका पेश किया। नायर ने वादा किया कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वे अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार हैं। नौकरी भी।

संयोग से 1 जून 1949 को नायर फैजाबाद के कलेक्टर बने। वहाँ सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह और अभिराम दास पहले से ही राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए प्रयासरत थे। मैथिल ब्राह्मण अभिराम दास नागा वैरागी यानी रामानंद संप्रदाय के 15 साल पुराने खाड़कू थे। हिंदू महासभा से जुड़े होने के कारण महंत दिग्विजय नाथ के करीबी थे। उनकी ख्याति राम जन्मभूमि के ‘उद्धारक’ के तौर पर थी। कहते हैं कि 3 दिसंबर 1981 को जब अभिराम दास की अंतिम यात्रा निकली तो ‘राम नाम’ की जगह ‘राम जन्मभूमि के उद्धारक अमर रहे’ की गूँज हर ओर से आ रही थी।

नायर के फैजाबाद में तैनाती के कुछ महीने बाद ही 22-23 दिसंबर 1949 की दरम्यानी रात रामलला भाइयों के साथ विवादित गुंबद के भीतर प्रकट हुए। नायर ने उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दबाव के बावजूद मूर्तियों को हटाने से इनकार कर दिया था। 1952 में जब फैजाबाद से उनका तबादला कर दिया गया तो उन्होंने नौकरी ही छोड़ दी।

रामलला के वकील एससी वैद्यनाथन सुप्रीम कोर्ट को बता चुके हैं कि राम का जन्म बाबरी मस्जिद के गुंबद के नीचे हुआ था। भारतीय पुरातत्व विभाग की खुदाई से मिले सबूत भी बताते हैं कि बाबरी मस्जिद के नीचे जो स्ट्रक्चर था उसकी बनावट उसमें मिली भगवान की तस्वीरें, मूर्तियॉं सब पहले से मंदिर के होने की गवाही देते हैं। लेकिन, आपत्ति जताने वाले यह भी पूछते हैं कि एक ही कालखंड में होने के बावजूद तुलसीदास ने राम मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बनाए जाने का जिक्र क्यों नहीं किया?

काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद : सुन्नी सेंट्रल वक़्फ बोर्ड को नोटिस जारी

विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद (पत्रिका से साभार)
विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद
अयोध्या में श्रीराम मंदिर का भव्य निर्माण शुरू होने के साथ ही अब वाराणसी में ‘ज्ञानवापी परिसर’ को मुक्त कराने की कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है। इस मुद्दे पर सोमवार(अगस्त 10) को वाराणसी की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में सुनवाई हुई थी। वहीं जिला जज की अदालत ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से कोर्ट में उपस्थिति न होने के कारण सुनवाई की अगली तारीख 1 सितंबर को निर्धारित कर दी है। इससे पहले प्रतिवादी अंजुमन इंतजामिया मस्जिद की तरफ से 1 जुलाई को इस मुद्दे पर याचिका दाखिल की गई थी।
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के शिलान्यास के बाद से ही काशी और मथुरा का मुद्दा भी गरमाता नजर आ रहा है। लोगों की निगाहें अब काशी विश्वनाथ मंदिर के फैसले पर टिकी हुई है।
प्रतिवादी अंजुमन इंतजामिया मस्जिद की ओर से अर्जी दी गई कि मामले में सुनवाई नहीं हो सकती हैं। इस मामले की सुनवाई सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार में नहीं है। कोर्ट ने सुनवाई के बाद प्रतिवादी की याचिका खारिज कर सुनवाई चालू रखने का आदेश दिया। उधर प्रतिवादी की ओर से एक और अर्जी दी गई। कहा गया कि लखनऊ वफ्फ बोर्ड ट्रिब्यूनल न्यायाधिकरण के पास प्रकरण को भेजा जाए। अदालत ने इस अर्जी को 25 फरवरी को खारिज कर दिया। इसी आदेश के खिलाफ प्रतिवादी ने जिला जज की अदालत में एक जुलाई को याचिका दाखिल की है।
वहीं एक जुलाई को दायर याचिका की सुनवाई करते हुए जिला जज की अदालत ने प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को नोटिस जारी करने का आदेश देते हुए अग्रिम सुनवाई के लिए एक सितंबर की तिथि तय की है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर की ओर से पंडित सोमनाथ व्यास और डॉ. रामरंग शर्मा ने ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण और हिंदुओं को पूजा-पाठ का अधिकार देने आदि को लेकर वर्ष 1991 में मुकदमा दायर किया है। जिस पर बाद में हाईकोर्ट की ओर से स्टे दे दिया गया।
पिछले वर्ष दिसंबर में वादमित्र ने सिविल कोर्ट (सीनियर डिवीजन-फास्टट्रैक) में एक और याचिका दाखिल कर पूरे परिसर का पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की माँग की। कहा कि लम्बा समय होने के कारण पूर्व के स्टे का आदेश स्वत: खारिज हो जाता है। लिहाजा, इस मामले में सुनवाई शुरू की जाए।
दिवंगत वादी पंडित सोमनाथ व्यास और डॉ. रामरंग शर्मा के स्थान पर प्रतिनिधित्व करने के लिए पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (सिविल) विजय शंकर रस्तोगी को न्याय मित्र नियुक्ति किया गया।
इस मामले में भगवान विश्वेश्वर पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील राजेंद्र प्रताप पांडेय पैरवी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अंजुमन इंतेजामि‍या बनारस और यूपी सुन्‍नी सेंट्रल चाहता था कि इस कार्यवाही को स्थगित कर दी जाए और आगे कोई सुनवाई न हो। कोर्ट द्वारा उनकी माँगें ख़ारिज किए जाने के बाद अब इस मामले में कार्यवाही चलेगी। नवम्बर 2019 में सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर के पक्ष में फ़ैसला आने के बाद अब लोगों के भीतर उम्मीद जगी है कि मथुरा व काशी विवाद में भी हिन्दुओं को न्याय मिलेगा।
काशी विश्वनाथ व ज्ञानवापी मस्जिद का मामला हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट, दोनों में ही चल रहा था। बाद में हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमा एक ही कोर्ट में चलेगा और सेशन कोर्ट में जारी रहेगा। वादी पक्ष की तरफ से पूरे ज्ञानवापी परिसर के एएसआई द्वारा भौतिक सर्वे कराने के लिए आवेदन दिया गया था, जिस पर मुस्लिम पक्ष ने आपत्ति जताई थी। उसका कहना था कि हाईकोर्ट के 1998 में दिए गए आदेश के अनुसार इस मामले में स्टे लगा हुआ है।

काशी-मथुरा पर हिंदुओं की याचिका न करें कबूल : जमीयत-उलेमा-ए-हिंद

काशी-मथुरा
काशी विश्वनाथ मंदिर (बाएँ), मथुरा कृष्ण जन्मभूमि मंदिर (दाएँ)
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अयोध्या विवाद के निपटारे के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में काशी-मथुरा को लेकर भी याचिकाओं का सिलसिला शुरू हो गया है। हिन्दू पक्ष की याचिका के बाद अब मुस्लिम पक्ष भी सुप्रीम कोर्ट पहुँचा है। जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने वकील एजाज मकबूल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल करके हिन्दू पुजारियों की याचिका का विरोध किया है।
जमीयत-उलेमा-ए-हिंद की ओर से दाखिल की गई याचिका में कहा गया है कि हिन्दू पुजारियों की याचिका पर नोटिस न जारी किया जाए। उनका कहना है कि मामले में नोटिस जारी करने से मुस्लिम समुदाय के लोगों के मन में अपने इबादत स्थलों के संबंध में भय पैदा होगा।
याचिका में अयोध्या विवाद का संदर्भ देते हुए कहा गया है कि इसके परिणाम के बाद इस तरह की याचिका से मुस्लिमों के मन में भय पैदा होगा, जिससे देश का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना नष्ट होगा। साथ ही जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने कहा है कि उसे संबंधित मामले में पक्षकार बनाया जाए।
हकीकत यह है कि जब अयोध्या में रामजन्म स्थान की पुष्टि के लिए खुदाई हुई तो इनके समर्थक तुष्टिकरण के पुजारी दल केंद्र और राज्य में सत्ता में बैठे थे, खुदाई में मिले सबूतों को कोर्ट से छुपा लिया गया था। परन्तु आज परिस्थितियां एकदम विपरीत होने के कारण इन्हें डर है कि आज खुदाई में सबूत मिलने पर कोई उन्हें कोर्ट से छुपाने का साहस नहीं कर पाएगा और सच्चाई सामने आने पर मुस्लिम समाज में इनके फैलाये झूठ का भांडा फ़ुट जाएगा। अयोध्या के मुद्दे पर इन लोगों ने खूब मूर्ख बनाया, लेकिन अब समय बदल चुका है। 
पाखंडी हिन्दू तक पाखंडी लोगों का साथ देकर अपने ही देवी-देवताओं को अपमानित करने का कोई मौका छोड़ रहे थे, जिस कारण आम जनमानस अपने तीर्थों को मुक्त करवाने को साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और मंदिर के नाम अपनी तिजोरियां भरने वाला बता कर बदनाम किया जा रहा था। वास्तविकता को झूठलाया जा रहा था।   
हिन्दू पुजारियों के संगठन ‘विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ’ ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में धार्मिक स्थल (विशेष प्रोविजन) एक्ट, 1991 की धारा 4 को चुनौती दी है। इस एक्ट के अनुसार अयोध्या राम जन्मभूमि को छोड़कर अन्य पवित्र स्थलों का धार्मिक चरित्र वैसा ही बनाए रखने का प्रावधान है। इस एक्ट को रद्द कर काशी, मथुरा जैसे हिन्दू स्थल को पुनः प्राप्त करने के लिए हिंदू संगठन कानूनी लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं।

अधिनियम की धारा 4 (1) में कहा गया हैं कि, “यह घोषित किया जाता है कि 15 अगस्त, 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस संप्रदाय का था वो आज, और भविष्य में, भी उसी का रहेगा।” जैसे किसी भी मस्जिद को मंदिर में नहीं बदला जा सकता है और वहीं मंदिर को भी मस्जिद या किसी और धर्म में नहीं बदला जा सकता है। हालाँकि अयोध्या विवाद को इससे अलग रखा गया था, क्योंकि उस पर कानूनी विवाद पहले से चल रहा था।
विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ की तरफ से दाखिल याचिका में कहा गया है कि यह कानून हिंदुओं के अधिकार का हनन करने वाला है। इसे रद्द कर देना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि संविधान का अनुच्छेद 25 लोगों को अपनी धार्मिक आस्था के पालन का अधिकार देता है। संसद इसमें बाधक बनने वाला कोई कानून पास नहीं कर सकती।
महासंघ के अनुसार संसद ने 1991 में एक कानून बनाकर सीधे-सीधे हिंदुओं को उनके अधिकार से वंचित कर दिया। काशी और मथुरा जैसे पवित्र धार्मिक स्थलों पर मस्जिद बनी हुई है। लेकिन संसद ने कानून बनाकर हिंदुओं को विदेशी आक्रमणकारियों की इन निशानियों को चुनौती देने से रोक दिया है। कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह धार्मिक स्थल (विशेष प्रोविजन) एक्ट, 1991 की धारा 4 को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दे।
याचिका में काशी विश्वनाथ एवं मथुरा मंदिर विवाद को लेकर कानूनी प्रक्रिया शुरू करने की माँग की गई है। याचिका में कहा गया है कि इस अधिनियम को कभी चुनौती नहीं दी गई और न ही किसी अदालत ने न्यायिक तरीके से इस पर विचार किया। अयोध्या विवाद में भी उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने इस पर टिप्पणी की थी।

ज्ञानवपी मस्जिद में सतयुग से मौजूद हैं भगवान विश्वेश्वर: मुस्लिम पक्ष की याचिका ख़ारिज, हिन्दुओं को मिलेगा न्याय!

काशी ज्ञानवापी मस्जिद
वर्षों से लंबित अयोध्या में राममन्दिर का विवाद समाप्त होने बाद, अब वाराणसी में काशी विश्वनाथ चर्चा में आ गया है। अभी तक काशी पर कोर्ट ने स्टे दिया हुआ था, जिसकी अवधि समाप्त होने पर, यह मुकदमा पुनः चर्चित हो रहा है। 
वाराणसी की फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में स्वयंभू भगवान विश्वनाथ और यूपी सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के बीच मुकदमा चल रहा है। इस मामले में अंजुमन इंतेजामिया बनारस भी वक़्फ़ बोर्ड के साथ है। मुस्लिम पक्ष की माँग थी कि इस मामले में स्टे बरक़रार रहे लेकिन कोर्ट ने उनकी माँग ख़ारिज कर दी है। अब ज्ञानवापी मस्‍जि‍द के पुरातत्‍वि‍क सर्वेक्षण की वादी पक्ष की माँग पर अगली सुनवाई 17 फरवरी को होगी। प्रतिवादियों की याचिका ख़ारिज होने के बाद लोगों में उम्मीद बँधी है कि अब इस मामले में तेज़ी से सुनवाई होगी।
इस मामले में भगवान विश्वेश्वर पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील राजेंद्र प्रताप पांडेय पैरवी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अंजुमन इंतेजामि‍या बनारस और यूपी सुन्‍नी सेंट्रल चाहता था कि इस कार्यवाही को स्थगित कर दी जाए और आगे कोई सुनवाई न हो। कोर्ट द्वारा उनकी माँगें ख़ारिज किए जाने के बाद अब इस मामले में कार्यवाही चलेगी। नवम्बर 2019 में सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर के पक्ष में फ़ैसला आने के बाद अब लोगों के भीतर उम्मीद जगी है कि मथुरा व काशी विवाद में भी हिन्दुओं को न्याय मिलेगा।
काशी विश्वनाथ व ज्ञानवापी मस्जिद का मामला हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट, दोनों में ही चल रहा था। बाद में हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमा एक ही कोर्ट में चलेगा और सेशन कोर्ट में जारी रहेगा। वादी पक्ष की तरफ से पूरे ज्ञानवापी परिसर के एएसआई द्वारा भौतिक सर्वे कराने के लिए आवेदन दिया गया था, जिस पर मुस्लिम पक्ष ने आपत्ति जताई थी। उसका कहना था कि हाईकोर्ट के 1998 में दिए गए आदेश के अनुसार इस मामले में स्टे लगा हुआ है।
हिन्दू पक्ष का कहना है कि ये मामला हिन्दुओं की भावनाओं से जुड़ा हुआ है, इसीलिए एएसआई द्वारा सर्वेक्षण कराना ज़रूरी है। ज्ञानवापी मस्जिद भी काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में ही स्थित है। हिन्दुओं का मानना है कि विवादित परिसर में अभी भी स्वयंभू विश्वेश्वर विराजमान हैं।
अधिवक्ता राजेंद्र पांडेय का भी यही कहना है। पांडेय ने कहा कि शिवलिंग ज्ञानवापी में विराजमान है और वो स्वयंभू हैं क्योंकि वो स्वयं प्रकट हुए हैं। 17 फरवरी को फिर से बहस होगी, जिसमें एएसआई से सर्वेक्षण कराने को लेकर कोर्ट दोनों पक्षों की दलीलों को सुनेगी।
आखिर ये मुकदमा किस बात को लेकर है? इस सवाल के जवाब में अधिवक्ता राजेंद्र पांडेय ने बताया कि ज्ञानवापी में सतयुग से ही भगवान विश्वेश्वर विराजमान हैं और एएसआई के सर्वे के बाद इस मामले में सच्चाई समाने आ जाएगी। उनका कहना है कि उस परिसर के मालिक भी भगवान विश्वेश्वर ही हैं। लेकिन एक मंडप को तोड़ कर औरंगज़ेब ने मस्जिद खड़ी कर दी थी।