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काशी-मथुरा हिंदू देवताओं की जमीन पर हिंदुओं का अधिकार, क्यों वर्शिप एक्ट नहीं बन सकता इस्लामी बर्बरता की ढाल

ज्ञानवापी और शाही ईदगाह ढाँचा (फोटो साभार: डेक्कन हेराल्ड)
वाराणसी के विवादित ज्ञानवापी ढाँचा (Gyanvapi Controversial Structure, Varanasi) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित पूजास्थल कानून-1991 पर शुक्रवार (20 मई 2022) को टिप्पणी की। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी स्थान के धार्मिक चरित्र के निर्धारण को पूजास्थल अधिनियम-1991 प्रतिबंधित नहीं कर सकता।

वहीं, शाही ईदगाह ढाँचे और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर मामले में हिंदू पक्ष की याचिका को स्वीकार करते हुए मथुरा की कोर्ट ने भी कहा कि इसकी सुनवाई में पूजास्थल अधिनियम-1991 बाधा नहीं है। 

हालाँकि, दोनों ही मामलों में कोर्ट स्वीकार किया है कि यह कानून सुनवाई में बाधा नहीं बन सकता, लेकिन तकनीकी तौर यह अधिनियम भारतीय कानून का हिस्सा है और विभिन्न परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट अपने विवेक के आधार पर इसका प्रयोग कर सकता है। 






सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने पूजास्थल अधिनियम-1991 को असंवैधानिक बताया और कहा कि ऐसा कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है ही नहीं। उन्होंने कहा कि अवैध काम को वैध ठहराने के लिए सरकार कानून नहीं बना सकती। इस कानून द्वारा हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों को उनके धार्मिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया है। इसके साथ ही उन्होंने इस कानून पर न्यायपालिका पर चोट बताया है।

भाजपा तो इस कानून का शुरू से विरोध करती रही है। कॉन्ग्रेस की सरकार द्वारा इस बिल को पेश करने के दौरान ही बहस में तत्कालीन भाजपा सांसद उमा भारती ने इसे महाभारत के ‘द्रौपदी का चीरहरण’ कहा था। भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि इस कानून से जिन स्थानों पर तनाव नहीं है, वहाँ भी दोनों समुदायों में तनाव बढ़ेगा।

साबित करना होगा कि ज्ञानवापी और ईदगाह इस्लामिक लॉ के तहत मस्जिद है

ऑपइंडिया से बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय मथुरा, काशी, भद्रकाली, भोजशाला जैसे विवादों में कानूनन हिंदुओं के पक्ष को मजबूत बताया और कहा कि इसके प्रमाण इन जगहों पर उपलब्ध हैं। ये प्रमाण हिंदुओं के पक्ष को मजबूत करते हैं।

एडवोकेट उपाध्याय ने बताया, “ये सब स्थान मस्जिद नहीं हैं। इन्हें मस्जिद साबित करने के लिए सबसे पहले इस्लामिक लॉ से इन्हें प्रूव करना पड़ेगा। ये मंदिर हैं या नहीं है, इसे हिंदू लॉ से प्रूव करना है। कोई भी स्थान ऐसा नहीं हो सकता कि वह मंदिर भी हो और मस्जिद भी। वह या तो मंदिर होगा या मस्जिद। अगर यह मस्जिद है तो आपको (मुस्लिम पक्ष को) कुछ बातें साबित करनी पड़ेंगी।”

इस्लामिक कानून के तहत मस्जिद बनाने के लिए आवश्यक शर्त की बात करते हुए उन्होंने कहा, “मस्जिद बनाने के लिए सबसे पहले यह साबित करना होगा कि ये यह जमीन मेरी है या हमने इसे किसी से खरीदा या फिर किसी ने अपनी इच्छा (बिना डर-भय, लालच के) से इसे दान किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात साबित करना होगा कि वहाँ पहले कोई स्ट्रक्चर नहीं था। इस्लामिक लॉ में मस्जिद के लिए यह पहली कंडीशन होती है। धार्मिक स्ट्रक्चर तो होना ही नहीं चाहिए।”

 इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने आगे बताया, “अगर मकान, दलान, दुकान आदि कोई घरेलू ढाँचा है और वहाँ मस्जिद बनाना चाहते हैं…. मान लीजिए हमारे पास एक दुकान है और हम उसे अब नहीं चलाना चाहते और वहाँ एक मस्जिद बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले उस दुकान की एक-एक ईंट उखाड़नी पड़ेगी। इस्लामिक लॉ कहता है कि नींव में पहले के ढाँचे का एक ईंट भी नहीं होनी चाहिए। पहली ईंट जो लगनी चाहिए, वो मस्जिद के नाम की लगनी चाहिए।”

हिंदू कानून और इस्लामिक कानून के बीच फर्क का जिक्र करते हुए एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि मंदिरों में पहले मंदिर बन जाता है फिर नामकरण होता है, जबकि मस्जिदों में पहले नामकरण होता है फिर मस्जिद बनती है। इस्लामिक लॉ के तहत मस्जिद का जो नाम रख दिया जाता है, उसी के नाम की पहली ईंट मस्जिद निर्माण की नींव में रखी जाती है।

औरंगजेब और इतिहास को झूठा साबित करना होगा

अश्विनी उपाध्याय ने ज्ञानवापी मामले को लेकर ऑपइंडिया से कहा, “आप (मुस्लिम) कहते हैं कि ज्ञानवापी मस्जिद है तो आपको सबसे पहले औरंगजेब को झूठा साबित करना पड़ेगा। जो उसके इतिहासकार हैं, उनको झूठा साबित करना पड़ेगा। उसके ये भी साबित करना पड़ेगा कि फलाने आदमी ने जमीन दान किया या उससे खरीदा। यह भी साबित करना पड़ेगा कि फलाने बादशाह ने इस मस्जिद की पहली ईंट रखी थी यहाँ पर।”

ज्ञानवापी मामले में हिंदू पक्ष ने 20 मई को सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि इतिहासकार इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस्लामी शासक औरंगजेब ने 9 अप्रैल 1669 को एक आदेश जारी किया था, जिसमें उसके प्रशासन को वाराणसी में स्थित भगवान आदि विश्वेश्वर के मंदिर को ध्वस्त करने का निर्देश दिया गया था। आदि विश्वेश्वर के मंदिर पर 1193 ईस्वी से 1669 ईस्वी तक हमला किया गया, लूटा गया और ध्वस्त किया गया।

इसके साथ ही उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि औरंगजेब ने अपने फरमान में और मुगल इतिहासकारों के रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि औरंगजेब या उसके बाद के शासकों ने विवादित भूमि पर वक्फ बनाने या किसी मुस्लिम या मुस्लिम निकाय को जमीन सौंपने का आदेश दिया था। हिंदू पक्ष की ओर कोर्ट में शामिल अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने याचिका में अदालत को बताया कि फरमान की कॉपी कोलकाता के एशियाटिक लाइब्रेरी रखे होनी की जानकारी मिली है।

हिंदू देवता की एक बार जमीन, हमेशा के लिए उनकी जमीन

अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “हिंदू लॉ कहता है कि एक बार वहाँ भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा कर दिया, उसके बाद उसकी दीवार तोड़ दीजिए, गुंबद उड़ा दीजिए, नमाज पढ़िए चाहे उसकी नींव की एक-एक ईंट उखाड़ दीजिए वह मंदिर ही रहेगा। एक बार मंदिर हो गया तो वह किसी भी रूप में हमेशा मंदिर ही रहेगा। जब तक वहाँ से मूर्ति का विसर्जन नहीं होगा, तब तक वह मंदिर ही कहलाएगा।”

हिंदू पक्ष ने कहा कि मस्जिद सिर्फ वक्फ या मुस्लिम की जमीन पर बनाई जा सकती है। इस मामले में मंदिर की भूमि और संपत्ति अनादि काल से देवता की है। इसके साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि किसी मुस्लिम शासक या किसी मुस्लिम के आदेश के तहत मंदिर की भूमि पर किए गए निर्माण को मस्जिद नहीं माना जा सकता है।

ज्ञानवापी विवादित परिसर में अभी भी भगवान की पूजा होती है और श्रद्धालुओं द्वारा पंचकोशी परिक्रमा की जाती है। हिंदू कानून भी कहता है कि देवता की भूमि हमेशा देवता के नाम पर रहती है। विदेशी शासन आने के बाद भी देवता का अधिकार खत्म नहीं होता।

अगर विवादित स्थानों पर वर्तमान कानून, इस्लामिक कानून, हिंदू कानून और संविधान के अनुच्छेदों में प्रदत्त अधिकारों के उल्लंघन पर गौर करें तो स्पष्ट है कि इन मामलों में हिंदुओं का पक्ष मजबूत है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जिन-जिन स्थानों को विवादित माना जा रहा है, वहाँ हिंदू देवताओं एवं प्रतीकों के निशान आज भी मौजूद हैं।

योगेंद्र यादव की काशी-मथुरा पर हिंदुओं को धमकी : 500 साल बाद मुस्लिम लेंगे बदला

                                                                                                                         फोटो साभार: Mint
काशी में ज्ञानवापी मस्जिद का अंजाम क्या होगा, भविष्य के गर्भ में छुपा है, लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ सुरताल वह लोग मिला रहे हैं जो चुनाव में अपनी जमानत भी नहीं बचा सकता। बाबरी विवाद में भी यही हुआ था जब मुस्लिमों से अधिक भारतीय संस्कृति के दुश्मन जयचन्दी हिन्दू विरोध कर रहे थे। ठीक वही स्थिति अब काशी और मथुरा में भारतीय संस्कृति को संजोयने के विरुद्ध देखने को मिल रहा है। 

विवादित ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे में मिले शिवलिंग और मंदिर होने के अपार साक्ष्य मिलने पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के जेहादी चेहरा उजागर देखने को मिल रहा है। बौखलाहट में इन्हें नहीं मालूम कि क्या बोलना है। Republic Bharat पर चर्चा पर एक मुस्लिम वकील ने ज्ञानवापी को अरबी का ही लब्ज बताने पर तुरन्त हिन्दू पक्ष की साध्वी ने बताया "वकील साहब यह किसी अरबी, फ़ारसी, सऊदी अरब, तुर्की या मुगलिस्तान का नहीं संस्कृत शब्द है। दूसरे, India TV पर सौरभ शर्मा के शो में इस्लामिक स्कॉलर ने यह कहते हुए कि "अब एक इंच भी जमीन नहीं देंगे", नारा-ए-तकबीर के नारे लगा दिए; यह वही शख्स है जिसने तीन तलाक कानून पर किसी चैनल पर चल रही चर्चा के दौरान तीन तलाक कानून के समर्थक को जूता दिखाया था। इसी चैनल पर मीनाक्षी जोशी के शो में भी एक मुस्लिम स्कॉलर ने कहा कि "80%(हिन्दू) इस्लाम कबूलेंगे।" लेकिन कोई भी मस्जिद पक्षकार एक बात का जवाब देने में पूर्णरूप से असफल रह रहे हैं कि "वह विदेशी आक्रांताओं की क्रूरता के साथ हैं या विरुद्ध?"     

एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव ने 19 May 2022 को यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि हिंदू समुदाय जब बहुमत में नहीं रहेंगे तो उन्हें अपने पुराने काशी विश्वनाथ मंदिर को फिर से हासिल करने को लेकर इस्लामवादियों के क्रोध का सामना करना पड़ सकता है।

NDTV की न्यूज एंकर निधि राजदान से बात करते हुए योगेंद्र ने दावा किया, “जब उन्होंने (मुस्लिमों ने) शासन किया तो हम 500 वर्षों तक इनकी अवहेलना करते रहे और आज शासन है तो हम तय करेंगे कि क्या होगा। हमें मत रोको, क्योंकि 500 साल पहले आप किसी और को नहीं रोक सकते थे।”

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “मैं उन सभी दोस्तों और उत्साही लोगों से हाथ जोड़कर कहना चाहता हूँ कि कृपया याद रखें, यदि आप आज कुछ करना चाहते हैं क्योंकि आप बहुमत में हैं और आप अपना 500 साल पुराने अतीत को हासिल करना चाहते हैं। कृपया उसके बारे में सोचें, जब इसके 500 साल बाद क्या हो सकता है।”

योगेंद्र यादव ने जोर देकर कहा कि वाराणसी में विवादित ज्ञानवापी मस्जिद पर दावा करने के कारण 500 साल बाद इस्लामवादियों के हाथों हिंदुओं को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। उन्होंने पूछा, “क्या हम चाहते हैं कि इस खेल में हमारे बच्चे, हमारी आने वाली पीढ़ियाँ साल 2022 में जो हुआ उसकी कीमत चुकाएँ?।”

सीएए विरोधी उपद्रव, जिसके कारण दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगे हुए, उसमें सक्रिय भागीदार रहे एक्टिविस्ट यादव ने इस्लामिक आक्रमणकारियों द्वारा हिंदू मंदिरों के विध्वंस पर भी पर्दा डालने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कई मंदिर पवित्र बौद्ध और जैन मंदिरों के खंडहरों पर बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई कहता है कि जैन मंदिरों पर कई हिंदू मंदिर बने हैं तो क्या यह माँग करनी चाहिए कि सत्य की खोज के लिए उनकी खुदाई की जाए?

योगेंद्र यादव ने कहा कि इस देश को कहीं एक रेखा खींचनी है और वह रेखा 15 अगस्त 1947 होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “इस देश को कहना चाहिए कि हम अतीत में जाना बंद करें। उस समय जो कुछ भी हुआ- अच्छा या बुरा, वहां मौजूद है और हमें आगे बढ़ना चाहिए।”

इस बयान के बाद उन्होंने हिंदुओं को अपनी उन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासतों को, जिन्हें मुगलों ने ध्वस्त और बर्बाद कर दिया, फिर से हासिल करने के लिए परोक्ष रूप से धमकी दी। योगेंद्र यादव ने हिंदुओं को उस दौरान प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी, जब देश में मुस्लिम 500 साल पहले की तरह बहुसंख्यक हो जाएँगे। दरअसल, यादव हिंदुओं को अपनी धार्मिक विरासत को पुनः प्राप्त करने की कोशिश करने के लिए डरा रहे थे।

दिलचस्प बात यह है कि योगेंद्र यादव द्वारा हिंदुओं को परोक्ष धमकी देने के बाद नकली हार्वर्ड प्रोफेसर निधि राजदान ने कहा कि वह यह बहस इसलिए नहीं कर रही हैं, कि उनका हिंदुओं या उनकी आस्था के प्रति कोई विशेष संबंध नहीं है, बल्कि इसलिए कि उन्हें ‘अंतर्धार्मिक सद्भाव’ की चिंता है।

कांग्रेस क्यों लेकर आई The Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991?

                                                                                                                         फोटो साभार: टीवी9 
वाराणसी के ज्ञानवापी विवादित ढाँचे (Gyanvapi Controversial Structure in Varanasi) के वीडियोग्राफी सर्वे में शिवलिंग और अन्य हिंदू प्रतीकों को सामने आने के बाद इसे हिंदू समुदाय को सौंपने की माँग तेज हो गई है। वहीं, एक तरफ विरोधी मुस्लिम पक्ष शिवलिंग को फव्वारा बताकर तथ्यों को नकार रहा है तो दूसरी ओर उनके वकील पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 (The Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991) को आधार बनाकर ढाँचे के स्वरूप एवं मालिकाना हक को लेकर किसी भी तरह के बदलाव की गुंजाइश को खारिज कर रहे हैं।

इन तथ्यों का इतिहास साक्षी है कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने देश में आक्रमण करने के दौरान और उसके बाद भी सिर्फ धन-संपत्ति की ही लूट-पाट नहीं की थी, बल्कि अपने धार्मिक उन्माद के कारण हजारों-हजार की संख्या में मंदिरों का विध्वंस किया था और कई मंदिरों को मस्जिदों में रूपांतरित कर दिया था। इस बात के साक्ष्य आज भी देश की कई मस्जिदों में स्पष्ट नजर आते हैं और इन्हीं साक्ष्यों को आधार बनाकर हिंदू समुदाय अपनी धरोहर पर फिर से दावा ठोक रहा है। लेकिन, मुस्लिम समुदाय इस कानून को आधार बनाकर अड़ंगा डालने की कोशिश कर रहा है।

साल 1991 में जब कांग्रेस ने पूजास्थल अधिनियम लोकसभा में पेश किया गया था, तब मध्य प्रदेश के खजुराहो से भाजपा की तत्कालीन सांसद उमा भारती (Uma Bharati) ने इसका जमकर विरोध किया था। इस कानून से अयोध्या के तत्कालीन बाबरी ढाँचे और श्रीराम जन्मभूमि विवाद को अलग रखा गया था, लेकिन उमा भारती और भाजपा नेताओं ने वाराणसी के ज्ञानवापी ढाँचा-काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के ईदगाह ढाँचा-श्रीकृष्म जन्मभूमि जैसे विवादित स्थलों को भी अपवाद रखने की माँग की थी।

समस्त भाजपा एवं संघ विरोधी कुर्सी की खातिर मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक जनता को यह समझाने में असमर्थ हैं कि "यह लड़ाई किसी मुसलमान या इस्लाम के विरुद्ध नहीं, बल्कि विदेशी आक्रांताओं द्वारा भारतीय संस्कृति पर हुए अपमान यानि प्रहारों से मुक्त करवाने की है।" लेकिन विषय को हिन्दू बनाम मुसलमान बनाकर मालपुए खाने में लगे हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए, हिन्दू विरोध कांग्रेस के DNA में प्रारम्भ से ही रहा है, जो समय-समय पर उजागर होता रहा है, जिसे जनमानस आज तक नहीं समझ पाया। हिन्दू पक्षकारों को साम्प्रदायिक के नाम से सम्बोधित कर नफरत की गन्दी सियासत करती रही। यह वही कांग्रेस है, जब सोमनाथ जीणोद्धार के बाद जब तत्कालीन प्रथम महामहिम डॉ राजेंद्र प्रसाद को निमंत्रण देने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने डॉ राजेंद्र को वहां जाने से रोकने के लिए साम्प्रदायिक दंगों का डर दिखाने का प्रयास किया था, लेकिन राजन बाबू उद्धघाटन करने गए। क्या उस समय देश में कोई दंगा हुआ? नहीं, क्यों? क्योंकि उस समय सख्त प्रशासक महामहिम डॉ राजेंद्र प्रसाद और उप-प्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री सरदार पटेल थे, आज की तरह कुर्सी के भूखे नेता नहीं। जनता को विशेषरूप से इस बात को समझना होगा कि जो नेता एवं पार्टी देश की संस्कृति को नहीं संजो सकते, जनता का हित नहीं कर सकते। जयचंदों और मीर ज़ाफरों से सावधान रहने की जरुरत है। 


कुर्सी के भूखे इन नेताओं ने रामजन्मभूमि मुद्दे को भी झूठ बोल-बोलकर इतना विवादित बना दिया था कि मुसलमान हिन्दू को इस्लाम विरोधी समझने लगा। तथाकथित ज्ञानवापी मस्जिद में मिले अपार प्रमाणों को कोई पहली बार नहीं झूठलाया जा रहा, अयोध्या में हुई खुदाई में मिले अपार प्रमाणों को भी कोर्ट तक से छुपाया था। लेकिन Archaelogical Survey of India के तत्कालीन निदेशक के के मोहम्मद ने तमिल भाषा में लिखी अपनी पुस्तक में स्पष्ट रूप से उल्लेख कर इन सबको बेनकाब किया है। 

पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम का उमा भारती ने किया था विरोध

पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम को 9 सितंबर 1991 को लोकसभा में पेश किया गया था। बहस के दौरान उमा भारती ने इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा था कि इसमें जिस तरह से अयोध्या को छूट दी गई है, उसी तरह काशी के विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर को भी छूट मिलनी चाहिए। उन्होंने इस बिल को महाभारत के ‘द्रौपदी चीरहरण’ बताते हुए सदन के सभी सदस्यों से इसका विरोध करने का आग्रह किया था।

बिल का लोकसभा में विरोध करते हुए उमा भारती ने कहा था, “मैं ज्ञानवापी के दर्शन के लिए वाराणसी गई थी। मैंने मंदिर के अवशेषों पर बनी मस्जिद को देखा तो मेरे शरीर में क्रोध की लहर दौड़ गई। मुझे अपने पूर्वजों के भाग्य पर शर्मिंदगी महसूस हुई, जो मुझे लगता है कि मेरी नारीत्व को चुनौती दे रहे थे और मुझसे पूछ रहे थे कि औरंगजेब का इरादा केवल एक मस्जिद बनाने का था तो मंदिर के अवशेष क्यों छोड़े गए?”

उन्होंने इतिहास के पन्ने पलटते हुए कहा था, “क्या औरंगजेब का इरादा मंदिर के अवशेषों पर मस्जिद को खड़ा करके हिंदुओं को उनके ऐतिहासिक भाग्य की याद दिलाते रहना और मुस्लिमों की आने वाली पीढ़ियों को उनके अतीत के गौरव और शक्ति की याद दिलाना नहीं था?”

उमा भारती ने तर्क दिया था कि गाँवों में बैलगाड़ियों के मालिक बैलों की पीठ पर घाव बना देते हैं और जब वे चाहते हैं कि उनकी बैलगाड़ी तेज चले तो वे घाव पर वार करते हैं। इसी तरह, ये विवाद ‘भारत माता’ पर घाव और गुलामी के निशान हैं। जब तक बनारस में ‘ज्ञानवापी’ अपनी वर्तमान स्थिति में बनी रहेगी, तब तक यह हिंदुओं को औरंगजेब द्वारा किए गए अत्याचारों की याद दिलाती रहेगी।

भाजपा ने बिल के विरोध में सदन से किया था वॉकआउट

लोकसभा में इस बिल के पेश होने पर बहस में सिर्फ 21 सांसदों ने हिस्सा लिया था, जिनमें 4 सांसदों ने विरोध किया था। विरोध करने वालों में भाजपा के तीन और शिवसेना के सांसद शामिल थे। भाजपा की ओर तत्कालीन सांसद लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, राम नाईक और मदन लाल खुराना और शिवसेना की ओर से अशोक आनंदराव देशमुख शामिल थे।

लोकसभा में बिल के पेश होने के बाद भाजपा नेता संसद से वॉकआउट कर गए थे। उनका नेतृत्व लालकृष्ण आडवाणी ने किया था, जबकि राज्यसभा में भाजपा नेता सिकंदर बख्त ने भाजपा की ओर से विरोध की कमानी संभाली थी। हालाँकि, 9 सितंबर के अगले दिन यानी 10 सितंबर को यह बिल लोकसभा में पास हो गया। यह बिल राज्यसभा में भी 12 सितंबर 1991 को ही पास हो गया।

तब भाजपा नेता लालकृष्ण आवाणी ने कहा था, “मुझे नहीं पता कि यह विधेयक कितना मददगार बनेगा, लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूँ कि हम उन समस्याओं को हल नहीं कर रहे हैं, जो सभी तनावों के पीछे हैं। हम इस विधेयक को उन जगहों पर तनाव पैदा करने के लिए पारित कर रहे हैं, जहाँ यह समस्या नहीं है।”

क्यों लाया गया था यह बिल?

साल 1986 में अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि का ताला खोले जाने के बाद भाजपा ने अपने राम मंदिर आंदोलन को गति देना शुरू कर दिया था। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए देश भर के लोगों का समर्थन जुटाने के लिए रथयात्रा का ऐलान किया गया। इस रथयात्रा के संयोजक वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे।

लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ मंदिर में पूजा कर अपनी रथयात्रा की शुरुआत की। यह रथयात्रा दिल्ली सहित 8 राज्यों से होते हुए 30 अक्टूबर को अयोध्या में खत्म होनी थी। देश भर में राम नाम का गुणगान हो रहा था और बच्चे-बच्चे की जुबान पर राम का नाम था। गाँव के आखिरी व्यक्ति तक राममंदिर को लेकर उत्साह था। इसको देखकर कांग्रेस और वामपंथियों में खलबली मच गई। 

इसी बीच तत्कालीन प्रधानममंत्री राजीव गाँधी की हत्या हो गई और सहानुभूति की लहर पर सवार कॉन्ग्रेस को 1991 के लोकसभा चुनावों में 232 सीटें मिलीं। पहली बार गाँधी-नेहरू परिवार अलग हटकर दक्षिण भारत के कांग्रेस नेता पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस ने केंद्र में सरकार बनाई। सरकार बनने के बाद कांग्रेस सरकार ने इस बिल को सदन में लाने का निर्णय लिया।

बिल का समर्थन करते हुए तत्कालीन गृहमंत्री और कांग्रेस नेता एसबी चव्हाण ने कहा था, “पूजा स्थलों के रूपांतरण के संबंध में समय-समय पर होने वाले विवादों को देखते हुए इसके लिए उपाय करना आवश्यक है, ताकि भविष्य में सांप्रदायिक माहौल ना खराब हो।”

तब भाजपा नेता उमा भारती ने तर्क दिया था कि यह कानून बिल्ली-कबूतर की स्थिति जैसी है। उन्होंने कहा था कि बिल्ली को आता देख कबूतर अपनी आँखें बंद कर लेता है और सोचता है कि वह सुरक्षित हो गया, लेकिन ऐसा नहीं होता। उन्होंने कहा कि 1947 की तरह धार्मिक स्थलों पर यथास्थिति बनाए रखना, बिल्लियों के आगे बढ़ने के खिलाफ कबूतरों की तरह आँखें बंद करने जैसा है। यह आने वाली पीढ़ियों के बीच तनाव को बनाए रखेगा।

इस बिल का कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर और गुलाम नबी आजाद ने खुलकर समर्थन किया था। मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि इस बिल का पेश होना धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक साथ आने और सांप्रदायिक ताकतों से लड़कर सांप्रदायिकता की राजनीति से छुटकारा पाने का अवसर है।

क्या है पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991

पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार द्वारा लाए गए पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम में कहा गया है कि 15 अगस्त 1947 तक अगर किसी धर्म का कोई पूजास्थल है तो उसे दूसरे धर्म के पूजास्थल में नहीं बदला जा सकता। कानून में इसके लिए एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना का प्रावधान किया गया है। इस कानून में अयोध्या को अलग रखा गया है, क्योंकि उस समय यह मामला कोर्ट में था।

इस कानून की धारा-2 में कहा गया है कि अगर 15 अगस्त 1947 में मौजूद किसी धार्मिक स्थल में बदलाव को लेकर अगर किसी अदालत, न्यायाधिकरण या अन्य प्राधिकरण में कोई याचिका लंबित है तो उसे रद्द किया जाएगा। कानून की धारा-3 में कहा गया है कि किसी पूजास्थल को पूरी तरह या आंशिक रूप से दूसरे धर्म के पूजास्थल में नहीं बदला जा सकता है।

वहीं, इस कानून के धारा-4(1) में कहा गया है कि किसी भी पूजास्थल का चरित्र देश की स्वतंत्रता के दिन का वाला ही रखना होगा। इस कानून का धारा-4(2) उन मुकदमों, अपीलों और कानूनी कार्यवाहियों पर रोक लगाता है, जो पूजास्थल कानून के लागू होने की तिथि पर लंबित थे।

पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को कोर्ट में चुनौती

भाजपा और दक्षिणपंथी संगठनों के लिए यह कानून शुरू से ही विवाद का विषय रहा है। भाजपा ने कानून के पहले दिन से ही इसका विरोध किया है। भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इस कानून को निरस्त करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की है। इसके अलावा, इस कानून के खिलाफ याचिका लखनऊ के विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ ने भी दायर की है।

इन याचिकाओं में कहा गया है कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाता है, जो कि संविधान की बुनियादी विशेषता है। इसके साथ ही यह कानून जो तिथि निश्चित करता है, वह हिन्दू, जैन, बुद्ध और सिख धर्मावलंबियों के अधिकारों को सीमित करता है।

अश्विनी उपाध्याय द्वारा मार्च 2021 में दायर की गई याचिका में कहा गया है कि इस कानून के प्रावधान मनमाने और असंवैधानिक हैं। यह कानून हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध लोगों को उनके पूजास्थलों पर हुए अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कोर्ट जाने से रोकता है। उन्होंने कहा है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26, 29 और 49 का उल्लंघन करता है।

असंवैधानिक है पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991: अश्विनी उपाध्याय

ऑपइंडिया से बात करते हुए भाजपा नेता और कानूनविद अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि इस कानून को बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास नहीं है। यह कानून पब्लिक ऑर्डर (कानून व्यवस्था) बनाए रखने की आड़ में बनाया गया, जबकि कानून-व्यवस्था स्टेट सब्जेक्ट है, केंद्र का सब्जेक्ट नहीं।

उन्होंने कहा, “यह कानून धार्मिक स्थान की यथास्थिति के नाम पर बनाया गया है। भारत से बाहर के धार्मिक स्थल केंद्र सरकार का विषय है, भारत के अंदर के नहीं। जैसे पाकिस्तान स्थिति नानकाना साहिब, चीन स्थित कैलाश मानसरोवर, कंबोडिया स्थित मंदिर, हज आदि से संबंधित कानून बनाने का अधिकार भारत सरकार के पास है। भारत के अंदर तीर्थ स्थानों को लेकर कानून बनाने का अधिकार राज्य के पास है।”

तीसरा, पार्लियामेंट कानून बनाकर अवैध काम को वैध नहीं बना सकता। कानून बनाकर वह ऐतिहासिक गलतियों को सही नहीं कर सकता। ऐतिहासिक गलतियों को सुधारना सरकार का काम है, उस पर ठप्पा लगाना सरकार का काम नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर धार्मिक स्थलों की स्थिति के लिए अगर इस कानून में कटऑफ तय करना ही था तो वह 15 अगस्त 1947 नहीं हो सकता। कायदे से कटऑफ डेट इसकी 1192 ईस्वी होनी चाहिए।

हिंदू-बौद्ध-जैन-सिखों के धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन

ऑपइंडिया से बातचीत में अश्विनी उपाध्याय ने बताया कि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल संरचना है। पूजास्थल कानून कहता है कि धार्मिक स्थलों को लेकर जो मुकदमा चल रहा है, वह खत्म हो जाएगा और आगे से कोई मुकदमा दर्ज नहीं होगा। यह कानून न्यायिक समीक्षा को ही खत्म कर रहा है। संविधान का एक स्तंभ न्यायपालिका है, यह उसी पर चोट कर रहा है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक देशों में विवाद का समाधान कोर्ट के जरिए नहीं होगा तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा और भीड़तंत्र हावी हो जाएगा।

अश्विनी उपाध्याय ने आगे कहा, “न्यायिक समीक्षा संविधान के अनुच्छेद 14 का हिस्सा है। हमारे देवी-देवता ज्यूरिस्टिक पर्सन हैं। इनको भी वैधानिक अधिकार है, संपत्ति का अधिकार है। इस कानून के जरिए राम और कृष्ण के बीच भेद करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, क्योंकि यह कानून (पूजास्थल कानून, 1991) कहता है कि अयोध्या का मामला इस कानून के दायरे में नहीं आएगा, लेकिन मथुरा पर लागू होगा। इस तरह राम और कृष्ण के बीच में भेदभाव लागू कर दिया गया।”

अपनी याचिका में दिए गए तथ्यों पर बात करते हुए उन्होंने आगे बताया, “अनुच्छेद 15 कहता है कि हमारे यहाँ (हिंदू धर्म) में जो मंदिर या मठ की जमीन होती है, वह उस देवता के नाम पर होती है। जो जमीन मंदिर के देवता के नाम पर एक बार चली गई, वह हमेशा मंदिर के देवता के नाम पर रहती है। उसे छीन नहीं सकते। उस संपत्ति को मैनेजमेंट कमिटी मैनेज तो करती है, लेकिन उसका मालिकाना हक मैनेजमेंट कमिटी के पास नहीं होता। जैसे कि अयोध्या मंदिर की जमीन को कोई पुजारी या महात्मा नहीं बेच सकता। वह भगवान राम के नाम पर जमीन है।”

एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 में राइट टू जस्टिस (न्याय का अधिकार) है। कोर्ट जाना, वहाँ दलील देना और वहाँ से न्याय लेना इसमें आता है। लेकिन यह कानून कोर्ट का दरवाजा ही बंद कर दे रहा है। इसलिए इसमें संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो रहा है।

कानून को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को हनन करने वाला बताते हुए उन्होंने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है। इसके तहत हमें (हिंदू), बौद्ध, जैन, सिख को अपने धर्म का पालन करना, उसका प्रचार-प्रसार करना, पूजा करना, परिक्रमा करना, रीति-रिवाज मानना आदि का अधिकार है। जब हमारे महादेव या कृष्ण या किसी देवता का स्थान ही कब्जे में होगा तो हम अपने अनुच्छेद 25 का पालन कैसे कर पाएँगे? इसलिए इस कानून से हमारे अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।”

इसके साथ ही उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 26 का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 26 अपने धार्मिक स्थानों के रख-रखाव का अधिकार देता है। उन्होंने पूछा कि जब उसका (मंदिर का) मालिकाना हक ही हिंदुओं के पास नहीं है तो उसका रख-रखाव कैसे होगा। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 26 का खुला उल्लंघन बताया।

भाजपा नेता उपाध्याय ने कहा, “संविधान का अनुच्छेद 29 कहता है कि इस देश में हमें अपनी संस्कृति को बचाने व उसका संरक्षण करने का अधिकार है। यह राइट टू कल्चर कहलाता है। कृष्ण जन्मभूमि दुनिया में एक ही है, मथुरा में। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का कोई स्थानापन्न (सब्सिट्यूट) नहीं है। कृष्ण का कोई दूसरा मंदिर, मथुरा का सब्सिट्यूट नहीं हो सकता। इस तरह यह कानून हमें अपने कल्चर को फॉलो करने से रोक रहा है।”

उन्होंने कहा कि संविधान का आर्टिकल 49 कहता है कि सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वह सांस्कृतिक धरोहरों को वह संजोए, उनका रख-रखाव करे। काशी-मथुरा, भद्रकाली, भोजशाला आदि सब सांस्कृतिक धरोहर हैं। ये सब धार्मिक के साथ-साथ सांस्कृतिक विषय भी हैं।

इस्लामिक कानून के तहत साबित करना होगा कि वहाँ मस्जिद थी

मथुरा, काशी, भोजशाला जैसे मंदिरों की चर्चा करते हुए अश्विनी उपाध्याय ने ऑपइंडिया को बताया, “ये सब स्थान मस्जिद हैं नहीं। इन्हें मस्जिद प्रूव करने के लिए सबसे पहले इस्लामिक लॉ से प्रूव करना पड़ेगा। मंदिर है या नहीं है, ये हिंदू लॉ से प्रूव करना है। कोई भी स्थान ऐसा नहीं हो सकता कि वह मंदिर भी हो और मस्जिद भी हो। वह या तो मंदिर होगा या मस्जिद। अगर यह मस्जिद है तो आपको (मुस्लिम पक्ष को) चार बातें साबित करनी पड़ेंगी।”

इस्लामिक कानून के तहत मस्जिद बनाने के लिए आवश्यक शर्त की बात करते हुए उन्होंने कहा, “मस्जिद बनाने के लिए सबसे पहले यह साबित करना होगा कि ये कि यह जमीन मेरी है या हमने इसे किसी से खरीदा या फिर किसी अपनी इच्छा (बिना डर-भय, लालच के) से इसे दान किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात कि वहाँ पहले कोई स्ट्रक्चर नहीं था। इस्लामिक लॉ में मस्जिद के लिए यह पहली कंडीशन होती है। धार्मिक स्ट्रक्चर तो होना ही नहीं चाहिए। अगर किसी मकान, दलान, दुकान आदि घरेलू ढाँचा है और वहाँ मस्जिद बनाना चाहते हैं…. मान लीजिए हमारे पास एक दुकान है और हम उसे अब नहीं चलाना चाहते और वहाँ एक मस्जिद बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले उस दुकान की एक-एक ईंट उखाड़नी पड़ेगी। इस्लामिक लॉ ये कहता है कि नींव में पहले के ढाँचे का एक ईंट भी नहीं होनी चाहिए। पहली ईंट जो लगनी चाहिए, वो मस्जिद के नाम की लगनी चाहिए।”

हिंदू कानून और इस्लामिक कानून के बीच फर्क का जिक्र करते हुए एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि मंदिरों में पहले मंदिर बन जाता है फिर नामकरण होता है, मस्जिदों में पहले नामकरण हो जाता है फिर मस्जिद बनती है। मस्जिद का जो नाम रख दिया जाता है, उसी के नाम की पहली ईंट नींव में रखी जाएगी।

ज्ञानवापी मामले में मुस्लिमों को औरंगजेब के इतिसकारों को झूठा साबित करना होगा: उपाध्याय

अश्विनी उपाध्याय ने ज्ञानवापी मामले को लेकर ऑपइंडिया से कहा, “आप (मुस्लिम) कहते हैं कि ज्ञानवापी मस्जिद है तो आपको सबसे पहले औरंगजेब को झूठा साबित करना पड़ेगा। जो उसके इतिहासकार हैं, उनको झूठा साबित करना पड़ेगा। उसके ये भी साबित करना पड़ेगा कि फलाने आदमी ने जमीन दान किया या उससे खरीदा। यह भी साबित करना पड़ेगा कि फलाने बादशाह ने इस मस्जिद की पहली ईंट रखी थी यहाँ पर।”

ज्ञानवापी को मंदिर बताते हुए उन्होंने कहा, “हिंदू लॉ कहता है कि एक बार वहाँ भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा कर दिया, उसके बाद उसकी दीवार तोड़ दीजिए, गुंबद उड़ा दीजिए, नमाज पढ़िए चाहे उसकी नींव की एक-एक ईंट उखाड़ दीजिए वह मंदिर ही रहेगा। एक बार मंदिर हो गया तो वह किसी भी रूप में हमेशा मंदिर ही रहेगा। जब तक वहाँ से मूर्ति का विसर्जन नहीं होगा, तब तक वह मंदिर ही कहलाएगा।”

मुस्लिम पक्ष को पता है कि कानून गलत है, इसलिए PIL का विरोध नहीं किया: उपाध्याय

अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि उपरोक्त ग्राउंड पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में पूजास्थल कानून, 1991 के खिलाफ PIL दाखिल किया है। मुस्लिम पक्ष ने इस PIL का अभी तक विरोध नहीं किया है। अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, “उन्हें पता है कि पूजास्थल कानून घटिया है, इसलिए इसका विरोध नहीं किया। जबसे मैंने PIL दाखिल किया है, दो साल में ये लोग सुप्रीम कोर्ट आ गए होते। अगर कोई इसका विरोध नहीं किया तो इसका मतलब है कि मेरे द्वारा दिए गए तथ्यों का कोई जवाब नहीं है।”

एडवोकेट उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस जारी किया है। इसको लेकर उपाध्याय का कहना है कि सरकार ने दो साल से इस नोटिस का जवाब नहीं दिया है। इसका मतलब है कि ऊपर दिए गए जो तथ्य उठाए गए हैं, उसका सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। इसलिए जवाब नहीं आया।

उन्होंने बताया कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को संसद में बिल द्वारा खत्म किया जा सकता है या सुप्रीम कोर्ट इस कानून को खत्म कर सकता है। उन्होंने कहा कि उनकी PIL यानी, इस विवादित कानून पर सुनवाई पूरे हुए ज्ञानवापी या मथुरा के ईदगाह मस्जिद को लेकर सुनवाई पूरी नहीं हो सकती।(एजेंसीज इनपुट्स सहित)

मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करने का ऐलान, धारा-144 लागू

उत्तर प्रदेश के मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ऐसे में 6 दिसंबर से पहले वहाँ धारा-144 लागू कर दी गई है। पुलिस-प्रशासन लोगों से अपील कर रहा है कि वो 6 दिसंबर को होने वाले किसी कार्यक्रम में शामिल न हों। बता दें कि ये वही दिन है, जब 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ था। हिन्दू संगठनों ने मथुरा के शाही ईदगाह मस्जिद में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करने का ऐलान किया था, जिसके बाद प्रशासन सतर्क हो गया है।

ये मस्जिद श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के पास में ही स्थित है। औरंगजेब ने मंदिर तोड़ कर इसे बनवाया था। SSP गौरव ग्रोवर ने बताया कि धारा-144 पहले से ही लागू है और अगर कोई व्यक्ति अफवाहें फैलाने में संलिप्त पाया जाता है तो उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि शहर के शांतिपूर्ण माहौल में खलल डालने का कार्य बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पुलिस को सूचना मिली है कि कुछ संगठन 6 दिसंबर को शाही ईदगाह मस्जिद तक पैदल मार्च की योजनाएँ बना रहे हैं।

SSP ने जनता से आग्रह किया है कि वो कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस की सहायता करे। साथ ही उन्होंने बताया कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों से भी संपर्क स्थापित कर के उनके अंदर आत्मविश्वास भरा गया है। सर्कल इंस्पेक्टर (सिटी) अभिषेक तिवारी ने कहा कि किसी को भी कोई गलत हरकत करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों से मिल कर उन्हें बताया कि पुलिस ने जगह-जगह चेकपॉट्स लगा दिए हैं।

अवलोकन करें:-

श्रीकृष्ण जन्मभूमि : ‘नहीं हटना चाहिए मथुरा का शाही ईदगाह मस्जिद’ : महेश पाठक, वरिष्ठ कांग्रेस न

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काशी, मथुरा की लड़ाई : क्यों एक फैसला, फैसला न होकर बन गया तुष्टिकरण ?

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अयोध्या एक झांकी थी, 

17वीं शताब्दी में मंदिर को खंडित कर के अतिक्रमण की गई भूमि पर बनाई गई इस मस्जिद को हटाने को लेकर अदालत में मामला चल रहा है। पुलिस ने कहा कि 6 दिसंबर को किसी भी कार्यक्रम की ौमती नहीं दी गई है। 53 साल पहले मंदिर और मस्जिद प्रबंधन के बीच एक सहमति पर हस्ताक्षर हुआ था। ‘कौमी एकता मंच’ ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अतिरिक्त सुरक्षा की तैनाती की माँग की है। 60 साल पुरानी संस्था ‘ऑल इंडिया तीर्थ पुरोहित महासभा’ ने शांति की अपील की है और याद दिलाया है कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

‘श्रीकृष्ण मंदिर पर बने ईदगाह मस्जिद में नमाज पढ़ने पर लगे रोक, मंदिर के चिह्नों को मिटा रहे मुस्लिम’

मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि एवं ईदगाह मस्जिद
 (साभार: दैनिक जागरण)
मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर बने विवादित शाही ईदगाह मस्जिद में नमाज पढ़ने को लेकर आपत्ति दर्ज कराते हुए इस पर रोक लगाने की माँग की गई है। हिंदुओं का कहना है कि ईदगाह में पहले कभी नमाज नहीं पढ़ी गई, लेकिन पिछले कुछ समय से इस विवादित मस्जिद में पाँचों वक्त की नमाज पढ़ी जाने लगी है। इस संबंध में श्रीकृष्ण मुक्ति आंदोलन समिति के अध्यक्ष एडवोकेट महेंद्र प्रताप सिंह ने जिलाधिकारी के नाम एक प्रार्थना पत्र एडीएम को सौंपा है।

एडवोकेट महेंद्र प्रताप सिंह ने प्रार्थना पत्र में कहा है कि शाही ईदगाह मस्जिद भगवान श्रीकृष्ण के मूल गर्भगृह पर बनी हुई है। इसकी जमीन को लेकर विवाद चल रहा है, जो न्यायालय में है। उन्होंने कहा कि विवाद के बावजूद पिछले कुछ दिनों से ईदगाह मस्जिद में पाँच वक्त नमाज पढ़ी जाने लगी है। इसके पहले इस मस्जिद में कभी नमाज नहीं पढ़ी गई। उन्होंने तर्क दिया कि इस हरकत से सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ने का खतरा बन गया है।

महेंद्र प्रताप सिंह ने प्रार्थना पत्र में तर्क दिया कि ईदगाह मस्जिद भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर एक हिस्से को तोड़कर बनाया गया है। क्रूर मुस्लिम आक्रांता औरंगजेब ने मंदिर को तोड़कर ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया था। उन्होंने कहा कि मस्जिद के दीवारों पर आज भी मंदिर के अवशेष के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि इसके दीवारों पर शंख, चक्र आदि स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। मुस्लिम पक्ष जान-बूझकर इन चिह्नों को मिटाने की कोशिश कर रहा है। इसलिए ईदगाह में नमाज पढ़ने से रोकना बहुत जरूरी है।

वहीं, अखिल भारत हिंदू महासभा ने 6 दिसंबर को ईदगाह पर ठाकुर जी का अभिषेक करने का निर्णय लिया गया। महासभा ने एक स्वर में कहा कि ईदगाह पर ठाकुर जी का अभिषेक बिना किसी तोड़फोड़ के शांति से संपन्न किया जाएगा।

इधर श्रीकृष्ण विराजमान प्रकरण मेें 24 नवंबर को भी जिला जज की अदालत में मुस्लिम पक्ष ने दावे की कमियाँ गिनाईं। अदालत ने बहस पूरी होने के लिए दो दिसंबर की तारीख नियत की है। उधर, जिला जज ने अभी तक इस संबंध में दायर सभी दावों की सूची माँग ली है। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री द्वारा पेश किए गए श्रीकृष्ण जन्मस्थान की 13.37 एकड़ जमीन के दावे की स्वीकारोक्ति संबंधी न्यायिक प्रक्रिया बुधवार को जारी रही।

‘मथुरा-काशी बाकी है’: 1947 का वो यज्ञ जब 3 दोस्तों ने खींचा हिंदुओं के 3 पवित्र स्थल को वापस पाने का खाका

                जब अयोध्या के साथ ही पड़ी थी काशी विश्वनाथ मंदिर और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव
यह तो पहली झाँकी है, मथुरा-काशी बाकी है। ये नारा तो बहुत बाद में बुलंद हुआ। उससे बरसों पहले तीन दोस्तों ने अयोध्या के साथ-साथ इन दो हिन्दू पवित्र स्थलों को वापस पाने का एक विस्तृत खाका तैयार कर लिया था। हालाँकि राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए पहले से ही संघर्ष जारी था। पर इनकी योजना की वजह से आजाद भारत में यह सिरे चढ़ा।

5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर भूमिपूजन के बाद फिर से मथुरा-काशी को वापस पाने की बातें जोर-शोर से होने लगी है। मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के लिए तो बकायदा एक ट्रस्ट भी बनाया गया है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट से 14 राज्यों के 80 संत-महामंडलेश्वर जुड़े हैं। आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए हस्ताक्षर अभियान शुरू करने की योजना बनाई गई है।

वास्तव में विवाद को जन्म देने वाले कोई अन्य नहीं, वरन मुस्लिमों से अधिक हिन्दू ही हैं जो कुर्सी की खातिर इस्लामिक कट्टरपंथियों के हाथ कठपुतली बन अपने पूज्यनीय पुरुषोत्तम श्रीराम को ही दांव पर लगा बैठे। राम विरोधी हिन्दू ही रामजन्म स्थान पर लाइब्रेरी, अस्पताल और न जाने क्या-क्या बनाने के लिए बोलते थे, आज वही लोग राम के चौदह वर्ष वनवास उपरांत होने वाली दीपावली पर छोड़ी जाने वाली आतिशबाज़ी पर विवाद करने से बाज़ नहीं आ रहे। देखिए सोशल मीडिया पर वायरल होता वीडियो: 

दूसरे, जब रामजन्मभूमि आन्दोलन अपने चरम पर था, उस समय हिन्दू संगठनों की खुली मांग थी कि "सम्मान से हमारे तीन प्रमुख तीर्थ अयोध्या, काशी और मथुरा दे दो, नहीं तो पूरे 6000 अपने धार्मिक स्थल जिन्हे मस्जिद, दरगाह और कब्रिस्तानों में बदल दिया है लेकर रहेंगे।", लेकिन कुर्सी के भूखे नेता तब भी अपनी नींद से नहीं जागे, और मुसलमानों को भड़काकर अपनी गन्दी और ओछी सियासत खेलते रहे, निहत्ते रामभक्तों पर गोलियां चलवाकर तुष्टिकरण करते रहे।  

वैसे, तुलसी दास लिख गए हैं;

झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाई महा अहि हृदय कठोरा॥

यह भी कि; 
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेतॉं नाहिं।
द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलजुग माहिं॥

यानी, ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सतयुग और त्रेता में नहीं होते। द्वापर में थोड़े से होंगे और कलियुग में तो इनके झुंड-झुंड होंगे। 

असल में हिंदुओं के इन पवित्र स्थलों को वापस पाने की योजना एक खेल से भी जुड़ी हुई है। यह खेल है 12वीं सदी में उत्तरी फ्रांस से शुरू हुआ ‘जिउ दी पौमे’ (हथेली का खेल), जो 16वीं सदी में इंग्लैंड पहुँच टेनिस हो गया। 78 फीट लंबे और 27 फीट चौड़े कोर्ट में खेले जाने वाले लॉन टेनिस को अंग्रेज 1880 के दशक में हिंदुस्तान लेकर आ गए थे। 1920 आते-आते भारत ने डेविस कप में भाग लेना भी शुरू कर दिया था। हालाँकि भारतीय लॉन टेनिस का इतिहास भले 100 साल से भी पुराना हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाप छोड़ने वाले हम चुनिंदा खिलाड़ी ही पैदा कर पाए हैं।

लेकिन, इस खेल ने हिंदू जीवन दर्शन के तीन पैरोकारों को इतनी प्रगाढ़ता से जोड़ा कि इसने आजाद भारत में अयोध्या के राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव डाल दी। ये तीन दोस्त थे, बलरामपुर स्टेट के महाराजा पटेश्वरी प्रसाद सिंह, नाथपंथी कनफटा साधुओं की शीर्ष पीठ गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ और इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) के अधिकारी केकेके नायर। महाराजा घुड़सवारी और लॉन टेनिस में पारंगत थे। महंत लॉन टेनिस के माहिर और नायर का भी इस खेल से लगाव था।

महाराजा हिंदू जीवन दर्शन के प्रचार-प्रसार को समर्पित थे। महंत तो बकायदा हिंदू महासभा के अधिकारी ही थे। नायर भी हिंदू महासभा के संपर्क में थे। लेकिन, कहते हैं कि तीनों की दोस्ती का आधार लॉन टेनिस के प्रति इनका लगाव ही था।

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखा है कि 1947 के शुरुआती दिनों में महाराजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया। केरल के एलप्पी के रहने वाले नायर जो 1930 में सिविल सर्विस से जुड़े थे, उस समय सरयू के उस पार फैजाबाद से सटे गोंडा जिले में तैनात थे। यज्ञ में महाराजा के गुरु स्वामी करपात्री जी भी शामिल हुए।

अंजुल भर भिक्षा लेने के कारण करपात्री कहलाए स्वामी जी सिद्ध दंडी संन्यासी, उद्भट विद्वान और प्रखर वक्ता थे। ‘रामराज्य और मार्क्सवाद’ नामक बहुचर्चित किताब उनकी ही लिखी है। 1940 में बनारस में हिंदू परंपराओं की रक्षा के लिए उन्होंने ‘धर्मसंघ’ की स्थापना की और 1941 में बनारस से दैनिक अखबार ‘सन्मार्ग’ शुरू किया। राजनीति में धर्म को उचित स्थान दिलाने के लिए ‘रामराज्य परिषद’ बनाया। 1951 में इस परिषद के 24 सदस्य राजस्थान विधानसभा के लिए चुने गए थे। कई लोग इस राजनीतिक दल के बैनर तले संसद भी पहुॅंचे।

शर्मा के मुताबिक उन्हें खुद स्वामी करपात्री ने बताया था कि राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव उसी यज्ञ में पड़ी थी। नायर वहाँ पहले से थे और यज्ञ समाप्ति से एक दिन पहले महंत दिग्विजय नाथ भी पहुँच गए। उन हिंदू धर्म स्थलों की मुक्ति पर चर्चा हुई, जिन पर इस्लामी अक्रांताओं ने कब्जा किया था।

इसके बाद नायर एक विस्तृत योजना के साथ स्वामी करपात्री और महंत दिग्विजय नाथ से मिले। उन्होंने अयोध्या के साथ-साथ वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि को दोबारा हासिल करने का खाका पेश किया। नायर ने वादा किया कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वे अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार हैं। नौकरी भी।

संयोग से 1 जून 1949 को नायर फैजाबाद के कलेक्टर बने। वहाँ सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह और अभिराम दास पहले से ही राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए प्रयासरत थे। मैथिल ब्राह्मण अभिराम दास नागा वैरागी यानी रामानंद संप्रदाय के 15 साल पुराने खाड़कू थे। हिंदू महासभा से जुड़े होने के कारण महंत दिग्विजय नाथ के करीबी थे। उनकी ख्याति राम जन्मभूमि के ‘उद्धारक’ के तौर पर थी। कहते हैं कि 3 दिसंबर 1981 को जब अभिराम दास की अंतिम यात्रा निकली तो ‘राम नाम’ की जगह ‘राम जन्मभूमि के उद्धारक अमर रहे’ की गूँज हर ओर से आ रही थी।

नायर के फैजाबाद में तैनाती के कुछ महीने बाद ही 22-23 दिसंबर 1949 की दरम्यानी रात रामलला भाइयों के साथ विवादित गुंबद के भीतर प्रकट हुए। नायर ने उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दबाव के बावजूद मूर्तियों को हटाने से इनकार कर दिया था। 1952 में जब फैजाबाद से उनका तबादला कर दिया गया तो उन्होंने नौकरी ही छोड़ दी।

रामलला के वकील एससी वैद्यनाथन सुप्रीम कोर्ट को बता चुके हैं कि राम का जन्म बाबरी मस्जिद के गुंबद के नीचे हुआ था। भारतीय पुरातत्व विभाग की खुदाई से मिले सबूत भी बताते हैं कि बाबरी मस्जिद के नीचे जो स्ट्रक्चर था उसकी बनावट उसमें मिली भगवान की तस्वीरें, मूर्तियॉं सब पहले से मंदिर के होने की गवाही देते हैं। लेकिन, आपत्ति जताने वाले यह भी पूछते हैं कि एक ही कालखंड में होने के बावजूद तुलसीदास ने राम मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बनाए जाने का जिक्र क्यों नहीं किया?

उत्तर प्रदेश : बागपत : मस्जिद में हनुमान चालीसा पढ़ने की इजाजत देने वाले मौलाना को हटा दिया

भाजपा नेता ने मस्जिद में पढ़ी हनुमान चालीसा (चित्र साभार- न्यूज़ 18)
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में सौहार्द का हवाला देते हुए विनयपुर गाँव की मस्जिद में हनुमान चालीसा पढ़ने की इजाजत देने वाले मौलाना को मस्जिद से निकाल दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर मौलाना अपना पूरा सामान लेकर गाजियाबाद स्थित लोनी चला गया है। 

मन्दिर में नमाज पढ़ने पर सौहार्द की दुहाई देने वाले मस्जिद में हनुमान चालीसा और गायत्री मन्त्र पढ़ने की इजाजत देने वाले मौलाना को मस्जिद से बर्खास्त किए जाने पर क्यों चुप्पी साधे हुए हैं? अब कहाँ गया उनका सौहार्द? क्यों इजाजत देने पर मौलाना को मस्जिद से बर्खास्त किया गया? आखिर एक ही तरफ से सौहार्द की कामना क्यों? क्या यह मथुरा के नंदगांव स्थित नंदबाबा मंदिर में नमाज पढ़ने किसी षड़यंत्र को प्रमाणित नहीं कर रहा, कि देखो यह एक मस्जिद थी, जिस पर हिन्दुओं ने जबरदस्ती कब्ज़ा कर लिया? क्योंकि अगर यह मस्जिद नहीं थी, फिर किस आधार पर 2020 में मंदिर में नमाज पढ़ने की इजाजत दी?   

मथुरा के नंदगाँव स्थित नंदबाबा मंदिर परिसर में नमाज अदा करने के चर्चित प्रकरण के बाद अब बागपत के विनयपुर गाँव की मस्जिद में हनुमान चालीसा और गायत्री मंत्र पढ़ा गया। मस्जिद में भाजपा की जिला कार्यकारिणी सदस्य एवं जनसंख्या फाउंडेशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनुपाल बंसल ने इसे फेसबुक पर ‘लाइव’ भी किया। एसपी अभिषेक सिंह का कहना है कि जाँच कराई गई है। मौलाना से अनुमति लेने के बाद ही पाठ किया गया। 

बागपत में खेकड़ा क्षेत्र के विनयपुर गाँव में भाजपा नेता मनुपाल बंसल मंगलवार (नंवबर 3, 2020) को मस्जिद में पहुँचे। उनका कहना है कि मौलाना अली हसन से इजाजत लेने के बाद उन्होंने भाईचारे के लिए पवित्र स्थान मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ किया। हनुमान चालीसा के पाठ को फेसबुक पर लाइव किया गया। गायत्री मंत्र भी पढ़ा गया।

मस्जिद में हनुमान चालीसा के पाठ की अनुमति देने वाला
मौलाना बर्खास्त (साभार - dainik jagran)
मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा आयोजित की गई गोपनीय बैठक में मौलाना को हटाने का निर्णय लिया गया। वहीं दूसरी तरफ हिन्दू समुदाय के लोग मौलाना को समर्थन देने के लिए पंचायत की तैयार पूरी कर चुके हैं।

दरअसल बागपत में खेकड़ा क्षेत्र के विनयपुर गाँव में भाजपा की जिला कार्यकारिणी सदस्य एवं जनसंख्या फाउंडेशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनुपाल बंसल मंगलवार (नंवबर 3, 2020) को मस्जिद में पहुँचे थे। उनका कहना था कि मौलाना अली हसन से इजाजत लेने के बाद उन्होंने भाईचारे के लिए पवित्र स्थान मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ किया। हनुमान चालीसा के पाठ को फेसबुक पर लाइव किया गया और गायत्री मंत्र का पाठ भी किया गया था। 

इसे लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ भी सामने आई थीं। मनुपाल बंसल जिला पंचायत चुनाव की तैयारियाँ में भी जुटे हुए हैं। एसपी अभिषेक सिंह का कहना है कि पुलिस ने जानकारी मिलते ही मामले की जाँच कराई। मौलाना की सहमति ली गई थी। मनुपाल बंसल विनयपुर की मस्जिद में जाते रहते हैं।

इस वीडियो में वह यह भी अपील कर रहे थे कि कोई ऐसे मामलों को तूल न दें और लोग आपसी सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखें। उन्होंने लोगों से अपील की कि सभी लोग भाईचारे से रहें। कोई तर्क-वितर्क न करें, हम सब हिंदुस्तानी हैं, कोई किसी पर कटाक्ष न करें।

वहीं, मस्जिद के मौलाना अली हसन ने कहा था कि ऊपर वाले का नाम कहीं भी बैठकर लिया जा सकता है। सब जगह उसकी बनाई हुई है। उन्होंने ही मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठन करने की इजाजत दी थी। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। सभी लोग भाईचारे से काम लें।

इससे पहले उत्तर प्रदेश में मथुरा के एक मंदिर में नमाज पढ़ने के बाद गोवर्धन इलाके की ईदगाह में चार युवकों ने हनुमान चालीसा का पाठ किया। ईदगाह मस्जिद में मंगलवार (नवंबर 3, 2020) सुबह किए गए इस हनुमान चालीसा पाठ का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो पुलिस एक्शन में आई और तत्काल चारों युवकों को हिरासत में ले लिया गया। 

काशी, मथुरा की लड़ाई : क्यों एक फैसला, फैसला न होकर बन गया तुष्टिकरण ?

अयोध्या एक झांकी थी, मथुरा और काशी अभी बाकी है 
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मामले का सुप्रीम कोर्ट का फैसला नवम्बर 2019 में ही आ चुका है, जिसके बाद न सिर्फ यहाँ राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ बल्कि अगस्त 2020 में भूमिपूजन भी हुआ। लेकिन क्या आपको याद है कि इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का क्या फैसला था? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरी जमीन को तीन हिस्सों में बाँटने का निर्देश दिया था। रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और बाबरी पक्ष को ज़मीन बाँट दी गई थी।

इस फैसले के बाद हिन्दुओं ने गजब का संयम दिखाया क्योंकि बाबरी विध्वंस के बाद पुलिस-प्रशासन को आशंका थी कि कोई सांप्रदायिक घटना हो सकती है। क़ानूनी रूप से शांतिपूर्ण तरीके से मुद्दे को सुलझाने के लिए रामलला विराजमान ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहाँ उन्हें जीत मिली। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तो काफी बात हो चुकी है, लेकिन हमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी याद करने की ज़रूरत है।

अयोध्या राम मंदिर मामला: क्या था इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का सार ये था कि हिन्दू और मुस्लिम, ये दोनों ही इस विवादित जमीन (तब) के बराबर के हकदार हैं। निर्मोही अखाड़े ने दलील दी थी कि वो अनंत काल से इस स्थल की देखभाल और प्रबंधन का काम करता आ रहा है। मुस्लिम पक्ष को पूरा एक तिहाई हिस्सा दिया गया था। हिन्दू पक्ष की दलील थी कि जहाँ बाबरी मस्जिद का गुम्बद स्थित था (जिसे दिसंबर 1992 में ध्वस्त किया गया), वहीं रामलला का जन्म हुआ था।

हाईकोर्ट ने कहा कि चूँकि सदियों से हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोग इसका प्रयोग करते आ रहे हैं, इसीलिए दोनों का ही इस पर अधिकार है। राम चबूतरा, सीता रसोई, भंडार और बाहर की खुली जगह निर्मोही अखाड़े को मिली। हालाँकि, कोर्ट ने ये भी कहा था कि 1993 के अयोध्या एक्ट के तहत जिस पक्ष को नुकसान हुआ हो, उसकी भरपाई के लिए कुछ एडजस्टमेंट्स किए जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहित की गई भूमि को भी हिन्दुओं और मुसलमानों, दोनों के लिए व्यवस्थित करते हुए प्रवेश और निकासी के लिए अलग-अलग प्रबंध करने के साथ-साथ ये भी कहा था कि दोनों से एक-दूसरे को कोई समस्या नहीं आनी चाहिए। साथ ही पूरी भूमि के आधिकारिक बँटवारे के लिए स्पेशल ड्यूटी ऑफिसर और रजिस्ट्रार के पास जाने को कहा गया था। वहाँ इसकी औपचारिकता पूरी होनी थी।

तीन जजों में से एक जस्टिस एसयू खान ने कहा था कि विवादित ढाँचा मस्जिद था और मस्जिद को बनाने के लिए किसी मंदिर को ध्वस्त नहीं किया गया। उनका कहना था कि मंदिर के अवशेषों का उपयोग मस्जिद बनाने के लिए हुआ। उनका मानना था कि स्वामित्व साबित करने में दोनों समुदाय विफल रहे। उनका कहना था कि 1949 के पहले से मस्जिद के गुम्बद को भगवान श्रीराम का सटीक जन्मस्थान माना जाने लगा।

जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने जस्टिस एसयू खान की इन बातों से सहमति जताई- मस्जिद के गुम्बद को भगवान श्रीराम का जन्मस्थान माना जाता है, विवादित ढाँचे को मुस्लिमों ने हमेशा से मस्जिद ही माना है और इसका कोई सबूत नहीं कि बाबर ने 1528 में इसे बनाया। लेकिन हाँ, उन्होंने जस्टिस एसयू खान की उस बात से सहमति नहीं जताई कि मंदिर को तोड़ कर मस्जिद नहीं बना था। उनका कहना था कि मंदिर को तोड़ा गया था।

वहीं जस्टिस डीवी शर्मा ने माना कि न तो ये विवादित ढाँचा मस्जिद था और न ही इसे बाबर ने बनवाया था। उन्होंने ASI के सर्वे के हवाले से माना कि विवादित ढाँचे के निर्माण के लिए मंदिर को तोड़ा गया था। उन्होंने स्तम्भों पर बने हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरों को देख कर कहा कि ये इस्लामी स्थापत्य का हिस्सा नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि यहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग 1528 से नमाज नहीं पढ़ते थे।

जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने कहा था कि 1996 में सिविल जजों के उस फैसला का भी समर्थन किया था, जिसमें कहा गया था कि ये वक़्फ़ की संपत्ति नहीं है। चूँकि अयोध्या के रामलला नाबालिग हैं, इसीलिए उन्होंने टाइटल डेक्लेरट्री के परिसीमन के लिमिटेशंस उनके लिए लागू न होने की बात कही। उन्होंने रामजन्मभूमि के खुद के अपने-आप में एक देवता होने की बात का भी समर्थन किया था। उन्होंने इस स्थान को ईश्वरीय आत्मा के प्रतीक के रूप में माना।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजमेंट और तीनों जजों के विचारों को देख कर ऐसा लगता है कि उन्हें सब कुछ पता था, लेकिन सभी पक्षों को खुश करने के लिए भूमि को तीनों पक्षों में बाँट दिया गया। जस्टिस शर्मा द्वारा कही गई कई बातें सुप्रीम कोर्ट में उठीं और हिन्दू पक्ष ने इसके माध्यम से दलीलें भी पेश कीं। तो इस तरह से ये फैसला न होकर तुष्टिकरण बन गया। इसके पीछे सांप्रदायिक तनाव का भय था या कुछ और, ये चर्चा का विषय है।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को क़ानूनी रूप से ‘Unsustainable’ बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि अगर ये सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए था, तो भी ये साध्य नहीं था। उसका कहना था कि 1500 स्क्वायर यार्ड्स की भूमि को तीन हिस्सों में बाँटना अंततः शांति बनाए रखने के लिए भी ठीक नहीं था। इसको बाँट देने से किसी भी पक्ष का भला नहीं होगा, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने कहा था।

कैसे अलग था अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अब जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को 10 साल बीत चुके हैं, ये कहा जा सकता है कि इस मामले को उस दौरान इस तरह से ट्रीट किया गया, जैसे ये दो पड़ोसियों के मामूली जमीन विवाद का झगड़ा हो और दोनों ठीक रह सकें, इसीलिए दोनों में जमीन बाँट दी गई। जबकि, सच्चाई ये है कि राम सहस्रों वर्षों से भारत में पूजे जाते रहे हैं और 100 करोड़ हिन्दुओं के देश में उनके ही आराध्य की जमीन का अतिक्रमण कर लिया गया, और उन्हें कहा जाए कि आधा-आधा बाँट लो?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पुराने जमाने के घुमंतुओं द्वारा लिखी गई बातों और गुरु नानक देव की अयोध्या यात्रा सहित कई साक्ष्यों का अध्ययन किया। जहाँ अयोध्या में ही मस्जिद के लिए अलग भूमि उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया, वहीं पूरी विवादित भूमि हिन्दुओं को दी गई। सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद ट्रस्ट का गठन हुआ। राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने का कार्य तो पहले से ही चालू था, अब इसका शिलान्यास भी हो गया।

सबसे बड़ी बात कि इस पर सुप्रीम कोर्ट को घेरने के लिए लिबरलों के पास केवल वही सब मुद्दे थे, जिनके आधार पर वो हर चीज का विरोध करते हैं। समरसता की बातें की गई। मुस्लिम समुदाय के लोगों में से कई ने इसे शरिया के खिलाफ बताया। कइयों ने बाबरी ध्वंस का मुद्दा उठाया। कुछ ने कहा कि जहाँ मस्जिद है, वहाँ आदिकाल तक मस्जिद ही रहती है। वही पुराने राग अलापने वालों ने कोई सटीक तर्क नहीं दिया। यहाँ बहस की एक घटना का जिक्र करना ज़रूरी है:

अधिवक्ता वैद्यनाथन ने ‘स्कन्द पुराण’ का उदाहरण देते बताया कि काफी पहले से सरयू में स्नान कर भगवान श्रीराम जन्मभूमि के दर्शन की परंपरा रही है। जब जस्टिस अशोक भूषण ने पूछा कि ‘स्कन्द पुराण’ कब लिखा गया था तो वैद्यनाथन ने बताया कि ये महाभारत काल में महर्षि वेद व्यास द्वारा लिखा गया। जब फिर सवाल हुआ कि इसमें देवता के दर्शन की बात क्यों नहीं है, तो वकील ने बताया कि पूरी जन्मभूमि ही देवता है।

जस्टिस भूषण ने पूछा कि इस मंदिर को बाबर ने तोड़ा था कि औरंगजेब ने, तो वैद्यनाथन ने बताया कि इस बारे में भ्रम है लेकिन ये सर्वविदित है कि अयोध्या के राजा श्रीराम थे। फ्रेंच ट्रेवलर विलियम फिंच ने अपनी भारत यात्रा (1608-11) में अयोध्या मंदिर का जिक्र किया है। जोसफ ताईफ़ेंटालर की पुस्तक का हवाला दिया गया, जिसमें भगवान श्रीराम के मंदिर के तोड़े जाने और उनमें लोगों की अटूट आस्था होने का जिक्र है।

सार ये कि सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट को ज़मीन का बँटवारा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये जमीन का झगड़ा नहीं था। ये अपनी आस्था के लिए, विदेशी अतिक्रमण से हुए नुकसान को ठीक करने के लिए और इतिहास में हुई गलतियों को ठीक करने के लिए लड़ी गई लड़ाई थी। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट में इस पर व्यापक बहस हुई। कोर्ट को बताया गया कि मथुरा और काशी की तरह ही साकेत भी हिन्दुओं की आस्था का केंद्र था।

काशी-मथुरा की मुक्ति के बिना अधूरा है राम मंदिर

जब आप संस्कृत के प्राचीनकाल में सबसे लोकप्रिय व्याकरणविद पाणिनि को पढ़ेंगे तो पाएँगे कि उनके समय में मथुरा का वैभव ऐसा था, जैसा 16वीं शताब्दी की शुरुआत में विजयनगर और रोम का रहा होगा। मथुरा का फैलाव काफी बड़ा था, वहाँ ब्राह्मणों की बड़ी-बड़ी बस्तियाँ थीं और व्यापार का वो उस समय का सबसे बड़ा केंद्र था। ‘अष्टाध्यायी’ में मथुरा की भव्य परंपरा का विस्तृत वर्णन किया गया है।

ठीक इसी तरह काशी के वैभव का जिक्र सभी शैव ग्रंथों में है। मथुरा और काशी के बारे में एक और अच्छी बात ये है कि इसके प्रमाण लगभग कई सारे हिन्दू धर्म-ग्रंथों में हैं और अयोध्या से कहीं ज्यादा इसके साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं। महाभारत में मथुरा का वर्णन है। मोक्षदायिनी काशी का वर्णन कई पुराणों में है। ऐसे में अब जब इन दोनों स्थलों की मुक्ति के प्रयासों का आगाज हो चुका है, इस राह में एक बहुत बड़ी बाधा भी है।

वो बाधा है – ‘‘उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 {Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991}, जिसके तहत किसी भी धार्मिक स्थल में परिवर्तन नहीं किया जा सकता, वो वैसा ही रहेगा, जैसा वो आज़ादी के समय था। वहाँ यथास्थिति बनी रहेगी। लेकिन, ये पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के अंतर्गत आने वाले स्थलों पर लागू नहीं होता। अयोध्या को इससे छूट दी गई थी, इसीलिए उसका केस लड़ा जा सका।

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने दिसंबर 2019 में इसमें संशोधन करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखते हुए कहा था कि ये उनके पूजा करने के मूल अधिकारों का उल्लंघन है और आपत्तिजनक है। उनका कहना था कि ‘फंडामेंटल राइट्स’ में संसद कोई बदलाव नहीं कर सकता है। उनका कहना था कि अनुच्छेद 25-26 ‘फ्रीडम ऑफ वरशिप’ प्रदान करता है, इसीलिए कोई इसे रद्द नहीं कर सकता है।

जहाँ काशी के शिवलिंग को स्वयंभू माना गया है और कहा गया है कि वो स्वयं प्रकट हुए हैं, वहाँ के ज्ञानवापी मस्जिद को देख कर ही पता चलता है कि उसका निचला हिस्सा मंदिर का है, जिसे तोड़ कर मस्जिद बनाया गया। दूसरी तरफ मथुरा के लिए अखाड़ा परिषद पक्षकार बनने के लिए विचार कर रहा है। वहाँ औरंगजेब ने मंदिर तोड़ कर शाही ईदगाह मस्जिद बनवाई थी। इसके लिए सिविल सूट भी दायर हो चुका है।

हम इसके लिए प्रार्थना कर सकते हैं कि राम मंदिर में जितने हिन्दुओं ने अपना खून बहाया, वैसा काशी-मथुरा के लिए न हो क्योंकि अब तक जिन्होंने बलिदान दिया है, उन्होंने सिर्फ अयोध्या के लिए ही नहीं दिया था। कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह हों या राम मंदिर के लिए अपनी सरकार कुर्बान कर देने वाले कल्याण सिंह – इतिहास में कुछ भी छिपा नहीं है। बाबरी ध्वंस के दौरान अपना खून बहाने वाले अशोक सिंघल से लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ने वाले 92 वर्षीय के पराशरण, इन वरिष्ठों का योगदान जाया न गया था और न जाएगा।

राम मंदिर के लिए संघर्ष करने वालों की गाथाओं से हम आपको समय-समय पर परिचित कराते रहे हैं, जिनमें किशोर कुणाल और केके मुहम्मद जैसे बुद्धिजीवियों से लेकर कोठरी भाइयों के बलिदान तक शामिल हैं। ये भगीरथ प्रयास, बलिदान और संघर्ष अयोध्या-काशी-मथुरा, इन तीनों के लिए था। इसीलिए, अयोध्या की लड़ाई तब तक अधूरी है, जब तक काशी और मथुरा का अतिक्रमण ख़त्म नहीं हो जाता।

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फ़िलहाल मथुरा को लेकर सक्रियता दिख रही है। तभी एक तरफ इकबाल अंसारी कह रहा है कि मंदिर-मस्जिद की बात करने वाले देश की तरक्की रोक रहे, तो असदुद्दीन ओवैसी 1991 के क़ानून और मथुरा में 50 के दशक में हुए समझौते का हवाला दे रहा। कांग्रेस नेता महेश पाठक खुद को पुरोहितों का प्रतिनिधि बता कर श्रीकृष्ण जन्मभूमि याचिका की निंदा कर रहे। जो भी हो, फ़िलहाल तो – ‘काशी-मथुरा बाकी है।‘