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पाकिस्तान में सैनेटरी पैड पर 40% ‘Period Tax’ का मामला पहुँचा सुप्रीम कोर्ट: Menstrual Hygiene में कितना पीछे है इस्लामी मुल्क?


पाकिस्तान में महिलाओं को हर महीने एक स्वाभाविक प्रक्रिया माहवारी (पीरियड) का सामना करना पड़ता है। इस प्रक्रिया शुरू होने पर महिला अपने आपको पूर्ण समझती है। एक समय था जब माहवारी को गुप्त रखा जाता था, लेकिन पश्चिमी सभ्यता के चलते आधुनिकता के नाम पर सैनिटरी पैड का विज्ञापन होने से अब कोई छुपने वाली चीज नहीं रही। लेकिन इस स्वाभाविक प्रक्रिया को देखने का समाज-व्यवस्था और सरकार का रवैया अक्सर आसान नहीं रहा। हाल में 25 वर्षीय वकील और कार्यकर्ता महनूर ओमर ने सरकार के सामने ‘पीरियड टैक्स’ नामक एक बड़ी चुनौती उठाई है। वकील महनूर ने कोर्ट में याचिका दायर की है कि सैनिटरी पैड्स पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर (टैक्स और कस्टम ड्यूटी) लगभग 40 प्रतिशत तक पहुँच जाते हैं, जिससे गरीब और ग्रामीण महिलाएँ इन तक पहुँच नहीं पातीं।

सरकार ने इस बात पर अभी तक प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं कि मासिक धर्म गृहस्थी का हिस्सा है, न कि कोई ‘लक्जरी’ चीज। पैड पर टैक्स लगने का अर्थ है- ‘महिलाओं को अपनी बॉडी बायोलॉजी पर अर्थव्यवस्था का बोझ देना’ और यह सामाजिक और आर्थिक असमानता को बढ़ावा देता है।

पीरियड्स टैक्स और इसे लग्जरी मानने का विवाद

पाकिस्तान में माहवारी प्रबंधन का सबसे बड़ा रोड़ा उच्च कर यानि हाई टैक्स हैं। जबकि दुनिया के कई देश, जैसे केन्या, भारत, UK, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, कोलंबिया और दक्षिण अफ्रीका, इस ‘पिंक टैक्स’ को समाप्त कर चुके हैं, पाकिस्तान सरकार सैनिटरी पैड्स को ‘आवश्यक वस्तु’ नहीं मानती है।

इसके विपरीत, सरकार गाय के वीर्य (cattle semen), दूध और पनीर जैसी चीजों को टैक्स-मुक्त रखती है, जबकि पैड्स को इत्र और कॉस्मेटिक्स जैसे ‘लग्जरी सामान’ की श्रेणी में रखकर उन पर भारी टैक्स लगाती है।

सरकार का यह फैसला कि सैनिटरी पैड जरूरी चीज नहीं, बल्कि लग्जरी (ऐश-आराम की चीज) है, पूरी तरह बेतुका है। यह असल में महिलाओं के साथ एक तरह का छिपा हुआ भेदभाव है। एक्टिविस्ट महनूर ओमर ने इसी बात पर सरकार को कोर्ट में घसीटा है। उनका कहना है कि जो चीज हर महीने महिलाओं के लिए जिंदगी की जरूरत है, उस पर टैक्स लगाना उनकी इज्जत (गरिमा) छीनने जैसा है।

सोचिए, एक महिला अपने जीवन के 16 से 17 साल तक पीरियड्स में रहती है। ऐसे में, इन जरूरी चीजों पर टैक्स लगाना दिखाता है कि नीतियाँ बनाते समय सरकार महिलाओं की जरूरतों को नजरअंदाज कर रही है। इसे ही ‘लिंग-अंध नीति‘ कहते हैं यानी ऐसी नीतियाँ जो सिर्फ पुरुषों या आम जनता को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। इसीलिए महनूर ओमर और ‘माहवारी जस्टिस’ जैसे ग्रुप इस गलत टैक्स को खत्म करवाने के लिए लड़ रहे हैं।

आँकड़े बताते हैं दर्द भरी कहानी: सेहत और पढ़ाई पर कैसा असर

ये सारे सरकारी नियम (टैक्स) कितने खराब हैं, ये जानने के लिए हमें इन बड़े आँकड़ों को देखना होगा। टैक्स लगने की वजह से सैनिटरी पैड इतने महँगे हो जाते हैं कि लाखों गरीब महिलाएँ उन्हें खरीद ही नहीं पातीं। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि पैड पर इतना ज्यादा टैक्स लगता है कि उनकी कीमत बाजार में 40% तक बढ़ जाती है। इस महँगाई का सीधा हमला महिलाओं की सेहत पर होता है।

पैड महँगे होने के कारण, खासकर गाँवों में, बहुत कम महिलाएँ पैड इस्तेमाल कर पाती हैं, सिर्फ 16.2% महिलाएँ। जब पैड नहीं मिलते, तो मजबूरन लड़कियाँ और महिलाएँ पुराने कपड़े या दूसरे गंदे/खराब सामान इस्तेमाल करती हैं। इससे उन्हें भयानक संक्रमण (Infection) होने और लंबे समय तक प्रजनन अंगों (Reproductive Health) में बड़ी समस्या होने का खतरा दोगुना हो जाता है। 2022 की बाढ़ जैसी मुश्किल घड़ी में, जब सब कुछ बह गया था, तब तो महिलाओं को और भी गंदी चीजें इस्तेमाल करनी पड़ी थीं।

यह समस्या लड़कियों की पढ़ाई भी बर्बाद कर रही है। जब पीरियड्स शुरू होते हैं, तो हर पाँच में से एक लड़की स्कूल नहीं जाती या स्कूल छोड़ देती है, क्योंकि उनके पास पैड नहीं होते और उन्हें शर्म आती है। 79% महिलाएँ कहती हैं कि वे पीरियड्स के दौरान सामाजिक गतिविधियों या काम में भाग नहीं ले पातीं। इसका मतलब है कि वे अपनी पढ़ाई का पूरा एक साल तक खो देती हैं। दुख की बात यह भी है कि लगभग 41% लड़कियों को तो पहली बार पीरियड्स आने से पहले पता ही नहीं होता कि यह क्या है, क्योंकि कोई उनसे बात ही नहीं करता। यह दिखाता है कि हमें न सिर्फ पैड सस्ते करने हैं, बल्कि सही जानकारी भी देनी है।

शर्म की दीवार और सरकार की अनदेखी

टैक्स की मुश्किल अपनी जगह है, लेकिन पाकिस्तान में एक और बहुत बड़ी रुकावट है, वह है पीरियड्स के बारे में फैली हुई चुप्पी और शर्म (Taboo)। माहवारी को आज भी समाज में ‘गंदा’ और ‘छुपकर बात करने वाला’ विषय माना जाता है। इस वजह से कोई भी इस पर खुलेआम बात नहीं करना चाहता। जब लोग बात नहीं करते, तो सरकार भी इस पर ध्यान नहीं देती।

इसी अनदेखी का नतीजा है ‘नीतिगत शून्यता‘। इसका सीधा मतलब है कि पाकिस्तान की सरकार के पास माहवारी स्वास्थ्य प्रबंधन (MHH) को सुधारने के लिए कोई राष्ट्रीय योजना, कोई बड़ा कानून या कोई साफ रणनीति ही नहीं है। जब कोई सरकारी प्लान नहीं होता, तो समस्या वैसी की वैसी बनी रहती है और लाखों महिलाएँ अपनी सेहत से जुड़ी इस सबसे जरूरी चीज के लिए जूझती रहती हैं।

लेकिन अच्छी बात यह है कि बदलाव की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। ‘माहवारी जस्टिस’ जैसे नौजवानों के संगठन इस चुप्पी को तोड़ रहे हैं। ये लोग गरीब और पिछड़ी जगहों पर माहवारी के बारे में सही जानकारी दे रहे हैं और जरूरी सामान (पैड्स) भी बाँट रहे हैं। इसके अलावा, सिंध प्रांत में एक अच्छा काम हुआ है। उन्होंने स्कूलों के रिकॉर्ड सिस्टम में ‘माहवारी सुविधाओं’ को शामिल करना शुरू कर दिया है ताकि पता चल सके कि स्कूलों में लड़कियों के लिए कितनी सुविधाएँ हैं।

वहीं, UNICEF जैसी संस्थाएँ सरकार से कह रही हैं कि टैक्स कम करो ताकि पैड सस्ते और आसानी से मिल सकें। ये सारे प्रयास और महनूर ओमर की कानूनी लड़ाई इस बात पर जोर देती है कि पीरियड्स का सही इंतजाम करना सिर्फ सफाई की बात नहीं है, बल्कि यह हर महिला का बुनियादी स्वास्थ्य अधिकार (Basic Health Right) है।

मामला सिर्फ पैसे का नहीं, बल्कि हक और सम्मान का है

पीरियड्स पर टैक्स क्यों नहीं लगना चाहिए?

पहला और सबसे जरूरी विचार यह है कि माहवारी यानी पीरियड्स एक कुदरती काम है। यह कोई शौक या लग्जरी (ऐश-आराम) की चीज नहीं है जिसके लिए औरतों को ज़्यादा टैक्स भरना पड़े। सैनिटरी पैड महिलाओं की बुनियादी जरूरत है, जैसे रोटी, कपड़ा और मकान। यह चीज उनकी सेहत, सफाई और इज्जत (गरिमा) से जुड़ी है। जब सरकार इस पर टैक्स लगाती है, तो वह इसे एक जरूरी चीज मानने से मना कर देती है। यह साफ तौर पर दिखाता है कि यहाँ भेदभाव हो रहा है।

टैक्स का बोझ, औरतों की जिंदगी पर असर
दूसरा बड़ा विचार यह है कि यह भारी टैक्स असमानता को बढ़ाता है। अगर पैड की कीमत में 40% हिस्सा टैक्स का है, तो सोचिए कि गरीब घरों की और गाँव की लड़कियाँ इसे कैसे खरीदेंगी? जब वे पैड नहीं खरीद पातीं, तो उन्हें गंदे और असुरक्षित तरीके अपनाने पड़ते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि उनकी सेहत खराब होती है, उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ता है और उनका आत्म-विश्वास कम हो जाता है। यानी, टैक्स सीधे तौर पर लैंगिक असमानता (Gender Inequality) को बढ़ावा दे रहा है।

सरकार की नीतियाँ क्यों ‘अंधी’ हैं?

तीसरा विचार यह है कि हमारी नीतियाँ बनाने वाले लोग, अक्सर पुरुषों की नजर से सोचते हैं। जब वे कोई टैक्स नियम बनाते हैं, तो वे बस यह देखते हैं कि सरकार की कितनी कमाई होगी, वे यह नहीं देखते कि उस टैक्स का बोझ किस पर पड़ेगा। इसीलिए महनूर ओमर ने कहा, “जब महिलाएँ मंत्री और बड़ी नेता हैं, तब भी ऐसी नीतियाँ बिना किसी सवाल के पास हो जाती हैं।” यह दिखाता है कि सरकार की सोच अभी भी ‘लिंग-अंधी’ (Gender Blind) है, जो महिलाओं की खास जरूरतों को नजरअंदाज कर देती है।

सिर्फ टैक्स हटाना काफी नहीं 

चौथा अहम विचार यह है कि सिर्फ टैक्स हटा देने से समस्या खत्म नहीं होगी। हमें समाज को भी बदलना होगा। माहवारी पर खुलकर बात करनी होगी, स्कूलों-कॉलेजों में लड़कियों को सही जानकारी देनी होगी और सबसे जरूरी, हर स्कूल और पब्लिक जगह पर साफ-सुथरे, अलग शौचालय, पानी और पैड की सुविधा देनी होगी। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि पाकिस्तान के बहुत से स्कूलों में लड़कियों के लिए अभी भी ये बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं।

पंजाब : ईसाइयत और ड्रग में जल रहा पंजाब ; केजरीवाल की मान सरकार लड़कियों को सेक्स वर्कर बना रहा ‘उड़ता पंजाब’; ड्रग्स की गोली दो, फिर मेरे साथ कुछ भी करो… , अनाज मंडी में ‘धंधा’: हाई कोर्ट बोला- नशाखोरी दीमक की तरह खा रहा

                                                 प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: GROK ai)
पंजाब सीमावर्ती राज्य है और सीमावर्ती राज्य में महिलाओं की हो रही दुर्दशा पर वहां की सरकार, प्रशासन और राजनीतिक पार्टियां चुप क्यों? इस गंभीर मुद्दे पर वहां के राज्यपाल को ही कोई सख्त कदम उठाना चाहिए। यह देखना चाहिए कि क्या पंजाब को बर्बाद करने पाकिस्तान षड़यंत्र रच रहा है। केवल चुनावों में नशे को मुद्दा बनाने की बजाए अभी मुद्दा बनाने का समय है। समय रहते वहां के विपक्ष को सचेत होना पड़ेगा।    
दिल्ली और पंजाब मॉडल लेकर घूमते अरविन्द केजरीवाल जनता को मुफ्त रेवड़ियों के जाल में फांस किस तरह पागल बनाते रहे हैं। दिल्ली नमूना तो सबने देख लिया और पंजाब की दुर्दशा देखो। आम आदमी पार्टी सरकार ने पंजाब में महिलाओं को ड्रग एडिक्ट बना सेक्स वर्कर बनने को मजबूर कर दिया। जिस राज्य में महिलाओं की इतनी दुर्दशा हो रही हो, क्या वह राज्य विकास की ओर जा सकता है।   

‘नशा मुक्ति अभियान’ लंबे समय से देश के कोने-कोने में चल रहा है लेकिन इसका असर हर जगह एक जैसा नहीं है। पंजाब में AAP सरकार जोर-शोर से दावा करती कि वो राज्य से नशे का खात्मा कर देंगे। वहीं दूसरी ओर एक लड़की की आपबीती सामने आती है जो बताती है कि राज्य में नशे के कारण कैसे लड़कियों की जिंदगी बर्बाद हो रही है और उन्हें नशा दे-देकर वेश्यावृत्ति में धेकला जा रहा है।

प्रशासन के लिए अगर उस लड़की की आपबीती एक धक्का है तो सवाल उठता है कि क्या ‘नशा मुक्ति अभियान’ जमीन तक पहुँचा भी है और अगर अधिकारी ऐसी स्थितियों से वाकिफ हैं तो फिर अब तक राज्य में ऐसे हालात क्यों हैं।

लड़की की आपबीती मीडिया में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट बताती हैं कि जिस समय नशा विरोधी कमेटी की टीम मार्च निकाल रही थी तभी उन्हें कोट ईसे खाँ के मसीता रोड पर लड़की सड़क किनारे खाना खाते हुए मिली। लड़की से सवाल-जवाब हुए तो उसने सरेआम जो कहना शुरू किया उससे सभी लोग हिल गए। लड़की ने कहा, “मुझे बस नशे के लिए छह कैप्सूल चाहिए और उसके बाद कोई मेरे साथ कोई कुछ भी करे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। एक महिला ने पहले मुझे नशे की लत लगाई और मुझे अब जिस्मफिरोशी में धकेल दिया है। मेरे जैसी कई युवतियों को हवस के भूखे भेड़ियों के समक्ष परोसती है और बदले में 300 रुपए लेती है। आधा हिस्सा 150 रुपए मुझे मिलते हैं। पहले 600-700 रुपए की कमाई होती थी पर अब जो पैसा मिलता है, उससे केवल नशे की पूर्ति हो पाती है।”

लड़की ने इस दौरान ये भी जानकारी दी कि वेश्यावृत्ति का काम अनाज मंडी में होता है। वहाँ लगे कुछ तंबू में जिस्म का सौदा करवाया जाता है लेकिन उससे पहले उन्हें नशे का आदी बनाते हैं। वो खुद जब कैप्सूल नहीं मिलती तो अस्पताल से मिलने वाली ‘बुपरीमार्फिन’ गोली पानी में मिलाकर इंजेक्शन लगा लेती है। युवती के मुताबिक ये इंजेक्शन लगाना भी उसे उसी औरत ने ही सिखाया है जिसने उसे वेश्यावृत्ति में धकेला। वहीं गोली उसे सरकारी अस्पताल के पास वाले मेडिकल स्टोर से मिल जाती है।

बच्ची की आपबीती आने के बाद पुलिस ने इस मामले को दर्ज तो कर लिया है लेकिन इसके बाद पूरे प्रशासन पर सवाल उठ रहे हैं। पूछा जा रहा है कि जब राज्य में नशे की कैप्सूल सब बंद हैं तो इनके पास वो कैसे पहुँच रही है।

नशे से हो रही पंजाब में जिंदगियाँ बर्बाद

ये पहली बार नहीं है जब पंजाब में नशे की लत के कारण किसी की जिंदगी बर्बाद हुई हो। 1 साल पहले एक डांसर की खबर आई थी जिसकी पूरी जिंदगी नशे की लत के कारण खराब हो गई थी।
खुद उसके भाई-बहनों ने उसे पहचानने से मना कर दिया था। इसके अलावा उसका पति भी छो़डकर चला गया था। बाद में उसे घर चलाने के लिए सेक्स वर्कर बनना पड़ा। मगर जब उम्र ढली तो उसे वो काम मिलना भी बंद हो गया।
ऐसे ही एक अन्य खबर बताती है कि कैसे अमृतसर के गाँव में नशे की आदत के कारण 100 से ज्यादा महिलाओं का सुहाग उजड़ गया। रिपोर्ट के अनुसार सभी के पतियों की पिछले तीन से छह साल में नशे के कारण मौत हुई थी।
महिलाओं ने शिकायत में पुलिस पर आरोप लगाया था कि पुलिस इन नशा तस्करों को नहीं पकड़ती। नशे से हमारा भविष्य बर्बाद हो रहा है। कई लोग तो इस क्षेत्र से जा चुके हैं। हाल ऐसे हैं कि अब तो लोग यहाँ मकान खरीदने में भी संकोच करते हैं।
इसी तरह 4 दिन पहले एक खबर पंजाब के फिल्लौर से आई थी। यहाँ नशे की एक्स्ट्रा डोज लेने पर 22 साल के युवक की मौत हो गई। उसका शव पेड़ के पास पड़ा मिला। जवान बेटे की मौत की खबर सुनते ही पूरे परिवार में कोहरा मच गया।

कोर्ट बार-बार लगा चुका है फटकार

पंजाब में नशाखोरी इतने चरम पर है कि कोर्ट तक इस मामले पर राज्य की आलोचना कर चुका है। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कहा था कि नशाखोरी देश के भविष्य को दीमक की तरह खा रही है। विशेष रूप से पंजाब में ये बड़ी चिंता का विषय है।
पिछले वर्ष अगस्त 2024 भी बठिंडा कोर्ट ने ड्रग तस्करों के खिलाफ सख्त स्टैंड लेने को पुलिस को आदेश दिया था। उन्होंने एक तस्कर की याचिका पर सुनवाई के दौरान पुलिस से कहा था कि वह बताएँ कि राज्य में एनडीपीएस के कितने मामले हैं, जिनमें आरोपी 6 महीने से अधिक समय से फरार हैं। अगर पुलिस द्वारा ड्रग मामलों में आरोपितों को उचित समय अवधि के भीतर गिरफ्तार नहीं किया जाता है, तो ऐसे आरोपितों को तुरंत घोषित अपराधी (पीओ) घोषित किया जाना चाहिए और कानून के प्रावधान के अनुसार बिना किसी देरी के उनकी संपत्ति जब्त की जानी चाहिए।
मार्च 2024 में भी कोर्ट ने पंजाब में पुलिस अधिकारियों से ड्रग तस्करों के खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी कोर्ट को देने को कही थी। हाईकोर्ट ने पंजाब की जेलों से नशे की तस्करी के बढ़ते मामलों पर टिप्पणी करते हुए इसे एसएसओसी की नाकामी बताई थी। साथ ही कहा था कि इन केसों की जाँच सीबीआई और ईडी द्वारा होनी चाहिए। पंजाब में स्थिति नियंत्रण से बाहर है और जेल अधिकारियों के खिलाफ जँच करने में पंजाब पुलिस सक्षम नहीं है।
इसी प्रकार साल 2023 में भी कोर्ट ने नशे के कारोबार और तस्करी के आँकड़ों को देख इन्हें डराने वाला बताया था। कोर्ट ने कहा था कि नशे की जड़ों को समाज से काटना बहुत जरूरी है। आरोपितों के खिलाफ न केवल एनडीपीएस का बल्कि मनी लॉंड्रिंग का मामला दर्ज होना चाहिए। अपराधियों को कम से कम 10 से 20 साल कैद की सजा सुनाई जानी चाहिए और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाना चाहिए।

पंजाब की AAP सरकार और उनके नशा मुक्त पंजाब को लेकर वादे

साल 2022 में जब पंजाब में चुनाव थे तब AAP प्रमुख केजरीवाल ने राज्य की जनता से वादा किया था कि AAP की सरकार आने के चार महीने के भीतर नशीले पदार्थ पर अंकुश लगवा देंगे। बाद में साल 2023 में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पटियाला में सभा को संबोधित करते हुए कहा ता कि वह अगले स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त 2024 तक पंजाब से चिट्टे के खतरे को खत्म कर देंगे। हालाँकि वो अपना वादा पूरा करने में विफल रहे जिसके कारण विपक्षी पार्टियों ने उन्हें घेरा भी और उनके वादे को महज ‘लॉलीपॉप’ बताया।
अवलोकन करें:-
अब हर साल-छह महीने पर खबरों में कुछ आँकड़े दिए जाते हैं। बताया जाता है कि एक अवधि में पंजाब में कितने ड्रग तस्कर पकड़े गए, कितनों के मादक पदार्थ जब्त हुए आदि। कभी मुख्यमंत्री घोषणा करते हुए कि जो गाँव नशा मुक्त होगा उन्हें विशेष अनुदान मिलेगा, तो कभी कोई टीम बनाकर नशा रोकने की बात होती है… लेकिन इन घोषणा से ज्यादा जरूरी तो ये है न कि देखा जाए जो प्रयास शुरू हुए उससे जमीनी स्तर पर क्या फर्क पड़ रहा है। अगर इसी चरण पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो ‘100 महिलाओं के विधवा’ होने वाली जैसी खबरें कभी आना बंद नहीं होगीं। लड़कियाँ नशे की लत लगाकर वेश्यावृत्ति में धकेली जाती रहेंगी। ड्रोन तस्करों को पकड़ लेगा लेकिन मेडिकल स्टोर पर मिलने वाली नशीली दवाइयों पर कार्रवाई नहीं होगी।

जस्टिस संजीव खन्ना शराब घोटाले के मुकदमों से हटाए जाएं; सुप्रीम कोर्ट में खेल खेला गया केजरीवाल को जेल से छुड़ाने का; मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ को गंभीरता से जाँच करवानी चाहिए; केजरीवाल को मोबाइल का पासवर्ड बताने के लिए क्यों नहीं कहा?

सुभाष चन्द्र

आज सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने केजरीवाल को अंतरिम जमानत दे दी और उसकी गिरफ़्तारी को चुनौती देने वाली उसकी याचिका को 3 जजों की बड़ी बेंच के पास भेज दिया। यह आज का फैसला कुछ और नहीं है बल्कि केजरीवाल को जेल से छुड़ाने का षड़यंत्र है जो रचा गया स्वयं सुप्रीम कोर्ट में और मेरे ऐसा कहने के पीछे कई कारण है। किसी भी कोर्ट ने केजरीवाल को मोबाइल का पासवर्ड बताने के लिए क्यों नहीं कहा? इसके पीछे भी गहरा खेल खेला जा रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट को बताना होगा कि अगर अरविन्द केजरीवाल निर्वाचित नेता है तो क्या जेल में बंद अन्य नेता निर्वाचित नहीं? मुख्य न्यायधीश चंद्रचूड़ जी सुप्रीम कोर्ट में ये क्या खेला खेला जा रहा है? 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
एक बहुत पुरानी कहावत "You show me the man I will show you the rules" सुप्रीम कोर्ट साबित कर रही है। आखिर सुप्रीम कोर्ट न्याय करने की बजाए कानून का क्यों मजाक बना रही है? आखिर किस वजह से सुप्रीम कोर्ट भ्रष्टाचार के सबूत होने के बावजूद केजरीवाल को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है? क्या किसी सामान्य नागरिक को इतनी छोटी तारीख दी जाती है, फिर केजरीवाल को क्यों? यहाँ दाल में कुछ काला नहीं सारी ही दाल काली है दिख रही है, जिसकी मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ को गंभीरता से जाँच के आदेश देने चाहिए। 

केजरीवाल ने 21 मार्च को ED द्वारा की गई उसकी गिरफ़्तारी को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी और वहां से याचिका खारिज होने के बाद वह गया सुप्रीम कोर्ट, जहां केजरीवाल पर मेहरबान जस्टिस संजीव खन्ना ने पहले उसे चुनावों में प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दे दी जबकि उसने जमानत मांगी नहीं थी। ये सब बातें भी षड़यंत्र का हिस्सा हैं।

जब कोर्ट अंतरिम जमानत दे दे या regular bail दे दे तो उसकी गिरफ़्तारी स्वतः ही “वैध” समझी जानी चाहिए लेकिन फिर भी खन्ना/दत्ता ने वैधता की सुनवाई जारी रखी। इस सुनवाई के चलते पहले केजरीवाल को 10 मई को अंतरिम जमानत दी गई और गिरफ़्तारी की वैधता पर 17 मई को सुनवाई पूरी करके फैसला सुरक्षित रख लिया गया।

आज जस्टिस खन्ना ने कहा कि "He is the Chief Minister of a state and the elected leader. Considering his right to life and liberty and the fact that he has been in jail for over 90 days, we are of the view that Kejriwal is entitled to be released on INTERIM BAIL” -

जमानत देने के लिए यह right to life and Liberty का तर्क औचित्यहीन है क्योंकि केजरीवाल की जान को कोई खतरा नहीं है और क्या आप हर आरोपी को liberty के नाम पर छोड़ देंगे? फिर तो किसी को भी जेल में रखने की जरूरत नहीं है। जमानत पर उसे छोड़ने के लिए यह दलील ही “षड़यंत्र” है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि “the legal question regarding the "necessity to arrest" under Section 19 of the Prevention of Money Laundering Act (PMLA) needs to be considered by a larger bench of the top court”

17 मई को सुनवाई ख़त्म करते हुए ही मीलॉर्ड को ये बड़ी बेंच को भेज देना चाहिए था। वैसे जब यह केस चीफ जस्टिस ने आपको दिया होगा तो समझा गया होगा कि 2 जजों की बेंच उपयुक्त है और इसका मतलब है आप अपने दायित्व की पूर्ति में नाकाम हो गए।

सारी कहानी यह है कि घुमा फिरा कर अदालतें PML Act को निष्क्रिय कर रही हैं, जिससे चोरों की मौज हो जाए।

अभी भी लगता है संजीव खन्ना चाहते थे केजरीवाल को पूरी राहत दी जाए लेकिन शायद दीपांकर दत्ता उनसे सहमत नहीं थे और इसलिए बड़ी बेंच को भेज कर अपना पिंड छुड़ा लिया।

केजरीवाल के लिए अगर आप 17 मई को ही आज का आदेश दे देते तो तब से लेकर अब तक 57 दिन की जेल तो उसकी बच जाती जो आपकी वजह से चलती रही।

वो 90 दिन से जेल में है तो सिसोदिया तो 16 महीने से जेल में है, उसने भी जमानत के लिए SLP दायर की है और उस बेंच में भी संजीव खन्ना जी हैं जिसका मतलब है ये उसे भी बाहर कर देंगे। सिसोदिया के केस में कोर्ट ने कहा है कि केस तो अब तक ख़त्म हो जाना चाहिए था लेकिन शुरू भी नहीं हुआ जबकि दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था ED/CBI देरी के लिए दोषी नहीं हैं।

अदालत यदि स्वयं ऐसे निर्णय करेगी जिसमें राजनीति का खेल दिखाई दे तो यह न न्यायपालिका के लिए शुभ है और न लोकतंत्र के लिए, courts को इससे दूर रखना चाहिए, जजों को न निष्पक्ष होना चाहिए बल्कि निष्पक्ष दिखना भी चाहिए और जस्टिस खन्ना कतई निष्पक्ष नहीं हैं। 

जेल में ही कटेंगे अरविंद केजरीवाल के दिन, दिल्ली की कोर्ट ने न्यायिक हिरासत 14 दिनों के लिए बढ़ाई: सेहत की पूरी जाँच करा कर रिपोर्ट कोर्ट को सौंपे

दिल्ली शराब घोटाला केस में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को बुधवार (05 जून 2024) को राउज एवेन्यू कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने उनकी अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। केजरीवाल ने सेहत का हवाला देते हुए सात दिनों की अंतरिम जमानत की माँग की थी, लेकिन कोर्ट ने कोई राहत देने से इनकार कर दिया, लेकिन जेल प्रशासन को ये निर्देश दिया है कि वो अरविंद केजरीवाल की सेहत की पूरी जाँच कराए और रिपोर्ट कोर्ट को सौंपे।

राऊज एवेन्यू कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल की न्यायिक हिरासत भी 14 दिन के लिए बढ़ा दी है। अब केजरीवाल को 19 जून तक जेल में ही रहना होगा। अपने आदेश में कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को जरूरी मेडिकल टेस्ट कराने का निर्देश दिया है। विशेष न्यायाधीश कावेरी बावेजा ने तिहाड़ जेल अधिकारियों को न्यायिक हिरासत में केजरीवाल की चिकित्सा आवश्यकताओं का ध्यान रखने का निर्देश दिया है।

केजरीवाल को लोकसभा चुनाव में प्रचार के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा 10 मई को दी गई अंतरिम जमानत पर एक जून तक के लिए जेल से रिहा किया गया था। इसके बाद उन्होंने अंतरिम जमानत को सात दिन के लिए बढ़ाने की माँग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने 29 मई को उनकी याचिका को तत्काल सूचीबद्ध करने से इनकार कर दिया था।

इस याचिका में केजरीवाल ने गुहार लगाई थी कि उन्हें मेडिकल जाँच कराने के लिए समय चाहिए क्योंकि उनका वजन कम हो रहा है और कीटोन का स्तर बढ़ा है। इसके बाद उन्होंने चिकित्सा आधार पर अंतरिम जमानत की माँग करते हुए विशेष सीबीआई-ईडी अदालत का रुख किया। 1 जून को उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए विशेष न्यायाधीश कावेरी बावेजा की अदालत ने अपना आदेश पाँच जून के लिए सुरक्षित रख लिया था। अरविंद केजरीवाल की अंतरिम जमानत का विरोध करते हुए ईडी ने कहा था कि केजरीवाल अदालत को गुमराह कर रहे हैं। ईडी ने आरोप लगाया कि लगातार चुनाव प्रचार कर रहे केजरीवाल का स्वास्थय तब खराब हुआ जब सरेंडर करने का समय आया।

अरविंद केजरीवाल को ईडी ने 21 मार्च 2024 को गिरफ्तार किया था। कोर्ट ने उन्हें 1 जून तक की अंतरिम बेल दी थी, ताकि वो लोकसभा चुनाव में प्रचार कर सकें। इसके बाद उन्होंने तिहाड़ जेल पहुँचकर सरेंडर कर दिया था। अरविंद केजरीवाल की नियमित जमानत याचिका अभी पेंडिंग है। आगामी 7 जून 2024 को उस जमानत याचिका पर सुनवाई होनी है।

‘2500 करोड़ रूपए में CM, 500 करोड़ में मंत्री बनाती है BJP’: मानहानि केस में बेंगलुरु कोर्ट ने राहुल गाँधी को 7 जून को बुलाया, कहा- हर हाल में पेश हों

एक बहुत पुरानी कहावत है 'बर्बाद करने को 1 ही उल्लू काफी है, यहाँ हर शाख पर उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा', कांग्रेस  केजरीवाल पार्टी की hit & run नीति अपनाकर पार्टी को जल्दी से जल्दी धूल में मिलाने को कमर कस चुकी है। अभी जयराम नरेश द्वारा अँधेरे में छोड़े तीर से बच नहीं पायी कि बेंगलुरु कोर्ट ने बीजेपी के मानहानि केस में राहुल गाँधी नोटिस दे दिया।    
बेंगलुरु के एक कोर्ट ने आदेश दिया है कि कांग्रेस नेता राहुल गाँधी 7 जून, 2024 को पेश हों। कोर्ट ने कहा है कि राहुल गाँधी को हर हाल में पेश होना होगा। कोर्ट ने भाजपा नेता द्वारा किए गए एक मुकदमे में यह आदेश दिया है। मामला 2023 विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा के विरुद्ध भ्रामक विज्ञापन चलाने से जुड़ा हुआ है।

बेंगलुरु के कोर्ट ने शनिवार (1 जून, 2024) को एक भाजपा नेता एस केशव प्रसाद द्वारा दायर मानहानि के मुकदमे पर सुनवाई की। इस मुकदमे में कहा गया है कि कांग्रेस ने 2023 विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा को भ्रष्ट चलाने वाले विज्ञापन चलवाए जिनसे भाजपा की मानहानि हुई।

इस मामले में कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी, मुख्यमंत्री सिद्दारमैया, उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और राहुल गाँधी को आरोपित बनाया गया था। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सिद्दारमैया और शिवकुमार को जमानत दे दी। इस दौरान राहुल गाँधी नहीं पेश हुए। उनके ना पेश होने पर भाजपा नेता के वकील ने माँग की कि राहुल गाँधी के विरुद्ध गैर जमानत वारंट जारी किया जाए।

कोर्ट में राहुल गाँधी की तरफ से चुनावी व्यस्तताओं के चलते बेंगलुरु जाने में असमर्थता जताई गई थी, जिसे कोर्ट ने 1 जून को मान लिया लेकिन सख्त हिदायत दी कि वह 7 जून को जरूर पेश हों। राहुल गाँधी ने इससे पहले मार्च में अपने विरुद्ध समन जारी किए जाने पर जून में तारीख माँगी थी।

भाजपा नेता द्वारा दायर इस मुकदमे में आरोप लगाया है कि कांग्रेस ने भाजपा पर 2500 करोड़ रूपए में मुख्यमंत्री और 500 करोड़ रूपए में मंत्रिपद बेचने की बात कही, इससे भाजपा की छवि खराब हुई। इसके अलावा कांग्रेस ने मई, 2023 में अखबारों में विज्ञापन छपवा कर दावा किया कि राज्य की भाजपा सरकार के दौरान कोविड से जुड़े ठेकों में 75%, PWD ठेकों में 40% और धार्मिक संस्थानों में दान के मामले में 30% कमीशन लिया गया। भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि इससे पार्टी की छवि धूमिल हुई।

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2023 कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बड़ी जीत हासिल हुई थी और भाजपा को सत्ता से बाहर होना पड़ा था।

दिल्ली : शराब और पानी घोटाले के बाद अब शुगर घोटाला : क्या घोटालों की जानकारी न दिए जाने पर सख्ती से बचने के लिए ड्रामा किया जा रहा है? पत्नी सुनीता परहेजी खाना न भेज क्यों अपने सुहाग की ज़िंदगी से खिलवाड़ कर रही है?क्या सुनीता को पति की ज़िंदगी प्यारी नहीं?

क्या बीजेपी के कंधे बन्दूक रख सुनीता को निशाना बनाया जा रहा है? 

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल शराब घोटाले मामले में तिहाड़ जेल में बंद हैं। जेल से बाहर आने के लिए तरह-तरह के तिकड़म अपनाए जा रहे हैं। अब पता चला है कि जमानत के लिए उन्होंने एक नया हथकंडा अपनाया है। वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए अपने नियमित डॉक्टर से सलाह लेने की केजरीवाल की याचिका दायर पर सुनवाई के दौरान ईडी ने बताया कि दिल्ली के मुख्यमंत्री को टाइप-2 डाइबिटीज है, लेकिन वह तिहाड़ जेल में आलू-पूड़ी, आम और मीठा खा रहे हैं। ईडी ने कहा है कि वह ऐसा जानबूझकर रहे हैं, जिससे कि उनका शुगर लेवल बढ़े और उन्हें मेडिकल के आधार पर जमानत मिल जाए। ईडी ने यह भी कहा है कि वह विशेष रूप से मीठा भोजन खा रहे थे। जिसकी किसी भी मधुमेह रोगी को अनुमति नहीं है। 

मधुमेह या कोई षड़यंत्र? 

केजरीवाल के तिहाड़ जाने के बाद से पार्टी में मुख्यमंत्री बनने की होड़ मची हुई है। शायद इसीलिए केजरीवाल मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ रहे। इसके पीछे भी एक गहरी साज़िश होने की शंका है। क्योकि केजरीवाल परिवार में ही कुर्सी रखना चाहते हैं। शायद इसी लिए केजरीवाल ने तिहाड़ जाते समय आतिशी और सौरभ का नाम लेकर कुर्सी से दूर करना चाहा हो? यह भी चर्चा है कि पार्टी में कुर्सी की भगदड़ मचती देख केजरीवाल सुनीता के लिए मुख्यमंत्री का रास्ता साफ करने पर आतिशी और सौरभ के नामों पर मोहर लगाकर इन दोनों को भी तिहाड़ में आने के मजबूर न कर दे। 

ऐसे में तिहाड़ प्रशासन को सख्त कार्यवाही करते हुए घर से आने वाले भोजन की जाँच करनी चाहिए। तिहाड़ प्रशासन क्या सो रहा है? जब किसी भी मधुमेह रोगी को तली चीजें, तेज मसाले, आलू, चुकंदर, मीठी चाय/कॉफ़ी, आम, खरबूजा, तरबूज, और किसी प्रकार का मिष्ठान मना होता है, फिर क्यों पूरी, आलू की सब्जी, आम आदि घर से आने पर किसी भी अनहोनी के होने में तिहाड़ प्रशासन और केजरीवाल की पत्नी के बीच किसी षड़यंत्र को रचे जाने की शंका हो सकती है। संभव हो वह शंका निराधार हो, फिर भी ED, CBI, जेल प्रशासन और कोर्ट्स आदि को सचेत रहने की जरूरत है। किसी उन्होने के होने पर ये सब सवालों के घेरे में आएंगे।  

तब घर का खाना की इजाजत देने वाली कोर्ट भी इन्ही सवालों का जवाब मांगेगी। वास्तव में अगर केजरीवाल मधुमेह रोगी है, फिर पत्नी से पूछना चाहिए कि क्यों बदपरहेजी खाना भेजा जा रहा है? क्या इसके पीछे कोई गहरा षड़यंत्र है? दिल्ली मंत्री आतिशी मार्लेना से पूछना चाहिए कि तिहाड़ जेल और बीजेपी को आरोपित करने से पहले अपने आका की पत्नी से क्यों नहीं पूछती कि जिस मधुमेह रोगी को 50 यूनिट insulin जाती हो, क्यों आलू की सब्ज़ी, पूरी और आम आदि क्यों भेज रही हो? क्या षड़यंत्र रच रही हो? मंत्री आतिशी को अपने पद की गरिमा बनाए रखने के लिए उप-राज्यपाल और तिहाड़ प्रशासन को केजरीवाल को मिलने ऐसे भोजन को तुरंत रोक, मधुमेह रोगी को दिए जाने वाला भोजन दिया जाये।      

सवाल यह है कि जब आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को शुगर और बीपी है तो उन्हें घर से इस तरह का खाना क्यों भेजा जा रहा है? डाइट चार्ट से ये भी पता चलता है कि केजरीवाल नियमित रूप से आलू-पूड़ी, केला, आम और मीठा खा रहे हैं। ऐसे में केजरीवाल से जुड़ी ये खबर सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रही है। लोग इसी के बारे में चर्चा कर रहे हैं।

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जेल के बाहर भी आतंकी रहेगा ‘कैद’, भागेगा तो दबोचा जाएगा: जम्मू-कश्मीर पुलिस GPS ट्रैकर इस्तेमाल करने वाली देश की पहली पुलिस बनी

                                                                                             आतंकी गुलाम मोहम्मद भट्ट (साभार: ANI)
आतंकियों को जमानत पर छोड़ने के बाद उन पर कड़ी निगाह रखी जाएगी। इसके लिए उनके पैरों में GPS ट्रैकर डालने का निर्णय लिया है। ऐसा करने वाली जम्मू-कश्मीर पुलिस देश की पहली पुलिस फोर्स बन गई है। आतंकियों के पैरों में डाले गए इस ऐंकलेट के जरिए आतंकी की गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी।

GPS ट्रैकर एंकलेट एक डिवाइस होती है। इसे किसी शख्स के टखने के चारों तरफ चिपका दिया जाता है। इसे लगाने के बाद वह व्यक्ति जहाँ भी जाएगा, उसके बारे में ऑपरेटर को जानकारी मिलती रहेगी। अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में जमानत या परोल पर जाने वाले कैदियों के लिए इस डिवाइस का इस्तेमाल किया जाता है।

पुलिस का कहना है कि इस डिवाइस को NIA की स्पेशल कोर्ट के एक आदेश के बाद इस्तेमाल में लाया गया है। NIA की स्पेशल कोर्ट ने पुलिस को एक खूँखार आतंकी पर नजर रखने के लिए उस पर जीपीएस ट्रैकर लगाने का निर्देश दिया था। पश्चिमी देशों में इस डिवाइस का इस्तेमाल घर में नजरबंद कैदियों की निगरानी के लिए भी किया जाता है।

जिस आतंकी पर पहली बार इस ट्रैकर का इस्तेमाल किया गया है, उसका नाम गुलाम मोहम्मद भट्ट है। भट्ट को UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था। उसने जमानत के लिए कोर्ट में आवेदन किया था। जमानत पर सुनवाई लंबित रहने के कारण आरोपित ने कोर्ट से अंतरिम जमानत की माँग की थी। इसके बाद कोर्ट ने यह निर्णय दिया।

आरोपित गुलाम भट्ट पर कई आतंकी संगठनों से जुड़े होने के आरोप हैं। वह प्रतिबंधित आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन केकहने पर कश्मीर में आतंकी फाइनेंसिंग में शामिल हो गया था। ऐसे ही एक मामले में उसे गिरफ्तार किया गया था। उसे 2.5 लाख रुपए की टेरर फाइनेंसिंग करते समय गिरफ्तार किया गया था।

वहीं, एक अन्य मामले में आतंकी संगठन से जुड़ने और साजिश रचने के आरोप में NIA कोर्ट और दिल्ली की पाटियाला हाउस कोर्ट ने उसे दोषी ठहरा चुकी है। इसको देखते हुए कोर्ट ने पुलिस से उस पर कड़ी निगरानी रखने के लिए कहा था। इसके बाद अभियोजन पक्ष की दलील के बाद कोर्ट ने उस पर जीपीएस ट्रैकर लगाने का निर्देश दिया।

नेशनल शूटर तारा शाहदेव की दर्दनाक कहानी : रकीबुल हसन ने मारा पीटा, भूखा रखा, कुत्ते से कटवाया, रेप, दूसरे मर्द के साथ सुलाने की धमकी…

                     नेशनल शूटर तारा शाहदेव की दर्दनाक कहानी, 9 साल बाद मिला इंसाफ (साभार-One India)
झारखंड की नेशनल शूटर तारा शाहदेव के मामले फैसला आ चुका है। किस तरह से रकीबुल हसन ने खुद को हिंदू रंजीत कोहली बताकर उन्हें धोखा दिया और शादी की थी। बाद में उन पर इस्‍लाम कबूलने का दबाव बनाया गया और ऐसा नहीं करने पर उनकी पिटाई की जाती थी और कई बार कुत्ते से भी कटवाया गया। उन्हें कई-कई दिनों तक भूखा रखा जाता था। उनके साथ रेप और जबरदस्ती की जाती रही।

लव जिहाद इसी मामले में हाल ही में सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने दोषी रकीबुल हसन उर्फ रंजीत कोहली को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इसके साथ ही रकीबुल की अम्मी कैशर रानी को 10 साल और साजिश रचने के आरोपित रहे हाईकोर्ट के बर्खास्त रजिस्ट्रार मुश्ताक अहमद को 15 साल कैद की सजा सुनाई है। सभी दोषियों पर 50-50 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। बता दें कि मुस्ताक अहमद ही वो शख्स था जिसने रकीबुल को रंजित कोहली बनाकर तारा से मिलवाया था। 

वहीं इस फैसले के बाद तारा शाहदेव ने कहा, ”मैं कोर्ट और सीबीआई को धन्यवाद देना चाहती हूँ, जिन्होंने मुझे न्याय दिलाया। ये न्याय सिर्फ मेरे लिए नहीं है, देश की हर बेटी को ये भरोसा मिलेगा कि जो भी उनके साथ ऐसा करेगा, उसे सजा मिलेगी।”

अभी तक आपको तारा शाहदेव के इस मामले की झलक मिल गई होगी कि कितनी बुरी तरह से एक राष्ट्रीय शूटर को सताया गया, उसने क्या-क्या सहा इसी पर हम आगे बात करने जा रहे हैं। हाल ही में जब इस मामले में 9 साल बाद फैसला आया है तो आइए जानते हैं तारा शाहदेव की दर्दनाक कहानी।

 क्या हुआ था उस दिन जब वह शादी के जोड़े में अपने पति के घर पहुँची? कैसे उन्हें शादी के दो दिन बाद ही उस समय झटका लगा जब ये कहा गया कि अपना धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल करो और तारा से सारा बन जाओ। इस तरह से देश के लिए गोल्ड जीतने वाली राष्ट्रीय खिलाड़ी अब लव जिहाद के एक ट्रैप में फँस चुकी थी। 

कैसे हुई रकीबुल हसन से मुलाकात

नेशनल शूटर तारा शाहदेव के माँ की 2014 में ही मौत हो गई थी। वो अपनी माँ की मौत से टूट गईं थी लेकिन शूटिंग कैंप में जाती रहीं। इसी दौरान पीली बत्ती लगे वाहन में विजिलेंस रजिस्ट्रार मुश्ताक अहमद (हाईकोर्ट में पदस्थापित) व रंजीत कुमार कोहली उर्फ रकीबुल हसन उनका प्रैक्टिस देखने आते थे। मुस्ताक की मदद से रंजित कोहली से यहीं उनकी मुलाकात हुई। कहते हैं रंजित ने मुस्ताक अहमद की मदद से तारा को सहारा दिया और फिर कुछ ही दिनों में शादी के लिए प्रपोज भी कर दिया।

लव जिहाद ने बर्बाद किया तारा का जीवन

सब कुछ बहुत तेजी से हो रहा था। 20 जून, 2014 को ही मुश्ताक की मौजूदगी में सगाई हुई और 7 जुलाई, 2014 को तारा की शादी रंजीत से हो गई। इससे पहले कि तारा इस शादी की खुशियाँ भी मना पातीं कि 8 जुलाई यानी शादी के अगले दिन ही तारा को पता चला कि रंजित कोहली दरअसल मुस्लिम है और उसका असली नाम रकिबुल हसन है।

ऐसे हुआ मामले का खुलासा

तारा ने इस मामले में जानकारी देते हुए बताया कि ससुराल में शादी के अगले ही दिन मंत्री हाजी हुसैन अंसारी के यहाँ से इफ्तार पार्टी का निमंत्रण मिला। जिसमें जनाब रकीबुल हसन खान के नाम का संबोधन था। यह कार्ड भी तारा ने कोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किया था। तारा ने बताया कि उनके बुरे दिन की शुरुआत तब हुई जब 9 जुलाई, 2014 को रंजीत 20-25 हाजी को लेकर घर आया और जबरन इस्लाम कबूलने के लिए दबाव बनाने लगा।
इस दौरान विरोध करने पर उनके साथ बुरी तरह मारपीट की गई। इस्लाम कबूल करवाने के लिए रकीबुल हसन ने दरिंदगी की सारी हदें पार कर दी थीं। करीब डेढ़ महीने तक उसने अपने कब्जे में रखते हुए तारा को न तो खाना-पीना दिया और न ही किसी से मिलने देता था। वह बार-बार कहता था कि इस्लाम धर्म कबूल करना होगा। ऐसा नहीं करने पर तारा का चेहरा सलामत नहीं रहेगा। उन्हें कई बार कुत्ते से कटवाया गया, ताकि वह डर से धर्म परिवर्तन कर लें। यह सिलसिला लगातार एक महीने से अधिक समय तक चलता रहा और शारीरिक और मानसिक तौर पर उन्हें प्रताड़ित किया जाता रहा है। 

नेशनल शूटर को जबरदस्ती बना दिया गया सारा 

नेशनल शूटर तारा जो उस समय गोल्ड मेडल जीत चुकी थीं। उनके साथ रोज मारपीट होने लगी थी, एक दिन मौलवी बुलाकर जबरदस्ती तारा को सारा बना दिया गया। इसके बाद तारा अगर मुस्लिम रीति रिवाज मानने से इनकार करती तो उन्हें खूब पीटा जाता, भूखा रखा जाता। छुप छुपकर घर की नौकरानी उन्हें रोटी देती थी। तारा के साथ बेड पर जोर जबरदस्ती की जाती। रकीबुल तारा के साथ रेप करता, उनकी मर्जी के बिना उनके साथ बेड शेयर करता। इतना ही नहीं तारा को यह धमकी भी दी जाने की लगी कि उनके साथ गैर मर्दों को सुलाया जाएगा। 
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9 साल बाद मिला तारा को इंसाफ

कई महीनों तक तारा ये सब सहती रही, लेकिन एक दिन मौका पाकर वो घर से बचकर बाहर निकली। इसके बाद तारा ने अपनी आपबीती पुलिस को बताई। इसके बाद ही तारा शाहदेव की दर्दनाक कहानी सबके सामने आई। इस मामले में तारा शाहदेव ने 2015 में झारखंड हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने अपने पति रकीबुल हसन और उसके परिवार के खिलाफ जबरन धर्म परिवर्तन और प्रताड़ना के आरोप लगाए। हाईकोर्ट ने मामले की जाँच सीबीआई को दी। और अब 9 साल बाद जाकर तारा शाहदेव को इंसाफ मिला है।