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कश्मीर : 4056 कब्रों में से 93% पाकिस्तानी आतंकियों की, SYSF की रिपोर्ट ने खोली ‘आतंकिस्तान’ के खूनी-खेल की पोल: सेना विरोधी प्रोपेगेंडा का सच आया सामने

                                                                                                                           साभार: इंडिया टुडे
पिछले तीन दशकों से कश्मीर की कब्रगाहें सिर्फ शोक और मातम का स्थान नहीं रहीं बल्कि इन्हें एक तरह से सूचना युद्ध का हथियार भी बनाया गया है। पश्चिमी एनजीओ, अलगाववादी लॉबी और पाकिस्तान की प्रोपेगेंडा मशीन लगातार एक ही कहानी दुनिया के सामने पेश करती रही कि कश्मीर की अनचिह्नित कब्रें भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा किए गए सामूहिक अत्याचार का ‘सबूत’ हैं।

टीवी पर होती चौपालों में किसी भी आतंकवाद के गुप्त समर्थक से यह कहते नहीं सुना कि "आतंकवाद का मजहब होता है", हमेशा यही बकते सुना जाता है कि "आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता", जब आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता फिर क्यों नहीं दफनाया जाता है? अगर कोई उन लाशों को लेकर नहीं जाता, क्यों नहीं उन्हें लावारिसों की जला दिया जाता? जिस दिन जलाना शुरू कर दिया मजहब अपने आप सामने आ जाएगा। 

अभी दो/दिन पहले News18 पर एंकर लुबिका लिकायत के शो गूंज में वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने गरीब फाउंडेशन के चेयरमैन अंसार रज़ा से पूछा कि आप लोग आज तक बाबरी पर चीख-पुकार करते हो लेकिन यह बताओं कि बाबरी के नाम पर मिली जमीन का क्या हुआ? राममन्दिर तो बनकर तैयार भी हो गया, क्या मस्जिद की नींव खुदी? बेशर्म रज़ा जलेबी की बात घुमाता रहा लेकिन जवाब नहीं दिया। ये है मुस्लिम मानसिकता।          खैर, एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स ऑफ डिसअपीयर्ड पर्सन्स (APDP) और इंटरनेशनल पीपल्स ट्रिब्यूनल ऑन ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस इन कश्मीर (IPTK) की 2009 में आई रिपोर्ट Buried Evidence में यहाँ तक दावा किया कि इन कब्रों में ‘जबरन गायब किए गए’ लोगों के शव हैं।

कम्युनिटी ह्यूमन राइट्स एंड एडवोकेसी सेंटर (CHRAC), एमनेस्टी इंटरनेशनल, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाएँ भी बार-बार ‘अंतरराष्ट्रीय जाँच’ की माँग करती रहीं हैं और यह इशारा देती रहीं कि भारतीय सेना और सुरक्षा बल इन गुमशुदगियों के लिए जिम्मेदार हैं।

हालाँकि, अब ‘सेव यूथ, सेव फ्यूचर’ (SYSF) फाउंडेशन की Unraveling the Truth: A Critical Study of Unmarked and Unidentified Graves in Kashmir Valley (2025) नामक रिपोर्ट ने इन तमाम दावों को झूठा साबित कर दिया है। कई सालों तक चले फील्डवर्क के बाद SYSF ने बारामूला, कुपवाड़ा, बांदीपोरा और गंदेरबल जिलों में 373 कब्रिस्तानों का सर्वे किया और अपनी रिपोर्ट में कुल 4,056 कब्रें दर्ज की हैं।

इस रिपोर्ट के नतीजे साफ बताते हैं कि दशकों से फैलाया जा रहा प्रोपेगेंडा पूरी तरह गलत है, इनमें:
– 2,493 कब्रें विदेशी आतंकियों की हैं इनमें ज्यादातर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और LoC के पास से भेजे गए घुसपैठिए हैं।
– 1,208 कब्रें स्थानीय आतंकियों की हैं यानी कश्मीरी युवक जिन्हें आतंकवाद में भर्ती किया गया।
– 70 कब्रें 1947 के कबायली हमलावरों की हैं।

– 276 कब्रें अनचिह्नित (unmarked) हैं।

 इसका मतलब यह हुआ कि कुल कब्रों में से 93.2% की पहचान हो चुकी है और दस्तावेज मौजूद हैं। यह दावा कि यहाँ ‘निर्दोष नागरिकों की सामूहिक कब्रें’ हैं, पूरी तरह झूठा हैं और असलियत यह है कि ये कब्रें ज्यादातर आतंकवादियों की हैं, जिन्हें सुरक्षा बलों ने काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशनों में मारा।

आँकड़े जो तोड़ते हैं मिथक

SYSF की रिपोर्ट साफ कहती है, “कब्रों की एक बड़ी संख्या में ऐसे लोग दफन हैं जिनकी पहचान नहीं हो पाई और इनमें से ज्यादातर विदेशी आतंकवादी थे जो LoC पार करके घुसे और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए।”

यह एक लाइन ही उस पुराने प्रचार को ध्वस्त कर देती है, जिसमें दशकों से कहा जा रहा था कि यहाँ ‘निर्दोष नागरिकों का जनसंहार’ हुआ है। असलियत यह है कि ये लोग किसी ‘राज्य नीति के शिकार’ नहीं थे बल्कि हथियार उठाने वाले आतंकवादी थे, जो मुठभेड़ों में मारे गए हैं। इनमें से कई लावारिस हैं क्योंकि रावलपिंडी बैठे उनके आकाओं ने मानने से ही इंकार कर दिया कि ये कभी अस्तित्व में थे।

स्टडी में आगे दावा किया गया है, “पहचान ना हो पाने वाले शवों को दफनाना एक व्यावहारिक मजबूरी थी, ना कि किसी तरह की छिपाने की सरकारी साजिश।” मतलब साफ है कि जो आतंकी बिना किसी पहचान पत्र के पकड़े गए या मारे गए, उन्हें गाँव वाले या मस्जिद कमेटियाँ जल्दी से दफना देती थीं।

जब 93.2% कब्रों की पहचान साफ तौर पर आतंकियों और घुसपैठियों के रूप में हो चुकी है, तो यह हंगामा करना कि ‘हजारों कश्मीरी गायब हैं’ का कोई मतलब नहीं बचता है।

कब्रों के पीछे पाकिस्तान का हाथ

SYSF की रिपोर्ट कब्रों को सीधे पाकिस्तान के प्रॉक्सी युद्ध से जोड़ती है। सोवियत सेना के अफगानिस्तान से जाने के बाद 1989 में ISI ने अपनी जिहादी मशीनरी को कश्मीर में भेजना शुरू किया था। पाकिस्तान ने कश्मीरी और पाकिस्तानी आतंकियों को Loc के पार लॉजिस्टिक सपोर्ट, पैसा, हथियार पहुँचाने में हर तरह की मदद दी थी।

हिजबुल मुजाहिद्दीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों ने घाटी को जंग का मैदान बना दिया। विदेशी आतंकी बिना किसी दस्तावेज के आते थे और मारे जाने पर ‘अनजान आतंकवादी’ के तौर पर दफना दिए जाते थे।

रिपोर्ट साफ लिखती है कि कश्मीर में स्थानीय राजनीतिक असहमति से लेकर पार सीमा जिहादी आतंकवाद के बदलाव ने ही संघर्ष की पूरी तस्वीर को बदल दिया है। असल में ये कब्रिस्तान पाकिस्तान के उस खूनी खेल की गवाही हैं, जिन पर उसकी छाप दिखती है।

कैसे प्रोपेगेंडा ने पूरी बहस को हाइजैक किया

कथित ‘ह्यूमन राइट्स’ इंडस्ट्री ने इन कब्रों को आधार बनाकर भारत के खिलाफ कहानी गढ़ी। APDP, IPTK और एमनेस्टी ने दावा किया कि इनमें ‘गायब हुए नागरिक’ दफन हैं। लेकिन SYSF ने इनकी कार्यप्रणाली की सच्चाई सामने ले दी है।

रिपोर्ट साफ कहती है, “फॉरेंसिक जाँच जैसे DNA टेस्टिंग ना होने के चलते इन रिपोर्टों ने मृतकों की अलग-अलग श्रेणियों को एक ही माना और स्थानीय नागरिक, स्थानीय आतंकी और विदेशी आतंकी के बीच कोई साफ-साफ अंतर नहीं किया।”

यही असली धोखा था। आतंकियों और आम नागरिकों को मिलाकर पहले की रिपोर्टों ने आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए और भारत को ‘जनसंहार करने वाले देश’ के तौर पर पेश किया। SYSF ने इसकी आलोचना करते हुए कहा, “इन शुरुआती जांचों में कई सीमाएँ थीं… और इन्हें बनाने वालों की वैचारिक सोच ने ही इन्हें प्रभावित किया।”

यहाँ तक कि जम्मू-कश्मीर राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) ने भी 2011 की अपनी जाँच में कहा था कि इन कब्रों में से कई विदेशी आतंकियों की थीं, जो मुठभेड़ों में मारे गए। फिर भी प्रोपेगेंडा मशीन ने इस सच्चाई को नजरअंदाज कर दिया क्योंकि मकसद सच नहीं बल्कि भारत को बदनाम करना था।

भुला दिए गए असली पीड़ित

जिन वैश्विक रिपोर्टों में ‘अनचिह्नित कब्रों’ को लेकर इतना शोर मचाया, उन्होंने 1989-90 में हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर लगभग चुप्पी साध ली थी। उन्होंने उन मुसलमानों के नरसंहारों को भी कम करके आँका जिन्होंने आतंकियों का विरोध किया था, जैसे वंधामा (1998), चित्तीसिंहपोरा (2000) और नादीमार्ग (2003)।

SYSF रिपोर्ट मानती है कि आतंकियों ने कश्मीर में बर्बर हिंसा फैलाई थी। रिपोर्ट कहती है, “आतंकी संगठनों ने लोगों को जबरन गायब किया, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की टार्गेटेड हत्याएँ कीं, अल्पसंख्यक समुदायों (खासकर कश्मीरी पंडित और उदारवादी मुसलमानों) को डराया-धमकाया और विरोध की हर आवाज को व्यवस्थित रूप से कुचल दिया।”

यहाँ उनकी कब्र भी हैं लेकिन एमनेस्टी की चमकदार रिपोर्टों में उनका जिक्र नहीं है। इस दोहरे रवैये की भी अपनी एक कहानी है।

जवाबदेही: भारत बनाम पाकिस्तान

आलोचक अक्सर 3 घटनाओं का जिक्र करते हैं, पठरीबल (2000), माछिल (2010) और अम्शीपोरा (2020) जहाँ निर्दोष नागरिक कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए। SYSF की रिपोर्ट में इनका सच भी नहीं छिपाया गया है। रिपोर्ट बताती है कि CBI ने पठरीबल को ‘नृशंस हत्या’ कहा, माछिल में पाँच जवानों को सजा मिली और अम्शीपोरा मामले में अफसर का कोर्ट-मार्शल हुआ।

यानी भारत ने गलती होने पर अपने ही लोगों को सजा दी। यही जवाबदेही है।

अब पाकिस्तान से तुलना कीजिए। SYSF बताती है कि बलूचिस्तान में ‘सामूहिक कब्रें’ मिली हैं, जहाँ लोगों को जबरन गायब किए जाने की घटनाओं की भरमार है। लेकिन हर बार जाँच रोक दी जाती है।

फर्क साफ है कि भारत अपनी गलतियों की जांच करता है, पाकिस्तान उन्हें संस्थागत प्रणाली का हिस्सा बना देता है।

प्रोपेगेंडा का क्या होता है फायदा

तो फिर यह नैरेटिव क्यों चलता रहा कि अनचिह्नित कब्रें ही भारत के अत्याचार की गवाही हैं? क्योंकि यह प्रोपेगेंडा का सबसे बड़ा हथियार था।

SYSF ने दावा किया है, “आतंकी और अलगाववादी नेटवर्क ने इन कब्रों की तस्वीरों का इस्तेमाल प्रचार के लिए किया। बिना पुख्ता सबूतों के बड़े-बड़े आरोप लगाए गए।”

पश्चिमी एनजीओ सुर्खियाँ बटोरने के लिए इन्हें दोहराते रहे। पाकिस्तानी डिप्लोमैट इस रिपोर्ट्स को UN में दिखाते रहे और अलगाववादी इनसे गुस्साए कश्मीरी युवाओं को और भड़काते रहे। इन कब्रों को मानसिक हथियार बना दिया गया।

अब सच सामने है कि ये कब्रें ज्यादातर पाकिस्तान से भेजे गए आतंकियों की हैं।

वैश्विक संदर्भ: बोस्निया या रवांडा नहीं है कश्मीर

सबसे खतरनाक चाल यह रही कि कश्मीर की कब्रों की तुलना बोस्निया के ‘जनसंहार’ वाली कब्रों से की गई। SYSF रिपोर्ट साफ बताती है, “जैसा ईरान, बोस्निया या रवांडा में हुआ, जहाँ राज्य दमन कारण था, वैसा कश्मीर में नहीं है।”

रिपोर्ट दावा करती है कि यहाँ कब्रें सीमा-पार आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन की वजह से बनीं, ना कि किसी एथनिक क्लीनजिंग की वजह से। इन दोनों को बराबरी पर रखना ही बेईमानी है।

क्यों अहम है यह रिपोर्ट

SYSF रिपोर्ट कोई भी सच्चाई नहीं छिपाती है। यह रिपोर्ट बताती है कि कहीं-कहीं गलतियाँ हुईं, अपने गायब लोगों की तलाश कर रहे परिवारों की बात करती है और जरूरत पड़े तो डीएनए टेस्टिंग की माँग भी करती है। असल मायने यह हैं कि रिपोर्ट ने कब्रों का सही संदर्भ सामने लाती है जिसमें आतंकवाद, पाकिस्तान का प्रॉक्सी वॉर और सुरक्षा बलों के ऑपरेशनल हालात शामिल हैं।

यह एक महत्वपूर्ण स्थानीय प्रयास है, जिससे दशकों से झूठ फैलाने वाली रिपोर्टों का सच सामने लाया जा सके। 93.2% कब्रों को दस्तावेजों के साथ दर्ज करके SYSF ने इस प्रोपेगेंडा की जड़ ही काट दी।

कब्रें बताती हैं असली कहानी

इस रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों ने प्रोपेगेंडा को पूरा तरह ध्वस्त कर दिया है, अब-
– 93.2% कब्रों की पहचान हो चुकी है।
– इनमें से ज्यादातर कब्रें विदेशी और स्थानीय आतंकियों की हैं, जो मुठभेड़ों में मारे गए।
– अब केवल 276 कब्रें अनचिह्नित हैं, जो कुल कब्रों का सिर्फ 6.8% है।

SYSF का निष्कर्ष है कि ये कब्रें किसी सुनियोजित भारतीय अत्याचार का सबूत नहीं हैं, बल्कि ‘एक मौजूदा और जारी संघर्ष की जटिल हकीकत हैं, जिसमें ऑपरेशनल जरूरतें और मानवीय त्रासदी दोनों शामिल हैं’।

एमनेस्टी, ह्यूमन राइट्स वॉच और अलगाववादी समूहों के गढ़े हुए झूठ की अब इन आँकड़ों के सामने पोल खुल गई है। ये कब्रें भारत की क्रूरता का नहीं बल्कि पाकिस्तान की ‘जिहादी आतंकवाद की राजनीति’ का सबूत हैं।

कश्मीरियों को सच जानने का हक है कि इन कब्रिस्तानों में दफन लोग भारत के शिकार नहीं थे बल्कि रावलपिंडी की चाल के मोहरे थे। भारतीय सेना ने इस खूनी खेल नहीं खेला बल्कि उसने इसे संभालने की कोशिश की। पाकिस्तान से निर्यात किया गया आतंकवाद ही उनके परिजनों की मौत और घाटी की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। भारतीय सुरक्षा बलों ने इसे नियंत्रित करने की कोशिश की और इसी के चलते आज कश्मीरी खुली हवा में साँस ले रहे हैं।

इंदौर का कांग्रेस पार्षद कश्मीर से गिरफ्तार, लव जिहाद में हिंदू लड़कियों को फाँसने के लिए देता था लाखों रुपए: बुर्का वाली महिलाओं ने समर्थन में किया प्रदर्शन

कांग्रेस पार्षद अनवर कादरी 
लव जिहाद के लिए फंडिंग करने वाला आरोपित कांग्रेस पार्षद अनवर कादरी को जम्मू कश्मीर से गिरफ्तार किया गया है। कादरी पर आरोप है कि वह हिंदू लड़कियों को फँसाने के लिए मुस्लिम युवकों को एक लाख और निकाह करने के लिए दो लाख रुपए देता था।

जानकारी के मुताबिक, पुलिस ने इससे पहले अनवर की बेटी आयशा को दिल्ली से गिरफ्तार किया था। उसकी खोज में पुलिस ने पहले दिल्ली में भी दबिश दी थी, लेकिन अनवर फरार हो गया था।

अनवर कादरी की बेटी आयशा से भी पुलिस को कई जानकारी मिली है। इसके बाद और गिरफ्तारियाँ होने की भी संभावना है। उसके अलावा इंदौर पुलिस ने साहिल शेख और अल्ताफ के खिलाफ भी दो युवतियों के साथ रेप और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने का मामला दर्ज किया था।

इसके बाद जाँच के दौरान आरोपितों ने कांग्रेस पार्षद अनवर कादरी का नाम लिया था। दोनों ने पुलिस को बताया था कि अनवर ने युवकों को एक हिंदू लड़की को फँसाने के लिए एक लाख रुपए और निकाह कराने पर दो लाख रुपए देने की बात कही थी।

उसके बाद मोबाइल जाँच में यह सामने आया कि वह ‘अर्जुन’ और ‘राज’ जैसे नामों का इस्तेमाल कर हिंदू लड़कियों से दोस्ती करता था और फिर उन्हें मिलने बुलाता था। इसके बाद उन पर निकाह और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जाता था। 2011 में कांग्रेस पार्षद अनवर कादरी, उसका भाई और एक अन्य आरोपित जानलेवा हमले के मामले में भी एक-एक साल की सजा काट चुके है। 

रिपोर्ट के मुताबिक, उसकी गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही इंदौर के वार्ड 58 की मुस्लिम महिलाओं ने अनवर कादरी के समर्थन में सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया है। बता दें कि मध्य प्रदेश पुलिस ने उसे पकड़ने के लिए पहले 10 हजार का इनाम घोषित किया था लेकिन बाद में ये इनाम राशि बढ़ाकर 20 हजार रुपए कर दी गई थी।

‘मैं कोई मलाला नहीं… अपने भारत में सुरक्षित हूँ’ : ब्रिटेन की संसद में कश्मीरी पत्रकार याना मीर ने प्रोपेगेंडा फैलाने वालों को लताड़ा

याना मीर ने कहा- 'मैं मलाला युसूफजई नहीं'
जम्मू कश्मीर की पत्रकार याना मीर ने ब्रिटिश संसद में एक कार्यक्रम के दौरान गर्व से खुद को कश्मीर में सुरक्षित बताया। उन्होंने संसद में जो भाषण दिया वो अब सोशल मीडिया पर वायरल है। इसमें उन्होंने कहा कि वह कोई पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई नहीं है, वह अपने जम्मू-कश्मीर में सुरक्षित महसूस करती हैं।

उन्होंने कहा, “मैं मलाला यूसुफजई नहीं हूँ क्योंकि मैं आजादू हूँ, अपने देश भारत में, अपने घर कश्मीर में, जो भारत का अभिन्न अंग है। मैं यह कह सकती हूँ कि मुझे कभी भी अपने देश से भागकर आपके देश में शरण लेने की नौबत नहीं आएगी। मैं कभी भी मलाला यूसुफजई नहीं बनूँगी। लेकिन मैं मलाला द्वारा मेरे देश और मेरी प्रगतिशील मातृभूमि कश्मीर को उत्पीड़ित कहकर बदनाम करने की साजिश से आपत्ति जताती हूँ। मुझे सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के ऐसे सभी टूलकिट सदस्यों से आपत्ति है जिन्होंने कभी कश्मीर जाने की परवाह नहीं की, लेकिन उत्पीड़न की कहानियाँ गढ़ते रहते हैं।”

मीर ने कहा, “मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि आप मजहब के आधार पर भारतीयों को बाँटने का काम बंद कर दीजिए। हम आपको कभी भी हमें तोड़ने की इजाजत नहीं देंगे। मुझे उम्मीद है कि हमारे देश के अपराधी जो पाकिस्तान और ब्रिटेन में रहते हैं वो अंतरराष्ट्रीय मीडिया या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों पर भारत को बदनाम करना बंद करेंगे। सेलेक्टिव प्रोपगेंडा फैलाना बंद कर दीजिए। भारतीय समाज का तुष्टिकरण करना बंद कीजिए।”

इस दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर भी निशाना साधा। याना ने कहा- “ब्रिटेन के लिविंग रूम से रिपोर्टिंग करके भारत को बाँटने की कोशिश बंद कीजिए। आतंकवाद के कारण कश्मीर की हजारों माँ पहले ही अपने बच्चे खो चुके हैं। हमारा पीछा करना बंद कर दीजिए। कश्मीरों लोगों को शांति से जीने दीजिए। धन्यवाद। जय हिंद”

जानकारी के मुताबिक, कश्मीरी पत्रकार याना मीर ने यूके पार्लियमेंट में आयोजित ‘संकल्प दिवस’ के कार्यक्रम में अपनी बात कही। यह कार्यक्रम जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर, यूके (जेकेएससी) द्वारा करवाया गया था। इस कार्यक्रम में 100 से अधिक लोग थे। इनमें यूके संसद के सदस्य, स्थानीय पार्षद, सामुदायिक नेता और बहुत लोग शामिल थे। इस कार्यक्रम में याना ने जिस मलाला का नाम लेकर लिया वो एक पाकिस्तानी कार्यकर्ता हैं और उन्हें नोबेल प्राइज भी मिल चुका है। मलाला कभी पाकिस्तान के स्वात में रहती थीं। वहाँ तालिबानियों ने उनके सिर में गोली मार दी थी। ब्रिटेन में उनका लंबे तक इलाज चला और उसके बाद वह वहीं रहने लगीं।


जेल के बाहर भी आतंकी रहेगा ‘कैद’, भागेगा तो दबोचा जाएगा: जम्मू-कश्मीर पुलिस GPS ट्रैकर इस्तेमाल करने वाली देश की पहली पुलिस बनी

                                                                                             आतंकी गुलाम मोहम्मद भट्ट (साभार: ANI)
आतंकियों को जमानत पर छोड़ने के बाद उन पर कड़ी निगाह रखी जाएगी। इसके लिए उनके पैरों में GPS ट्रैकर डालने का निर्णय लिया है। ऐसा करने वाली जम्मू-कश्मीर पुलिस देश की पहली पुलिस फोर्स बन गई है। आतंकियों के पैरों में डाले गए इस ऐंकलेट के जरिए आतंकी की गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी।

GPS ट्रैकर एंकलेट एक डिवाइस होती है। इसे किसी शख्स के टखने के चारों तरफ चिपका दिया जाता है। इसे लगाने के बाद वह व्यक्ति जहाँ भी जाएगा, उसके बारे में ऑपरेटर को जानकारी मिलती रहेगी। अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में जमानत या परोल पर जाने वाले कैदियों के लिए इस डिवाइस का इस्तेमाल किया जाता है।

पुलिस का कहना है कि इस डिवाइस को NIA की स्पेशल कोर्ट के एक आदेश के बाद इस्तेमाल में लाया गया है। NIA की स्पेशल कोर्ट ने पुलिस को एक खूँखार आतंकी पर नजर रखने के लिए उस पर जीपीएस ट्रैकर लगाने का निर्देश दिया था। पश्चिमी देशों में इस डिवाइस का इस्तेमाल घर में नजरबंद कैदियों की निगरानी के लिए भी किया जाता है।

जिस आतंकी पर पहली बार इस ट्रैकर का इस्तेमाल किया गया है, उसका नाम गुलाम मोहम्मद भट्ट है। भट्ट को UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था। उसने जमानत के लिए कोर्ट में आवेदन किया था। जमानत पर सुनवाई लंबित रहने के कारण आरोपित ने कोर्ट से अंतरिम जमानत की माँग की थी। इसके बाद कोर्ट ने यह निर्णय दिया।

आरोपित गुलाम भट्ट पर कई आतंकी संगठनों से जुड़े होने के आरोप हैं। वह प्रतिबंधित आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन केकहने पर कश्मीर में आतंकी फाइनेंसिंग में शामिल हो गया था। ऐसे ही एक मामले में उसे गिरफ्तार किया गया था। उसे 2.5 लाख रुपए की टेरर फाइनेंसिंग करते समय गिरफ्तार किया गया था।

वहीं, एक अन्य मामले में आतंकी संगठन से जुड़ने और साजिश रचने के आरोप में NIA कोर्ट और दिल्ली की पाटियाला हाउस कोर्ट ने उसे दोषी ठहरा चुकी है। इसको देखते हुए कोर्ट ने पुलिस से उस पर कड़ी निगरानी रखने के लिए कहा था। इसके बाद अभियोजन पक्ष की दलील के बाद कोर्ट ने उस पर जीपीएस ट्रैकर लगाने का निर्देश दिया।

‘इजरायल के जालिमों फिलिस्तीन खाली करो’: धरने पर बैठीं महबूबा मुफ़्ती ने दी ‘बंदूक उठाने’ वाली धमकी, बोलीं – जुल्म बंद नहीं हुआ तो…

फिलिस्तीन के समर्थन में सड़क पर उतरीं महबूबा मुफ्ती (साभार-X हैंडल महबूबा मुफ़्ती)
इजरायल पर हमास द्वारा किए गए आतंकी हमले के जवाब में इजरायल-हमास के बीच 15वें दिन भी युद्ध जारी है। इजरायली सेना लगातार गाजा में हमास के ठिकानों को निशाना बना रही है। इसी बीच पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी खुलेआम फिलिस्तीन के समर्थन में उतर आई हैं।

भारत में टीवी चर्चाओं से लेकर सड़क तक इजराइल के विरुद्ध विधवा विलाप करने वाले हमास द्वारा बेगुनाह 14,000 नागरिको को मारे जाने पर क्यों चुप्पी साधे हुए हैं? पहल करने वाले को गुनहगार क्यों नहीं बोलते? इजराइल के विरुद्ध शोर मचाने वाले उस समय क्यों चुप थे, जब इस्लामिक आतंकवादी भारत में निर्दोष लोगों के खून की होली खेल रहे थे? ये पाखंडी पाकिस्तान द्वारा भारत के कश्मीर के हिस्से को हड़पने पर क्यों चुप हैं? 

दूसरे, ये वही पाखंडी नेता हैं, जो पुलवामा में मारे गए जवानों पर सरकार से कार्यवाही की मांग कर रहे थे, और जब सरकार ने कार्यवाही की तो सबूत मांग रहे थे। पुलवामा में जितने निर्दोष मारे गए, उससे हज़ार गुना तो हमास ने इजराइल में मारे हैं, तो क्या इजराइल सरकार हाथों में चूड़ियां पहनकर बैठी रहती? इन पाखंडी वोट के भूखे नेताओं को विदेशी विपक्ष से शिक्षा लेनी चाहिए, जो संकट की इस घडी में सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हत्यारों को सजा देने के लिए तत्पर हैं। लेकिन ये भारतीय छद्दम सेक्युलरिस्ट्स कभी 'हिन्दू आतंकवाद' तो कभी 'भगवा आतंकवाद' कहकर हिन्दुओं को बदनाम कर आतंकवादियों का बचाव कर रहे थे। 

जितना शोर भारत के पाखंडी छद्दम सेक्युलर नेता मचा रहे है, किसी में किसी मुस्लिम देश से इन्हें अपने देश में शरण देने को कहने की हिम्मत है? एक बार एक देश ने गलती की थी, लेकिन वहां जेहादी हरकतें करने पर देश से बाहर कर दिया था। इसी वजह से कोई मुस्लिम देश इन्हीं शरण देने को तैयार नहीं। 

 

महबूबा मुफ़्ती ने श्रीनगर में सड़क पर उतरकर फिलिस्तीन का झंडा लिए हुए विरोध-प्रदर्शन किया। जिसका वीडियो भी वायरल हुआ है जिसमें वह इजरायल का विरोध और फिलिस्तीन का समर्थन करती नजर आती हैं। हालाँकि, पूरे प्रदर्शन में उन्होंने हमास के आतंकियों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला।

 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वह फिलिस्तीन का झंडा लिए सड़क पर बैठ कर विरोध-प्रदर्शन कर रही थीं। उन्होंने इजरायल गो बैक के नारे लगाते हुए कहा, “फिलिस्तीन में 1500 बच्चे मारे गए हैं और पूरी दुनिया तमाशा देख रही है। अगर इजरायल को फिलिस्तीन पर जुल्म करने से नहीं रोका गया तो नतीजा खतरनाक होगा। पूरी दुनिया को इजरायल पर दबाव बना, जंगबंदी को लागू कराना चाहिए।”

गो बैक इजरायल गो बैक के नारेबाजी कर रहे पीडीपी के प्रदर्शनकारियों ने कहा कि इजरायल को गाजा पट्टी पूरी तरह से खाली कर फिलिस्तीनियों को उनका हक दे देना चाहिए। प्रदर्शन में शामिल महबूबा मुफ्ती ने कहा कि फिलिस्तीन के हालात अत्यंत गंभीर हैं। और पूरी दुनिया तमाशा देख रही है। किसी को भी फिलिस्तीन में 1500 बच्चों की मौत नजर नहीं आ रही है।

इतना ही नहीं महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में पीडीपी कार्यकर्ताओं ने भी आज पार्टी मुख्यालय के बाहर फिलिस्तीन के समर्थन में धरना दिया। धरने पर बैठे पीडीपी नेताओं व कार्यकर्ताओं ने इजरायल के खिलाफ और फिलिस्तीनियों के समर्थन में लिखे नारों वाले बैनर और तख्तियाँ ले रखी थी। 

वहीं महबूबा मुफ्ती ने रूस-यूक्रेन युद्ध का हवाला देते हुए कहा कि जब यूक्रेन में दो वर्ष के भीतर 500 बच्चे मारे गए तो पूरा विश्व चीखने लगा था। आज फिलिस्तीन में हजारों की संख्या में लोग मारे जा रहे हैं तो कोई बात नहीं कर रहा है। हम दुनिया भर के देशों से अपील करते हैं कि इजरायल पर दबाव बनाकर सीजफायर कराओ। अगर इजरायल का यह जुल्म बंद नही कराया गया तो इसके नतीजे बहुत खतरनाक होंगे।

इतना ही नहीं उन्होंने लगभग धमकी देते हुए कहा कि यदि इजरायल का यह जुल्म बंद नहीं हुआ तो और भी लोग बन्दूक उठाएँगे। इससे दुनिया में और भी अधिक हालात खराब होंगे। इसलिए हम कहते हैं कि इजरायल के जालिमों फिलिस्तीन को खाली करो। 

हमास द्वारा इजरायल पर किए गए आतंकी हमले में जहाँ करीब 1400 लोग मारे गए हैं वहीं 200 से अधिक के बंधक बनाए जाने की बात भी सामने आई है। इसके बाद गाजा पर इजरायल द्वारा की गई कार्रवाई में सैकड़ों बच्चों सहित करीब 4,137 लोगों के मारे जाने का दावा किया जा रहा है। जबकि दस लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। इसके अलावा 13,000 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं।


भारतीय सेना को बदनाम करने वाली अरुंधति रॉय पर चलेगा मुकदमा: दिल्ली के उप-राज्यपाल ने दी मंज़ूरी, कहा था – ‘कश्मीर कभी नहीं रहा भारत का अभिन्न अंग’

दिल्ली के उप-राज्यपाल विजय कुमार सक्सेना ने लेखिका अरुंधति रॉय के खिलाफ अभियोग चलाने को मंज़ूरी दे दी है। ये मामला 2010 में दिए गए भड़काऊ भाषण का है। राज निवास के अधिकारियों ने मंगलवार (10 अक्टूबर, 2023) को इसकी जानकारी दी। अरुंधति रॉय के साथ-साथ जम्मू कश्मीर के एक प्रोफेसर शेख शौकत हुसैन के खिलाफ भी अभियोग चलाए जाने को मंज़ूरी दे दी गई है। नई दिल्ली स्थित मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत के आदेश के बाद इन दोनों के विरुद्ध FIR दर्ज की गई थी।

शेख शौकत हुसैन ‘सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर’ में इंटरनेशनल लॉ का प्रोफेसर रहा है। उप-राज्यपाल ने पाया कि दोनों के खिलाफ मामला चलाए जाने के लिए पर्याप्त आधार हैं। दोनों के खिलाफ IPC (भारतीय दंड संहिता) की धारा-153A (धर्म, नस्ल, स्थान या भाषा के आधार पर 2 समुदायों में नफरत पैदा करना, शांति भंग करना), 153B (राष्ट्रीय अखंडता के विरुद्ध बातें करना) और 505 (भड़काऊ बयान देना) के तहत मामला दर्ज किया जा चुका है।

दिल्ली में ही एक भाषण के दौरान इन दोनों ने इस तरह की बयानबाजी मंच से की थी। दोनों के खिलाफ IPC की धारा-124A (राजद्रोह) के तहत भी मुकदमा चलाया जाना था, लेकिन ये संभव नहीं हो सका क्योंकि इस धारा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि उसकी संवैधानिक पीठ की सुनवाई पूरी होने तक सारे मामले रोक दिए जाएँ। इस मामले में 2 अन्य अभियुक्त अलगाववादी सैयस अली शाह गिलानी और दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेक्चरर रहे अब्दुल रहमान गिलानी की मौत हो चुकी है।

28 अक्टूबर, 2010 को कश्मीरी कार्यकर्ता सुशील पंडित ने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई थी। ‘आज़ादी – द ओनली वे’ के बैनर तले इस कार्यक्रम को आयोजित किया गया था और इसमें ‘सभी राजनीतिक बंदियों को मुक्त करने के लिए कमिटी (CRPP)’ ने इसे आयोजित किया था। इसमें कश्मीर को शेष भारत से अलग करने की बात की गई थी। अरुंधति रॉय ने कहा था कि कश्मीर कभी भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं रहा है। साथ ही उन्होंने झूठा दावा किया था कि भारतीय अधिकारियों ने संयुक्त राष्ट्र में इसे स्वीकार किया है।

भारत विरोधी अरुंधति रॉय ऐसे ही झूठ फैलाने के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान भी न केवल पीएम केयर्स फंड के बारे में झूठ बोला, बल्कि भारत के टीकाकरण अभियान और SII और भारत बायोटेक द्वारा विकसित COVID-19 टीकों के बारे में भी गलत सूचनाएँ फैलाई थीं। उन्होंने कहा था कि मोदी सरकार मुस्लिमों का नरसंहार करने के लिए कोरोनावायरस के प्रकोप का उपयोग कर रही है।कश्मीर में आतंकवाद निरोधी अभियानों को उन्होंने लगातार ‘सरकार प्रायोजित’ आतंकवाद के रूप में संदर्भित किया था।