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उत्तर प्रदेश : जमीन जिहाद :क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद के बलिदान स्थल वाले पार्क पर वक़्फ़ बोर्ड का कब्ज़ा कैसे हुआ और किसने करवाया?

                                      प्रयागराज में चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में बनी है सुन्नी वक्फ बोर्ड वाली दरगाह
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (Prayagraj, Uttar Pradesh) में चल रहा माघ मेला अब समापन की ओर है। इस माघ मेले (Magh Mela) में सुविधा और सुरक्षा को लेकर अधिकतर संत और श्रद्धालु शासन और प्रशासन से संतुष्ट दिखे। ऑपइंडिया की टीम ने भी धर्मक्षेत्र कहे जाने वाले माघ मेले का दौरा किया।

काफी चीजों में जहाँ शासन-प्रशासन के कार्य सराहनीय पाए गए तो एकाध स्थान ऐसे भी रहे, जो लगा कि सरकार की नजर से छूट गए। इन्हीं स्थानों में सबसे प्रमुख है प्रयागराज में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़े स्थान। हमने उन बिंदुओं की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करने का फैसला किया है। प्रस्तुत है भाग ..

अधिकतर स्थान अंग्रेजों के नाम पर

9 फरवरी 2023 को हम उस चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में थे, जहाँ 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों से लड़ते हुए आज़ाद ने वीरगति पाई थी। यहाँ ये बात गौर करने योग्य है कि चंद्रशेखर आजाद को घेरकर खुद को गोली मारने पर मजबूर करने वालों में अधिकतर सिपाही भारतीय थे।
ये भारतीय सिपाही ब्रिटिश अफसर नॉट बावर के अधीनस्थ लड़ रहे थे। उन्हीं में एक प्रमुख नाम इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह का है, जो उस समय कर्नलगंज थाने का SHO हुआ करता था। उस कर्नलगंज थाने का नाम आज भी ज्यों-का-त्यों ही है।
                                                     थाना कर्नलगंज, प्रयागराज (फाइल फोटो)
प्रयागराज न सिर्फ चंद्रशेखर आज़ाद, बल्कि उनके साथी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से विख्यात रामप्रसाद सिंह तोमर सहित कई अन्य वीरों की कर्मभूमि रहा है। हालाँकि, यहाँ घूमते हुए आपको कई स्थानों के नाम अभी भी अंग्रेजों के नाम पर मिल जाएँगे। इनमें स्टैनली रोड, कर्नलगंज, मम्फोर्डगंज, बेली रोड व अस्पताल और एलनगंज आदि प्रमुख हैं।

पार्क में घुसते ही दरगाह

चंद्रशेखर आज़ाद पार्क का मुख्य द्वार गेट नंबर 1 है। यहाँ से पार्क में घुसने वालों को 0 किलोमीटर का बोर्ड भी लगा दिखाई देता है। जैसे ही गेट नंबर 1 से कोई पार्क में प्रवेश करता है, वैसे ही उसे पार्क प्रशासन और DM प्रयागराज का बोर्ड लगा मिलता है।
इस बोर्ड में साफ तौर पर हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए लिखा गया गया है कि उस स्थान का प्रयोग सिर्फ पार्क के लिए होगा। हालाँकि, इसी बोर्ड से महज 50 मीटर की दूरी पर हमें एक मजार दिखी जहाँ कई लोग जियारत करते दिखाई दिए।
                                                                दरगाह का बाहरी हिस्सा
जैसे ही हम मज़ार के अंदर गए तो वहाँ हमें कुछ लोग एक कुएँ के पास घेरा लगाए बैठे मिले। दरगाह 2 हिस्सों में थी और दूसरे भाग में कुछ लोग एक कब्र को घेरे हुए थे। हमने वहाँ के खादिम से बात करनी चाही तो वसीम नाम के व्यक्ति से हमने मिलवाया गया।
वसीम ने हमें दरगाह को औरंगजेब के जमाने का बताया। वहाँ जियारत कर रहे लोगों के बारे में वसीम ने दावा किया कि दरगाह पर आने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है। खादिम वसीम ने हमें बताया कि वो सरकार से चाहते हैं कि मज़ार को व्यापक रूप दिया जाए।
                                                 दरगाह के खादिम वसीम और उनके सहयोगी

सुन्नी वक्फ बोर्ड का लगा है पोस्टर

जब हमने खादिम वसीम को मजार के बारे में और बताने के लिए कहा तो उन्होंने हमें एक बोर्ड दिखाया, जिस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड लिखा हुआ था। हमने बोर्ड को पूरा पढ़ा तो उसमें अरबी भाषा में 786 के बाद वो जगह हजरत शंदल शाह और गुलाब शाह बाबा की दरगाह लिखी हुई थी।
दरगाह की जगह कम्पनी बाग़ यानी चंद्रशेखर आज़ाद पार्क के अंदर बताई गई। इस बोर्ड में दावा किया गया है कि गुलाब शाह और शंदल शाह 1857 की क्रान्ति में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। हालाँकि, हमने पार्क प्रशासन से इस दावे के संबंध में सबूत माँगे तो उनके पास यह मौजूद नहीं था।
                                                            वक्फ बोर्ड वाली दरगाह

उर्दू में है, पढ़ नहीं पाओगे

1857 की क्रांति में गुलाब शाह और शंदल शाह की शहादत के बारे में जब हमने मजार के खादिम वसीम से कुछ सबूत दिखाने के लिए कहा तो उन्होंने टाल दिया। खादिम वसीम बोले, “कागज उर्दू में है। पढ़ नहीं पाओगे।”
1857 की क्रांति में गुलाब शाह और शंदल शाह की शहादत के बारे में जब हमने मजार के खादिम वसीम से कुछ सबूत दिखाने के लिए कहा तो उन्होंने टाल दिया। खादिम वसीम बोले, “कागज उर्दू में है। पढ़ नहीं पाओगे।”
सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के इस पोस्टर के मुताबिक, यह जगह पहले रसूलपुर व समदाबाद नाम से जानी जाती थी। इसी बोर्ड में दरगाह के लिए सहयोग की अपील की गई है। खादिम के तौर पर बोर्ड में किसी जमील खाँ का नाम लिखा हुआ था। हालाँकि, खुद को खादिम बता रहे वसीम ने यह बोर्ड उखाड़ कर अंदर रखा हुआ था।
                              दरगाह से सट कर पार्क को पार्क ही रखने का हाईकोर्ट के हवाले से आदेश

मर्द टोपी पहने और औरतें न छुएँ मजार

इस मजार के गेट मुख्य पर शंदल शाह का नाम हजरत सैयद फ़िरोज़ अली बाबा रहमत उल्लाह अलैह के तौर पर भी दर्ज है। मजार के बाहर साफ तौर पर आदेश है कि मर्द अंदर घुसने से पहले सिर पर टोपी रखें और औरतें पल्लू।
इसमें औरतों को साफ़ तौर पर आदेश है कि वो मजार का पीछा करके न जाएँ और आगे से आएँ। औरतों को मजार छूने से भी साफ मना किया गया है। यहाँ जो चंदा देना चाहते हैं, उसके लिए एक गुल्लक रखा हुआ है।
                                                                        दरगाह के निर्देश

बाहर फूल बेच रही महिला लम्बे समय से बीमार

हालाँकि, मजार के खादिम वसीम का कहना था कि वहाँ आने के बाद तमाम समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है, लेकिन मजार के बाहर लम्बे समय से फूल बेचने वाली महिला खुद को लम्बे समय से बीमार बता रही थी।
दरगाह के ही एक सदस्य से लम्बी बातचीत की रिकॉर्डिंग ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जिसमें वो तमाम दवा लेने और अस्पतालों के चक्कर लगाने की जानकारी दे रही है। हैरानी की बात ये रही कि दरगाह का नियमित सदस्य ही उस महिला को अच्छे डॉक्टर के पास जाने की सलाह दे रहा था।
बात दें कि अक्टूबर 2021 में साल हाईकोर्ट के आदेश पर चंद्रशेखर पार्क के अंदर बने मस्जिद, मजार, 14 कब्र सहित दर्जन भर अवैध अतिक्रमणों को तोड़ा गया था। हाईकोर्ट ने साल 1975 के बाद बने अवैध निर्माणों को हटाने का निर्देश दिया था।
इन अवैध निर्माणों को हटाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र सिंह बिसेन याचिका दाखिल की थी। उन्होंने याचिका में कहा था कि इतने महान स्वतंत्रता सेनानी से जुड़े इस पार्क पर अतिक्रमण होना मामूली घटना नहीं है। एक साजिश के तहत इस पर कब्जा किया जा रहा है।
चंद्रशेखर आजाद पार्क 133 एकड़ में फैला है। अवैध अतिक्रमण हटाने से पहले लगभग 25-30 साल पहले वहाँ मस्जिद, मजार और कब्र बना दिए गए थे। उस दौरान वहाँ लगभग 20 मजार व तीन मस्जिद बनाई जा चुकी थीं।
हालाँकि, यहाँ बने मजार पर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अपना दावा किया है। सितंबर 2022 में मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में एक याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि ये मजार 200 साल पुराना है। हालाँकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मजार अवैध है।
प्रयागराज में ही मौजूद चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़े एक अन्य भूले-बिसरे स्थान की चर्चा हम अपनी अगली रिपोर्ट में करेंगे।                   (साभार: राहुल पाण्डेयhttp://www.opindia.com)

काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद : सुन्नी सेंट्रल वक़्फ बोर्ड को नोटिस जारी

विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद (पत्रिका से साभार)
विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद
अयोध्या में श्रीराम मंदिर का भव्य निर्माण शुरू होने के साथ ही अब वाराणसी में ‘ज्ञानवापी परिसर’ को मुक्त कराने की कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है। इस मुद्दे पर सोमवार(अगस्त 10) को वाराणसी की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में सुनवाई हुई थी। वहीं जिला जज की अदालत ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से कोर्ट में उपस्थिति न होने के कारण सुनवाई की अगली तारीख 1 सितंबर को निर्धारित कर दी है। इससे पहले प्रतिवादी अंजुमन इंतजामिया मस्जिद की तरफ से 1 जुलाई को इस मुद्दे पर याचिका दाखिल की गई थी।
अयोध्या में रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के शिलान्यास के बाद से ही काशी और मथुरा का मुद्दा भी गरमाता नजर आ रहा है। लोगों की निगाहें अब काशी विश्वनाथ मंदिर के फैसले पर टिकी हुई है।
प्रतिवादी अंजुमन इंतजामिया मस्जिद की ओर से अर्जी दी गई कि मामले में सुनवाई नहीं हो सकती हैं। इस मामले की सुनवाई सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार में नहीं है। कोर्ट ने सुनवाई के बाद प्रतिवादी की याचिका खारिज कर सुनवाई चालू रखने का आदेश दिया। उधर प्रतिवादी की ओर से एक और अर्जी दी गई। कहा गया कि लखनऊ वफ्फ बोर्ड ट्रिब्यूनल न्यायाधिकरण के पास प्रकरण को भेजा जाए। अदालत ने इस अर्जी को 25 फरवरी को खारिज कर दिया। इसी आदेश के खिलाफ प्रतिवादी ने जिला जज की अदालत में एक जुलाई को याचिका दाखिल की है।
वहीं एक जुलाई को दायर याचिका की सुनवाई करते हुए जिला जज की अदालत ने प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को नोटिस जारी करने का आदेश देते हुए अग्रिम सुनवाई के लिए एक सितंबर की तिथि तय की है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर की ओर से पंडित सोमनाथ व्यास और डॉ. रामरंग शर्मा ने ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण और हिंदुओं को पूजा-पाठ का अधिकार देने आदि को लेकर वर्ष 1991 में मुकदमा दायर किया है। जिस पर बाद में हाईकोर्ट की ओर से स्टे दे दिया गया।
पिछले वर्ष दिसंबर में वादमित्र ने सिविल कोर्ट (सीनियर डिवीजन-फास्टट्रैक) में एक और याचिका दाखिल कर पूरे परिसर का पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की माँग की। कहा कि लम्बा समय होने के कारण पूर्व के स्टे का आदेश स्वत: खारिज हो जाता है। लिहाजा, इस मामले में सुनवाई शुरू की जाए।
दिवंगत वादी पंडित सोमनाथ व्यास और डॉ. रामरंग शर्मा के स्थान पर प्रतिनिधित्व करने के लिए पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (सिविल) विजय शंकर रस्तोगी को न्याय मित्र नियुक्ति किया गया।
इस मामले में भगवान विश्वेश्वर पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील राजेंद्र प्रताप पांडेय पैरवी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अंजुमन इंतेजामि‍या बनारस और यूपी सुन्‍नी सेंट्रल चाहता था कि इस कार्यवाही को स्थगित कर दी जाए और आगे कोई सुनवाई न हो। कोर्ट द्वारा उनकी माँगें ख़ारिज किए जाने के बाद अब इस मामले में कार्यवाही चलेगी। नवम्बर 2019 में सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर के पक्ष में फ़ैसला आने के बाद अब लोगों के भीतर उम्मीद जगी है कि मथुरा व काशी विवाद में भी हिन्दुओं को न्याय मिलेगा।
काशी विश्वनाथ व ज्ञानवापी मस्जिद का मामला हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट, दोनों में ही चल रहा था। बाद में हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमा एक ही कोर्ट में चलेगा और सेशन कोर्ट में जारी रहेगा। वादी पक्ष की तरफ से पूरे ज्ञानवापी परिसर के एएसआई द्वारा भौतिक सर्वे कराने के लिए आवेदन दिया गया था, जिस पर मुस्लिम पक्ष ने आपत्ति जताई थी। उसका कहना था कि हाईकोर्ट के 1998 में दिए गए आदेश के अनुसार इस मामले में स्टे लगा हुआ है।

सुन्नी वक्फ बोर्ड ने राजीव धवन को अयोध्या केस से हटाया

अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद में सुन्नी वक्फ बोर्ड समेत मुस्लिम पक्ष की ओर से जिरह करने वाले सीनियर वकील राजीव धवन को केस से हटा दिया गया है. राजीव धवन ने खुद फेसबुक पर पोस्ट लिखकर इसकी जानकारी दी है.
राजीव धवन ने फेसबुक पर लिखा-'जमीयत को ये हक है कि वो मुझे केस से हटा सकते हैं, लेकिन जो वजह दी गई है वह गलत है. कहा जा रहा है कि मुझे केस से इसलिए हटा दिया गया है, क्योंकि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. ये बिल्कुल गलत है.'
अयोध्या केस में पुनर्विचार याचिका दाखिल
सोमवार को अयोध्या रामजन्मभूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट में पहली पुनर्विचार याचिका दाखिल हुई. मुस्लिम पक्षकार एम सिद्दीकी ने 217 पन्नों की पुनर्विचार याचिका दाखिल की. एम सिद्दीकी की तरफ से मांग की गई कि संविधान पीठ के आदेश पर रोक लगाई जाए, जिसमें कोर्ट ने विवादित जमीन को राम मंदिर के पक्ष दिया था. याचिका में मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट नहीं बनाने की भी अपील की गई है. याचिका में कहा गया कि इस मामले में पूर्ण न्याय तभी होता जब मस्जिद का पुनर्निर्माण होगा.

अयोध्या पर 9 नवंबर को आया था सुप्रीम कोर्ट का फैसला
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को अयोध्या मामले पर अपना फैसला सुनाया था. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई  की अध्‍यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने विवादित जमीन पर रामलला विराजमान के हक में फैसला दिया है. सरकार को यह भी आदेश दिया कि वह मस्जिद के लिए सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड को अयोध्‍या में कहीं भी पांच एकड़ जमीन मुहैया कराए. कोर्ट ने केंद्र सरकार को राम मंदिर के लिए 3 महीने में एक्शन रिपोर्ट बनाकर निर्माण कार्य शुरू करने का आदेश दिया है.

सुन्नी वक्फ बोर्ड दूसरी जगह मस्जिद बनाने को तैयार: सूत्र

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अयोध्या मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 40 दिन तक चलने के बाद खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट नवंबर में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद फैसला सुनाएगा। सूत्रों के मुताबिक मध्यस्थता पैनल ने भी अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है। इसमें एक बड़ी ख़बर सामने आ रही है कि सुन्नी वक्फ़ बोर्ड (Sunni Waqf Board) सरकार को जमीन देने को तैयार हो गया है। साथ ही वक्फ बोर्ड दूसरी जगह मस्जिद बनाने के लिए भी तैयार है। बता दें कि इससे पहले CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पांच जजों की बेंच ने इस मामले में 40 दिन तक सुनवाई करने के बाद दलीलें पूरी कर लीं।
बेंच ने अयोध्या भूमि विवाद मामले में संबंधित पक्षों को ‘मोल्डिंग ऑफ रिलीफ' (राहत में बदलाव) के मुद्दे पर लिखित दलील दाखिल करने के लिए तीन दिन का समय दिया है। इस पीठ में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर भी शामिल हैं। बता दें कि कोर्ट ने पहले ही कहा था कि सुनवाई 17 अक्टूबर को पूरी हो जाएगी। बाद में इस समय सीमा को एक दिन पहले कर दिया गया।
पांच जजों की बेंच ने अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि को तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला-के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश देने संबंधी इलाहाबाद हाईकोर्ट के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सुनवाई की है।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार योगी सरकार ने शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड के संपत्तियों की खरीद-फरोख्त में अनियमितता क.....

सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के इस निर्णय ने हिन्दू-मुस्लिम सभी को चकित कर दिया है। चर्चा यह है भी है कि "जब यह कदम लेना था, फिर किस कारण इसे इतने वर्षों तक लंबित कर, हिन्दू-मुसलमानों के बीच नफरत फ़ैलाने का काम करता रहा। इस विवाद में जो लाखों जानें गयीं, उनका कौन जिम्मेदार है? अब से पहले भाईचारा और गंगा-यमुना तहजीब कहाँ थी? क्या इस मुद्दे को विवादित बनाने के लिए इनको कहीं से फंडिंग हो रही थी, जो मोदी सरकार की कूटनीति के कारण बंद होने के कगार पर थी? 
रामजन्म स्थान को विवादित बनाकर राम विरोधियों ने मक्का पर भी ऊँगली उठवा दी है। अक्टूबर 16 को रिपब्लिक भारत चैनल पर अयोध्या और फैज़ाबाद से जनता की लाइव कवरेज में जनता ने मक्का मदीना में हज के दौरान बंद कमरे के आगे सजदा किया जाने पर सवाल खड़ा कर दिया है।   
सूत्रों का यह भी कहना है कि योगी सरकार द्वारा वक़्फ़ बोर्ड सम्पत्तियों में धांधली और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की सीबीआई से जाँच के आदेश ने अपने आपको इस बचाने रखने के दबाव में यह कदम उठाया है। क्योकि सीबीआई जाँच में समस्त धांधलियों के उजागर होते ही मुस्लिम समाज में इनका दबदबा समाप्त होते ही कोई इनको टके के लिए भी नहीं पूछेगा। योगी-मोदी सरकारों द्वारा साम, दाम, दण्ड और भेद नीति ने इनको घुटनों के बल आने को मजबूर किया है कि जिस तरह मुस्लिम एनजीओस की जाँच होने प्रारम्भ हुई है, इन मुस्लिम एनजीओस के पदाधिकारियों को अपनी इज्जत बचाने की खातिर सबकी नींद हराम हो चुकी है। इतना बड़ा कदम उठाने के पीछे कोई न कोई राज जरूर है।  

राम मंदिर पर मुसलमानों ने दावा छोड़ा, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में दायर कर सकती है हलफनामा

राम मंदिरसुप्रीम कोर्ट में बुधवार(अक्टूबर 16) को अयोध्या विवाद की अंतिम दिन की सुनवाई होनी थी। उससे पहले तेजी से बदले घटनाक्रम में मुस्लिम पक्ष ने विवादित जमीन पर अपना दावा छोड़ दिया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इस संबंध में हलफनामा शीर्ष अदालत में दायर कर दिया है। मध्यस्थता पैनल ने इसकी पुष्टि की है।
इससे पहले सोशल मीडिया पर बड़े पत्रकारों से लेकर कई अन्य लोगों ने भी इस समबन्ध में अपुष्ट सूचनाएँ दी थी , जिनके आधार पर कहा जा रहा था कि राम में आस्था रखने वालों के अच्छे दिन आ गए हैं और आक्रांता बाबर द्वारा की गई ऐतिहासिक भूल को सुधारने का क्षण आन खड़ा है। अपुष्ट ख़बरों में कहा जा रहा है कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड विवादित स्थल पर अपने दावे से पीछे हट गया है और आज ही हलफनामा दायर कर अदालत को इस बात की सूचना दे दी जाएगी।
चर्चा है कि कई साधु-संतों के साथ सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के नेताओं की बैठक हुई, जिसमें काफ़ी सौहार्दपूर्ण वातावरण में बातचीत हुई। इस दौरान साधु-संतों ने सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के लोगों को मिठाई भी खिलाई। पत्रकार अमीर अब्बास ने बताया कि यह उन मुस्लिमों की भावनाओं के अनुरूप है, जो राम मंदिर पर भाईचारा कायम रखने के लिए विवादित जमीन हिन्दुओं को देने की बात कहते हैं। अगर यह सच है तो बहुत बड़ी ख़बर है। हालाँकि, अभी इन सूचनाओं की पुष्टि होनी बाकी है।

लेकिन इस बात पर कोई मुँह खोलने को तैयार नहीं है कि किन शर्तों पर सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड राम मंदिर वाली भूमि पर दावा छोड़ने को तैयार हुआ है। बदले में उसकी क्या माँगे और शर्तें हैं? वैसे अपुष्ट ख़बरें आ रही हैं कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने सशर्त रूप से ऐसा करने का फ़ैसला लिया है। वहीं, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के एक वकील ने इससे इनकार किया है।
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने साफ़ कर दिया है कि राम मंदिर मामले की अंतिम सुनवाई बुधवार (अक्टूबर 16, 2019) को होगी और उसके बाद अदालत फ़ैसला लिखने के लिए कुछ समय लेगी। भाजपा भी क़ानूनी तरीके से राम मंदिर बनवाने की बात अपने हर घोषणा-पत्र में शामिल करती रही है। अपुष्ट सूचनाओं का कहना है कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड अयोध्या में 2.77 एकड़ ज़मीन पर अपने मालिकाना हक़ का दावा छोड़ देगा और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में आज ही हलफनामा दायर किया जाएगा। 
इससे पहले भी कई बार राम मंदिर पर मध्यस्थता की प्रक्रिया अपनाई गई लेकिन बात नहीं बनी। अंत में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की नियमित सुनवाई शुरू की और कहा जा रहा है कि सीजेआई रंजन गोगोई नवम्बर में अपने रिटायरमेंट से पहले इस मामले को निपटाने के इच्छुक हैं। जब सुनवाई के लिए दोनों पक्षों ने अतिरिक्त समय माँगा तो नाराज़ गोगोई ने अदालत में यहाँ तक कहा कि क्या आप दिवाली तक सुनवाई जारी रखना चाहते हैं? हालाँकि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के ह्रदय परिवर्तन (जैसा कि अपुष्ट सूत्रों का कहना है) का कारण अभी तक साफ़ नहीं हुआ है।
मंगलवार(अक्टूबर 15) को सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने रामलला के वकील सीएस वैधनाथन से कहा कि वे बुधवार को 45 मिनट बहस कर सकते हैं. मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने पूछा कि क्या मोल्डिंग ऑफ रिलीफ़ पर भी बुधवार को ही बहस होगी? कोर्ट ने कहा बुधवार को एक घंटा मुस्लिम पक्षकार जवाब देंगे. चार पक्षकारों को 45-45 मिनट मिलेंगे. अयोध्या मामले की सुनवाई बुधवार को ही खत्म होने की उम्मीद है. मोल्डिंग ऑफ रिलीफ पर भी आज ही सुनवाई हो सकती है.
अयोध्या मामले पर सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि अब बहुत हो चुका, हम पांच बजे उठ जाएंगे
सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अन्य अर्जियों पर सुनवाई से किया इनकार
मंगलवार को सुनवाई के दौरान एक हिन्दू पक्ष ने दलील दी कि भारत विजय के बाद मुगल शासक बाबर द्वारा करीब 433 साल पहले अयोध्या में भगवान राम के जन्म स्थान पर मस्जिद का निर्माण कर ‘ऐतिहासिक भूल' की गयी थी और अब उसे सुधारने की आवश्यकता है.
पीठ के समक्ष एक हिन्दू पक्षकार की ओर से पेश पूर्व अटार्नी जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरण ने कहा कि अयोध्या में कई मस्जिदें हैं जहां मुस्लिम इबादत कर सकते हैं लेकिन हिन्दू भगवान राम का जन्म स्थान नहीं बदल सकते. सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य द्वारा 1961 में दायर मामले में प्रतिवादी महंत सुरेश दास की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने कहा कि विदेशी शासक बाबर द्वारा की गयी ऐतिहासिक भूल को सुधारने की जरूरत है. बाबर ने भगवान राम के जन्म स्थान पर मस्जिद का निर्माण कर ऐतिहासिक भूल की और कहा कि मैं बादशाह हूं और मेरा आदेश ही कानून है.