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उत्तर प्रदेश : जमीन जिहाद :क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद के बलिदान स्थल वाले पार्क पर वक़्फ़ बोर्ड का कब्ज़ा कैसे हुआ और किसने करवाया?

                                      प्रयागराज में चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में बनी है सुन्नी वक्फ बोर्ड वाली दरगाह
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (Prayagraj, Uttar Pradesh) में चल रहा माघ मेला अब समापन की ओर है। इस माघ मेले (Magh Mela) में सुविधा और सुरक्षा को लेकर अधिकतर संत और श्रद्धालु शासन और प्रशासन से संतुष्ट दिखे। ऑपइंडिया की टीम ने भी धर्मक्षेत्र कहे जाने वाले माघ मेले का दौरा किया।

काफी चीजों में जहाँ शासन-प्रशासन के कार्य सराहनीय पाए गए तो एकाध स्थान ऐसे भी रहे, जो लगा कि सरकार की नजर से छूट गए। इन्हीं स्थानों में सबसे प्रमुख है प्रयागराज में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़े स्थान। हमने उन बिंदुओं की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करने का फैसला किया है। प्रस्तुत है भाग ..

अधिकतर स्थान अंग्रेजों के नाम पर

9 फरवरी 2023 को हम उस चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में थे, जहाँ 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों से लड़ते हुए आज़ाद ने वीरगति पाई थी। यहाँ ये बात गौर करने योग्य है कि चंद्रशेखर आजाद को घेरकर खुद को गोली मारने पर मजबूर करने वालों में अधिकतर सिपाही भारतीय थे।
ये भारतीय सिपाही ब्रिटिश अफसर नॉट बावर के अधीनस्थ लड़ रहे थे। उन्हीं में एक प्रमुख नाम इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह का है, जो उस समय कर्नलगंज थाने का SHO हुआ करता था। उस कर्नलगंज थाने का नाम आज भी ज्यों-का-त्यों ही है।
                                                     थाना कर्नलगंज, प्रयागराज (फाइल फोटो)
प्रयागराज न सिर्फ चंद्रशेखर आज़ाद, बल्कि उनके साथी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से विख्यात रामप्रसाद सिंह तोमर सहित कई अन्य वीरों की कर्मभूमि रहा है। हालाँकि, यहाँ घूमते हुए आपको कई स्थानों के नाम अभी भी अंग्रेजों के नाम पर मिल जाएँगे। इनमें स्टैनली रोड, कर्नलगंज, मम्फोर्डगंज, बेली रोड व अस्पताल और एलनगंज आदि प्रमुख हैं।

पार्क में घुसते ही दरगाह

चंद्रशेखर आज़ाद पार्क का मुख्य द्वार गेट नंबर 1 है। यहाँ से पार्क में घुसने वालों को 0 किलोमीटर का बोर्ड भी लगा दिखाई देता है। जैसे ही गेट नंबर 1 से कोई पार्क में प्रवेश करता है, वैसे ही उसे पार्क प्रशासन और DM प्रयागराज का बोर्ड लगा मिलता है।
इस बोर्ड में साफ तौर पर हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए लिखा गया गया है कि उस स्थान का प्रयोग सिर्फ पार्क के लिए होगा। हालाँकि, इसी बोर्ड से महज 50 मीटर की दूरी पर हमें एक मजार दिखी जहाँ कई लोग जियारत करते दिखाई दिए।
                                                                दरगाह का बाहरी हिस्सा
जैसे ही हम मज़ार के अंदर गए तो वहाँ हमें कुछ लोग एक कुएँ के पास घेरा लगाए बैठे मिले। दरगाह 2 हिस्सों में थी और दूसरे भाग में कुछ लोग एक कब्र को घेरे हुए थे। हमने वहाँ के खादिम से बात करनी चाही तो वसीम नाम के व्यक्ति से हमने मिलवाया गया।
वसीम ने हमें दरगाह को औरंगजेब के जमाने का बताया। वहाँ जियारत कर रहे लोगों के बारे में वसीम ने दावा किया कि दरगाह पर आने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है। खादिम वसीम ने हमें बताया कि वो सरकार से चाहते हैं कि मज़ार को व्यापक रूप दिया जाए।
                                                 दरगाह के खादिम वसीम और उनके सहयोगी

सुन्नी वक्फ बोर्ड का लगा है पोस्टर

जब हमने खादिम वसीम को मजार के बारे में और बताने के लिए कहा तो उन्होंने हमें एक बोर्ड दिखाया, जिस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड लिखा हुआ था। हमने बोर्ड को पूरा पढ़ा तो उसमें अरबी भाषा में 786 के बाद वो जगह हजरत शंदल शाह और गुलाब शाह बाबा की दरगाह लिखी हुई थी।
दरगाह की जगह कम्पनी बाग़ यानी चंद्रशेखर आज़ाद पार्क के अंदर बताई गई। इस बोर्ड में दावा किया गया है कि गुलाब शाह और शंदल शाह 1857 की क्रान्ति में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। हालाँकि, हमने पार्क प्रशासन से इस दावे के संबंध में सबूत माँगे तो उनके पास यह मौजूद नहीं था।
                                                            वक्फ बोर्ड वाली दरगाह

उर्दू में है, पढ़ नहीं पाओगे

1857 की क्रांति में गुलाब शाह और शंदल शाह की शहादत के बारे में जब हमने मजार के खादिम वसीम से कुछ सबूत दिखाने के लिए कहा तो उन्होंने टाल दिया। खादिम वसीम बोले, “कागज उर्दू में है। पढ़ नहीं पाओगे।”
1857 की क्रांति में गुलाब शाह और शंदल शाह की शहादत के बारे में जब हमने मजार के खादिम वसीम से कुछ सबूत दिखाने के लिए कहा तो उन्होंने टाल दिया। खादिम वसीम बोले, “कागज उर्दू में है। पढ़ नहीं पाओगे।”
सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के इस पोस्टर के मुताबिक, यह जगह पहले रसूलपुर व समदाबाद नाम से जानी जाती थी। इसी बोर्ड में दरगाह के लिए सहयोग की अपील की गई है। खादिम के तौर पर बोर्ड में किसी जमील खाँ का नाम लिखा हुआ था। हालाँकि, खुद को खादिम बता रहे वसीम ने यह बोर्ड उखाड़ कर अंदर रखा हुआ था।
                              दरगाह से सट कर पार्क को पार्क ही रखने का हाईकोर्ट के हवाले से आदेश

मर्द टोपी पहने और औरतें न छुएँ मजार

इस मजार के गेट मुख्य पर शंदल शाह का नाम हजरत सैयद फ़िरोज़ अली बाबा रहमत उल्लाह अलैह के तौर पर भी दर्ज है। मजार के बाहर साफ तौर पर आदेश है कि मर्द अंदर घुसने से पहले सिर पर टोपी रखें और औरतें पल्लू।
इसमें औरतों को साफ़ तौर पर आदेश है कि वो मजार का पीछा करके न जाएँ और आगे से आएँ। औरतों को मजार छूने से भी साफ मना किया गया है। यहाँ जो चंदा देना चाहते हैं, उसके लिए एक गुल्लक रखा हुआ है।
                                                                        दरगाह के निर्देश

बाहर फूल बेच रही महिला लम्बे समय से बीमार

हालाँकि, मजार के खादिम वसीम का कहना था कि वहाँ आने के बाद तमाम समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है, लेकिन मजार के बाहर लम्बे समय से फूल बेचने वाली महिला खुद को लम्बे समय से बीमार बता रही थी।
दरगाह के ही एक सदस्य से लम्बी बातचीत की रिकॉर्डिंग ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जिसमें वो तमाम दवा लेने और अस्पतालों के चक्कर लगाने की जानकारी दे रही है। हैरानी की बात ये रही कि दरगाह का नियमित सदस्य ही उस महिला को अच्छे डॉक्टर के पास जाने की सलाह दे रहा था।
बात दें कि अक्टूबर 2021 में साल हाईकोर्ट के आदेश पर चंद्रशेखर पार्क के अंदर बने मस्जिद, मजार, 14 कब्र सहित दर्जन भर अवैध अतिक्रमणों को तोड़ा गया था। हाईकोर्ट ने साल 1975 के बाद बने अवैध निर्माणों को हटाने का निर्देश दिया था।
इन अवैध निर्माणों को हटाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र सिंह बिसेन याचिका दाखिल की थी। उन्होंने याचिका में कहा था कि इतने महान स्वतंत्रता सेनानी से जुड़े इस पार्क पर अतिक्रमण होना मामूली घटना नहीं है। एक साजिश के तहत इस पर कब्जा किया जा रहा है।
चंद्रशेखर आजाद पार्क 133 एकड़ में फैला है। अवैध अतिक्रमण हटाने से पहले लगभग 25-30 साल पहले वहाँ मस्जिद, मजार और कब्र बना दिए गए थे। उस दौरान वहाँ लगभग 20 मजार व तीन मस्जिद बनाई जा चुकी थीं।
हालाँकि, यहाँ बने मजार पर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अपना दावा किया है। सितंबर 2022 में मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में एक याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि ये मजार 200 साल पुराना है। हालाँकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मजार अवैध है।
प्रयागराज में ही मौजूद चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़े एक अन्य भूले-बिसरे स्थान की चर्चा हम अपनी अगली रिपोर्ट में करेंगे।                   (साभार: राहुल पाण्डेयhttp://www.opindia.com)

26 दिसंबर – “जेलर – कोई अंतिम इच्छा ? उत्तर – अंतिम इच्छा उस हत्यारे को मारने की थी, वो पूरी हो गई”

Related imageआज जिस बलिदानी का बलिदान दिवस है उस वीर के महानतम कार्य उस गाने को गाली के समान सिद्ध करते हैं जो भारतीयों को बचपन से रटाया जाता है .. जिस गाने में आज़ादी का हकदार बिना खड्ग बिना ढाल को बता कर केवल सूत, कपास को ही मान लिया गया .. उधम सिंह जी थे वो पराक्रमी जिनके शौर्य और गौरव को छिपाने के लिए ही सोची समझी रणनीति बना कर पिछली सरकारें केवल कुछ ख़ास नामों पर ही लाखों रुपये बहाती रहीं, लेकिन कभी भी देश के सच्चे सपूतों को याद नहीं करती। 
पिछले वर्ष आर टी आई से पता चला कि सैकड़ों करोड़ रुपये केवल कुछ गिने चुने नामों की जयंती पर ही फूंके गये थे, जबकि सच्चे क्रन्तिकारी रानी लक्ष्मी बाई से लेकर सुभाष चन्द्र बोस तक किसी को भी आज तक याद नहीं किया गया, आइये हम परम बलिदानी उधम सिंह को नमन व स्मरण करते है…..वही वीर जिन्होंने भारत माता के अपमान का बदला लेने के लिए अपनी संकल्प की अग्नि को 20 साल तक दबाये रखा और….जलियावाला कांड का बदला लिया….ऐसे ही पंजाब के वीर उधम सिंह को आज उनके बलिदान दिवस पर हम नमन करते है। 
पंजाब में संगरूर जिले के सुनाम गांव में 26 दिसंबर 1899 में जन्मे ऊधम सिंह ने जलियांवाला बाग में अंग्रेजों द्वारा किए गए कत्लेआम का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी जिसे उन्होंने गोरों की मांद में घुसकर 21 साल बाद पूरा कर दिखाया। पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडायर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में शांति के साथ सभा कर रहे सैकड़ों भारतीयों को अंधाधुंध फायरिंग करा मौत के घाट उतार दिया था। क्रांतिकारियों पर कई पुस्तकें लिख चुके जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चमन लाल के अनुसार जलियांवाला बाग की इस घटना ने ऊधम सिंह के मन पर गहरा असर डाला था और इसीलिए उन्होंने इसका बदला लेने की ठान ली थी। ऊधम सिंह अनाथ थे और अनाथालय में रहते थे, लेकिन फिर भी जीवन की प्रतिकूलताएं उनके इरादों से उन्हें डिगा नहीं पाई।
उन्होंने 1919 में अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर जंग-ए-आजादी के मैदान में कूद पड़े। तथाकथित देशभक्त जिनके वंशज आज सत्ताओ के शीर्ष पर में है…….उनका द्वारा लूटा हुआ धन स्विस बांको में पड़ा है, देश के ८४ करोड़ लोग भूखे मर रहे है..आपको दिखाते है, शहीद उधम सिंह का संगरूर , सुनाम स्थित घर , जिसको देखकर कोई यह नहीं कह सकता की यह किसी महान क्रिन्तिकारी का घर है… आज तक सचे क्रन्तिकारी का इस देश के गदारो ने जिन्होंने 70 सालो तक शासन किया कोई स्मारक नहीं बनाया,,,..लेकिन यहाँ पर एक परिवार की और से ४०० से अधिक योजनाये चल रही है … बलिदानी उधम सिंह का स्मारक देखकर आंसू आते है.. आज तक नेताजी का कोई स्मारक , पंडित बिस्मिल का, चंदेर्शेखर आजाद का, राजिंदर लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह का कोई भी स्मारक नहीं है, (अगर कोई है तो वह सरकार का नहीं बल्कि देशभक्त लोगो का बनवाया हुआ है)…
भारत के महान क्रांतिकारियों में ऊधम सिंह का विशेष स्थान है। उन्होंने जलियांवाला बाग नरसंहार के दोषी माइकल ओडायर को गोली से उड़ा दिया था।जाने माने नेताओं डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में लोगों ने जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन एक सभा रखी थी, जिसमें ऊधम सिंह पानी पिलाने का काम कर रहे थे। पंजाब का तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडायर किसी कीमत पर इस सभा को नहीं होने देना चाहता था और उसकी सहमति से ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर ने जलियांवाला बाग को घेरकर अंधाधुंध फायरिंग करा दी। अचानक हुई गोलीबारी से बाग में भगदड़ मच गई। बहुत से लोग जहां गोलियों से मारे गए, वहीं बहुतों की जान भगदड़ ने ले ली।
जान बचाने की कोशिश में बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी। बाग में लगी पट्टिका के अनुसार 120 शव तो कुएं से ही बरामद हुए। सरकारी आंकड़ों में मरने वालों की संख्या 379 बताई गई, जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोगों की इस घटना में जान चली गई। स्वामी श्रद्धानंद के मुताबिक मृतकों की संख्या 1500 से अधिक थी। अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉ. स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से ज्यादा थी। ऊधम सिंह के मन पर इस घटना ने इतना गहरा प्रभाव डाला था कि उन्होंने बाग की मिट्टी हाथ में लेकर ओडायर को मारने की सौगंध खाई थी।
अपनी इसी प्रतिज्ञा को पूरा करने के मकसद से वह 1934 में लंदन पहुंच गए और सही वक्त का इंतजार करने लगे।ऊधम को जिस वक्त का इंतजार था वह उन्हें 13 मार्च 1940 को उस समय मिला जब माइकल ओडायर लंदन के कॉक्सटन हाल में एक सेमिनार में शामिल होने गया। भारत के इस सपूत ने एक मोटी किताब के पन्नों को रिवॉल्वर के आकार के रूप में काटा और उसमें अपनी रिवॉल्वर छिपाकर हाल के भीतर घुसने में कामयाब हो गए। चमन लाल के अनुसार मोर्चा संभालकर बैठे ऊधम सिंह ने सभा के अंत में ओडायर की ओर गोलियां दागनी शुरू कर दीं। सैकड़ों भारतीयों के कत्ल के गुनाहगार इस गोरे को दो गोलियां लगीं और वह वहीं ढेर हो गया।
अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के बाद इस महान क्रांतिकारी ने समर्पण कर दिया। उन पर मुकदमा चला और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 31 जुलाई 1940 को पेंटविले जेल में यह वीर हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गया। ..अमर बलिदानी उधम सिंह के माता पिता उनको अनाथ छोड़कर बचपन में चल बसे थे, जब वह ८ वर्ष के थे,,,,कुछ समय बाद २-३ साल बाद ही उनके बड़े भाई भी उनको सदा सदा के लिए छोड़कर चले गए