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उत्तराखंड : 26 अवैध मजारों पर चला बुलडोजर… नीचे नहीं मिला कोई मानव अवशेष: 1400 जगह लिस्ट में

                           उत्तराखंड प्रशासन ने 26 अवैध मजारों पर चलाया बुलडोजर (चित्र साभार- पाञ्चजन्य)
उत्तराखंड प्रशासन ने अवैध मजारों के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू किया है। स्थानीय मीडिया में दावा किया जा रहा है कि इस अभियान के तहत प्रदेश में एक ही रात के अंदर 26 अवैध मजारों को ध्वस्त कर दिया गया। अभियान को अंजाम देने के लिए पहले से बुलडोजर तैनात कर दिए गए थे। ध्वस्त हुई मजारों में कुछ ऐसी भी हैं, जो राजधानी देहरादून के जंगली जानवरों के लिए रिजर्व क्षेत्र में बनी हुई थीं। यह कार्रवाई रविवार (12 मार्च 2023) को हुई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सभी 26 मजारें उत्तराखंड वन विभाग की जमीनों पर बनाई गई थीं। इसमें कई मजारें हाल-फ़िलहाल में बनी हुईं थीं। दिलचस्प बात यह कि इन मजारों के नीचे से कोई मानव अवशेष भी नहीं मिले।

मजारों के बनने के पीछे उन हिन्दुओं का ही हाथ है, जो अपने देवी-देवताओं की शक्ति को भूल मजारों को पूजते हैं, वहां नोटों की बारिश करते हैं, और वही नोट हिन्दुओं के खिलाफ षड़यंत्र में अहम् भूमिका निभाता है। 

उत्तराखंड राज्य सरकार ने लगभग 1400 ऐसे स्थानों को चिन्हित किया है, जिसमें इसी प्रकार से मजहबी निर्माण करके अतिक्रमण किया गया है। कुछ ही समय बाद उन सभी स्थानों पर इसी प्रकार की कार्रवाई की उम्मीद जताई जा रही है। इस मामले में खुद मुख्यमंत्री पुष्कर धामी द्वारा अधिकारीयों को सख्त निर्देश मिलने की बात कही जा रही है।

कुछ रिपोर्ट्स में ध्वस्त हुई मजारों की संख्या एक रात के बजाए अब तक की कुल कार्रवाई के तौर पर गिनाई गई है। बताया ये भी जा रहा है कि अभी अवैध मजारों को चिन्हित करने का काम भी जारी है।

मजारों के अलावा उत्तराखंड प्रशासन अन्य अतिक्रमणों पर भी एक्शन के मूड में है। राजधानी देहरादून में शक्ति नहर डाकपथर के किनारे बसे लोगों की भी पहचान का सत्यापन चल रहा है। कई लोगों ने खुद ही वो जगह छोड़नी शुरू कर दी। आरोप है कि यहाँ सरकारी जमीन पर बाहरी लोगों ने आकर कब्ज़ा कर लिया था।

नगर निगम ने भी शक्तिनहर किनारे की सरकारी भूमि खाली करवाने के लिए अभी से वहाँ बुलडोजर और ट्रैक्टर खड़े कर दिए हैं। लोगों के सत्यापन की प्रक्रिया खत्म होने के बाद माना जा रहा है कि यहाँ JCB मशीन चलाई जाएगी। बताया जा रहा है कि अवैध अतिक्रमण के खिलाफ साल 2018 से ही कार्रवाई की तैयारी थी लेकिन इसमें कुछ कारणों से देर लगी।

उत्तराखंड में सरकारी जमीनों पर अवैध मजारों को ऑपइंडिया ने भी अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में बताया था। तब हमने बाघों के लिए दुनिया भर में मशहूर जिम कार्बेट पार्क के अंदर जाकर वहाँ मौजूद मजारों को दिखाया था। इसके अलावा देहरादून के प्रसिद्ध संत स्वामी दर्शन भारती ने भी हमसे बात करते हुए लैंड जिहाद को उत्तराखंड के आने वाले भविष्य के लिए खतरनाक संकेत बताया था।

उत्तर प्रदेश : जमीन जिहाद :क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद के बलिदान स्थल वाले पार्क पर वक़्फ़ बोर्ड का कब्ज़ा कैसे हुआ और किसने करवाया?

                                      प्रयागराज में चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में बनी है सुन्नी वक्फ बोर्ड वाली दरगाह
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (Prayagraj, Uttar Pradesh) में चल रहा माघ मेला अब समापन की ओर है। इस माघ मेले (Magh Mela) में सुविधा और सुरक्षा को लेकर अधिकतर संत और श्रद्धालु शासन और प्रशासन से संतुष्ट दिखे। ऑपइंडिया की टीम ने भी धर्मक्षेत्र कहे जाने वाले माघ मेले का दौरा किया।

काफी चीजों में जहाँ शासन-प्रशासन के कार्य सराहनीय पाए गए तो एकाध स्थान ऐसे भी रहे, जो लगा कि सरकार की नजर से छूट गए। इन्हीं स्थानों में सबसे प्रमुख है प्रयागराज में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़े स्थान। हमने उन बिंदुओं की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करने का फैसला किया है। प्रस्तुत है भाग ..

अधिकतर स्थान अंग्रेजों के नाम पर

9 फरवरी 2023 को हम उस चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में थे, जहाँ 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों से लड़ते हुए आज़ाद ने वीरगति पाई थी। यहाँ ये बात गौर करने योग्य है कि चंद्रशेखर आजाद को घेरकर खुद को गोली मारने पर मजबूर करने वालों में अधिकतर सिपाही भारतीय थे।
ये भारतीय सिपाही ब्रिटिश अफसर नॉट बावर के अधीनस्थ लड़ रहे थे। उन्हीं में एक प्रमुख नाम इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह का है, जो उस समय कर्नलगंज थाने का SHO हुआ करता था। उस कर्नलगंज थाने का नाम आज भी ज्यों-का-त्यों ही है।
                                                     थाना कर्नलगंज, प्रयागराज (फाइल फोटो)
प्रयागराज न सिर्फ चंद्रशेखर आज़ाद, बल्कि उनके साथी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से विख्यात रामप्रसाद सिंह तोमर सहित कई अन्य वीरों की कर्मभूमि रहा है। हालाँकि, यहाँ घूमते हुए आपको कई स्थानों के नाम अभी भी अंग्रेजों के नाम पर मिल जाएँगे। इनमें स्टैनली रोड, कर्नलगंज, मम्फोर्डगंज, बेली रोड व अस्पताल और एलनगंज आदि प्रमुख हैं।

पार्क में घुसते ही दरगाह

चंद्रशेखर आज़ाद पार्क का मुख्य द्वार गेट नंबर 1 है। यहाँ से पार्क में घुसने वालों को 0 किलोमीटर का बोर्ड भी लगा दिखाई देता है। जैसे ही गेट नंबर 1 से कोई पार्क में प्रवेश करता है, वैसे ही उसे पार्क प्रशासन और DM प्रयागराज का बोर्ड लगा मिलता है।
इस बोर्ड में साफ तौर पर हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए लिखा गया गया है कि उस स्थान का प्रयोग सिर्फ पार्क के लिए होगा। हालाँकि, इसी बोर्ड से महज 50 मीटर की दूरी पर हमें एक मजार दिखी जहाँ कई लोग जियारत करते दिखाई दिए।
                                                                दरगाह का बाहरी हिस्सा
जैसे ही हम मज़ार के अंदर गए तो वहाँ हमें कुछ लोग एक कुएँ के पास घेरा लगाए बैठे मिले। दरगाह 2 हिस्सों में थी और दूसरे भाग में कुछ लोग एक कब्र को घेरे हुए थे। हमने वहाँ के खादिम से बात करनी चाही तो वसीम नाम के व्यक्ति से हमने मिलवाया गया।
वसीम ने हमें दरगाह को औरंगजेब के जमाने का बताया। वहाँ जियारत कर रहे लोगों के बारे में वसीम ने दावा किया कि दरगाह पर आने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है। खादिम वसीम ने हमें बताया कि वो सरकार से चाहते हैं कि मज़ार को व्यापक रूप दिया जाए।
                                                 दरगाह के खादिम वसीम और उनके सहयोगी

सुन्नी वक्फ बोर्ड का लगा है पोस्टर

जब हमने खादिम वसीम को मजार के बारे में और बताने के लिए कहा तो उन्होंने हमें एक बोर्ड दिखाया, जिस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड लिखा हुआ था। हमने बोर्ड को पूरा पढ़ा तो उसमें अरबी भाषा में 786 के बाद वो जगह हजरत शंदल शाह और गुलाब शाह बाबा की दरगाह लिखी हुई थी।
दरगाह की जगह कम्पनी बाग़ यानी चंद्रशेखर आज़ाद पार्क के अंदर बताई गई। इस बोर्ड में दावा किया गया है कि गुलाब शाह और शंदल शाह 1857 की क्रान्ति में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। हालाँकि, हमने पार्क प्रशासन से इस दावे के संबंध में सबूत माँगे तो उनके पास यह मौजूद नहीं था।
                                                            वक्फ बोर्ड वाली दरगाह

उर्दू में है, पढ़ नहीं पाओगे

1857 की क्रांति में गुलाब शाह और शंदल शाह की शहादत के बारे में जब हमने मजार के खादिम वसीम से कुछ सबूत दिखाने के लिए कहा तो उन्होंने टाल दिया। खादिम वसीम बोले, “कागज उर्दू में है। पढ़ नहीं पाओगे।”
1857 की क्रांति में गुलाब शाह और शंदल शाह की शहादत के बारे में जब हमने मजार के खादिम वसीम से कुछ सबूत दिखाने के लिए कहा तो उन्होंने टाल दिया। खादिम वसीम बोले, “कागज उर्दू में है। पढ़ नहीं पाओगे।”
सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के इस पोस्टर के मुताबिक, यह जगह पहले रसूलपुर व समदाबाद नाम से जानी जाती थी। इसी बोर्ड में दरगाह के लिए सहयोग की अपील की गई है। खादिम के तौर पर बोर्ड में किसी जमील खाँ का नाम लिखा हुआ था। हालाँकि, खुद को खादिम बता रहे वसीम ने यह बोर्ड उखाड़ कर अंदर रखा हुआ था।
                              दरगाह से सट कर पार्क को पार्क ही रखने का हाईकोर्ट के हवाले से आदेश

मर्द टोपी पहने और औरतें न छुएँ मजार

इस मजार के गेट मुख्य पर शंदल शाह का नाम हजरत सैयद फ़िरोज़ अली बाबा रहमत उल्लाह अलैह के तौर पर भी दर्ज है। मजार के बाहर साफ तौर पर आदेश है कि मर्द अंदर घुसने से पहले सिर पर टोपी रखें और औरतें पल्लू।
इसमें औरतों को साफ़ तौर पर आदेश है कि वो मजार का पीछा करके न जाएँ और आगे से आएँ। औरतों को मजार छूने से भी साफ मना किया गया है। यहाँ जो चंदा देना चाहते हैं, उसके लिए एक गुल्लक रखा हुआ है।
                                                                        दरगाह के निर्देश

बाहर फूल बेच रही महिला लम्बे समय से बीमार

हालाँकि, मजार के खादिम वसीम का कहना था कि वहाँ आने के बाद तमाम समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है, लेकिन मजार के बाहर लम्बे समय से फूल बेचने वाली महिला खुद को लम्बे समय से बीमार बता रही थी।
दरगाह के ही एक सदस्य से लम्बी बातचीत की रिकॉर्डिंग ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जिसमें वो तमाम दवा लेने और अस्पतालों के चक्कर लगाने की जानकारी दे रही है। हैरानी की बात ये रही कि दरगाह का नियमित सदस्य ही उस महिला को अच्छे डॉक्टर के पास जाने की सलाह दे रहा था।
बात दें कि अक्टूबर 2021 में साल हाईकोर्ट के आदेश पर चंद्रशेखर पार्क के अंदर बने मस्जिद, मजार, 14 कब्र सहित दर्जन भर अवैध अतिक्रमणों को तोड़ा गया था। हाईकोर्ट ने साल 1975 के बाद बने अवैध निर्माणों को हटाने का निर्देश दिया था।
इन अवैध निर्माणों को हटाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र सिंह बिसेन याचिका दाखिल की थी। उन्होंने याचिका में कहा था कि इतने महान स्वतंत्रता सेनानी से जुड़े इस पार्क पर अतिक्रमण होना मामूली घटना नहीं है। एक साजिश के तहत इस पर कब्जा किया जा रहा है।
चंद्रशेखर आजाद पार्क 133 एकड़ में फैला है। अवैध अतिक्रमण हटाने से पहले लगभग 25-30 साल पहले वहाँ मस्जिद, मजार और कब्र बना दिए गए थे। उस दौरान वहाँ लगभग 20 मजार व तीन मस्जिद बनाई जा चुकी थीं।
हालाँकि, यहाँ बने मजार पर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अपना दावा किया है। सितंबर 2022 में मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में एक याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि ये मजार 200 साल पुराना है। हालाँकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मजार अवैध है।
प्रयागराज में ही मौजूद चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़े एक अन्य भूले-बिसरे स्थान की चर्चा हम अपनी अगली रिपोर्ट में करेंगे।                   (साभार: राहुल पाण्डेयhttp://www.opindia.com)

उत्तर प्रदेश : दरगाह की खुदाई में जमीन से निकली हनुमान जी और शनिदेव की मूर्ति

                                 बड़े मियाँ दरगाह के अंदर से खुदाई में निकलीं हिन्दू देवताओं की मूर्तियाँ
उत्तर प्रदेश के एटा जिले की जिस दरगाह का स्थानीय लोगों ने प्राचीन मंदिर होने का दावा किया है वहाँ खुदाई के दौरान हिन्दू देवताओं की प्रतिमाएँ मिलने की सूचना है। यह प्रतिमाएँ जलेसर थानाक्षेत्र में आने वाली दरगाह के अंदर, सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस चौकी के निर्माण की नींव खोदने के दौरान निकलीं। हिन्दू संगठनों ने इन प्रतिमाओं की शोभा यात्रा निकालने का ऐलान किया है। वहीं पुरातत्व विभाग मूर्तियों की प्राचीनता का पता लगाएगा। यह खुदाई 15 अप्रैल 2022 को हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रस्तावित पुलिस चौकी की नींव बड़े मियाँ की मज़ार से लगभग 10 मीटर दूर खोदी जा रही थी। इस दौरान जमीन से हनुमान और शनिदेव की प्रतिमाएँ निकलीं। मूर्तियों की जानकारी मिलते ही स्थानीय भाजपा विधायक संजीव दिवाकर भी मौके पर पहुँच गए। उनकी मौजूदगी में हनुमान की प्रतिमा को पानी से और शनिदेव की प्रतिमा को तेल से धुला गया।

इस घटना को स्थानीय भाजपा विधायक संजीव दिवाकर ने भी अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है। उन्होंने लिखा, “आज 15 अप्रैल 2022 को जलेसर शनिदेव मंदिर पर पुलिस चौकी के निर्माण हेतु हो रही खुदाई के दौरान निकली शनिदेव और वीर हनुमान जी की मूर्ति। अन्य मर्तियाँ होने की भी आशंका। शनिदेव पर लगी श्रद्धालुओं की भीड़।” भाजपा विधायक द्वारा शेयर की गई तस्वीरों में कई लोग मौके पर मौजूद दिखाई दे रहे हैं।

भाजपा विधायक के साथ स्थानीय लोगों का भी दावा है कि जहाँ बड़े मियाँ की मज़ार बनी है वहाँ पहले मंदिर था। बाद में दरगाह ने धीरे-धीरे अतिक्रमण कर के मंदिर के अस्तित्व को खत्म कर दिया। इसी दौरान 13 अप्रैल को इसी दरगाह पर भगवा ध्वज लहराते एक फोटो भी वायरल हुई थी। इस पर अलीगंज के SDM अलंकार अग्निहोत्री ने इसे शनिदेव की पूजा के लिए आने वाले हिंदू श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाया गया नेजा (ध्वज) बताया था जो लाल रंग में होता है।

जलेसर देहात ग्राम पंचायत के प्रधान शैलेंद्र सिंह का कहना है कि इस स्थान पर शनिदेव का एक प्राचीन मंदिर स्थित था और दरगाह से जुटे लोगों ने धीरे-धीरे करके पूरे मंदिर का अतिक्रमण कर लिया। अब मंदिर का अस्तित्व ही खत्म हो गया। स्थानीय विधायक संजीव दिवाकर भी का भी यही मानना है।

दरगाह में घोटाला 

इस दरगाह में शनिजात के चढ़ावे में आने वाले करोड़ों रुपए और सामानों के घोटाले का मामला भी सामने आ चुका है। घोटाला सामने आने के बाद प्रशासन ने दरगाह को अपने कब्जे में ले लिया है। यहाँ की व्यवस्था के लेकर हर इंतजाम अब प्रशासन के हाथ में आ चुका है। यहाँ चढ़ावे में सालाना लगभग 5 करोड़ रुपए आते हैं। अब यहाँ जो भी पैसा चढ़ावे में आएगा, वह सरकारी कोष में जमा कराया जाएगा।

दरगाह में बड़े मियाँ और शनि मंदिर में श्रद्धालु अधिक आते हैं। वहीं, जैन समाज बुधवार को होने वाले जात का प्रबंधन देखता है। यहाँ घोटाले और हेराफेरी को लेकर जाँच जारी है। प्रशासन का कहना है कि अगर कोई इसमें दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

ग्राम प्रधान शैलेंद्र सिंह राजपूत ने 14 मार्च 2022 को इस घोटाले की तहरीर दी थी और कमिटी के विरुद्ध जाँच की माँग की थी। उसके बाद जलेसर की दरगाह कमिटी के सदस्यों के खिलाफ करीब 99 करोड़ रुपए के गबन को लेकर मामला दर्ज किया गया है। इसमें दरगाह कमिटी के अध्यक्ष मोहम्मद अकबर सहित 9 लोगों पर केस दर्ज किया गया है, जिसके बाद से सभी फरार हैं। इन पर दरगाह का पैसा गबन कर अकूत संपत्ति जुटाने का आरोप है।