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नेहरु करना चाहते थे जन्मभूमि से बेदखल फिर भी विराजमान रहे रामलला

अयोध्या, नेहरू, राम
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
राम जिसका महत्व और महानता रावण तक भलीभांति जानता था, लेकिन तुष्टिकरण की पुजारी कांग्रेस मुग़ल आक्रांताओं का चोला औढ़ देश की जनता को भ्रमित कर अयोध्या में रामजन्म स्थल पर राम मन्दिर का विरोध कर, रावण को भी बहुत पीछे छोड़ दिया।   
शायद राम होने की नियति यही है! बार-बार अपनी ही जमीन से बेदखल होना है। हर दौर में खुद को साबित करते रहना। अयोध्या से उन्हें दूर करने की साजिश पुरानी है। साजिशकर्ता कभी मंथरा होती है तो कभी नेहरू। 
हिन्दू हिन्दू कहकर कांग्रेस हिन्दुओं को पागल बनाती रही, लेकिन पार्टी में विराजमान हिन्दू भी हिन्दू विरोधी गतिविधियों में साथ देते रहे। फिर जब सोमनाथ मंदिर के जीणोंद्वार किये जाने का नेहरू ने विरोध किया था, जब जीणोंद्वार बाद प्रवेश पूजन में तत्कालीन प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के जाने का भी विरोध किया था, लेकिन राजन बाबू ने नेहरू के विरोधों को दरकिनार कर मंदिर के प्रवेश में सम्मिलित हुए थे। 
और हिन्दू महासभा नेता कमलेश तिवारी की हत्या समस्त हिन्दू मन्दिरों का विरोध कर रहे हिन्दुओं के लिए ऑंखें खोलने से कम नहीं, मुसलमान अपने मौहम्मद के विरुद्ध कुछ सुनने को तैयार नहीं, और हिन्दू हैं कि अपने देवी-देवताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहते हैं। 
नेहरू यानी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में ​विस्तार से उन घटनाओं का ब्यौरा दिया है, जब गर्भगृह से राम की मूर्ति हटाने पर नेहरू अमादा थे। लेकिन, केरल के रहने वाले आईसीएस अधिकारी केकेके नायर, जो उस समय फैजाबाद के जिलाधिकारी थे ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
हेमंत शर्मा लिखते हैं, “उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम नेताओं और देवबंद के उलेमाओं ने नेहरू को तार भेजकर उनका ध्यान अयोध्या की ओर दिलाया। नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत और राज्य के गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को तत्काल मस्जिद से मूर्तियों को हटाने के निर्देश दिए।लगातार केंद्र से संदेश लखनऊ आते और वैसे ही तार लखनऊ से फैजाबाद भेजे जाते कि मूर्तियॉं तुरंत हटाई जाएँ। 24 और 25 दिसंबर 1949 को लखनऊ में इस मुद्दे पर दिन भर उच्च स्तरीय बैठक होती रही। तय किया गया कि मूर्तियों को गर्भगृह से बाहर ले जाकर राम चबूतरे पर रखा जाएगा। पर फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट केकेके नायर इस बात पर अड़े रहे कि मूर्ति हटाने की घोषणा से मात्र से खून-खराबा होगा।”
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय ने इस संबंध में फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी केकेके नायर को 23 दिसंबर को निर्देश दिए। जवाब में 26 दिसंबर को नायर ने लिखा, “मैं आज भी इसकी कल्पना नहीं कर पा रहा कि मूर्ति को वहॉं से कैसे हटाया जाए। यदि इस कार्य को धार्मिक रीति के अनुसार किया जाना है तो मुझे कोई ऐसा योग्य हिन्दू पुजारी नहीं मिलेगा, जो इस काम के लिए अपने जीवन और मोक्ष को दॉंव पर लगाने का इच्छुक हो। यदि ऐसा किसी भी तरह या किसी के द्वारा भी किया जाना है तो इसके परिणामस्वरुप हिन्दुओं के सभी वर्गों के विरोध का सामना सरकार को करना पड़ सकता है। मुझे स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि क्या सरकार उस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।”
इससे पहले की इस पर सरकार कोई प्रतिक्रिया देती अगले ही दिन नायर ने मुख्य सचिव को फिर एक चिट्ठी दाग दी। इस बार उन्होंने लिखा, “यदि सरकार किसी भी कीमत पर मूर्ति हटाने का फैसला लेती है तो मैं अनुरोध करूँगा कि मुझे कार्यमुक्त किया जाए और मेरा कार्यभार किसी ऐसे अधिकारी को दिया जाए, जिसे इस समाधान में वह अच्छाई दिखती हो जो मुझे दिखाई नहीं देती। जहॉं तक मेरा सवाल है मेरा विवेक मुझे ऐसा करने की इजाजत नहीं देता।”
नायर की चिट्ठियों से राज्य सरकार दबाव में आ गई। घबराए सहाय ने उन्हें फोन कर कहा कि वे मौके पर जैसा ठीक समझें करें। लेकिन, नेहरू लगातार अपनी चिंता जताते रहे। जब नायर सरकार की सुनने को तैयार नहीं थे तो नेहरू ने 26 नवंबर 1949 को पंत को एक तार भेजा। इसमें कहा, “अयोध्या में हुई घटनाओं से मैं परेशान हूँ। मैं गंभीरतापूवर्क उम्मीद करता हूँ कि आप इस विषय पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देंगे। वहॉं आपत्तिजनक उदाहरण रखे जा रहे हैं जिनके परिणाम घातक होंगे।”
मूर्तियॉं तो नहीं हटीं। पर नेहरू के प्रयास जारी रहे। 15 फरवरी 1950 को उन्होंने पंत को एक पत्र लिख अयोध्या के हालात पर जानकारी मॉंगी। साथ ही कश्मीर पर इसके कारण पड़ने वाले हालात को लेकर चिंता जताई। 5 मार्च 1950 को किशोरीलाल को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा, “उत्तर प्रदेश सरकार ने हिम्मत से काम लिया, लेकिन जो हुआ वो कम था। फैजाबाद के अधिकारियों ने या तो बदमाशी की या फिर हालात को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।”
यहॉं तक कि नेहरू अयोध्या भी जाना चाहते थे। पर पंत उन्हें टालते गए। यहॉं यह जानना जरूरी है कि पंत को नेहरू पसंद नहीं करते थे। पंत देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभाई पटेल के करीबी माने जाते थे। लिहाजा, नेहरू ने पटेल से भी पंत पर दबाव डलवाने की कोशिश की। 9 जनवरी 1950 को पटेल ने इस संबंध में पंत को पत्र भी लिखा। लेकिन, उन्होंने मूर्तियॉं हटाने के लिए कोई निर्देश देने की बजाए मुख्यमंत्री पंत की ओर से उठाए गए कदमों की तारीफ की। साथ ही इस समस्या के लिए अपनी पार्टी में बढ़ती गुटबंदी को भी जिम्मेदार ठहराया।
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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने अयोध्या के रामजन्मूभि पर राम मंदिर बनाने का निर्णय ले लिया था। राजीव गांधी को ....


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पुरातत्व बताता है कि अयोध्या सिर्फ हिंदुओं की मान्यता नहीं है। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात कोरी आस्था नहीं ह....

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इतिहासविद् और लेखिका मीनाक्षी जैन ने अयोध्या विवाद पर दो किताबें Rama and Ayodhya (2013) और The Battle for Rama: Case of the Temple at Ay...

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार अयोध्या मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 40 दिन तक चलने के बाद खत्म हो गई है। सुप्रीम क...

शर्मा ने ​अपनी किताब में जिन घटनाओं और चिट्ठियों का जिक्र किया है, उनसे जाहिर होता है कि नेहरू मूर्तियॉं हटाकर धर्मनिरपेक्ष दिखना चाहते थे। लेकिन, नायर के अड़ने और पंत तथा पटेल के नरम रुख अपनाने के कारण वे अपने इस मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाए।
इलाहबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर जब रामजन्म स्थान की 

‘मुस्लिम पक्ष साबित नहीं कर पाए बाबर का दावा

सुप्रीम कोर्ट, राम मंदिरदशकों से अटके पड़े अयोध्या विवाद की बुधवार(अक्टूबर 16) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई। 40 दिनों की सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है। 23 दिनों के भीतर फैसला आने की उम्मीद है। पीठ ने संबंधित पक्षों को ‘मोल्डिंग ऑफ रिलीफ’ (राहत में बदलाव) के मुद्दे पर लिखित दलील दाखिल करने के लिए 3 दिन का समय दिया है।
सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चन्द्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के सितंबर 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सुनवाई की है। हाई कोर्ट ने अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि को तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर-बराबर बॉंटने का आदेश दिया था।
सुनवाई के 40वें दिन एक हिन्दू पक्षकार ने दलील दी कि सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षकार यह साबित करने में विफल रहे हैं कि अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवादित स्थल पर मुगल बादशाह बाबर ने मस्जिद का निर्माण किया था। वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने कहा कि मुस्लिम पक्ष का यह दावा था कि मस्जिद का निर्माण शासन की जमीन पर हुकूमत (बाबर) द्वारा किया गया था, लेकिन वे इसे सिद्ध नहीं कर पाए हैं।
वैद्यनाथन सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम व्यक्तियों द्वारा अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि पर मालिकाना हक के लिए 1961 में दायर मुकदमे का जवाब दे रहे थे। उन्होंने कहा कि यदि मुस्लिम पक्ष प्रतिकूल कब्जे के सिद्धांत के तहत विवादित भूमि पर मालिकाना हक का दावा कर रहे हैं तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि मूर्तियॉं या मंदिर पहले इसके असली मालिक थे।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार अयोध्या मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 40 दिन तक चलने के बाद खत्म हो गई है। सुप्रीम क...

वैद्यनाथन ने कहा कि अयोध्या में मुसलमानों के पास नमाज पढ़ने के लिए अनेक स्थान हो सकते हैं, लेकिन हिन्दुओं के लिए तो भगवान राम का जन्मस्थान एक ही है जिसे बदला नहीं जा सकता। एक अन्य हिंदू पक्षकार गोपाल सिंह विशारद की ओर से वकील रंजीत कुमार ने कहा कि इस जगह श्रद्धालुओं का पूजा-अर्चना करने पहले से ही अधिकार था। मुस्लिमों की आस्था के स्थान पर इस जमीन का स्वरूप नहीं बदला जा सकता है।
कभी पांडवों ने पाई थी जीत, अब राम मंदिर के लिए हुआ मां बगलामुखी मंदिर में 'शत्रु विजय यज्ञ'
बगलामुखी मंदिर में 'शत्रु विजय यज्ञ' 
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट का फैसला जो भी हो, मध्य प्रदेश के आगर मालवा स्थित मां बगलामुखी मंदिर के पंडितों का मानना है कि फैसला राम मंदिर के पक्ष में ही आएगा। दरअसल, मां बगलामुखी मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां पांडवों ने कौरवों पर विजय पाने के लिए शत्रु विजय यज्ञ किया था।शत्रु विजय यज्ञ के बाद पांडवों को महाभारत के युद्ध में जीत हासिल हुई थी।
तंत्र की देवी हैं मां बगलामुखी
वहीं, राम मंदिर को लेकर जल्द ही फैसला आए इसे लेकर आगर मालवा जिले के नलखेड़ा में स्थित विश्व प्रसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर में मौजूद पंडितों ने मां बगलामुखी के दरबार में शत्रु विजय यज्ञ किया। मां बगलामुखी मूलत: तंत्र की देवी हैं। मान्यता है कि मध्य प्रदेश के नलखेड़ा में चमत्कारिक मां बगलामुखी मंदिर द्वापर काल से मौजूद है। मां बगलामुखी मंदिर तांत्रिक क्रियाओं के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि महाभारत से पहले यहां पर पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से कौरवों पर जीत हासिल करने के लिए तंत्र साधना की थी। ऐसा माना जाता है कि यहां यज्ञ करने पर शत्रुओं पर विजय प्राप्ति होती है। तंत्र-मंत्र क्रियाओं के साथ यज्ञ करने के लिए यह मंदिर विश्व भर में प्रसिद्ध है।
कई दिग्गज करवा चुके हैं तंत्र साधना
आपको बता दें कि मां बगलामुखी मंदिर में कई दिग्गज भी तंत्र साधना करवा चुके हैं। यहां तंत्र साधना करवा चुके लोगों में अभिनेता से लेकर बड़े नेताओं के नाम शामिल हैं। मां बगलामुखी मंदिर में तंत्र साधना करवाने वालों में केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी, पूर्व सांसद उमा भारती, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, अमर सिंह समेत कई नाम शामिल हैं। माना जाता है कि इनमें से सभी को विजय हासिल हुई है। 
राम मंदिर के लिए किया गया 'शत्रु विजय यज्ञ'
वहीं, मां बगलामुखी मंदिर में राम मंदिर के लिए शत्रु विजय यज्ञ करने वाले पंडितों का कहना है कि राम मंदिर के पक्ष में फैसला आए, जल्द से जल्द राम मंदिर बने और जल्द से जल्द इस देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं का सम्मान हो। इसी को लेकर सिद्धपीठ मां बगलामुखी में हवन किया गया है। बता दें कि इस मंदिर में दस पीढ़ियों से पुजारी तंत्र साधना करवाते आए हैं। नलखेड़ा में लखुंदर नदी के तट पर बना यह मंदिर श्मशान क्षेत्र में स्थित है। यहां तंत्र साधना के लिए विशेष प्रकार के यज्ञ, हवन या पूजा-पाठ किए जाते हैं।
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महारुद्र की मूलशक्ति के रूप में होती है पूजा
मां बगलामुखी को महारुद्र (मृत्युंजय शिव) की मूल शक्ति के रुप में पूजा जाता है। तीन मुखों वाली मां के मस्तक पर तीसरा नेत्र व मणि है। मंदिर में मां बगलामुखी के साथ श्रीकृष्ण, हनुमान, भैरव, लक्ष्मी और मां सरस्वती की प्रतिमाएं भी हैं। ऐसी मान्यता है कि मंदिर की स्थापना युधिष्ठिर ने की थी। युधिष्ठिर द्वारा किए गए शत्रु विजय यज्ञ के दौरान स्वयंभू मां बगलामुखी की प्रतिमा प्रकट हुई थी।

मुस्लिम पक्ष के वकील ने फाड़ा हिंदू पक्ष की ओर से दिखाया गया नक्शा

राम मंदिरअयोध्या मामले (Ayodhya Case) में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ आखिरी सुनवाई कर रही है. सुप्रीम कोर्ट ने अन्य कुछ याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार कर दिया और सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि अब बहुत हो चुका, हम शाम को पांच बजे उठ जाएंगे. इसके बाद 40वें दिन कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई. हिंदू पक्ष की ओर से अपनी दलीलें रखी जा रही हैं. सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने हिन्दू महासभा के वकील विकास सिंह की ओर से पेश कि गए नक्शे को फाड़ दिया. इसके बाद सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि अगर कोर्ट का डेकोरम नहीं बनाया रखा गया तो हम कोर्ट से चले जाएंगे. 
अखाड़ा के सेवादार के अधिकार को किसी ने भी चुनौती नहीं दी है सिर्फ सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने वहां पर अपने अधिकार की मांग की. 
सुशील जैन: हमारा दावा मन्दिर की भूमि और स्थाई सम्पत्ति पर मालिकाना अधिकार और सेवायत के अधिकार को लेकर है. मुस्लिम पक्षकारों के इस दावे में भी दम नहीं कि 22/23 दिसंबर 1949 की रात बैरागी साधु जबरन इमारत में घुसकर देवता को रख गए. ये मुमकिन ही नहीं कि मुसलमानों के रहते इतनी आसानी से वो घुस गए. जबकि 23 दिसंबर को जुमा था.
निर्मोही अखाड़े की कहानी शिवाजी महाराज से शुरू हुई. जस्टिस बोबड़े ने कहा कि यहां इसका क्या संबन्ध है. 
- सुशील जैन: हम भले कुछ कमजोर हुए पर शिवाजी महाराज के राज में हम शक्तिशाली थे. कोई सबूत नहीं कि बाबर ने अयोध्या में मस्जिद बनाई. 
- जस्टिस चंद्रचूड़- आप मस्जिद बनाने को लेकर नहीं डेडिकेशन यानी समर्पण /लोकार्पण को लेकर जवाब दें. मस्जिद का नाम भी जन्मभूमि मस्जिद है. पूरी इमारत को किसी ने डेडिकेट नहीं किया. ये यूजर्स डेडिकेशन है.
- विकास सिंह: बाबर उदार लेकिन औरंगजेब कट्टर शासक था. बाबरनामा में ऐसी कोई बात का जिक्र नहीं मिलता.

- साल 1860 का अंग्रेज़ी हुकूमत के ग्रांट का बोर्ड ऑफ कंट्रोल का दस्तावेज कोर्ट के सामने रखा जिसमे मुसलमानों ने ग्रांट का ज़िक्र किया है. जबकि 1858 में बोर्ड भंग हो गया था तो 1860 में कैसे दस्तावेज़ जारी हुआ. 1863 में भी ऐसा ही दिखाया गया और उसे मस्जिद पर कब्जे और मालिकाना हक का आधार बताया गया.
- विकास सिंह ने बुकानन और स्त्रम थेलर की किताबों के हवाले से कहा कि इनमें रामजन्म स्थान की लोकेशन है. तो धवन बोले कि आपने कोर्ट में मजाक बना रखा है. ऑक्सफोर्ड की किताब के हवाले से भी विकास सिंह ने राम जन्मस्थल की सही जगह बताई.
- विकास सिंह ने कहा कि मैं हाईकोर्ट के फैसले के मुताबिक एक नक्शा दिखाना चाहता हूं. तो धवन ने कहा कि धवन कहा कि यह भी किताब का हिस्सा है. मैं किसी भी सूरत में इसे मंजूरी नहीं दे सकता. ये कहते हुए धवन ने नक्शा फाड़ डाला. पांच टुकड़े कर दिए. 
- विकास सिंह ने कोर्ट को बुक दी. CJI ने कहा कि वो नवंबर में इस किताब को पढेंगे. विकास सिंह के कहा कि फैसले से पहले इस किताब को पढ़िएगा. राजीव धवन के बार बार टोकने पर विकास सिंह नाराज हो गए. और कहा कि हमारे पास कम समय है उसके बाद भी राजीव धवन बार बार टोक रहे है.
- हिन्दू महासभा की तरफ से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने बहस शुरू की. विकास सिंह ने किशोर कुणाल की लिखी किताब को रिकॉर्ड पर कोर्ट के समक्ष रखने की पेशकश की. मुस्लिम पक्ष ने इसका विरोध किया. राजीव धवन ने कहा ये नई किताब है. 
- रंजीत कुमार: जन्मभूमि का महत्व भी कैलास मानसरोवर जैसा है. मैं वहां गया तो देखा कि हिन्दू ही नहीं बौद्ध भी उस पर्वत की पूजा उपासना करते हैं. बौद्ध वहां के पत्थरों पर पताका लगाकर उसे ज्वेल ऑफ स्नो या रिन पो छे कहते हैं. पूरा पर्वत बिना किसी प्रतिमा के पवित्र और पूजनीय स्थल माना जाता है.
- मध्यस्थता पैनल ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल की
- सी एस वैधनाथन के बाद गोपाल सिंह विशारद के वकील रंजीत कुमार बहस ने बहस शुरू की. CJI ने रंजीत कुमार को कहा कल आपने कहा था कि आप केवल 2 मिनट बहस करेंगे. रंजीत कुमार ने कहा कि दो मिनट में बहस कैसे पूरा करूंगा. CJI ने मुस्कुराते हुए कहा कि कल तो आप 2 मिनट कह रहे थे. 
- सी एस वैधनाथन ने बहस पूरी करते हुए कहा कि बिना संपति के मालिक हुए 'मुस्लिम पक्ष मालिकाना हक का दावा कर रहा है.'
- सवा ग्यारह बजते ही राजीव धवन ने खड़े होकर कहा कि 45 मिनट हो गए हैं. अब इनकी बहस का समय खत्म हो गया. CJI ने मुस्कुराते हुए कहा अभी 10 मिनट बचे हैं, क्योंकि हम दस मिनट देर से बैठे थे.
- वैद्यनाथन ने अपनी बहस आगे बढ़ाई तो CJI ने आगाह किया कि 5 मिनट में अपना जवाब पूरा कर लें.
- वैद्यनाथन- हालांकि दोनों पक्ष वहां उपासना कर रहे थे. लेकिन मस्जिद को वक़्फ़ करने या डेडिकेशन का कोई प्रमाण या सबूत किसी के पास नहीं है.
- वैधनाथन: ट्रांसलेशन को लेकर 8 वर्षों से कोई आपत्ति नहीं जताई गई. मुस्लिम पक्षकारों को जिरह करने का पर्याप्त अवसर दिया गया. मुस्लिम कह रहे है कि हमने उन्हें वहां से हटाने की कोशिश की. वक्फ वह सिर्फ दावा कर रहे है, उनको दस्तवेज़ दिखाना चाहिए. उनकी तरफ से माना गया कि हिन्दू वहां पूजा कर रहे थे और हिंदुओं को वहां से हटाने की कोशिश की गई.
- वैधनाथन: अगर हम जन्मस्थान पर विश्वास नहीं करेंगे तो फिर हम कहां करेंगे. रामलला विराजमान ने दावा किया 1934 तक ही विवादित स्थल पर नवाज हुई.
- हिंदू पक्ष के वकील सी एस वैद्यानाथन का जवाब: मुस्लिम कहते हैं कि राम चबूतरा भगवान राम का जन्मस्थान था. यह छोटी जगह को बांटने का एक प्रयास था. श्रद्धालु आंतरिक गुबंद में भी पूजा अर्चना करते रहे हैं. 
- सी एस वैद्यानाथन: हम आंतरिक आंगन में प्रार्थना कर रहे थे. लेकिन बाद में रेलिंग के कारण और कानून और व्यवस्था की समस्याओं को हल करने के लिए लगाए गए प्रतिबंध के कारण ये बंद हो गया. विवादित स्थल में 1949 तक वहां अंदर मूर्ति नहीं थी और साप्ताहिक नमाज़ होती थी.
- हाईकोर्ट के फैसले के हवाले से वैद्यनाथन ने सुन्नी बोर्ड के दावे को काटते हुए कहा कि जब ज़मीन का मालिक तत्कालीन हुकूमत थी और उन्हीं की देखरेख में मस्जिद बनाई गई तो सुन्नी बोर्ड ने उसे कैसे डेडिकेट किया? 
- अयोध्या मामले पर सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि अब बहुत हो चुका, हम पांच बजे उठ जाएंगे
- सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अन्य अर्जियों पर सुनवाई से किया इनकार
मंगलवार को सुनवाई के दौरान एक हिन्दू पक्ष ने दलील दी कि भारत विजय के बाद मुगल शासक बाबर द्वारा करीब 433 साल पहले अयोध्या में भगवान राम के जन्म स्थान पर मस्जिद का निर्माण कर ‘ऐतिहासिक भूल' की गयी थी और अब उसे सुधारने की आवश्यकता है.
पीठ के समक्ष एक हिन्दू पक्षकार की ओर से पेश पूर्व अटार्नी जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरण ने कहा कि अयोध्या में कई मस्जिदें हैं जहां मुस्लिम इबादत कर सकते हैं लेकिन हिन्दू भगवान राम का जन्म स्थान नहीं बदल सकते. सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य द्वारा 1961 में दायर मामले में प्रतिवादी महंत सुरेश दास की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने कहा कि विदेशी शासक बाबर द्वारा की गयी ऐतिहासिक भूल को सुधारने की जरूरत है. बाबर ने भगवान राम के जन्म स्थान पर मस्जिद का निर्माण कर ऐतिहासिक भूल की और कहा कि मैं बादशाह हूं और मेरा आदेश ही कानून है.
उन्होंने कहा, ‘अयोध्या में मुस्लिम किसी भी अन्य मस्जिद में इबादत कर सकते हैं. अकेले अयोध्या में 55-60 मस्जिदें हैं. लेकिन, हिंदुओं के लिए यह भगवान राम का जन्म स्थान है...जिसे हम बदल नहीं सकते.'
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संविधान पीठ ने परासरण से परिसीमा के कानून, विपरीत कब्जे के सिद्धांत और अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि से मुस्लिमों को बेदखल किये जाने से संबंधित अनेक सवाल किये. पीठ ने यह भी जानना चाहा कि क्या मुस्लिम अयोध्या में कथित मस्जिद छह दिसंबर, 1992 को ढहाये जाने के बाद भी विवादित संपत्ति के बारे में डिक्री की मांग कर सकते हैं?
पीठ ने परासरण से कहा, ‘वे कहते हैं, एक बार मस्जिद है तो हमेशा ही मस्जिद है, क्या आप इसका समर्थन करते हैं.' इस पर परासरण ने कहा, ‘‘नहीं, मैं इसका समर्थन नहीं करता. मैं कहूंगा कि एक बार मंदिर है तो हमेशा ही मंदिर रहेगा.'