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क्या इस्लाम मूर्तियों के आगे नमाज पढ़ने की इजाजत देता है? मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना


विश्व में भारत एक ऐसा अनोखा देश है जहाँ हिन्दुओं को अपने धार्मिक स्थलों को वापस लेने के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं। कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में मुस्लिम तुष्टिकरण करते हर हिन्दू धार्मिक स्थल को विवादित बना मुसलमानों को पागल बना वोट लेता रहा और मुसलमान हिन्दुओं को इस्लाम का दुश्मन समझता रहा।

कल(मई 15) को एक राष्ट्रीय चैनल पर चर्चा के दौरान एक इस्लामिक विद्वान ने कहा कि अगर मुसलमान एक दिन नमाज पढ़ ले तो गंगा-जमुनी तहजीब की एक अच्छी मिसाल होगी। चर्चा में भाग ले रहे एक सहयोगी ने कहा बहुत अच्छी बात है फिर तो हिन्दुओं को भी मस्जिद में हनुमान चालीसा पढ़ने की इजाजत होनी चाहिए। इतना ही नहीं, मुसलमानों को किस तरह पागल बनाया जाता है और वह भी गुलामों की तरह कट्टरपंथी मौलानाओं की बात मान हिन्दुओं को अपना दुश्मन समझने लगता है। जब इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है फिर भोजशाला में स्तम्भों और दीवारों पर बनी मूर्तियों के आगे नमाज कैसे पढ़ी जा सकती है? ठीक यही स्थिति रामजन्मभूमि मन्दिर की थी।     

     

राम अगर काल्पनिक थे फिर लीला स्थलों पर कांग्रेसी क्यों जाते थे?  

अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर मुद्दा इसलिए उलझा रहा कि कांग्रेस साक्ष्यों को छिपाती रही। और मुसलमानों के बीच हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं को बदनाम करने का काम करती रही। रामसेतु और राम को काल्पनिक बताना, लेकिन हिन्दुओं को पागल बनाने दशहरे पर रामलीला मंचो पर माल बटोरने पहुंचना। अगर राम काल्पनिक थे फिर राम मंचन स्थलों पर क्यों जाते थे?  
भारत की महान सभ्यता केवल पुस्तकों में दर्ज कथाओं तक सीमित नहीं, बल्कि वह धरती की परतों में भी सांस लेती है। जब पुरातत्वविद जमीन की गहराइयों में उतरते हैं, तो वे केवल ईंट-पत्थर नहीं खोजते, बल्कि इतिहास की धड़कन को सुनते हैं। हाल के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य स्तरीय पुरातत्व विभागों द्वारा की गई खुदाइयों ने यह संकेत दिया है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं अत्यंत प्राचीन और सतत रही हैं। यह निरंतरता ही सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। एएसआई की खोज और तथ्यों के आधार पर अब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने धार की भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। शुक्रवार को दिए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा, हमने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर विचार किया है। ASI एक्ट के प्रावधानों के साथ-साथ अयोध्या मामले को भी आधार माना है। ऐतिहासिक और संरक्षित जगह देवी सरस्वती का मंदिर है। केंद्र सरकार और ASI यह फैसला लें कि भोजशाला मंदिर का मैनेजमेंट कैसा रहेगा।

पुरातात्विक-ऐतिहासिक तथ्य और अयोध्या केस को भी आधार माना

न्यूज वेबसाइट बार एंड बेंच के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा कि भोजशाला में सरस्वती मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के साक्ष्य पाए गए हैं। कोर्ट ने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई सर्वे के साथ अयोध्या केस को भी आधार माना। कोर्ट ने कहा- हर सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाले प्राचीन स्मारकों और मंदिरों की सुरक्षा निश्चित करे। साथ ही गर्भगृह और धार्मिक आस्था से जुड़ी देव प्रतिमाओं का भी संरक्षण करे। अदालत ने ASI का 2003 का वह आदेश भी रद्द कर दिया, जिसमें ASI ने भोजशाला में हिंदुओं को पूजा का अधिकार नहीं दिया था। उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें मुस्लिमों को नमाज पढ़ने का अधिकार दिया गया था।

 मुस्लिम पक्ष फैसले की समीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट जाएगा

हाई कोर्ट ने भोजशाला को कमाल मौला मस्जिद बताने वाले मुस्लिम पक्ष को सरकार से मस्जिद के लिए अलग जमीन मांगने को कहा है। धार शहर काजी वकार सादिक ने कहा कि उन्हें हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान है। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद और शोभा मेनन ने कोर्ट में अपना पक्ष रखा था। अब फैसले की समीक्षा की जाएगी, इसके बाद मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाएगा। वहीं जैन समाज की ओर से पैरवी कर रहीं एडवोकेट प्रीति जैन ने कहा कि सुनवाई के दौरान यह दावा किया गया था कि तीर्थंकरों की मूर्तियों के अवशेष आज भी ब्रिटिश म्यूजियम में मौजूद हैं और उन्हें उचित स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को लेकर जैन समाज भी सुप्रीम कोर्ट जाएगा।
हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर की, हमको भी सुनें
हाईकोर्ट के फैसले के बाद फिलहाल भोजशाला के मुख्य गेट पर बैरिकेड्स लगाकर परिसर को बंद कर दिया गया है। मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात है। भोजशाला विवाद मामले में हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर की है। याचिकाकर्ता जितेंद्र सिंह विशेन की ओर से अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा ने कैविएट दाखिल की। इसमें कहा गया है कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर किसी भी अपील पर हिंदू पक्ष को सुने बिना कोई आदेश पारित न किया जाए।

भोजशाला: 2100 पन्नों की रिपोर्ट में 500 से अधिक तस्वीरें

इससे पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में मध्यप्रदेश में ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे साबित होता है कि हमारी हिंदू संस्कृति कितनी सदियों पुरानी है। एएसआई को भोजशाला मस्जिद में हिंदू प्रतीक चिन्ह मिले हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि हिंदू धार्मिक स्थल को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ है।  मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर एएसआई की विस्तृत रिपोर्ट ने महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। एएसआई ने 2100 पन्नों की रिपोर्ट को 500 से अधिक तस्वीरों और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तैयार किया है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि भोजशाला का निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ, जबकि परिसर में स्थित मस्जिद का निर्माण 1265 ईस्वी के आसपास का बताया गया है। इस अंतर को यूं समझ सकते हैं कि 1265 ईस्वी एक विशिष्ट वर्ष है जो 13वीं शताब्दी (1201-1300) का हिस्सा है, जबकि 12वीं शताब्दी 1101-1200 ईस्वी के बीच की अवधि है। यानि 1265 से लगभग 65 से 165 साल पहले की अवधि है। 1265 ईस्वी में सुल्तान बलबन का शासन था, जबकि 12वीं सदी में दिल्ली सल्तनत से पहले राजपूत राजाओं का शासन था। यह तथ्य ऐतिहासिक क्रम को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इससे यह भी साफ संकेत मिलता था कि पहले भोजशाला बनी और उसके बाद मस्जिद का निर्माण हुआ।

मध्यप्रदेश के धार में भोजशाला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भोजशाला मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक प्राचीन स्थल है, जिसे परमार शासक राजा भोज (11वीं शताब्दी) से जुड़ा है। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों के आधार पर यह साबित होता है कि यह एक प्राचीन शैक्षिक-धार्मिक केंद्र रहा है, जहां पर विद्यादायिना मां सरस्वती की उपासना और अध्ययन परंपरा रही है। भोजशाला स्थल पर संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष और विद्या-परंपरा से जुड़े संकेतों का प्रमाणित उल्लेख मिलता है। दरअसल, भोजशाला पर विवाद इसी परिसर में कमाल मौला मस्जिद के अस्तित्व के बाद सामने आया। हिंदुओं के कई अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी तोड़ो और कब्जा करो की नीति अपनाई गई। इससे यह साफ हो गया कि यह स्थल मूलतः मां सरस्वती का मंदिर/विद्या-केंद्र था, जिस पर बाद में मस्जिद बनी। इसी दावे-प्रतिदावे के कारण पूजा और नमाज दोनों को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली
कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली। क्योंकि लंबे समय तक प्रशासन ने इस हिंदू स्थल पर भी दिन-विशेष की व्यवस्था लागू कर दी। कुछ दिनों में हिंदू पूजा और कुछ में तुष्टिकरण के लिए मुस्लिम नमाज की अनुमति प्रदान कर दी गई। यह व्यवस्था अस्थायी थी, पर मूल प्रश्न कि स्थल की ऐतिहासिक पहचान तो अनसुलझा रहा। इसके लिए मामला न्यायालयों तक पहुंचा। हाल के वर्षों में अदालतों ने पुरातात्त्विक सर्वेक्षण और साक्ष्यों के आधार पर तथ्य-जांच पर जोर दिया है। कुछ अवसरों पर विशेष तिथियों/समयों में पूजा की अनुमति संबंधी आदेश भी सामने आए हैं। अंतिम निर्णय अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। अब सुप्रीम कोर्ट ने बसंत पंचमी के दिन धार में भोजशाला में सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम दोनों पक्षों से अपील करते हैं कि वे आपसी सम्मान और सहयोग बरकरार रखें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और जिला प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने की हिदायत दी।

मंदिर स्थापत्य के संकेत, विज्ञान-तकनीक से इतिहास की पड़ताल
एएसआई के सर्वेक्षण में स्तंभों पर कमल आकृतियां, देवी-देवताओं की मूर्तियां, संस्कृत शिलालेख और मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत पाए गए। इन प्रतीकों को सनातन परंपरा से जोड़ा जाता है। वास्तुशिल्पीय विश्लेषण यह दर्शाता है कि संरचना में प्रयुक्त शैली उस कालखंड के मंदिर निर्माण की परंपराओं से मेल खाती है। हालांकि यह विषय न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन पुरातात्विक दृष्टि से यह अध्ययन सांस्कृतिक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एएसआई ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर भूमिगत संरचनाओं का परीक्षण किया। खुदाई के दौरान दीवारों की संरचना, स्तंभों और शिलालेखों का गहन अध्ययन किया गया। यह दर्शाता है कि इतिहास की खोज अब केवल अनुमान पर आधारित नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पद्धति पर टिकी है। सनातन संस्कृति की प्राचीनता को समझने के लिए यह पद्धति निर्णायक सिद्ध हो रही है।

मंदिर के हिस्सों में बनाई मस्जिद, सनानत धर्म से जुड़े प्रतीक मिले
भोजशाला विवाद को लेकर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पुराने मंदिर के हिस्सों का इस्तेमाल करके मस्जिद बनाई गई है। भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, भोजशाला परिसर में सिक्कों, सनातन धर्म से जुड़े प्रतीक चिन्हों और देवी-देवताओं की मूर्तियों का विवरण दिया गया है। मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत मिले हैं। कई स्तंभों पर नक्काशी, कमल आकृतियां और शिल्प अवशेष पाए गए। संस्कृत भाषा के शिलालेख भी दर्ज किए गए हैं। यह 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच के बताए जा रहे हैं

सनातन संस्कृति यानि अनादि और अनंत शक्ति की निरंतरता
इन खोजों का साझा सूत्र निरंतरता है। चाहे मंदिर स्थापत्य हो, शिलालेख हों, मूर्तियां हों या नगर नियोजन, सदियों से एक सांस्कृतिक धारा प्रवाहित होती दिखती है। सनातन शब्द का अर्थ ही है, जो अनादि और अनंत है। पुरातात्विक प्रमाण इस सांस्कृतिक निरंतरता को ठोस आधार प्रदान करते हैं। सनातन संस्कृति की महत्ता को समझने के लिए अब तथ्यपरकत खोज हो रही है। भारत की सनातन संस्कृति केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत धरोहर है। राजस्थान से मध्य प्रदेश तक फैले पुरातात्विक प्रमाण यह संकेत देते हैं कि यह परंपरा सदियों से विकसित होती रही है। मंदिर स्थापत्य, नदी किनारे बसे नगर, शिलालेख और मूर्तियां, ये सब उस सांस्कृतिक यात्रा के साक्षी हैं जो आज भी जारी है। इन खोजों का महत्व केवल अतीत तक सीमित नहीं है। वे हमें यह स्मरण कराते हैं कि हमारी सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी हैं। जब नई पीढ़ी इन साक्ष्यों को देखती है, तो उसे अपनी पहचान पर गर्व का अनुभव होता है। इतिहास की हर खुदाई हमें यही बताती है कि यह सभ्यता क्षणिक नहीं, बल्कि कालजयी है। सनातन संस्कृति की यही सबसे बड़ी शक्ति है कि वह समय के प्रवाह में भी अपनी पहचान बनाए रखती है, और हर युग में नए प्रमाणों के साथ स्वयं को पुनः स्थापित करती है।

अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के बारे में भी कहा जाता है कि इस स्थल पर पहले प्राचीन शिव मंदिर था। दावा करने वाले पक्ष स्थापत्य संकेतों, ऐतिहासिक उल्लेखों और स्थानीय परंपराओं के पुख्ता प्रमाण देते हैं। उनका कहना है कि स्थल की मूल धार्मिक पहचान की जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर, दरगाह से जुड़े पक्ष दरगाह की ऐतिहासिक-धार्मिक निरंतरता पर जोर देते हैं। यह मामला भी अदालतों के समक्ष है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किए जाने का अर्थ यह है कि शीर्ष अदालत ने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई के लिए दरवाजा खोल दिया है। आगे की प्रक्रिया में दस्तावेज, ऐतिहासिक प्रमाण और विधिक तर्कों की जांच होगी। भोजशाला हो या अजमेर की दरगार दोनों विवादों में मूल प्रश्न स्थल की ऐतिहासिक पहचान और पूजा/आस्था के अधिकार से जुड़ा है। दोनों ही मामलों में अंतिम फैसला अदालतों को करना है। भोजशाला में प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय से दिन-विशेष की व्यवस्था रही, वहीं अजमेर में विवाद अपेक्षाकृत न्यायिक सुनवाई के शुरुआती चरणों में है।

पहले जिनको विवादास्पद कह दबाया, वे अब खुलकर विमर्श में आए
दरअसल, भारत की सभ्यता केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि स्मृति की निरंतर धारा है। इस स्मृति में मंदिर हैं, तीर्थ हैं, शिलालेख हैं और वे कथाएं हैं, जिनमें आस्था, दर्शन और संस्कृति एक साथ बहती रही है। लेकिन इस सांस्कृतिक निरंतरता को इतिहास के कुछ दौरों में योजनाबद्ध रूप से तोड़ा गया। सनातन परंपरा के अनेक धार्मिक स्थलों पर हमले हुए, संरचनाएं ध्वस्त की गईं और पूजा स्थलों के ऊपर नई धार्मिक इमारतें खड़ी कर दी गईं। यह केवल स्थापत्य परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रयास था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद हिंदू समाज के भीतर एक नया आत्मबोध उभरा। दशकों तक जिन विषयों को “विवादास्पद” कहकर दबाया गया, वे अब खुलकर विमर्श के केंद्र में आ गए हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण इस परिवर्तन का प्रतीक बन गया। 22 जनवरी को प्राण-प्रतिष्ठा के दो वर्ष पूरे होना केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत अब अपनी सांस्कृतिक स्मृति से मुंह नहीं मोड़ेगा।

राम मंदिर पर कांग्रेस में फूट: सुरजेवाला के बयान को ख़ुर्शीद ने नकारा

सलमान ख़ुर्शीद, रणदीप सुरजेवालाराम मंदिर मुद्दे को लेकर कांग्रेस के भीतर ही खींचतान देखने को मिल रही है। पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि कांग्रेस अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करते हुए राम मंदिर निर्माण का समर्थन करती है। लेकिन पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान ख़ुर्शीद ने कहा है कि अगर सुरजेवाला की जगह वे पार्टी का रुख रखते तो कुछ अलग कहते। उन्होंने कहा कि राम मंदिर पर अगर उन्हें कांग्रेस का पक्ष रखने भेजा जाता तो उनकी राय वो नहीं होती, जो सुरजेवाला ने कही
ख़ुर्शीद ने कहा कि उनकी पार्टी का शुरू से यह मानना रहा है कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा उसे स्वीकार किया जाएगा। लेकिन, फ़ैसले के डिटेल में जाने पर अलग-अलग चीजों को उठा कर पेश किया जा सकता है। ख़ुर्शीद ने कहा कि राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में लिखा गया है कि 3 बार मस्जिद के साथ ग़ैर-क़ानूनी कार्य किया गया। उन्होंने कहा कि क्या हमें ये चीजें हाइलाइट नहीं करनी चाहिए?
सलमान ख़ुर्शीद ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ से बात करते हुए रणदीप सुरजेवाला के बयान को नकार दिया और कहा कि इससे ग़लत सन्देश गया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि फ़ैसले में मस्जिद को ध्वस्त करने या फिर मंदिर और मस्जिद दोनों बनाने की बातें कही गई है। बकौल ख़ुर्शीद, वो मीडिया के सामने इन बातों को उठाते। उनका इशारा था कि जिस तरह उनकी पार्टी ने केवल मंदिर की बात की, उससे ग़लत सन्देश गया। उन्होंने कहा कि पार्टी को सीधा कहना चाहिए था कि वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करती है।
ख़ुर्शीद ने कहा कि कांग्रेस नेता कठपुतली नहीं हैं, अगर बोलते समय किसी चीज को लेकर स्पष्ट राय है तो उसे रखना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के सभी नेताओं ने तय किया था कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान किया जाएगा और यही कहना चाहिए था। ख़ुर्शीद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के ‘पूरे फ़ैसले’ का सम्मान किए जाने की बात कही जानी चाहिए थी, सिवाय उसमें से चुन कर किसी एक चीज का समर्थन करने की बात कहने के। एचटी को दिए गए इंटरव्यू में ख़ुर्शीद ने एक तरह से सुरजेवाला और अपनी पार्टी से एकमत न होने की ओर इशारा किया।

राम मंदिर पर सलमान ख़ुर्शीद का इंटरव्यू (साभार: HT)
ज्ञात हो कि रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि वो राम मंदिर बनाने के पक्ष में हैं। उन्होंने कहा था कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला न तो किसी की जीत है और न ही किसी की हार। लेकिन कांग्रेस पार्टी द्वारा राम मंदिर के निर्माण का समर्थन किए जाने पर ही ख़ुर्शीद नाराजगी दिखा रहे हैं। ख़ुर्शीद ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक लेख लिख कर बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में रामलला की मूर्ति रखे जाने की निंदा की है। साथ ही ख़ुर्शीद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि वहाँ मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात एएसआई की रिपोर्ट साबित नहीं कर पाई। उन्होंने लिखा कि ये फ़ैसला ‘हिन्दू राष्ट्र’ को ख़ारिज करता है।

न्यायालय पर सतत् हमले और राम मन्दिर मुकदमा

-विनोद बंसल
      ट्विटर : @vinod_bansal Email : vinodbansal01@gmail.com
       बात पांच दिसंबर 2017 की है जब देश के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंड पीठ स्वतंत्र भारत के सर्वाधिक चर्चित 77 वर्षों से लंबित मामले पर अपनी पहली सुनवाई हेतु उपस्थित थी. इससे पहले 11 अगस्त को न्यायालय ने सभी पक्षकारों को अपने अपने पक्ष के दस्तावेज समय पर जमा कराने हेतु आदेश दिया था. अपराह्न 2 बजे भारत के वरिष्ठ वकीलों, वादी-प्रतिवादियों तथा अपीलकर्ताओं इत्यादि से खचा-खच भरे न्याय कक्ष में जैसे ही प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में गठित पीठ ने सुनवाई प्रारम्भ की तथा श्री रामलला विराजमान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. पाराशरण, सी एस वैद्यनाथन तथा हरीश साल्वे ने अपना पक्ष रखना प्रारम्भ किया, दूसरे पक्ष ने व्यवधान पैदा करना प्रारम्भ कर दिया. पूर्व कानून मंत्री तथा काँग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल, दुष्यंत दवे तथा राजीव धवन ने एक के बाद एक लगातार कार्यवाही में रोड़े अटकाए. जब न्यायाधीशों ने उन सभी से सुनवाई आगे बढ़ने देने को कहा तो वे सीधे तौर पर धमकी या धौंस देने पर उतारू हो गए और कहा कि यदि ये सुनवाई नहीं रुकी तो वे न्यायालय का बहिष्कार करेंगे.
       मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पैरवी करते हुए इन वकीलों ने कहा कि यह सुनवाई भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के इशारे पर हो रही है क्योंकि उसी के चुनाव घोषणा पत्र में इसका वर्णन भी है और सुब्रमण्यम  स्वामी ने भी इस सम्बन्ध में प्रधान मंत्री को पत्र भी लिखा है. दूसरा वे बोले कि इस मामले की सुनवाई की अभी जल्दी ही क्या है? इसे जुलाई 2019 के आम चुनाव के बाद ही प्रारम्भ करनी चाहिए. तीसरा, कपिल सिब्बल ने कहा कि इस मामले में निर्णय से बाहर गम्भीर परिणाम होंगे तथा इससे देश के साम्प्रदायिक ताने बाने को नुकसान पहुंचेगा. चौथा, मुकदमे के महत्त्व को देखते हुए उच्चतम न्यायालय के पांच या सात सदस्यीय पीठ ही सुनवाई करे न कि वर्तमान तीन सदस्यीय पीठ इसकी सुनवाई करे. पांचवा,  मुख्य न्यायाधीश की सेवा निवृति की तिथि आने वाली है अत: यह मामला उनके रहते पूरा नहीं सुना जा सकता. छटा बहाना यह था कि न्यायालय को दिए जाने वाले 90,000 पृष्ठों के दस्तावेजों के अनुवाद हेतु भी समय चाहिए. इस सब के ऊपर पूर्व कानून मंत्री व कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ने तो भरे कोर्ट को धमकी तक दे डाली कि यदि हमारी बातें नहीं मानी गई तो हम कोर्ट का बहिष्कार करेंगे. इस प्रकार पहले ही दिन की बहस में राजनीति, धमकियां, असंसदीय भाषा-शैली, अतार्किक बहसबाजी से देश की सर्वोच्च न्यायालय को दो चार होना पड़ा.
       मात्र दो ही दिन बाद सात दिसंबर को एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय को फिर इन तथाकथित वरिष्ठ वकीलों को आड़े हाथों लेते हुए सीधी चेतावनी देनी पड़ी. प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ को यहाँ तक कहना पड़ा कि “वकीलों को कानून का मंत्री कहा जाता है. उन्हें कोर्ट का अधिकारी भी कहा जाता है किन्तु दुर्भाग्य से वकीलों का एक छोटा सा समूह अपनी आवाज बढ़ा रहा है. जोर से चिल्लाने वालों को स्पष्ट तौर से समझ लेना चाहिए कि उन्हें सहन नहीं किया जाएगा. आवाज बढाने का अर्थ है कि या तो वे अपने पक्ष को रखने में अक्षम हैं या वे उसके लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं
       वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, दुष्यंत दवे तथा राजीव धवन के रामजन्म भूमि अयोध्या मामले, दिल्ली सरकार की केंद्र के साथ खींच-तान मामले तथा एक और अन्य मामले का हवाला देते हुए प्रधान न्यायाधीश को गुस्से से कहना पड़ा कि “जब बेंच धवन की दलीलों से असहमती व्यक्त करती है तो वे आग बबूला(“atrocious”) हो जाते हैंअयोध्या केस में तो उनका व्यवहार और भी अधिक नृशंस(“atrocious”) दिखा. बेंच ने कहा कि यह बार की परिपाटी नहीं है. यदि बार इनको ठीक नहीं करती तो हमें इनको ठीक करना पड़ेगा.”
       मामला यहाँ तक ही रुकता तो भी चल जाता किन्तु, इन कथित वरिष्ठ वकीलों की ऐंठ इससे भी एक कदम और आगे बढ़ गई और तीन ही दिन बाद राजीव धवन ने कोर्ट में वकालत नहीं करने तक की धमकी भी दे डाली. देश के प्रधान न्यायाधीश को भेजे अपने पत्र में उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली सरकार मामले में उन्हें कोर्ट में अपमानित होना पड़ा. धवन ने कहा कि “आप मेरे वरिष्ठ वकील के गाउन को वापस ले सकते हैं किन्तु फिर भी मैं उसे अपनी यादों व सेवाओं को याद रखने के लिए अपने साथ रखूँगा”. हालांकि, जब न्यायालय ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया तो वे बेशर्मी से न्यायालय में लौट आए. 
       न्यायालय में बार-बार दी जा रही धमकियों को बेंच पर निष्प्रभावी जान इस “शाउटिंग ब्रिगेड” ने अब  राजनैतिक दाव-पेच लगा मुख्य न्यायाधीश पर ही महाभियोग लगाने के लिए विपक्षी राजनेताओं को एकत्र कर लिया और कुछ वरिष्ठ न्यायाधीशों को अपने ही मुख्य न्यायाधीश के विरूद्ध प्रेस के समक्ष उतार कर देश में एक नया किन्तु बेहद दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास रच डाला. महाभियोग का मामला जब संसद के समक्ष पहुंचा तथा  राज्यसभा के सभापति के नाते श्री एम वेंकय्या नायडू ने इसे अस्वीकार कर दिया तो यह ब्रिगेड देश के उप-राष्ट्रपति पर भी प्रहार से बाज नहीं आया.
       खैर ! सुनवाई के अनेक मोड़ों पर आए अटकावों, भटकावों, धौंस व धमकियों के सतत प्रहारों से बचते-बचाते तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा, जिनसे मामले के निस्तारण की पूरी अपेक्षा थी, ने 2 अक्तूबर 2018 को अपना कार्यकाल तो पूरा कर लिया किन्तु मसला वहीँ का वहीं रहा.
       नए मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई ने जब कार्यभार सम्भाला और सुनवाई के लिए एक पीठ का गठन किया तो उसमें सामिल एक जज पर ही प्रश्न चिन्ह लगा कर दिया गया और यहाँ तक कि पीठ के जजों का धर्म देख बाबर बादियों ने प्रश्न किया कि इसमें कोई मुस्लिम जज क्यों नहीं है? अंततोगत्वा सुनवाई प्रारम्भ से पूर्व ही ‘साउटिंग ब्रिगेड’ की दोनों मांगों को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने मान लिया और एक न्यायाधीश को पीठ से हटना पड़ा. ऐसे ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त मध्यस्तों के नामों पर भी खूब टीका-टिपण्णी हुई.  
       सुनवाई जब पुन: प्रारम्भ हुई तो फिर सर्वोच्च न्यायालय की मर्यादाओं को बारम्बार तार-तार करने के सतत प्रयास जारी रहे. कभी इन ‘वरिष्ठ वकीलों’ ने मुख्य-न्यायाधीश के समक्ष न्यायालय द्वारा पक्षपात करने के सरे-आम आरोप लगाए तो कभी कार्यवाही में बाधक बन न्यायालय को कार्यवाही बीच में ही रोकने को मजबूर किया. कभी कहा कि यदि आप लगातार सुनवाई करेंगे तो यह ‘अमानवीय’ व ‘अव्यावहारिक’  होगा. 9 अगस्त को चौथी लगातार सुनवाई पर धवन के धमकी दी कि सुनवाई में जल्दवाजी की तो वे न्यायालय का सहयोग नहीं कर पाएंगे और फिर कहा कि मैं यह टोर्चर नहीं झेल सकता और मामले की पैरवी छोड़ दूँगा. कभी आरोप लगाया कि आप सिर्फ मुस्लिम पक्षकारों से ही प्रश्न क्यों पूछते हैं? कभी मामले को मध्यस्तता पैनल के भंवर में फंसाने के षड्यंत्र रचे गए तो कभी मुस्लिम पक्षकारों व उनके वकीलों को धमकियों का जिक्र किया गया. कभी हिन्दू धर्म ग्रंथों, आराध्य देवों व हिन्दू भावनाओं को कचोटने के कुत्सित प्रयास हुए. लगातार सुनवाई के 40 वें व अंतिम दिन तो श्री राजीव धवन ने अपनी रही सही कसर भी पूरी कर ली. श्री राम जन्मभूमि के पवित्र मानचित्र को मुख्य-न्यायाधीश के उपस्थिति में पूरी संविधान पीठ के सामने ही खचाखच भरे कोर्ट रूम में ही फाड़ कर न्यायालय की मर्यादा को फिर से तार-तार कर डाला. इस पर मुख्य न्यायाधीश को कहना पडा कि यदि आप की संतुष्टि अभी भी नहीं हुई हो तो इसके और टुकडे कर सकते हैं, हम यहाँ से उठ जाते है.
       श्री राम जन्म भूमि मामले में चली सुनवाई ने अनेक उन राम-द्रोहियों तथा न्याय द्रोहियों को बे-नकाब कर दिया जो अभी तक व्यवस्था में सेंध लगा कर, धौंस जमाकर या अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर इसे चरमराने में ना जाने कब से सक्रिय थे. वास्तव में मुट्ठीभर वकील पता नहीं कब से अपनी पूर्व कानून मंत्री, राजनेता और वरिष्ठता की दबंगई न्याय व्यवस्था पर चला रहे थे. एक महत्वपूर्ण विचारणीय बात यह भी है कि आखिर उपरोक्त अशोभनीय न्याय-विरोधी व्यवहार सिर्फ मुस्लिम पक्षकारों का ही क्यों रहा? दो वर्ष चली इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई में किसी हिन्दू पक्षकार या उसके किसी भी वकील के व्यवहार में तो कोई न्यूनता दृष्टिगोचर नहीं हुई? अब यह सही समय है जब जोर जोर से चिल्लाकर धौंस दिखाने वाली इस शाउटिंग ब्रिगेड को बार या कोर्ट के द्वारा बाहर का रास्ता दिखाकर इनके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की जाए जिससे कोई भी हमारी न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता व पारदर्शिता में दखल देने का दुस्साहस ना कर सके.   हमें गर्व है अपनी न्याय-व्यवस्था पर जो अनेक झंझावातों, प्रहारों व षडयंत्रों को नकारते हुए गत 2 वर्षों में  गम्भीरता पूर्वक अपने लक्ष्य की ओर बढ़ी. देश को पूरा भरोसा है कि श्री राम जन्मभूमि पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व के लिए एक मिशाल होगा तथा जन्मभूमि पर भगवान श्री राम के राष्ट्र मंदिर का निर्माण शीघ्र प्रारम्भ होगा.
** लेखक विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं**

मुस्लिम पक्ष के वकील ने फाड़ा हिंदू पक्ष की ओर से दिखाया गया नक्शा

राम मंदिरअयोध्या मामले (Ayodhya Case) में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ आखिरी सुनवाई कर रही है. सुप्रीम कोर्ट ने अन्य कुछ याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार कर दिया और सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि अब बहुत हो चुका, हम शाम को पांच बजे उठ जाएंगे. इसके बाद 40वें दिन कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई. हिंदू पक्ष की ओर से अपनी दलीलें रखी जा रही हैं. सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने हिन्दू महासभा के वकील विकास सिंह की ओर से पेश कि गए नक्शे को फाड़ दिया. इसके बाद सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि अगर कोर्ट का डेकोरम नहीं बनाया रखा गया तो हम कोर्ट से चले जाएंगे. 
अखाड़ा के सेवादार के अधिकार को किसी ने भी चुनौती नहीं दी है सिर्फ सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने वहां पर अपने अधिकार की मांग की. 
सुशील जैन: हमारा दावा मन्दिर की भूमि और स्थाई सम्पत्ति पर मालिकाना अधिकार और सेवायत के अधिकार को लेकर है. मुस्लिम पक्षकारों के इस दावे में भी दम नहीं कि 22/23 दिसंबर 1949 की रात बैरागी साधु जबरन इमारत में घुसकर देवता को रख गए. ये मुमकिन ही नहीं कि मुसलमानों के रहते इतनी आसानी से वो घुस गए. जबकि 23 दिसंबर को जुमा था.
निर्मोही अखाड़े की कहानी शिवाजी महाराज से शुरू हुई. जस्टिस बोबड़े ने कहा कि यहां इसका क्या संबन्ध है. 
- सुशील जैन: हम भले कुछ कमजोर हुए पर शिवाजी महाराज के राज में हम शक्तिशाली थे. कोई सबूत नहीं कि बाबर ने अयोध्या में मस्जिद बनाई. 
- जस्टिस चंद्रचूड़- आप मस्जिद बनाने को लेकर नहीं डेडिकेशन यानी समर्पण /लोकार्पण को लेकर जवाब दें. मस्जिद का नाम भी जन्मभूमि मस्जिद है. पूरी इमारत को किसी ने डेडिकेट नहीं किया. ये यूजर्स डेडिकेशन है.
- विकास सिंह: बाबर उदार लेकिन औरंगजेब कट्टर शासक था. बाबरनामा में ऐसी कोई बात का जिक्र नहीं मिलता.

- साल 1860 का अंग्रेज़ी हुकूमत के ग्रांट का बोर्ड ऑफ कंट्रोल का दस्तावेज कोर्ट के सामने रखा जिसमे मुसलमानों ने ग्रांट का ज़िक्र किया है. जबकि 1858 में बोर्ड भंग हो गया था तो 1860 में कैसे दस्तावेज़ जारी हुआ. 1863 में भी ऐसा ही दिखाया गया और उसे मस्जिद पर कब्जे और मालिकाना हक का आधार बताया गया.
- विकास सिंह ने बुकानन और स्त्रम थेलर की किताबों के हवाले से कहा कि इनमें रामजन्म स्थान की लोकेशन है. तो धवन बोले कि आपने कोर्ट में मजाक बना रखा है. ऑक्सफोर्ड की किताब के हवाले से भी विकास सिंह ने राम जन्मस्थल की सही जगह बताई.
- विकास सिंह ने कहा कि मैं हाईकोर्ट के फैसले के मुताबिक एक नक्शा दिखाना चाहता हूं. तो धवन ने कहा कि धवन कहा कि यह भी किताब का हिस्सा है. मैं किसी भी सूरत में इसे मंजूरी नहीं दे सकता. ये कहते हुए धवन ने नक्शा फाड़ डाला. पांच टुकड़े कर दिए. 
- विकास सिंह ने कोर्ट को बुक दी. CJI ने कहा कि वो नवंबर में इस किताब को पढेंगे. विकास सिंह के कहा कि फैसले से पहले इस किताब को पढ़िएगा. राजीव धवन के बार बार टोकने पर विकास सिंह नाराज हो गए. और कहा कि हमारे पास कम समय है उसके बाद भी राजीव धवन बार बार टोक रहे है.
- हिन्दू महासभा की तरफ से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने बहस शुरू की. विकास सिंह ने किशोर कुणाल की लिखी किताब को रिकॉर्ड पर कोर्ट के समक्ष रखने की पेशकश की. मुस्लिम पक्ष ने इसका विरोध किया. राजीव धवन ने कहा ये नई किताब है. 
- रंजीत कुमार: जन्मभूमि का महत्व भी कैलास मानसरोवर जैसा है. मैं वहां गया तो देखा कि हिन्दू ही नहीं बौद्ध भी उस पर्वत की पूजा उपासना करते हैं. बौद्ध वहां के पत्थरों पर पताका लगाकर उसे ज्वेल ऑफ स्नो या रिन पो छे कहते हैं. पूरा पर्वत बिना किसी प्रतिमा के पवित्र और पूजनीय स्थल माना जाता है.
- मध्यस्थता पैनल ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल की
- सी एस वैधनाथन के बाद गोपाल सिंह विशारद के वकील रंजीत कुमार बहस ने बहस शुरू की. CJI ने रंजीत कुमार को कहा कल आपने कहा था कि आप केवल 2 मिनट बहस करेंगे. रंजीत कुमार ने कहा कि दो मिनट में बहस कैसे पूरा करूंगा. CJI ने मुस्कुराते हुए कहा कि कल तो आप 2 मिनट कह रहे थे. 
- सी एस वैधनाथन ने बहस पूरी करते हुए कहा कि बिना संपति के मालिक हुए 'मुस्लिम पक्ष मालिकाना हक का दावा कर रहा है.'
- सवा ग्यारह बजते ही राजीव धवन ने खड़े होकर कहा कि 45 मिनट हो गए हैं. अब इनकी बहस का समय खत्म हो गया. CJI ने मुस्कुराते हुए कहा अभी 10 मिनट बचे हैं, क्योंकि हम दस मिनट देर से बैठे थे.
- वैद्यनाथन ने अपनी बहस आगे बढ़ाई तो CJI ने आगाह किया कि 5 मिनट में अपना जवाब पूरा कर लें.
- वैद्यनाथन- हालांकि दोनों पक्ष वहां उपासना कर रहे थे. लेकिन मस्जिद को वक़्फ़ करने या डेडिकेशन का कोई प्रमाण या सबूत किसी के पास नहीं है.
- वैधनाथन: ट्रांसलेशन को लेकर 8 वर्षों से कोई आपत्ति नहीं जताई गई. मुस्लिम पक्षकारों को जिरह करने का पर्याप्त अवसर दिया गया. मुस्लिम कह रहे है कि हमने उन्हें वहां से हटाने की कोशिश की. वक्फ वह सिर्फ दावा कर रहे है, उनको दस्तवेज़ दिखाना चाहिए. उनकी तरफ से माना गया कि हिन्दू वहां पूजा कर रहे थे और हिंदुओं को वहां से हटाने की कोशिश की गई.
- वैधनाथन: अगर हम जन्मस्थान पर विश्वास नहीं करेंगे तो फिर हम कहां करेंगे. रामलला विराजमान ने दावा किया 1934 तक ही विवादित स्थल पर नवाज हुई.
- हिंदू पक्ष के वकील सी एस वैद्यानाथन का जवाब: मुस्लिम कहते हैं कि राम चबूतरा भगवान राम का जन्मस्थान था. यह छोटी जगह को बांटने का एक प्रयास था. श्रद्धालु आंतरिक गुबंद में भी पूजा अर्चना करते रहे हैं. 
- सी एस वैद्यानाथन: हम आंतरिक आंगन में प्रार्थना कर रहे थे. लेकिन बाद में रेलिंग के कारण और कानून और व्यवस्था की समस्याओं को हल करने के लिए लगाए गए प्रतिबंध के कारण ये बंद हो गया. विवादित स्थल में 1949 तक वहां अंदर मूर्ति नहीं थी और साप्ताहिक नमाज़ होती थी.
- हाईकोर्ट के फैसले के हवाले से वैद्यनाथन ने सुन्नी बोर्ड के दावे को काटते हुए कहा कि जब ज़मीन का मालिक तत्कालीन हुकूमत थी और उन्हीं की देखरेख में मस्जिद बनाई गई तो सुन्नी बोर्ड ने उसे कैसे डेडिकेट किया? 
- अयोध्या मामले पर सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि अब बहुत हो चुका, हम पांच बजे उठ जाएंगे
- सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अन्य अर्जियों पर सुनवाई से किया इनकार
मंगलवार को सुनवाई के दौरान एक हिन्दू पक्ष ने दलील दी कि भारत विजय के बाद मुगल शासक बाबर द्वारा करीब 433 साल पहले अयोध्या में भगवान राम के जन्म स्थान पर मस्जिद का निर्माण कर ‘ऐतिहासिक भूल' की गयी थी और अब उसे सुधारने की आवश्यकता है.
पीठ के समक्ष एक हिन्दू पक्षकार की ओर से पेश पूर्व अटार्नी जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरण ने कहा कि अयोध्या में कई मस्जिदें हैं जहां मुस्लिम इबादत कर सकते हैं लेकिन हिन्दू भगवान राम का जन्म स्थान नहीं बदल सकते. सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य द्वारा 1961 में दायर मामले में प्रतिवादी महंत सुरेश दास की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने कहा कि विदेशी शासक बाबर द्वारा की गयी ऐतिहासिक भूल को सुधारने की जरूरत है. बाबर ने भगवान राम के जन्म स्थान पर मस्जिद का निर्माण कर ऐतिहासिक भूल की और कहा कि मैं बादशाह हूं और मेरा आदेश ही कानून है.
उन्होंने कहा, ‘अयोध्या में मुस्लिम किसी भी अन्य मस्जिद में इबादत कर सकते हैं. अकेले अयोध्या में 55-60 मस्जिदें हैं. लेकिन, हिंदुओं के लिए यह भगवान राम का जन्म स्थान है...जिसे हम बदल नहीं सकते.'
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संविधान पीठ ने परासरण से परिसीमा के कानून, विपरीत कब्जे के सिद्धांत और अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि से मुस्लिमों को बेदखल किये जाने से संबंधित अनेक सवाल किये. पीठ ने यह भी जानना चाहा कि क्या मुस्लिम अयोध्या में कथित मस्जिद छह दिसंबर, 1992 को ढहाये जाने के बाद भी विवादित संपत्ति के बारे में डिक्री की मांग कर सकते हैं?
पीठ ने परासरण से कहा, ‘वे कहते हैं, एक बार मस्जिद है तो हमेशा ही मस्जिद है, क्या आप इसका समर्थन करते हैं.' इस पर परासरण ने कहा, ‘‘नहीं, मैं इसका समर्थन नहीं करता. मैं कहूंगा कि एक बार मंदिर है तो हमेशा ही मंदिर रहेगा.' 

‘मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ के ख़िलाफ़ जाँच का ऐलान

योगी आदित्यनाथ, मुस्लिम बोर्डजैसे-जैसे राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की घड़ी नजदीक आती जा रही है, हर पक्ष की ओर से बयानों का सिलसिला भी तेज़ होता जा रहा है। अगर मुस्लिम समुदाय के बयानों पर गौर करें तो उनके बीच असहमति बनती दिख रही है। एएमयू के पूर्व कुलपति जमीरुद्दीन शाह ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय चाहे जो भी आए, इस मामले में मुस्लिमों की हार होनी तय है। मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने विवादित ज़मीन हिन्दुओं को दिए जाने की वकालत की। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने शाह के बयान का विरोध किया। अब इस मामले में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का बयान आया है। अब नया बयान मोहसिन रजा का आया है।
योगी सरकार में मंत्री मोहसिन रजा ने कहा कि ‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ के लोग बड़े होटलों में रुकते हैं और फ्लाइट से यात्रा करते हैं। उन्होंने पूछा कि इन सबके लिए रुपया आख़िर आ कहाँ से रहा है? उन्होंने कहा कि मुल्सिम लॉ बोर्ड बस एक एनजीओ की तरह है जो देश के बदले अपने फायदे के लिए काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुधर जाए क्योंकि सरकार उनकी गतिविधियों पर जाँच भी बिठाएगी।
दूसरी सबसे बड़ी आबादी अल्पसंख्यक क्यों कही जाती है? 
कहते हैं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड(NGO) कांग्रेस से दूर होते मुस्लिम समाज को कांग्रेस में बने रहने के उद्देश्य से इस NGO की स्थापना तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी द्वारा करवाई गयी थी और उसका लाभ कांग्रेस आज तक उठा रही है यानि मुस्लिम वोटबैंक की तरह इनका उपयोग कर रही है। इसी कारण कांग्रेस और उसके समर्थक पार्टियां मुस्लिमों की हर जायज-नाजायज मांग का आंख मीच कर समर्थन करते हैं, अल्पसंख्यक के नाम पर कभी उनको देश की मुख्यधारा से जुड़ने से दूर रखने का प्रयास करते रहते हैं। ऐसे में अब चर्चा यह भी है, कि देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी अल्पसंख्यक क्यों कही जाती है?  

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों व अन्य संगठनों द्वारा दिए गए सुझावों को ठुकरा दिया है। आज ‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ की बैठक भी हुई। संगठन ने साफ़ कर दिया है कि विवादित ज़मीन को छोड़ने का कोई सवाल ही नहीं है। मुस्लिम पक्षकार जफरयाब जिलानी ने कहा कि बोर्ड इस तरह की किसी भी माँग से काफ़ी हैरान है। बोर्ड ने क़ानूनी प्रक्रिया से इस मामले का हल निकालने की अपनी बात दोहराई और कहा कि वे सभी सुप्रीम कोर्ट के बहुप्रतीक्षित फ़ैसले का इंतजार कर रहे हैं।
जमीरुद्दीन शाह ने कहा कि अगर हिन्दू पक्ष केस जीत जाता है, फिर भी भारतीय समाज में कुछ ऐसे तत्व हैं जो इसका ग़लत फ़ायदा उठाना चाहेंगे। वहीं उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मोहसिन रजा ने ‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ की फंडिंग पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि टेरर फंडिंग विदेश से होती है। साथ ही उन्होंने पूछा कि बोर्ड को फंडिंग कहाँ से मिल रही है?

मुस्लिम पक्षकार पस्त जब सुप्रीम कोर्ट में खड़े हुए रामलला के 92 वर्षीय वकील के. पराशरण

के पराशरण, राम मंदिरराम मंदिर मामले में सोमवार (सितम्बर 30, 2019) को 34वें दिन की सुनवाई हुई। इस दौरान के. पराशरण ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें रखीं। पराशरण ने उपनिषदों और महाभारत का हवाला देकर अपने तर्कों को रखा। रामलला विराजमान के 92 वर्षीय वकील ने मुस्लिम पक्षकारों द्वारा पिछले कुछ दिनों में कही गई बातों का एक-एक कर जवाब दिया। पराशरण ने इस मामले में न्यायिक व्यक्ति को हिन्दू क़ानून के अनुसार देखने की बात कही। उन्होंने कहा कि हिन्दू देवता को रोमन और अंग्रेजी क़ानूनों के अनुसार नहीं देखा जा सकता।
पराशरण ने अपनी इस दलील को दोहराया कि जन्मस्थान एक न्यायिक व्यक्ति है। इसे साबित करने के लिए उन्होंने कोर्ट के ही कुछ अन्य फ़ैसलों का जिक्र किया। समझाया कि हिन्दू धर्म में एक ही ईश्वर है, जो परम आत्मा है। उन्होंने आगे कहा कि इसी ईश्वर की विभिन्न मंदिरों में और विभिन्न स्वरूपों में पूजा की जाती रही है। पराशरण के दावों से बौखला कर सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि इन बातों का इस केस से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने उदाहरण दिया था, तब उन्हें कोर्ट ने टोका था। धवन ने कोर्ट को निष्पक्ष रहने की सलाह दी।
पराशरण ने धवन की दलीलों को काटते हुए कहा कि विवादित स्थल पर मूर्ति होने या न होने से इस मामले पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। उन्होंने समझाया कि पूजा-स्थल का मुख्य उद्देश्य ईश्वर की पूजा है और वहाँ मूर्ति हो भी सकती है और नहीं भी। पराशरण ने मुस्लिम पक्ष से कहा कि मूर्ति न होने की बात कह कर जन्मस्थान पर सवाल उठाना एक ग़लत तर्क है। धवन की आपत्ति पर पराशरण ने कहा कि उन्होंने ख़ुद हिन्दू पक्ष की दलीलों पर 4 दिन जवाब दिया लेकिन अब सवाल खड़े कर रहे हैं। पराशरण ने कहा कि वो अदालत में जो भी कह रहे हैं, उसका कुछ न कुछ मतलब है।

इससे पहले मुस्लिम पक्षकार निज़ाम पाशा ने कहा कि मस्जिद में स्तम्भ न होने की बात कहना सरासर ग़लत है क्योंकि हदीस में इसका जिक्र है कि नमाज 2 खम्भों पर बनी दीवार पर पढ़ा जाता है। उन्होंने कहा कि बहस धार्मिक पहलुओं पर नहीं बल्कि क़ानूनी पहलुओं पर होनी चाहिए। वहीं मुस्लिम पक्ष की दलीलों का जवाब देते हुए भारतीय न्यायिक व्यवस्था के भीष्म पितामह कहे जाने वाले पराशरण ने कहा:
“स्वयंभू दो प्रकार के होते हैं। एक वह जो ख़ुद प्रकट होते हैं और एक वो जिनकी स्थापना मूर्ति में की जाती है। हमारे यहाँ भूमि भी स्वयंभू ही होती है। यह ज़रूरी नहीं है कि भगवान का कोई निश्चित रूप हो लेकिन सामान्य लोगों को पूजा करने के लिए किसी आकार या आकृति की आवश्यकता पड़ती है। आकृति के होने से उस पर लोगों का ध्यान केंद्रित होता है। दूसरी तरफ जो लोग अध्यात्म में काफ़ी ऊपर उठ चुके होते हैं, उन्हें पूजा वगैरह के लिए किसी आकृति या स्वरूप की ज़रूरत नहीं पड़ती।”
जस्टिस बोबडे ने पराशरण से पूछा था कि उन्हें इस भूमि को एक न्यायिक व्यक्ति या ज्यूरिस्टिक पर्सन साबित करने के लिए इसे ‘दिव्य’ या ‘ईश्वरीय’ साबित करने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? पराशरण ने बताया कि मूर्ति अपने-आप में भगवान नहीं है, लेकिन स्थापना के बाद उसमें दिव्यता आ जाती है। उन्होंने बताया कि ऐसी मूर्ति में स्थापित ईश्वर लोगों की भावनाओं और आस्थाओं का प्रतीक होते हैं। उन्हें समर्पित की गई चल व अचल संपत्ति के भी वह स्वामी होते हैं।
पराशरण ने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि विपत्ति के समय भगवान प्रकट होकर भक्तों की रक्षा करते हैं। उन्होंने जस्टिस बोबडे के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि महाभारत के युद्ध के दौरान भी भगवान श्रीकृष्ण के शास्त्र उठाए बिना पांडवों को जीत मिल गई थी। इस उदाहरण के पीछे का आधार समझाते हुए पराशरण ने कहा कि भक्तों की आस्था ही इतनी मजबूत होती है कि उसके लिए भगवान को आना पड़ता है।

मंदिर के मलबे पर ही बनी थी बाबरी मस्जिद

Image result for k k mohammedअयोध्या विवादपुरातत्व बताता है कि अयोध्या सिर्फ हिंदुओं की मान्यता नहीं है। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात कोरी आस्था नहीं है। जिन पुरातात्विक सबूतों से बाबरी मस्जिद का दावा कमजोर होता है और जिसे हाई कोर्ट ने भी प्रमाणिक माना था, उन्हें जुटाने वालों में 53 मुसलमान थे। इनमें सबसे प्रमुख नाम केके मुहम्मद का है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के क्षेत्रीय निदेशक रहे केके मुहम्मद मलयालम में लिखी अपनी आत्मकथा ‘जानएन्ना भारतीयन’ में बताते हैं कि 1976-77 में ही इस बात के सबूत मिल चुके थे कि बाबरी मस्जिद असल में मंदिर है। उनकी आत्मकथा हिंदी में ‘मैं भारतीय हूॅं’ नाम से है। वैसे, ब्रिटिश राज में पीटर कारनेगी ने भी लिखा था, “यह बात स्थानीय तौर पर पुष्ट होती है कि मुसलमानों की विजय के वक्त अयोध्या में तीन महत्वपूर्ण हिंदू मंदिर थे। जन्मस्थान मंदिर, स्वर्गद्वार मंदिर और ठाकुर मंदिर। पहले पर बाबर ने मस्जिद बनवा दी, जिस पर अभी भी उसका नाम खुदा है। दूसरे मंदिर के साथ औरंगजेब ने वैसा ही किया। तीसरे पर भी बाद में मस्जिद बना दी गई। ये सब इस्लाम के उस मशहूर सिद्धांत के आधार पर किया गया, जिसके तहत उन सभी पर धर्म थोप दिया जाता है, जिन्हें जीत लिया गया हो।” कारनेगी फैजाबाद का पहला ब्रिटिश कमिश्नर था। उसने ही अवध का पहला गजेटियर तैयार किया था। कारनेगी के लिखे से जाहिर है कि बाबरी मस्जिद उसी जगह पर बनाई गई थी, जो जन्मस्थान है।
Image result for k k mohammedImage result for k k mohammedयदि कारनेगी के दावों को नकार दें तो भी खुदाई से मिले साक्ष्य बार-बार इस सत्य को दुहराते हैं कि बाबरी मस्जिद असल में मंदिर के मलबे पर खड़ा किया गया था। मुहम्मद अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, “हमें विवादित स्थल से 14 स्तंभ मिले थे। सभी स्तंभों में गुंबद खुदे हुए थे। ये 11वीं और 12वीं शताब्दी के मंदिरों में मिलने वाले गुंबद जैसे थे। गुंबद में ऐसे 9 प्रतीक मिले हैं, जो मंदिर में मिलते हैं।”
1976-77 में पुरातात्विक अध्ययन के लिए अयोध्या में प्रो. बीबी लाल की अगुवाई में खुदाई हुई थी। इस टीम में मुहम्मद भी थे। बकौल मोहम्मद, “खुदाई के लिए जब हम वहॉं पहुॅंचे तो मस्जिद की दीवारों में मंदिर के खंभे साफ-साफ दिखाई देते थे। मंदिर के उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थरों से किया गया था। स्तंभ के नीचे भाग में 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश 8 ऐश्वर्य चिन्हों में एक माने जाते हैं।”
Image result for k k mohammedएक इंटरव्यू में मोहम्मद ने बताया था कि उस समय इन साक्ष्यों पर उतनी बात नहीं हुई। जब अयोध्या का विवाद गहराया तो उस उत्खनन की रिपोर्ट को लेकर संदेह जताए गए। इसके बाद हाई कोर्ट के आदेश पर एएसआई ने 12 मार्च 2003 से 7 अगस्त 2003 के बीच राम जन्मभूमि परिसर की खुदाई की। खुदाई में कुल 137 मजदूर लगाए गए थे, जिनमें से 52 मुसलमान थे।
खुदाई के बाद एएसआई ने 22 सितंबर 2003 को अपनी 574 पन्नों की रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंपी। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर हाई कोर्ट के तीन जजों ने माना कि विवादित स्थल का केंद्रीय स्थल रामजन्मभूमि ही है। खास बात यह रही कि तीनों जज गर्भगृह के सवाल पर एकमत थे।
हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘अयोध्या का चश्मदीद’ में इन घटनाओं का विस्तार से ब्यौरा दिया है। वे लिखते हैं, “एएसआई ने कुल 90 खाइयाँ खोदीं। पूरे क्षेत्र को पॉंच हिस्सों में बॉंटा। इनमें पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी क्षेत्र और उभरा हुआ प्लेटफॉर्म शामिल था। सभी क्षेत्रों में क्रमवार खुदाई हुई, जिससे ढॉंचों की प्रकृति और उसकी सांस्कृतिकता का अंदाजा लगे। जो अवशेष मिले, उससे साबित होता था कि वहाँ 11वीं शताब्दी का हिंदू मंदिर था।”
खुदाई के दौरान निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर सवाल नहीं उठे, इसके भी बकायदा इंतजाम किए गए थे। हेमंत शर्मा ने इसका ब्यौरा देते हुए लिखा है, “समूची खुदाई और ढॉंचों के अभिलेखीकरण की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई। खुदाई न्यायिक पर्यवेक्षकों, वकीलों और संबंधित पक्षों या उनके नामित व्यक्तियों की मौजूदगी में संपन्न हुई। खुदाई में पारदर्शिता हो, इस खातिर सारी उत्खनित सामग्री दोनों पक्षों की मौजूदगी में ही सील की जाती थी। इसे उसी दिन फैजाबाद के कमिश्नर की ओर से उपलब्ध कराए गए स्ट्रांग रूम में रखा जाता था। हर रोज इस स्ट्रांग रूम को बंद करने के बाद सील किया जाता था।”
एएसआई की रिपोर्ट में खुदाई के दौरान पाए गए अभिलेखों के तीन हिस्सों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी भी है। इनमें एक नागरी में और दो अरबी में पाए गए थे। अरबी अभिलेख में एक 16वीं शताब्दी की नस्ख शैली में था। इसमें कुरान की एक आयत खुदी थी। दूसरा अरबी अभिलेख भी 16वीं शताब्दी के शुरुआत की शैली में था। इसमें अल्लाह शब्द खुदा था। एएसआई के मुताबिक नागरी का पॉंच वर्णों वाला अभिलेख 11वीं शताब्दी का था। मुहम्मद बताते हैं कि विवादित ढॉंचा विध्वंस के बाद मलबे से ‘विष्णु हरिशिला पटल’ मिला था। इसमें 11वीं और 12वीं सदी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है, “यह मंदिर बाली और दस हाथों वाले (रावण) को मारने वाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं) को समर्पित किया जाता है।”
दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार, एएसआई की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि विवादित ढॉंचे के ठीक नीचे एक बड़ी संरचना मिली है। जो अवशेष मिले हैं वह ढॉंचे के नीचे उत्तर भारत के मंदिर होने का संकेत देते हैं। यही नहीं 10वीं शताब्दी के पहले उत्तर वैदिक काल तक की मूर्तियाँ और अन्य वस्तुओं के खंडित अवशेष मिले हैं। इनमें शुंग काल की चूना पत्थर की दीवार और कुषाण काल की बढ़ी संरचना शामिल है।
एएसआई रिपोर्ट में कहा गया है कि विवादित ढांचे के नीचे मिली विशाल संरचना में नक्काशीदार ईंटें, देवताओं की युगल खंडित मूर्तियाँ, नक्काशीदार वास्तुशिल्प, पत्तों के गुच्छे, अमालका, कपोतपाली, दरवाजों के हिस्से, कमल की आकृति जैसी चीजें मिली हैं। विवादित मस्जिद के ठीक नीचे मिले इमारत का आकार 50 गुना 30 मीटर उत्तर-दक्षिण और पूरब-पश्चिम था। इसके 50 खम्भों के आधार मिले हैं। इसके केंद्र बिंदु के ठीक ऊपर विवादित मस्जिद के बीच का गुंबद है, जहाँ अस्थायी मंदिर में भगवान राम की मूर्तियॉं रखी होने की वजह से खुदाई नहीं हो सकी।
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तीन अभिलेख। दो अरबी में और एक नागरी में। अरबी के दोनों अभिलेख 16वीं शताब्दी के। पॉंच वर्णों का नागरी अभिलेख 11वीं शताब्दी का। 16वीं शताब्दी के बाद का इतिहास तो आपको वामपंथी इतिहासकारों ने खूब पढ़ाया है। और ये भी कि मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद नहीं बनाई गई थी!