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जो कुरान में नहीं वह नहीं मानेगे: UCC पर रोते-बिलखते मुस्लिम कट्टरपंथी और छद्दम/ढोंगी सेक्युलरिस्ट्स को वीडियो जरूर देखना चाहिए

यूसीसी पर मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रिया (फोटो साभार : X_ANI)
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 6 फरवरी 2024 को उत्तराखंड विधानसभा में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से जुड़ा बिल पेश कर दिया। इसको लेकर तमाम मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रिया सामने आ रही है। कई मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है और UCC को नकार दिया है। जिसका मुख्य कारण है शरीयत के लागू करने के रास्ते का बंद होना। 
एनजीओ आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा पाकिस्तान को तोड़ बांग्लादेश बनाये पर कांग्रेस से मुस्लिम वोट बैंक को दूर होते देख इसकी स्थापना की गयी थी, यानि मुस्लिम समाज को खुश कर इस वोट बैंक को कांग्रेस की झोली में रखने के लिए तुष्टिकरण के आगे घुटनों के बल बैठना पड़ा। 
UCC के विरोध करने का असली कारण है, इनकी दुकानों और तिजोरी पर प्रहार। भारत में इतने वर्षों के बाद इस कानून को पिछली सरकारों द्वारा तुष्टिकरण के आगे घुटने टेकने की वजह से इस कानून को बनाने के लिए सोंचा तक नहीं था। जिस कारण मुस्लिम कट्टरपंथी अपना वर्जस्व बनाये हुए थे और छद्दम सेक्युलरिस्ट्स सेकुलरिज्म का ढोल पीट हिन्दुओं का हनन करते रहे। 

जब मुस्लिम कट्टरपंथियों और ढोंगी सेक्युलरिस्ट्स अपनी दाल नहीं पकती देखते, तब ये समस्त ढोंगी गैंग संविधान को भूल साम्प्रदायिक भाषा पर उतर आते हैं। राष्ट्र इस गैंग से जानना चाहता है कि विश्व में एक ऐसा देश बताए जहाँ UCC न हो। आखिर कब तक अपनी भड़काऊ हरकतों से बेगुनाह लोगों-हिन्दू एवं मुस्लिम- की लाशों पर बैठ मालपुए खाने के साथ-साथ अपनी तिजोरियों को भरते रहोगे? इमरजेंसी में विपक्ष को जेलों में भर संविधान में Secular शब्द डालने से क्या संविधान सेक्युलर हो गया? देश को उसी तुष्टिकरण की नीति पर चलाया गया। समय बदल रहा है और बहुत तेजी से बदल रहा है, जिस कारण इन सब की दुकानों पर ताला पड़ने वाला है। यह शोर-शराबा, रोना-बिलखना सिर्फ अपनी पार्टियों/संस्थानों(यानि दुकान) को बचाने के लिए है, किसी नागरिक-हिन्दू अथवा मुस्लिम- के लिए नहीं। 

स्मरण हो, जब पिछली बार उत्तराखंड में भाजपा सरकार बनने के बाद, मदरसों और स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों को मिलने वाली राशि को सीधे बैंक खातों में डालने की प्रक्रिया शुरू होने पर शोर मचा था कि 'मदरसों से 98000 बच्चे गायब', कहाँ गए मदरसे जाने वाले बच्चे, किसने अगवा किया? किसी ने अगवा नहीं किया उन बच्चों को, हकीकत में जब नकद भुगतान चल रहा था, इतने बच्चों का मदरसा चालक/संरक्षक अपनी जेब में डाल रहे थे, उस हो रही लूट पर पाबन्दी हो गयी थी।  

कुछ समय से यह सुनने को मिल रहा है कि 2024 चुनाव के बाद मुस्लिम कट्टरपंथियों, सनातन विरोधियों, सर तन से जुदा गैंग, भारत के विरुद्ध षड़यंत्र रचने वाले-चाहे भारत में हो अथवा भारत से बाहर- आदि गैंग पर जबरदस्त प्रहार होने वाला है, जिसमें भारत को विदेशों से भी जबरदस्त समर्थन मिलेगा। लेकिन जब तक उस बात की पुष्टि न हो प्रसारित नहीं करनी चाहिए। यही पत्रकारिता का नियम भी है। इसी सन्दर्भ में एक वीडियो मिला, जिसकी पुष्टि नहीं कि यह कब का है और कहाँ का, लेकिन लगता वजनदार है। देखिए: 

खुद को मुस्लिमों का रहनुमा मानने वाला ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने समान नागरिक संहिता की की जरूरत को ही नकार दिया। कांग्रेस नेता इमरान प्रतापगढ़ी ने समान नागरिक संहिता को मुद्दे से भटकाने वाला बताया। वहीं, सपा नेता एसटी हसन ने कहा कि यह बिल कुरान के खिलाफ होगा तो उसका विरोध किया जाएगा।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बोला- यूसीसी की जरूरत ही नहीं

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा, “जहाँ तक ​​यूसीसी का सवाल है, हमारी राय है कि प्रत्येक कानून में एकरूपता नहीं लाई जा सकती है। यदि आप किसी खास समुदाय को इस यूसीसी से छूट देते हैं तो इसे एक समान कोड कैसे कहा जा सकता है? संविधान का आर्टिकल 25 अभी भी है।”
फिरंगी महली ने आगे कहा, “संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता दी गई है। मुस्लिमों में शादी विवाह के लिए के लिए शरिया लॉ 1937 से मौजूद है। हिंदुओं, सिखों के लिए कानून मौजूद है। ऐसे में किसी यूसीसी की जरूरत नहीं ही है। बाकी हमारी टीम इस बिल की कॉपी मिलने के बाद इसे पढ़ेगी, फिर आगे का फैसला लिया जाएगा।”

उत्तराखंड सरकार फेल, मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश: कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी की भी प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने इस मामले को सियासी बताते हुए कहा, “भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकारों के पास भी गिनाने के लिए काम के तौर पर कुछ नहीं है। उत्तराखंड की सरकार कानून व्यवस्था से लेकर महिला सुरक्षा तक में पूरी तरह विफल हो चुकी है। पुष्कर सिंह धामी के पास और कोई तरीका नहीं बचा है लोकसभा चुनाव में जाने के लिए। यूसीसी का प्रोपेगेंडा खड़ा करना है।”
प्रतापगढ़ी ने कहा, “इस देश में अलग-अलग रंग के फूल हैं। अलग-अलग रंग के फूलों की महत्ता है। आप पूरे देश को एक रंग में रंग देना चाहते हैं। ये कहीं से भी भारत जैसे विविधता वाले देश के लिए अच्छा नहीं है। लेकिन पूरी तरह विफल है। अंकिता भंडारी को आजतक इंसाफ नहीं मिला है। उत्तराखंड में आज भी लोगों के पास रोजगार नहीं है, अग्निवीर योजना को लेकर युवाओं में गुस्सा.. इस सारे मुद्दों पर घिरी हुई उत्तराखंड की सरकार के और कुछ नहीं है।”

असम के बदरुद्दीन अजमल बोले- कचरे में डाल देना चाहिए ये बिल

एआईयूडीएफ के अध्यक्ष और असम से सांसद बदरुद्दीन अजमल ने कहा, “हमारा हिंदुस्तान एक रंगा-रंग बगीचा है। कोई भी बगीचा कितना भी खूबसूरत क्यों न हो, अगर उसमें सिर्फ एक फूल है तो आप उसे ज्यादा देर तक देख नहीं पाएँगे। भारत में लोग सभी धर्मों की संस्कृति जीवित है। यही हमारी खूबसुरती है। एक जिन्न आकर औरत-मर्द सबको एक कर दे… तो ऊपर वाला चाहता तो वैसा ही बना देता। दुनिया में मर्द बनाते ही नहीं, सारी औरतें बन जातीं। औरत नहीं बनाता तो सारे मर्द बन जाते। प्रकृति के खिलाफ कुछ भी ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है।”
अजमल ने आगे कहा, “जब सरकार विफल हो जाती है तो कुछ चमकदार लाना होता है। असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा भी समय-समय पर ऐसा ही करते हैं। लोगों का ध्यान भटकाने के लिए वो कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पीएम मोदी को खुश करना चाहते हैं। ये चलेगा नहीं, क्योंकि ये नेचर के खिलाफ है। बाकी इस बिल को कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए।”

शरियत के खिलाफ कानून बना तो मंजूर नहीं: सपा संसद

इस बिल पर सपा सांसद एसटी हसन ने कहा कि कुरान के खिलाफ कोई भी कानून मंजूर नहीं है। उन्होंने कहा, “अगर कोई कानून ऐसा बनता है, जो हमें… मुसलमानों को कुरान-ए-पाक ने दी गई हिदायत के खिलाफ बनता है। जैसे कि हम साढ़े 14 सौ साल से पैतृक संपत्ति में बेटी को हिस्सा दे रहे हैं। कितना देते हैं, वो अलग बात है। उसके खिलाफ कोई कानून बनता है तो हम उसे मानने को तैयार नहीं है।”
एसटी हसन ने आगे कहा, “अगर मुसलमानों के हित में है, अगर शरियत के हिसाब से है… हर वो कानून शरियत का जिससे दूसरे को परेशानी नहीं हो रही तो इन्हें (भाजपा को) क्यों परेशानी है? कब तक ये हिंदू-मुसलमान कहकर पोलराइज करते रहेंगे। अब लोग तंग आ चुके हैं इस राजनीति से।”
गौरतलब है कि उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) आने के बाद समाज में कई बदलाव होने वाले हैं। नए कानून में विवाह, लिव-इन रिलेशनशिप, उत्तराधिकार से लेकर तमाम सिविल मामलों को लेकर प्रावधान किए गए हैं। ये सारे प्रावधान बिन किसी धार्मिक भेदभाव के सब पर लागू होंगे। मसलन, 18 साल की उम्र में अगर लड़की की शादी होनी है तो यह कानून सारे लोगों पर लागू होगा। 

‘चाचा… शरीयत में मत दे दखल’: जावेद अख्तर को इस्लामी कट्टरपंथियों ने घेरा

                                              जावेद अख्तर और तालिबान (साभार: कोईमोई/डक्कन हेराल्ड)
अफगानिस्तान में कट्टरपंथी तालिबान (Afghanistan, Taliban) शासन द्वारा वहाँ की लड़कियों की शिक्षा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। इसको लेकर बॉलीवुड के गीतकार जावेद अख्तर ने सवाल उठाया है। जावेद अख्तर के इस ट्वीट पर कट्टरपंथियों ने उन्हें घेर लिया।

जावेद अख्तर को कट्टरपंथी ही नहीं, अन्य भी घेर रहे हैं। अब इसे इनका दोगलापन कहा जाए तो कोई अतिशियोक्ति नहीं। ये वही जावेद है जो हिजाब और सर तन से जुदा आदि मुद्दों पर खामोश रहने वाले तालिबान के विरुद्ध किस आधार पर बोल रहे हैं? क्या सर तन से जुदा की मुहीम और तालिबान में कोई अंतर है?

जावेद अख्तर ने ट्वीट किया, “तालिबानियों ने इस्लाम के नाम पर सभी महिलाओं और लड़कियों के स्कूल-कॉलेजों और नौकरियों पर प्रतिबंध लगा दिया है। भारतीय मुस्लिम पर्सनल बोर्ड और अन्य इस्लामिक विद्वानों ने इसकी निंदा क्यों नहीं की। क्यों। क्या वे तालिबानियों से सहमत हैं?”

इसको लेकर अल हिंद नाम के एक ट्विटर यूजर ने लिखा, “श्याम बिहारी की चौथी पीड़ी तू ज़्यादा दख़ल ना दे शरीयत में।”

आदिल साइन नाम के यूजर ने लिखा, “जावेद भाई, अपने मुल्क की चुनौतियों को पहले समझ लें, फिर पड़ोसी मुल्क की बातों पर सोचा जाए। पर नहीं आप तो आप हैं… ऐसी उम्र में लोग थोड़े चिंतित हो ही जाते हैं.. उम्र का कसूर है आप तो मासूम हैं।”

सलमान नाम के यूजर ने लिखा, “भाई सब क्यों अपनी दुर्गति करवाने पर तुले हैं? आपका इस्लाम से कोई लेना देना है क्या?AIMPLB का तालिबान से कोई कनेक्शन बता रहे हो क्या? बेकार क्यों अपनी टाँग फैला रहे हो..जब किसी ने सपोर्ट नहीं किया है तो जरूरी है कि निंदा करें।”

नीलिमा पवार नाम की एक यूजर ने लिखा, “हाँ, भारत के 99% मुस्लिम सहमत हैं और वही शरिया यहाँ लाना चाहते हैं। इसलिए श्रद्धा के कितने भी टुकड़े हो चुप रहते हैं। गजवा-ए-हिंद के सपने देखते है। चाचा आप भी जाग जाओ, क्यूँकी शरिया में गैर मुस्लिम ही नहीं, जो शरिया ना माने वह भी काफिर है। पाकिस्तान में शिया, अहमदिया सभी काफिर हैं।”

संकेत एस जोशी ने लिखा, “मुझे हमेशा आश्चर्य होता है कि इन इस्लामिक देशों का किसी भी क्षेत्र के विकास में क्या योगदान है, जिससे मानव को लाभ होता है। वैज्ञानिक अनुसंधान, उत्पाद विकास, कला, खेल, शिक्षा में कोई बड़ी भूमिका नहीं… लेकिन गोला-बारूद के संबंध में उन्नत तकनीक का उपयोग करने में अग्रणी।”

T. Burhagohain नाम की एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा, “इस्लाम में ईसाई और हिंदू धर्म की तरह एक मजबूत सुधार आंदोलन होना चाहिए। इस धर्म की शुरुआत से इस्लाम में कोई सुधार नहीं हुआ है।”

अफगानिस्तान में तालिबान शासन ने 21 दिसंबर 2022 को एक फरमान जारी करते हुए कहा कि अब तालिबानी महिलाएँ नौकरी और पढ़ाई नहीं करेंगी। तालिबान ने तर्क दिया था, ”विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे कुछ विषय इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ हैं।” इसके साथ ही उसने यह भी कहा था कि लड़कियों पर पश्चिमी देशों का रिवाज हावी हो रहा है।

तेलंगाना : शरिया के हिसाब से कंगारू कोर्ट के गठन की कवायद? वक्फ बोर्ड को ज्यूडिशियल पावर देने की तैयारी

तेलंगाना में शरिया अदालतों की तैयारी?
                                                                                                                                                         प्रतीकात्मक 
ऐसा लगता है कि तेलंगाना की सरकार शरिया कानून के हिसाब से कंगारू अदालतों के गठन का मन बना रही है। इसके लिए वक़्फ़ बोर्ड को ज्यूडिशियल पावर देने की तैयारी चल रही है। यह खुलासा ‘तेलंगाना टुडे’ की रिपोर्ट से हुआ है।
राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री कोप्पुला ईश्वर ने कहा कि वक्फ बोर्ड को न्यायिक दर्जा देने के मुद्दे पर जल्द ही मुख्यमंत्री द्वारा विचार किया जाएगा। AIMIM के अकबरुद्दीन ओवैसी द्वारा उठाए गए एक सवाल के जवाब में मंत्री ने आश्वासन दिया कि तेलंगाना सरकार राज्य भर में वक़्फ़ बोर्ड की संपत्तियों की सुरक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही वक़्फ की जमीनों के हुए दूसरे सर्वे के लिए गैजेट नोटिफिकेशन आने में देरी को लेकर भी उन्होंने बैठक बुलाने का आश्वासन दिया।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) सहित कट्टरपंथी मुस्लिम लंबे समय से भारत में शरिया अदालतें स्थापित करने की माँग कर रहे हैं। AIMPLB यहाँ तक यह दावा कर चुका है कि वह देश के प्रत्येक जिले में शरिया अदालतें स्थापित करना चाहता है।
तेलंगाना सरकार द्वारा शरिया अदालतों को वैध बनाने पर विचार करने का निर्णय खतरनाक परिणामों से भरा हुआ है। यह देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति के लिए आफत पैदा कर सकता है। अगर इसे तेलंगाना सरकार द्वारा अधिकृत किया गया तो इसका अन्य राज्य सरकारों द्वारा अनुसरण किया जा सकता है, जो मुस्लिम कट्टरपंथियों का समर्थन हासिल करने के लिए अपने राज्यों में इसी तरह के आदेश पारित करने के लिए इसका इस्तेमाल करेंगे।
शरिया अदालतें न्यायिक अदालतों के अधिकार को कमज़ोर कर देंगी और देश में एक समानांतर न्यायिक प्रणाली के समान होगी। इतना ही नहीं यह मुल्लों को इस्लाम और सख्ती से स्थापित करने का अवसर भी प्रदान करेगा। जो लोग इसका विरोध करेंगे उन्हें इस्लामी कानून के हिसाब से दंडित करने का अधिकार भी इन्हें मिल जाएगा। इसके जरिए मुल्ले इस्लाम के मध्ययुगीन कानून को फिर से लागू करने का दबाव भी बनाएँगे। जिसके परिणामस्वरूप राज्य में न्यायिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी।

‘मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ के ख़िलाफ़ जाँच का ऐलान

योगी आदित्यनाथ, मुस्लिम बोर्डजैसे-जैसे राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की घड़ी नजदीक आती जा रही है, हर पक्ष की ओर से बयानों का सिलसिला भी तेज़ होता जा रहा है। अगर मुस्लिम समुदाय के बयानों पर गौर करें तो उनके बीच असहमति बनती दिख रही है। एएमयू के पूर्व कुलपति जमीरुद्दीन शाह ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय चाहे जो भी आए, इस मामले में मुस्लिमों की हार होनी तय है। मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने विवादित ज़मीन हिन्दुओं को दिए जाने की वकालत की। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने शाह के बयान का विरोध किया। अब इस मामले में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का बयान आया है। अब नया बयान मोहसिन रजा का आया है।
योगी सरकार में मंत्री मोहसिन रजा ने कहा कि ‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ के लोग बड़े होटलों में रुकते हैं और फ्लाइट से यात्रा करते हैं। उन्होंने पूछा कि इन सबके लिए रुपया आख़िर आ कहाँ से रहा है? उन्होंने कहा कि मुल्सिम लॉ बोर्ड बस एक एनजीओ की तरह है जो देश के बदले अपने फायदे के लिए काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुधर जाए क्योंकि सरकार उनकी गतिविधियों पर जाँच भी बिठाएगी।
दूसरी सबसे बड़ी आबादी अल्पसंख्यक क्यों कही जाती है? 
कहते हैं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड(NGO) कांग्रेस से दूर होते मुस्लिम समाज को कांग्रेस में बने रहने के उद्देश्य से इस NGO की स्थापना तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी द्वारा करवाई गयी थी और उसका लाभ कांग्रेस आज तक उठा रही है यानि मुस्लिम वोटबैंक की तरह इनका उपयोग कर रही है। इसी कारण कांग्रेस और उसके समर्थक पार्टियां मुस्लिमों की हर जायज-नाजायज मांग का आंख मीच कर समर्थन करते हैं, अल्पसंख्यक के नाम पर कभी उनको देश की मुख्यधारा से जुड़ने से दूर रखने का प्रयास करते रहते हैं। ऐसे में अब चर्चा यह भी है, कि देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी अल्पसंख्यक क्यों कही जाती है?  

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों व अन्य संगठनों द्वारा दिए गए सुझावों को ठुकरा दिया है। आज ‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ की बैठक भी हुई। संगठन ने साफ़ कर दिया है कि विवादित ज़मीन को छोड़ने का कोई सवाल ही नहीं है। मुस्लिम पक्षकार जफरयाब जिलानी ने कहा कि बोर्ड इस तरह की किसी भी माँग से काफ़ी हैरान है। बोर्ड ने क़ानूनी प्रक्रिया से इस मामले का हल निकालने की अपनी बात दोहराई और कहा कि वे सभी सुप्रीम कोर्ट के बहुप्रतीक्षित फ़ैसले का इंतजार कर रहे हैं।
जमीरुद्दीन शाह ने कहा कि अगर हिन्दू पक्ष केस जीत जाता है, फिर भी भारतीय समाज में कुछ ऐसे तत्व हैं जो इसका ग़लत फ़ायदा उठाना चाहेंगे। वहीं उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मोहसिन रजा ने ‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ की फंडिंग पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि टेरर फंडिंग विदेश से होती है। साथ ही उन्होंने पूछा कि बोर्ड को फंडिंग कहाँ से मिल रही है?

मंदिर निर्माण पर अध्यादेश और तीन तलाक पर कानून बना तो देंगे कोर्ट में चुनौती: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड


मंदिर निर्माण पर अध्यादेश और तीन तलाक पर कानून बना तो देंगे कोर्ट में चुनौती: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्डऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने रविवार(दिसम्बर 16) को कहा कि तीन तलाक पर संसद में कानून बनाए जाने की स्थिति में वह इसे अदालत में चुनौती देगा. केंद्र सरकार तीन तलाक पर अध्यादेश लाई है. इसकी मियाद छह महीने होगी. अगर यह गुजर गई तो कोई बात नहीं लेकिन अगर इसे कानून की शक्ल दी गई, तो बोर्ड इसको अदालत में चुनौती देगा.
बोर्ड की कार्यकारिणी समिति की यहां हुई बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य कासिम रसूल इलियास में बताया कि कहा कि यह अध्यादेश मुस्लिम समाज से सलाह-मशवरा किए बगैर तैयार किया गया है और अगर सरकार इसे संसद में विधेयक के तौर पर पेश करेगी तो बोर्ड सभी धर्मनिरपेक्ष दलों से गुजारिश करेगा कि वे इसे पारित ना होने दें.
जहरीले बयानों पर लगे रोक
इलियास ने बताया कि बोर्ड का स्पष्ट रुख है कि वह बाबरी मस्जिद मामले में अदालत के अंतिम फैसले को स्वीकार करेगा. बैठक में यह भी राय बनी कि सरकार मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश या कानून लाने की मांग के साथ दिए जा रहे जहरीले बयानों पर रोक लगाए.

अयोध्या पर अध्यादेश
बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य जफरयाब जीलानी ने इस मौके पर कहा कि अयोध्या के विवादित स्थल पर यथास्थिति बरकरार रहने की स्थिति में कोई अध्यादेश नहीं लाया जा सकता. धर्मनिरपेक्षता संविधान का आधार है और अगर सरकार अध्यादेश या कानून जाती है तो वह संवैधानिक तौर पर सही नहीं होगा.

कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटा रहे
इस सवाल पर कि बोर्ड मंदिर बनाने के लिए विश्व हिंदू परिषद तथा अन्य कुछ संगठनों द्वारा विभिन्न आयोजन करके सरकार पर दबाव बनाए जाने की शिकायत सुप्रीम कोर्ट से क्यों नहीं करता, जीलानी ने कहा कि वह शीर्ष अदालत के रवैया को अच्छी तरह जानते हैं इसीलिए हम मंदिर को लेकर हो रही बयानबाजी के खिलाफ अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा रहे हैं. उन्होंने बताया कि इससे पहले जब बोर्ड ने विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल के खिलाफ शिकायत की थी तब अदालत ने कहा था की इन बातों में पड़ना ठीक नहीं है और इनका अदालत पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

दारुल कजा का गठन
इलियास ने बताया कि बैठक में बोर्ड की दारुल कजा कमेटी की रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें बताया गया कि इस साल देश में 14 नई दारुल कजा का गठन किया गया है. इस महीने के अंत तक कुछ और स्थानों पर भी इन्हें कायम किया जाएगा. दारुल कजा में कम वक्त में जायदाद, वरासत और तलाक जैसे मामलों का निपटारा किया जाता है. उन्होंने बताया कि बैठक में यह फैसला किया गया है कि दारुल कजा के फैसलों का दस्तावेजीकरण किया जाएगा ताकि अदालत के बोझ को कम करने में दारुल कजा के योगदान को दुनिया के सामने लाया जा सके.

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Mr K K MUHAMMED, Ex Regional Director, ASI, Demolished the theory of Babri Masjid spread by secular and left Historian. He said it was a mandir and it is the...

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राजनीति कितने निचले स्तर पर जा सकती है, इसका उदाहरण 
बोर्ड की महिला इकाई की प्रमुख असमा ज़हरा ने इस मौके पर बताया कि उनकी रिपोर्ट के मुताबिक पूरे मुल्क में तीन तलाक अध्यादेश और शरई कानूनों में दखलअंदाजी के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में करीब दो करोड़ महिलाओं ने शिरकत की. 

‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ का नारा लगाती भीड के साथ दिखा मुस्लिम भाजपा नेता तो किया गया समुदाय से बेदखल !

भाजपा के अल्पसंख्यक नेता जाहिर कुरैशी (दाईं ओर)
जनसत्ता के अनुसार सप्ताह भर पहले ऐसी खबर आई थी कि गुजरात के वडोदरा स्थित याकूतपुरा के एक मस्जिद ने गेट पर बोर्ड लगाकर भाजप के एक अल्पसंख्यक नेता जाहिर कुरैशी की प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया था। अब इस नेता पर वडोदरा शहर जिला कुरैशी जमात पंच (मुस्लिम कसाइयों का संगठन) ने एक्शन लेते हुए सोमवार (10 नवंबर, 2018) को कुरैशी का सामाजिक बहिष्कार करने का ऐलान किया। बता दें कि जाहिर दिवंगत नेता गनी कुरैशी के बेटे हैं, जो गुजरात मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (MRM) के प्रमुख थे। आरोप है कि जाहिर ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ का नारा लगाते हुए एक भीड के साथ नजर आए थे। समुदाय के नेताओं ने इसे विश्वासघात करार दिया। समुदाय के नेताओं ने कथित तौर पर शहर के अन्य मस्जिदों में नेता की एंट्री पर बैन लगा दिया और उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया।
अहमदाबाद के एक व्यापारी उस्मान कुरैशी ने कहा, ‘यह परिवार समुदाय के खिलाफ जाने के लिए कुख्यात है। अयोध्या में विवादित स्थल पर मंदिर बनाने की वकालत करके और ऐसी प्रतिज्ञा लेने के बाद इस शख्स को समाज से बाहर कर दिया गया है। ‘हालांकि, जाहिर कुरैशी ने कहा, ‘कुछ समाज विरोधी तत्व हैं। वे नहीं चाहते कि समाज में शांति कायम हो और माहौल बेहतर हो। ऐसा इसलिए क्योंकि मैं भाजप के साथ हूं !’
वहीं, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक ने कहा, ‘वह खुद मंदिर नहीं बनाना चाहते बल्कि वह मंदिर निर्माण के लिए लोगों का समर्थन जुटाना चाहते हैं। मैंने उन्हें सलाह दी है कि अपनी योजना में आगे बढ़ने से पहले वह अपने समुदाय के नेताओं को मनाएं !’ बता दें कि मस्जिद में एंट्री पर बैन लगने की खबरें आने के बाद कुरैशी ने कहा था कि वह राम मंदिर मसले का शांतिपूर्ण हल चाहते हैं, इसलिए नेताओं से मिलने देहली गए थे। उनका कहना है कि उनकी इस मुलाकात को लेकर कुछ लोगों में गुस्सा था।
अब प्रश्न यह है कि "क्या भाजपा का अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ और संघ का मुस्लिम मंच मन्दिर मुद्दे पर मन्दिर के पक्ष में आवाज़ उठाकर मन्दिर विरोधियों को बेनकाब करने में सक्षम होंगे?" 
फिर खुदाई में जितने भी सबूत मिले हैं, यदि उसका 000000.000001 प्रतिशत भी मस्जिद के पक्ष में सबूत मिला होता, भारत में जितने भी छद्दम धर्म-निरपेक्ष हैं, संसद में अध्यादेश लाकर मस्जिद बनवा दी होती। लेकिन मुग़ल पूजक हिन्दू ही अपनी कुर्सी की खातिर अपने आराध्य श्रीराम के मन्दिर का विरोध कर रहे हैं। दूसरे, पाकिस्तान कट्टरपंथियों और छद्दम धर्म-निरपेक्षों के मन्दिर विरोध की धमकी में कोई अन्तर नहीं।